Sunday, 6 February 2022

व्यवहारवाद की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

व्यवहारवाद की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। 

व्यवहारवाद अथवा व्यवहारवादी क्रान्ति एक राजनीतिक घटना है। इसकी उत्पत्ति वास्तव में परम्परावादी राजनीतिशास्त्र की कमियों के कारण हुई है। जब राजनीतिक विज्ञान के विद्वानों ने परम्परागत पद्धतियों में निराशाजनक परिणाम देखे तो वे नई पद्वतियों को खोजने की ओर अग्रसर हए। इसी क्रम में, विशेषतः उन्होंने अमेरिका में इस प्रकार की अध्ययन पद्वति की खोज कर ली जिसके द्वारा राजनीतिक घटनाओं का वैज्ञानिक आधार पर अध्ययन राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत सरलतापूर्वक होने लगा। 

व्यवहारवाद की आलोचनात्मक व्याख्या

  1. व्यवहारवादियों के पास संगतता से सम्बन्धित मान्यताएँ नहीं हैं, क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण केवल अनुभववादी ज्ञान पर आधारित नहीं हो सकता। अतः व्यवहारवादी राजनीतिशास्त्रियों ने अपने सिद्धांतों को कम महत्त्वपूर्ण खोजों पर उद्धृत किया है।

  2. स्वयं व्यवहारवादियों का व्यवहार आलोचना से परे नहीं है। उनमें मत वैभिन्नयता पाई जाती है।

  3. व्यवहारवादी अपने दृष्टिकोण में मर्यादित भी हैं और अहंकारी भी। एक तरफ तो वे अपनी मान्यताओं को सापेक्ष कहते हैं, दूसरी तरफ वे किसी भी अन्य अध्ययन सामग्री के अस्तित्व को तब तक महत्त्व नहीं देते जब तक कि उसका मापन या परिमाण न किया जा सके। यह कट्टरवादी दृष्टिकोण व्यवहारवाद को मर्यादित तथा लोचहीन बना देता है।

  4. स्वयं अमेरिका में जहाँ व्यवहारवाद की नींव रखी गई और विकास हुआ, व्यवहारवादी अनुसन्धान अधिक खर्चीला प्रमाणित हुआ और करोड़ों डॉलर की धनराशि व्यय होने के पश्चात् भी एक विश्वस्त प्रामाणिक तथा सन्तोषप्रद धरातल की उत्पत्ति नहीं कर सका।

  5. व्यवहारवादी तथ्यों तथा आँकड़ों को एकत्र करने में इतने उलझे रहते हैं कि कितनी ही बार व्यवहारिक तथा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को भुला देते हैं। अपनी प्रकृति से राजनीतिशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है, जो पूर्णतः प्राकृतिक विज्ञान नहीं बन सकता।

  6. व्यावहारवादी प्राकृतिक और राजनीतिक विज्ञानों में अन्तर की उपेक्षा कर देते हैं और यह स्वीकार नहीं करते कि दोनों विज्ञानों की प्रविधियों और मूल्यांकन तकनीकों में अन्तर होना चाहिए। अपनी प्रकृति से राजनीतिशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है जो पूर्णतः प्राकृतिक विज्ञान नहीं बन सकता है। यही नहीं, उसे प्राकृतिक विज्ञान के समकक्ष भी नहीं बनाया जा सकता है।

  7. मूल्यों के विषय में व्यवहारवादी धारणा त्रुटिपूर्ण है। इस बारे में प्राकृतिक विज्ञानों का अनुसरण नहीं किया जा सकता है। प्राकृतिक विज्ञानों में मूल्यों तथा वास्तविकता में अन्तर करना सम्भव है, किन्तु राजनीतिक विज्ञान में मूल्य तथा वास्तविकताएँ एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। कुछ छोटी-मोटी बातों को लेकर इनको एक-दूसरे से पृथक् करना कठिन है। आलोचकों का कथन है कि व्यवहारवादी कहें कछ भी. परन्तु वे अपने मूल्य से अवश्य प्रभावित होते हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक में मूल्यों से असम्बद्ध नहीं रहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त। व्यवहारवादी सभी प्रकार के मूल्यों को एक तुला पर रखकर तौलते हैं जोकि गलत है।

लियोस्ट्रास ने लिखा है, “सभी मूल्यों का साझा करते हुए तथा इस तथ्य से इनकार करते हुए कि कुछ मूल्य उच्च तथा कुछ निम्न हैं और यह स्वीकार करते हुए कि मनुष्य और पशु में कोई मौलिक अन्तर नहीं है, यह बिल्कुल मनगढंत है।" इस प्रकार आजकल अनेक व्यवहारवादी मूल्यों के महत्त्व को स्वीकार करने लगे हैं। 

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