Tuesday, 23 July 2019

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध। Essay on My Best Friend in Hindi

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध। Essay on My Best Friend in Hindi

दोस्तों आज के लेख में हमने मेरा प्रिय मित्र पर निबंध लिखा है अर्थात My Best Friend in Hindi. यहां पर प्रस्तुत किए गए 'मेरा प्रिय मित्र’ अथवा 'मेरा सच्चा मित्र' पर छोटे तथा बड़े अनुच्छेद और निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 & 10 के विद्यार्थियों के लिये उपयुक्त हैं।

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध। Essay on My Best Friend in Hindi

Please scroll below to read essays on My Best Friend and 10 line essay in Hindi for students in 100, 150, 200, 250, 300, and 400 words.

10 Lines on My Best Friend in Hindi

(1) मेरे कई मित्र हैं लेकिन आशू मेरा सबसे प्रिय मित्र है।
(2) हम एक ही स्कूल में तथा एक ही कक्षा में पढ़ते हैं।
(3) उनके पिता एक दुकानदार हैं और माँ एक गृहिणी हैं।
(4) वह दुकान में अपने पिता की सहायता भी करता है।
(5) वह अपने माता-पिता तथा बड़ो का सम्मान करता है।
(6) वह हमारे स्कूल की फुटबॉल टीम का कप्तान हैं।
(7) वह मेरे साथ रोजना शतरंज का अभ्यास करता है।
(8) हम दोनों हमेशा  एक दुसरे की मदद करते हैं।
(9) वह मेरे लिए एक दोस्त से अधिक भाई की तरह है।
(10) मैं धन्य हूं कि मेरा विपुल जैसा दोस्त है।

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (100 शब्द)

रमन मेरा सबसे प्रिय मित्र हैं। वह मेरा सहपाठी है और मेरी ही उम्र का है। वह एक अच्छे परिवार से है। उनके माता-पिता मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं। इसी तरह, मेरे माता-पिता रमन से बहुत प्यार करते हैं। रमन अच्छे चरित्र का लड़का है। वह स्वाभाव से खुशमिजाज और दयालू लड़का है। हम दोनों रोजाना एक-साथ स्कूल जाते हैं। वह विद्यालय में सभी शिक्षकों का प्रिय छात्र है। विज्ञान और गणित उसके पसंदीदा विषय हैं। पढाई के साथ-साथ वह खेलकूद में भी अव्वल है। हमारे बीच कभी कोई गलतफहमी नहीं हुई। मैं रमन जैसा दोस्त पाकर स्वयं को भाग्यशाली हूं। 

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (150 शब्द)

मित्र वह व्यक्ति होता है जिसके साथ रहने से हम आनंदित हो। दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को एक सच्चे मित्र की आवश्यकता होती है। सच्ची मित्रता जीवन में एक वरदान की तरह होती है। परंतु सच्चे और ईमानदार दोस्त बड़े ही दुर्लभ होते हैं। 

मेरे कई दोस्त हैं लेकिन रमन मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। वह मेरे घर से कुछ ही दूरी पर रहता है। हम एक ही स्कूल में पढ़ते हैं। वह एक सम्मानित परिवार से ताल्लुक रखता हैं। उसके पिता एक डॉक्टर हैं और माँ एक शिक्षक हैं। वे अमीर हैं, उनका पास अपना बड़ा घर, कार और आधुनिक जीवन की अन्य सभी सुविधाएं हैं। और फिर भी वह कभी भी अभिमान करता है।

रमन एक बुद्धिमान छात्र है। वह अपने से बड़ों का सम्मान करता है। वह मेरी कक्षा का मॉनिटर भी है। वह विज्ञान का गृहकार्य करने में मेरी मदद करता है और बदले में, मैं उसकी अंग्रेजी में मदद करता हूं। हमारा आपसी तालमेल भी बहुत अच्छा है। मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा रमन जैसा मित्र है।

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (200 शब्द)

हमारे कई मित्र होते हैं परंतु कहावत है कि विपत्ति  के समय में जो साथ दे वही सच्चा मित्र होता है। सच्चा मित्र एक सहायक तथा मार्ग दर्शक बनकर हमें जीवन जीने की सही राह दिखाता है। वह हमें पथभ्रष्ट होने से बचाता है। जब हम विचलित होते हैं तब वह हमारा मार्गदर्शन करता है। 

ऐसा ही है मेरा मित्र रमन। हम दोनों एक दूसरे को बचपन से जानते हैं। वह बहुत ही मेहनती छात्र है और सदैव समय पर स्कूल आता है। वह मेरे घर से कुछ ही दूरी पर रहता है। उसके पिताजी सरकारी अधिकारी और मां एक आदर्श ग्रहणी हैं। वह सदैव व्यस्त रहते हैं। मेरी मां उसके लिए विशेष व्यंजन बनाती हैं। हमें साथ में स्कूल का ग्रह कार्य करना, लाइब्रेरी जाना और सैर पर जाना पसंद है। 

उसे वास्तव में मित्रता निभाना आता है। जब मैं उदास होता हूं तो वह सावधानीपूर्वक मेरी बातों को सुनता है और मेरी मदद करने का प्रयास करता है। यदि आपके पास भी रमन जैसा मित्र हो तो आपका जीवन भी खुशियों से भर जाएगा। क्योंकि मित्र जीवन में औषधि की तरह होते हैं। मुझे खुशी है कि मेरे पास ऐसा सच्चा मित्र है और हम जीवन पर्यंत मित्र रहेंगे। 

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (250 शब्द)

आमतौर पर, जिन व्यक्तियों को हम अक्सर मित्र कहते हैं, वे वास्तविक मित्र नहीं हैं। वे केवल परिचित अथवा जान पहचान के व्यक्ति हैं जिनके साथ हम अक्सर संपर्क में आते हैं। एक सच्चा मित्र वह है जिसके साथ हम अपने सारे रहस्य, खुशियाँ, दुख और विचार साझा करते हैं।  वह आपके सुख-दुख में आपके साथ खड़ा होता है व विपत्ति के समय में आपका साथ नहीं छोड़ता। वह लोग वास्तव में भाग्यशाली हैं जिनके पास कम से कम एक सच्चा मित्र और ईमानदार मित्र है। 

ऐसा ही है मेरा मित्र रमनरमेश त्रिपाठी। हम छठी कक्षा से दोस्त हैं। हम एक ही कक्षा में पढ़ते हैं। वह एक सम्मानित परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता एक पुलिस इंस्पेक्टर हैं और माँ एक हाउस वाइफ हैं। वह बहुत ईमानदार और मेहनती हैं। वह विद्यालय में सभी शिक्षकों का प्रिय छात्र है। वह स्कूल क्रिकेट टीम के कप्तान भी हैं।

रमेश एक मधुर स्वभाव वाला मृदुभाषी और विनम्र लड़का है। वह अपने से बड़ों का सम्मान करता है। शायद इसीलिए वह सबका चहेता भी है। उसका मानना है कि टाइम इज मनी अर्थात समय ही वास्तविक धन है। इसीलिए वह अपने समय का सदुपयोग करता है। वह मेरे लिए एक दोस्त से अधिक भाई की तरह है। 

जब भी स्कूल में मैं किसी समस्या में होता हूं तो वह मेरी सहायता करता है हम स्कूल के होमवर्क में भी एक दूसरे की मदद करते हैं हम एक साथ मंदिर और पुस्तकालय जैसी जगहों पर जाना पसंद करते हैं वह सच में एक आदर्श मित्र है। 

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (300 शब्द)

मेरे कई दोस्त हैं लेकिन दीपक शुक्ला मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं। मैं उसे संक्षेप में दीपू कहता हूं। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से है। उनके पिता एक दुकानदार हैं और माँ एक आदर्श गृहिणी हैं। वे मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं। मैं अक्सर उनसे मिलने जाता हूं। वह क्रिकेट खेलना पसंद करता है और स्कूल में मुझसे और अन्य दोस्तों से इस खेल के बारे में बात करता है।

वह एक स्वस्थ स्वास्थ्य रखता है। वह सुबह जल्दी उठता है और नियमित रूप से सुबह की सैर के लिए जाता है। दीपक एक बुद्धिमान छात्र होने के साथ-साथ खेल-कूद में भी अव्वल है। वह हमेशा कक्षा में प्रथम आता है। गणित व भौतिक विज्ञान उसके प्रिय विषय है। उसने शहर में आयोजित सभी वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीते। 

वह बहुत अच्छा हँसमुख और मृदुभाषी लड़का है। मैं उनके दोस्ताना और सरल स्वभाव का सम्मान करता हूं।  इसका मतलब यह नहीं है कि हम एक दूसरे के गुलाम हैं। हमारे बीच भी मतभेद हैं। लेकिन दोस्ती के बीच उनका कोई स्थान नहीं है। एक बार, दीपक कुछ दिनों के लिए बीमार था तब मुझे उसकी बहुत याद आयी। जब भी मैं अपने स्कूल में समस्या में होता हूं तो वह हमेशा मेरी मदद करने के लिए होता है। 

वह बुलंद महत्वाकांक्षा का लड़का है। उसका सपना है कि वह आईएएस अधिकारी बने। मेरा भी एक उद्देश्य एक कार्यकारी अधिकारी होना है। इसलिए वह मेरे करियर के निर्माण में मेरे लिए एक प्रेरणा हैं। वह अपने सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत करता है और चाहता है कि मैं भी ऐसा ही करूं। उनकी कंपनी निश्चित रूप से मुझे मेरा लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगी।

हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं। दीपक मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, और वह जीवन भर सबसे अच्छा रहेगा।

मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (400 शब्द)

जीवन में भोजन और पानी की भांति सच्चा मित्र अत्यंत आवश्यक है। मित्र के बिना जीवन का कोई महत्व नहीं है। वह एक सच्चा सलाहकार, शुभचिंतक और महान सहायक हैं। इसीलिए कहा भी गया है कि सचमुच सच्चा मित्र खोजना मुश्किल, छोड़ना कठिन और भूलना नामुमकिन है। 

राहुल मेरा प्रिय मित्र है। राहुल से मेरी दोस्ती तब शुरू हुई जब हम काफी छोटे थे। वह मेरे घर से कुछ ही दूरी पर रहता है। उनके माता-पिता एक सरकारी बैंक में अधिकारी हैं। उसके एक भाई और एक बहन है। वह अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान है। वे अमीर हैं, उनका अपना बड़ा घर, कार और आधुनिक जीवन की अन्य सभी सुविधाएं हैं। और फिर भी वह कभी पैसे का घमंड नहीं करता। उनके पिता जी मेरे पिताजी के करीबी दोस्त भी हैं। इसलिए, हमारी दोस्ती हमें विरासत में मिली है। उनके माता-पिता मुझे अपने बेटे की तरह प्यार करते हैं। इसी तरह, मेरे माता-पिता रमन से बहुत प्यार करते हैं। 

हमारे बीच कई झगड़े हुए। अपनी शुरुआती स्कूली शिक्षा के लिए, हम दोनों ने एक ही विद्यालय में प्रवेश लिया। अब हम एक साथ हाईस्कूल की पढाई कर रहे हैं। लेकिन पढाई में राहुल की उपलब्धियाँ निश्चित रूप से मेरी तुलना में बेहतर हैं। उसने स्कूल के क्रिकेट टूर्नामेंट में भी खेला और हमारी टीम को जीत दिलाई।

राहुल एक उत्तम चरित्र का लड़का है। वह लम्बा और सुडौल है। वह नियमित सुबह की सैर करता है। टहलने से आने के बाद, वह कुछ योगासन भी करता है। वह एक प्रकृति प्रेमी है। वह पक्षियों, फूलों और पौधों की संगति में रहना पसंद करता है। हम अक्सर एक साथ होते हैं और रचनात्मक गतिविधियों में अपना समय गुजारते हैं, जैसे कि होमवर्क करना, गेम खेलना या लंबी सैर पर जाना। 

हम दोनों जरूरत के समय में एक-दूसरे की मदद करते हैं। कभी-कभी वह मुझे अपने घर बुलाता है। उसके माता-पिता मुझे अपने पास बिठाते हैं और मेरा मार्गदर्शन करते हैं। हालाँकि राहुल के पिता काफी अमीर हैं, लेकिन वह बेकार में पैसा खर्च नहीं करते। इसके बजाय, वह अपने पॉकेट मनी का उपयोग स्कूल के गरीब और ज़रूरतमंद छात्रों की मदद करने के लिए करता है। सभी शिक्षक उससे प्यार करते हैं और उस पर भरोसा करते हैं। वह हमारे स्कूल का एक बहुत लोकप्रिय छात्र भी है।

हम एक साथ मिलकर एक दूसरे की कमियों पर काम करते हैं ताकि हम एक दूसरे को निखार सकें। हालांकि, कुछ छात्रों को हमारी दोस्ती से जलन महसूस होती है, लेकिन हम कभी भी उनकी परवाह नहीं करते हैं। आशा है कि हम जीवन भर एक-दूसरे के परम मित्र रहेंगे।

Monday, 22 July 2019

वर्षा पर संस्कृत में कविता। Poem on Rain in Sanskrit

वर्षा पर संस्कृत में कविता। Poem on Rain in Sanskrit

दोस्तों आज के लेख में हमने वर्षा पर संस्कृत (Sanskrit) में कविता  अर्थात Poem on rain प्रस्तुत की है। यह कविता कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11 और 12 के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। वर्षा पर लिखी गई इस संस्कृत कविता के अंतर्गत हम जानेंगे कि वर्षा होने के दौरान प्रकृति में क्या क्या बदलाव आते हैं। कौन-कौन सी घटनाएं घटती हैं।

वर्षा पर संस्कृत में कविता। Poem on Rain in Sanskrit

सर सर आयान्ति वर्षाधारा:
अत्र प्रसन्ना: सर्वे जीवा: ।
वृक्षै: प्राप्तं नवजीवनम्
नृत्यन्ति ङ्कोदेन बाला: सततम् ।।1।।
धप् धप् पतन्ति जलप्रपाता:
ड्रँव ड्रँव कुर्वन्ति कूपमण्डूका: ।
टप् टप् गायन्ति पर्णेषु बिन्दव:
पक्ववटखादने मग्ना जना: ।।2।।
कृष्णान् ङ्केघान् पश्य आकाशे
धडाम् धुडुम् धडाम् धुडुम् गर्जन्ति ते ।
जलेन क्लिन्नं जातमङ्गं
धो धो धो वर्षन्ति ङ्केघा: सततम् ।।3।।
नृत्ङ्मं कुर्वन्ति मङ्मूरास्ते
सिंहा गर्जन्ति ननु ङ्केघनाद: ।
सत्वरं वहन्ति सागरं नद्य:
प्राणा हि प्राणिनां वर्षाकाल: ।।4।।
लेखक - श्री. श्रीहरि: गोकर्णकर:

Sunday, 21 July 2019

विनोदाचे महत्त्व / मानवी जीवनातील विनोदाचे स्थान / Laughter is The Best Medicine Essay in marathi

विनोदाचे महत्त्व / मानवी जीवनातील विनोदाचे स्थान / Laughter is The Best Medicine Essay in marathi

दोस्तों आज हमने "मानवी जीवनातील विनोदाचे स्थान" पर मराठी निबंध प्रस्तुत किया है। यह निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 12 के लिए उपयुक्त है। Here you will find essays and paragraph on laughter is the best medicine in marathi for students.

विनोदाचे महत्त्व / मानवी जीवनातील विनोदाचे स्थान / Laughter is The Best Medicine Essay in Marathi

`सुख पाहता जवापाडे। दु:ख पर्वताएवढे'
भागवत धर्माच्या मंदिरावर कळस चढाविणान्या संत शिरोमणी तुकाराम महाराजांचे हे बोल आहेत. आयुष्यात प्रत्येकाला दु:खाचे डोंघर पार करावे लागतात,  तेव्हा अल्प असे सुख त्याच्या वाट्याला येते. मानवी जीवनातील पर्वताएवढ्या दु:खाने भरडून जाताना विनोदाचा आधार मोलाचा ठरतो. विनोदामुळे हास्य निर्माण होते; आाणि `हास्य' ही माणसाची सहजप्रवृत्ति आहे. म्हणूनच तर मानवी जीवनात विनोदाचे महत्त्व अनन्यसाधारण आहे.

पूर्वी राजे-महाराजांच्या काळात राजदरबारी विदूषकाची नेमणूक करत असे. नित्याच्या कामकाजातून राजाची व दरबाराची करमणूक व्हावी, हे त्यामागचे कारण असे. विनोदाने घटकाभर का होईना, पण दु:खाचा विसर पडतो आणि त्या दु:खातून बाहेर येण्याचा मार्ग सुसह्य होतो. 

मानवी जीवनातील विनोद हा बरेचदा शब्दांच्या, अर्थांच्या, प्रसंगांच्या अथवा कल्पनेच्या चमत्कृतीपूर्ण वापरामुळे होतो. मानवी जीवनातील अनेक तन्हेच्या विसंगती हे विनोदाचे  उगमस्थान आहे. 

मराठी साहित्यातील विनोदी लेखनाचे दालन अनेक मान्यवर विनोदी लेखकांनी समृद्ध केलेले आहे. चि. वि. जोशी (चिमणरावांचे चन्हाट), प्र. के. अत्रे (झेंडूची फुले), पु. ल. देशपांडे (व्यक्ती आणि वल्ली), द. मा. मिरासदार (माझ्या बापाची पेंड), श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर (सुदाम्याचे पोहे), राम गणेश गडकरी (संपूर्ण बाळकराम) अशी बरीच नामावली आपणास सापडते. या सर्वांच्या लेखनातून व्यक्त होणारा विनोद वेगवेगळ्या प्रकारातील असला, तरी त्यामागे हेतू हाच की माणसाला त्याच्या आयुष्यातील चार सुखाचे क्षण या विरंगुळ्यातून मिळावेत. बरेचदा लोक आपल्या आयुष्यातील दु:खाचा विसर पडून क्षणभर दैनंदिन ताण-तणावांतून बाहेर पडण्याचा मार्ग म्हणून विनोदी साहित्य अगदी आवडीने वाचतात. यामुळे आपण थोडे अंतर्मुख होऊन आत्मपरिक्षण करण्यास प्रवृत्त होतो.

यापूर्वीचेही जर संत वाड्मय आपण पाहिले, तर त्यातसुद्धा विनोदाला अनन्य साधारण महत्त्व दिलेले दिसते. याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे संत एकनाथ लिखित `मला दादला नको ग बाई....' सारखी समाज प्रबोधनपर विनोदी अंगाने जाणारी `भारूड' ही काव्य रचना. या रचनेत केवळ हसवणे, मनोरंजन करणे हेच विनोदाचे उाद्दिष्ट मर्यादीत न राहता त्यातून लोकजागृतीही घडताना दिसते. 

आजच्या स्पर्धच्या युगात जगताना ज्या ताण-तणावातून जावे लागते, त्यात थोडा विसावा, विरंगुळा म्हणून दूरदर्शन, खाजगी टी.व्ही. चनेल्सवरसुद्धा विविध विनोदी कार्यक्रमांची मेजवानीच आपल्याला मिळते आहे. अशा वेळी जेव्हा घरातील लहान-थोर मंडळी एकत्र बसून मनमुराद हसतात, तेव्हा कुटुंबातील सर्व ताण-तणाव नाहिसे झाल्यासारखे वाटतात आणि एक वेघळा निरपेक्ष, निखळ आनंद सर्वांनाच अनुभवायला मिळतो. विनोदामुळे जीवनाला प्रवाहीपणा येऊन जीवनाचा आनंद खन्या अर्थाने खेळकरपणाने उपभोगण्याची लज्जत वाढते, म्हणूनच `विनोद' हे जीवनाचे महत्त्वाचे अंग आहे, तर `हसा आाणि लठ्ठ व्हा' हा सुखी जीवनाचा मंत्र आहे.

Saturday, 20 July 2019

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध

दोस्तों आज हमने राष्ट्रभाषा हिंदी की गिरती स्थिति पर निबंध लिखा है। यह निबंध कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 12 के लिए उपयुक्त है। Here you will find essays and paragraph on Hindi language for students.

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और यह भारत में बहुतायत से बोली जाती है। परंतु फिर भी भारत में इसकी स्थिति उत्तरोत्तर गिरती जा रही है। इस निबंध के माध्यम से हम जानेंगे कि आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी का पतन हो रहा है। 

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (150 शब्द) 

यद्यपि हिंदी भारतवर्ष की राजभाषा है परंतु वर्तमान में इसकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। यदि हमसे पूछा जाए कि हमने हिंदी भाषा की स्थिति में सुधार के लिए क्या किया है तो सिवाय इसके कि हम मौन होकर रह जाएं या दो चार आयोग के नाम गिना दें परंतु कोई तथ्य पूर्ण उत्तर नहीं दे सकते। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज भी विदेशी मानसिकता से पीड़ित कुछ ऐसे लोग हैं जो अंग्रेजी को हिंदी से श्रेष्ठ समझते हैं और इसी कारण आज हिंदी को अपने ही देश में तिरस्कृत होना पड़ रहा है। हिंदी भाषियों को हीन दृष्टि से देखा जाता है। यही नहीं देश के प्रमुख नेता, राजनेता, अभिनेता आदि अंग्रेजी बोलकर अपने अहम की पुष्टि करते हैं। अतः हम सभी को चाहिए कि हम अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी भाषा का अधिक से अधिक प्रयोग करें तभी इसकी स्थिति में सुधार आ सकता है। यह भी पढ़ें हिंदी भाषा का महत्व पर निबंध

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (200 शब्द)

आज भारतवर्ष को स्वतन्त्र हुए 72 वर्ष हो चुके हैंपरंतु इसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वास्तविकता तो यह है कि हिंदी जहां थी वहीं है, और दक्षिण भारत के राज्यों में तो इसकी स्थिति और भी बुरी है। यद्यपि भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया गया था परंतु वह सिर्फ सिर्फ एक दिखावा था। कई लोगों का मानना है कि हिंदी अभी पूर्णतया विकसित भाषा नहीं है परंतु इस तथ्य में कदापि सच्चाई नहीं है। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो हिंदी को अच्छी तरह बोलना व लिखना जानते हैं लेकिन वे अपने मिथ्याभिमान का प्रदर्शन अंग्रेजी बोलकर करते हैं, फिर चाहे वो सरकारी व्यक्ति हो या आम आदमी। वास्तविकता तो यह है कि यदि आप भारत में किसी अहिंदी भाषी राज्य में भी चले जाएं तो वहां भी सभी लोग टूटी-फूटी हिंदी बोल तथा समझ सकते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जो संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में पिरौती है अतः हम सभी को हिंदी की स्थिति में सुधार के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रं भाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। Related : राष्ट्रभाषा की समस्या

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (300 शब्द)

आज हिंदी भाषा भारतवर्ष के कोने-कोने में बोली जाती है और इसे देश की राजभाषा का भी दर्जा प्राप्त है परंतु अंग्रेजी के प्रति हमारे झुकाव के कारण आज हिंदी की स्थिति सोचनीय हो गई है। समाज में अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है जबकि हिंदी भाषी को हीन दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे लोगों का मानना है कि हिंदी अभी पूर्णतया विकसित नहीं है। वह अंग्रेजी भाषा को हिंदी से श्रेष्ठ समझते हैं। हमारे देश के नेता अभिनेता विदेशों में तो छोड़िए, अपने ही देश में अंग्रेजी का इस प्रकार प्रयोग करते हैं मानो अंग्रेजी ही उनकी मातृभाषा हो। वास्तविकता यह है कि हिंदी ना केवल अंग्रेजी से श्रेष्ठ है अपितु यह अंग्रेजी से प्राचीन भी है।रामायण, रामचरितमानस, महाभारत जैसे महाकाव्य हिंदी में ही लिखे गए। अतः हिंदी का साहित्य अंग्रेजी की अपेक्षा अधिक समृद्ध है। दु:ख की बात यह है कि हिन्दी जगत में नये साहित्यकार उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी साहित्य को अधिक और अधिक रुचिकर सक्षम और समृद्ध बनाया जाए।यह प्रसन्नता का विषय है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में भी कुछ सीमा तक हिन्दी का अच्छा विकास हुआ। हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में भाषण देकर सबको चौंका दिया था। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी शपथ के बाद प्रथम भाषण हिन्दी में देकर हिन्दी को गौरवान्वित किया और भारतवासियों के हदय में आशा की किरण जाग्रत की। अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रभाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। अतः हम सब का कर्तव्य है कि हम सभी लोग मिलकर हिंदी भाषा को उसकी खोई हुई स्थिति वापस दिलाएं क्योंकि मातृभाषा का प्रयोग करना गौरव का विषय है ना कि हीनता का

राष्ट्रभाषा हिन्दी की गिरती स्थिति पर निबंध (1900 शब्द)

आज भारतवर्ष को स्वतन्त्र हुए 72 वर्ष हो चुके हैं, परन्तु यदि हमसे पूछा जाये कि हमने हिन्दी के उत्थान के लिये क्या किया, तो सिवाय इसके कि हम मौन होकर रह जायें, या दो चार आयोग के नाम गिना दें, कुछ तथ्यपूर्ण उत्तर नहीं दे सकते। यह प्रश्न हम अपने से करते तो उत्तर मिलता कि हिन्दी जहाँ थी, वहीं है और दक्षिणी राज्यों में तो उससे भी बुरी स्थिति में है। राजर्षि टण्डन, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी आदि नेताओं के जीवनकाल में, या स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व हिन्दी को अपनी भाषी समझकर हम लोग आदर करते थे या यों कहिये कि केवल अंग्रेजों को दिखाने के लिए हमारे अन्दर वह जोश था। यद्यपि भारतीय संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर लिया गया था, फिर भी आज तक उसे समुचित स्थान प्राप्त नहीं हो सका है। यह निश्चय किया गया था कि चूंकि हिन्दी अभी इतनी समर्थ नहीं है, इसलिए हिन्दी के साथ सन् 1965 तक सरकारी कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी।
यह भी पढ़ें हमारी राष्ट्र भाषा: हिन्दी पर निबंध

सन् 1965 आने से बहुत पहले ही अंग्रेजी के प्रबल समर्थक सचेत हो गए। उन्हें भय हुआ कि कहीं हिन्दी में आ जाये। इसके लिए उखाड़-पछाड़ शुरू हो गई। सन 1965 में ही लोक सभा में एक विधेयक लाने का प्रयत्न किया गया कि अभी हिन्दी इस योग्य नहीं हुई है कि राष्ट्र-भाषा के पद पर आसीन हो सके। अतः सन् 1965 के बाद भी अंग्रेजी की अवधि बढा दी जाये। नवम्बर में ही इस प्रकार का विधेयक लोकसभा में आने वाला था, जिसे तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री प्रस्तुत कर रहे थे, परन्तु 20 अक्टूबर, सन् 1962 को चीनी आक्रमण के कारण आपातकालीन स्थिति घोषित हो जाने के कारण यह विधेयक उस समय टल गया। पुनः सन् 1963 में इस विधेयक को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। विधेयक की धारा इस प्रकार थी—

  • इस कानून का नाम राजभाषा कानून होगा, 
  • हिन्दी का अर्थ देवनागरी में लिखित है, 
  • सन् 1965 के बाद हिन्दी के अतिरिक्त अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकता है, 
  • दस वर्ष बाद तीन संसद सदस्यों की एक समिति हिन्दी की पुनः जाँच करेगी, 
  • सन् 1965 के बाद केन्द्रीय कानूनों या राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया अध्यादेश या संविधान के अन्तर्गत जारी किए नियम आदि के हिन्दी अनुवाद प्रामाणिक माने जायेंगे। 
  • सन् १९६५ के बाद किसी विधान सभा द्वारा स्वीकृत कानून के हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित किये जा सकते हैं, 
  • सन् 1965 के बाद किसी राज्य के राज्यपाल राष्ट्रपति से अनुमति लेकर अंग्रेजी के साथ हिन्दी व राज्य की और किसी भाषा को राज्य-भाषा का स्थान दे सकते हैं, तथा 
  • केन्द्रीय सरकार राज्य भाषा सम्बन्धी कानून के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए नियम बना सकती है।
स्वर्गीय पं. जवाहरलाल नेहरू ने उक्त विधेयक का बड़ा समर्थन किया और कांग्रेस संसदीय पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने अपनी निम्नलिखित राय जाहिर की—“इस समय देश में एकता रखना अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दुस्तान को बिगाड़ कर हिन्दी की तरक्की नहीं हो सकती। हमें दक्षिण के लोगों में यह विचार पैदा नहीं होने देना चाहिये कि उत्तर वाले उन पर हिन्दी थोप रहे हैं।” ‘हिन्दी तथा अहिन्दी भाषियों को दो भागों में बाँट देने से देश का भारी अहित होगा। हिन्दी को रजामंदी से आगे ले जाना है, अगर हिन्दी वाले जबरदस्ती करेंगे तो दूसरे लोग विरोध करेंगे। इससे ऐसी खाई पैदा हो जायेगी जो हिन्दी के लिए ही नहीं वरन् पूरे देश के लिए घातक सिद्ध होगी। हिन्दी का और ताकत मिलेगी, यदि हिन्दी के साथ अंग्रेजी को सहायक भाषा रहने दिया जाए, क्योंकि अंग्रेजी के जरिये नये-नये विचार आते रहेंगे।

इस विधेयक को लोक सभा में प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन गृहमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था कि-"आप मुझ पर विश्वास रखें, मेरे द्वारा हिन्दी का अहित कभी भी नहीं हो सकता, परन्तु मुझे अपना कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी पूरा करना है। परन्तु दूसरी बात उन्होंने भी स्वयं स्वीकार करते हुए कहा कि “जब तक हिन्दी विकसित नहीं हो जाती और जब तक लोग उसे अच्छी तरह से सीख नहीं लेते, तब तक अंग्रेजी को बनाये रखना ही पड़ेगा। आज अंग्रेजी सभी राज्यों की साझी भाषा है और राज्यों तथा केन्द्रों के बीच पत्र-व्यवहार भी उसी में होता है। यदि अगले पाँच वर्षों में अंग्रेजी का त्याग कर दिया गया, तो भारत अपने आप अलग-अलग भागों में बँटकर बिखर जायेगा।” शास्त्री जी के वक्तव्य से भी ध्वनित होता था कि हिन्दी अविकसित थी। हिन्दी के मूर्धन्य कवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इस विधेयक के विषय में कहा था-"अंग्रेजी को आगे जो इतनी आयु दी जा रही है वह सावधि होगी या निरावधि? हिन्दी-भाषी राज्यों का मत है कि अंग्रेजी के प्रयोग को निरावधि नहीं छोड़ना चाहिये। दिनकर ने यह सोचा था कि एक अवधि ही निश्चित हो जाये तो अच्छा है।

भारतीय लोक सभा के अन्य सदस्यों की भाँति श्री अनन्त गोपाल शेवड़े भी इस विधेयक को प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने कहा था कि- “देश के सारे नेताओं को जो शासन के भीतर तथा बाहर हैं, और जो राजनीतिक, सांस्कृतिक या साहित्यिक क्षेत्रों में काम करने वाले हैं। ऐसा वातावरण निर्माण करने का प्रयत्न करना चाहिये, जिससे इस विषय पर शान्ति से न्याययुक्त और तर्कयुक्त बुद्धि से केवल राष्ट्रीय हित में विचार हो सके, उसमें क्रोध, अविश्वास और राजनीतिक पैंतरेबाजी के लिये स्थान न हो। राज-भाषा के प्रश्न पर विचार करते हुये हमें राष्ट्र हित को ही सर्वोपरि रखना चाहिये, राजनीतिक दलगत स्वार्थों से तो हिन्दी या राष्ट्र का अहित ही होगा है।”

हिन्दी को ही यदि राष्ट्र भाषा बना दिया गया तो और भाषायें अशक्त या अप्रतिभा हो जायेंगी या हिन्दी में ही श्रेष्ठ और सत्साहित्य है इसका मतलब यह कभी नहीं समझना चाहिये और यह भी नहीं सोचना चाहिये कि हिन्दी उन पर थोपी जा रही है क्योंकि दक्षिणात्य समझते हैं। कि हम भी भारत माता की संतान हैं, हिन्दी हैं, संस्कृत की उत्तराधिकारिणी हिन्दी हमारे देश की राष्ट्र-भाषा है। दक्षिणात्यों में जितना देववाणी संस्कृत का अध्ययन है, उसका शतांश भी उत्तर वालों में नहीं। अधिकांश दक्षिणवासी हिन्दी का समर्थन करते देखे गये हैं। श्री रसक पुन्निगे का कथन था कि हिन्दी साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग, मुम्बई, आगरा आदि की हिन्दी परीक्षायें दक्षिण में खूब चलती हैं। लगभग 15 वर्ष से राज्य स्कूलों और कॉलिजों में हिन्दी अध्यापन की व्यवस्था है। दक्षिण में हिन्दी का समर्थन करने वालों का एक कट्टर समुदाय भी है, जो हिन्दी के लिये सब कुछ त्याग सकता है। दक्षिण में अधिकाधिक मात्रा में हिन्दी फिल्में दिखाई जाती हैं।

15 सदस्यों ने विधेयक के विरोध में मत दिया। प्रसिद्ध कांग्रेसी एवं प्रसिद्ध साहित्यकार सेठ गोविन्ददास ने कांग्रेसी होते हुए भी विधेयक का लोक सभा में घोर विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, “भले ही मुझे कांग्रेस छोड़नी पड़े पर मैं आँखों देखा विष नहीं खा सकता।" परिणाम वही हुआ जो होना था। विधेयक बहुमत से पास हुआ। इसके पश्चात् राज्य सभा में भी थोड़े बहुत नेताओं के विरोध के पश्चात् यह विधेयक पास हो गया। अब अंग्रेजी आगे भी बारह वर्षों तक राष्ट्र-भाषा के रूप में बनी रही, इसे संयोजक भाषा कहा गया। 10 वर्ष बाद हिन्दी की स्थिति पर फिर विचार हुआ।

हिन्दी को संविधान ने राष्ट्र-भाषा स्वीकार किया, इसके पीछे भी भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों का बल निहित था।

1967 के आम चुनावों के पश्चात् बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों की सरकारों ने हिन्दी में ही कार्य करने का दृढ़ संकल्प लिया, उधर छात्रों में मातृ भाषा के प्रति अपूर्व श्रद्धा उमड़ती हुई दिखाई पड़ी, हिन्दी भाषी प्रान्तों में अंग्रेजी में लिखी हुई कोई भी वस्तु दिखाई न पड़े इसलिए छात्रों ने अंग्रेजी के साइन बोर्डों की जगह हिन्दी के साइन बोर्ड लगाइये, अंग्रेजी को वैकल्पिक विषय घोषित कर दिया। हिन्दी टाइप राइटरों के निर्माण के लिए कंपनियों को आदेश दे दिये गये। विधान सभा की निश्चित कार्यवाहियां हिन्दी में की जाने लगीं। सरकारी कार्यायलों को आदेश दे दिये गये कि अपना सारा काम हिन्दी में करें। सहसा एक बार ऐसा प्रतीत होने लगा कि शायद हिन्दी के दुर्दिन बीत चुके हैं।

सन् 1965 के बाद भी अंग्रेजी को संयोजक भाषा के रूप में प्रथिष्ठित करने वाले विधेयक के पास हो जाने पर भी बहुत से लोग शासन की भाषा नीति से प्रसन्न नहीं थे। परिणामस्वरूप राजभाषा विधेयक संशोधक बिल राज्यसभा तथा लोकसभा में पस्तुत किया गया। विरोधी दलों के विरोध के बावजूद संशोधन पास हो गया।

उधर हिंदी भाषा मंत्रिमंडल अपने अपने राज्यों में केंद्रीय सरकार के इस निर्णय के विरूद्ध थे और अपने राज्यों में अंग्रेजी को प्रोत्साहित करने के पक्ष में नहीं थे। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने सन् 1968 प्रारंभ होते ही अंग्रेजी को परिक्षाओं से निकाल बाहर फेंकने के लिए वैकल्पिक विषय घोषित कर एक पुनीत कर्तव्य का पालन किया। बिहार और राजस्थान में भी सरकारों ने इसी प्रकार के पवित्र निर्णय लिये। राजस्थान में तो यह सुविधा तक दी गई कि टेलीफोन पर हिन्दी अंग्रेजी के हिन्दी पर्यायवाची शब्द बताये जाने लगा।

प्रसन्नता का विषय है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में भी कुछ सीमा तक हिन्दी का अच्छा विकास हुआ तथा अन्य प्रदेश भी इस ओर प्रयत्नशील हुए। 1967 के आम चुनावों के बाद नये शिक्षा मंत्री श्री त्रिगुणसेन ने इस ओर विशेष रूचि ली। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल का रुख भी हिन्दी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण था। हमारे पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी में भाषण देकर सबको चौंका दिया था। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी शपथ के बाद प्रथम भाषण हिन्दी में देकर हिन्दी को गौरवान्वित किया और भारतवासियों के हदय में आशा की किरण जाग्रत की। बिहार के मन्त्रिमण्डल ने हिन्दी को सरकारी भाषा घोषित कर बड़ा पुनीत कार्य किया।

हिन्दी के आज तीन स्वरूप हैं। पहला स्वरूप भारतीयों की मातृभाषा का, दूसरा स्वरूप राजभाषा का और तीसरा स्वरूप भारत से बाहर बस जाने वाले प्रवासी भारतीयों का । हिन्दी का तीसरा स्वरूप सर्वाधिक व्यापक उसका विश्व भाषा वाला रूप है। मारीशस फिजी गियाना सरीनाम श्रीलंका इण्डोनेशिया थाइलैण्ड और जापान को मिलाकर तीस ऐसे देश हैं जहाँ कई लाख की संख्या में भारतवासी बसे हुये हैं और आपसी व्यवहार में हिन्दी का प्रयोग करते हैं। हिन्दी आज विश्व की प्रमुख भाषाओं की पंक्ति में जा पहुँची है। उसके बोलने वालों की संख्या के अनुसार संसार में तीसरा स्थान हिन्दी का है। पिछले वर्षों में सम्पन्न हुये विश्व हिन्दी सम्मेलनों के कारण हिन्दी के इस तीसरे स्वरूप की चर्चा अधिक जोरों पर है। ये सम्मेलन जनवरी 1975 में भारत के नागपुर शहर में और अगस्त 1976 में। मारीशस में सम्पन्न हुये। निश्चित ही इन सम्मेलनों के सत्यप्रयासों का प्रभाव विश्व के बौद्धिक जनमानस पर पड़ा और हिन्दी ने संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया। 1977 से प्रतिष्ठित भारत सरकार के विदेश मन्त्री के संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य विदेशों की यात्राओं में हिन्दी के प्रयोग से सम्भवतः विश्व में हिन्दी को आगे बढ़ने में कुछ बल मिला, परन्तु हिन्दी की स्थिति यथावत् रही। भारत की समृद्धि की जहाँ अनन्त उपलब्धियाँ रहीं वहाँ हिन्दी की समृद्धि बहुत मन्द रही। राजीव गाँधी के युग में भी यही स्थिति रही। सन् 1996 तक हिन्दी का कोई महत्त्वपूर्ण उत्थान नहीं हुआ।

अब स्थिति काफी सुधर गयी है। बैंकों में चैक हिन्दी में स्वीकार किये जाते हैं। रेलवे टिकिट में हिन्दी अनिवार्य है। न्यायालयों के निर्णय भी हिन्दी में आने लगे हैं। आशा है कि राष्ट्रं भाषा निकट भविष्य में अपना वांछित स्थान और गौरव प्राप्त कर लेगी। दु:ख की बात यह है कि हिन्दी जगत में नये साहित्यकार उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी साहित्य को अधिक और अधिक रुचिकर सक्षम और समृद्ध बनाया जाए।

Friday, 19 July 2019

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी - ग्रामीण विकास की पहल

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी - ग्रामीण विकास की पहल

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी - ग्रामीण विकास की पहल

दोस्तों आज के लेख में हमने भारत निर्माण स्वयंसेवी की चर्चा की है। इसके अंतर्गत हम जानेंगे कि आखिर भारत निर्माण स्वयंसेवी कौन होता है और किस प्रकार भारत निर्माण स्वयंसेवी बना जा सकता है। दोस्तों भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में भारत निर्माण स्वयं सेवी की एक महत्वपूर्ण भूमिका भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास में भारत निर्माण स्वयंसेवी की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है आइए इस लेख के माध्यम से जानते हैं भारत निर्माण स्वयंसेवी के बारे में। 

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी एक ऐसा व्‍यक्‍ति है जो ग्रामीण परिवेश से जुड़ा है वह विभिन्‍न परिवारों तथा विभागों के मेजबानों के बीच सहज कड़ी के रूप में कार्य करता है। वह सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्‍न कार्यक्रमों के लाभ बिना पहुंच वाले ग्रामीणों को दिलवाना सुनिश्‍चित करता है। दुसरे शब्‍दों में, वह कार्यक्रमों तथा इन कार्यक्रमों की पहुंच से दूर बिना के लोगों के बीच मील का आखिरी मानवीय संपर्क है। अब तक देश में 31,000 स्‍वयंसेवी को भारत निर्माण स्‍वयंसेवी के रूप में नामांकित कर लिया गया है।

भारत निर्माण स्‍वयंसेवी क्‍यों?

सरकार तथा संबंधित राज्‍य सरकारें कई दशकों से विभिन्‍न कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों को संचालित कर रही हैं। तथापि, कई मुल्‍यांकन अध्‍ययनों में यह दर्शाया गया है कि कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन में कमी रह गई और गरीबी से नीच रहने वाले कई संबद्ध परिवारों को वांछित लाभ नहीं मिल पाया। विभिन्‍न स्‍तरों पर इन सुविधाओं का लाभ देने वालों का आकार सीमित रहने तथा पर्याप्‍त समय न देने पर लक्षित ग्रामीण घर परिवारों को इनका लाभ भी समय पर नहीं मिल पाया तथा कहीं पर ऐसे लोगों को भी लाभ मिल गया जिन्‍हें इसकी जरूरत नहीं थी।

ग्रामीण घर परिवारों के साथ आखिरी जुड़ाव के रूप में मानवीय चेहरा प्रस्‍तुत करने के लिए यह सोचा गया कि क्षमतावान युवकों का उपयोग भारत निर्माण स्‍वयंसेवी के नाम से किया जाए तो ग्रामीण घर परिवारों के बीच कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों के बारे में जागरूकता फैलाएंगे जिससे बेहतर योजना तथा कार्यक्रमोंका सुचारु कार्यान्‍वयन हो और पारदर्शिता तथा जवाबदेही लाई जा सके।

वे क्‍यों स्‍वयंसेवी बने?

पिछले काफी समय से देखा जा रहा था कि ग्रामीण परिवोश में स्‍थानीय शक्‍ति के समूह बढ़ने, विभिन्‍न समुदायों के बीच एकता का अभाव, उनसे संबंधित मुद्दों के बारे में जागरूकता का अभाव, कार्यक्रम की कार्यान्‍वयन प्रक्रिया के पहलुओं के बारे में जागरूकता का अभाव जैसे मुद्दे सामने आ रहे थे इससे विभिन्‍न सरकारी कार्यक्रमों का लाभ गरीब परिवारों को नहीं पहुंच पा रहा था। इसके साथ ही, विभिन्‍न कल्‍याणकारी तथा विकास कार्यक्रमों की योजना की प्रक्रिया में ग्रामीण परिवारों की सहभागिता पर्याप्‍त नहीं थी। इसलिए, ग्रामीण की विशेष तौर पर युवाओं की स्‍वयेसेवी भागीदारी तथा ग्राम विकास के लिए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन में भाग लेने का अवसर प्रदान करना आवश्‍यक समझा गया। भारत निर्माण स्‍वयंसेवकों ने अपने कार्यों से अपने व्‍यक्‍तित्‍व, व्‍यवहार में काफी परिवर्तन महसूस किया। उन्‍होंने सम्‍मान और पहचान प्राप्‍त की तथा जहां उन्‍होंने कोई विशिष्‍ट कार्य किया तो उनमें यह भाव पैदा हुआ कि ‘यह हमने किया’।

प्रशिक्षण में मूल्‍यों तथा नैतिकता के साथ-साथ सरकार की सभी विकास योजनाओं के उद्देश्‍यों पर बल दिया गया है। इससे उनका ध्‍यान उनके समुदाय में व्‍याप्‍त विभिन्‍न बुराइयों जैसे कि शराबखोरी, जल्‍दी स्‍कूल छोड़ देने के साथ ग्रामीण अर्थव्‍यस्‍था, सुशासन और योजना की ओर गया। ग्राम सभा, ग्राम पंचायत तथा समितियों के अंतर्गत मुद्दों का निपटान, अनुशासन, सहजता तथा निर्धारित ढंग के होने से वे स्‍वयं अचंभित थे और ऐसा उन्‍होंने पहले सोचा भी नहीं था। वे शक्‍तिशाली स्‍तंभों से भी सामना करने लगे और उन्‍हें अपने विकास कार्यक्रम के अनुरूप ढालने में समर्थ रहे।

अनेक गांवों में गलियों की सफाई की, कूड़े की निपटान किया, टैंकों, को साफ, श्रमदान करके सड़क तैयार की, सूचना प्रदान की। कई बार उन्‍होंने अपनी कमाई भी लगाई। उनमें से कुछ ने बेसहारा परिवारों, जिनमें केवल महिलाए घर चलाती थीं जिनके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली से प्राप्‍त चावल पूरा नहीं पड़ता था, ऐसे परिवारों की पहचान की और कार्यकर्ताओं ने ऐसे परिवारों की मदद की और यह सुनिश्‍चित किया कि वे हर रोज अपने तीन समय का भोजन प्राप्‍त कर सकें। कई स्‍वयंसेवी अपने गांव में रोशनी लाने के लिए ऊर्जा के वैकल्‍पिक स्‍त्रोतों की योजना सरकार से धनराशि प्राप्‍त करने के लिए बना रहे हैं। कुछ अपनी गलियों में सौर ऊर्जा से रोशनी तथा कुछ सौर कुकर और बिजली के लिए योजना बना रहे हैं। गांव में विभिन्‍न समुदायों के बीच काफी समय से चल रहे झगड़ों का निपटारा कर लिया गया है और भाईचारा पनपा है। भारत निर्माण स्‍वयंसेवी ने मंडल स्‍तर पर सभी विभागों से संपर्क कर समुदायों के पूरे नहीं किए गए अनुरोधों के संबंध में उत्‍तर प्राप्‍त किए हैं। उनमें से अनेक ने दफनाने के लिए स्‍थान, खेल के मैदान तथा कुछ ने अपने गांव से बस लाने के लिए प्रशासन से पहचान तथा अधिसूचना प्राप्‍त कर ली है। प्राय: सभी गांव वालों ने यह सूचित किया है कि उन्‍होंने ऐसी दुकानें (शराब की दुकान) बंद कराने के प्रयास किए और उनमें से कई ऐसी दुकानें बंद कराने में सफल रहे। कुछ ने गांव की दुकानों में पान और गुटकों की बिक्री बंद करा दी। कइयों ने सौ प्रतिशत आईएसएल कवरेज के बारे में अनेक लोगों को सूचित किया है।

कइयों ने प्रशासन से नालियों की लाइन के निर्माण के लिए संपर्क किया है। एक गांव में प्रत्‍येक घर परिवार के लिए गड्ढ़ा भरना निश्‍चित किया गया है, यह उनका लक्ष्‍य है और उन्‍हें यह विश्‍वास कि वे इस कार्य को शीघ्र ही पूरा कर लेंगे। कुछ गांवों में खुली हवादार लाइब्रेरी शुरू की गयी हैं। अखबार और पत्रिकाएं शाम तक छोटे कमरे में रख दी जाती हैं और शाम को इन्‍हें पेड़ के पास चौपाल में पढ़ने के लिए पहुंचा दिया जाता है। बाद में इन्‍हें फिर से स्‍वयंसेवी प्रभारी द्वारा कमरे में वापस पहुंचा दिया जाता है।

आंध्र प्रदेश ग्रामीण विकास अकादमी (अपार्ड) के प्रशिक्षण कार्यक्रम में सभी भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों को स्‍वयं सेवा की भावना का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रबुद्ध व्‍यक्‍तियों, उस्‍मालिया विश्‍वविद्यालय के साइक्‍लोजिस्‍ट, ब्रह्म कुमारियां, भारतके पूर्व राष्‍ट्रपति अब्‍दुल कलाम द्वारा शुरू किया गया लीड इंडिया फाउंडेशन, अनुभवी पत्रकार तथा प्रोग्रेसिव सरपंच तथा अपार्ड से लोगों को शामिल किया गया। इस प्रयोग की सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह रही कि यह सभी स्‍वयंसेवी किसी भी स्‍त्रोत से कोई वित्‍तीय सहायता या मानदेय प्राप्‍त नहीं करते। इसके विपरीत कई मामलों में वे जहां आवश्‍यकता पड़ती है अपनी स्‍वंय की धनराशि खर्च करते हैं। उन्‍होंने यह सिद्ध कर दिया है कि ग्रामीण समुदाय निष्‍क्रिय नहीं हैं और वे अपनी समस्‍याओं का समाधान करने में सक्षम हैं। उन्‍होंने यह भी सिद्ध कर दिया है कि वे अपने समुदाय के अधूरे सपनों को पूरा कर सकते हैं तथा वे ग्रामीण आंध्र प्रदेश के स्‍तर में गुणवत्‍तापरक सुधार लाएंगे। एक खास बात जो अपार्ड ने देखी कि भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों तथा चुने हुए प्रतिनिधियों के बीच कार्य का बेहतर माहौल बना जबकि यह लगता था कि इनके बीच टकराव तथा तकरार न हो जाए। यात्रा जारी है और भारत निर्माण स्‍वयंसेवियों से लम्‍बी सूची प्राप्‍त करने की अपेक्षा है।
लुईस कैरोल की जीवनी। Lewis carroll biography in Hindi

लुईस कैरोल की जीवनी। Lewis carroll biography in Hindi

लुईस कैरोल की जीवनी। Lewis carroll biography in Hindi

लुइस कैरोल अंग्रेजी लेखक और गणितज्ञ चार्ल्‍स लुटविग डॉजसन का छद्म नाम था। उनका जन्‍म 27 जनवरी, 1832 में हुआ। वह विशेष रूप में अपनी कृति "एलिस एडवेंचर्स वन वंडरलैंड" (1865) और " थ्रू द लुकिंग ग्‍लासेस" (1872) के लिये जाने जाते हैं। कैरोल को जिन चीजों के प्रति आकर्षण था, उनमें फोटोग्रॉफी सबसे आगे थी। उन्‍हें बच्‍चों की फोटोग्रॉफी में विशेष उत्‍कृष्‍टा प्राप्‍त थी। 

लुईस कैरोल की जीवनी। Lewis carroll biography in Hindi
वह एक पादरी के बेटे थे और उनके ग्‍यारह बच्‍चों में सबसे बड़े थे। कैरोल ने छोटी उम्र से ही जादू दिखाकर, कठपुतली शो करके और छोटे सामाचार-पत्रों के लिये कविताएं लिखकर मनोंरजन करना शुरू कर दिया था।1846 में दर्शन ने रग्बी स्कूल में दाखिला लिया। उसके बाद उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज ऑक्सफोर्ड से स्नातक किया। 1854 में उन्हें गणित में डिग्री प्रदान की गई और उसके अगले साल वह क्राइस्ट चर्च कॉलेज में गणित विषय के लेक्चरर बन गए। 

1856 में डॉजसन ने पत्रिका द ट्रेन को एक पैरोडी प्रस्तुत की। द ट्रेन के संपादक एडमंड येट्स ने डोडसन द्वारा प्रस्तुत संभावित पेन नामों की एक सूची से छद्म नाम "लुईस कैरोल" चुना। उसी वर्ष कैरोल ने पहली बार क्रइस्‍ट चर्च के डीन की बेटी एलिस प्लेसेन्स लिडेल से मुलाकात की।

4 जुलाई, 1862 को डॉजसन ने एलिस लिडेल और कई अन्य लोगों के साथ गार्डन स्टोर तक की नाव यात्रा की। इस यात्रा के दौरान डॉटसन ने बच्चों को एक कहानी सुनाकर समय गुजार दिया। बाद में उन्होंने इसी कहानी को संशोधित किया और इसे एलिस एडवेंचर्स अंडरग्राउंड नाम दिया। जब उन्होंने 1863 में पुस्तक समाप्त की तो उनके मित्रों और परिवार जनों ने उन्हें इसे प्रकाशित करने का आग्रह किया

इस पुस्तक का नाम बदलकर ऐलिस इन वंडरलैंड कर दिया गया और जुलाई 1865 में प्रकाशित किया गया। प्रिंट की गुणवत्ता खराब होने के कारण इसे तुरंत संचलन से हटा दिया गया। नवंबर में एक दूसरा, सही किया गया संस्करण लगभग उसी समय प्रकाशित किया गया जब डोडसन के गणितीय ग्रंथ द डायनामिक्स ऑफ ए पार्टिकल प्रकाशित हुआ।

कैरोल के हास्‍य रचनाओं और बच्‍चें के कार्यों में द हंटिंग ऑफ शार्क, हास्‍य कविताओं के दो संग्रह, सिल्‍वी एंड ब्रूनों के दो भाग भी शामिल हैं। एक गणितज्ञ के रूप में कैरोल रूढि़वादी और अमौलिक थे। "लुईस कैरोल" में बच्चों की कहानियों के लेखक के रूप में उनकी स्थायी प्रसिद्धि के बारे में मिश्रित भावनाएं थीं। वह खुद को विज्ञान और गणित का आदमी समझना पसंद करते थे जो बकवास लिखने के लिए भी हुआ था।

14 जनवरी, 1898 को चार्ल्स डोड्सन की ब्रोंकाइटिस से मृत्यु हो गई। उन्हें अपने परिवार के लिए खरीदे गए घर के पास माउंट सेमेटरी, गिल्डफोर्ड, सरे में दफनाया गया।

Thursday, 18 July 2019

Yuri Gagarin Biography in Hindi प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन की जीवनी

Yuri Gagarin Biography in Hindi प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन की जीवनी

Yuri Gagarin Biography in Hindi प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन की जीवनी

यूरी गगारिन वह पहले व्‍यक्‍ति थे, जो आंतरिक्ष में गये थे। उन्होंने Vostok 1 नामक अन्तरिक्ष यान में अपनी यात्रा की थी। उनका जन्‍म 9 मार्च, 1934 को रूस के एक सुदूर स्‍थित क्लुशिनो गांव में हुआ था। वो चार भाई-बहन थे जहा उनके पिता एलेक्सी एवोंविच गागरिन बढाई का काम किया करते थे और माँ अन्ना टिमोफेय्ना  गागरिन दूध की डेयरी में काम करती थी। बचपन से ही गणित और भौतिकी में यूरी की बहुत रुचि थी। उन्‍हें ऐसे स्‍कूल में भर्ती कराया गया, जिसमें एक बड़ी सी एयरक्रॉफ्ट फैक्‍टरी थी। 
Yuri Gagarin Biography in Hindi प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन की जीवनी

स्‍कूल में उन्‍हें अवसर प्राप्‍त था कि वह प्रयोगशालाओं में काम देख सकें। वह खिड़कियों से देखते कि नये एयरक्राफ्ट अपनी विमानशालाओं से अपने पहियों पर आते हैं, रनवे पर पहुंचते हैं और टेस्‍ट पायलटों द्वारा उड़ाए जाते हैं। 

उनका स्‍कूल उनके लिये प्रेरणादायी स्‍थल था। प्रयोगशालाओं में काम होते देखना उन्‍हें अत्‍यधिक प्रेरित करता था। जल्‍दी ही उनकी एक टेस्‍ट पायलट बनने की महत्‍वकांक्षा विकसित हो गई। गगारिन अक्‍सर इन पायलटों की सराहना करते। इसी तरह का सपना दूसरे विद्यार्थियों के मन में भी पल रहा था और रिक्‍त स्‍थान सीमित थे। 

यूरी ने एक कारखाने में इंजन के भागों के मोल्‍डर की नौकरी कर ली और उसके साथ ही रात में अपनी पढ़ाई जारी रखी। तकनीकों के प्रति आकर्षण ने उनके सपने को सच कर दिया और उन्‍हें सैराटेव के इंडिस्‍ट्रियल कॉलेज में दाखिला मिल गया। वहां एयरोड्रॉम और एक फ्लाइंग क्‍लब भी था। उन्‍होंने क्‍लब की सदस्‍यता ले ली। 

1955 में जब उनकी उम्र इक्‍कीस वर्ष थी, उन्‍होंने एयफोर्स ट्रेनिंग सेंटर में विद्यार्थी के रूप में दाखिला ले लिया। दो वर्षों में वह वहां से उच्च श्रेणी से पास हुए और रशियन एयरफोर्स में बतौर पायलट नियुक्‍त हो गए। उनकी मुलाकात मेडिकल की एक छात्रा वैलेनटाइना इवानोवा से हुई, जिससे उन्‍होंने शादी कर ली। 

1968 में यूरी का जेट मिग १५ (MiG-15) ट्रेनर क्रैश हो गया और इस दुर्घटना में चौंतीस वर्ष उम्र में ही उनकी मृत्‍यु हो गई।  

Wednesday, 17 July 2019

जे कृष्णमूर्ति का जीवन परिचय। J Krishnamurti Biography in Hindi

जे कृष्णमूर्ति का जीवन परिचय। J Krishnamurti Biography in Hindi


जे कृष्णमूर्ति का जीवन परिचय। J Krishnamurti Biography in Hindi

जे कृष्‍णमूर्ति (J Krishnamurti) को एक क्रांतिकारी लेखक और दर्शनशास्‍त्रीय वक्‍ता माना जाता है। वह आध्‍यात्‍मिक मुद्दों पर भी बात करते थे और प्रत्‍येक मनुष्‍य को प्रेरित करते थे कि वह धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक क्रांति के बारे में सोचे। वह एक ‘गुरू’ थे। कुछ उन्‍हें मति-भ्रमि‍त कहत थे और दूसरे कहते थे कि वह अंतर-अनुभव में दक्ष व्‍यक्‍ति थे।

जिद्दु का जन्‍म तेलुगु बोलने वाले ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम नारायणियाह और माता का नाम संजीवम्‍मा था। उनके पिता ब्रिटिश प्रशासन में कार्यरत थे और माता का निधन हो गया था, तब उनकी आयु दस वर्ष थी। 1903 में वह कुडप्‍पाह आ गये, जहां उन्‍होंने स्‍कूल में पढ़ना शुरू किया। यहां उन्‍हें अस्‍पष्‍ट सोच वाला और स्‍वप्‍नदर्शी। मंद-बुद्धि माना जाता था। जब वह अट्ठारह वर्ष के थे, तब दावा किया कि उन्‍हें अपनी मृत बहन की आत्‍मा के दर्शन होते हैं। 1907 में उनके पिता सेवानिवृत्‍त हुए और उन्‍होंने ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ की तत्‍कालीन अध्‍यक्ष एनी बीसेंट को एक पत्र लिखकर नौकरी की मांग की। उन्‍हें वहां क्‍लर्क के रूप में नियुक्‍ति मिल गई। वह और उनके पुत्र 1909 में थियोसोफिकल सोसायटी के मुख्‍यालय चैन्‍न्‍ई आ गये।

मई, 1909 को जिद्दु थियोसोफिकल सोसायटी के प्रभावकारी सदस्‍य चार्ल्‍स वेबस्‍टर लेडबेटर से मिले। लेडबेटर को उनमें एक ‘आग’ दिखी और कहा कि वह एक महानवक्‍ता और एक आध्‍यात्‍मिक अस्तित्‍व बनेंगे, जो धरती पर मानवता को विकास को देखने के लिये एक ‘विश्‍व शिक्षक’ के रूप में आया है। इसके बाद उन्‍हें थियोसोफिकल सोसायटी की छत्र-छाया में निजी तौर पर शिक्षित किया गया। उनका एनीबीसेंट सें इतना गहरा संबंध विकसित हुआ कि उनके पिता ने बीसेंट को कृष्‍णमूर्ति पर कानूनी संरक्षकता दे दी।

1911 में थियोसोफिकल सोसायटी ने कृष्‍णमूर्ति को अपने नये संगठन आर्डर ऑफ द स्‍टार इन ईस्‍ट का अध्‍यक्ष बना दिया। इस अभियान को विश्‍वस्‍तर पर प्रेस कवरेज मिला। वह इस प्रचार और उनके भविष्‍य के बारे में भविष्‍यवाणी करने से अपने को असहज अनुभव कर रहे थे। 1911 में उन्‍होंने लंदन में ‘आर्डर ऑफ द स्‍टार इन ईस्‍ट’ के सदस्‍यों को अपना पहला सार्वजनिक भाषण दिया। वह थियोसोफिकल सोसायटी की पत्रिकाओं और पुस्‍तिकाओं के लिये भी लिखने लगे। प्रथम विश्‍व युद्ध के बाद कृष्‍णमूर्ति ने लगातार कई व्‍याख्‍यान दिये और विश्‍व-भर में बैठकें कीं, आर्डर ऑफ द स्‍टार इन ईस्‍ट के अध्‍यक्ष होने के नाते अपनी भूमिका से संबंधित। उन्‍होंने लेखन जारी रखा, जो अधिकतर आडॅर इन द प्रिपरेशन फॉर द कमिंग के कार्यो के आसपास घूमता था।

1922 में वह रोजैलिंड विलियम्‍स से मिले और दोनों ने कैलिफोर्निया में ‘वर्ल्‍ड टीचर प्रोजेक्‍ट’ पर चर्चा की, जो बाद में उनका आधिकारिक निवास स्‍थान बन गया। सितंबर माह के दौरान वह एक जीवन बदल देने वाले आध्‍यात्‍मिक अनुभव से गुजरे। उन्‍होंने एक रहस्‍यवादी मिलन अनुभव किया। इसके बाद उन्‍हें अत्‍यधिक शांति प्राप्‍त हुई। कुछ वर्षों में उन्‍होंने अधिक अमूर्त विचारों और लचीली अवधारणाओं के बारे में बात करना शुरू कर दिया। 3 अगस्‍त, 1929 को एनी बीसेंट के सामने उन्‍होंने ‘आर्डर’ को समाप्‍त कर दिया, एक भाषण में जिसे ‘डिजोल्‍यूशन स्‍पीच’ कहा जाता है।

वह लगातार इस तथ्‍य से इंकार करते रहे कि वह एक ‘विश्‍व नेता’ हैं। उन्‍होंने आखिर खुद को थियासोफिकल सोसायटी से अलग कर लिया। कृष्‍णमूर्ति ने अपनी बाकी जीवन लोगों से संवाद स्‍थापित करने और प्रकृति, विश्‍वासों, सत्‍य, दुख, स्‍वतंत्रता और मृत्‍यु पर अपने विचार सार्वजनिक तौर पर व्‍यक्‍त करने में बिताया। इस व्‍यक्‍ति ने कभी निर्भरता और शोषण पर विश्‍वास नहीं किया और न ही उन उपहारों को स्‍वीकार किया, जिनकी वर्षा उनके कार्यो के लिये की गई थी।

1930 से 1944 के दौरान एक प्रकाशन कंपनी ‘स्‍टार पब्‍लिशिंग ट्रस्‍ट‘ के साथ स्‍पीकिंग टूर्स के लिये संबंधित रहे। उनके विचारों के आधार पर ऋषि वैली स्‍कूल प्रारंभ हुआ। यह ‘कृष्‍णमूर्ति फाउंडेशन’ बैनर के अधीन संचालित किया जाता था। 1930 के दशक में उन्‍होंने यूरोप, अमेरिका और ऑस्‍ट्रेलिया में कई व्‍याख्‍यान दिये।

1930 में उन्‍होंने द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बारे में बोला और वह फेडरल ब्‍यूरो ऑफ इन्‍वेस्‍टीगेशन की निगरानी में आ गये। उन्‍होंने 1944 तक व्‍याख्‍यान बंद रखे। इसके बाद यह सिलसिला एक बार फिर नियमित रूप से प्रारंभ हो गया। उनके सभी व्‍याख्‍यान कृष्‍णमूर्ति राइटिंग्‍स इंक में प्रकाशित हुए।

1953 में उन्‍होंने लिखना प्रारंभ किया और उनकी पहली पुस्‍तक प्रकाशित हुई। इस दौरान वह कई प्रमुख व्‍यक्‍तित्‍वों से मिले, जैसे दलाईलामा और पंडित जवाहरलाल नेहरू। 1961 में एक भौतिक विज्ञानी डैविड बोहम से मिले, जिनके विश्‍वास उनके समानांतर थे। वह एक वैज्ञानिक समुदाय से भी मिले।

1980 के दशक के अंत में कृष्‍णमूर्ति ने अपनी शिक्षाओं के आधारभूत तथ्‍यों को कोर ऑफ टीचिंग नाम से लिखा, जिसमें उन्‍होंने ज्ञान पर बल दिया।

कृष्‍णमूर्ति की मृत्‍यु 17 फरवरी, 1986 को 90 वर्ष की आयु में पैंक्रियाटिक कैंसरके कारण कैलिफोर्निया में हुई।

Tuesday, 16 July 2019

होमी जहांगीर भाभा पर अनुच्छेद लेखन। Homi Bhabha Paragraph (Anuched) in Hindi

होमी जहांगीर भाभा पर अनुच्छेद लेखन। Homi Bhabha Paragraph (Anuched) in Hindi

होमी जहांगीर भाभा पर अनुच्छेद लेखन। Homi Bhabha Paragraph (Anuched) in Hindi

होमी जहांगीर भाभा भारत के प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक थे। होमी जहांगीर भाभा का जन्‍म 30 अक्‍टूबर 1909 को बाम्‍बे के एक समृद्ध पारसी परिवार में हुआ था। स्‍वतंत्रता के बाद उन्‍होंने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिये कार्य किया। 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग की स्‍थापना की। उन्‍होंने नाइल्‍स बोहर के साथ अध्‍ययन किया, जिसने क्‍वांटम थ्‍योरी के लिये उनका मार्ग प्रशस्‍त किया। वह चाहते थे कि आण्‍विक ऊर्जा का उपयोग लोगों की गरीबी और अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने के लिये किया जाए। होमी भाभा को देश-विदेश के विश्‍वविद्यालयों से कई मानद उपाधियां मिलीं और वह कई सांइटिफिक सोसाइटियों के सदस्‍य रहे, जिनमें संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेस भी थी। भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास में डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा का एक विशेष योगदान रहा है। उनके बिना भारत में परमाणु ऊर्जा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। होमी जहांगीर भाभा सिर्फ एक वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि आधुनिक भारत के निर्माता भी थे। हम सभी भारतीय और आगे आने वाली पीढ़ियां डॉक्टर होमी भाभा से सदैव प्रेरित होती रहेंगी। 
डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा पर निबंध। Essay on Dr Homi Jehangir Bhabha in Hindi

डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा पर निबंध। Essay on Dr Homi Jehangir Bhabha in Hindi

डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा पर निबंध। Essay on Dr Homi Jehangir Bhabha in Hindi

दोस्तों आज के लेख में हमने डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा (Homi Jehangir Bhabha) पर निबंध/Essay लिखा है। डॉक्टर भाभा भारत के महान परमाणु वैज्ञानिक थे। इस निबंध (Essay) के माध्यम से हम डॉ होमी भाभा द्वारा भारत में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में किए गए योगदान तथा उनके जीवन के बारे में जानेंगे। 

होमी भाभा, जिनका पूरा नाम होमी जहांगीर भाभा है, भारत के प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक थे। होमी जहांगीर भाभा का जन्‍म 30 अक्‍टूबर 1909 को बाम्‍बे के एक समृद्ध पारसी। परिवार में हुआ था। वह एलफिंस्‍टन कॉलेज से स्‍नातक और रॉयल इंस्‍टीटयूट ऑफ साइंस, बॉम्‍बे में पढ़ाई करने के बाद कैंब्रिज युनिर्सिटी चले गये। उन्‍हें 1934 में डॉक्‍ट्रेट की उपाधि मिली। 

डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा पर निबंध। Essay on Dr Homi Jehangir Bhabha in Hindi
डॉक्टर भाभा जब छोटे थे तभी से उन्हें चांद सितारों अंतरिक्ष आदि को लेकर बड़ी जिज्ञासा थी। इसी जिज्ञासा के कारण बड़े होकर वह एक महान भौतिक विज्ञानी बने। उन्‍होंने नाइल्‍स बोहर के साथ अध्‍ययन किया, जिसने क्‍वांटम थ्‍योरी के लिये उनका मार्ग प्रशस्‍त किया। भाभा ने वॉल्‍टर हेटलर के साथ भी कासकैड थ्‍योरी ऑफ इलेक्‍ट्रान शॉवर्स पर काम किया, जो कॉस्‍मिक रैडिएशंस को समझने के लिये काफी महत्‍वपूर्ण है। उन्‍होंने मेसॉन कण को पहचाने के लिये भी महत्‍वपूर्ण कार्य किये।


द्वितीय विश्‍वयुद्ध शुरू होने के कारण 1939 में भाभा भारत लौट आये। 1939 में उन्‍होंने सी.वी.रमन के अधीन बैंग्‍लौर के इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ साइंस में एक कॉस्‍मिक रे रिसर्च यूनिट की स्‍थापना की। जो. आर. डी. टाटा की सहायता से मुबई में टाटा इंस्‍टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च की भी रिसर्च की भी स्‍थापना की। 1939 में वह इसके निदेशक बन गये।

भाभा महान वैज्ञानिक और कुशल प्रशासक थे। स्‍वतंत्रता के बाद उन्‍होंने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिये कार्य किया। 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग की स्‍थापना की। उनके मार्गदर्शन में वैज्ञानिकों ने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिये कार्य किया और एशिया का पहला परमाणु रिएक्‍टर 1956 में बाम्‍बे के पास ट्रॉम्‍बे में प्रारंभ हुआ।

भाभा 1955 में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्वक उपयोग के लिये जिनेवा में पहली युनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस के चेयरमैन थे। उन्‍होंने आण्‍विक ऊर्जा पर अंतर्राष्‍ट्रीय नियंत्रण की वकालत की और सभी देशों में परमाणु बमों को गैरकानूनी घोषित करने को कहा। वह चाहते थे कि आण्‍विक ऊर्जा का उपयोग लोगों की गरीबी और अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने के लिये किया जाए। होमी भाभा को देश-विदेश के विश्‍वविद्यालयों से कई मानद उपाधियां मिलीं और वह कई सांइटिफिक सोसाइटियों के सदस्‍य रहे, जिनमें संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की नेशनल अकेडमी ऑफ साइंसेस भी थी। उन्‍होंने क्‍वांटम थ्‍योरी व कॉस्मिक रेज पर शोध-पत्र भी लिखे।

अतः यह कहा जा सकता है कि भारत में परमाणु ऊर्जा के विकास में डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा का एक विशेष योगदान रहा है। उनके बिना भारत में परमाणु ऊर्जा की कल्पना भी नहीं की जा सकती और यह भी माना जा सकता है कि उन्हीं के आदर्शों से प्रेरित होकर हमें डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम जैसे महान वैज्ञानिक मिले जो भारत के राष्ट्रपति भी बने। अतः डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा सिर्फ एक वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि आधुनिक भारत के निर्माता भी थे।  हम सभी भारतीय और आगे आने वाली पीढ़ियां डॉक्टर होमी भाभा से सदैव प्रेरित होती रहेंगी। 
10 Lines on Homi Bhabha in Hindi

10 Lines on Homi Bhabha in Hindi

10 Lines on Homi Bhabha in Hindi

  1. डॉ होमी भाभा का पूरा नाम होमी जहांगीर भाभा है। 
  2. होमी भाभा भारत के प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक थे। 
  3. होमी भाभा का जन्‍म 30 अक्‍टूबर 1909 को बाम्‍बे में हुआ था। 
  4. उन्होंने इंग्लैंड के कैअस कॉलेज, कैंब्रिज इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। 
  5. स्‍वतंत्रता के बाद उन्‍होंने परमाणु ऊर्जा के विकास के लिये कार्य किया। 
  6. वे परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के प्रबल हिमायती थे। 
  7. 1948 में भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग की स्‍थापना की। 
  8. जर्मनी में उन्होंने कास्मिक किरणों पर अध्ययन और प्रयोग किए। 
  9. उन्‍होंने क्‍वांटम थ्‍योरी व कॉस्मिक रेज पर शोध-पत्र भी लिखे। 
  10. होमी भाभा की मृत्‍यु 24 जनवरी 1966 में एक विमान हादसे में हुई। 
डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा पर विस्तृत निबंध पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
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Monday, 15 July 2019

विजयादशमी / दशहरा पर संस्कृत निबंध। Dussehra par Nibandh in Sanskrit

विजयादशमी / दशहरा पर संस्कृत निबंध। Dussehra par Nibandh in Sanskrit

विजयादशमी / दशहरा पर संस्कृत निबंध। Dussehra par Nibandh in Sanskrit

भारतीय संस्कृत्याम् उत्सवानां महत्त्वम् अतीव अस्ति। दीपावली, होलिका, इत्यादिषु उत्सवेषु विजयादशमी मुख्यः उत्सवः अस्ति। अयमुत्सवः आश्विनमासे शुक्ल: दशम्यामागच्छति। रामस्य रावणोपरि विजयः अर्थात् धर्मस्य अधर्मोपरि उपरि विजयः अभवत् अत: अयमुत्सवः मन्यते। अस्मिन् पर्वाणि मेघनाद-कुम्भकर्ण-रावणानां मूर्तयः दह्यन्ते। एतासु मूर्तिसु विस्फोटका: पदार्थाः भवन्ति। मूर्तिदहनसमये भयंकरः, घोर: च रवः भवति। एतत् दृश्यं द्रष्टुं बालकाः जनाः च आगच्छन्ति। स्त्रियः, बालाः, बालिका: च नूतनानि वस्त्राणि धारयन्ति। जना: मिष्टान्नं भक्षयन्ति। बाला: धनुषबाणैः सह क्रीडन्ति। अतः अयमुत्सवः सर्वेभ्यः आनन्दकरः भवति। विजयादशमी दिने पर्यन्तं सर्वत्रं रामलीला भवति। रामलक्ष्मणयोः शोभायात्रा रंगमञ्चे आगच्छति। तत्पश्चात् रावण दहनं भवति। अस्य उत्सवस्य इयं शिक्षा यत् रामवत् कार्यं कर्त्तव्यं न रावणवत्। सदेव सदाचारः आचरितव्यः। धर्मस्य सदा विजयः भवति, अधर्मस्य च विनाशः।
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मम विद्यालये सर्वे अध्यापका: अनुशासनप्रियाः सन्ति। सर्वे एव स्नेहन छात्रान् पाठयन्ति। किन्तु संस्कृताध्यापक: ‘श्रीविद्याचरण:’ मम सर्वतोऽधिकः प्रियः अध्यापकः अस्ति। सः निजविषये प्रवीणः अस्ति। अस्य स्वभावः सरल: स्नेहपूर्णः च अस्ति। सः महता स्नेहन पाठयति। छात्रान् कदापि न दण्डयति। अस्य उच्चारणम् अतीव शुद्धं विद्यते। अस्य पाठनस्य विधिः समुचितः सरलः च वर्तते अतः सर्वे छात्रा: संस्कृतविषये श्रेष्ठान् अङ्कान् प्राप्नुवन्ति। सर्वे छात्रा: अध्यापकाः अपि अस्य सम्मानं कुर्वन्ति। प्रधानाचार्यः अपि तस्य आदरं करोति। सः स्वयं सदा नित्यं वदति, तथा छात्रान अपि पाठयति यत् ‘छात्राः, सदा सत्यं वदत। स्वाध्यायं नित्यं कुरुत’ इति। सः प्रतिवर्ष विद्यालये सांस्कृतिक समारोहस्य समायोजनं करोति। गणतंत्रदिवसस्य समारोहे स्वयं देशभक्ति गीतं गायति। श्रीविद्याचरणः सर्वेषामेव छात्राणां प्रियः शिक्षकः। असौ मम आदर्शः अस्ति।
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Sunday, 14 July 2019

भारत में समावेशी विकास एवं चुनौतियाँ

भारत में समावेशी विकास एवं चुनौतियाँ

भारत में समावेशी विकास एवं चुनौतियाँ

भारत में समावेशी विकास एवं चुनौतियाँ! Read this article in Hindi to learn about:- 1. भारत में समावेशी विकास से आशय (Concept of Inclusive Development in India) 2. समावेशी विकास की चुनौतियां (Challenges for Inclusive Growth in India) 3. सरकार द्वारा समावेशी विकास की दिशा में किये जा रहे प्रयास...

समावेशी विकास से तात्पर्य ऐसे विकास से है जिसमें तेज आर्थिक विकास, उच्‍च घरेलू विकास दर तथा अधिक राष्‍ट्रीय आय प्राप्‍त होती है और स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, स्‍वच्‍छ पेयजल, स्‍वच्‍छ पर्यावरण, पौष्‍टिक भोजन जैसी बुनियादी सुविधाओं का लाभ कमजोर वर्गों सहित सभी वर्गों तक पहुँचता है। इस प्रकार समावेशी विकास की रणनीति निर्धनता रेखा से नीचे रह रहे कमजोर वर्गों को रोजगार के अवसरों में वृद्धि तथा सामाजिक सेवाओं का लाभ वास्‍तव में इन तक पहुँचकर जीवन स्‍तर में गुणात्‍मक सुधार लाने पर केन्‍द्रित है।

अत: विकास एवं वितरण तथा सामाजिक न्‍याय को प्रभावी बनानेके लिए सामवेशी विकास अपरिहार्य है। यह विकासके वितरणात्‍मक पहलू पर बल देता है और समता के सैद्धान्‍तिक पहलू को न्‍याय के व्‍यवहारिक धरातल से मिलाकर विकास के सारे क्षेत्रों को स्‍वयं में समाहित करता है।
समावेशी विकास से आशय है कि :-
(1) आधारभूत वस्‍तुओं तक सबकी पहुँच हो।
(2) शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी, कमजोर वर्ग के लोगों को रोजगार वृद्धि प्रक्रिया से जोड़ा जाये तथा कृषि, ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में निवेश तथा आय वृद्धि के प्रभावी उपाय किये जायें।
(3) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग तथा अल्‍पसंख्‍यकों, कमजोर वर्गों, निर्धनों महिलाओं का सामाजिक तथा आर्थिक सशक्‍तिकरण हो।
(4) स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा आवास तथा खाद्य सुरक्षा पर सर्वाधिक सार्वजनिक व्‍यय किया जाये।
(5) वित्‍तीय समावेशन किया जाये।

विश्‍व बैंक में समावेशी विकास को गति और विकास की संरचना के रूप में परिभाषित किया है। यह वह गति है, जिसके साथ कोई अर्थव्‍यवस्‍था आगे बढ़ती है और लाभ अधिकमत लोगों तक पहुँचता है। इस धारणा के पीछे विकास की गरीबोन्‍मुख विचारधारा है, जिसका आशय ऐसे विकास से है, जिसमें सभी प्रकार के निर्धनों को प्रथमत: लाभ पहुँचे तथा नीतियाँ एवं कार्यक्रम सामान्‍यतय: उन लक्ष्‍यों को ध्‍यान में रखकर बनाये जायें, जिसमें उत्‍पादनों पर कार्य करने के बजाय गरीबों के बीच आय के पुर्नवितरण पर जोर हो। इसका उद्देश्‍य ऐसे समतामूलक समाज का निर्माण करना है जिसमें सभी वर्गों को उच्‍च गुणवत्‍तयुक्‍त स्‍वास्‍थ्‍य व खुशहाल जीवन जीने का समान अवसर मिल सके और सभी वर्गों के लोक एक ही प्रकार के खाद्यान्‍न, वस्‍त्र, मकान एवं जीवनशैली में गरिमामय जीवन जी रहे हो।

वास्‍तव में भारत के लिए समावेशी विकास कोई नयी अवधारणा नहीं है, बल्‍कि हमारी संस्‍कृति में निहित सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, सर्वे सन्‍तु निरामय: की सामाजिक परिकल्‍पना का व्‍यवहारिक रूप है, जिसे 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) में सर्वाधिक महत्‍व देते हुए सभी को विकास का सहभागी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

भारत में  समावेशी विकास की चुनौतियां


मानव विकास रिपोर्ट 2014, विश्‍व विकस रिपोर्ट 2012, राष्‍ट्रीय अपराध अभिलेख 2013 तथा मानवाधिकार संचायिका 2012 आदि के विश्‍लेषण भारत में विकास प्रक्रिया के नकारात्‍मक पक्षों को उजागर करते हुए समता मूलक समाज के अस्‍तित्‍व पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाते हैं। वास्‍तव में भारत की कुल आबादी का 1/3 से अधिक भाग ऐसा है, जो विकास की इस प्रक्रिया से कोसों दूर है। आज भी उसका जीवन रोटी, कपड़ा मकान जैसी मूलभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति में ही बीत जाता है।
संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ द्वारा सहस्‍त्राब्‍दी विकास लक्ष्‍य रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 1/3 गरीब भारत में रहते हैं, जो प्रतिदिन 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम में जीवन यापन करते हैं।

हालांकि आज भारत विश्‍व की दूसरी सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थवयवस्‍था बन चुका है, तथापि गरीब और अमीर के मध्‍य अंतर उत्‍तरोत्‍तर बढ़ता जा रहा है और सापेक्ष गरीबी बढ़ रही है। देश में कुल साक्षरता प्रतिशत 65.38 है, जो इस बात का परिचायक है कि जनसंख्‍या का बहुत बड़ा भाग आज भी विकास एवं समाज की मुख्‍य धारा से अलग है।

आंकड़ों के अनुसार विगत 17 वर्षों में लगभग 3 लाख किसानों द्वारा आत्‍महत्‍या, 2007-2012 के मध्‍य करीब सवा तीन करोड़ किसानों द्वारा अपनी जमीन बेंचकर शहरों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्य करने हेतु मजबूर होना आर्थिक विकास का लाभ किसानों तक न पहुँच पाना स्‍पष्‍ट दिखाता है।

सरकार द्वारा समावेशी विकास की दिशा में किये जा रहे प्रयासों में प्रमुख निम्‍नलिखित है:-
(1) वित्‍तीय समावेशन के माध्‍यम से समाज के असुरक्षित और कमजोर वर्ग को निवेश के अवसर और अर्थिक वृद्धि के लाभ हेतु धन उपलब्‍ध कराया जा रहा है। इसका उद्देश्‍य जमा और भुगतान खाता, साख बीमा और पेंशन जैसी व्‍यापक वित्‍तीय सेवाओं का लाभ सर्वसुलभ कराना है, इस विषयक प्रधानमंत्री जनधन योजना, स्‍वर्ण मौद्रीकरण योजना, मुद्रा बैंक, स्‍किल इण्डिया मिशन आदि प्रमुख हैं।

(2) भारत में प्रशासन की पहुँच सभी तक हो तथा अन्‍तिम छोर पर बैठा व्‍यक्‍ति भी सामाजिक, आर्थिक बदलाव का लाभ लेकर अपने जीवन स्‍तर को उन्‍नत बना सकें, इसके लिए डिजिटल इण्‍डिया कार्यक्रम की शुरूआत की गई है। इसके जरिए सरकार तथा प्रशासन को जवाबदेह एवं संवेदनशील बनायाजा सकेगा, साथ ही विभिन्‍न विभागों, योजनाओं में समन्‍वय हो सकेगा। ई-हेल्‍थकेयर, ई-कोर्ट, ई-पुलिस, ई-बैंकिंग आदि का विस्‍तार भी इसी के द्वारा सम्‍भव है।

(3) किसानों को विकास की इस प्रक्रिया से जोड़ने हेतु राष्‍ट्रीय क्रृषि बाजार, मृदा स्‍वास्‍थ्‍य योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, कृषि सिंचाई योजना, कृषि ऋण, डी.डी. किसान चैनल, कृषि बीमा योजना तथा ई-मण्‍डी आदि योजनाएं संचालित की जा रही हैं।

(4) प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, मेक इन इण्‍डिया, स्‍वच्‍छ भारत अभियान तथा जनजातियों के विकास हेतु वन बन्‍धु कल्‍याण योजना एवं महिलाओं की आर्थिक स्‍वतंत्रता व स्‍वावलम्‍बन हेतु बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं, सुकन्‍या समृद्धि योजना आदि समावेशी विकास की दिशा में संचालित की जा रही है।

(5) किन्‍तु समावेशी विकास का सामाजिक पक्ष जोकि भारतीय परम्‍परागत समाज की बुराइयों (जाति, धर्म, रूढि़याँ, अंधविश्‍वास) के कारण बाधित हे, उसे तमाम संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद समाज के बौद्धिक परिष्‍करण, मनोवृत्‍ति में परिवर्तन संवेदनशीलता, मानवीयता तथा शिक्षा में गुणात्‍मक बढ़ोत्‍तरी से ही सम्‍भव है, जो स्‍वयं से ही प्रारम्‍भ होता है।

अत: आज भारत में समतामूलक समाज के निर्माण हेतु विकास के उपरोक्‍त अवसरों को तर्कसंगत तरीके से हासिए पर स्‍थित वर्गों तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्‍पसंख्‍यकों को मुख्‍य धारा में लाकर क्षेत्र, भाषा, आयु, लिंग, सम्‍प्रदाय आदि कारकों के ऊपर उठते हुए सामाजिक न्‍याय एवं सामाजिक सुरक्षा, युक्‍तियुक्‍त विभेद तथा लक्षित विकास को समावेशी विकास का पर्याप्‍त बनाना ही होगा, तभी सभी लोग इस विकास से लाभान्‍वित होकर गरिमामय जीवन जीवन कल्‍पना को साकार कर सकेंगे।
अम्लीय वर्षा पर निबंध तथा टिप्पणी। Essay on Acid Rain and Its Effects in Hindi

अम्लीय वर्षा पर निबंध तथा टिप्पणी। Essay on Acid Rain and Its Effects in Hindi

अम्लीय वर्षा पर निबंध तथा टिप्पणी। Essay on Acid Rain and Its Effects in Hindi

दोस्तों आज अम्लीय वर्षा या एसिड रेन पर निबंध लिखा गया है। जब बरसात में पानी के स्थान पर अम्ल बरसता है तो इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। अम्लीय वर्षा का पीएच मान 7 से कम होता है। अम्लीय वर्षा पर लिखे गए इस Essay में आप ऐसे में आप इसके प्रभाव (Effects) व रोकथाम के बारे में जानेंगे।

हम सभी उस वर्षा के बारे में जानते हैं जो पानी बरसाती है। परंतु जब पानी के स्‍थान पर अम्‍ल बरसता है तो इसे अम्लीय वर्षा कहते हैं। बरसात का शुद्ध पानी पृथ्‍वी की तरफ आते समय रास्‍ते में सल्‍फर और नाइट्रोजन के आक्‍साइड से क्रिया करके अम्‍ल बनाता है। ये आक्‍साइड कहां से निकलते हैं? निस्‍संदेह उन उद्योगों से, जहां कोयला और तेल जलाया जाता है, तथा मोटर वाहनों के धुएं से निकलते हैं। इस तरह यह साबित हो जाता है कि अम्‍लीय वर्षा उन औद्योगिक गतिविधियों से होती हैं जो वायु को प्रदूषित करती हैं। इसके प्रमुख स्‍त्रोत वे बिजलीघर हैं जहां बिजली के उत्‍पादन के लिए कोयला जलाया जाता है। अधिकांश कोयले में सल्‍फर (गंधक) होती है जो कोयला जलाने पर सल्‍फर डाईऑक्‍साइड में बदल जाती है।

पानी की अम्‍लता या क्षारीयता पी. एच. (pH) पैमाने पर मापी जाती है। किसी द्रव में हाइड्रोजन आयन की सांद्रता ही पी एच की सूचक है। इस पैमाने में, कम पी एच का अर्थ है हाइड्रोजन आयन की अधिक सांद्रता तथा अधिक अम्‍लीयता। शुद्ध पानी का पी एच 7 होता है, जिसे उदासीन पी एच कहते हैं। पानी का पी. एच. 7 से कम होने पर वह अम्‍लीय बन जाता है 7 से ऊपर होने पर क्षारीय।

वर्षा के पानी में कार्बन डाईऑक्‍साइड घुल होने के कारण उसका पी एच अक्‍सर 7 से कम (पी. एच. 5.7, हल्‍का अम्‍ल) होता है, परंतु इतनी अम्‍लीयता क्षयकारी नहीं होती है। अम्‍लीय वर्षा के पानी का पी. एच. 2-5 होता है। इ‍तने कम पी एच का अर्थ है अधिक अम्‍लीयता जिसके परिणामस्‍वरूप अधिक क्षयकारी होना। इसलिए 4 पी. एच. का पानी 5 पी एच के पानी से दस गुना अधिक क्षयकारी होता है। जिस पानी का पी. एच. 3 हो वह 5 पी. एच. वाले पानी से 100 गुना अधिक क्षयकारी होता है। यदि ऐसा ही है कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि अम्‍लीय वर्षा जिसका पी.एच. 2 और 3 के बीच है, कितनी क्षयकारी होगी।

जैसा कि बताया जा चुका है कि बरसात के पानी के पी. एच 7 से कम होता है। फिर ऐसा क्‍या है जो वर्षा के साधारण जल को अम्‍लीय बनाता है, और फिर वही अम्‍लीय जल वर्षा के रूप में धरती पर बरसता है? यह परिवर्तन उद्योगों से निकली गैसों (सल्‍फर के आक्‍साइड) और वाहनों के धुएं से निकली गैसों (नाइट्रोजन के आक्‍साइड) के कारण आता है। ये गैसों पानी की बूंदों और बर्फ के क्रिस्‍टलों में घुलने से पहले आक्‍सीकारकों, उत्‍प्रेरकों और सूर्य की किरणों के प्रभाव में क्रिया करके तनु (पतला) अम्‍लीय घोल बनाती हैं। यह अम्‍लीय घोल धरती पर वर्षा, बर्फ, ओला, ओस और कुहरे के रूप में गिरता है। अम्‍लीय वर्षा की विशेष बात यह है कि उसे बनाने वाले कारक अलग जगह से उत्‍सर्जित होते हैं और अम्‍लीय वर्षा दूसरी जगह होती है। एक देश में उत्‍सर्जित प्रदूषक तत्‍व वातावरण में प्रवेश करते हैं, हवा के साथ उड़कर हजारों किलोमीटर दूर पहुंचते हैं और दूसरे देश की धरती पर अम्‍लीय वर्षा के रूप में बरस जाते हैं। उदाहरण के लिए इंग्‍लैंड और जर्मनी में उत्‍सर्जित प्रदूषक अम्‍लीय वर्षा के रूप में स्‍वीडन और नार्वे में जाकर बरसे थे। कनाडा हालांकि अमेरिका की तुलना में कम प्रदूषित गैसें वातावरण में छोड़ता है फिर भी अम्‍लीय वर्षा कनाडा में अधिक होती है। बरसात की कोई राष्‍ट्रीय सीमा नहीं होती है इसलिए दूसरे प्रदूषकों की तुलना में अम्‍लीय वर्षा एक विश्‍वव्‍यापी घटना है।

अठारहवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के समय से ही मनुष्‍य विभिन्‍न प्रकार के पदार्थों के निर्माण के लिए ऊर्जा के विभिन्‍न स्‍त्रोतों की खोज में लगा हुआ है। अन्‍तत: अधिक मात्रा में कोयला और ईंधन जलाना पड़ता है और ईंधन में मौजूद सल्‍फर डाईऑक्‍साइड में बदल जाती है- इस शताब्‍दी में यह गैस वातावरण में सबसे अधिक उत्‍सर्जित की गयी है।

अम्‍लीय वर्षा की समस्‍या 1950 के दशक के आरंभिक दिनों में प्रांरभ हुई। वातावरण में उत्‍सर्जित होने वाले धुएं की मात्रा कम करने के उद्देश्‍य से कोयला जलाना कम करने के लिए गैस सिलिंडरों का प्रयोग शुरू किया गया और ताप बिजलीघरों में कोयला जलने से उत्‍पन्‍न ज्‍वलनशील गैसों के साथ निकलने वाली उड़नशील राख को अलग करने के लिए संयंत्रों में प्रेसिपिटेटर लगाए गए। नए बिजलीघरों को शहरों से बहुत दूर स्‍थापित किया गया और इनमें बहुत ऊंची-ऊची चिमनियां (अक्‍सर 150 मीटर से भी ऊंची) लगाई गयीं, ताकि संयंत्र से निकली सल्‍फर डाईऑक्‍साइड दूर-दूर तक फैल जाए और धरती पर अधिक सांद्रता में न पहुंचे। परंतु ये उपाय भी काफी नहीं साबित हुए। ज्‍यादा सल्‍फर डाईऑक्‍साइड देर तक हवा में रहने से वह सल्‍फ्यूरिक अम्‍ल में बदल जाती है।

एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार वातावरण में हर साल लगभग 15 करोड़ टन सल्‍फर डाईऑक्‍साइड छोड़ी जाती है, जो बाद में सल्‍फ्यूरिक अम्‍ल में बदल जाती है। दो-तिहाई अम्‍लीय वर्षा सल्‍फ्यूरिक अम्‍ल के कारण होती है। मोटर वाहनों से निकले नाइट्रोजन के ऑक्‍साइड वातावरण में क्रिया करके नाइट्रिक अम्‍ल बनाते हैं। ऐसा अनुमान है कि प्रति वर्ष लगभग 40 करोड़ टन नाइट्रोजन के ऑक्‍साइड वातावरण में छोड़े जाते हैं।

वर्ल्‍ड रिसोर्सेज रिपोर्ट के मुख्‍य संपादक डान हेनरिक्‍सन के अनुसार अम्‍लीय वर्षा कुछ भी नहीं बख्‍शती है। जिसको बनाने में मनुष्‍य को कई दशक का समय लगा है और जिसे विकसित करने में प्रकृति को हजारों वर्ष लगे हैं, वह केवल कुछ ही वर्षों में नष्‍ट होकर खाक में मिल रहा है।

अम्‍लीय वर्षा के हानिकारक प्रभाव

अम्‍लीय वर्षा धरती पर फसलों और पौधों की वृद्धि में रुकावट डाल सकती है, जंगलों का नाश कर सकती है और मनुष्‍य के लिए श्‍वसन से संबंधित खतरनाक स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं पैदा कर सकती है। जर्मनी, स्‍विटजरलैंड और स्‍वीडन में लगभग आधे प्राकृतिक वन या तो खत्‍म हो गये हैं अथवा खत्‍म हो रहे हैं और ब्रिटेन में लगभग 60 प्रतिशत पेड़ सड़-गड़ रहे हैं। सबसे अधिक पृथ्‍वी का वह हिस्‍सा प्रभावित हुआ है जो पश्‍चिमी न्‍यूयॉर्क से प्रांरभ होकर पूरब में वरमौंट से लेकर, मेसच्‍यूसैटस से उत्तर कैरोलाइना तक फैला हुआ है। वरमौंट के सदाबहार वनोंके वृ‍क्षों की वृद्धि बार-बार अम्‍लीय वर्षा और कुहरे का सामना करते-करते धीमी हो गयी है। वृद्धि में गिरावट अम्‍लीय वर्षा ने कोलोरैडो के जंगलों में स्‍थित यैलोस्‍टोन नेशनल पार्क को भी प्रभावित किया है। तीस वर्ष पहले यहां लाल स्‍प्रूम वृक्षों और सुगंधित देवदारू वृक्षों का घना जंगल था। इनमें से कुछ वृक्ष तो 30 मीटर ऊंचे हैं, और कुछ सदियों पुराने हैं। दुख की बात यह है कि इनमें से अधिकांश वृक्ष अब मर रहे हैं और जंगल अनुपजाऊ पहाडि़यों में बदलते जा रहे हैं। इसी प्रकार की घटनाएं पश्‍चिमी जर्मनी उत्तरी गोलार्द्ध के कई दूसरे देशों में हो रहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले मध्‍य यूरोप में ही अम्‍लीय वर्षा से 50 करोड़ वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले वन नष्‍ट हो गये हैं।

नार्वे की लगभग 80 प्रतिशत झीलों और स्‍वीडन की लगभग 25 प्रतिशत झीलों में न तो मछलियां हैं और नही कोई अन्‍य जलीय जीव। संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका की लगभग 20 प्रतिशत झीलें बंजर हो गयी हैं- पानी बिल्‍कुल साफ है परंतु जीवनरहित। इन झीलों के निर्जीव होने के लिए कौन जिम्‍मेदार है? नि:सन्‍देह, अम्‍लीय वर्षा। यह पता चला है कि स्‍कैन्‍डीनेविया और कनाडा की ज्‍यादातर झीलों और नदियों में ट्राउट और सालमन मछलियों की संख्‍या अब बहुत कम हो गयी है। जब पी एच 5.5 से कम हो जाता है (अर्थात् अम्‍लीयता बढ़ जाती है), तब मछलियां प्रजनन नहीं कर पातीं। उनके अंडों से बच्‍चे नहीं निकल पाते। यदि कुछ निकल भी गये तो वे मर जाते हैं और यदि मरने से भी बच गये तो उनमें अनेक प्रकार की विकृतियां पैदा हो जाती हैं। वयस्‍क मछलियों में अम्‍लीय पानी उनकी हड्डियों से क्रिया करता है। उनकी हडि्डयों में कैल्‍शियम की मात्रा कम हो जाती है। मांसपेशियां तो स्‍वस्‍थ रहती हैं पंरतु हड्डियों के कमजोर होने से शरीर में विकृतियां उत्‍पन्‍न हो जाती हैं। उनके गलफड़ों में एल्‍यूमीनियम के यौगिक जमा हो जाने से उन्‍हें सांस लेने में भी तकलीफ होती है। जब पानी का पी एच इतना कम हो जाए कि वह अम्‍लीय होने लगे तब पानी में जमा पदार्थों के घुलने से एल्‍यूमीनियम यौगिक बनते हैं। उभयचर प्राणियों जैसे सैलामेन्‍डर के अंडे यदि अम्‍लीय पानी में दिए गए हों तो उनमें ठीक से विकास नहीं हो पाता है। साथ ही पानी में उगने वाले पौधों की किस्‍में और संख्‍या भी कम हो जाती है। लिली जैसे बड़े पौधे बिल्‍कुल समाप्‍त हो सकते हैं। अन्‍तत: झीलें चश्‍में दोनों ही जीवरहित हो जाते हैं। यहां तक कि पक्षी भी नहीं बच पाते हैं। अम्‍लीय पानी की झीलों के निकट रहकर प्रजनन करने वाले पक्षी जलकीटों को खाकर उनमें मौजूद एल्‍यूमीनियम की विषाक्‍तता का शिकार हो जाते हैं।

अम्‍लीय पानी की बरसात से मिट्टी की ऊपरी बह जाती है जिसके पश्‍चात यह अम्‍लीय पानी मिट्टी की निचली सतह में पहुंच जाता है और भूमिगत जल को अम्‍लीय बना देता है। पौधों की वृद्धि के लिए आवश्‍यक पोषक तत्‍व या तो बह जाते हैं अथवा पौधों को प्राप्‍त नहीं होते हैं। इसके विपरीत एल्‍यूमीनियम, सीसा और पारा जैसी अन्‍य धातुएं जो पौधों के लिए विषैली होती हैं अधिक घुलनशील हो जाती हैं और पौधों की वृद्धि कम कर देती हैं। इसका कुल परिणाम होता है पौधों को क्षति, उनकी कम वृद्धि और उनके रोगी हो जाने की अधिक संभावना।

आइए, अब निर्जीव वस्‍तुओं पर अम्‍लीय वर्षा का प्रभाव देखें। क्‍या पत्‍थरों को कौढ हो सकता है? संगमरमर (यह पत्‍थर मुख्‍यतया कैल्‍शियम कार्बोनेट का बना होता है) से बने स्‍मारकों, मूर्तियों, भवनों आदि को अम्‍लीय वर्षा का खतरा अधिक होता है। अम्‍लीय वर्षा में मौजूद सल्‍फ्यूरिक अम्‍ल कैल्‍शियम कार्बोनेट से क्रिया करके उसे जिप्‍सम (कैल्‍शियम सल्‍फेट) में बदल देता है जिसका आयतन संगमरमर से लगभग दोगुना होता है। इसके फलस्‍वरूप सतह पर दबाव उत्‍पन्‍न होता है जिससे पत्‍थर की परतें उतर जाती हैं, उसमें गड्डे हो जाते हैं और उसका क्षय हो जाता है। और तो और, बरसात सतह पर बने जिप्‍सम को धो डालती है जिससे सतह के ऊपर बनायी गयी आकृतियों को काफी क्षति पहुंचती है। जनसामान्‍य की भाषा में इस प्रक्रिया को पत्‍थर का कोढ़ कहा जाता है।

यह अनेक वर्षों से ज्ञात है कि शुद्ध वायु की अपेक्षा प्रदूषित वायु में स्‍टील और तांबे जैसी धातुओं की तेजी से क्षति होती है। चूने के पत्‍थर पर भी अम्‍लों का प्रभाव पड़ता है इसलिए अनेक शहरों में चूने के पत्‍थर से बनी इमारतों और मूर्तियों को क्षति हो रही है।

विश्‍व के सात आश्‍चर्यों में से एक, ताजमहल को भी अगरा के समीप ही मथुरा में स्‍थि‍त तेल शोधक कारखाने से निकली अम्‍लीय गैसों के कारण पत्‍थरों का कोढ़ हो रहा है। यूनानी शिल्‍पी फिडियास द्वारा पांचवीं शताब्‍दी ईसा पूर्व में निर्मित नारी स्‍तंभ अथवा संगमरमर से निर्मित कुमारियों की 6 मूर्तियां 2500 वर्षों से यूनान की राजधानी एथन्‍स की शोभा थीं। परंतु 1977 में उन्‍हें हटाकर संग्रहालय में रख दिया गया है। इसका कारण भी अम्‍लीय वर्षा है। 1960 के दशक में इन मूर्तियों का काफी क्षरण हो गया था, इसलिए इनके जैसी फाइबर की मूर्तियां बनाकर वहां लगाई गई हैं। ब्रिटेन में भी अम्‍लीय वर्षा से काफी नुकसान हुआ है जिसके प्रमाण कैन्‍टरबरी, आक्‍सफोर्ड और लंदन की ऐतिहासिक इमारतों के क्षरण से मिलते हैं।

अम्‍लीय वर्षा ने अंतर्राष्‍ट्रीय समस्‍याओं को एक नया आयाम दिया है। यह राष्‍ट्रों के कूटनीतिक संबंधों के बीच किरकिरी साबित हो सकती है। उदाहरण के लिए पश्‍चिमी जर्मनी और स्‍वीडन के रिश्‍तों में दरार है क्‍योंकि स्‍वीडन की लगभग 20 प्रतिशत झीलें जर्मनी के रूहर औद्योगिक क्षेत्र से निकली अम्‍लीय गैसों से हुई अम्‍लीय वर्षा से प्रभावित हैं। यहां तक कि स्‍वीडन के स्‍कूली बच्‍चों ने इन गैसों के उत्‍सर्जन के लिए पश्‍चिमी जर्मनी के विरुद्ध एक पोस्‍टकार्ड अभियान भी चलाया था।

इंग्‍लैंड और उसके पड़ोसी देशों के बीच भी कोई ज्‍यादा अच्‍छे संबंध नहीं हैं और स्‍कैन्‍डीनेविया अपने देश में अम्‍लीय पानी जमा होने के लिए इंग्‍लैंड को दोषी मानता है। अम्‍लीय वर्षा के विवाद को लेकर अमेरिका और कनाडा के रिश्‍तों में भी तनाव है। कनाडा में जमी लगभग आधी सल्‍फर अमेरिका से आती है और उत्तर-पूर्वी अमेरिका में जमा लगभग 20 प्रतिशत सल्‍फर कनाडा की देन है।

भारत में अभी इस विपत्ति का गंभीर खतरा नहीं पैदा हुआ है क्‍योंकि यहां के कोयले में सल्‍फर की मात्रा कम (0.5-0.7 प्रतिशत) होती है। दूसरे देशों, विशेषकर अमेरिका में बिटुमिनस की खानों में सल्‍फर की मात्रा 6-8 प्रतिशत होती है। इस कोयले को जलाने से अधिक मात्रा में सल्‍फर डाईऑक्‍साइड निकलती है। फिर भी भारत में लगातार अत्‍यधिक सतर्कता की आवश्‍यकता है, क्‍योंकि मुंबई, कलकत्ता और दिल्‍ली जैसे शहरों में वातावरण में सल्‍फर डाईऑक्‍साइड की मात्रा काफी अधिक है।

अम्‍लीय वर्षा और मानव स्‍वास्‍थ्‍य के बीच अभी भली-भांति सीधा संबंध स्‍थापित नहीं किया गया है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि अधिक समय तक अधिक सल्‍फर डाईऑक्‍साइड युक्‍त वायु में सांस लेने से श्‍वसन संबंधी बीमारियां, जैसे वातस्‍फीति, दमा और स्‍वसनिका दमा, हो जाती है। जलस्‍त्रोतों और पानी के पाइपों में अम्‍लीय जल की उपस्‍थिति से भारी धातुएं घुलकर जल आपूर्ति में मिल सकती हैं जिनसे गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं उत्‍पन्‍न हो सकती हैं।

अम्‍लीय वर्षा की रोकथाम और नियंत्रण

अम्‍ल के जमाव पर नियंत्रण पाना इतना आसान नहीं है क्‍योंकि यह अनेक प्रकार की मानक गतिविधियों से जुड़ा है। परंतु स्‍थिति काबू से बाहर न हो जाए इसके लिए अभी से निम्‍नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए:
  • जिन बिजलिघरों में ईंधन के रूप में कोयले का इस्‍तेमाल होता है उन्‍हें कम सल्‍फर वाला कोयला इस्‍तेमाल करना चाहिए अथवा ऐसा ईंधन इस्‍तेमाल करना चाहिए जिससे प्रदूषण कम हो।
  • जहां कहीं जरूरी हो, जैसे कि प्रगलकों में, वहां सल्‍फर डाईऑक्‍साइड को अवशोषित करने की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए।
  • मोटर वाहनों में कैटालिटिक कन्‍वर्टर लगाने चाहिए ताकि वे धुएं को साफ रखें (नाइट्रोजन के ऑक्‍साइड अहानिकारक हो जाते हैं और कार्बन मोनोआक्‍साइड कार्बन डाईआक्‍साइड में बदल जाती है।) इंजनों को अच्‍छी तरह ट्यून होना चाहिए जिससे धुएं से निकलने वाली गैसों की मात्रा कम हो।
  • उत्‍सर्जन नियंत्रण का सख्‍ती से पालन होना चाहिए।