Sunday, 22 July 2018

लाटी कहानी का सारांश

लाटी कहानी का सारांश

लाटी कहानी का सारांश

लाटी कहानी का सारांश

कथा नायक कप्तान जोशी की पत्नी को क्षय रोग हो जाना : कथानायक कप्तान जोशी अपनी पत्नी बानो से अत्यधिक प्रेम करता है। विवाह के तीसरे दिन के बाद ही कप्तान को युद्ध हेतु बसरा जाना पड़ा। तब बानो सिर्फ 16 वर्ष की थी। अपने पति की अनुपस्थिति में बानो नें 7-7 नंदों के ताने सुने, भतीजों के कपड़े धोए, ससुर के होज बुने। पहाड़ की नुकीली छतों पर पांच-पांच सेर उड़द दाल पीसकर बड़ियां बनाई आदि। उसे मानसिक प्रताड़ना दी गई कि उसका पति जापानियों द्वारा कैद कर लिया गया है और वह कभी नहीं आएगा। इन सब कारणों से निरंतर घिरती-घुलती रही। बानो क्षय रोग से पीड़ित होकर चारपाई पकड़ लेती है। (कहानी का उद्देश्य यहाँ देखें)

कप्तान का पत्नी के प्रति अगाध प्रेम : कप्तान अपनी पत्नी बानो से अत्यधिक प्रेम करता है। जब वह 2 वर्ष बाद लौट कर घर आता है तो उसे पता चलता है कि घर वालों ने बानो को क्षय रोग होने पर सेनेटोरियम अस्पताल भेज दिया है। वह दूसरे दिन ही वहां पहुंच गया। उसे देखकर बानो के बहते आंसुओं की धारा ने दो साल के सारे उलाहने सुना दिए। सेनेटोरियम के डॉक्टर द्वारा बानो की मौत नजदीक आने की स्थिति में कमरा खाली करने का उसे नोटिस दे दिया गया। कप्तान ने भूमिका बनाते हुए बानो से कहा कि अब यहां मन नहीं लगता है। कल किसी और जगह चलेंगे। वह दिन-रात अपनी पत्नी की सेवा में बिना कोई परहेज एवं सावधानी बरतें लगा रहता था।

बानो द्वारा आत्महत्या का प्रयास करना : बानो समझ गई कि उसे भी सेनेटोरियम छोड़ने का नोटिस मिल गया है, जिसका अर्थ हुआ कि अब वह भी नहीं बचेगी। कप्तान देर रात तक बानो को बहलाता रहा। उससे अपना प्यार जताता रहा। जब कप्तान को लगा कि बानो सो गई है, तो वह भी सोने चला जाता है। सुबह उठने पर बानो अपने पलंग पर नहीं मिली। दूसरे दिन नदी के घाट पर बानो की साड़ी मिली। कप्तान को जब लाश भी नहीं मिली तो उसने समझा बानो नदी में डूबकर मर गई है।

लाटी के रूप में बानो का मिलना : जब कप्तान को पूरा विश्वास हो गया कि बानो अब इस दुनिया में नहीं है, तो घर वालों के जोर देने से उसने दूसरा विवाह कर लिया। दूसरी पत्नी प्रभा से उसे दो बेटे और एक बेटी हुयी। वह भी कप्तान से अब मेजर हो गया। लगभग 10 वर्ष बाद नैनीताल में वैष्णो देवी के दल में उसे लाटी मिलती है, तो मेजर उसे पहचान लेता है। पता चलता है कि गुरुमहाराज ने औषधियों से उसका क्षय रोग ठीक कर दिया था, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी स्मरण शक्ति और आवाज दोनों चली गई। अब ना तो वह बोल सकती है, और ना ही उसे अपना अतीत याद है। वह वैष्णवीदेवी के दल के साथ चली जाती है और मेजर स्वयं को पहले से अधिक बूढा और खोखला महसूस करता है।

Saturday, 21 July 2018

ध्रुवायात्रा कहानी का सारांश। Dhruv Yatra Kahani ka Saransh

ध्रुवायात्रा कहानी का सारांश। Dhruv Yatra Kahani ka Saransh

ध्रुवयात्रा कहानी का सारांश। Dhruv Yatra Kahani ka Saransh

Dhruv Yatra Kahani ka Saransh

विजेता के रूप में राजा रिपुदमन बहादुर : कहानी का मुख्य पात्र राजा रिपुदमन बहादुर उत्तरी ध्रुव जीतकर यूरोप के नगरों की बधाइयां लेते हुए मुंबई और फिर वहां से दिल्ली आते हैं। उनकी प्रेयसी उर्मिला अन्य खबरों की तरह ही इस खबर को भी पढ़ती है, लेकिन किसी प्रकार की व्याकुलता या जिज्ञासा प्रकट नहीं करती। 

राजा रिपुदमन बहादुर एवं उर्मिला के बीच प्रेम संबंध : राजा रिपुदमन एवं उर्मिला के बीच काफी पहले से प्रेम संबंध है, लेकिन उन दोनों ने परस्पर विवाह नहीं किया है। रिपुदमन विवाह को बंधन मानते हैं, किंतु प्रेम को सत्य मानते हैं। वह मानसोपचार के लिए आचार्य मारुति से मिलते हैं, क्योंकि उन्हें नींद कम आने तथा मन नियंत्रण में नहीं रहने की समस्या महसूस होती है। आचार्य उन्हें शारीरिक रूप से स्वस्थ बताते हैं।

राजा रिपुदमन की उर्मिला से मुलाकात : राजा रिपुदमन ने उर्मिला से विवाह नहीं किया है, किंतु उन दोनों के प्रेम संबंधों के कारण उनकी एक संतान है। उर्मिला राजा से मिलने आई तो साथ में अपने बच्चे को भी लाई, जिसके नाम को लेकर उन दोनों के बीच चर्चा होती है। दोनों बात करने के लिए जमुना किनारे पहुंच जाते हैं। वहां उर्मिला राजा से कहती है कि तुम अब मेरी व मेरे बच्चे की जिम्मेदारी से मुक्त हो। अब तुम निश्चिंत होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करने पर अपना ध्यान केंद्रित करो। उर्मिला सिद्धि प्राप्ति के लिए राजा को दक्षिणी ध्रुव जाने की सलाह देती है। 

आचार्य (उर्मिला के पिता) द्वारा विवाह के लिए दबाव डालना : राजा रिपुदमन आचार्य को बताते हैं कि उर्मिला पहले विवाह के लिए उद्यत थी, जबकि वह तैयार नहीं थे। गर्भधारण करने के बाद वह विवाह के लिए तैयार थे, किंतु उर्मिला ने उन्हें ध्रुव यात्रा पर भेज दिया। अब लौट आने पर वह प्रसन्न नहीं है। वह कहती है कि यात्रा की कहीं समाप्ति नहीं होती। 

सिद्धि तक जाओ जो मृत्यु के पार है। आचार्य मारुति राजा को बताते हैं कि उर्मिला उन्हीं की बेटी है और तुम लोग विवाह कर के साथ-साथ यहीं रहो। अपने आचार्य पिता की बात उर्मिला नहीं मानती है। उनका अंत समय आने पर भी उर्मिला उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं करती है और अपने पिता से स्वयं को भूल जाने के लिए कहती है। 

उर्मिला के दृढ़ संकल्प के सामने रिपुदमन का झुकना : जब राजा रिपुदमन को यह विश्वास हो गया कि उर्मिला किसी भी प्रकार अपने निश्चय से नहीं हटने वाली है, तो वह पूछते हैं कि उन्हें कब जाना है? तो उर्मिला कहती है कि जब हवाई जहाज मिल जाए, राजा उसी समय शटलैंड के लिए पूरा जहाज बुक कर लेते हैं, जो तीसरे दिन ही जाने वाला होता है। इतनी जल्दी जाने की बात सुनकर उर्मिला थोड़ी भावुक हो जाती है, लेकिन रिपुदमन कहते हैं कि उर्मिला रूपी स्त्री के अंदर छिपी प्रेमिका की यही इच्छा है। 

रिपुदमन की दक्षिणी ध्रुव जाने की तैयारी : इस खबर से दुनिया के अखबारों में धूम मच गई। लोगों की उत्सुकता का ठिकाना न रहा। उर्मिला सोच रही थी कि आज उनके जाने की अंतिम संध्या है। राष्ट्रपति की ओर से भोज दिया गया होगा। एक से बढ़कर एक बड़े-बड़े लोग उसमें शामिल होंगे। कभी वह अनंत शून्य में देखती तो कभी अपने बच्चे में डूब जाती। 

राजा रिपुदमन द्वारा आत्महत्या करना : तीसरे दिन जो जाने का दिन था, उर्मिला ने अखबार पढ़ा - राजा रिपुदमन सवेरे खून से भरे पाए गए। गोली का कनपटी के आर-पार निशान है। 
अखबार में विवरण एवं विस्तार के साथ उनसे संबंधित अनेक सूचनाएं थी, जिन्हें उर्मिला ने अक्षर-अक्षर सब पड़ा। 

राजा रिपुदमन द्वारा आत्महत्या से पहले लिखा गया पत्र : राजा ने अपने पत्र में लिखा है कि “दक्षिणी ध्रुव जाने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी, फिर भी वे जाना चाहते थे क्योंकि इस बार उन्हें वापस नहीं लौटना था। लोगों ने इसे मेरा पराक्रम समझा लेकिन यह छलावा है क्योंकि इसका श्रेय मुझे नहीं मिलना चाहिए। 

ध्रुव पर जाने पर भी मैं नहीं बचता या फिर नहीं लौटता और आत्महत्या कर के भी नहीं लौटूंगा। मैं अपने होशोहवास में अपना जीवन समाप्त करके किसी की परिपूर्णता में काम आ रहा हूं। भगवान मेरे प्रिय के लिए मेरी आत्मा की रक्षा करें। 

Friday, 20 July 2018

पंचलाइट कहानी का सारांश

पंचलाइट कहानी का सारांश

पंचलाइट कहानी का सारांश

panchlight kahani ka saransh
गांव में रहने वाली विभिन्न जातियां अपनी अलग-अलग टोली बनाकर रहती हैं। उन्ही में से महतो टोली के पंचों ने पिछले 15 महीने से दंड जुर्माने के जमा पैसों से रामनवमी के मेले में इस बार पेट्रोमेक्स खरीदा। पेट्रोमैक्स खरीदने के बाद बचे हुए 10 रुपयों से पूजा की सामग्री खरीदी गई। पेट्रोमेक्स यानी पंचलाइट को देखने के लिए टोली के सभी बालक, औरतें एवं मर्द इकट्ठा हो गए और सरदार ने अपनी पत्नी को आदेश दिया कि वह इसके पूजा-पाठ का प्रबंध करें। पंचलाइट कहानी का उद्देश्य यहाँ देखें।

पंचलाइट को जलाने की समस्या : महतो टोली के सभी जन ‘पंचलाइट’ के आने से अत्यधिक उत्साहित हैं, लेकिन उनके सामने एक बड़ी समस्या यह आ गई कि पंचलाइट जलाएगा कौन? क्योंकि किसी भी व्यक्ति को उसे जलाना नहीं आता। महतो टोली के किसी भी घर में अभी तक ढिबरी नहीं जलाई गई थी, क्योंकि सभी पंचलाइट की रोशनी को ही सभी ओर फैला हुआ देखना चाहते थे। पंचलाइट के ना जलने से पंचों के चेहरे उतर गए। राजपूत टोली के लोग उनका मजाक बनाने लगे। जिसे सबने धर्यपूर्वक सहन किया। इसके बावजूद पंचों ने तय किया कि दूसरी टोली के व्यक्ति की मदद से पंचलाइट नहीं जलाया जाएगा, चाहे वह बिना जले ही पढ़ा रहे। 

टोली द्वारा दी गई सजा भुगत रहे गोधन की खोज : गुलरी काकी की बेटी मुनरी गोधन से प्रेम करती थी और उसे पता था कि गोधन को पंचलाइट चलाना आता है, लेकिन पंचायत ने गोधन का हुक्का-पानी बंद कर रखा था। मुनरी ने अपनी सहेली कनेली को और कनेली ने यह सूचना सरदार तक पहुंचा दी कि गोधन को पंचलाइट जलाना आता है। सभी पंचों ने सोच विचार कर अंत में निर्णय लिया कि गोधन को बुलाकर उसी से पंचलैट जलवाया जाए। 

गोधन द्वारा पंच लाइट जलाना : सरदार द्वारा भेजे गए छड़ीदार के कहने से गोधन के नहीं आने पर उसे मनाने गुलरी काकी गयीं। तब गोधन ने आकर पंचलाइट में तेल भरा और जलाने के लिए ‘स्पिरिट’ मांगा। स्पिरिट के अभाव में उसने नारियल के तेल से ही पंचलाइट जला दिया। पंचलैट के जलते ही टोली के सभी सदस्यों में खुशी की लहर दौड़ गई। कीर्तनिया लोगों ने एक स्वर में महावीर स्वामी की जय ध्वनि की और कीर्तन शुरू हो गया। 

पंचों द्वारा गोधन को माफ करना : गोधन ने जिस होशियारी से पंचलैट को जला दिया, उससे सभी प्रभावित हुए। गोधन के प्रति सभी लोगों के दिल का मैल दूर हो गया। गोधन ने सभी का दिल जीत लिया। मुनरी ने बड़ी हसरत भरी निगाहों से गोधन को देखा। 
सरदार ने गोधन को बड़े प्यार से अपने पास बुला कर कहा कि, “तुमने जाति की इज्जत रखी है। तुम्हारे सात खून माफ। खूब गाओ सलीमा का गाना।” अंत में गुलरी काकी ने गोधन को रात के खाने पर आमंत्रित किया। गोधन ने एक बार फिर से मुनरी की ओर देखा और नजर मिलते ही लज्जा से मुनरी की पलकें झुक गई।

Thursday, 19 July 2018

लाटी कहानी का उद्देश्य

लाटी कहानी का उद्देश्य

लाटी कहानी का उद्देश्य 

लाटी कहानी का मूल उद्देश्य समाज में पति के बिना अकेली रहने वाली पत्नी के जीवन की त्रासदी को दिखाना है, जिसमें लेखिका को सफलता मिली है। लेखिका ने यह संदेश भी दिया है कि महिला ही महिला का शोषण करती है। अतः उन्हें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना चाहिए। उन्हें एक दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए तथा उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए।
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लेखिका का यह भी उद्देश्य है कि क्षय रोग कोई असाध्य रोग नहीं है। यदि परिजनों का सहयोग और सहानुभूति मिले तो रोगी को मृत्यु से भी बचाया जा सकता है। यही कारण है कि नेपाली भाभी एक दिन अचानक मृत्यु को प्राप्त हो जाती है और बानो जो हड्डियों का ढांचा मात्र रह गई थी, क्षय रोग उसका कुछ भी ना बिगाड़ सका।

Wednesday, 18 July 2018

पंचलाइट कहानी का उद्देश्य

पंचलाइट कहानी का उद्देश्य

पांच लाइट कहानी का उद्देश्य

panch light kahani ka uddeshya
फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध आंचलिक कथाकार हैं. ग्रामीण अंचलों से उनका निकट का परिचय है. बिहार के अंचलों के सजीव चित्र उनकी कथाओं के अलंकार हैं. पंचलाइट भी बिहार के परिवेश की कहानी है. कहानीकार ने ग्रामीण अंचल का वास्तविक चित्र खींचा है. आवश्यकता किस प्रकार बड़े-से-बड़े संस्कार और निषेध को अनावश्यक सिद्ध कर देती है, इसी केंद्रीय भाव के आधार पर कहानी के माध्यम से एक महत्वपूर्ण उद्देश्य को स्पष्ट किया गया है. गोधन द्वारा पेट्रोमैक्स जला देने पर उसकी सब गलतियां माफ कर दी जाती है. उस पर लगे सारे प्रतिबंध हटा दिए जाते हैं तथा उसे मनचाहे आचरण की छूट दी जाती है. ग्रामवासी जाति के आधार पर अनेक टोलियों में बंट जाते हैं. वह आपस में ईर्ष्या-द्वेष के भावों से भरे रहते हैं. इसका बड़ा सजीव चित्रण कहानी में प्रस्तुत किया गया है. कहानीकार ने यह स्पष्ट किया है कि इस आधुनिक युग में अभी भी कुछ गांव और जातियां पिछड़ी हुई हैं. रेणु जी ने अप्रत्यक्ष रूप से ग्राम सुधार की प्रेरणा भी दी है.

Tuesday, 17 July 2018

सूत पुत्र कर्ण नाटक का सारांश

सूत पुत्र कर्ण नाटक का सारांश

सूत पुत्र कर्ण नाटक का सारांश

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डॉ गंगा सहाय प्रेमी द्वारा लिखित नाटक सूतपुत्र के प्रथम अंक का प्रारंभ महर्षि परशुराम के आश्रम के दृश्य से होता है। धनुर्विद्या के आचार्य एवं श्रेष्ठ धनुर्धर परशुराम, उत्तराखंड में पर्वतों के बीच तपस्या में लीन हैं। परशुराम ने यह व्रत ले रखा है कि वह केवल ब्राह्मणों को ही धनुर्विद्या सिखाएंगे। सूत-पुत्र कर्ण की हार्दिक इच्छा है कि वह एक कुशल लक्ष्यबेधी धनुर्धारी बने। इसी उद्देश्य से वह परशुराम जी के आश्रम में पहुंचता है और स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त करने लगता है। इसी दौरान एक दिन कर्ण की जंघा पर सिर रखकर परशुराम सोए होते हैं, तभी एक कीड़ा कर्ण की जंघा को काटने लगता है, जिससे रक्त बहने लगता है। कर्ण उस दर्द को सहन करता है, क्योंकि वह अपने गुरु परशुराम की नींद नहीं तोड़ना चाहता। रक्त बहने से परशुराम की नींद टूट जाती है और कर्ण की सहनशीलता को देखकर उन्हें उसके क्षत्रिय होने का संदेह होता है। उसके पूछने पर कर्ण उन्हें सत्य बता देता है। 

परशुराम अत्यंत क्रोधित होकर कर्ण को श्राप देते हैं कि मेरे द्वारा सिखाई गई विद्या को तुम अंतिम समय में भूल जाओगे और इसका प्रयोग नहीं कर पाओगे। कर्ण वहां से वापस चला आता है। 

द्वितीय अंक का सारांश 
सूतपुत्र नाटक का द्वितीय अंक द्रौपदी का स्वयंवर से प्रारंभ होता है। राजकुमार और दर्शक एक सुंदर मंडप के नीचे अपने-अपने आसनों पर विराजमान हैं। खौलते तेल के कड़ाह के ऊपर एक खंभे पर लगातार घूमने वाले चक्र पर एक मछली है। स्वयंवर में विजयी बनने के लिए तेल में देख कर उस मछली की आंख को बेधना है। अनेक राजकुमार लक्ष्य बेधने की कोशिश करते हैं और असफल होकर बैठ जाते हैं। प्रतियोगिता में कर्ण के भाग लेने पर राजा द्रुपद आपत्ति करते हैं और उसे अयोग्य घोषित कर देते हैं। दुर्योधन उसी समय कर्ण को अंग देश का राजा घोषित करता है। इसके बावजूद कर्ण का क्षत्रियत्व एवं उसकी पात्रता सिद्ध नहीं हो पाती और कर्ण निराश होकर बैठ जाता है। उसी समय ब्राह्मण वेश में अर्जुन एवं भीम सभा-मंडप में प्रवेश प्रवेश करते हैं। लक्ष्य बेधने की अनुमति मिलने पर अर्जुन मछली की आंख बेध देते हैं और राजकुमारी द्रौपदी उन्हें वर माला पहना देती हैं। 

अर्जुन द्रौपदी को लेकर चले जाते हैं। सूने सभा-मंडप में दुर्योधन एवं कर्ण रह जाते हैं। दुर्योधन कर्ण से द्रौपदी को बलपूर्वक छीनने के लिए कहता है, जिसे कर्ण नकार देता है। दुर्योधन ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन एवं भीम से संघर्ष करता है और उसे पता चल जाता है कि पांडवों को लाक्षाग्रह में जलाकर मारने की उसकी योजना असफल हो गई है। कर्ण पांडवों को बड़ा भाग्यशाली बताता है। यहीं पर द्वितीय अंक समाप्त हो जाता है। 

तृतीय अंक का सारांश 
अर्जुन एवं कर्ण दोनों देवपुत्र हैं। दोनों के पिता क्रमशः इंद्र एवं सूर्य को युद्ध के समय अपने-अपने पुत्रों के जीवन की चिंता हुई। इसी पर केंद्रित तीसरे अंक की कथा है। यह अंक नदी के तट पर कर्ण की सूर्य उपासना से प्रारंभ होता है। कर्ण द्वारा सूर्यदेव को पुष्पांजलि अर्पित करते समय सूर्यदेव उसकी सुरक्षा के लिए उसे स्वर्ण के दिव्य कवच एवं कुंडल प्रदान करते हैं। वह इंद्र की भावी चाल से भी उसे सतर्क करते हैं तथा कर्ण को उसके पूर्व वृतांत से परिचित कराते हैं। इसके बावजूद वे कर्ण को उसकी माता का नाम नहीं बताते। कुछ समय पश्चात इंद्र अपने पुत्र अर्जुन की सुरक्षा हेतु ब्राम्हण का वेश धारण कर कर्ण से उसका कवच-कुंडल मांग लेते हैं। इसके बदले इंद्र कर्ण को एक अमोघ शक्ति वाला अस्त्र प्रदान करते हैं, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता। इंद्र के चले जाने के बाद गंगा तट पर कुंती आती है। वह कर्ण को बताती है कि वही उसका ज्येष्ठ पुत्र है। कर्ण कुंती को आश्वासन देता है कि वह अर्जुन के सिवा किसी अन्य पांडव को नहीं मारेगा। दुर्योधन का पक्ष छोड़ने संबंधी कुंती के अनुरोध को कर्ण अस्वीकार कर देता है। कुंती कर्ण को आशीर्वाद देकर चली जाती है और इसी के साथ नाटक के तृतीय अंक का समापन हो जाता है। 

चतुर्थ अंक का सारांश 
डॉ गंगासहाय प्रेमी द्वारा रचित सूतपुत्र नाटक के चौथे एवं अंतिम अंक की कथा का प्रारंभ कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि से होता है। सर्वाधिक रोचक एवं प्रेरणादायक इस अंक में नाटक के नायक कर्ण की दानवीरता, वीरता, पराक्रम, दृढ़प्रतिज्ञ संकल्प जैसे गुणों का उद्घाटन होता है। अंक के प्रारंभ में एक ओर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन तो दूसरी ओर कर्ण एवं शल्य हैं। शल्य एवं कर्ण में वाद-विवाद होता है और शल्य कर्ण को प्रोत्साहित करने की अपेक्षा हतोत्साहित करता है। कर्ण एवं अर्जुन के बीच युद्ध शुरू होता है और कर्ण अपने बाणों से अर्जुन के रथ को पीछे धकेल देता है। श्रीकृष्ण कर्ण की वीरता एवं योग्यता की प्रशंसा करते हैं, जो अर्जुन को अच्छी नहीं लगती। 

कर्ण के रथ का पहिया दलदल में फंस जाता है। जब वह पहिया निकालने की कोशिश करता है, तो श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन निहत्थे कर्ण पर बाण वर्षा प्रारंभ कर देते हैं, जिससे कर्ण मर्मांतक रूप से घायल हो जाता है और गिर पड़ता है। संध्या हो जाने पर युद्ध बंद हो जाता है। 

श्री कृष्ण कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए युद्धभूमि में पड़े कर्ण से सोना मांगते हैं। कर्ण अपना सोने का दांत तोड़कर और उसे जल से शुद्ध कर ब्राह्मण वेशधारी श्रीकृष्ण को देता है। श्रीकृष्ण एवं अर्जुन अपने वास्तविक स्वरुप में प्रकट होते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण से लिपट जाते हैं और अर्जुन कर्ण के चरण स्पर्श करते हैं। कर्ण की मृत्यु पर अर्जुन दुखी होता है। यहीं पर नाटक समाप्त हो जाता है।

Monday, 16 July 2018

राजमुकुट नाटक का सारांश

राजमुकुट नाटक का सारांश

राजमुकुट नाटक का सारांश

rajmukut natak in hindi
मेवाड़ में राणा जगमल अपने वंश की मर्यादा का निर्वाह ना करते हुए सुरा-सुंदरी में डूबा हुआ था. अपने भोग-विलास एवं आनंद में किसी भी तरह की बाधा सहन नहीं करने वाला राणा जगमल एक क्रूर शासक बन गया था. उसने कुछ चाटुकारों के कहने पर निरपराध विधवा प्रजावती की नृशंस हत्या करवा दी. जिससे प्रजा में क्रोध की ज्वाला भड़क उठी. प्रजावती के शव को लेकर प्रजा राष्ट्रनायक चंदावत के घर पहुंची. इसी समय कुंवर शक्ति सिंह ने राणा जगमल के क्रूर सैनिकों के हाथों से एक भिखारिणी की रक्षा की. जगमल के कार्यों से खिन्न शक्तिसिंह को चंदावत ने कर्म-पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. 

एक दिन जब जगमल राज्यसभा में आनंद मना रहा था, तो राष्ट्रनायक चंदावत वहां पहुंचे और जगमल को उसके घृणित कार्यों के प्रति सचेत करते हुए उसे प्रजा से क्षमा-याचना के लिए कहा. जगमल ने उनकी बात स्वीकार करते हुए उनसे योग्य उत्तराधिकारी चुनने के लिए कहा और अपनी तलवार और राजमुकुट उन्हें सौंप दिया.

राष्ट्रनायक चंदावत ने राणा प्रताप को जगमल का उत्तराधिकारी बनाया और उन्हें राजमुकुट एवं तलवार सौंप दी. प्रताप मेवाड़ के राणा बन गए अब सुरा-सुंदरी के स्थान पर शौर्य एवं त्याग भावना की प्रतिष्ठा हुई. प्रजा प्रसन्नतापूर्वक राणा प्रताप की जय-जयकार करने लगी. 

द्विदीय अंक का सारांश 
मेवाड़ के राणा बनकर प्रताप ने अपनी प्रजा को अपने खोए हुए सम्मान को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया. प्रजा में वीरता का संचार करने के लिए उन्होंने ‘अहेरिया’ उत्सव का आयोजन किया. इस उत्सव में प्रत्येक क्षत्रिय को एक वन्य पशु का आखेट करना अनिवार्य था. इस आखेट के क्रम में एक जंगली सूअर के आखेट को लेकर राणा प्रताप और शक्तिसिंह में विवाद उत्पन्न हो गया. विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों भाई शस्त्र निकालकर एक दूसरे पर झपट पड़े. 

भावी अनिष्ट की आशंका से राजपुरोहित ने बीच-बचाव करने का प्रयत्न किया, परंतु दोनों ही नहीं माने. राजकुल को अमंगल से बचाने के लिए राजपुरोहित ने अपने ही हाथों अपनी कटार अपनी छाती में घोंपी और प्राण त्याग दिए. राणा प्रताप ने शक्तिसिंह को राज्य से निर्वासित कर दिया. शक्तिसिंह मेवाड़ से निकलकर अकबर की सेना में जा मिले. 

तृतीय अंक का सारांश 
राजा मानसिंह राणा प्रताप के चरित्र एवं गुणों से बहुत प्रभावित थे, इसलिए वह राणा प्रताप से मिलने गए. राजा मानसिंह की बुआ का विवाह सम्राट अकबर के साथ हुआ था. अतः राणा प्रताप ने उन्हें धर्म से च्युत एवं विधर्मियों का सहायक समझकर उनसे भेंट नहीं की. 

उन्होंने राजा मानसिंह के स्वागत के लिए अपने पुत्र अमरसिंह को नियुक्त किया. इससे मानसिंह ने स्वयं को अपमानित महसूस किया और वह उत्तेजित हो गए. अपने अपमान का बदला चुकाने की धमकी देकर वह चले गए. 

तत्कालीन समय में दिल्ली का सम्राट अकबर मेवाड़ विजय के लिए रणनीति बना रहा था. उसने सलीम, मानसिंह एवं शक्तिसिंह के नेतृत्व में एक विशाल मुगल सेना मेवाड़ भेजी. हल्दीघाटी के मैदान में भीषण युद्ध हुआ. मानसिंह से बदला लेने के लिए राणा प्रताप मुगल सेना के बीच पहुंच गए और मुगलों के व्यूह में फस गए. 
राणा प्रताप को मुगलों से घिरा देख चंदावत ने राणा प्रताप के सिर से मुकुट उतारकर अपने सिर पर पहन लिया और युद्धभूमि में अपने प्राणों की बलि दे दी. राणा प्रताप बच गए. उन्होंने युद्धभूमि छोड़ दी. दो मुगल सैनिकों ने राणा प्रताप का पीछा किया, जिसे शक्तिसिंह ने देख लिया. 

शक्तिसिंह ने उन मुगल सैनिकों का पीछा करते हुए उन्हें मार गिराया. शक्तिसिंह और राणा प्रताप गले मिले. उनके आंसुओं से उनका समस्त वैमनस्य धुल गया. उसी समय राणा प्रताप के घोड़े ‘चेतक’ की मृत्यु हुई, जिससे राणा प्रताप को अपार दुख हुआ. 

चतुर्थ अंक का सारांश 
हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो जाने पर भी राणा ने अकबर से हार नहीं मानी. अकबर ने प्रताप की देशभक्ति, आत्मत्याग एवं शौर्य से प्रभावित होकर उनसे भेंट की इच्छा प्रकट की. शक्तिसिंह साधु-वेश में देश में विचरण कर रहा था और प्रजा में देश प्रेम तथा एकता की भावना जागृत कर रहा था. अकबर के मानवीय गुणों से परिचित होने के कारण शक्तिसिंह ने प्रताप से अकबर की भेंट को छल-प्रपंच नहीं माना. उसका विचार था कि दोनों के मेल से देश में शांति एवं एकता की स्थापना होगी. 

इस चतुर्थ अंक में ही नाटक का मार्मिक स्थल समाहित है. एक दिन राणा प्रताप के पास वन में एक सन्यासी आया, जिसका उचित स्वागत-सत्कार न कर पाने के कारण राणा प्रताप अत्यंत दुखी हुए. अतिथि को भोजन देने के लिए राणा प्रताप की बेटी चंपा घास के बीजों की बनी रोटी लेकर आई. 

उसी समय कोई वनबिलाव चंपा के हाथ से रोटी छीन कर भाग गया. इसी क्रम में चंपा गिर गई और सिर में गहरी चोट लगने से उसकी मृत्यु हो गई. कुछ समय बाद अकबर सन्यासी वेश में वहां आया और प्रताप से बोला, “आप उस अकबर से तो संधि कर सकते हैं, जो भारत माता को अपनी मां समझता है और आपकी तरह ही उस की जय बोलता है.” 

मृत्यु शैया पर पड़े महाराणा प्रताप को रह-रहकर अपने देश की याद आती है. वह अपने बंधु-बांधवों पुत्र और संबंधियों को मातृभूमि की स्वतंत्रता एवं रक्षा का व्रत दिलाते हुए भारत माता की जय बोलते हुए स्वर्ग सिधार जाते हैं.

Sunday, 15 July 2018

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश

गरुड़ध्वज नाटक का सारांश

garuda dhwaja natak ka saransh

पंडित लक्ष्मीनारायण मिश्र द्वारा रचित नाटक गरुड़ध्वज के प्रथम अंक की कहानी का प्रारंभ विदिशा में कुछ प्रहरियों के वार्तालाप से होता है। पुष्कर नामक सैनिक, सेनापति विक्रम मित्र को महाराज शब्द से संबोधित करता है, तब नागसेन उसकी भूल की ओर संकेत करता है। वस्तुतः विक्रममित्र स्वयं को सेनापति के रूप में ही देखते हैं और शासन का प्रबंध करते हैं। विदिशा शुंगवंशीय विक्रममित्र की राजधानी है, जिसके वह योग्य शासक हैं। उन्होंने अपने साम्राज्य में सर्वत्र सुख-शांति स्थापित की हुई है और बृहद्रथ को मारकर तथा गरुड़ध्वज की शपथ लेकर राज्य का राजकाज संभाला है। काशीराज की पुत्री वासंती मलयराज की पुत्री मलयवती को बताती है कि उसके पिता उसे किसी वृद्ध यवन को सौंपना चाहते हैं, तब सेनापति विक्रममित्र ने ही उसका उद्धार किया था। वासंती एकमोर नामक युवक से प्रेम करती है और वह आत्महत्या करना चाहती है, लेकिन विक्रममित्र की सतर्कता के कारण वह इसमें सफल नहीं हो पाती। 

श्रेष्ठ कवि एवं योद्धा कालिदास विक्रममित्र को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा के कारण “भीष्म पितामह” कहकर संबोधित करते हैं और इस प्रसंग में एक कथा सुनाते हैं। 87 वर्ष की अवस्था हो जाने के कारण विक्रम मित्र वृद्ध हो गए हैं। वह वासंती और एकमोर को महल भेज देते हैं। मलयवती के कहने पर पुष्कर को इस शर्त पर क्षमादान मिल जाता है कि उसे राज्य की ओर से युद्ध लड़ना होगा। उसी समय साकेत से एक यवन श्रेष्ठि की कन्या कौमुदी का सेनानी देवभूति द्वारा अपहरण किए जाने तथा उसे लेकर काशी चले जाने की सूचना मिलती है। सेनापति विक्रममित्र कालिदास को काशी पर आक्रमण करने के लिए भेजते हैं और यही पर प्रथम अंक समाप्त हो जाता है। 

द्वितीय अंक का सारांश
नाटक का द्वितीय अंक राष्ट्रहित में धर्म स्थापना के संघर्ष का है। इसमें विक्रममित्र की दृढ़ता एवं वीरता का परिचय मिलता है, साथ ही उनके कुशल नीतिज्ञ एवं एक अच्छे मनुष्य होने का भी बोध होता है। इसमें मांधाता सेनापति विक्रममित्र को अन्तिलिक के मंत्री हलोधर के आगमन की सूचना देता है। कुरु प्रदेश के पश्चिम में तक्षशिला राजधानी वाला यवन प्रदेश का शासक शुंगवंश से भयभीत रहता है। उसका मंत्री हलोधर भारतीय संस्कृति में आस्था रखता है। वह राज्य की सीमा को वार्ता द्वारा सुरक्षित करना चाहता है। विक्रममित्र देवभूति को पकड़ने के लिए कालीदास को काफी भेजने के बाद बताते हैं, कि कालिदास का वास्तविक नाम मेघरुद्र था, जो 10 वर्ष की आयु में ही बौद्ध भिक्षु बन गया था। उन्होंने उसे विदिशा के महल में रखा और उसका नया नाम कालिदास रख दिया। 

काशी का घेरा डालकर कालिदास काशीराज के दरबार में बौद्ध आचार्यों को अपनी विद्वता से प्रभावित कर लेते हैं तथा देवभूति एवं काशीराज को बंदी बनाकर विदिशा ले आते हैं। विक्रममित्र एवं हलोधर के बीच संधि वार्ता होती है, जिसमें हलोधर विक्रममित्र की सारी शर्तें स्वीकार कर लेता है तथा अन्तिलिक द्वारा भेजी गई भेंट विक्रममित्र को देता है। भेंट में स्वर्ण निर्मित एवं रत्नजडित गरुड़ध्वज भी है। वह विदिशा में एक शांति स्तंभ का निर्माण करवाता है। इसी समय कालिदास के आगमन पर वासंती उसका स्वागत करती है और वीणा पर पड़ी पुष्पमाला कालिदास के गले में डाल देती है। इसी समय द्वितीय अंक का समापन होता है। 

तृतीय अंक का सारांश
नाटक के तृतीय अंक की कथा अवंति में घटित होती है। गर्दभिल्ल के वंशज महेंद्रादित्य के पुत्र कुमार विषमशील के नेतृत्व में अनेक वीरों ने शकों को हाथों से मालवा को मुक्त कराया। अवंती में महाकाल के मंदिर पर गरुड़ध्वज फहरा रहा है तथा मंदिर का पुजारी वासंती एवं मलयवती को बताता है कि युद्ध की सभी योजनायें इसी मंदिर में बनी हैं। राजमाता से विषमशील के लिए चिंतित ना होने को कहा जाता है, क्योंकि सेना का संचालन स्वयं कालिदास एवं मांधाता कर रहे हैं। 

काशीराज अपनी पुत्री वासंती का विवाह कालिदास से करना चाहते हैं, जिसे विक्रममित्र स्वीकार कर लेते हैं। विषमशील का राज्याभिषेक किया जाता है और कालिदास को मंत्रीपद सौंपा जाता है। राजमाता जैनाचार्यों को क्षमादान देती है और जैनाचार्य अवंति का पुनर्निर्माण करते हैं। 

कालिदास की मंत्रणा से विषमशील का नाम विक्रममित्र के नाम के पूर्व अंश “विक्रम” तथा पिता महेंद्रादित्य के बाद के अंश “आदित्य” को मिलाकर विक्रमादित्य रखा जाता है। विक्रममित्र काशी एवं विदिशा राज्यों का भार भी विक्रमादित्य को सौंपकर स्वयं सन्यासी बन जाते हैं। कालिदास अपने स्वामी “विक्रमादित्य” के नाम पर उसी दिन से “विक्रम संवत” का प्रवर्तन करते हैं। नाटक की कथा यहीं पर समाप्त हो जाती है।

Saturday, 14 July 2018

आन का मान नाटक का सारांश

आन का मान नाटक का सारांश

आन का मान नाटक का सारांश

aan ka maan natak

श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ द्वारा रचित नाटक ‘आन का मान’ का आरंभ रेगिस्तान के एक रेतीले मैदान से होता है। इस समय भारत की राजनीतिक सत्ता मुख्यतः मुगल शासक औरंगजेब के हाथों में थी और जोधपुर में महाराज जसवंत सिंह का राज्य था। वीर दुर्गादास राठौर महाराज जसवंत सिंह का कर्तव्यनिष्ठ सेवक था और महाराज की मृत्यु हो जाने के बाद वह उनके अवयस्क पुत्र अजीत सिंह के संरक्षक की भूमिका निभाता है। अपने पिता औरंगजेब की नीतियों का विरोध करते हुए उसका पुत्र अकबर द्वितीय औरंगजेब से अलग हो जाता है और उसकी मित्रता दुर्गादास राठौर से हो जाती है। 

औरंगजेब की चाल से अकबर द्वितीय को ईरान चले जाना पड़ा। अपनी मित्रता निभाते हुए अकबर द्वितीय की संतानों सफीयत और बुलंद अख्तर के पालन-पोषण का दायित्व दुर्गादास ने अपने ऊपर ले लिया। समय के साथ-साथ सभी युवा होते हैं और राजकुमार अजीत सिंह सफीयतुन्निसा पर आसक्त हो जाता है। सफीयत के टालने के बावजूद भी अजीत सिंह में उसके प्रति प्रेम की भावना अत्यधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण दुर्गादास नाराज हो जाते हैं। दुर्गादास द्वारा राजपूती आन एवं मान का ध्यान दिलाने पर अजीत सिंह अपनी गलती मानकर क्षमा मांग लेता है। युद्ध की तैयारी प्रारंभ होती है। 

औरंगजेब के संधि प्रस्ताव को लेकर ईश्वरदास आता है। मुगल सूबेदार शुआजत खां द्वारा सादे वेश में प्रवेश करने के बावजूद अजीत सिंह उस पर प्रहार करता है, परंतु राजपूती परंपरा का निर्वाह करते हुए निशस्त्र व्यक्ति पर प्रहार होने से दुर्गादास बचा लेता है। 

द्वितीय अंक का सारांश : आन का मान नाटक के सर्वाधिक मार्मिक स्थलों से संबंधित दूसरे अंक की कथा भीम नदी के तट पर स्थित ब्रम्हपुरी से प्रारंभ होती है। ब्रम्हपुरी का नाम औरंगजेब ने इस्लाम पूरी रख दिया है। औरंगजेब की दो पुत्रियों मेहरुन्निसा एवं जीनतुन्निसा में से मेहरुन्निसा हिंदुओं पर औरंगजेब द्वारा किए जाने वाले अत्याचार का विरोध करती है, जबकि जीनतुन्निसा अपने पिता की नीतियों की समर्थक है। अपने दोनों पुत्रियों की बात सुनने के बाद औरंगजेब मेहरुन्निसा द्वारा रेखांकित किए गए अत्याचारों को अपनी भूल मानकर पश्चाताप करता है। वह अपने बेटों विशेषकर अकबर द्वितीय के प्रति की जाने वाली कठोरता के लिए भी दुखी होता है। उसके अंदर अकबर द्वितीय की संतानों यानी अपने पौत्र-पौत्री क्रमशः बुलंद एवं सफीयत के प्रति स्नेह और बढ़ जाता है। औरंगजेब अपनी वसीयत में अपने पुत्रों को जनता से उदार व्यवहार करने के लिए परामर्श देता है। वह अपनी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को सादगी से करने के लिए कहता है। वसीयत लिखे जाने के समय ही ईश्वरदास वीर दुर्गादास राठौर को बंदी बना कर लाता है। औरंगजेब अपने पौत्र-पौत्री यानी बुलंद और सफीयत को पाने के लिए दुर्गादास से सौदेबाजी करना चाहता है, लेकिन दुर्गादास इसके लिए तैयार नहीं होता। 

तृतीय अंक का सारांश : आन का मान नाटक के तीसरे अंक की कथा सफीयत के गान के साथ प्रारंभ होती है और उसी समय अजीत सिंह वहां पहुंच जाता है। वह सफीयत को अपना जीवन साथी बनाने का इच्छुक है, लेकिन सफीयत स्वयं को विधवा कहकर अजीत सिंह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करती। अजीत सिंह द्वारा अनेक तर्क देने के बावजूद सफीयत अजीत सिंह को लोकहित हेतु स्वहित को त्यागने का सुझाव देती है। वह वहां से जाना चाहती है, लेकिन प्रेम के उद्वेग में बहता अजीत सिंह उसे अपने पास बैठा लेता है। 

बुलंद अख्तर के आने से सफीयत सकुचा जाती है तथा अपने भाई से अजीत सिंह के प्रेम एवं विवाह की इच्छा की बात बताती है। वह इसका विरोध करता है और फिर वहां से चला जाता है। इसी समय दुर्गादास का प्रवेश होता है और वह इन सब बातों को सुनकर औरंगजेब के संदेह को उचित मानता है। 

दुर्गा दास के विरोध की भी परवाह ना करते हुए अजीत सिंह सफीयत को साथ चलने का प्रस्ताव देता है। यह देखकर सफीयत के सम्मान की रक्षा हेतु दुर्गादास तैयार हो जाता है। तभी मेवाड़ से अजीत सिंह का विवाह का प्रस्ताव आता है, जिसे वह दुर्गादास की चाल समझता है। दुर्गादास पालकी मंगवा कर सफीयत को बैठाकर चलने के लिए तैयार होता है, तो अजीत सिंह पालकी रोकते हुए दुर्गादास को चेतावनी देता है- 
“दुर्गादास जी ! मारवाड़ में आप रहेंगे या मैं रहूंगा।” 
दुर्गादास सधे हुए शब्दों में कहता है, “आप ही रहेंगे महाराज ! दुर्गादास तो सेवक मात्र है। उसने चाकरी निभा दी।” 
ऐसा कहकर दुर्गादास जन्मभूमि को अंतिम बार प्रणाम करता है और यहीं पर नाटक की कथा समाप्त हो जाती है।

Friday, 13 July 2018

कुहासा और किरण हिंदी नाटक। Kuhasa aur kiran natak in hindi

कुहासा और किरण हिंदी नाटक। Kuhasa aur kiran natak in hindi

कुहासा और किरण हिंदी नाटक। Kuhasa aur kiran natak in hindi

Kuhasa aur kiran natak

नाटक का आरम्भ कृष्ण चैतन्य के निवास पर अमूल्य और कृष्ण चैतन्य कि सचिव सुनंदा के वार्तालाप से होता है। कृष्ण चैतन्य के साठवें जन्मदिवस के अवसर पर अमूल्य एवं चैतन्य के अलावा उमेशचन्द्र, विपिन बिहारी, प्रभा आदि उन्हें बधाई देते हैं।

पाखंडी कृष्ण चैतन्य को राष्ट्र के प्रति सेवाओं के बदले 250 रूपए मासिक पेंशन मिलती है। वह अनेक प्रकार के गैर कानूनी कार्य करता है।उसके घ्रणित कार्यों के तंग आकर ही उसकी पत्नी गायत्री भी उसे छोड़कर अपने भाई के पास चली जाती है। देशभक्त राजेन्द्र के पुत्र अमूल्य से कृष्ण चैतन्य हमेशा सशंकित रहता है।

अतः उसे अपने यहाँ से हटाकर विपिन बिहारी के यहाँ साप्ताहिक हिन्दी का सम्पादन करने के लिए नियुक्त कर देने की सूचना देता है। अमूल्य के रिश्ते की बहन प्रभा नारी अधिकार को लेकर लिखे गए अपने उपन्यास को कृष्ण चैतन्य के माध्यम से छपवाना चाहती है। मुल्तान षड्यंत्र केस, जिसमें कृष्ण चैतन्य ने मुखबिरी की थी, के दल के नेता डॉ चन्द्रशेखर की पत्नी मालती राजनीतिक पेंशन दिलाने का आग्रह करने हेतु कृष्ण चैतन्य के पास आती है और उसे पहचान लेती है। प्रभा एवं मालती के बीच बहस होती है।

पुरानी स्मृतियाँ एवं कलई खुलने के भय से कृष्ण चैतन्य व्याकुल हो जाता है। वहाँ उपस्थित अमूल्य को भी उसकी असलीयत का आभास हो जाता है।

द्वितीय अंक का प्रारम्भ विपिन बिहारी के निजी कक्ष से होता है। विपिन बिहारी पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक हैं, जो पत्रिका छापने के लिए मिलने वाली सरकारी कोटे के कागज़ को ब्लैक करता है। यह ब्लैक मार्केटिंग उमेशचन्द्र अग्रवाल की दूकान से होती है। ये दोनों देश के भृष्ट संपादकों और व्यापारियों के प्रतिनिधि हैं। दोनों का चरित्र आडम्बरपूर्ण और कृत्रिम है, जिन्हें एक अन्य भ्रष्टाचारी कृष्ण चैतन्य का संरक्षण प्राप्त है। अमूल्य द्वारा मुल्तान षड्यंत्र केस के बारे में जानकारी दिए जाने तथा उसमें कृष्ण चैतन्य की देशद्रोही की भूमिका को पत्रिका के माध्यम से उजागर करने संबंधी दिए गए सुझाव को विपिन बिहारी अस्वीकार कर देता है। वह कृष्ण चैतन्य के खिलाफ कुछ भी लिखने में असमर्थता व्यक्त करता है।

वह सुनंदा, प्रभा व अमूल्य को कृष्ण चैतन्य के विरुद्ध कोई भी कार्य न करने के लिए कहता है। इसी बीच वहाँ पुलिस इंस्पेक्टर आकर अमूल्य को पचास रिम कागज़ ब्लैक में बेचने के अपराध में गिरफ्तार कर लेता है। सुनंदा व प्रभा कृष्ण चैतन्य के इस कुकृत्य से क्रोधित होती हैं। तभी उमेशचन्द्र वहाँ आकर अमूल्य द्वारा आत्महत्या के असफल प्रयास करने की सूचना देता है। सुनंदा सम्पूर्ण घटना के विषय में गायत्री को सूचित करती है। इस घटना के पश्चात विपिन बिहारी आत्मग्लानि का अनुभव कर कृष्ण चैतन्य के सम्मुख अपराध के इस मार्ग को छोड़ने की अपनी इच्छा प्रकट करता है। लेकिन वह ‘तरंगे हम तीनो, डूबेंगे, हम तीनो’ कहकर उसका विरोध करता है। इसी बीच गायत्री की कार दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। पत्नी की मृत्यु के बाद कृष्ण चैतन्य को आत्मग्लानि होती है। यहीं पर दूसरा अंक समाप्त हो जाता है।

तृतीय अंक : कृष्ण चैतन्य अपने निवास पर गायत्री देवी की तस्वीर के सम्मुख स्तब्ध भाव से बैठा अपनी पत्नी के बलिदान कि महानता का अनुभव करता है। सुनंदा मृत्यु से पूर्व गायत्री देवी द्वारा लिखे गए पत्र की सूचना पुलिस को देकर जीवित व्यक्तियों के मुखौटों को उतारना चाहती है। इसी समय सी। आई। डी। के अधिकारी आते हैं। विपिन बिहारी उन्हें अपने पत्रों के स्वामित्व परिवर्तन की सूचना देता है। प्रभा उन्हें बताती है कि अमूल्य निर्दोष है।

कृष्ण चैतन्य कागज़ की चोरी का रहस्य स्पष्ट करते हुए कहता है कि वास्तव में चोरी की यह कहानी एक जालसाजी थी, क्योंकि अमूल्य उसका राज जान गया था कि वह कृष्ण चैतन्य नहीं, बल्कि कृष्णदेव है- मुल्तान षड्यंत्र का मुखबिर। इसके बाद वह विपिन और उमेश के भ्रष्टाचार व चोरबाजारी का रहस्य भी खोल देता है। सी। आई। डी। के अधिकारी टमटा साहब सभी को अपने साथ ले जाने लगते हैं। तभी वहाँ मालती आती हैं और पेंशन न मिलने की बात कहती है। कृष्ण चैतन्य अपना सबकुछ मालती को सौंप देता है। कृष्ण चैतन्य के साथ-साथ विपिन बिहारी व उमेश अग्रवाल भी गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। अमूल्य के निर्दोष होने के कारण उसे छोड़ दिया जाता है। अमूल्य, प्रभा आदि सभी को अपने अन्तर यानि ह्रदय के चोर दरवाजों को तोड़ने तथा मुखौटा लगाकर घूम रहे मगरमच्छों को पहचानने का सन्देश देता है। ‘बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता’ इस कथन के साथ नाटक समाप्त हो जाता है।

Thursday, 12 July 2018

सांप और कौवे की कहानी। Snake and Crow Story in Hindi

सांप और कौवे की कहानी। Snake and Crow Story in Hindi

सांप और कौवे की कहानी। Snake and Crow Story in Hindi

Snake and Crow Story in Hindi

एक वृक्ष के ऊपर एक कौवा घोंसला बना कर अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों में बड़ा प्रेम था इसलिए दोनों बड़े सुख के साथ रहते थे। दोनों रोज खाने की खोज में साथ-साथ उड़ते थे, और खा-पीकर फिर साथ-साथ लौट आते थे। कुछ दिनों बाद कहीं से एक काला सांप आ गया। सांप भी वृक्ष की जड़ में बिल बनाकर रहने लगा। 

कौवी सांप को देखकर डर गई। उसने कौवे से कहा, "सांप बड़े दुष्ट स्वभाव का होता है। ना जाने कहां से आ गया है।" कौवे ने कौवी को हिम्मत बंधाई और कहा, "घबराओ नहीं, ईश्वर हम सब का रक्षक है।" कुछ दिनों पश्चात कौवी ने अंडे दिए। अंडे से बच्चे निकले। बच्चे धीरे-धीरे बड़े हुए। उछलने-कूदने लगे। कौवा और कौवी, दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते थे। 

एक दिन बच्चों को घोसले में छोड़कर दोनों भोजन की खोज में चले गए। सन्नाटा देखकर सांप बिल से बाहर निकला। वह धीरे-धीरे वृक्ष पर चढ़ गया। उसने कौवे के घोंसले के पास जाकर उनके बच्चों को खा लिया और चुपके से वृक्ष से नीचे उतर कर अपने बिल में चला गया। 

कौवा और कौवी, दोनों जब लौटे तो घोसले में बच्चों को न पाकर वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने आस-पास की चिड़ियों से अपने बच्चों के संबंध में पूछताछ की, पर कोई कुछ नहीं बता सका। कौवा और कौवी करते तो क्या करते ? दोनों रो-धोकर शांत हो गए। कुछ दिनों पश्चात कौवी ने फिर से अंडे दिए। अंडे से बच्चे निकले। बच्चे कुछ बड़े हुए। उछलने-कूदने लगे। कौवा और कौवी ने परस्पर सलाह की, हमें अपने बच्चों को अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहिए। दोनों में से एक को सदा घोसले में रहना चाहिए। 

एक दिन कौवा भोजन की तलाश में चला गया। कौवी अपने बच्चों के पास घोसले में थी। चारों ओर सन्नाटा था। सांप अपने बिल से बाहर निकला और धीरे-धीरे वृक्ष के ऊपर चढ़ने लगा। कौवी ने सांप को देख लिया। वह जोर-जोर से कांव-कांव करने लगी, पर सांप के ऊपर कुछ भी असर नहीं पड़ा। वह वृक्ष पर चढ़ता ही गया और घोसले के पास जा पहुंचा। 

कौवी सहायता के लिए पुकारने लगी, पर उसकी सहायता के लिए कोई भी नहीं आया। सांप पहले की तरह उसके बच्चों को खाकर वृक्ष के नीचे उतर गया। कौवी करती भी करती तो क्या करती ? वह सिर पीट पीट कर रोती ही रह गई। जब कौवा लौटा तो कौवी ने रो-रोकर सांप के द्वारा बच्चों के खा जाने की बात सुनाई। कौवे की आंखों से भी आंसू निकल आए, पर उसने धैर्य से काम लिया। वह बोला, "अब रो-रोकर क्या करोगी ? जो होना था, वह हो गया है। हिम्मत रखो, थोड़ा धीरज धरो। 

कौवी रोती हुई बोली, "सांप दो बार मेरे बच्चों को खा गया। अब मैं इस वृक्ष पर नहीं रहूंगी। चलो, किसी दूसरे वृक्ष पर चलें।" कौवा बोला, "इस वृक्ष पर मेरे पूर्वज रह चुके हैं। इसे छोड़ना ठीक नहीं है। धैर्य रखकर इसी वृक्ष पर रहो। मैं सांप को मारने का उपाय करूंगा।" 

किंतु कौवे के बहुत समझाने पर भी कौवी बार-बार यही कहती रही कि किसी दूसरे वृक्ष पर चलो। आखिर कौवे ने कहा, "तुम मेरी बात नहीं मानती तो, आस-पड़ोस की चिडियों से पूछो।" कौवे और कौवी ने आस-पड़ोस की चिड़ियों से सलाह ली, तो उन्होंने ने भी कहा, "तुम दोनों को इसी वृक्ष पर रहना चाहिए। हम सभी मिलकर सांप का मुकाबला करेंगे। 

इतने पर कौवी के मन को शांति नहीं मिली। आखिर कौवा बोला, "तुम्हें इस तरह संतोष नहीं होता, तो चलो लोमड़ी मौसी के पास चलें। वह सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। वह जो कुछ कहे, उसी के अनुसार हमें और तुम्हें काम करना चाहिए।" कौवी लोमड़ी के पास जाने के लिए राजी हो गई। कौवी को लेकर कौवा लोमड़ी के पास गया। उसने लोमड़ी को सांप द्वारा बच्चों को खाए जाने की बात सुनाकर कहा, "हम दोनों अब क्या करें ? उसी वृक्ष पर रहें या उसे छोड़ दें ?" 

लोमड़ी सोच कर बोली, "तुम दोनों कहीं मत जाओ, अपने घर में रहो। मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बता रही हूं जिसके अनुसार काम करने से सांप को उसके पापों का दंड मिल जाएगा। पास के तालाब पर राजकुमारियां स्नान करने के लिए आती हैं। वह अपने गहने--कपड़े उतार कर रख लेती हैं और स्नान करने के लिए पानी में घुस जाती हैं। 

कल सवेरे तुम दोनों वहीं पहुंच जाओ। राजकुमारियां जब अपने गहने रखकर पानी में घुसे, तो तुम दोनों एक-एक मोती की माला अपनी-अपनी चोंच में उठाकर भाग चलो। इतने जोर-जोर से बोलो कि नौकरों का ध्यान तुम दोनों की ओर खिंच जाए। वे मोती की माला के लिए तुम्हारा पीछा करेंगे। तुम दोनों मोती की माला लेकर अपने वृक्ष पर लौट जाओ और मालाओं को सांप के बिल में डालकर अपने घोंसले में जा बैठो। फिर देखो क्या होता है। 

कौवा और कौवी ने लोमड़ी की बात मान ली। दोनों ने दूसरे दिन वही किया जो लोमड़ी ने कहा था। दोनों कांव-कांव करते हुए एक-एक मोती की माला चोंच में उठाकर भाग चले। नौकरों ने उनका पीछा किया, पर वे दोनों वृक्ष के नीचे पहुंचकर मालाओं को सांप के बिल में डालकर अपने घोंसले में जा बैठे। नौकर भी पीछा करते हुए वृक्ष के नीचे पहुंचे। उन्होंने वृक्ष की जड़ में, बिल में मोतियों की माला देखी। 

नौकर मोतियों की माला को निकालने के लिए बिल को खोदने लगे। सांप भी बिल के भीतर बैठा हुआ था। वह छेड़छाड़ को सहन नहीं कर सका। वह फुफकार मारता हुआ बाहर निकला। सभी नौकर पहले तो डर कर भाग खड़े हुए, फिर सबने मिलकर सांप का सामना किया। एक बहुत बड़े डंडे और तलवार पड़ने से सांप मर गया। 

कौवा और कौवी दोनों प्रसन्न हुए। उन्होंने लोमड़ी के पास जाकर उसे बहुत बहुत धन्यवाद दिया। लोमड़ी ने कहा, "किसी भी दुष्ट से डरकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि दुष्ट को दुष्टता से ही जीतने का प्रयत्न करना चाहिए।" 

कहानी से शिक्षा 
बुरे आदमी के पड़ोस में नहीं रहना चाहिए। 
बुरे आदमी को सज्जनता से नहीं छल से जीतने का प्रयत्न करना चाहिए। 
विपत्ति में धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। बुद्धिमानों की सलाह से काम करना चाहिए। 

Wednesday, 11 July 2018

करवा चौथ पर निबंध। Essay on Karwa Chauth in Hindi

करवा चौथ पर निबंध। Essay on Karwa Chauth in Hindi

करवा चौथ पर निबंध। Essay on Karwa Chauth in Hindi

पति की दीर्घायु और मंगल कामना हेतु हिंदू सुहागिन नारियों का यह पावन पावन पर्व है। करवा (जलपात्र) द्वारा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा को अर्ध्य देकर पारण (उपवास के बाद का पहला भोजन) करने का विधान होने से इसका नाम करवा चौथ है। करवा चौथ और करक चतुर्थी पर्यायवाची हैं। चंद्रोदय तक निर्जल उपवास रखकर पुण्य संयय करना इस पर्व की विधि है। चंद्र दर्शनोपरांत सास या परिवार में ज्येष्ठ श्रद्धेय नारी को (बायना) दान देकर सदा सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद लेना व्रत साफल्य का सूचक है।

Essay on Karwa Chauth in Hindi

सुहागिन नारी का पर्व होने के नाते यथासंभव और यथाशक्ति न्यूनाधिक सोलह सिंगार से अलंकृत होकर सुहागिन अपने अंतःकरण के उल्लास को प्रकट करती है। पति चाहे गूंगा हो, बहरा हो, अपाहिज हो, क्षय़ या असाध्य रोग से ग्रस्त हो, क्रूर-अत्याचारी-अनाचारी या व्याभिचारी हो उससे हर प्रकार का संवाद और संबंध शिथिल पड़ चुके हैं फिर भी हिंदू नारी इस पर्व को कुंठित मन से नहीं मनाएगी अवश्य। पत्नी का पति के प्रति यह मूक समर्पण किसी भी दूसरे धर्म या संस्कृति में कहां? 

पुण्य प्राप्ति के लिए किसी पुण्यतिथि में उपवास करने या किसी उपवास के द्वारा कर्मानुष्छान द्वारा पुण्य संचय करने के संकल्प को व्रत कहते हैं। व्रत और उपवास द्वारा शरीर को तपाना तप है। व्रत धारण कर, उपवास रखकर पति की मंगल कामना सुहागिन का तप है। तप द्वारा सिद्धि प्राप्त करना पुण्य का मार्ग है। अतः सुहागन करवा चौथ का व्रत धारण कर उपवास रखती है। 

समय, सुविधा और स्वास्थ्य के अनुकूल उपवास करने में ही व्रत का आनंद है। उपवास तीन प्रकार के होते हैं- (क) ब्रह्म मुहूर्त से चंद्रोदय तक जल तक भी ग्रहण न करना। 
(ख) ब्रह्म मुहूर्त में सर्गी मिष्ठान, चाय आदि द्वारा जलपान कर लेना। 
(ग) दिन में चाय या फल स्वीकार कर लेना, किंतु अन्न ग्रहण नहीं करना। 

भारतीय पर्वों में विविधता का इंद्रधनुषीय सौंदर्य है। इस पर्व के मनाने, व्रत करने, उपवास करने में मायके से खाद्य पदार्थ भेजने-न भेजने, रूढ़ि परंपरा से चली कथा सुनने-न सुनने, बायना देने-न देने, करवे का आदान-प्रदान करने-न करने, श्रद्धेय प्रौढ़ा से आशीर्वाद लेने-न लेने की विविध शैलियाँ हैं। इन सब विविधता में एक ही उद्देश्य निहित है ‘पति का मंगल’।

पश्चिमी सभ्यता में निष्ठा रखने वाली सुहागिन, पुरुष मित्रों में प्रिय, विवाहित नारी तथा बॉस की प्रसन्नता में अपना उज्जवल भविष्य सोचने वाली पति के प्रति पूर्ण निष्ठा का भी करवा चौथ के दिन सब ओर से ध्यान हटा कर व्रत के प्रति निष्ठा और पति के प्रति समर्पण करवा चौथ की महिमा है। 

हिंदू धर्म विरोधी, ‘खाओ पियो मौज उड़ाओ’ की सभ्यता में सरोबार तथाकथित प्रगतिशील तथा पुरुष नारी समानता के पक्षपाती एक प्रश्न खड़ा करते हैं कि करवा चौथ का व्रत नारी के लिए ही क्यों? हिंदू धर्म में पुरुष के लिए पत्नी व्रत का पर्व क्यों नहीं? 

भारतीय समाज पुरुष प्रधान है। 19.9 प्रतिशत परिवारों का संचालन दायित्व पुरुषों पर है। पुरुष अर्थात पति। ऐसे स्वामी, परम पुरुष, परम आत्मा जिससे समस्त परिवार का जीवन चलता है, सांसारिक कष्टों और आपदाओं में अपने पौरूष का परिचय देता है, परिवार के उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर करने में जो अपना जीवन समर्पित करता है उसके दीर्घ जीवन की मंगल कामना करना कौन सा अपराध है? 

यह एक कटु सत्य है कि पति की मृत्यु के बाद परिवार पर जो दुख और कष्ट आते हैं, विपदाओं का जो पहाड़ टूटता है उससे नारी का जीवन नर्क तुल्य बन जाता है। निराला जी ने सच ही कहा है कि 
वह क्रूर काल तांडव की स्मृति रेखा-सी 
 वह टूटे तारों की छुटी लता सी दीन 
दलित भारत की विधवा है। 
रही पत्नी व्रत की बात पति चाहे कितना भी कामुक हो, लंपट हो, नारी मित्र का पक्षधर हो, अपवाद स्वरुप संख्या में नगण्य-सम पतियों को छोड़कर सभी पति परिवार पोषण के संकल्प से आबद्ध रहते हैं। अपना पेट काटकर, अपनी आकांक्षाओं को कुचलकर, अपने दुख सुख की परवाह छोड़कर इस व्रत का नित्य पालन करते हैं। अपने परिवार का भरण पोषण सुख सुविधा और उज्जवल भविष्य मेरा दायित्व है, मेरा व्रत है। वह इस व्रत पालन में जीवन की सिद्धि मानता है-
व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति, श्रद्धया सत्यमाप्यते।
व्रत से दीक्षा प्राप्त होती है। दीक्षा से दक्षिणा प्राप्त होती है। दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।

Tuesday, 10 July 2018

बसंत पंचमी पर निबंध व लेख हिंदी में

बसंत पंचमी पर निबंध व लेख हिंदी में

बसंत पंचमी पर निबंध व लेख हिंदी में

vasant panchami lekh aur nibandh
माघ शुक्ल पंचमी को ‘बसंत पंचमी’ के नाम से जाना जाता है। कोशकार रामचंद्र वर्मा के अनुसार ‘बसंत पंचमी बसंत ऋतु के आगमन का सूचक है।’ 
ऋतु गणना में चैत्र और वैसाख दो मास वसन्त के हैं। फिर उसका पदार्पण 40 दिन पूर्व कैसे? कहते हैं कि ऋतुराज बसंत के अभिषेक और अभिनंदन के लिए शीर्ष पांच ऋतुओं ने अपनी आयु के आठ आठ दिन बसंत को समर्पित कर दिए। इसलिए बसंत पंचमी 40 दिन पूर्व प्रकट हुई थी। यह तिथि चैत्र कृष्णा प्रतिपदा से 40 दिन पूर्व माघ शुक्ल पंचमी को आती है। 

भूमध्य रेखा का सूर्य के ठीक-ठाक सामने आ जाने के आसपास का कालखंड है बसंत। अतः बसंत भारत का ही नहीं विश्व वातावरण के परिवर्तन का धोतक है। संभव है कभी वृहत्तर भारत में माह की शुक्ल पक्ष में बसंतागमन होता हो और माघ शुक्ल पंचमी को बसंत आगमन के उपलक्ष में ‘अभिनंदन पर्व’ रूप में स्थापित किया हो। वस्तुतः बसंत पंचमी, बसंत आगमन की पूर्व सूचिका ही है इसी कारण इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहते हैं।

बसंत पंचमी विद्या की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती का जन्म दिवस भी है। इसलिए इस दिन सरस्वती पूजन का विधान है। ज्ञान की गहनता और उच्चता का सम्यक् परिचय इसी से प्राप्त होता है। पुस्तकधारिणी वीणावादिनी मां सरस्वती की यह देन है कि वे जीवन के रहस्यों को समझने की सूक्ष्म दृष्टि प्रदान कर ज्ञान लोक से संपूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं। अतः सरस्वती पूजा ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देती है- ‘महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो विश्वा विराजति।‘ 

प्राचीन काल में वेद अध्ययन का सत्र श्रावणी पूर्णिमा से लेकर आरंभ होकर इसी तिथि को समाप्त होता था
गत बीसवीं शताब्दी में बसंत पंचमी को ना तो विद्या का सत्र समाप्त होता था ना विद्या अभ्यास के लिए मंगल दिन मानकर विद्या ज्ञान का आरंभ होता था। हां मां शारदा की कृपा एवं आशीर्वाद के लिए सरस्वती पूजन अवश्य होता रहा है। 

पौराणिक कोश के अनुसार बसंत पंचमी रति और कामदेव की पूजा का दिन है। मादक महकती बसंती बयार में, मकर राशि फूलों की बहार में, भंवरों की गुंजार और कोयल की कूक में, मानव ह्रदय जब उल्लसित होता है तो उसे कंकणों का रणन नूपुरों की रूनझुन, किंकणियों का मादक क्वणन सुनाई देता है। मदन विकार का प्रादुर्भाव होता है तो कामिनी और कानन में अपने आप यौवन फूट पड़ता है। (जरठ) वृद्ध स्त्री की अद्भुत श्रृंगार सज्जा से आनंद पुलकित जान पड़ती है। दांपत्य और पारिवारिक जीवन की सुख समृद्धि के लिए रति और कामदेव की कृपा चाहिए। अतः रति-कामदेव पूजन का दिन माना जाता है।

बसंत पंचमी किशोर हकीकत राय का बलिदान दिवस भी है। सियालकोट (अब पाकिस्तान) का किशोर हकीकत मुस्लिम पाठशाला में पढ़ता था। 1 दिन साथियों से झगड़ा होने पर उसने ‘कसम दुर्गा भवानी’ की शपथ लेकर झगड़ा समाप्त करना चाहा, मुस्लिम छात्रों ने जो झगड़ा करने पर उतारू  थे, दुर्गा भवानी को गाली दी। हकीकत स्वाभिमानी था, बलवान भी था। प्रत्युत्तर में फातिमा को गाली दी। ’फातिमा’ को गाली देने के अपराध में उसे मृत्युदंड या मुस्लिम धर्म स्वीकार करने का विकल्प रखा गया। किशोर हकीकत ने मुस्लिम धर्म स्वीकार नहीं किया। उसने हंसते हुए मृत्यु का वरण किया। 

उस दिन भी बसंत पंचमी थी। लाहौर में रावी का तट था सहस्त्रों हिंदू जमा थे। सबके सामने मुस्लिम शासक की आज्ञा से उस किशोर का सिर तलवार से काट दिया गया। 
रावी नदी के तट पर खोजेशाह के कोटक्षेत्र मैं धर्मवीर हकीकत की समाधि बनाई गई। स्वतंत्रता पूर्व हजारों लाहौर वासी बसंत के दिन वीर हकीकत की समाधि पर इकट्ठे होते थे। मेला लगता था। अपने श्रद्धा सुमन चढ़ाते थे। 

बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र पहनने की प्रथा थी। वह आज नगरों में लुप्त हो गई है। गांव में अवश्य अभी उसका कुछ प्रभाव दिखाई देता है। हां बसंती हलवा, पीले चावल तथा केसरिया खीर खाकर आज भी बसंत पंचमी पर उल्लास उमंग प्रकट होता है। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण बनता है। 

बसंत ह्रदय के उल्लास, उमंग, उत्साह और मधुर जीवन का द्योतक है। इसलिए बसंत पंचमी के दिन संगीत, खेलकूद प्रतियोगिताएं तथा पतंगबाजी का आयोजन होता है। बसंत मेले लगते हैं। बसंत पंचमी प्रतिवर्ष आती है। जीवन में बसंत (आनंद) ही यशस्वी जीवन जीने का रहस्य है, यह रहस्योद्घाटन कर जाती है।

Monday, 9 July 2018

विक्रम संवत का इतिहास। History of Vikram Samvat in Hindi

विक्रम संवत का इतिहास। History of Vikram Samvat in Hindi

विक्रम संवत का इतिहास। History of Vikram Samvat in Hindi

History of Vikram Samvat in Hindi

भारत का सर्वमान्य संवत् विक्रम-संवत है। विक्रम-संवत् के अनुसार नव-वर्ष का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का आरंभ हुआ था और इसी दिन से भारतवर्ष में कालगणना आरम्भ हुई थी।
चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्जं प्रथमेहणि।
शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा यूर्योदये सति।।
यही कारण है कि ज्योतिष में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही होती है।

चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा बसन्त ऋतु में आती है। वसन्त में प्राणियों को ही नहीं, वृक्ष, लता आदि को भी आह्वादित करने वाला मधुरस प्रकृति से प्राप्त होता है इतना ही नहीं वसन्त समस्त चराचर को प्रमाविष्ट करके, समूची धरती को पुष्पभरण से अलंकृत करके मानव-चित्त की कोमल वृत्तियों को जागरित करता है। इस सर्वप्रिये चारूतरं वसन्ते’  में संवत्सर का आरम्भ सोने में सुहागाको चरितार्थ करता है। हुन्दू मन में नव-वर्ष के उमंग, उल्लास, मादकता को दुगना कर देता है।
विक्रम-संवत् सूर्य-सिद्धान्त पर चलता है। ज्योतिषियों के अनुसार सूर्य-सिद्धान्त का मान ही भ्रमहीन एवं सर्वश्रेष्ठ है। सृष्टि संवत् के प्रारम्भ से यदि आज तक का गणित किया जाए तो सूर्य सिद्धान्त के अनुसार एक दिन का भी अन्तर नहीं पड़ता।

पराक्रमी महावीर विक्रमादित्य का जन्म अवन्ति देश की प्राचीन नगरी उच्चयिनी में हुआ था। पिता महेन्द्रदित्य गणनायक थे और माता मलयवती थीं। इस दम्पती को पुत्र प्राप्ति के लिए अनेक व्रत और तप करने पड़े। शिव की नियमित उपासना और आराधना से उन्हें पुत्ररत्न मिला था। इसका नाम विक्रमादित्य रखा गया। विक्र्म के युवावस्था में प्रवेश करते ही पिता ने राज्य का कार्य भार उसे सौंप दिया।

राज्यकार्य संभालते ही विक्रमादित्य को शकों के विरूद्ध अनेक तथा बहुविध युद्धों मे उलझ जाना पड़ा। उसने सबसे पहले उज्जयिनी और आस-पास के क्षेत्रों में फैले शको के आतंक को समाप्त किया। सारे देश में से शकों के उन्मूलन से पूर्व विक्रम ने मानव गणतन्त्र का फिर संगठन किया और उसे अत्यधिक बलशाली बनाया और वहाँ से शकों का समूलोच्छेद किया। जिस शक्ति का विक्रम ने संगठन किया था, उसका प्रयोग उसने देश के शेष भागों में से शक-सत्ता को समाप्त करने में लगाया और उसकी सेनाएं दिग्विजय के लिए निकल पड़ीं। ऐसे वर्णन उपलब्ध होते हैं कि शकों का नाम-निशान मिटा देने वाले इस महापराक्रमी वीर के घोड़े तीनों समुद्रों में पानी पीते थे। इस दिग्विजयी मालवगध नायक विक्र्मादित्य की भयंकर लड़ाई सिंध नदी के आस-पास करूर नामक स्थान पर हुई। शकों के लिए यह इतनी बड़ी पराजय थी कि कश्मीर सहित सारा उत्तरापथ विक्रम के अधीन हो गया।

ऐतिहासिक दृष्टि से यह सत्य है कि शकों का उन्मूलन करने और उन पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में विक्रम-संवत् आरम्भ किया गया था जो कि इस समय की गणना के अनुसार ईस्वी सन् से 57 वर्ष पहले शुरू होता है। इस महान् विजय के उपलक्ष्य में मुद्राएँ भी जारी की गई थीं, जिनके एक और सूर्य था, दूसरी ओर मालवगणस्य जयः’  लिखा हुआ था।

विदेशी आक्रमणकारियों को समाप्त करने के कारण केवल कृताज्ञतावश उसके नाम से संवत् चलाकर ही जनसाधारण ने वीर विक्रम को याद नहीं रखा, बल्कि दिन-रात प्रजापालन में तत्परता, परदुःख परायणता, न्यायप्रियता, त्याग, दान, उदारता आदि गुणों के कारण तथा साहित्य और कला के आश्रयदाता के रूप में भी उन्हें स्मरण किया जाता है। यह तो हुई विक्र्मादित्य की चर्चा। वर्ष-प्रतिपदाके महत्व के कुछ अन्य कारण भी हैं।

स्मृति कौस्तुभ के रचनाकार का कहना है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र के विष्कुम्भ के योग में दिन के समय भगवान ने मत्स्य रूप अवतार लिया था। ईरानियों में इसी तिथि पर नौरोजमनाया जाता है। (ईरानी वस्तुतः पुराने आर्य ही हैं।)

संवत् 1946 में हिन्दू राष्ट्र के महान् उन्नायक, हिन्दू संगठन के मंत्र-द्रष्टा तथा धर्म के संरक्षक परम पूज्य डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म वर्ष-प्रतिपदा के ही दिन हुआ था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे। वर्ष-प्रतिपदा का पावन दिन संघ शाखाओं में उनका जन्मदिन के रूप में सोल्लास मनाया जाता है। प्रतिपदा 2045 से प्रतिपदा 2056 तक उनकी जन्म-शताब्दी मनाकर कृतज्ञ राष्ट्र ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

आंध्र में यह पर्व उगदि नाम से मनाया जाता है। उगदि का अर्थ है युग का आरंभ अथवा ब्रह्मा जी की सृष्टि-रचना का प्रथम दिन। आध्रवासियों के लिए यह दीपावली की भांति हर्षतिरेक का दिन होता है।सिंधु प्रान्त में नवसंवत् को चेटी चंडो (चैत्र का चन्द्र) नाम से पुकारा जाता है। सिन्धी समाज इस दिन को बड़े हर्ष और समारोहपूर्वक मनाता है।

कश्मीर में यह पर्व नवरोज के नाम से मनाया जाता है। जवाहरलाल जी ने अपनी आत्मकथा मेरी कहानी में लिखा है ;कश्मीरियों के कुछ खास त्योहार भी होते हैं इनमें सबसे बड़ा नवरोज यानी वर्ष प्रतिपदा का त्यौहार है इस दिन हम लोग नए कपड़े पहन कर बन-ठनकर निकलते हैं। घर के बड़े लड़के-लड़कियों का हाथ खर्च के तौर पर कुछ पैसे मिला करते थे।
नव वर्ष मंगलमय हो, सुख समृद्धि का साम्राज्य हो, शांति और शक्ति का संचरण रहे, इसके लिए नव संवत पर हिंदुओं में पूजा का विधान है। इस दिन पंचांग का श्रवण और दान का विशेष महत्व है। व्रत, कलश स्थापन, जलपात्र का दान, वर्षफल श्रवण, गत वर्ष की घटनाओं का चिंतन तथा आगामी वर्ष के संकल्प इस पावन दिन के महत्वपूर्ण कार्यक्रम माने जाते हैं। प्रभु से प्रार्थना की जाती है
भगवँस्तव प्रसादेन वर्षं क्षेममिहास्तु में।
संवत्सरोपसर्गाः मे विलयं यान्त्वशेषतः
(हे प्रभु! आपकी कृपा से नव वर्ष मेरे लिए कल्याणकारी हो तथा वर्ष के सभी विघ्न शांत हो जाएं)

हम हिंदू हैं। हिंदू धर्म में हमारी आस्था है, श्रद्धा है तो हमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को उमंग और उत्साह से नव वर्ष मनाना चाहिए। संबंधियों तथा मित्रों को ग्रीटिंग कार्ड भेजना तथा शुभकामना प्रकट करना हमारे स्वभाव का अंग होना चाहिए। इसी से हमारे समाज में पहले से ही विद्यमान परंपरा का निर्वाह करते हुए शुभ संस्कारों का विकास होगा और हमारी भारतीय अस्मिता की रक्षा भी होगी

Sunday, 8 July 2018

रक्षा बंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं। Raksha Bandhan ka itihas

रक्षा बंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं। Raksha Bandhan ka itihas

रक्षा बंधन का इतिहास व पौराणिक कथाएं। Raksha Bandhan ka itihas

Raksha Bandhan ka itihas

रक्षाबंधन हमारा राष्ट्रव्यापी पारिवारिक पर्व है, ज्ञान की साधना का त्यौहार है। श्रवण नक्षत्र से युक्त श्रावण की पूर्णिमा को मनाए जाने के कारण यह पर्व ‘श्रावणी’ नाम से भी प्रसिद्ध है। प्राचीन आश्रमों में स्वाध्याय के लिए, यज्ञ और ऋषियों के लिए तर्पण कर्म करने के कारण इसका ‘ऋषि तर्पण’, ‘उपाकर्म’ नाम पड़ा। यज्ञ के उपरांत रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा के कारण रक्षाबंधन लोक में प्रसिद्ध हुआ। 

रक्षाबंधन का प्रारंभ कब और कैसे हुआ इस संबंध में कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। एक किवदंती है कि एक बार देवता और दैत्यों का युद्ध शुरू हुआ। संघर्ष बढ़ता ही जा रहा था। देवता परेशान हो उठे। उनका पक्ष कमजोर होता जा रहा था। एक दिन इंद्र की पत्नी शचि ने अपने पति की विजय एवं मंगल कामना से प्रेरित होकर उन को रक्षा सूत्र बांधकर युद्ध में भेजा। इसके प्रभाव से इंद्र विजयी हुए। इस दिन से राखी का महत्व स्वीकार किया गया और रक्षाबंधन की परंपरा प्रचलित हो गई। 

श्रावण मास में ऋषिगण आश्रम में रहकर स्वाध्याय और यज्ञ करते थे। इसी माह यज्ञ की पूर्णाहुति होती थी श्रावण-पूर्णिमा को। इसमें ऋषियों के लिए तर्पण कर्म होता था, नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता था। इसलिए इसका नाम ‘श्रावणी उपाकर्म’ पड़ा। यज्ञ के अंत में रक्षा सूत्र बांधने की प्रथा थी इसलिए इसका नाम रक्षाबंधन भी लोक में प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रतिष्ठा को निभाते हुए ब्राह्मणगण आज भी इस दिन अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते हैं। 

मुस्लिम काल में यही रक्षासूत्र अर्थात् राखी बन गया।  यह रक्षी वीरन अर्थात वीर के लिए थी। हिंदू नारी स्वेच्छा से अपनी रक्षार्थ वीर भाई या वीर पुरुष को भाई मानकर राखी बांधती थी। इसके मूल में रक्षा कवच की भावना थी। इसलिए विजातीय को भी हिन्दू नारी ने है अपनी रक्षार्थ राखी बांधी। मेवाड़ की वीरांगना कर्मवती का हिमायू को राखी भेजना इसका प्रमाण है। (आज कुछ इतिहास इस बात को नहीं मानते इसे अंग्रेजों मुसलमानों की चाल मानते हैं।) 

काल की गति कुटिल है। वह अपने प्रबल प्रवाह में मान्यताओं, परंपराओं, सिद्धांतों और विश्वास को बहा कर ले जाती है और छोड़ देती है उस के अवशेष। पूर्व काल का श्रावणी यज्ञ एवं वेदों का पठन-पाठन मात्र नवीन यज्ञोपवीत धारण और हवन आहुति तक सीमित रह गया। वीरों को राखी बांधने की प्रथा विकृत होते होते बहन द्वारा भाई को राखी बांधने और दक्षिणा प्राप्त करने तक ही सीमित हो गई। 

बीसवीं सदी से रक्षाबंधन पर्व विशुद्ध रूप में बहन द्वारा भाई की कलाई में राखी बांधने का पर्व है। इसमें रक्षा की भावना लुप्त है। है तो मात्र एक कोख से उत्पन्न होने के नाते सतत स्नेह, प्रेम और प्यार की आकांक्षा। राखी है भाई की मंगल-कामना का सूत्र और बहन के मंगल-अमंगल में साथ देने का आह्वाहन।

बहन विवाहित होकर अपना अलग घर संसार बसाती हैं। पति, बच्चोंस पारिवारिक दायित्व और दुनियादारी में उलझ जाती है। भूल जाती है मात्रकुल को, एक ही मां के जाए भाई और सहोदरा बहन को। मिलने का अवसर नहीं निकाल पाती। विवशताएं चाहते हुए भी उसके अंतर्मन को कुंणठित कर देती हैं। रक्षाबंधन और भैयादूज यह दो पर्व दो सहोदरों-बहन और भाई को मिलाने वाले दो पावन प्रसंग हैं। हिंदू धर्म की मंगल मिलन की विशेषता ने उसे अमृत का पान कराया है। 
कच्चे धागों में बहनों का प्यार है। 
देखो राखी का आया त्योहार है।। 
रक्षाबंधन बहन के लिए अद्भुत, अमूल्य, अनंत प्यार का पर्व है। महीनों पहले से वह इस पर्व की प्रतीक्षा करती है। पर्व समीप आते ही बाजार में घूम घूम कर मन चाही राखी खरीदती है। वस्त्राभूषणों को तैयार करती है। ‘मामा-मिलन’ के लिए बच्चों को उकसाती है। 

रक्षाबंधन के दिन वह स्वयं प्रेरणा से घर आंगन बुहारती है। लीप पोत कर स्वच्छ करती है। सेवियां, जवे, खीर बनाती है। बच्चे स्नान ध्यान कर नववस्त्रों में अलंकृत होते हैं। परिवार में असीम आनंद का स्त्रोत बहता है। 

भारतीय संस्कृति भी विलछड़ है। यहां देव-दर्शन दर्पण की प्रथा है। अर्पणा श्रद्ध का प्रतीक है। अतः अर्पण पुष्प का हो या राशि का, इसमें अंतर नहीं पड़ता। राखी पर्व पर भाई देवी रूपी बहन के दर्शन करने जाता है। पुष्पवत् फल या मिष्ठान साथ ले जाता है। राखी बंधवाकर पत्र पुष्प-रूप में राशि भेंट करता है। ‘पत्रं पुष्पं फलं तोयं’ की विशुद्ध भावना उसके अंतर्मन को आलोकित करती है। इसलिए वह दक्षिणा अर्पण कर खुश होता है।

भाई बहन का यह मिलन बीते दिनों की स्थिति बताने का सुंदर सुयोग है। एक दूसरे के दुख, कष्ट, पीड़ा को समझने की चेष्टा है तो सुख, समृद्धि, यशस्वित्ता में भागीदारी का बहाना। 

आज राजनीति ने हिंदू धर्म पर प्रहार करके उसकी जड़ों को खोखला कर दिया है। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की ओट में हिंदू भूमि भारत में हिंदू होना सांप्रदायिक होने का परिचायक बन गया है। ऐसी विषाक्त वातावरण में भी रक्षाबंधन पर्व पर पुरातन परंपरा का पालन करने वाले पुरोहित घर घर जाकर धर्म की रक्षा का सूत्र बांधता है। रक्षा बांधते हुए - 
येन बद्धो बली राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। 
तेन त्वां प्रतिबघ्रामि, रक्षे! मा चल, मा चल।।
मंत्र का उच्चारण करता है। यजमान को बताता है कि रक्षा के जिस साधन (राखी) से महाबली राक्षसराज बली को बांधा गया था उसी से मैं तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षासूत्र ! तू भी अपने धर्म से विचलित ना होना अर्थात इसकी भली-भांति रक्षा करना।