Sunday, 24 March 2019

एनसीसी की स्थापना तथा छात्रों के लिए एनसीसी लाभ

एनसीसी की स्थापना तथा छात्रों के लिए एनसीसी लाभ

एनसीसी की स्थापना तथा छात्रों के लिए एनसीसी लाभ

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राष्‍ट्रीय केडेट कोर (एनसीसी) की स्थापना 16 जुलाई, 1948 को तब की गई जब संसद ने इसके लिए एक कानून पास किया। शायद यह भारत में छात्र समुदाय के लिए एक अनोखा अवसर था। 1948 में कश्‍मीर युद्ध के बाद भारत ने एक महत्‍वपूर्ण सबक यह सीखा कि आजादी की रक्षा के लिए शक्‍तिशाली सशस्‍त्र बल की जरूरत पड़ती है। इसके बाद तुरंत कर्रावाई यह की गई कि सिफारिशों पर आधारित कुंजरू समिति का गठन किया गया, जिसे एक विधेयक का मसौदा तैयार करना था, जो उन सिफारिशों पर आधारित हो जो 13 मार्च 1948 को संविधान सभा के सामने पेश की गई थीं और जिन्‍होंने इस सभा के सदस्‍यों में गहरी दिलचस्‍पी और उत्‍साह पैदा किया था। उचित जांच और बहस तथा कई संशोधनों के पश्‍चात सभा द्वारा एक विधेयक 08 अप्रैल, 1948 को तैयार किया गया। केंद्र सरकार ने इस मामले में राज्‍य सरकार की यह राय मंजूर कर ली जिसके अनुसार एक केडेट कोर का गठन किया जाना था और जिसे बाद में नेशनल केडेट कोर (एनसीसी) कहा गया। कुंजरू समिति ने भी समिति ने भी ऐसी ही सिफारिश की थी। इस विधेयक को 16 अप्रैल, 1948 को गवर्नर जनरल का अनुमोदन मिल गया और इस तरह से राष्‍ट्रीय केडेट कोर (एनसीसी) अस्‍तित्‍व में आया।

एनसीसी का विकास
एनसीसी को विकसित होने में कई वर्ष लग गए। शुरू-शुरू में एनसीसी राइफल्‍स का गठन एक पैदल सेना की बटालियन की तर्ज पर किया गया और बाद में इसी को सामान्‍य यूनिट में बदल दिया गया। चीन के साथ युद्ध के बाद 1963 में एनसीसी को सभी छात्रों के लिए अनिवार्य बना दिया गया। इसके परिणामस्‍वरूप उनकी संख्‍या 17.16 मिलियन तक पहुंच गई। इस भारी संख्‍या को अव्‍यावहारिक माना गया और इसी बात को ध्‍यान में रखते हुए 1969 में इसे स्‍वैच्‍छिक बनाने की सिफारिश की गई, जो आज तक चल रही है।
एनसीसी तीनों सेनाओं द्वारा चलाई जाती है। इसका प्रमुख महानिदेशक होता है, जिसका रेंक लेफ्टिनेंट जनरल का होता है। एनसीसी यूनिटों के नियंत्रण और उनमें दाखिले तथा ट्रेनिंग के लिए 17 क्षेत्रीय निदेशालय हैं और इनके प्रमुख अतिरिक्‍त महानिदेशक या उप महानिदेशक होते हैं। इनका रेंक मेजर जनरल या ब्रिगेडियर अथवा नौसेना और वायु सेना में इनके समकक्ष पदों वाला होता है। वर्तमान में 1960 एनसीसी ग्रुप हेडक्‍वाटर हैं और इनके नीचे 800 यूनिटें हैं, जो देश के 633 जिलों में एनसीसी का काम देखती हैं।
आज एनसीसी दुनिया का स्‍वैच्‍छिक रूप से गठित सबसे बड़ा यूनिफार्म पहनने वाला युवा संगठन है और इसके कैडेटों की संख्‍या 13.4 लाख है। सरकार ने वर्ष 2015 तक एनसीसी कैडेटों की संख्‍या बढ़ाकर 15 लाख करने के आदेश जारी किए हैं। भारत की तर्ज पर अनेक देशों ने युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत नियमित रूप से युवा वर्ग की की एक-दूसरे देश को आवाजाही सुनिश्‍चित की है। यह हकीकत है कि एनसीसी कैडेटों की कवायद और उनके चुस्‍त-दुरूस्‍त कैडेटों का होना हर भारतीय के लिए गर्व की बात है और जो उन्‍हें फिर से भरोसा दिलाता है कि हमारे राष्‍ट्र का भविष्‍य उज्‍जवल और महान है।

एनसीसी का आदर्श वाक्‍य – एकता और अनुशासन
किसी व्‍यक्‍ति का व्‍यक्‍तित्‍व उसके शुरूआती वर्षों में बनता है। युवा वर्ग की तुलना कच्‍ची मिट्टी से की गई है, जिसे मनचाहे आकार में मोड़ा जा सकता है। इसके लिए जरूरत होगी सही प्रशिक्षण और दिशा निर्देशों की। प्रचीन काल में भारत के युवा संत महात्‍माओं और विद्वानोंके सान्निध्‍य में रहते थे और उनसे अनेक अच्‍छी बातें सीखते थे। आश्रमों और गुरुकुलों में उन्‍हें कारपोरेट ढंग के जीवन बिताने की शिक्षा मिलती थी। इसी की तर्ज पर आज देश के युवा वर्ग को सही दिशा देने के लिए एनसीसी का गठन किया गया है। इसके संपर्क में युवा वर्ग को सही दिशा देने के लिए एनसीसी का गठन किया गया है। इसके संपर्क में युवा वर्ग तक आते हैं, जब वे अपने सीखने के वर्षों में होते हैं। यहां उन्‍हें मित्र, विद्वान और मार्गदर्शक मिलते हैं, जिनके प्रतिभाओं से वे सही दिशा पकड़ सकते हैं और वे भविष्‍य के नेता बन जाते हैं। एनसीसी प्रशिक्षण के जरिए हम अपने युवा वर्ग में ऊर्जा का संचार करते हैं और उनमें स्‍वावलंबन और अच्‍छे गुण पैदा करते हैं। उनकी रचनात्‍मकता उत्‍साह और मानवीयता को सही दिशा दी जाती है, ताकि वे एनसीसी के आदर्श वाक्‍य, एकता और अनुशासन के अनुरूप चल सके।

एनसीसी का मौजूदा उद्देश्‍य देश के युवाओं को संभावित नेताओं, देशभक्‍त नागरिकों में परिणीत करने पर जोर देना है, जो सशस्‍त्र बल में अपना कैरियर चुनने के लिए प्रेरित हैं। मैजूदा विचार को ध्‍यान में रखते हुए एनसीसी की प्रशिक्षण गतिविधियां चार वृहत श्रेणियों विभाजित हैं, जिसमें संस्‍थागत प्रशिक्षण, समाज सेवा, सामुदायिक विकास कार्यक्रम और युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम शामिल हैं।

प्रशिक्षण के स्‍वरूप
संस्‍थागत प्रशिक्षण का अयोजन कालेज और स्‍कूल स्‍तर पर होता है। यह एनसीसी प्रशिक्षण का मुख्‍य आधार है और इसका आयोजन संबंधित एनसीसी अधिकारियों और थल सेना, नौसेना और वायु सेना जैसे तीनों सेवाओं से सैनिक सशस्‍त्र बल के जवानों (एनसीसी में जो प्रतिनियुक्‍त‍ि पर हैं) द्वारा किया जाता है।

शिविर प्रशिक्षण- इस प्रशिक्षण का उद्देश्‍य कैडेटों को सैन्‍य दल के रूप में विकसित करना है। वार्षिक प्रशिक्षण शिविर के अतिरिक्‍त कैडेटों को राष्‍ट्रीय स्‍तर के विशेष राष्‍ट्रीय एकीकरण शिविर, राष्‍ट्रीय एकीकरण शिविर तथा नेतृत्‍व शिविर जैसे शिविरों में भी भेजा जाता है, जहां वे सभी राज्‍यों और संघ-शासित प्रदेशों के कैडोटों से वार्ता-लाप और भेंट कर सकते हैं और उनके दल और नेतृत्‍व कौशल को समझ सकते हैं।

समाज सेवा और सामुदायिक विकास- प्रौढ़ शिक्षा संवर्द्धन, पोलियोरोधी अभियान, ग्रामीण विकास परीक्षण परियोजना, एड्स जागरूकता, वृक्षरोपण और ड्रगरोधी कार्यक्रम जैसे अभियानों में भागीदारी कर कैडेटों में नैतिक औैर सामाजिक प्रतिबद्धता लाना है ताकि वे राष्‍ट्र निर्माण में सहयोग दे सकें।

युवा आदान-प्रदान कार्यक्रम- इस कार्यक्रम के तहत चयनित कैडेटों को विदेश में राज्‍य-अतिथि तथा देश के ब्रांड दूत के रूप में यात्रा करने का अवसर प्राप्‍त होता है।

साहस आधारित पाठ्यक्रम- इन कैडेटों को नई साहसिक गतिविधियों में शामिल किया जाता है, ताकि वे अपने जीवन और नेतृत्‍व कौशल में और सुधार ला सकें। माउन्‍टेन ट्रेक तथा अभियान, पैरासेलिंग और कूद-फांद, नौकायन यात्रा तथा माइक्रो लाइट फ्लाइंग जैसे कार्यक्रम नियमित तौर पर एनसीसी द्वारा किया जाता है।

खेल- एनसीसी टीमें नियमित तौर पर सुब्रोतो कम फुटबाल, नेहरू कप हाकी तथा राष्‍ट्रीय शूटिंग चौम्‍पियनशिप जैसी प्रतियोगिताओं में भाग लेती हैं।

व्‍यक्‍तिगत विकास- एनसीसी की संशोधित प्रशिक्षण दर्शन का उद्देश्‍य कैडेटों के जीवन कौशल में सुधार लाने के साथ-साथ जीवन में आगे बढ़ने के लिए उन्‍हें सक्षम बनाना है।

छात्रों के लिए एनसीसी कैसे मदद करता है?
रक्षा सेवाओं में एनसीसी सी प्रमाणपत्र धारक कैडेटों को शामिल करने के लिए तीनों सेवाओं में रिक्‍तियां आरक्षित रहती है।
(1)  थल सेना: भारतीय सैन्‍य अकादमी (आईएमए) देहरादून में प्रति पाठ्यक्रम 32 रिक्‍तियां होती हैं, जो यूपीएससी और एसएसबी साक्षात्‍कार के जरिए भरे जाते हैं।
(2)  ओटीए चेन्‍नई तथा गया: गैर-तकनीकी श्रेणियों में शार्ट सर्विस कमीशन के लिए प्रति वर्ष पचास रिक्‍तियां होती हैं। ये रिक्‍तियां एसएसबी साक्षात्‍कार के द्वारा भरी जाती हैं।
(3)  नौसेना: प्रति पाठ्यक्रम 6 रिक्‍तियां होती हैं और इनमें चयन एसएसबी साक्षात्‍कार के जरिए होती हैं, इसमें एनसीसी सी प्रमाणपत्र धारकों को आयु में दो साल की छूट होती है।
(4)  वायु सेना: फ्लाइंग प्रशिक्षण पाठ्यक्रम सहित सभी पाठ्यक्रमों में दस प्रतिशत रिक्‍तियां होती हैं और इसमें चयन एसएसबी साक्षात्‍कार के जरिए होता है। अन्‍य रैंको, नाविक तथा एयरमेन को भर्तियों में पांच से दस प्रतिशत बोनस अंक दिये जाते हैं।
अन्‍य
अर्धसैनिक बलों में भर्तियां: इसमें भर्ती के लिए दो से दस प्रतिशत बोनस अंक दिये जाते हैं।
दूरसंचार विभाग: इसमें भर्ती के लिए विशेष बोनस अंक  दिया जाता है।
एनसीसी में: सिविलियन ग्‍लाइडिंग प्रशिक्षक/गर्ल कैडेट प्रशिक्षक/एनसीसी में पूर्णकालिक लेडी अधिकारियों की नियुक्‍ति में सी प्रमाणपत्र धारकों को प्राथमिकता दी जाती है।
राज्‍य सरकार में: पुलिस, प्रशासन, वन, उत्‍पाद और परिवहन विभाग जैसे राज्‍य सेवाओं में प्राथमिकता मिलती है।
स्‍कालरिशिप छात्रवृत्ति: कैडेट वेलफेयर सोसाइटी तथा सहारा छात्रवृत्ति के जरिए एनसीसी कैडेट छह हजार रुपये से तीस हजार रुपये तक छात्रवृत्ति प्राप्‍त करने के लिए पात्र होते हैं।

खेल: एनसीसी की टीम और सदस्‍यों को राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिस्‍पर्धाओं/प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन के लिए आकर्षक नकद पुरस्‍कार भी दिया जाता है।

एनसीसी जो कि विश्‍व में सबसे वृहत संगठित युवा बल है, इसने विगत वर्षों में राष्‍ट्र निर्माण के साथ-साथ देश में युवाओं को सुधारने में एक अद्वितीय संगठन का मुकाम हासिल किया है। यह संगठन अपने विभिन्‍न नवीन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के जरिए तथा बड़ी संख्‍या में राष्‍ट्रीय एकीकरण शिविरों का आयोजन कर राष्‍ट्रीय एकीकरण की उपलब्‍धि की दिशा में अमूल्‍य योगदान दिया है। इतिहास दर्शाता है कि विगत वर्षों में एनसीसी ने कई युवाओं को एक ख्‍याति प्राप्‍त और श्रेष्‍ठ नेता के रूप में तैयार किया है, जिनके कार्य अनुकरणीय हैं। अग्रदूतों में नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस, पूर्व थल सेना अध्‍यक्ष एयर मार्शल सुब्रोतो मुखर्जी, पूर्व थल सेना अध्‍यक्ष, एडमिरल निर्मल वर्मा, पूर्व मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त डा. एम.एस. गिल, संसद सदस्‍य सुश्री जया भादुड़ी, ख्‍याति प्राप्‍त फिल्‍म नायिक तथा आर.डी. कैम्‍प – 1966 के श्रेष्‍ठ कैडेट तथा अन्‍य ख्‍याति प्राप्‍त व्‍यक्‍ति शामिल हैं। एनसीसी की महत्‍वपूर्ण भूमिका को ध्‍यान में रखते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक पायलट परियोजना में एनसीसी को चिन्‍हित स्‍नातक संस्‍थानों में एक चयनित विषय के रूप में शामिल करने का हाल ही में निर्णय लिया है। यह कदम निश्‍चितरूप से एनसीसी के प्रयासों को बढ़ावा देगा।
भारत की सामाजिक समस्याएँ पर निबंध। Essay on Social Problems in Hindi

भारत की सामाजिक समस्याएँ पर निबंध। Essay on Social Problems in Hindi

भारत की सामाजिक समस्याएँ पर निबंध। Essay on Social Problems in Hindi

Essay on Social Problems in Hindi
आज भारतीय समाज समस्याओं का घर है। इन समस्याओं ने उसे जर्जर कर दिया है। समय बदला, देश की स्थिति बदली, हम स्वतन्त्र हुये परन्तु हमारी सामाजिक विषमतायें आज भी वैसी ही हैं, जैसी दो सौ वर्ष पहले थीं। ये दोष कुछ तो अंग्रेजों ने हमारे समाज को दिये थे और कुछ हमारे ही घर के स्वार्थी धर्म के ठेकेदारों ने। एक समय था जब हमारा देश, हमारा समाज विश्व में मुतश्रेष्ठ समाजों में गिना जाता था। यहाँ की जनता सुखी और धन-धान्य से सम्पन्न थी।

समाज की सबसे प्रमुख समस्या स्त्रियों की है। यद्यपि भारतीय संविधान ने स्त्रियों को पुरुषों के अधिकारों के समान ही अधिकार दिये हैं परन्तु वे केवल नाममात्र के हैं। पति की इच्छा ही उसका सर्वस्व है, पति के दुराचार, अन्याय, अत्याचारों को वह मूक पशु की तरह सहन करती है। उसका संसार घर की चारदीवारी तक ही सीमित है।

वृद्ध रोग वश, जड़ धनी होना। अंध वधिर क्रोधी अति दीना ।
ऐसेहु पतिकंर किये अपमाना। नारि पाव यमपुर दुख नाना ।।

पति देवता की सेवा और बच्चों का पालन-पोषण करने तक ही उसका कर्तव्य है। घर में बैठकर कब किसका विवाह हुआ है कब किसके बच्चा हुआ इन्हीं बातों तक उसकी सामाजिक भावना है। संसार क्या है, इंसान क्या है, मानव जाति किन परिस्थितियों से गुजर रही है, उसे इन फालतू बातों से कोई सम्बन्ध नहीं। वह तो केवल घर की दासी है, आत्मोन्नति और आत्म-संस्कार से मतलब नहीं। बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, विवाह-विच्छेद, विवाह-निषेध आदि ने उसकी और भी दर्दशा कर दी है। न वह स्वतन्त्र वायुमण्डल में साँस ले सकती है और न स्वतन्त्रतापूर्वक किसी से बोल सकती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक को आजीवन कारावास किस विधाता ने इसके भाग्य में लिख दिया है-

“पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्रश्च स्थविरे भावे न स्त्रीस्वतन्त्रयमर्हति॥”

व्यवस्था में पिता रक्षा करता है, युवा: हमारी अवस्था में पति रक्षा करता है, वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है, इस प्रकार स्त्री कभी स्वतन्त्र नहीं रह पाती। भारतीय स्त्री की अवनति का सबसे प्रमुख कारण उसकी ‘आर्थिक पराधीनता है। उसे एक-एक पैसे के लिए हाथ फैलाना पड़ता है। इस आर्थिक स्वतन्त्रता के अपहरण ने उसे अवनति के गर्त में डाल दिया है। नारी समाज को इस प्रकार की हीनावस्था भारतीय समाज के लिये कलंक है। समाज के उत्थान के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हम स्त्री का आदर करें, उसे अपने समान अधिकार दें। नारी त्याग, बलिदान, तपस्या और साधना की मूर्ति है, वह एक व्यक्ति के लिए जीवनभर साधना कर सकती है और अपने अमूल्य जीवन का बलिदान कर सकती है। प्रसाद जी ने नारी की महिमा में लिखा है-

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में ॥"

समाज की भयानक दुसरी समस्या हरिजनों के प्रति दुर्व्यवहार करना है। जिन्हें हम हरिजन कहते हैं।, वे समाज के सबसे बड़े सेवक और तपस्वी हैं। क्या वे मनुष्य नहीं हैं क्या उन्हें भगवान का नाम लेने तक का अधिकार नहीं, क्या वे उसके मन्दिर में जाकर दर्शन नहीं कर सकते? क्या वे कुएँ से अपनी प्यास बुझाने के लिए जल भी नहीं ले सकते? क्या उनके शरीर में आत्मा या प्राण नहीं फिर ऐसा कौन सा कारण है, जो समाज उन्हें अपने तक नहीं आने देता। हां यह बात अवश्य है कि उनमें हम जैसी बनावट नहीं है।

भगवान पर सबका बराबर अधिकार है, जो उसका प्रेम से स्मरण करता है, वह तो उसी का है। फिर ये धनवान बेचारे हरिजनों को मन्दिर में क्यों नहीं घुसने देते क्या भगवान पर इन्हीं के एकाधिकार है? भगवान राम ने शबरी, जो भील जाति की थी, के झूठे बेर खाये थे। स्वर्गीय गुप्त जी ने लिखा है

“गुह निषाद, शबरी तक का मन रखते हैं, प्रभु कानन में।
क्या ही सरल वचन रहते हैं, इनके भोले आनन में ।।
इन्हें समाज नीच कहता है पर हैं ये भी तो प्राणी ।।
इनमें भी मन और भाव हैं, किन्तु नहीं वैसी वाणी ।।”

शहरों में तो यद्यपि यह दुर्व्यवहार सरकार की कठोर आज्ञाओं के कारण वन्द-सा हो गया है, परन्तु गाँवों में तो अब भी अपनी पराकाष्ठा पर है। अतः हमें उनको भी मनुष्य समझना चाहिये। और उनका आदर करना चाहिये।

हमारे समाज की विवाह प्रथा भी एक विषम समस्या है। मूक पशु को जिस तरह एक खूंटे से दूसरे खूटे पर बाँध दिया जाता है, उसी प्रकार हमारी कन्याओं का भी विवाह होता है। चाहे पति मुर्ख हो, कुरूप हो, काना हो, लंगडा हो, पर उसे उसके साथ जाना है। चाहे रूचि भिन्न हों, विचार भिन्न हों, स्वभाव भिन्न हों, परन्तु लड़की को माता-पिता की आज्ञा माननी पड़ती है। परिणामस्वरूप आये दिन आत्महत्याओं की दुर्घटनायें हो रही है। होना यह चाहिये कि समः लडकी और लड़कों को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार हो। ऐसा करने से अनमेल विवाह की समस्या स्वतः सुलझ जायेगी। विवाह सम्बन्धी दूसरी समस्या दहेज की है। दहेज की समस्या के कारण कन्या का जीवन माता-पिता को भार मालूम पड़ता है। पहले तो गाँव में कुछ जातिय में ऐसी प्रथा थी कि लडकी का जन्म होते ही उसे आक का दूध पिलाकर सुला दिया जाता र घण्टे आधे घण्टे में वह मर जाती थीं। तभी तो कवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् मक के मुख से कहलवाया था कि-

“पुत्रीति जात महतीह चिन्ता कस्मै प्रदेयेति महान् वितर्कः।
दत्वा सुखं प्राप्स्यति वां न वेत्ती, कन्या पितृत्व खुल नाम कष्टम।।"

प्रसन्नता की बात है कि भारत सरकार ने दहेज पर प्रतिबंध लगा दिया है। परंतु इस कुरीति की जड़े ही हरी चली गई हैं कि उखाड़ने से भी नहीं उखड़ती। जिस तरह पैठ में बैलों का मोल तोल होता है, एक खरीददार के बाद दूसरा आता है और जो अच्छी कीमत लगा देता है उसी को बैल मिल जाता है, इसी प्रकार शादी के बाजार में लड़के बिक रहे हैं, चाहे लड़की वाला अपना मकान बेचे या भूखों मरे। वास्तव में यह सामाजिक समस्या बड़ी भयंकर है, इसे किसी-न-किसी तरह छोड़ देना चाहिए, इसी में समाज का हित है।

जिस सती प्रथा को राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारक ने बन्द करा दिया था अब वह स्वतन्त्र भारत में फिर से सिर उठाने लगी है। राजस्थान में रूप कुंवर के सती होने की घटना को भारत सरकार ने बड़ी कठोरता से लिया है। आगे इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार ने संसद में विधेयक पेश कर सती होने को कानून विरोधी घोषित कर दिया है। सती प्रथा को प्रोत्साहित करने वालों को 1988 के इस कानून में कठोरतम दण्ड की व्यवस्था की गई है।

जाति-पांति का भेदभाव भी आज की एक सामाजिक समस्या है। समाज इसी के कारण। आज विश्रृंखलित है। न समाज में परस्पर प्रेम है, न सहानुभूति, न राष्ट्र का कल्याण है, न्याय। सामूहिक और सामाजिक हित की बात तो कोई सोचता ही नहीं। ब्राह्मण, ब्राह्मण के लिए वैश्य के लिए, और क्षत्रिय, क्षत्रिय के लिए ही कुछ करता है। इस जाति-पांति का विशाल रूप प्रान्तीयता में परिवर्तित हो जाता है। बंगाली, बंगाली का ही हित और पंजाबी पंजाबी का ही हित सोचता है। यही संकीर्ण विचारधारा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। देश की एकता में ये विचारधारायें कुठाराघात कर रही है। साम्प्रदायिकता की भावना से प्रेरित होकर हमें कभी कोई काम नहीं करना चाहिये। हमारे सामने सदैव देश-हित और राष्ट्र कल्याण का आदर्श होना चाहिए।

आजकल विद्यार्थियों के एक वर्ग की अनुशासनहीनता भी एक भयंकर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। आज का विद्यार्थी उद्दण्ड है, अनुशासनहीन है। आज वह भयानक से भयानक और जघन्य से जघन्य कुकृत्य करने को भी तैयार है। आज उसे न माता-पिता का भय है और न गुरुजनों के प्रति श्रद्धा है। बड़े-बड़े अपराधों में विद्यार्थियों के नाम सुने जाते हैं। चरित्रहीनता उनका सिरमौर बन गई है। क्या होगा इस देश का?

सामाजिक जागृति का अभाव भी हमारी एक सामाजिक समस्या है। हम जहाँ भी जो कुछ भी करते हैं वह अपने लिये करते हैं। न हमें देश का ध्यान है, न अपने नगर का और न पड़ौस का। हमारे सभी काम अपने संकुचित 'स्व' पर आधारित होते हैं, परमार्थ और परोपकार का नाम तक नहीं है। समाज हित हमसे बहुत दूर रह गया है। हमें इस कलुषित मनोवृत्ति को त्याग देना चाहिये। समाज के प्रति भी हमारे बहुत से कर्तव्य हैं, उत्तरदायित्व हैं। अतः हमें सदैव समाज कल्याण के लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये

"निज हेतु बरसता नहीं व्योम से पानी ।
हम हों समष्टि के लिये व्यष्टि बलिदानी ।।"

इसी प्रकार देश में बेरोजगारी की समस्या भी समाज के आगे मुँह बाये खड़ी है। जब बड़े बड़े पढ़े लिखों को हाथ पर हाथ रखे बेकार बैठे देखा जाता है, तो बड़ी लज्जा आती है, इस देश के दुर्भाग्य पर। इसी प्रकार निरक्षरता की समस्या भी इतने विशाल देश में एक भयानक समस्या है। बिना पढ़ा-लिखा व्यक्ति ने अपने अधिकार को समझ पाता है और न अपने कर्तव्य का ही उसे ज्ञान होता है। भारत की नई सरकार इसको दूर करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में प्रौढ़-शिक्षा, योजना के अन्तर्गत प्रौढ़ पाठशालायें स्थापित कर रही हैं।

वर्तमान में परीक्षाओं में नकल भी एक भयंकर सामाजिक समस्या बन गयी है। निर्भीकता और उद्दण्डता कुछ छात्रों के मन और मस्तिष्क में रहती है। इसे कैसे दूर किया जा सकता है? यह समस्या भी भारतीय शिक्षकों एवं समाज-सुधारकों के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह के रूप में मुंह बाये खड़ी है और इस समस्या का समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आता है?

उपरिलिखित समस्याओं में समय आने पर कुछ सुधार भी सम्भव दृष्टिगोचर होता है परन्तु नैतिक पतन की विकराल समस्या समाज के सामने मुँह फाड़े खड़ी है मानो वह पूरे समाज को निगल जाने के लिये आतुर है। अध्यापक-विद्यार्थी, व्यापारी उद्योगपति, राजनेता और अभिनेता, कृषक और मजदूर पढ़े-लिखे और बिना पढ़े-लिखे इसे गाजर का हलुआ समझ बैठे हैं। कुम्भकार के आबे (गड्ढा) में एक घड़े को बचाया जा सकता है पर जब पूरे आबे में ही आग लग रही हो तो बताइये कौन बचाये?

उपरोक्त समस्याओं से ग्रसित भारतीय समाज के सन्मुख भ्रष्टाचार की समस्या विकराल रूप धारण कर उपस्थित हुई है जिसने न केवल सामाजिक जीवन को अपितु समाज के आर्थिक, राजनीतिक धार्मिक न्यायिक, सुरक्षा एवं प्रशासनिक ढांचे को हिलाकर रख दिया है। उसने ऐसा भयावह संकामक रूप धारण कर लिया है कि बिरले ही इससे अछूते रह पाते हैं। वर्तमान में ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार हमारे समाज का आचार बन गया है। न्याय-प्रणाली इसका सामना करने में असहाय सी लगती है। काला धन और मुद्रा स्फीति का पोषण भ्रष्टाचार द्वारा अबाध गति से हो रहा है। शासन तंत्र जो स्वयं इस भयंकर रोग से ग्रसित है कैसे इसको रोक सकता है।

सामाजिक चेतना से ही इसका उपचार संभव है। अत: प्रत्येक नागरिक का यह धर्म है, कर्तव्य है कि वह किसी भी स्थिति में किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार का पोषक न बने।

इसी प्रकार की अन्य छोटी-मोटी समस्यायें हैं जो हमारे समाज को निष्प्राण किये दे रही हैं। हमें उन्हें दूर करने के लिये भगीरथ प्रयत्न करना चाहिये, जिससे कि समाज का अधिक अहित न हो सके। हमारी राष्ट्रीय सरकार भी इन सामाजिक विषमताओं को समूल नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील है। तभी हमारा देश वास्तविक उन्नति कर सकेगा, अन्यथा हमारी अमूल्य स्वतन्त्र भी कोई मूल्य नहीं रहेगा।
भारत में सर्वोदय की अवधारणा पर निबंध। Sarvodaya in Hindi

भारत में सर्वोदय की अवधारणा पर निबंध। Sarvodaya in Hindi

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Sarvodaya in Hindi
सृष्टि के प्रारम्भिक काल से ही समाज के मनीषियों ने समाज को सुखी, शान्त और समय बनाने के लिये अनेकानेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। समाज को सुसंगठित और सुव्यवस्थित बनाने के लिए ऋषि मुनियों ने वर्णाश्रम व्यवस्था का प्रतिपादन किया, जिसकी पृष्ठभूमि में जातिवाद  और ब्राह्मणों का धर्मवाद निहित था। इस व्यवस्था पर आधारित समाज नि:संदेह बहुत समय तक सुसंगठित रूप से चलता रहा यहाँ तक कि आज भी उसका त्यों का त्यों रूप भारतवर्ष में विद्यमान है, उसमें कुछ विकृति अवश्य आने लगी है। समाज को शाश्वत सुख और अनन्त शक्ति प्रदान करने के लिये ही महात्मा बुद्ध ने भिक्षु रूप धारण करने तथा संघारामों की घोषणा की थी। समाज की विशृंखलता और जातिवाद को दूर करने के लिये ही कबीर ने निर्भीक होकर समाज के चौराहों पर गर्जना की थी। इसी तरह समय-समय पर अनेक समाज-सुधारक, समाज को व्यवस्थित करने में प्रयत्नशील रहे। आज का समाज विभिन्न विचारधाराओं का केन्द्र है। सभी अपने-अपने रूप में समाज को सम्पन्न बनाने का दावा करते हैं। प्रमुख रूप से चक्की के दो पाट पर आज समस्त विश्व को पीसे डाल रहे हैं, वे हैं पूंजीवाद और साम्यवाद। आधुनिक युग में ही ये विचारधारायें विशेष रूप से प्रचलित हुई हैं। साम्राज्यवादी देश पूंजीवाद का समर्थन करते हैं। पंजीवाद पैसे के बल पर सभी का शोषण कर सकता है, चाहे वह विद्वान् हो या श्रमिक। साम्यवाद पूंजीवाद व्यवस्था को पूर्ण रूप से नष्ट कर देना चाहता है। यह विचारधारा वर्ग-संघर्ष में विश्वास रखती है उनका विश्वास है कि एक दिन आयेगा जबकि श्रमिक और मजदूरों को इन शोषक पूंजीपतियों पर स्वामित्व होगा। साम्यवादी, रक्तमय क्रान्ति में विश्वास रखते हैं। इनकी दृष्टि में सत्य, अहिंसा और जैसी कोई वस्तु महत्त्व नहीं रखती।
परन्तु इन विचारधाराओं के अतिरिक्त कुछ विचारक ऐसे भी होते हैं जो किसी वर्ग-विशेष का हित-चिन्तन न करके, मानव मात्र के कल्याण की कामना करते हैं जो हर किसी को सुखी समृद्ध एवं सम्पन्न देखना चाहते हैं। सबके विकास में ही देश का कल्याण समझते हैं। इनकी इच्छा रहती है कि-

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत् ।।'

अर्थात् सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी कल्याण प्राप्त करें, किसी को कोई दुख प्राप्त न हो, इस प्रकार की पुनीत भावनाओं को महात्मा गाँधी जैसे पुण्यात्माओं ने प्रस्तुत किया था। वर्ग-भेद, वर्ण-भेद, जाति-भेद तथा छूत-अछूत जैसे सामाजिक रोगों को समाज से बहिष्कृत करने के लिये आर्त दुखी और चिरविपन्न जनता को शान्ति प्रदान करने एवं उसके अभ्यदय और सर्वांगीण विकास के लिये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें सभी प्राणियों को अपनी अपनी सहज योग्यताओं के विकास का अवसर मिले और जिसमें न कोई ऊँचा हो और न नीचा। गाँधी जी भारत में राम राज्य की स्थापना के पक्षधर थे जहाँ-

दैहिक दैविक, भौतिक तापा।।
राम राज्य काहू नहि व्यापा।

इस प्रकार का समाज सर्वोदय के सिद्धान्तों में निहित है। सर्वोदय के मंत्रदाता महात्मा गाँधी थे। उन्होंने मानव कल्याण के लिये अनेक सूत्रों का निर्माण किया तथा उन्हें रचनात्मक रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया। गाँधी जी के इन्हीं सूत्रों का नाम 'सर्वोदय' है। सर्वोदय की प्रेरणा गांधी जी को रस्किन की ‘अन्टू दी लास्ट' नामक पुस्तक से प्राप्त हुई। उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा—“मैं नैटाल के लिये रवाना हुआ। मास्टर पोलक स्टेशन पर मुझे पहुँचाने आये और रस्किन की पुस्तक 'अटू दी लास्ट' मेरे हाथ में देकर बोले "यह पुस्तक पड़ने लायक है। मेरे जीवन में यदि किसी पुस्तक ने महत्वपूर्ण रचनात्मक परिवर्तन कर डाला तो वह यही पुस्तक  है। मेरा विश्वास है कि जो चीज मेरे अन्तर में बसी हुई थी उसका स्पष्ट प्रतिबिम्ब मैंने इस पुस्तक में देखा है। इस पुस्तक में गाँधी जी ने केवल तीन सिद्धान्तों को अपने सर्वोदय का आधार बनाया-

1. व्यक्ति का श्रेय समष्टि के श्रेय में ही निहित है।

2. वकील और नाई दोनों के कार्य का मूल्य समान है, क्योंकि प्रत्येक को अपने व्यवसाय द्वारा अपनी आजीविका चलाने का समान अधिकार है।

3. किसान, कारीगर तथा मजदूर का जीवन सच्चा तथा सर्वोत्कृष्ट है।

समाज का कर्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के लिये कार्य दे और उसकी आवश्यकता पूरी करे। सर्वोदय के मानव मान-दण्ड ने पर्याप्त क्रान्ति की है। सर्वोदय समाज के आर्थिक और सामाजिक वैषम्यों का तीव्र विरोध करता है तथा जड़वाद और व्यक्तिवाद के विरुद्ध है। सर्वोदय सम्पत्ति के राष्ट्रीयकरण में विश्वास रखता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति में शोषण और संघर्ष की भावनायें अन्तर्निहित होती हैं। निजी सम्पत्ति में मानव की स्वार्थपरता बढ़ती है। अतः सहकार्य और साहचर्य से मानव की ईर्ष्र्या के स्थान पर सहयोग और सहानुभूति, वैमनस्य के स्थान पर स्नेह तथा संकीर्णता के स्थान पर औदार्य की वृद्धि होती है। इस प्रकार सर्वोदय, समाजवाद, आत्मवाद और समत्व में विश्वास रखता है। सर्वोदय नेता एवम् गम्भीर विचारक श्री शंकरराव देव ने सर्वोदय के विषय में लिखा है, “साम्यवाद अथवा पूँजीवाद की भाँति सर्वोदय, साध्य के लिये साधना की अपेक्षा नहीं करता।" साम्यवाद शोषितों का पक्ष लेकर हिंसात्मक रक्तमय क्रान्ति का पक्षपाती है। इसी प्रकार पूंजीवाद स्वतन्त्र को गुलाम बनाकर शोषण करता ही है ।
  • साम्प्रदायिक एकता
  • मद्य निषेध
  • वर्ग भेद तथा अस्पृश्यता का निवारण
  • खादी का प्रयोग
  • गृह-उद्योग का विकास
  • ग्रामों की सफाई
  • प्रारम्भिक शिक्षा
  • प्रौढ़ शिक्षा
  • महिलाओं की सेवा
  • स्वास्थ्य एवं शिक्षा
  • क्षेत्रीय भाषायें
  • राष्ट्र भाषा
  • आर्थिक सहायता
  • कृषक
  • श्रमिक
  • आदिवासी  
  • कुष्ट रोग
  • विद्यार्थी

पक्ष का ही प्रतिपादन नहीं करता, वह क्रियात्मक रूप से कर्म करने की प्रेरणा भी प्रदान करता है। राष्ट्रपिता गाँधी जी ने सर्वोदय के अट्ठारह नियम, सूत्र रूप से जनता के सामने प्रस्तुत किये थे। उन्हीं सूत्रों के आधार पर सर्वोदय का विकास भारत में हुआ। ये सूत्र पिछले पृष्ठ पर अंकित हैं।

इन अष्टादश सूत्री नियमों पर चलकर भारतवर्ष अपनी सर्वांगीण उन्नति कर सकता है। जब तक मानव में “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “आत्मवत् सर्वभूतेषु" जैसी पवित्र भावनाओं का उदय नहीं होता, तब तक न वह स्वयम् उन्नति कर सकता है और न दूसरों को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकता है। सर्वोदय के आधार पर ही हम ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः' की पवित्र भावनाओं को फिर से जागृत कर सकते हैं। एक समय था जब हमारे ऋषि कहा करते थे-

शं नो अस्तु द्विपदे शं नो अस्तु चतुष्पदे

अर्थात् दो पैर वाले और चार पैर वाले सभी का कल्याण हो। परन्तु आज चार पैर वालों की तो दूर की बात है, मानव अपने बन्धु दो पैर वाले का भी भला नहीं चाहता। स्वार्थ की कालिमामयी प्रवृत्ति इतनी बढ़ गई है कि चारों ओर अपना ही अपना दिखाई पड़ता है, दूसरे के कल्याण की तो कोई सोचता ही नहीं। अत: भारतवर्ष यदि अपनी सार्वभौमिक और सर्वांगीण उन्नति चाहता है, तो राष्ट्रपिता गाँधी के सर्वोदय के सिद्धान्तों को स्वीकार करना पड़ेगा, तभी उसकी उन्नति सम्भव है।

Saturday, 23 March 2019

Indian Atomic Policy in Hindi भारतीय आणविक नीति का वैश्‍विक दृष्‍टिकोण

Indian Atomic Policy in Hindi भारतीय आणविक नीति का वैश्‍विक दृष्‍टिकोण

Indian Atomic Policy in Hindi भारतीय आणविक नीति का वैश्‍विक दृष्‍टिकोण

सारे संसार में भारत बुद्ध एवं गाँधी के दर्शन से जाना जाता है। भारत अपने शांतिवाद आध्‍यात्‍म के कारण ही समस्‍त राष्‍ट्रों मध्‍य अपनी श्रेष्‍ठता को प्रतिस्‍थापित करता है। आज के बदलते अंर्तराष्‍ट्रीय परिवेश को प्रतिस्‍थापित करता है। आज के बदलते अंतर्राष्‍ट्रीय परिवेश में शस्‍त्रों के अंधी दौड़ तथा आयुध एवं परमाणु के आविष्‍कारों ने भारत को शांतिवाद तुंगनिद्रा से जागने के लिए वि‍वश किया। अगस्‍‍त-1945 के आरम्‍भ में अमेरिका के पास केवल दो परमाणु बम लिटिल ब्‍याय थे और हिरोशिमा व नागासाकी में उनके इस्‍तेमाल के साथ ही अमेरिका का परमाणु बमों का भण्‍डार खाली हो गया था, लेकिन 29 अगस्‍त 1949 को परमाणु बम के एकाधिकार क्षेत्र समाप्‍त हुआ जब रूस ने पहला सफल परमाणु बम परीक्षण किया। इससे परमाणु शस्‍त्रों की दौड़ चल पड़ी। मई 1951 में अमेरिका ने और नवम्‍बर 1952 में सोवियत संघ ने अपने प्रथम हाइड्रोजन शक्‍ति परीक्षण किये, 1952 में ब्रिटेन, 1960 में फ्रांस और 1964 में चीन भी परमाणु शस्‍त्रों की दौड़ में शामिल हुआ।

भारत भी वर्षों के गुलामी से आजादी प्राप्‍त करने के उपरान्‍त राष्‍ट्र के विकास में भावी भारत निर्माण के आयामों को स्‍थापित करने का प्रयत्‍न कर रह था। इन्‍हीं के बीच-गतिशील अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्षितिज पर पश्‍चिमी राष्‍ट्र व महाशक्‍तियाँ परमाणु सम्‍पन्‍न हो चुकी थी जो विश्‍व शांति के दृष्‍टि से श्रेयस्‍कर नहीं था। दक्षिण एशिया में भारतकी स्‍थिति कुछ विषेष रूप की थी जिसने भारत को परमाणु ऊर्जा के शोध व विकास के तरफ ध्‍यान देने के लिए 1944 में ही डॉ० होमी जहाँगीर भाभा ने विशेष बल दिया। अभी तक कुल सात राष्‍ट्रों ने आणविक परीक्षण कर चुके है- (अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्‍तान) इनके अतिरिक्‍त एक दर्जन ऐसे राष्‍ट्र हैं जो परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है (कनाडा, जर्मनी, दक्षिणी अफ्रीकी, इटली, इजराइल, स्‍वीडन, स्‍विट्जलैण्‍ड, जापान) हथियारो के दौड़ आयुध निर्माण ने सम्‍पूर्ण विश्‍व को सदैव युद्ध के लिए तत्‍पर रहने की दिशा में खड़ा किया। जहाँ प्रत्‍येक राष्‍ट्र एक दूसरे को शंका दृष्‍टि से देख रहा है।

पं० जवाहर लाल नेहरू ने परमाणु अस्‍त्रों द्वारा उत्‍पन्‍न खतरे को एक प्रमाणिक विभिषिका मानते थे और उनका विश्‍वास था कि भारत परमाणु ऊर्जा का विकास शांतिपूर्ण कार्यों के लिए करेगा। इसी को ध्‍यान में रखते हुए 1948 में भारतीय परमाणु नीति की घोषणा करते हुए कहा कि भारत परमाणु शक्‍ति वाला शांतिपूर्ण राष्‍ट्र बनेगा इस नीति की उत्‍पत्ति गांधीवादी परम्‍परा और अहिंसा के आदर्शों से हुई थी। जो भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम का एक महत्‍वपूर्ण अंग था। इस नीति में स्‍वतंत्र तथा शांतिपूर्ण परमाणु शक्‍ति के विकास की भावना समाहित थी इसी लक्ष्‍य को पं० नेहरू जी ने जीवनपर्यन्‍त निभाया था। लेकिन चीन के द्वारा 16 अक्‍टूबर 1964 को चीन ने अपना पहला परमाणु विस्‍फोट किया इसी पर प्रतिक्रिया स्‍वरूप श्री लाल बहादुर शास्‍त्री ने कहा-मेरा यह विचार नहीं है कि, वर्तमान परमाणु शक्‍ति सम्‍बन्‍धी शांतिवादी नीति की जड़े बहुत गहरी है और उसमें परिवर्तन नहीं होगा। वास्‍तव में यही से भारत ने परमाणु बम सम्‍बन्‍धी नीति पर विवाद शुरू हुआ तथा 24 अक्‍टूबर 1964 को ही डॉ० भाभा ने कहा कि भारत को परमाणु बम बनाना पड़ेगा चीन की नीतियों और उसके द्वारा पूर्व में किए गए विश्‍वासघात को देखते हुए यह आवश्‍यक है। परमाणु सम्‍पन्‍न हो, भले ही उसका स्‍वरूप शांति को स्‍थापित करता हो। लेकिन सुरक्षा (देश की अखण्‍डता) सर्वोच्‍च है, राष्‍ट्रीय हित की दृष्‍टि से भारत के द्विआयामी परमाणु नीति का निर्माण हुआ और इसलिए परमाणु बम बनाने के विकल्‍प को खुला रखा गया। यदि राजनैतिक इच्‍छा हुई तो परमाणु बम का निर्माण किया जा सके। इीस समय तत्‍कालीन प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्‍त्री ने भूमिगत परमाणु विस्‍फोट परियोजना को मंजूरी दे दी।

श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी अपने कार्यकाल के प्रारम्‍भ में ही भारत को 18 देशों की नि:शस्‍त्रीकरण सम्‍बन्‍धी समिति को जेनेवा सम्‍मेलन में विशम परिस्‍थितियों का सामना करना पड़ा। जिसमें अणु प्रसार निषेध संधि (1968) अनुमोदित करने का प्रयास किया गया, जो चीन के द्वारा उत्‍पन्‍न खतरे से उसकी सुरक्षा करेगी परन्‍तु भरत ने इंकार कर दिया। सन् 1974 में भारत ने भी पोखरण में प्रथम परमाणु परीक्षण (परमाणु ऊर्जा आयोग) कर डाला, तत्‍पश्‍चात अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में 11 व 13 मई 1998 को द्वितीय परमाणु परीक्षण सम्‍पन्‍न कर डाला। इसी के परिणाम स्‍वरूप भारत के आणविक नीति पर नये सिरे से बहस प्रारम्‍भ हुई। पड़ोसियों, माशक्‍तियों का तर्क था कि भारत के इस कदम से दक्षिण एशिया में हथियारों के होड़ को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन भारत की नीति केवल अपनी सुरक्षा व विकास की थी।'

परमाणु परीक्षणों के बाद भारत के दृष्‍टिकोण में अपने राष्‍ट्रीय हितों के अनुरूप नीति को एक निश्‍चित दिशा देने की नई चुनौती के रूप में स्‍वीकारा जिस पृथ्‍वी पर कुछ राष्‍ट्र परमाणु हथियार रखने का एकाधिकार बनाये रखना चाहते है और आतंकवाद से निपटने के नाम पर किसी भी देश पर मिसाइली हमले को वैध ठहराते हो, वहाँ निर्गुट आंदोलन, दक्षिण सहयोग परमाणु निरस्‍त्रीकरण, शांतिपूर्ण सहअस्‍तित्‍व, उत्तर दक्षिण संवाद कैसे स्‍थापित हो सकता है, लेकिन फिर भी भारत ने परमाणु हथियार रखने वाले अन्‍य राष्‍ट्रों की सीधी चुनौती पेश कर रहा है। चीन व पाकिस्‍तान को बता रहा है कि उसकी ओर से पैदा खतरों के मुकाबले के लिए भारत पूर्णरूपेण तैयार है, लेकिन शान्ति की नीति को सदैव भारत ने अपने लिए हमेशा एक उच्‍च आदर्श के रूप में प्रतिस्‍थापित किया है। परमाणु सम्‍पन्‍नता किसी प्रकार का शस्‍त्रों की उच्‍चता न होकर केवल अपने राष्‍ट्रीय हितों और अपनी जनता को सुरक्षा (परमाणु/जैविक) हथियारों से सुरक्षा प्रदान करना है।

दक्षिण एशिया या विश्‍व राजनीति में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद से एक नये त्रिकोणात्‍मक संघर्ष की शुरूआत हुई जो दो रूपों में है-
  1. भारत-पाक-चीन
  2. भारत-दक्षिण एषिया-सम्‍पूर्ण विश्‍व (विकसित राष्‍ट्र)

भारत की नीति काफी हद तक उसके सुरक्षा हितों तथा राष्‍ट्रीय व प्रादेशिक अखंण्‍डता के खतरों से जुड़ी हुई है। भारत के सुरक्षा हित कश्‍मीर को लेकर गत कई दशकों से प्रभावित हो रहे है और उधन चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन में गम्‍भीर मनमुटाव चल रहा है। दीर्घकालीन दृष्‍टि से भारत के लिए खतरा पैदा कर सकता है। कश्‍मीर के सवाल पर भारत के रिश्‍ते कई देशों के साथ बनते और बिगड़ते रहे है। मध्‍य एशिया में कट्टरपंथी इस्‍लामी प्रसार का फैलाव भारत के हितों को प्रभावित करेगा और पारम्‍परिक रूप से जो भारत का माना जा रहा था वह भारत के हाथ से निकलता लग रहा है। भारत के लिए अब यह एक नयी चुनौती है जिसमें परमाणु सम्‍पन्‍न होकर भी फूंक-फूंक कर चलना होगा। परमाणु विस्‍फोटोको उपरांत पश्‍चिमी देशों की रूचि दक्षिण एशिया में अचानक बढ़ गयी है। चूँकी इस क्षेत्र की शांति में बाधक मुख्‍यत: कश्‍मीर समस्‍या ही है, इसलिए पश्‍चिमी देशों का मानना है कि इस समस्‍या का हल यथाशीघ्र खोज लिया जाए। इस पहल को अंजाम देने के लिए पश्‍चिमी देश शक्‍ति प्रदर्शन की भी बात कर रहे हैं। इस तथ्‍य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पश्‍चिमी विचाराधारा के नाम पर एंग्‍लो अमेरिकी (ब्रिटेन और अमेरिका) ही प्रधान रही है इस विचार के तहत पाकिस्‍तान को भारत के बराबर बनाये जाने की कोशिश की गयी।

दक्षिण एशिया में शक्‍ति संतुलन की प्रक्रिया की कल्‍पना की गयी। इससे आशा की गयी कि इस क्षेत्र में शांति बनी रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। समय-समय पर ऐसा पटाक्षेप हुए जिसमें शंका उत्‍पन्‍न होती है। परमाणु राष्‍ट्र होने के बाद भी भारत को पाक व चीन के तरफ से भी राष्‍ट्रीय सुरक्षा व प्रादेशिक अखंडता के लिए खतरा उत्‍पन्‍न किया जा रहा है क्‍योंकि भारत अपने परमाणु नीति को शांति पर आधारित किया है। शांति व विश्‍व शांति की दृष्‍टि से सभी राष्‍ट्रों की सुरक्षा को प्रमुखता के रूप में विदेश नीति में स्‍थापित किया है। भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्‍पष्‍ट किया है कि चीन और पाकिस्‍तान की क्रिया विधि ने उनको विस्‍फोटो के लिए बाध्‍य किया है लेकिन महत्‍वपूर्ण यह है परमाणु अस्‍त्र न बनाने के निर्णय से परमाणु अप्रसार संधि के मूल उद्देश्‍यों की वास्‍तविक रूप में सिद्धि की संभावना बढ़ गयी है, क्‍योंकि परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण एवं गैरशां‍तिपूर्ण उपयोग के भारतीय दृष्‍टिकोणको ध्‍यान में रखता। परमाणु युद्ध का खतरा समाप्‍त हो सकताहै।

भारत के आणविक नीति के कारण विश्‍व समाज के सामने नि:शस्‍त्रीकरण की समस्‍या एक नये आयाम के रूप में उभरी है। यदि परमाणु अनुसंधान केवल शांतिपूर्ण उद्देश्‍यों को ध्‍यानमें रखकर किया जाए तो शस्‍त्र नियंत्रण और परमाणु अप्रसार की समस्‍या स्‍वयं हल हो जाएगी। अप्रसार का वास्‍तविक अर्थ है किसी भी देश के पास परमाणु शस्‍त्रों का कोई भण्‍डार न हो’, लेकिन आज तो कुछ देशों के पास घातक हथियारों का जखीरा हैं। 1945 से लेकर अब तक 2060 से भी ज्‍यादा परीक्षण किए जा चुके हैं। परमाणु अनुसंधान का प्रयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्‍यों के लिए किया जाना चाहिए। भारत ने सदैव इसे अपने आणविक नीति का शांतिवादी स्‍वरूप रखा जो आज भी प्रासंगिक रूप में उच्‍च आदर्शों के साथ खड़ी है।

भारतीय सरकारों को समय-समय पर क्षेत्रीय मंचों तथा अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों, यू.एन. में भारत की नीति का शांतिवादी स्‍वरूप को उजागर किया है। इसी से सरकार के निर्माण-पतन के बावजूद भी भारतीय आविवक नीति स्‍थिर रही। जो स्‍वतंत्रता थी।
  1. भारत एक न्‍यूनतम नाभिकीय निवाकर बनाए रखेगा।
  2. भारत की किसी खुले उद्देश्‍य के कार्यक्रम अथवा शस्‍त्री की किसी होड़ में शामिल होने की मांग नहीं है।
  3. भारती नाभिकीय ह‍थियारों का पहले प्रयोग न करने और नाभिकीय हथियारों का पहले प्रयोग न करने और नाभिकीय ह‍थियार सहित राष्‍ट्रों के विरूद्ध प्रयोगन करने की नीति का अनुमोदन करता है।
  4. भारत का नाभिकीय शस्‍त्रागार नागरिक अधिकार और नियंत्रण में है।
  5. एक राष्‍ट्रीय सुरक्षा परिषद की स्‍थापना की गई तथा इसे सामरिक प्रतिरक्षा की समीक्षा करने के लिए कहा गया है।
  6. भारत निस्‍त्रीकरण सम्‍मेलन में सच्‍ची भावना से नाभिकीय हथियार तथा अन्‍य नाभिकीय विस्‍फोटक यंत्र के निर्माण के उद्देश्‍य से विखण्‍डनीय सामग्री के उत्‍पादन पर रोक लगाने के लिए एक संधि पर वार्ताओं में शामिल है।

भारत ने अपने आणविक नीति में परमाणु बटन का प्रबंध उद्घोषित किया कि-
  • गैर परमाणु हथियार वाले देशों के खिलाफ परमाणु हथियारों का इस्‍तेमाल नहीं करेगा।
  • भारत के खिलाफ या भारतीय बलों पर कहीं भी जैविक या रासायनिक हथियारों से हमला होने पर देश जवाबी परमाणु हमले का विकल्‍प का इस्‍तेमाल करेगा।
  • परमाणु और प्रक्षेपास्‍त्र से सम्‍बन्‍धित सामग्री तथा प्रौद्योगिक के निर्यात पर कड़ा नियंत्रण, विखंडनीय सामग्री कटौती संधि में भागीदारी एवं परमाणु परीक्षणें पर स्‍वैच्‍छिका रोक जारी रखना शामिल है।
  • भारत ने परमाणु हथियार मुक्‍त विश्‍व के प्रति प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है तथा कहा कि वह प्रमाणित व भेदभाव रहित परमाणु निरस्‍त्रीकरण के जरिए यह लक्ष्‍य हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • परमाणु हथियारों का नियंत्रण प्रधानमंत्री के अधीन किया गया।

भारत अमेरिका कि बीच असैन्‍य परमाणु समझौता हुआ और इसे लागू करने के लिए अमेरिका को कांग्रेस से पारित यूनाईटेड स्‍टेट्स-इण्डिया पीसफुल एटामिक एनर्जी कोऑपरेशन एक्‍ट 2006 (हेनरी हाइड कानून) पारित हुआ जिसके बाद भारत को 48 सदस्‍यीय न्‍यूक्‍लीयर सप्‍लायर्स ग्रुप (NSG) की मंजूरी मिली।

भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि परमाणु समझौते से ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि भारत भविष्‍य में परमाणु परीक्षण नहीं कर सके। 123 समझौता परमाणु परीक्षण करने में भारत के अधिकार को किसी प्रकार बाधित नहीं करता है। आर्थिक विकास के लिए यह समझौता आवश्‍यक था। क्‍योंकि परमाणु ऊर्जा किफायती और आसानी से प्रापत किया जा सकता है। इसलिए यह समझौता भारत के राष्‍ट्रीय हित में है, जो बिना किसी दबाव के और आणविक नीति को स्‍पष्‍ट करते हुए उसके वैश्‍विक स्‍वरूप को उजागर किया।

अक्‍टूबर 2008 में भारतीय परमाणु नीति को उस समय अप्रत्‍यक्ष रूप में अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मान्‍यता प्राप्‍त हुई जिसके बाद भारत ने फ्रांस तथा रूस के साथ भी परमाणु सहयोग समझौते किए। भारत की परमाणु शस्‍त्र नीति को एक प्रकार से स्‍वीकृति मिल गई थी। भारत ने यह स्‍थ‍िति NPT पर हस्‍ताक्षर किए किये बिना प्राप्‍त की और सितम्‍बर 2009 में घोषित किया कि भारत परमाणु अप्रसार पर हस्‍ताक्षर नही करेगा।

भारतीय आणविक नीति की प्रमुख बाते निम्‍न थी।
  1. फ्रांस, रूस, आदि के साथ ऐसे समझौते करके भारतीय ऊर्जा सुरक्षा को विश्‍वसनीय और दृढ़ बनाना।
  2. अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवाद की पूर्ण समाप्‍ति के लिए उन सभी देशों विशेषकर U.S.A. इग्‍लैण्‍ड, रूस आदि से दृढ़ सहयोग करना तथा पकिस्‍तान पर इस बात के लिए दबाव बनाना कि वह अपनी आतंकवाद को सर्मथन देने की नीति का त्‍याग करे और अपनी धरती पर विद्यमान आंतकी संगठनों को बंद करे तथा सीमा पार आतंकवाद पर रोक लगाए।
  3. पूर्वी एशिया तथा एशिया के देशों के साथ अधिक आर्थिक सहयोग सम्‍बन्‍ध स्‍थापित करना।
  4. अफ्रीकी देशों के साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक सम्‍बन्‍धों के विकास को एक नई प्राथमिकता।
  5. संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की स्‍थायी सदस्‍यता प्राप्‍त करने के लिए लगातार कार्य करना।
  6. परमाणु नि:शस्‍त्रीकरण का पूर्ण समर्थन करना लेकिन NPT, CTBT जैसी अपूर्ण संधियों पर हस्‍ताक्षर न करना।
  7. समकालीन स्‍थिति में भारतीय परमाणु नीति को बनाए रखना और आवश्‍यक रूप में भारतीय परमाणु निवारक क्षमता को विकसित करना।
  8. विश्‍व आर्थिक मंदी का सामना करने के लिए उचित कदम उठाने और दूसरे राष्‍ट्रों के साथ अधिक व्‍यापक आर्थिक सम्‍बन्‍धों को विकसित करके भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को दृढ़ बनाना।
  9. विश्‍व में परमाणु प्रसार के रोकने के लिए अन्‍य देशो के साथ पूर्ण सहयोग करना।
  10. चीन व पाक के साथ विद्यमान सीमा सम्‍बन्‍धी झगड़े के निपटाने के लिए लगातार प्रयास करना।

भारत की आणविक सम्‍पन्‍न होने के बाद भी भारत शांन्‍ति का रक्षक है लेकिन भारतीय हित की दृष्‍टि से चीन के द्वारा नए सुपर सोनिक परमाणु वाहन के सफल परीक्षण किया जो परमाणु हथियारो को लक्ष्‍य तक ले जाने के समक्ष है इसकी खूबी यह कि यह अमेरिकी किसाइलो को वकमा देकर बच निकलनेमें समक्ष है। डब्‍ल्‍यू - 14 को आवाज से 10 गुना ज्‍यादा रफ्तार पर चलने के लिए बनाया गया है।

आज के बदलते विश्‍व परिदृश्‍य में स्‍वतंत्र आणविक नीति रखते हुए भारत ने वर्तमान में रूस की मदद से कम से कम 10 रिएक्‍टर लगाने को समझौते किया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी व रूसी राष्‍ट्रपति पुतिन ने परमाणु ऊर्जा, पेट्रोलियम, मेडिकल रिसर्च फौजी ट्रेनिंग पर समझौता किया। आस्‍ट्रेलिया भी यूरेनियम की सप्‍लाई करेगा, कनाडा ने भी ऐसा भरोसा दिया है। हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री के ब्रिटेन दौरे में भारत ब्रिटेन के मध्‍य 9 अरब पाउंड मूल्‍य के सौदे किए जिनमें असैन्‍य पर परमाणु समझौते पर हस्‍ताक्षर तथा व साइबर सुरक्षा में सहयोग का फैसला हुआ। बिट्रिश प्रधान डेविड कैमरुन ने कहा कि नई गतिशील आधुनिक भागीदारी हुई और संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्‍थायी सदस्‍यता के लिए ब्रिटेन का समर्थन दोहराया है। मोदी ने कहा कि – असैन्‍य परमाणु समझौते ने हमारे बीच आपसी विश्‍वास और जलवायु परिवर्तन का सामना करने में हमारे संकल्‍प का प्रतीक है। भारत के वैश्‍विक स्‍वच्‍छ ऊर्जा भागीदारी वैश्‍विक केन्‍द्र में सहयोग का समझौते से वैश्‍विक उद्योग में सुरक्षा और बचाव को मजबूती मिलेगी। भारत के सबसे बड़े व्‍यापारिक भागीदारी में ब्रिटेन का 18वॉ स्‍थान है। वर्ष 2014-15 में द्विपक्षीय व्‍यापार 14.32 अरब डालर रहा। भारत में निवेशकों में ब्रिटेन की स्‍थिति तीसरे बड़े राष्‍ट्र की है।

भारत आज सुचना, प्रौद्योगिकी, रक्षा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्‍थापित करता चला जा रहा है। भारत ने परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम स्‍वदेशी मिसाईल अग्‍नि में द्विचरणीय शस्‍त्र प्रणाली है। यह 20 मीटर लम्‍बी तथा 17 टन भारी है। इसमें पाँचवी पीढ़ी के कम्‍प्‍यूटर लगे है। इसकी आधुनिकता विशेषताएँ उड़ान के दौरान होने वाले अवरोधो के दौरान खुद को ठीक एवं दिशा निर्देशित कर सकता है। यह तकनीक भारत की आत्‍मनिर्भर को बतलाता है लेकिन फिर भी भारत कुछ राष्‍ट्रों द्वारा अपनाई गई नस्‍लवादी भेदभाव की नीति साम्राज्‍यवाद, उपनिवेशवाद, नव उपनिवेशवाद की नीतियों की आलोचना करने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र की जनसभाओं का प्रयोग करता है तथा अन्‍य मंचों से भी लगातार अपने शांतिवादी दृष्टिकोण उकेरता आया है। निरस्‍त्रीकरण, शस्‍त्रीनियंत्रण तथा परमाणु नि:शस्‍त्रीकरण की दिशा में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के प्रयत्‍नों में सहायता प्रदान किया है प्रजातिपार्थक्‍य की नीति के विरूद्ध अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍था के तथा हिन्‍द महासागर को शान्‍ति क्षेत्र बनाने के प्रस्‍तावों को पास करवाने के पीछे भारत का हाथ निश्‍चत रहा है।

इन्‍हीं के मद्देनजर विश्‍व के द्वारा भारत प्रयोजित शांति के नियमों का स्‍थापित करने के क्षेत्र में उसकी महत्ती भूमिका को नकार नहीं पारहा है और तृतीय विश्‍व के प्रतिनिधि के तौर पर गुटनिरपेक्ष के अगुवा के रूप में बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था, विकासशील राष्‍ट्रों में सबसे अधिक जी.डी.पी. में विकासशील देशों में सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है। वर्ष 2014 में पर्याप्‍त ल्‍पूटोनियम भारतके पास था और अनुमानित संख्‍या 175-125 थी, लेकिन इसके बावजूद भी परमाणु सम्‍पन्‍नता दादागिरी में नहीं बदली बल्‍कि उद्देश्‍यों के आधारपर सुरक्षा के लिए आधारित रही। बदलते परिदृश्‍य में एक नई विश्‍व व्‍यवस्‍था में भारत के स्‍वरूप को सभी राष्‍ट्रों में स्‍वीकार है- चाहे आधार कुछ भी हो- जनसंख्‍या, स्‍थान, परमाणु सम्‍पन्‍नता, तृतीय विश्‍व का प्रतिनिधि, विकासशील राष्‍ट्रों के नेता के रूप भारत की महत्ता को अस्‍वीकार नहीं किया जा सकता है।

भारत के परीक्षणों के बाद लगे प्रतिबंध अपने आप हटे बिना किसी दबाव के क्‍योंकि विश्‍व शांति भारत का अन्‍तिम लक्ष्‍य है। चाहे भारत के पड़ोसी राष्‍ट्रों से भले ही धोखा क्‍यों न मिला हो लेकिन भारत पाक व चीन के साथ सदैव बात चीत के लिए अग्रसर रहता है कारण यह है कि अहिंसा भारत के विदेशनीति में ही स्‍थापित है, जो गांधी के लिए आर्दश है जो शांतिवाद आध्‍यात्‍म है।

जलवायु परिवर्तन का मुद्दा हो, G 77, G 20 आसियान, बिम्‍सटेक, ब्रिक में भारत की उपस्‍थिति से इन संगठनों की उपादेयता बढ़ी है। इनके कार्य प्रणालियों पर विश्‍व के महाशक्‍ति की नजर सदैव बनी रहती है।

परिवर्तित विश्‍व में आर्थिक कारणों ने भी संधियों को जन्‍म दिया है भारत प्रत्‍येक स्‍तर पर गतिमान है। आर्थिक, सांस्‍कृति, राजनैतिक, कूटनीतिक, विज्ञान- सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरंतर विकास के पथ अग्रसर है। इस बदलते मॉडल में या यूँ कहे नई विश्‍व आर्थिक व्‍यवस्‍था में भारत की आणविक नीति का उपयोग (कूटनीतिक, राजनीतिक) स्‍तरों पर विदेशनीति के व्‍यापक परिप्रेक्ष के रूप सक्रिय करने की आवश्‍यकता है जिससे भारत विकास की नई ऊचाइयों छूँ सके। सुरक्षा परिषद में विकसित राष्‍ट्रों का अनुसमर्थन भी मिले चाहे आधार कोई बने लेकिन सुरक्षा परिषद में भारत का स्‍थायी सदस्‍यता मिले जिसका एक मानक शांतिवादी परमाणु नीति शस्‍त्र निरस्‍त्रीकरण की भावना भी हो सकती है। परमाणु सम्‍पन्‍नता से किसी राष्‍ट्र को भयभीत होने की आवश्‍यकता नहीं है क्‍योंकि भारतीय विदेशनीति में पंचशील को अपनाया गया जिसका मूलाधार शांति और केवल अंतर्राष्‍ट्रीय शांति है। परमाणुनीति के आधार पर विश्‍व में आणविक व सामरिक क्षेत्रों में शक्‍ति संतुलन स्‍थापित किया जा सके  । जिससे भारत-पाक चीन के त्रिकोणात्‍मक सघर्ष पर रोक लगे तथा दक्षिण एशिया में शक्‍ति संतुलन स्‍थापित हो सम्‍पूर्ण विश्‍व में शांति प्रत्‍यायोजित हो क्‍योंकि परमाणु के कारण सदैव विश्‍व अशान्‍त है। आज 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी विश्‍व लिटल ब्‍वाय को भूला नहीं पाया है जिसका परिणाम सम्‍पूर्ण विश्‍व ने झेला। युद्धों के खतरों को टालने के लिए शायद भारत ने परमाणु हथियारों का निर्माण किया लेकिन शांति उसका मूल उद्देश्‍य था, जो संयुक्‍तराष्‍ट्रकी संकल्‍पना है। शांति और संर्वत्र शांति स्‍थापित हो क्‍योंकि युद्ध मानव मस्‍तिष्‍क में जन्‍म लेता है और वहीं पर उसे नियन्त्रित किया जाय। यदि ऐसा नही हुआ तो विश्‍व कल्‍याण कभी भी नहीं हो पाएगा।

भारत विश्‍व कल्‍याण हेतु है विश्‍व शांति स्‍थापित करना चाहता है। इसलिए उसने अपनी आणविक नीति को सदैव शांतिवादी ही कहा और आगे भी उसका स्‍वरूप वही होगा। जो सम्‍पूर्ण मानवता एवं मानव जाति के लिए श्रेयस्‍कर है। यहीं भारतीय परमाणु नीति का वैश्‍विक दृष्‍टिकोण है जो समस्‍त राष्‍ट्रों के लिए आज भी उतना प्रासांगिक है जितना संयुक्‍त राष्‍ट्र। भारतीय आणविक नीति शांति पूर्ण साधनों द्वारा शांति की स्‍थापनाके लक्ष्‍य अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सुरक्षा व शांति के मध्‍य सम्‍पूर्ण सुसंगता है
भारत में समावेशी विकास की अवधारणा। Inclusive Development in Hindi

भारत में समावेशी विकास की अवधारणा। Inclusive Development in Hindi

भारत में समावेशी विकास की अवधारणा। Inclusive Development in Hindi

समावेशी विकास का आशय ऐसे आर्थिक विकास से है जिसमें विकास का लाभ समाज के सबसे कमजोर वर्ग को मिलता है। इस प्रकार समावेशी विकास में ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है जो अब तक विकास की प्रक्रिया में छूट गये थे या पीछे रह गए थे। विश्‍व बैंक द्वारा प्रकाशित इंडिया डेवलपमेंट रिपोर्ट 2006 में कहा गया है कि विकास की प्रक्रिया आर्थिक क्रियाओं के योग का मात्र माप नहीं है। बल्‍कि आर्थिक विकास के समावेशी स्‍वरूप का मूल्‍यांकन है जिसमें आर्थिक लाभों के वितरण पर ही ध्‍यान नहीं दिया जाता बल्‍कि सुरक्षा, सशक्‍तिकरण, विकास में पूर्ण सहभागिता, जैसे कारकों पर भी ध्‍यान दिया जाता है। सामान्‍यता किसी विकास को समावेशी विकास तब माना जाता है जब विकास के साथ-साथ सामाजिक अवसरों का भी समान वितरण हो ऐसे। समावेशी विकास के प्राय: दो लक्षण बताए जाते हैं:
(1)  सेवाओं के वितरण तथा अवसर की उपलब्‍धता में समानता।
(2)  विकास के द्वारा प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति की सशक्‍तिकरण।
समावेशी विकास की अवधारणा कोई नई अवधारणा नहीं है। यह कहा जा सकता है कि विकास का अर्थ ही समावेशी विकास है। आज हम इसे समावेशी विकास कह कर अपनी पिछली गलतियों को सुधारने सुधारने की चेष्‍टा कर रहे हैं। वास्‍तव में इसके पहले विकास के जो भी प्रयास किए गए उसका लाभ ऊपरी तबके ने अपनी झोली में डाल दिया और वे लोग इससे वंचित रह गए जिन्‍हें वास्‍तव में इसकी जरूरत थी। इसी को ध्‍यान में रखते हुए 12वीं पंचवर्षीय योजना में विकास को समावेशी बनाने पर बल दिया गया है। योजना आयोग के अनुसार जनसंख्‍या का बड़ा भाग विकास के लाभ से वंचित है। विकास के स्‍वरूप से उपजी असमानताओंकी चर्चा करते हुए कई प्रकारके असंतुलनों का उदाहरण दिया गया है। जैसे-ग्रामीण व शहरी असमानता, अमरी व गरीब जसंख्‍या के मध्‍य असमानता, पुरुषों व महिलाओं के मध्‍य असमानता, राज्‍यों व राज्‍य के विभिन्‍न क्षेत्रों के मध्‍य असमानता।

इस समय भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में तीव्रवर विकास करने की आवश्‍यकता है क्‍योंकि भारत की आय के मौजूदा स्‍तर पर, इस बात में कोई संशय नहीं है कि यदि हम अपनी जनसंख्‍या के जीवनयापन की आर्थिक स्‍थितियों में व्‍यापक सुधार लाना चाहते हैं और भारत के नवयुवकों की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा करना चाहते हैं तो हमें अर्थव्‍यवस्‍था के उत्‍पादन आधार को बढा़ना होगा। किंतु यदि यह प्राप्‍त लाभों के प्रभाव को पर्याप्‍त रूप से व्‍यापक नहीं करता तो वह विकास ही पर्याप्‍त नहीं है। हमें एक ऐसी विकास प्रक्रिया की आवश्‍यकता है जो और अधिक समावेशी हो, जो गरीबी में अधिक तेजी से कमी लाने के लिए गरीबों की आय को बढ़ाए जो अच्‍छी गुणवत्‍ता वाले रोजगार का विस्‍तार करे और जो जनसंख्‍या के सभी वर्गों के लिए स्‍वास्‍थ्‍य एवं शिक्षा जैसी आवश्‍यक सेवाओं तक पहुंच को भी सुनिश्‍चित करे।। कुछ समय पूर्ण उद्योग महासंघ की वार्षिक बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योग जगत को सामाजिक विकास में भागीदारी हेतु प्रेरित करते हुए समावेशी विकास के लिए दस सूत्रीय रूपरेखा प्रस्‍तुत की गई थी। ये दस सूत्र निम्‍नलिखित हैं:
  1. उद्योग जगत अपने कर्मचारियों तथा श्रमिकों के कल्‍याण के लिए निवेश करे तथा उनके बच्‍चों के स्‍वास्‍थ एवं शिक्षा की व्‍यवस्‍था की साथ सामाजिक सुरक्षा हेतु उपाय करे।
  2. उद्योग जगत को कर भुगतान के साथ अपनी जिम्‍मेदारी को समाप्‍त नहीं मानना चाहिए। उन्‍हें अपनी सामाजिक जिम्‍मेदारी का ध्‍यान रखना चाहिए तथा इसकी पूर्ति के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।
  3. उद्योग जगत को अनुसूचित वर्ग के लोगों, महिलाओं तथा साधनविहीन लोगों को नौकरियों में अवसर उपलब्‍ध कराने के लिए नीति बनानी चाहिए।
  4. कंपनी तथा उद्योगों के उच्‍च पदों पर विराजमान लोगों को अधिक वेतन और भत्‍ते लेने से परहेज करना चाहिए। इस प्रकार कंपनी के व्‍यव में कमी लाकर उस धन को समाज कल्‍याण के क्षेत्र में लगाना चाहिए।
  5. उद्योगों को चाहिए कि वे तकनीकी क्षेत्र में निवेश करके देश के योग्‍य और प्रतिभा सम्‍पन्‍न युवाओं को शोध और अनुसंधान हेतु मदद दें। उद्योगों को नियमित रूप से छात्रवृत्‍ति देने की दिशा में भी सोचना चाहिए।
  6. उद्योग जगत को अपने उत्‍पादोंकी वाजिब कीमत रखनी चाहिए तथा अन्‍य उद्योगोंसे गठबंधन करके उत्‍पादों की कीमत को बढ़ाए रखनेकी नीति का त्‍याग करना चाहिए।
  7. उद्योगो को पर्यावरण के अनुकूल तकनीक को अपनाना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों को बचाए रखा जा सके।
  8. उद्योग जगत को अनुसंधान और विकास की गति में तेजी लाने के लिए सक्रिय योगदान देना चाहिए।
  9. उद्योगों को भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध संघर्षशील होना चाहिए तथा ऐसे उद्योगपति जो राजनीति में भी दखल रखते हैं, को राजनीति और उद्योग के बीच लाभकारी संबंध नहीं बनाना चाहिए।
  10. मीडिया को उत्‍तरदायित्‍वपूर्ण भूमिका में आना चाहिए तथा मीडिया के गैर-जिम्‍मेदाराना व्‍यवहार को हतोत्‍साहित करना चाहिए।

समावेशी विकास अपने विस्‍तृत आकार में सामाजिक न्‍याय की उस अवधारणा का पोषण भी करता है जिसे हमारे संविधान में भी मान्‍यता दी गयी है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि समावेशी विकास अपने आप में एक संपूर्ण और समग्र अवधारणा है। यह सामाजिक बदलाव का कारक है। जहां तक भारत का प्रश्‍न है यह एक विकासशील देश है और कई क्षेत्रों में अभी भी यहां विशेष प्रयास की जरूरत है अपने देश की जरूरतों के मुताबिक समावेशी विकास के निम्‍नलिखित प्रमुख घटकों का उल्‍लेख किया जा सकता है:
  1. आधारभूत संरचनाओं – सड़क, स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं, पेयजल, स्‍वच्‍छता, सिंचाई, शिक्षा इत्‍यादि के क्षेत्र में विशेष प्रयास किए जाने चाहिए तथा आर्थिक विकास की धारा को इस ओर मोड़ जाना चाहिए।
  2. ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर विशेष ध्‍यान दिया जाना चाहिए। निचले वर्ग तक विकास की लहर पहुंचने के लिए रोजगार के अवसरों का बढ़ाना नितांत आवश्‍यक है। मनरेगा के अंतर्गत देश में इस दिशा में ठोस प्रयास किया जा रहा है।
  3. कृषि तथा ग्रामीण विकास क्षेत्र में निवेश में वद्धि की जानी चाहिए ताकि ग्रामीण जनता की आय में वृद्धि हो सके।
  4. सूचना प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकों की सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच सुनिश्‍चित की जानी चाहिए।
  5. पिछड़ी तथा दलित जातियों, महिलाओं तथा आदिवासियों के सशक्‍तिकरण की दिशा में विशेष प्रयास किया जाना चाहिए।

इस दिशा में कारगर पहले करते हुए केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में आधारिक संरचना के विकास के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री आदर्श गांव योजना, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना, ग्रामीण आवास योजना, राष्‍ट्रीय बायोगैस कार्यक्रम, ग्रामीण पेयजल योजना, उन्‍नत चूल्‍हा कार्यक्रम, ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का संचालन स्‍थानीय स्‍वशासी संस्‍थाओं के माध्‍यम से किया जा रह है। ग्रामीण आवागमन व्‍यवस्‍था को सुदृढ़ करने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काफी सहायक सिद्ध हो रही है। इस योजना का मुख्‍य उद्देश्‍य ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क से वंचित सभी गांवों को सड़क मार्ग से जोड़ना है।

फ्लैगशिप कार्यक्रम के अंतर्गत जवाहर लाल नेहरू राष्‍ट्रीय नवीनीकरण मिशन, राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम, एकीकृत बाल विकास सेवाएं, राष्‍ट्रीय गामीण स्‍वास्‍थ्‍य मिशन, पूर्ण स्‍वच्‍छता अभियान, राजीव गांधी पेयजल मिशन, सर्वशिक्षा अभियान मध्‍यान्‍ह भोजन योजना पर विशेष ध्‍यान देकर सरकार समावेशी विकास के लक्ष्‍य को शीघ्र अतिशीघ्र हासिल कर लेने की योजना पर काम कर रही है। इसके अतिरिक्‍त केंद्र सरकार द्वारा भारत निर्माण परियोजना का संचालन किया जा रहा है। इसके अंतर्गत असिंचित भूमि को सिचांई सुविधा से युक्‍त करना, दूरवर्ती गांवों को पेयजल उपलब्‍ध कराना, निर्धनों हेतु आवास का निर्माण कराना, सभी गावों को विद्युत तथा टेलीफोन सुविधा से युक्‍त करना इत्‍यादि लक्ष्‍य पर काम चल रहा है।

इस प्रकार समावेशी विकास की प्राथमिकतांए स्‍पष्‍ट हैं। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों, अन्‍य पिछड़ी जातियों अल्‍पसंख्‍यकों और महिलाओं तथा बच्‍चों के उत्‍थान कार्यक्रमों के साथ-साथ कृषि, सिंचाई, जल संसाधन, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, ग्रामीण अवसंरचना में महत्‍वपूर्ण निवेश तथा सामान्‍य अवसंरचना के लिए जरूरी सार्वजनिक निवेश संबंधी आवश्‍यकताएं इसमें शामिल हैं। अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए कुछ नई और व्‍यापक आधारवाली योजनाओं को क्रियान्‍वित करना होगा। स्‍वाधीनता के बाद के प्रथम तीन दशकों तक भारत की विकास दर 3.5 प्रतिशत या इसके नीचे ही रही। आज हम 9 प्रतिशत विकास दर के स्‍तर को प्राप्‍त करने में सक्षम हुए हैं किन्‍तु आर्थिक विकास की इस दौड़ में देश के उस भाग को पीछे छोड़ दिया गया है जिसे गांधीजी असली भारत कहते थे। अब हमें विकास का लाभ उस असली भारत तक पहुंचना होगा।

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की जानकारी

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की जानकारी

लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 की जानकारी UPSC

संसद द्वारा पारित एंतिहासिक लोकपाल तथा लोकायुक्‍त विधेयक, 2011 (राज्‍यसभा द्वारा 17 दिसम्‍बर, 2013 तथा लोकसभा द्वारा 18 दिसम्‍बर, 2013 को पारित) ने केंन्‍द्र में लोकपाल तथा राज्‍यों में इस कानून के प्रभावी होने के एक वर्ष के अदंर राज्‍यों के विधान मंडलों द्वारा परित किये जाने पर लोकायुक्‍त संस्‍था के गठन का मार्ग प्रशस्‍त कर दिया। दोनों सदनों द्वारा पारित यह विधेयक राष्‍ट्रपति की स्‍वीकृति के लिए भेजा जाएगा और राष्‍ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून का रूप ले लेगा। नया कानून ऊंचे पदोंपर आसीन लोगों सहित सार्वजनिक पदोंपर आसीन लोगों के विरुद्ध भ्रष्‍टाचार की शिकायतों से निपटने के तौर-तरीके प्रदान करता है।

विधेयक का महत्‍व
संसद के दोनों सदनों द्वारा इस बिल को पारित किया जाना स्‍वयं में महत्‍वपूर्ण है। इस दृष्टि से कि अतीत में लोकपाल कानून बनाने के सभी प्रयास विफल रहे। लोकसभा पर आठ विधेयक पेश किये गये थे, लेकिन 1985 के विधेयक को छोड़कर विभिन्‍न लोकसभाओं के भंग होने के कारण ये विधेयक अधर में रह गये। वर्तमान विधेयक को सदन के दोनों सदनों से मिली मंजूरी कारगर भ्रष्‍टाचार विरोधी ढांचा बनाने के संसद तथा सरकार की प्रतिबद्धता का संकेत देती है।

इस विधेयक की अन्‍य महत्‍वपूर्ण विशेषता यह है कि सिविल सोसायटी सहित सभी हितधारकों से लगातार विचार-विमर्श के बाद इसको वर्तमान रूप दिया गया। लोकपाल और लोकायुक्‍त विधेयक स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में एकमात्र विधेयक है, जिस पर संसद और संसद से बाहर व्‍यापक चर्चा हुई। इस चर्चा से लोगों में भ्रष्‍टाचार से निपटने के लिए लोकपाल की कारगर संस्‍था की जरूरत महसूस हुई।

संदर्भ
सकरार ने 8 अप्रैल, 2011 को लोकपाल विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए एक संयुक्‍त प्रारूप समिति का गठन किया। विधेयक के मूलभूत सिद्धान्‍तों पर व्‍यापक चर्चा हुई। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों तथा सकरार ने प्रतिनिधियों की राय भिन्‍न होने के कारण लोकपाल विधेयक के दो अलग-अलग मसौदे बने। सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों ने जन लोकपाल विधेयक का मसौदा बनाया और सरकार की तरफ से विधेयक का प्रारूप तैयार किया गया। सरकार तथा सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों की राय में भिन्‍नता होने के कारण संयुक्‍त प्रारूप समिति का विधायी कार्य कठिन हो गया, क्‍योंकि संविधान बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ किये और संवैधानिक प्रावधानों के तथा प्रास्‍तावित विधेयक के प्रावधानों के बीच संतुलन बनाने की आवश्‍यकता पड़ी। इसलिए प्रस्‍तावित विधेयक पर सभी राजनीतिक दलों तथा राज्‍य सरकारों के बीच विचार-विमर्श हुआ। 3 जूलाई, 2011 को सर्वदलीय बैठक हुई। इसके बाद 4 अगस्‍त, 2011 को सरकार ने लोकसभा में लोकपाल विधेयक, 2011 पेश किया। विधेयक को समीक्षा और रिपोर्ट के लिए कार्मिक, जन शिकायत, विधि और न्‍याय विभाग की स्‍थायी समिति को भेजा गया। फिर 27 अगस्‍त, 2011 को एक साथ संसद को दोनों सदनों में विचार-विमर्श के दौरान तत्‍कालीन वित्‍तमंत्री ने सदन की भावना निम्‍न शब्‍दों में व्‍यक्‍त की:

यह सदन सिटीजन चार्टर, उचित तरीके से निचले स्‍तर के अफसरों को लोकपाल के दायरे में लाने तथा राज्‍यों में लोकायुक्‍त संस्‍था बनाने के बारे में सिद्धान्‍त रूप में सहमत है। मैं सदस्‍यों से आग्रह करूंगा कि आज विभाग से जुड़ी स्‍थायी समिति को इसे आगे विचार के लिए भेजें

सभी हितधारकों में व्‍यापक विचार-विमर्श के बाद स्‍थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में विधेयक में प्रमुख संशोधनों का सुझाव देते हुए अनेक सिफारिशें कीं। ये सिफारिशें विधेयक की सीमा और विषय वस्‍तु के बारे में र्थी। समिति ने यह सिफारिश भी की कि केन्‍द्रीय विधेयक में राज्‍यों में लोकायुक्‍त गठन के लिए आवश्‍यक प्रावधान किये जाएं, ताकि राज्‍य के लोकायुक्‍तों से जुड़े कानून में एकरूपता आ सके। स्‍थायी समिति की सिफारिशों पर विचार करने के बाद सरकार ने लोकसभा में विचाराधीन लोकपाल विधेयक, 2011 को वापस ले लिया और 12 दिसम्‍बर, 2011 को एक नया तथा व्‍यापक लोकपाल और लोकायुक्‍त विधेयक, 2011 प्रस्‍तुत किया। 27 दिसम्‍बर, 2011 को लोकसभा ने इस विधेयक को पारित किया। राज्‍यसभा ने 21 मई, 2012 को राज्‍यसभा की प्रवर समिति को भेजने संबंधी एक प्रस्‍ताव स्‍वीकार किया। हितकारों के साथ विचार-विमर्श के बाद प्रवर समिति ने राज्‍यसभा को अपनी रिपोर्ट सौंपी। प्रकार समिति ने विधेयक में अनेक संशोधन की सिफारिश की। निरंतर विचार-विमर्श की प्रक्रिया से इस विधेयक के गुजरने के कारण यह कहना असंगत नहीं होगा कि वर्तमान विधेयक में भारत के लोगों की व्‍यापक सहमति है।

विधेयक की प्रमुख विशेषताएं
संसद द्वारा पारित विधेयक की प्रमुख विशेषताएं निम्‍न है :
(क) केंद्र में लोकपाल तथा राज्‍य के स्‍तर पर लोकायुक्‍त संस्‍था का गठन कर देश के लिए एक रूप निगरानी तथा भ्रष्‍टाचार विरोधी मानचित्र प्रस्‍तुत करना।
(ख) लोकपाल संस्‍था में एक अध्‍यक्ष तथा 8 सदस्‍य होंगे इनमें से 50 प्रतिशत सदस्‍य न्‍यायिक क्षेत्र के होंगे। लोकपाल के 50 प्रतिशत सदस्‍य जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्‍य पिछड़े वर्गों, अल्‍पसंख्‍यकों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्‍व करेंगे।
(ग) लोकपाल के अध्‍यक्ष और सदस्‍यों का चयन एक चयन समिति करेगी। इसके निम्‍न सदस्‍य होंगे:
  1. प्रधानमंत्री
  2. लोकसभा अध्‍यक्ष
  3. लोकसभा में विपक्ष के नेता
  4. भारत के प्रधान न्‍यायाधीश या भारत के प्रधान न्‍यायाधीश द्वारा मनोनीत उच्‍चतम न्‍यायालय का वर्तमान न्‍यायाधीश
  5. भारत के राष्‍ट्रपति द्वारा मानेनीत प्रख्‍यात न्‍यायविद
(घ) चयन प्रक्रिया में चयन समिति को खोज-समिति मदद देगी। खोज-समिति के 50 प्रतिशत सदस्‍य अनुसूची जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्‍य पिछड़े वर्गों, अल्‍पसंख्‍यकों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्‍व करेंगे।
(ङ) प्रधानमंत्री का पद लोकपाल के दायरे में आया। प्रधानमंत्री के विरुद्ध शिकायतों की सुनवाई की विशेष प्रक्रिया होगी।
(च) समूह ए.बी.सी तथा डी के अधिकारियों तथा सरकार के कर्मचारियों सहित सभी श्रेणियों के लोकसेवक, लोकपाल के क्षेत्राधिकार में आएंगे। लोकपाल द्वारा मुख्‍य सर्तकता आयुक्‍त को शिकायत भेजे जाने पर मुख्‍य सतर्कता आयुक्‍त समूह ए तथा बी के अधिकारियों के मामले में अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आगे निर्णय के लिए लोकपाल को वापस भेजेंगे। समूह सी तथा डी कर्मचारियों के मामले में मुख्‍य सतकर्ता आयुक्‍त अपनी शक्‍तियों का उपयोग करते हुए सीवीसी कानून के तहत आगे बढेंगे। उनकी कार्रवाई की रिपोर्टिंग तथा समीक्षा लोकपाल द्वारा की जाएगी।
(छ) विदेशी चंदा (योगदान) नियमन कानून (एफसीआरए) के संदर्भ में 10 लाख रुपए से अधिक का दान (चंदा) प्राप्‍त करने का मामला लोकपाल के क्षेत्राधिकार मे लाया गया।
(ज) लोकपाल द्वारा सीबीआई सहित किसी अन्‍य जांच एजेंसी को सौंपे गए मामले में अधीक्षण तथा निर्देशन का अधिकार लोकपाल के पास होगा।
(झ) सीबीआई निदेशक के चयन की अनुशंसा प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता वाली उच्‍च स्‍तरीय समिति करेगी।
(ञ) लोक सेवकों द्वारा भ्रष्‍ट साधन से प्राप्‍त संपत्ति की कुर्की जब्‍ती मामले के विचाराधीन होने पर होगी।
(ट) स्‍पष्‍ट समय-सीमा:
  1. प्रारंभिक जांच-तीन महीनों के भीतर, तीन महीनों तक विस्‍तार संभव।
  2. जांच 6 महीनों की अवधि में जिसे एक समय में 6 महीनों हेतु और बढ़ाया जा सकता है।
  3. सुनवाई एक साल में, सुनवाई अवधि का विस्‍तार एक साल और संभव। इसके लिए विशेष अदालतों का गठन

(ठ) भ्रष्‍टाचार रोधी कानून के अंतर्गत अधिकतम सजा साज वर्ष के बढ़ाकर 10 वर्ष करने का प्रावधान। भ्रष्‍टाचार रोधी कानून की धारा 7, 8, 9, तथा 12 के ताहत न्‍यूनतक सजा 3 वर्ष की होगी तथा धारा 15 के तहत न्‍यूनतम सजा अब 2 वर्ष की होगी।

राज्‍य सभा की प्रवर समिति की सुधार अनुशंसा विधेयक में शामिल
राज्‍य सभा की प्रवर समिति ने अपनी रिपोर्ट में विधेयक के विभिन्‍न अनुच्‍छेदों में संशोधन का सुझाव दिया। इनमें से अधिकांश सिफारिशों को माना गया और अब यह सिफारिशें संसद द्वारा पारित विधेयक का हिस्‍सा बन गई हैं। विधेयक में कुछ प्रमुख संशोधन से प्रकार हैं:

(क)   राज्‍यों को अपने-अपने लोकायुक्‍तों के स्‍वरूप के बारे में निर्णय की स्‍वतंत्रता: प्रवर समिति ने राज्‍यों में लोकायुक्‍त संस्‍थान गठित करने वाले विधेयक के भाग 3 को समाप्‍त करने की सिफारिश की। समिति ने सुझाव दिया कि विधेयक के इस भाग को नई धारा 63 को शामिल कर खत्‍म किया जा सकता है। इस धारा में कानून के प्रभाव में आने के 365 दिनों के अंदर राज्‍य विधानमंडल द्वारा कानून लोकायुक्‍त संस्‍था गठन का प्रावधान है। सरकार ने यह स्‍वीकार कर लिया इस तरह संसद द्वारा पारित विधेयक में लोकायुक्‍त के स्‍वरूप तय करने में राज्‍यों को दी गई स्‍वतंत्रता से संघीय भावना का सम्‍मान होता है। विधेयक में एक साल के अंदर लोकायुक्‍त गठन करने का अधिकार राज्‍यों को प्रदान किया गया है।
(ख)  लोकपाल के अध्‍यक्ष तथा सदस्‍यों के चयन के लिए चयन समिति को व्‍यापक बनाना: लोकपाल चयन के लिए बनी चयन समिति का 5वां सदस्‍य प्रख्‍यात न्‍यायविद होगा 5वें सदस्‍य का मनोनयन प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा भारत के प्रधान न्‍यायाधीश की अनुशंसा से प्रधानमंत्री करेंगे। इससे यह सुनिश्‍चित हुआ कि चयन मंडल में सरकार के प्रतिनिधियों की बाहुल्‍यता नहीं होगी।
(ग)  सरकार द्वारा आंशिक या पूर्ण रूप से वित्‍त घोषित संस्‍थान लोकपाल के क्षेत्रधिकार में: सरकार द्वारा आंशिक या पूर्ण रूप से वित्‍तीय सहायता प्राप्‍त करने वाले संस्‍थान लोकपाल क्षेत्रधिकार में आएंगे। लेकिन वैसे संस्‍थान इसके दायरे से बाहर होंगे जो सरकारी सहायता से चलते हैं। इससे सुनिश्‍चित हुआ कि लोकपाल की परिधि में किसी न किसी रूप से सरकारी सहयता प्राप्‍त स्‍कूलों तथा सोसायटियों जैसे छोटे संस्‍थान नहीं आएंगे और लोकपाल को कारगर तरीके से भ्रष्‍टाचार के बड़े मामलों से निपटने की स्‍वतंत्रता होगी।
(घ)  ईमानदार लोक सेवकों के लिए पर्याप्‍त सुरक्षा: विधेयक में यह सुनिश्‍चित किया गया है कि अनावश्‍यक रूप से जांच के मामले में लोक सेवक को परेशान नहीं किया जाएगा।
(ङ) सरकार/सक्षम अधिकारी के स्‍थान पर लोक सेवकों के विरुद्ध जांच की अनुमति का अधिकार लोकपाल के पास: विधेयक में सरकार/सक्षम अधिकारी के स्‍थान पर लोक सेवकों के विरुद्ध जांच की अनुमति का अधिकार लोकपाल को दिया गया है लेकिन लोकपाल ऐसा निर्णय लेने से पहले सक्षम अधिकारी तथा लोक सेवक की टिप्‍पणी प्राप्‍त करेंगे। मामले में आरोप पत्र दाखिल करने बारे में निर्णय लेने के बाद लोकपाल अपनी अभियोजन शाखा या जांच एजेंसी को विशेष न्‍यायालय में सुनवाई आरंभ करने के लिए अधिकृत करेंगे। लोकसभा द्वारा पारित मूल विधेयक में लोकपाल की अभियोजन शाखा द्वारा मुकदमा चलाने की व्‍यवस्‍था थी।
(च)  सीबीआई का सुदृढ़ीकरण: विधेयक में केंद्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो को मजबूत बनाने के अनेक प्रावधनों में निम्‍न प्रमुख हैं:
  1. सीबीआई के निदेशक के पूर्ण नियंत्रण में अभियोजन निदेशक के नेतृत्‍व में अभियोजन निदेशालय की स्‍थापना।
  2. केंद्रीय सतर्कता आयोग की अनुशंसा पर अभियोजन निदेशककी नियुक्‍ति।
  3. लोकपाल द्वारा निर्देशित मामलों के लिए लोकपाल की सहमति से सरकारी वकीलों के अलावा सीबीआई द्वारा अधिवक्‍ताओं का पैनल रखना।
  4. लोकपाल द्वारा प्रेषित मामलों में जांच करने वाले सीबीआई के अधिकारियों का स्‍थानांतरण लोकपाल की सहमति से।
  5. लोकपाल द्वारा सौंपे गए मामलों की जांच के लिए सीबीआई को पर्याप्‍त धन उपलब्‍ध कराने का प्रावधान।