Monday, 27 December 2021

असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ होने प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।

असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ होने प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. प्रथम विश्वयुद्धोत्तर काल की भारतीय परिस्थितियों का असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ होने में क्या योगदान था?
  2. 'रॉलेट एक्ट' के विषय में आप क्या जानते हैं ? यह किस प्रकार असहयोग आन्दोलन का एक कारण बना ?
  3. जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने असहयोग आन्दोलन को अवश्यम्भावी बना दिया था, स्पष्ट करें।
  4. 'हण्टर समिति प्रतिवेदन' पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
  5. असहयोग आंदोलन के प्रमुख 5 कारणों का वर्णन कीजिए
  6. 'खिलाफत आन्दोलन' क्या था ? असहयोग आन्दोलन के प्रादुर्भाव में इसकी क्या भूमिका थी?

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी व्यवस्था में अन्याय, अत्याचार व शोषण पनपता है तो जनता द्वारा शोषणकारी राज्य व सरकार के विरुद्ध आवाज अवश्य ही उठायी गयी है। यही स्थिति भारतीय जनता की भी रही। सन् 1918-19 ई. तक की भारतीय परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार की शोषणकारी नीतियाँ चरम पर थी। ऐसे में जनता का विरोध करना अवश्यंभावी हो गया। तत्कालीन समय में भारतीय राजनीतिक पटल पर महात्मा गाँधी का उदय हो चुका था। उन्होंने भारतीय जनमानस को विरोध प्रदर्शित करने का एक नवीन मार्ग दिखलाया, यह मार्ग 'असहयोग' व सत्याग्रह का मार्ग था, जोकि अहिंसा, नैतिकता और सद्भावना पर आधारित था। प्रारम्भ में महात्मा गाँधी ब्रिटिश सरकार के सहयोगी बने रहे परन्तु सत्ता के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से व्यापक अहिंसात्मक विरोध का बिगुल फूंक दिया। 'असहयोग आन्दोलन' उनके ब्रिटिश सरकार विरोधी एवं भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन सम्बन्धी कार्यक्रम का प्रथम व्यापक प्रत्यक्षीकरण था।

असहयोग आन्दोलन के तत्कालीन परिस्थितियों में अनेक अपरिहार्य कारण मौजूद थे, जिनमें से कुछ प्रमुख कारणों का उल्लेख निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है .

असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ होने के कारण

सन् 1919 ई. में प्रारम्भ हए असहयोग आन्दोलन के निम्नलिखित प्रमुख कारण थे -

  1. प्रथम विश्वयद्धोत्तर कालीन भारत में घोर निराशा और असन्तोष - स्वतंत्रता, प्रजातन्त्र और आत्मनिर्णय के नाम पर लड़े गये प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय जनता से ब्रिटिश सरकार ने शीघ्रातिशीघ्र उत्तरदायी शासन की स्थापना के आश्वासन द्वारा धन-जन की भरपूर सहायता प्राप्त की। परन्तु युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत को पूर्ण स्वराज्य न देकर 1919 ई. का भारतीय शासन अधिनियम पारित कर दिया जो भारतीय जनता की आशाओं के विपरीत था। इस अधिनियम से कोई भी संतुष्ट नहीं था। इस सन्दर्भ में तिलक ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था कि . "हमें बिना सूर्य के प्रभात दिया गया है। इसके साथ-साथ ब्रिटिश सरकार द्वारा युद्ध में व्यय की गई अपार राशि (लगभग 1.5 अरब पौण्ड) को भी भारतीय जनता से वसूलने का प्रयास किया गया। जनता पर भारी मात्रा में 'कर' लगाये गये तो वहीं तमाम आवश्यक वस्तुओं के दामों में भी असाधारण वृद्धि करके धन की वसूली की गयी। इन स्थितियों के चलत जनसाधारण को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। अतः इन निराशाजनक स्थितियों में जनता के पास प्रतिकार के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था। फलस्वरूप जनता ने असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
  2. रौलेट एक्ट - प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त भी तमाम सुधारवादी आश्वासनों की उपेक्षा करते हुए ब्रिटिश सरकार स्वाधीनता हेतु संघर्षरत क्रान्तिकारियों पर नियन्त्रण के नाम पर अपना दमन चक्र निरन्तर बनाए रखना चाहती थी। इस हेतु ब्रिटिश सरकार ने सन 1917 ई. में 'सर सिडनी रौलेट' की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति ने लगभग 4 माह उपरान्त अप्रैल, 1918 ई. में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के वर्तमान फौजदारी कानून क्रान्तिकारियों और उनकी गतिविधियों को कुचलने के लिए अपर्याप्त हैं। अतः सरकार ने इस सन्दर्भ में दो विधेयकों को तैयार कर उन्हें पारित करा लिया, इन्हें ही 'रौलेट एक्ट' के नाम से जाना जाता है। रौलेट एक्ट अधिनियम के तहत किसी भी व्यक्ति को महज संदेह के आधार पर गिरफ्तार करके अनिश्चित समय तक नजरबन्द रखा जा सकता था। 18 मार्च, 1919 ई. को 'रौलेट एक्ट' लाग कर दिया गया। इसका भारत में चारों ओर घोर विरोध हुआ। पं. मोतीलाल नेहरू के शब्दों में, "अधिनियम ने अपील, वकील और दलील की व्यवस्था का अन्त कर दिया।" अतः इस एक्ट ने की असहयोग आन्दोलन को आवश्यम्भावी बना दिया।
  3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड - रौलेट एक्ट के विरोध में भारत के अन्य प्रान्तों के समान ही पंजाब में भी हड़ताले और प्रदर्शन प्रारम्भ हो गये। तत्कालीन पंजाब का गवर्नर 'मायकेल ओ डायर' था, जोकि अत्यन्त ही अत्याचारी व स्वेच्छाचारी अधिकारी था। उसने इस प्रकार के आन्दोलनों को सख्ती से कुचलने का निर्णय लिया। उसने कांग्रेसी नेताओं डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की बन्दी बना लिया। 13 अप्रैल, सन् 1919 ई. को बैशाखी के पुनीत पर्व पर अमृतसर के जलियाँवाला बाग में इन अत्याचारी नीतियों का विरोध करने हेतु एक अहिंसात्मक जन सभा का आयोजन किया गया। इसमें अपार जनसमूह ने भाग लिया जिसमें स्त्री-पुरुष, बालक, वृद्ध इत्यादि सभी शामिल थे। यह स्थान तीन ओर से ऊँची-ऊँची दीवारों से घिरा था, उसमें आने-जाने का केवल एक संकरा मार्ग था। जब तकरीबन 25,000 के लगभग जनता वहाँ एकत्रित होकर शान्तिपूर्ण ढंग से ब्रिटिश सरकार की अत्याचारी नीतियों का विरोध कर रही थी। ऐसे ही समय जनरल डायर सेना की टुकड़ी के साथ वहाँ पहुँचा और बिना किसी चेतावनी एवं हवाई फायर के सीधे गोली मारने का आदेश दे दिया। फलस्वरूप लगभग 10 मिनट तक लगातार गोलियों बरसती रहीं और निहत्थे, असहाय लोग तिल-तिल कर मरते रहे। इस गोलीकाण्ड में लगभग 1 हजार लोग मारे गये। इससे समस्त भारत की जनता का खून खौल उठा और इसी उत्तेजना ने असहयोग आन्दोलन के प्रारम्भ को अपरिहार्य बना दिया।
  4. हंटर समिति प्रतिवेदन - ब्रिटिश शासन ने पंजाब राज्य की घटना से उत्पन्न भारतीय जनता के, क्रोध को शान्त करने के लिये एवं गाँधी जी द्वारा दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही की माँग को देखते हुए हंटर समिति गठित की गयी। इस समिति में लॉर्ड हंटर अध्यक्ष तथा कुछ अन्य सदस्य नियुक्त किये गये। इस समिति को जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जाँच करनी थी। परन्तु आशा के विपरीत समिति ने दोषी अधिकारियों के कृत्य को न्यायोचित ठहराया। इसी क्रम में 'डायर' के प्रशंसकों ने उसे चाँदी की तलवार और 20 हजार पौण्ड की धनराशि देकर सम्मानित किया। यह सब भारतीय जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान था। वास्तव में जलियाँवाला बाग हत्याकांड ओर हण्टर समिति के प्रतिवेदन ने भारतीय जनता के हृदय में एक ऐसे ज्वालामुखी को जन्म दिया जो आगे चलकर 'असहयोग आन्दोलन' के रूप में फूट पड़ा।
  5. खिलाफत आन्दोलन - प्रथम विश्वयुद्ध में टर्की मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध जर्मनी के साथ लड रहा था। चूंकि भारतीय मुसलमान टर्की के सुल्तान को अपना खलीफा (धर्म गुरु) मानते थे। अतः ब्रिटेन द्वारा टर्की के विरुद्ध युद्ध किया जाना उनकी दृष्टि में उनके धर्म गुरु का विरोध किया जाना था। इसलिये इस युद्ध में भारतीय मुसलमान ब्रिटेन को किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं देना चाहते थे। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मुसलमानों का सहयोग प्राप्त करने हेतु यह आश्वासन दिया कि युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटेन टर्की के प्रति बदले की भावना से व्यवहार नहीं करेगा और न ही उसे विभाजित करेगा। परन्तु यद्ध समाप्ति पर ब्रिटिश सरकार ने सेवर्स की सन्धि के तहत टर्की को छिन्न-भिन्न कर दिया। खलीफा को बन्दी बना लिया गया। इस घटना से भारतीय मुसलमान ब्रिटिश शासन के अत्यधिक विरुद्ध हो गये। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खलीफा की सत्ता पुनस्थापित करने के लिए 'खिलाफत आन्दोलन' प्रारम्भ कर दिया। गाँधी जी ने खिलाफत आन्दोलन का समर्थन किया। हिन्दु-मुस्लिम एकता स्थापित होने के आधार पर असहयोग आन्दोलन करने का निश्चय किया गया।

इस प्रकार उपर्युक्त प्रमुख कारणों के चलते असहयोग आन्दोलन का प्रादुर्भाव हुआ।

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