Saturday, 5 February 2022

व्यवहारवाद की सीमाएं बताइये। Vyavharvad ki Seema

व्यवहारवाद की सीमाएं बताइये। Vyavharvad ki Seema

व्यवहारवाद की सीमाएं - 

  1. जब व्यवहारवादी अध्ययन प्रारम्भ किया जाता है, तो उसकी निश्चित सीमाएँ स्पष्ट होने लगती हैं: उदाहरणार्थ मनुष्य की व्याख्या नियन्त्रित परिस्थितियों तथा कछ विशेष मान्यताओं के अन्तर्गत की जा सकती है। कुछ ऐसे ढंग तथा धारणाएँ भी हैं जिनको व्यवहारवादी ढंग से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

  2. व्यवहारवादी नीति-निर्माण के लिए प्रत्येक दृष्टिकोण से पूर्ण नहीं है। नीति-निर्माण के नैतिक पक्ष में कोई इसका योगदान नहीं है, क्योंकि यह मूल्य को उचित नहीं समझता है अनुभवजन्य पक्ष में इसका योगदान कुछ सीमा तक होता है, क्योंकि सम्पूर्ण तथ्यों के लिए व्यवहारवादी ढंग का प्रयोग नहीं किया जा सकता।

    विधायी पक्ष प्रायोगिक विज्ञान तथा दर्शन पर आधारित है, जो व्यवहारवादी शक्ति के बाहर की बात है। इस नीति-निर्माण की दृष्टि से व्यवहारवादी उपयोगिता सीमित है।

  3. राजनीति को परिभाषित करने के लिए केवल व्यवहारवादी ढंग ही नहीं है। उसका मस्तिष्क की धारणाओं द्वारा भी पता लगाया जा सकता है।

  4. व्यवहारवाद की मान्यता मूल्य-निरपेक्षता है, परन्तु शोधकर्ता के मूल्य तथा विचारधाराएँ अन्वेषण के लिए विषय के चयन को प्रभावित करती हैं।

  5. परम्परावादी व्यवहारवाद को उपयोगी मानते हैं, किन्तु उन्होंने उसकी सीमा निर्धारित कर दी है।

  6. अध्ययनकर्ता की अवधारणाएँ केवल क्या और कैसे का ही निधारिण नहीं करती है वरन् उसके लक्ष्यों के निर्णय को भी प्रभावित करती है।

  7. व्यवहारवादी इस बात को भी स्पष्ट करते हैं कि हमें राजनीतिक जीवन में किसे महान् या श्रेष्ठ समझना चाहिए और किसे नहीं। इस दृष्टिकोण से उन परिस्थितियों में सफलता या असफलता के बारे में पूर्व की बातें बताई जा सकती हैं, परन्तु व्यवहारवादी सभी प्रकार की परिस्थितियों मे अन्तिम मूल्य का चुनाव नहीं कर सकता है।

उपरोक्त विवेचन से यह तथ्य स्पष्ट है कि व्यवहारवादी दृष्टिकोण की कुछ अपनी सीमाएँ हैं जिनके अनुसार उसे चलना पड़ता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य के जीवन का केवल विज्ञान की विधियों से ही अध्ययन नहीं किया जा सकता है। इसके उत्तर में व्यवहारवादियों का मत है कि भविष्य में अधिक तकनीकी खोज करके दृष्टिकोण को अपने आपमें पूर्ण बनाया जा सकता है, परन्तु आलोचकों का कथन है कि व्यवहारवादी की सीमाएँ केवल कल्पनात्मक हैं।

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