Saturday, 15 June 2019

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi


श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi


श्रीनिवास रामानुजन अय्यंगार यांचा जन्म २२ डिसेंबर १८८७ रोजी तामिळनाडू प्रांतातील इरोड या गावी झाला. त्यांच नाव संत रामानुजा यांच्यावरुन ठेवण्यात आल होत. त्यांचे वडील श्रीनिवास अय्यंगार एका कापडाच्या व्यापारीकडे नोकरी करत होते. त्या व्यवसायातील प्राप्ती अत्यंत तुटपुंजी असल्याने त्यांनी आपला मुक्काम कुंभकोणम या टुमदार शहरात हलवला आणि एका व्यापार्‍याकडे मुनिमाची नोकरी करण्यास सुरुवात केली.

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi
रामानुजन यांचे गणितातील ज्ञान आश्चर्यकारक होते व त्यातील बहुतेक त्यांनी स्वतःच प्राप्त केलेले होते. परंपरित अपूर्णांकासंबंधी यापूर्वी काय विकसित केले गेलेले आहे यासंबंधी त्यांना आजिबात माहिती नव्हती, तरीही या विषयातील त्यांचे प्राविण्य त्या काळच्या इतर गणितज्ञांच्या तुलनेने अनन्यसाधारण होते. विवृत्तीय समाकल [⟶ अवकलन व समाकलन ], अतिगुणोत्तरीय श्रेढी [⟶ श्रेढी ], रीमान श्रेढी, झीटा फलनाची समीकरणे व त्यांचा स्वतःचा अपसारी श्रेढींसंबंधीचा सिद्धांत हे त्यांनी स्वतः संशोधन करून शोधून काढले. याउलट गणितातील पद्धतशीर प्रशिक्षण न मिळाल्याने किंवा उत्तम दर्जाच्या ग्रंथालयाचा उपयोग करण्याची संधी उपलब्ध न झाल्याने त्यांच्या ज्ञानातील वैगुण्येही तितकीच आश्चर्यकारक होती. गणितीय सिद्धतेविषयीची त्यांची कल्पना अतिशय संदिग्ध होती. 

मद्रासच्या श्रीनिवास रामानुजन या एका सामान्य कारकुनाचं असामान्य गणिती ज्ञान मद्रासचा इंग्रज कस्टम ऑफिसर ट्रिनीटी कॉलेजमधील जी. एच. हार्डी या गणितज्ञाच्या लक्षात आणून देतो. हार्डी त्याला १९१३ साली केंब्रिजला बोलावून घेतो. रामानुजनची विधवा सनातनी आई समुद्रपर्यटन निषिद्ध मानणारी असते. तिची समजूत घालून आणि तरुण पत्नीला घरी सोडून रामानुजन इंग्लंडला पोचतो. रामानुजनचे निर्भेळ गणिती सिद्धान्त बरोबर असले तरी त्यासाठी इतर गणितज्ञांना पटतील असे पुरावे देण्याचा आग्रह हार्डी धरतो. त्यावरून दोघांमध्ये वाद होतात. रामानुजनचे सिद्धान्त केम्ब्रिजच्या दृढ्ढाचार्यांना मान्य करायला लावून त्याला रॉयल सोसायटीचा फेलो करण्याचा हार्डीचा पहिला प्रयत्न असफल होतो, पण दुसऱ्या खेपेस यशस्वी होऊन रामानुजनला फेलो होण्याचा मान मिळतो.

रामानुजनच्या मते प्रत्येक समीकरण ईश्वराशी निगडित असतं, तर हार्डी पडला पूर्ण नास्तिक. पण ही मतभिन्नता त्यांच्या बौद्धिक किंवा वैयक्तिक मैत्रीच्या आड येत नाही. हे होत असताना पाच वर्षांच्या इंग्लंडमधील वास्तव्यात रामानुजनला क्षयाची सुरुवात झालेली असते. शाकाहारी रामानुजनच्या जेवणाचेही हाल होतात. भारतात परतल्यावर एका  वर्षातच वयाच्या ३२ व्या वर्षी तो मृत्यू पावतो. इंग्लंडमधील टॅक्सीत बसण्याच्या वेळेस तिचा १७२९ हा नंबर दोन घनांची बेरीज असलेला सर्वांत लहान आकडा आहे हे रामानुजन दाखवून देतो. गणितातल्या अशा काही विक्षिप्त संख्यांना आजही taxicab numbers असं संबोधलं जात.
विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन का जन्‍म 27 मार्च, 1845 को जर्मनी के लेन्‍नेप में हुआ और वह नीदरलैंड में पले-बढ़े। उन्‍होंने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की ओर 1869 में पीएच.डी. की डिग्री प्राप्‍त की। रॉटजन ने सन् 1901 के एक्स रे की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार जीता। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लैबोरेटरी असिस्‍टेंट के रूप में कार्य किया। इसके बाद कुछ जगह प्रोफरेसर, कहीं डायरेक्‍टर बनकर स्‍कॉलर के रूप में ऊपर उठते गए।
विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi
Wilhelm Rontgen
रॉटजन ने 8 नवंबर, 1895 को संयोगवश ही एक खोज कर ली, जब वह क्रूक्‍स ट्यूब (एक कांच की निर्वात नली, जिसके दोनों ओर इलेक्‍ट्रॉड थे) से होने वाले उत्‍सर्जन की जांच कर रहे थे। जिस उत्‍सर्जन को रॉटजन देख रहे थे। वह कैथोड किरणें थीं, जो अत्‍यधिक गति वाले इलेक्‍ट्रॉन्‍स से बनी थीं, जिससे नेगेटिव इलेक्‍ट्रॉड बाहर आते थे, जब क्रूक्‍स ट्यूब के इलेक्‍ट्रॉड पर वोल्‍टेज एप्‍लाई किया जाता, तब निर्वात पर्याप्‍त शक्‍तिशाली होता है और वोल्‍टेज उस पर एप्‍लाई किया जाता है तब कैथोड किरणें निर्वात नली को चमका रही थीं। यह वह चमक थी, जिसे विलहम कॉनरैड रॉटजन देख रहे थे, जब उन्‍होंने अपनी खोज की।
रॉटजन एक एलयूमिनियम खिड़की के बिना क्रूक्‍स टृयूब का उपयोग कर रहे थे और उन्‍होंने नली को काले गत्‍ते से घेरा हुआ था, ताकिवह ट्यूब को चमकते हुए अच्‍छे तरीके से देख सकें। इसलिये जब उन्‍होंने ने देखा कि एक चमक बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन से आ रही है, जो थोड़ी ही दूर थी, वह जानते थे कि इसका कारण कैथोड किरणें नहीं हैं, क्‍योंकि कैथोड किरणें न तो कांच की नली से, न ही गत्‍ते से गुजर सकती हैं। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने इसे प्रमाणित करने के लिये कई और परीक्षण किये के क्रूक्‍स ट्यूब उस उत्‍सर्जन का स्‍त्रोत है, जो स्‍क्रीन को चमका रहा है। उन्‍होंने अनुमान लगाया कि ये उत्‍सर्जन उनकी तरह के सभी उत्‍सर्जनों में उपस्‍थित थे, लेकिन वह पहले थे, जिन्‍होंने इन्‍हें नोटिस किया।
विलहम कॉनरैड रॉटजन ने नये खोजे हुए उत्‍सर्जन को एक्‍स-रे (गणित में एक्‍स अज्ञात का प्रतीक है) ना‍म दिया और इसके प्रमाण के लिये आगे और कार्य किया। उन्‍होंने देखा कि मेज की दराज में एक फोटोग्रॉफिक प्‍लेट रखी थी, उसी कमरे में, जिसमें क्रूक्‍स ट्यूब थी और नोटिस किया कि वह अनावृत हो गई है। जब उन्‍होंने इसे विकसित किया, तो उन्‍हें उस पर चाबी की इमेज मिली, जो मेज पर रखी थी, उन्‍हें समझ में आया कि एक्‍स-रे आसानी से मेज की लकड़ी के पार हो जाती है, लेकिन चॉबी की धातु से कम अंश में। बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन और एक क्रूक्‍स ट्यूब का उपयोग करके विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लेड की डिस्‍क की एक इमेज उत्‍पन्‍न की और उनकी उंगलिया की हड्डी की, जो उस डिस्‍क को पकड़े हुए थीं।
उनके प्रयोगों ने यह दिखा दिया एक्‍स-रे अलग-अलग सामाग्रियों से अलग-अलग अंशों में पार होती हैं। जब उनकी इस खोज को सार्वजनिक किया गया, तो सारे विश्‍व में एक्‍स-रे के बारे में सनसनी फैल गई। इसे विलहम कॉनरैड रॉटजन किरणें का नाम भी दिया गया। रोग की पहचान में इसके चिकिस्‍तकीय उपयोग तुरंत ही प्रारंभ हो गये। एक्‍स-रे का इस्‍तेमाल चिकित्‍सीय उपचार, दंत परीक्षण, औद्योगिक निरीक्षण और कई दूसरे क्षेत्रों में किया जाने लगा। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने अपने तीन वैज्ञानिक पत्रों में एक्‍स–रे के कई आधारभूत नियमों का वर्णन किया, जो 1895, 1896 और 1897 में प्रकाशित हुए। उन्‍हें 1901 में नोबल पुरस्‍कार मिला। 10 फरवरी, 1923 को उनका निधन हो गया। 
बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi
Poem on Clouds in Hindi : दोस्तों आज हमने बादल पर बाल कविताएं लिखी है क्योंकि बादल हमारे जीवन में एक अहम स्थान रखते हैं वे बरसात कराते हैं धरती की प्यास बुझाते हैं। बादल बच्चों को बहुत आकर्षक लगते हैं। इसीलिए आज हमने बादल पर कुछ कविताएं पोस्ट की हैं जो छोटे बच्चों को बहुत पसंद आएँगी। 

यदि मैं बादल बन जाऊं

कितना ही अच्छा हो,
यदि मैं बादल बन जाऊं। 
नीले नीले आसमान में,
इधर-उधर मंडराऊं। 
जब भी देखूं सूखी धरती,
झट से पिघल में जाऊं। 
गर्मी से तंग लोगों को,
ठंडक में पहुंचाओ। 
खुशी खुशी से गड़ गड़ करके,
छम छम बुंदे लाऊं। 
इसीलिए तो कहता हूं,
मैं बादल बन जाऊं। 
लेखक : अज्ञात 

झूम-झूम कर बरसे बादल।

झूम-झूम कर बरसे बादल।
गरज-गरज कर बरसे बादल॥
समन्दर से भर कर पानी।
घूमड़-घूमड़ कर बरसे बादल॥
काले, भूरे और घने ये।
सब हिल-मिलकर बरसे बादल॥
खेत, खलिहान, नदी, नालों पर।
ठहर-ठहर कर बरसे बादल॥
जीवन, जहीर और जॉन के।
खुले सिर पर बरसे बादल॥
प्रेम-प्यार और अमन चैन का।
आंचल भर कर बरसे बादल॥
लेखक : परमानंद शर्मा 'अमन'
प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे किसी भी मनचाहे आकार में ढाला जा सकता है। यह अन्य सामग्रियों की तुलना में सस्ती होती है तथा टिकाऊ भी होती है। यह हमारे प्रतिदिन के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन किसी भी दूसरी चीज की तरह प्लास्टिक के कई फायदे हैं तो इससे नुकसान भी हैं। यह हमारे पर्यावरण के लिए हानिकारक है। यह आसानी से अपघटित नहीं होती और इसे जलाने पर वायुमंडल प्रदूषित होता है। 

प्लास्टिक के हानिकारक प्रभाव : जब प्लास्टिक का निर्माण किया जाता है तो इसके निर्माण के दौरान विषैला धुआ निकलता है। जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए तो उत्तरदाई है ही, वायु प्रदूषण भी फैलाता है। प्लास्टिक के सामान नालियों को चोक करते हैं और सीवरेज सिस्टम को नष्ट करते हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि इन चीजों के उपयोग पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाए। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जन जागरूकता आवश्यक है।

महासागरीय प्रदूषण : प्लास्टिक की वस्तुओं का आसानी से क्षय  नहीं होता इसलिए उन्हें समुद्र में छोड़ दिया जाता है। समुद्र में प्लास्टिक का तेजी से क्षरण होता है। लेकिन क्षरण के दौरान यह समुद्र में हानिकारक विषय रसायन विसर्जित करती है, जिससे समुद्र में रहने वाले जलीय जीवो पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समुद्र में विभिन्न प्रकार का कचरा फेंका जाता है जैसे :-प्लास्टिक के बर्तन, पॉलीथिन, बोतलें आदि जो समुद्र में तैरते रहते हैं। नतीजतन समुद्र के भीतर पर्याप्त मात्रा में सूरज का प्रकाश प्रवेश नहीं कर पाता। इस प्रकार यह समुद्र के भीतर वनस्पतियों के विकसित होने में बाधा उत्पन्न करता है। 

उपसंहार : जहां समस्या होती है वहां समाधान भी होता है। इसी तरह प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का भी समाधान है। हमें अपनी धरती को स्वच्छ, रहने योग्य और प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए केवल एक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।  आज हम जिस प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का सामना कर रहे हैं। उस पर अंकुश लगाने के लिए हमें कुछ उपाय अपनाने होंगे जैसे रीसाइकिल्ड और बायोडिग्रेडेबल सामग्री का उपयोग करना। हमें प्लास्टिक बैग के स्थान पर पेपर बैग या जूट के बने हुए बैग का उपयोग करना चाहिए। प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण या बिक्री पर रोक लगाने के लिए नियमों को अधिक सख्त बनाने की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि ऐसे उत्पादों के किसी भी अवैध निर्माण या बिक्री से संबंधित मामले की सख्ती से जांच होनी चाहिए। 
वृक्षारोपण पर अनुछेद लेखन। Vriksharopan par Anuched Lekhan

वृक्षारोपण पर अनुछेद लेखन। Vriksharopan par Anuched Lekhan

वृक्षारोपण पर अनुच्छेद लेखन। Vriksharopan par Anuched Lekhan

वृक्षारोपण पर अनुछेद लेखन। Vriksharopan par Anuched Lekhan
वृक्षों का महत्व हमें अच्छी तरह से ज्ञात है, वृक्षारोपण की बात अब सेमिनारों और बैठकों में चर्चा तक ही सीमित नहीं रह सकती। अब समय आ गया है कि वृक्षारोपण को वास्तव में क्रियान्वित किया जाए। हमें पहले ही देर हो चुकी है और अब इसमें देरी नहीं की जा सकती। तेजी से औद्योगिकीकरण और लापरवाह वनों की कटाई ने पर्यावरण के साथ पहले ही कहर बरपा दिया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और वन क्षेत्र के परिणामस्वरूप गिरावट ने भारी जलवायु परिवर्तन लाए हैं। हम प्राकृतिक आपदाओं का आसान शिकार हैं। वन्यजीवों की कई प्रजातियों के विलुप्त होने से ईको-सिस्टम में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई है। प्राकृतिक संसाधनों जैसे पेयजल, तेल, खनिजों आदि की कमी या नुकसान, मनुष्य के लिए एक खतरनाक खतरा बन जाता है। यह सब इसलिए हुआ है क्योंकि आदमी लालची और गैरजिम्मेदार बन गया है। इसलिए मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध को एक झटका लगा है। उपाय अधिक से अधिक पेड़ लगाने में निहित है। हम एक स्थायी दुनिया तभी हासिल कर सकते हैं जब हम अपने पर्यावरण की देखभाल करना सीखेंगे। हमारा बहुत अस्तित्व पर्यावरण के अच्छे स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, और पेड़ों का रोपण इस दिशा में एक कदम है। वृक्षों के इस व्यापक महत्त्व को देखते हुए हर वर्ष वन महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इस मौके पर स्कूलों तथा कॉलेजों में वृक्षारोपण का कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
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मार्कस टुलियस सिसरो की जीवनी। Marcus Tullius Cicero Biography in Hindi

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मार्कस टुलियस सिसरो की जीवनी। Marcus Tullius Cicero Biography in Hindi

मार्कस टुलियस सिसरो की जीवनी। Marcus Tullius Cicero Biography in Hindi
नाम : मार्कस टुलियस सिसरो
रोम : राजनीतिज्ञ और वक्‍ता
जन्‍म : 3 जनवरी 106 ईसा पूर्व
मृत्‍यु : 7 दिसंबर, 43 ईसा पूर्व
मार्कस टुलियस सिसरो एक राजनीतिज्ञ थे। हालांकि उनका एक शानदार राजनीतिक करियर था, लेकिन वह रोम के सर्वश्रेष्‍ठ वक्‍ता और एक लेखक के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्‍म 3 जनवरी 106 ईसापूर्व अर्पिनम में हुआ था। सिसरो को अंग्रेजी में टूलि के नाम से जाना जाता है। एक युवा के रूप में उन्‍होंने रोम में कानून, साहित्‍य और दर्शनशास्‍त्र की पढ़ाईकी थी। कुछ दिनों तक सेना की नौकरी करने और तीन साल तक एक वकील के रूप में कार्य करने के बाद, ग्रीस और एशिया की यात्रा की। उन्‍होंने अपना अध्‍ययन भी जारी रखा। वह 77 ईसा पूर्व रोम वापस आये आपना राजनीतिक करियर प्रारंभ किया। राजनीतिज्ञ और सेनाध्‍यक्ष पॉम्‍पे से जुड़ गये। 74 ईसा पूर्व सीनेट में प्रवेश करने में सफल रहे।


हालांकि सिसेरो का परिवार रोम के अभिजात वर्ग से संबंधित नहीं था, लेकिन 64 ईसा पूर्व कानसुलशिप की प्रतिस्‍पर्धा  के लिये सबसे समृद्ध और शक्‍तिशाली रोमनिवासियोंने उनका समर्थन किया था, क्‍योंकि उन्‍हें उनके प्रतिद्वंद्वी कैटिलिने के प्रति कम सम्‍मान था। सिसेरा चुन लिये गये, लेकिन उनके प्रशासन के दौरान कैटिलिने ने सरकार को उखाड़ फेंकने के लिये एक षड्यंत्र रचा। सिसेरो ने षड्यंत्र को दबा दिया और कैटिलिनों के समूह के कईं लोगों की हत्‍या करवा दी। जूलियस सीजर और दूसरे रोमन सिनेटर ने तर्क दिया की सिसेरो ने बहुत जल्‍दबाजी में कार्य किया, षड्यंत्रकारियों को कानूनी तरीके से अपने बचाव का अवसर नहीं दिया गया, क्‍योंकि सिसेरो ने पॉम्‍पे के मुख्‍य प्रतिद्वंद्वी सीजर के साथ शांति स्‍थापित करने से इंकार कर दिया था, इसलिये 58 ईसा पूर्व उन्‍हें निर्वासनके लिये विवश किया गया। एक वर्ष मेसिडोनिया में बिताने के बाद पॉम्‍पे के उकसाने पर उन्‍हें बुला लिया गया।

51 ईसा पूर्वतक सिसेरो ने खुद को दर्शनशास्‍त्र पढ़ने और लिखने में व्‍यंस्‍त रखा, इसके बाद उन्‍होंने सिलिसिया प्रांत के प्रशासन को चलाने की जिम्‍मेदारी स्‍वीकार की। वह 50 ईसा पूर्व रोम वापस आये और पाम्‍पे के साथ काम करने लगे, जो अब सीजर का कटट्र शत्रु हो गया था। 48 ईसा पूर्व सीजर द्वारा पाम्‍पे को हराने के बाद सिसेरो को महसूस हुआ कि अब और प्रतिरोध करना बेकार है। उन्‍होंने सीजर के राजनीतिक मित्रता के प्रस्‍ताव की स्‍वीकार कर लिया, जबकि सीजर एक वास्‍तविक तानाशाह था, सिसेरो एक निजी नागरिक के तौर पर जीवन बिताते थे और इस दौरान उन्‍होंने अत्‍यधिक लेखन कार्य किया। 44 ईसा पूर्व सीजर की हत्‍या के बाद सिसेरो राजनीति में वापस आये। इस आशा के साथ कि प्रजातंत्र की पुन: बहाली हो जाएगी। उन्‍होंने रोमन कॉनसल मार्क एंटोनी के साथ सत्‍ता संघर्ष में सीजर के दत्‍तक पुत्र ओक्‍टेवियन और एंटोनी में समझौता हो गया और सिसेरा को रोम से निषिद्ध कर दिया गया। 7 दिसंबर, 43 ईसा पूर्व उनकी हत्‍या हो गई।

अपने लेखन में सिसेरो ने समृद्ध गद्य शैली का सृजन किया था, जिसका यूरोप की सभी साहित्‍य‍ि‍क भाषाओं पर व्‍यापक प्रभाव पड़ा। उनके लेखन में विविध विषयों को समेटा गया, जिनमें प्रबुद्ध लोगों की रुचि थी। उनके लगभग सभी दार्शनिक कार्य ग्रीक स्‍त्रोतों से उधार लिये गये थे और उनकी स्‍वाभाविक विशेषताओं के अलावा, अधिकतर ग्रीक दर्शन को संरक्षित करने में इनका अत्‍यधिक मूल्‍य है। उनके ऑन द रिपब्‍लिक, ऑन द लॉज, ऑन ड्यूटी और ऑन द नैचर ऑफ गॉड पर जो लेख हैं, असाधारण हैं। एक वक्‍ता रूप में बोले गये उनके जो कार्य हैं, जिन्‍हें संवादों के रूप में लिखा गया, विशेष रूप में ‘ऑन द ओरेटर’—एक उत्‍कृष्‍ट वक्‍ता के उत्‍पाद और ऐतिहासिक सामाग्री के समृद्ध स्‍त्रोत के रूप में इनका अत्‍यधिक मूल्‍य है। एक वक्‍ता के रूप में उनके चार भाषण सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं, जो उन्‍होंने कैटिलिने के विरुद्ध दिये थे और चौदह, जो एंटोनी के विरुद्ध फिलिप्पिक्‍स कहलाते हैं।

सिसेरा के कार्यों में ऑन ओल्‍ड एज और ऑन फ्रेंडशिप की हमेशा सौहार्द शैली के लिये प्रशंसा की जाती है। इतिहासकारों के लिये सबसे महत्‍वपूर्ण है, सिसेरा द्वारा अपने जान-पहचान के लोगों और मित्रों को लिखे पत्रों के चार संग्रह। ये पत्र रोमन रिपब्लिक के अंतिम वर्षों की राजनीति पर जानकारी प्राप्‍त करने के बहतरीन स्‍त्रोत हैं।  
यूक्लिड का जीवन परिचय। Euclid ka Jivan Parichay

यूक्लिड का जीवन परिचय। Euclid ka Jivan Parichay


यूक्लिड का जीवन परिचय। Euclid ka Jivan Parichay

नाम : यूक्लिड
उपनाम : ज्‍यामिती के पिता
जन्‍म : 350 ईसवी
जन्मस्थान : ग्रीस

यूक्लिड (Euclid) ग्रीक गणितज्ञ थे, जो ईसा से लगभग ३२५ वर्ष पूर्व हुए थे। यूक्लिड ने एलिमेण्ट्स (Elements) नामक एक पुस्तक लिखी जो 13 खंडों में विभाजित है। इनमें प्‍लेन ज्‍योमेट्री, प्रपोर्शन इन जनरल, द प्रापर्टीज ऑफ नंबर्स, इनकमेनसुरेबल मैग्‍नीट्यूड्स और सॉलिड ज्‍यामेट्री जैसे विषय शामिल थे। उन्हें "ज्यामिति का जनक" कहा भी जाता है। यह मिस्र से सम्राट टॉलेमी प्रथम (Ptolemy 1st) के, जिसने ईसा से ३०६ वर्ष पूर्व से २८३ वर्ष पूर्व तक राज्य किया था, समकालीन थे। संभवत : उनकी शिक्षा एथेंस में प्‍लेटो के शिष्‍यों के द्वारा हुई। वह अलेक्‍़जेंद्रिया में ज्‍यामिती पढ़ाते थे और वहां उन्‍होंने गणित के एक विद्यालय की भी स्‍थापना की। 

युक्‍लिड को द डाटा (ए कलेक्‍शन ऑफ ज्‍योमेट्रिकल थ्‍योरम्‍स); द फिनॉमिना (द डिस्‍क्रिप्‍शन ऑफ हेवन्‍स); द ओप्टिक्‍स; द डिवीजन ऑफ स्‍केल, ए मेथेमेटिकल डिस्‍कशन ऑफ म्‍युजि़क और भी कईं किताबें लिखने का श्रेय जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इन सभी कार्यों (एलीमेंट्स के अलावा) का श्रेय उनको गलत तरीके से दिया गया है। इतिहासकार उनके दूसरे योगदानों की मौलिकता पर असहमत हैं।

संभवत: एलीमेंट्रस का जो ज्‍यामितीय भाग है, वह प्राथमिक रूप से पूर्व के कई गणितज्ञों, जैसे यूडोक्‍सस के कार्यों की पुनर्व्‍यस्‍था था, लेकिन युक्‍लिड का स्‍वयंयह मानना था कि उन्‍होंने अंको के सिद्धांतों में कईं मौलिक खोजें की हैं।

युक्‍लिड की एलीमेंट्रस को करीब 2000 वर्षों से मूलग्रंथ के रूप में पढ़ा जा रहा है और यहां तक कि आज भी उनकी पहली कुछ पुस्‍तकों के रूपांतरित संस्‍करण प्‍लेन जयामिती में हाईस्‍कूल इंस्‍ट्रक्‍शन का आधार बनाते हैं। युक्‍लिड के कार्यों का पहला छपा हुआ संस्‍करण अरबी से लैटिन में किया हुआ अनुवाद था, जो 1482 में वेनिस में प्रकाशित हुआ। 1798 ई० में इस गणितज्ञ की स्मृति में यूक्लिड नाम का शहर बसाया गया, जो अमरीका के ओहायो प्रांत में है।

Friday, 14 June 2019

अगाथा क्रिस्‍टी का जीवनपरिचय। Agatha Christie Biography in Hindi

अगाथा क्रिस्‍टी का जीवनपरिचय। Agatha Christie Biography in Hindi

अगाथा क्रिस्‍टी का जीवनपरिचय। Agatha Christie Biography in Hindi

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अगाथा क्रिस्‍टी अंग्रेजी उपन्‍यासकार थीं, जिन्‍होंने रहस्‍य से भरी बहुत सारी कहानियां लिखी हैं। उनका पूरा नाम अगाथा मैरी क्लरिस्सा क्रिस्टी था। अगाथा का जन्‍म 15 सितंबर 1890 को टॉर्के, डेवन, में एक धनी उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता अमरीकी थे और माता इंग्लैंड से थीं। उन्होंने ‘द़ मिस्टीरियस अफेयर ऍट स्टाइल्स’ (The Mysterious Affair at Styles) से अपने लेखकीय करियर की शुरूआत की जो 1920 में प्रकाशित हुआ। अगाथा क्रिस्टी विश्व की महानतम महिला लेखिकाओं मे गिनी जाती हैं। उनकी रहस्‍यमय कहानियां की सबसे खास बात यह थी कि वह कथा-वस्‍तु में चतुर और आश्‍चर्यजनक टि्विस्‍ट दे देती थीं।  दो काल्‍पनिक जासूसों हरक्‍यूले पाइराइट और मिस मारपल का सृजन भी उन्‍होंने किया। पाइरइट उनके कई मामलों का नायक रहा, जिनमें उनकी कालजयी रचनाएं द मर्डर ऑफ द रॉजर एक्‍रॉयड (1926) और कर्टेन (1975), जिनमें जासूस मर जाता है, भी शामिल हैं। 

इन्होंने 1914 में कर्नल आर्किबॉल्ड क्रिस्टी (Colonel Archibald Christie) से विवाह किया, जिसके बाद उनकी एकमात्र पुत्री रोज़ालिन्ड हिक्स का जन्म हुआ। 1928 में इस विवाह का अंत तलाक़ में हुआ। 1930 में जब वह मध्‍य-पूर्व की यात्रा कर रही थीं, क्रिस्‍टी की मुलाकात प्रसिद्ध अंग्रेज पुरात्‍ववेत्ता सर मैक्‍स मैल्‍लोवैन से हुई। उन्‍होंने उसी वर्ष उनसे शादी कर ली। तभी से क्रिस्‍टी अपने पति के साथ उनकी सीरिया और इराक की वार्षिक यात्राओं में उनके साथ रहती थीं। उन्‍होंने इन यात्राओं का उपयोग अपने उपन्‍यासों, जैसे मर्डर इन मेसोपोटामिया (1930), डेथ ऑन नील (1937) और अपॉइंटमेंट वदि डेथ (1938) की सामाग्री के रूप में किया। क्रिस्टी का देहान्त 12 जनवरी 1976 को ऑक्सफोर्डशायर में हुआ।

क्रिस्‍टी के नाटकों में प्रसिद्ध हैं, द मॉउस ट्रैप, जिसका मंचन लंदन में 1952 से लगातार किया और विटनेस फॉर द प्रॉसिक्‍युशन (1953, फिल्‍म 1957), जिसके लिये उन्‍हें 1954-1955 का न्‍यूयार्क ड्रामा क्रिटिक्‍स सर्कल अवार्ड मिला। उनकी कहानियों पर कई टेलीविजन धारावाहिक और फिल्‍में बनाई गई, सबसे अधिक उनके चरित्रों हरक्‍यूले पाइराट और मिस मारपल पर। श्रीमती क्रिस्टी को अनेक सम्मान प्राप्त हुए। इनमें महत्त्वपूर्ण हैं 1955 में मिस्टरी राईटर्स औफ़ अमॅरिका (Mystery Writers of America) का सर्वोत्तम ग्रैन्ड मास्टर पुरस्कार (Grand Master Award) और 1971 में ब्रिटिश राज्य की ‘डेम कमान्डर’ पदवी, जो ब्रिटिश राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से है।

Thursday, 13 June 2019

रानी दुर्गावती की कहानी। Rani Durgavati ki Kahani

रानी दुर्गावती की कहानी। Rani Durgavati ki Kahani

रानी दुर्गावती की कहानी। Rani Durgavati ki Kahani

रानी दुर्गावती का नाम इतिहास में महान वीरांगना के रूप में बड़े आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। उनका जन्म उत्तरप्रदेश के राठ (महोबा) नामक स्थान पर हुआ था। वे कालिंजर के अन्तिम शासक महाराजा कीर्तिसिंह चन्देल की इकलौती सन्तान थी। नवरात्रि की दुर्गाष्टमी को जन्म लेने के कारण पिता ने इनका नाम दुर्गावती रखा। बचपन में ही दुर्गावती की माता का देहान्त हो गया था। पिता ने इन्हें पिता के साथ-साथ माँ का प्यार भी दिया और इनका पालन-पोषण बड़े लाड़ प्यार से किया।

दुर्गावती बचपन से ही बड़ी बहादुर थीं। अस्त्र-शस्त्र चलाने में और घुड़सवारी करने में उनकी विशेष रुचि थी। राजकुमार के समान ही उन्होंने वीरता के कार्यों का प्रशिक्षण लिया। बड़ी होने पर वे अकेली ही शिकार को जाने लगीं। बन्दूक और तीर-कमान से अचूक निशाना लगाने में वे निपुण थीं। दुर्गावती वीर होने के साथ-साथ सुशील, भावुक और अत्यन्त सुन्दरी भी थीं। इन गुणों के साथ-साथ दुर्गावती में धैर्य, साहस, दूरदर्शिता और स्वाभिमान भी कूट-कूट कर भरा था।

दुर्गावती का विवाह गोंडवाना नरेश राजा दलपति शाह से सम्पन्न हुआ। राजा दलपतिशाह बड़े वीर, दानी और न्यायप्रिय शासक थे। दुर्गावती अब गोंडवाना की रानी बन गईं। इनका वैवाहिक जीवन बड़ी सुख-शान्ति से बीतने लगा। इसी बीच रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। महाराजा दलपतिशाह अचानक बीमार पड़ गए। उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया। एक दिन राजा इस संसार से चल बसे। रानी की तो मानो दुनिया ही उजड़ गई। रानी और प्रजा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

अपने पुत्र की खातिर रानी को यह आघात सहन करना पड़ा। वीरनारायण उस समय बहुत छोटा था। रानी ने उसका राजतिलक सम्पन्न कराया और गढ़मण्डला राज्य की संरक्षिका के रूप में रानी स्वयं शासन का कार्य देखने लगीं। रानी दुर्गावती बड़ी ही सूझ-बूझ तथा कुशलता से राज्य का संचालन करने लगीं। वीर नारायण की शिक्षा भी अच्छी तरह से चल रही थी। राज्य में धन-दौलत की कमी नहीं थी। प्रजा सुख-चैन की वंशी बजा रही थी। रानी ने अपनी प्रजा की भलाई के लिए अनेक योजनाएँ चलाईं। अनेक निर्माण कार्य किए। अपने राज्य में अनेक इमारतें, कुएँ, तालाब, बावड़ी आदि भी बनवाए। इनके शासनकाल को गोंडवाने का स्वर्णयुग कहा जाता है। प्रजा उनके कार्य और व्यवहार से प्रसन्न और सन्तुष्ट थी।

जबलपुर नगर में स्थित रानीताल, चेरीताल और मदनमहल आज भी रानी की स्मृति को बनाए हुए हैं। उस समय इनके राज्य में बावन गढ़ थे। रानी दुर्गावती ने सोलह वर्षों तक कुशलतापूर्वक अपने राज्य की देखभाल की। इस बीच रानी ने अपनी सेना को नए ढंग से संगठित किया। नारी-सेना बनाई और शत्रु राज्यों में गुप्तचरों का जाल बिछाया। इससे राज्य की शासन व्यवस्था में काफी सुधार आया और राज्य की शक्ति भी बढ़ी। गढ़मण्डला राज्य की सम्पन्नता देखकर अनेक राजाओं ने उनके राज्य पर आक्रमण किए पर रानी की वीरता के आगे उन्हें परास्त होना पड़ा।

उस समय दिल्ली में सम्राट अकबर का राज्य था। गढ़मण्डला की सम्पन्नता और स्वतन्त्रता उसकी आँख की किरकिरी बनी थी। उसने सोचा कि स्त्री होने के कारण रानी दुर्गावती से उसका राज्य छीनने में कोई मुश्किल नहीं होगी। उसने सर्वप्रथम एक सन्देशवाहक भेजकर रानी दुर्गावती को यह पैगाम भेजा कि वह उसकी आधीनता स्वीकार कर लें। पैगाम पाते ही रानी आग बबूला हो गईं और उन्होंने बादशाह अकबर का पैगाम ठुकरा दिया। अकबर ने अपने सेनापति आसिफ खाँ को गढ़मण्डला पर अधिकार करने के लिए भेज दिया। सेनापति आसिफ खाँ एक बहुत बड़ी सेना और तोपखाना लेकर गढ़मण्डला की ओर चल पड़ा।

रानी को इस आक्रमण की सूचना मिली, तो उन्होंने अपनी प्रजा को संगठित कर उसका सामना करने का निश्चय किया। रानी दुर्गावती ने मुगल सेना से लड़ने के लिए अपने राज्य के सबसे मजबूत किले सिंगौरगढ़ को चुना। यह गढ़ आजकल दमोह जिले में है। आसिफ खाँ ने अपनी विशाल सेना के घमण्ड में सिंगौरगढ़ पर चढ़ाई कर दी।
किले के बाहर रानी से उसकी पहली मुठभेड़ हुई। शत्रु सेना के मुकाबले रानी की सेना बहुत कम थी, पर रानी दुर्गावती साक्षात् दुर्गा की तरह युद्ध में कूद पड़ी। रानी ने बड़ी बुद्धिमानी और चतुराई से मुगल सेना को विन्ध्य पर्वत की एक सँकरी घाटी में आने के लिए विवश कर दिया। घाटी में बसे नरही गाँव के पास रानी ने चट्टानों में छिपे अपने सैनिकों की सहायता से अकबर की सेना को आसानी से परास्त कर दिया।

मुगल सेना को हटना पड़ा, तभी उसका पीछे रह गया तोपखाना आ गया। मुगल सेना ने बड़ी-बड़ी तोपों से गोलों की झड़ी लगा दी। रानी के सैनिक तीर-कमान और तलवार से लड़ रहे थे। रानी भी हाथी पर सवार होकर अदम्य साहस के साथ दुश्मन से जूझ रही थीं। रानी की फौज के पीछे एक सूखी नदी थी। अचानक पानी बरसने से उसमें बाढ़ आ गई। सामने शत्रु का आग उगलता तोपखाना, पीछे बाढ़ आई नदी, रानी और उनकी सेना दोनों ओर से घिर गए। घमासान युद्ध होने लगा, परन्तु तोप के गोलों का मुकाबला तीर तलवार कब तक करते। फिर भी रानी दुर्गावती वीरतापूर्वक आसिफ खाँ की विशाल सेना से जूझती रहीं। यहाँ तक कि एक बार फिर मुगल सेना के सामने हार का खतरा उत्पन्न हो गया। तभी एक तीर रानी की बाँयीं आँख में आ लगा। बहुत प्रयास करने के बाद भी तीर का फलक आँख से नहीं निकला।

उसी समय शत्रु से लड़ते-लड़ते उनके पुत्र वीरनारायण की मृत्यु हो गई। इससे सारी सेना घबरा गई और उसमें हाहाकार मच गया। पुत्र को वीरगति प्राप्त होने पर भी रानी विचलित नहीं हुई। घायल होते हुए भी और अधिक वीरता के साथ मुगल सेना का सामना करने लगीं।

तभी एक और तीर रानी के गले में आकर लगा। यह तीर प्राणघातक सिद्ध हुआ। अब उन्हें अपने जीवन और जीत की आशा न रही। जीते जी शत्रु उनके शरीर को न छू सके, इसलिए उन्होंने अपनी कटार अपनी छाती में भोंक ली और स्वयं को समाप्त कर लिया। रानी दुर्गावती ने अन्तिम साँस तक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अद्वितीय वीरता, अदम्य साहस और असाधारण रण कौशल का परिचय दिया। इस तरह रानी दुर्गावती अपनी मातृभूमि की आन-बान-शान पर मिटकर भी अमर हो गई। युगों-युगों तक उनका अलौकिक आत्म-त्याग प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
सुकरात पर निबंध। Essay on Socrates in Hindi

सुकरात पर निबंध। Essay on Socrates in Hindi

सुकरात पर निबंध। Essay on Socrates in Hindi

सुकरात पर निबंध। Essay on Socrates in Hindi
सुकरात एक महान ग्रीक दार्शनिकं थे। वह प्रचीन विश्‍व के सबसे बुद्धिमान व्‍यक्‍ति माने जाते हैं। उन्‍होंने जीवन के हर क्षेत्र में सत्‍य को खोजने का प्रयास किया। ग्रीक दर्शन का उत्‍थान सुकरात के दर्शन के साथ ही हुआ। उन्‍होंने लोगों को सिखाया कि आंखें मूंद कर किसी भी चीज का अनुसरण मत करो।

सुकरात का जन्‍म 469 ईसा पूर्व एथेंस में हुआ था। उनके पिता संगतराश और मूर्तिकार थे। सुकरात दिखने में कुरूप थे। बचपन में ही उन्‍हें धार्मिक प्रशिक्षण प्राप्‍त हुआ। युवावस्‍था में सुकरात एक सैनिक थे और उन्‍हेंने अपनी मातृभूमि एथेंस की ओर से कई युद्धों में भाग लिया। एथेंस महान सभ्‍यता की धरती थी। साहित्‍य, नाटक, वास्‍तुकला, दर्शन और मूर्तिकला में एथेंस शीर्ष पर था। सुकरात की पृष्‍ठभूमि ने उन्‍हें प्रेरित किया कि उनका रुझान दर्शन-शास्‍त्र की ओर हो। आत्‍मा के बारे में सुकरात की शिक्षाएं  इतनी जटिल थीं कि लोग उन्‍हें समझने में असमर्थ थे। 

उनके शिष्‍य प्‍लेटो सुकरात का बहुत सम्‍मान करते थे और उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे। यदि सुकरात को प्लेटो जैसे शिष्य ना मिले होते तो शायद दुनिया सुकरात जैसे महान दार्शनिक के बारे में जान भी ना पाती। आज अगर दुनिया सुकरात को जानती है, तो वह सिर्फ प्लेटो द्वारा रचित किताब अपोलोजी में लिखे सुकरात के संवादों की वजह से। सिकंदर भी अगर महान कहलाया तो उसका श्रेय भी कहीं ना कहीं सुकरात को ही जाता है। वास्तव में सुकरात के शिष्य प्लेटो ने ही अरस्तु को शिक्षा दी और जिस कारण अरस्तु सिकंदर के महान गुरु बने। 

शीघ्र ही सुकरात का समकालीन सरकार से संघर्ष हो गया। अधिकारियों ने उन पर आरोप लगाया कि वह युवाओं को गुमराह कर रहे हैं और उन्‍हें शिक्षा दे रहे हैं कि वे पारंपरिक विश्‍वासों पर संदेह करें। सुकरात का विश्‍वास था कि हर कोई सरकार चलाने के लिए उपयुक्‍त नहीं है, क्‍योंकि प्रशासन एक कला है, जिसके लिए विशेष कौशल की आवश्‍यकता होती है।

सुकरात की विचारधारा ने उनके कुछ मित्र बनाए, लेकिन बहुत शत्रु बना दिये। उनका सामाजिक जीवन संकटों से घिर गया। उन्‍हें अपनी पत्‍नी का भी सहयोग नहीं मिला। वह एक क्रूर और शिकायतों से भरी महिला थी, लेकिन सुकरात ने अपनी विचारों और विश्‍वासों को अभिव्‍यक्‍त करना बंद नहीं किया, जिसने शक्‍तिशाली लोगों को उत्तेजित कर दिया। सुकरात को युवा अनुयायी उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करते और अपने वरिष्‍ठों से प्रश्‍न करते। शत्रुओं ने युवाओं को भ्रष्‍ट करने का अरोप लगाया। आरोप बेबुनियाद थे, लेकिन अधिकारियों ने उन्‍हें दोषी घोषित कर दिया और उन्‍हें मृत्‍युदंड की सजा सुनाई। उन्‍होंने खशी-खुशी का प्‍याला पीकर मौत को गले लगा लिया।  

Wednesday, 12 June 2019

नक्‍सलवाद : भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती एवं इसका प्रबंधन

नक्‍सलवाद : भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती एवं इसका प्रबंधन


नक्‍सलवाद : भारत की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती एवं इसका प्रबंधन

आन्‍तरिक सुरक्षा भारत की एक गम्‍भीर समस्‍या रही है। आजादी को आरम्‍भ से लेकर अब तक कभी भाषा को लेकर आन्‍तरिक संघर्ष, कभी सम्‍प्रदाय/जातियों के मध्‍य संघर्ष तो कभी क्षेत्रियता को लेकर संघर्ष से सभी भारत की आन्‍तरिक व्‍यवस्‍था में अस्‍थिरता पैदा करते रहे है। नक्‍सलवादी संघर्ष भी उनमें से एक रहा है।
यद्यपि नक्‍सलवादी संघर्ष आरम्‍भ में एक सिधान्‍तवादी आन्‍दोलन रहा, इसके प्रति बुद्धिजीवि वर्ग का समर्थन रहा किन्‍तु कालान्‍तर में यह सामाजिक – आर्थिक आन्‍दोलन अपने मूल दर्शन से विमुख हुआ तथा आन्‍दोलन के जगह संघर्ष में परिवर्तित हो गया। सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा के लिए स्‍वंय एक चुनौती बन गया।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब 15 सितम्‍बर 2009 को दिल्‍ली में पुलिस अधिकारियो के सम्‍मेलन में नक्‍सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताया। राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी अपने अभिभाषण में नक्‍सलवाद को देश की आन्‍तरिक सुरक्षा के लिए चुनौती माना।
अध्‍ययनों से स्‍पष्‍ट होता है कि वर्तमान का नक्‍सलवाद पं० बंगाल के नक्‍सलवादी गाँव 1967 के कानूसन्‍याल एवं चारूमजूमदार के नेतृत्‍व वाले नक्‍सवाद से बिल्‍कुल अलग हैं।
वेदमारवाह (पूर्व डी.जी.पी. नेशनल सिक्‍योरिटी गार्ड) का मानना है कि “चौथी दुनिया के नाम से संबोधित होने वाले नक्‍सलवादी समाज का सशस्‍त्र आन्‍दोलन भारत में अपने तीसरे चरण में पहुँच चुका है। बीते दो चरणों के मुकाबले यह विद्रोह ज्‍यादा नुकसानदेह, घातक और विस्‍फोटक है।”
पहले चरण में जल, जंगल जमीन पर जनता के अधिकार के लिए माओवादी विचार के अन्‍तर्गत नक्‍सलवाद का विकास हुआ। यह संघर्ष शाषित बनाम शासक का था।
यह वह दौर था जब समाज का एक वर्ग नक्‍सलवाद को व्‍यवस्‍था को विद्रोह सन्‍दर्भ में एक बुद्धिजीवि आन्‍दोलन के तौर पर मानता था। पश्‍चिम बंगाल में तो इस आन्‍दोलन के व्‍यापक व समर्थन प्राप्‍त हुआ। तब एक वैचारिक आन्‍दोलन था।
दूसरे चरण में नक्‍सलवाद का प्रवेश तब हुआ जब इसका सीधा संघर्ष देश के समाज बलों से हुआ। इस काल खण्‍ड मे नक्‍सलवाद का विस्‍तार हुआ और भारत का लाल गलियारे का निर्माण हुआ, जो पश्‍चिम बंगाल से फैलाकर बिहार, झारखण्‍ड, उडि़सा, छत्‍तीसगढ़, मध्‍य प्रदेश व महाराष्‍ट्र व आन्‍ध्र प्रदेश तक पहुंच गया।
यह स्‍थिति नक्‍सलवाद के संक्रमाण का रहा। यद्यपि इस काल में सरकार को नक्‍सलवाद के तरफ से व्‍यापक चुनौती पेश की गई सरकार तंत्र की विफलता इन नक्‍सल प्रभावित इलाकों में साफ दिखती है। नक्‍सल उन्‍मूलन के नाम पर सरकारी पैसों का बन्‍दरबाट करने की कोशिश से ज्‍यादा प्रयास कभी नही दिखा।
विभिन्‍न सर्वे एवं स्‍वयसेवी संस्‍थाओ के अध्‍ययन इस बात की ओर सं‍केत कर रहे है कि नक्‍सली आंन्‍दोलन अपने तृतीय चरण में प्रवेश कर चुका है। 25 मई 2013 को पहली बार एक सियासी पार्टी का काफिलें पर हमला इसी ओर संकेत करता है यह पहली बार देखा गया कि अब नक्‍सलियो के निशाने पर नीति-नियंता, राजनैतिक नेतृत्‍व व राजनैतिक पार्टिया है।
इस चरण में नक्‍लसलवादी संघर्ष अपने सबसे विभत्‍स रूप में अवतर्रित हुआ। क्‍यों‍कि अबये वैचारिकी की लड़ाई नहीं रही न ही विकास की समस्‍या। इस परिवर्तन की ओ स्‍वंय नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलन को प्रारम्‍भ करने वालो में से एक कानूसन्‍याल ने अपने मौत से पूर्व एक साक्षात्‍कार में संकेत किया था। “उन्‍होंने कहा था कि वर्तमान में जो नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलन का नया संसकरण माओवादी है, उसे माक्‍सवादी नही कहा जा सकता है।” जिस जल जंगल जमीन के हक के लिए वे हथियार बंद है, उन्‍ही पर निर्माण रखने के ऐवज में निजी घरानों व सरकारी महकमों से मोटी रकम वसूलते है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सर्वहारा की बात कर सुनहरे सपने दिखाकर प्रारम्‍भ हुआ यह आन्‍दोलन अब गिरोह बन्‍द मिलिसिया से तब्‍दील हो चुका है, जिसका एक मात्र उद्देश्‍य हथियारों के बल पर पैसे वसूलने व अपना तंत्र चलाना है।
अब, जब यह स्‍पष्‍ट हो चुका है कि नक्‍सवादी संघर्ष अपने वैचारिकी को छोड़ राष्‍ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्‍त है और व्‍यापक नरसंहार उनका साधन बन चुके है तो निश्‍चय ही हमे उनसे निबटने के साधनका प्रबन्‍धन करना होगा।
यद्यपि प्रथम चरण में सरकार ने नक्‍सली आन्‍दोलन के प्रति नरम रूख अपनाया और उन्‍हे मुख्‍य धारा में लाने का प्रयास किया यह प्रयास आन्‍ध्र प्रदेश में सफल रहा किन्‍तु अन्‍य क्षेत्रों में इसका नकारात्‍मक प्रभाव रहा द्वितीय चरण में गुड गर्वनेन्‍स को आधार बनाकर समस्‍या का समाधान करने का प्रयास किया गया।
गृहमंत्री रहते हुए पी० चिदम्‍बरम् ने एक निती बनायी थी-क्‍लीयर, होल्‍ड एण्‍ड डेवलेपमेंट की। इसमें पहले किसी क्षेत्र से माओवादियो का दखल कम किया जाना था, फिर वहा प्रशासनिक पकड़ मजबूत बनाकर उसके बाद वहा पर आर्थिक विकास कि योजनाये लागू करनी थी। इस पर उचित प्रबन्‍धन के साथ कार्य भी हुआ, किन्‍तु एक सियासी व्‍यक्‍ति के चलते केवल आर्थिक विकास पर कार्य हुआ, जिसमें पी० चिदम्‍बरम् से लेकर गृहमंत्रालय व सुरक्षा बल तक ढीले पड़ गये।
जबकि सशस्‍त्र तरीका उचित नही है। इनसे लड़ने का एकमात्र अचूक है हथियार है- सीज एण्‍ड इंगेज (तलासियेव आमना-सामना किजिए) माओवादियो को खत्‍म करने का इसके अलावा और कोई विकल्‍प नहीं है।
नक्‍सलवादी संघर्ष समाधान हेतु दूसरा महत्‍वपूर्ण तथ्‍य है, हमे बौद्धिक रूप से इसे पुन: परिभाषित करना होगा इस प्रयास में छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री डा० रमन सिंह की इसलिए तारीफ करनी चाहिए कि पहली बार उन्‍होने इस छद्वम जनवादी युद्ध को राष्‍ट्रीय आतंकवाद की सज्ञां दी। किसी राजनेता ने पहली बार इस समस्‍या को उसके राष्‍ट्रीय संदर्भ में पहचाना।
नक्‍सलवाद को इस नये दृष्‍टिकोण से देखते हुए केन्‍द्र व राज्‍यो को आपसी समन्‍वय से कार्य करने का प्रबन्‍धन करना होगा। “आन्‍तरिक सुरक्षा पर आयोजित मुख्‍यमन्‍त्रियो के सम्‍मेलनमें मुख्‍यमन्‍त्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि केन्‍द्र सरकार आन्‍तरिक सुरक्षा से जुड़े मामलो में निती निर्धारण में अक्‍सर राज्‍य सरकारो को विश्‍वास में नहीं लेती।…….. जरूरत है कि केन्‍द्र सरकार दलगत राजनितिक से उपर उठकर राष्‍ट्र के हित मे सोचे और आतंकवाद तथा नक्‍सलवाद विरोधी मुहिम मे राज्‍य सरकारो के साथ कन्‍धा मिलाकर काम करे”।
विकास कार्यो का इस प्रकार प्रबन्‍धन करें जिससे राज्‍य व सरकारों के मध्‍य उचित संमन्‍वय स्‍थापित हो सके और नक्‍सली क्षेत्रों का विकास सम्‍भव हो सके।
पी० चिदम्‍बरम् ने गृहमंत्री रहते हुए सिर्फ केन्‍द्र व राज्‍य के बीच संमन्‍वय बनाने में सफलता स्‍थापित की बल्‍कि दलगल राजनीति से उपर उठकर प्रभावित राज्‍यों में जरूरत के मुताबिक केन्‍द्रीय बल मुहैया कराया।
नयी रणनीति के तहत आपरेशन ग्रीन हन्‍ट चलाया गया। जिसकी सफलता भी सामने आयी और सरकार को झुकाने का सपना देखने वाले सरकार के समक्ष 72 दिन तक हिंसा नहीं करने का प्रस्‍ताव देने लगे।
यद्यपि मोदी सरकार का रूख अभी नक्‍सलवाद को लेकर बहुत स्‍पष्‍ट नहीं है। फिर भी विकास कार्यों पर कोई अस्‍पष्‍टता नही है। यह नक्‍सल प्रभावी क्षेत्रों के विकास प्रबन्‍धन का परिणाम है कि विभिन्‍न योजनाओं के 160908 प्रोजेक्‍ट 10 प्रभावी राज्‍यों में संचालित है जिनमे से 129037 परियोजनायें 26 जनवरी 2015 तक पूर्ण हो चुकी थी केन्‍द्र 9059.00 करोड़ में से 8149.61 करोड़ रूपये अब तक अवमुक्‍त कर चुका है।
इसके अलावा 2 स्‍क‍िल डेवलेपमेंट प्रोग्राम रोशनी व स्‍क‍िल डेवलेपमेंट 34 एल० डब्‍लू० ई० क्षेत्रों में ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलाये जा रहे है। दातेवाड़ा मे हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 24 हजार करोड़ रूपये की स्‍टील प्‍लान्‍ट परियोजना को चालू किया गया। साथ ही 140 किमी० रेल लाइन रावघाट से जगदलपुर का अनावरण किया जिससे निश्‍चय ही एल०डब्‍लू०ई० क्षेत्रों का विकास होगा।
यह उचित प्रबन्‍धन का परिणाम है कि, केन्‍द्र व राज्‍य सरकारों ने अपने नितियों में बहुत हद तक बदलाव करना शुरू कर दिया है। विकास के कई परियोजनाओ को जमीन पर उतारने की कोशिश कि जा रही है। केंन्‍द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय जहा इस दिशा में ठोस पहल कर रहा है, वहीं नक्‍सल प्रभावी राज्‍य विशेषकर छत्‍तीसगढ़, झारखण्‍ड और बिहार सरकार भी प्रभावित क्षेत्रो के कल्‍याण के लिए कई महत्‍वकाक्षी परियोजनाओ को अमल में लाने की कोशिश कर रहे है। जिससे नक्‍सल आदिवादी इलाको मे व्‍याप्‍त शोषण, गरीबी और बेरोजगारी दूर हो सके और वहा के लोग देश की मुख्‍य धारा में जुड़ सके।
मानव अधिकारों पर वैश्वीकरण के प्रभाव। Manav Adhikar par Vaishvikaran ke Prabhav

मानव अधिकारों पर वैश्वीकरण के प्रभाव। Manav Adhikar par Vaishvikaran ke Prabhav

मानव अधिकारों पर वैश्वीकरण के प्रभाव। Manav Adhikar par Vaishvikaran ke Prabhav

मानव अधिकारों पर वैश्वीकरण के प्रभाव
वैश्वीकरण के इस दौर में मानव अधिकारों पर क्‍या प्रभाव पड़ा है। वर्तमान समय में विश्‍व स्‍तर पर कौन सी ऐसी सम-सामयिक घटनाऐं हुई है, जिनका मानव अधिकारों पर प्रभाव पड़ा है। वो घटनाऐं किस हद तक मानव अधिकारों पर प्रभाव डालती है। यहाँ ये तय करन उचित होगा कि वैश्वीकरण के सन्‍दर्भ में मानव से सम्‍बन्‍धित कौन से अधिकार अहमियत रखते हैं। यदि बात की जाये तो मानव के लिये सब से म‍हत्‍वपूर्ण उसकी जिन्‍दिगी है। अत: मानव के अन्‍य अधिकार जैसे स्‍वतन्‍त्रता का अधिकार, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार के साथ-साथ मानव के लोकतांत्रिक अधिकार में शामिल वातावरण का अधिकार मायने रखता है। वैश्वीकरण के इस दौर में इन अधिकारों पर कैसा प्रभाव पड़ा है ये चर्चा का विषय है।

बात मानव अधिकारों की चल रही है। विश्‍व वैश्वीकरण के सन्‍दर्भ में, ये जानना आवश्‍यक है कि वैश्वीकरण का शाब्‍दिक अर्थ क्‍या है? वैश्‍वीकरण के मायने हैं, स्‍थानीय या क्षेत्रीय वस्‍तुओं या घटनाओं के विश्‍व स्‍तर पर रूपान्‍तरण की प्रक्रिया। अर्थात किसी घटना या वस्‍तु का विश्‍व स्‍तर पर क्‍या प्रभाव है।

1960 व उससे पहले के समय में वैश्वीकरण का उपयोग सामाजिक विज्ञान में किया जाता रहा है। 1980 के दशक से वैश्‍वीकरण का उपयोग अर्थशास्‍त्रियों द्वारा किया गया परन्‍तु 1980 से 1990 के दशक तक ये धारणा लोकप्रिय नहीं हुई। वैश्‍वीकरण का सबसे प्राचीन दृष्‍टिकोण चार्ल्‍स तेज रसेल द्वारा दिया गया है। वैश्‍वीकरण को एक सदियो लम्‍बी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है जो मानव जनसंख्‍या व सभ्‍यता के विकास पर नजर रखती है। वैश्‍वीकरण को पिछले 50 वर्षों से सामाजिक विज्ञान के सन्‍दर्भ में भिन्‍न-भिन्‍न विषयों के सम्‍बन्‍धित करके समझा जा सकता है।

राजनीतिक वैश्‍वीकरण विश्‍व सरकार का एक गठन है। जो राष्‍ट्रों के बीच सम्‍बन्‍धों का संचालन करता है, इसके अतिरिक्‍त सामाजिक व आर्थिक वैश्‍वीकरण से उत्‍पन्‍न होने वाले अधिकारों की गारन्‍टी देता है। वैश्‍वीकरण की इस दौड़ से संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका ने शक्‍ति के पद का लुत्‍फ उठाया है ऐसा उसने राजनीतिक स्‍तर पर किया और क्‍यू किया क्‍योंकि इसकी आर्थिक स्‍थिति अन्‍य देशों के मुकाबले में बेहतर थी। अन्‍य दूसरे देशों के नागरिकों के मानव अधिकारां का उसके द्वारा समय-समय पर हनन किया गया चाहे नागासाकी हिरोशिमा (जापान) हो या अफगानिस्‍तान राजनीतिक वैश्‍वीकरण के दो पहलुओं को देखता है: - (1) जैवमण्‍डल में नजर आ रही क्षति, (2) गरीबी, असमानता, न्‍याय में हो रही देरी, पारम्‍परिक संस्‍कृतिक का क्षरण। ये सब वैश्‍वीकरण से सम्‍बन्‍धित क्षति का परिणाम है। अब चाहे वे राजनीतिक हो या अधिक।
(1)  जैवमण्‍डल को तीन भागों में बांटा गया है:-
(1)   जल मण्‍डल (Hydrosphere) पृथ्‍वी पर स्‍थित सभी जलीय भाग जैसे महासागर, झील, जल धाराऐं, नदियाँ पृथ्‍वी का लगभग 73 प्रतिशत सतह जल से ढकी है।
(2)   स्‍थल मण्‍डल (Lithosphere) यानि जमीन की ठोस पर्त जैसे – चट्टानें, मृदा (मिट्टी) खनिज आते हैं, खनिज में फस्‍फोरस, कैल्‍सियम, आयरन आते हैं।
(3)   वायु मण्‍डल (Atmosphere) वायुमण्‍डल में – आक्‍सीजन, कार्बन-डाई ऑक्‍साइड, नाइट्रोजन आदि गैसें जीवों कों वायु मण्‍डल से मिलती है। जल मण्‍डल, स्‍थल मण्‍डल, वायु मण्‍डल के साथ मिलाकर सभी जीवधारी एवं बड़ी इकाई बनाते हैं वही जैव मण्‍डल कहलाता है।
आर्थिक वैश्‍वीकरण से समस्‍त जैव मण्‍डल को नुकसान हो रहा है। इस वैश्‍वीकरण का सीधा प्रभाव मानव अधिकारों पर पड़ रहा है एक ओर विकासवादी देश है जो विकास के नाम पर समस्‍त पर्यावरण का सत्‍यानाश कर रहे हैं, दूसरी ओर विकासवादी देश है जो विकास के नाम पर समस्‍त पर्यावरण का सत्‍यानाश कर रहे हैं, दूसरी और ऐसे व्‍यक्‍ति बहुत कम हैं जो जियो और जीने दो के नियम को अपनाये हुए हैं। हम जियो और जीने दो के सिद्धान्‍त को किस हद तक अपनाये हुए है बात साबित होती है, जल मण्‍डल में होने वाले प्रदूषण से जल से वाहित होने वाले मल के मिलने से अनेक वैक्‍टीरिया और अन्‍य रोग पैदा होता हैं। टॉयफाइड, पीलिया, पेचिश जैसे रोग जल मण्‍डल के दूषित होने से होते हैं। पारा (मरकरी) लेड (सीसा) फलोराइड पानी में मिलने से मानव को नुकसान पहुंचता है यहाँ तक उसकी मृत्‍यु तक हो सकती है। अभी हाल ही में (मैगी) में सीसे की मात्रा अत्‍यधिक होने से उसे प्रतिबन्‍धित कर दिया गया और पीने के मुआमले में हम लोग क्‍या कर रहे हैं। सीसे की अधिक मात्रा शरीर में पहुंचने से मानसिक रोग, उच्‍च रक्‍त चाप आदि बीमारियाँ देखने में आती है। इसके अलावा पानी में आक्‍सीजन की कमी होने के कारण पानी में रहने वाले प्राणियों और पौधों की भी मृत्‍यु हो जाती है।
धार्मिक आस्‍था के नाम पर भी मनुष्‍य का जीने का अधिकार रक्षित नहीं है। केवल दिल्‍ली में भी 800 से अधिक, दुर्गा प्रतिमाऐं स्‍थापित होती हैं। कोलकाता में लगभग सौ वर्ष पूर्व एक-दो प्रतिमाऐं ही स्‍थापित होती थी। 50 वर्ष पूर्व 300, 400 और आज इनकी तादाद 2500 से ज्‍यादा है। केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2010 की रिपोट के आधार पर कहा जाता है कि विसर्जन के बाद पानी में टोटल डिजाल्‍वड सालिड बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। पानी में खनिज तत्‍व जैसे लोहा, तांबा आदि की मात्रा 200 से 300 प्रतिशत बढ़ जाती है जिससे मनुष्‍यों में अपगंता बढ़ने का खतरा बना रहता है।
आज के इस वैश्‍वीकरण के दौर में यदि हम जल मण्‍डल को रक्षित कर मानव अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं तो ये एक सराहनीय काम है। इसके लिये हमे हानिकारक अपशिष्‍ट पदार्थो को पानी में मिलने से रोकना होगा। पीने के पानीके स्‍त्रोतों जैसे तालाब, नदी, आदि के चारों ओर दीवार बनाकर उसमें गन्‍दगी को मिलने से रोकना होगा। पीने का पानी के स्‍त्रोतों जैसे तालाब, नदी, आदि के चारें ओर दीवार बनाकर उसमें गन्‍दगी को मिलने से रोकना होगा। नदियों व तालाबों में पशुओं के नहलाने व वाहनों के धोने पर पाबन्‍दी होनी चाहिए। समय-समय पर जलाशयों की सफाई आक्‍सीकरण – तालों व Fitlers सहायता से जल का शुद्धीकरण।
स्‍थल मण्‍डल को शुद्ध व साफ रखकर मानवीय अधिकारों को रक्षित किया जा सकता है। स्‍थल मण्‍डल में ठोस पर्त में यानि मिट्टी को प्रदूषित होने से रोकने में भूमि तथा जल में मलमूत्र विसर्जन पर रोक होनी चाहिए। ठोस पदार्थ जैसे तांबा, लोहा, काँच, को मिट्टी में नहीं दबाना चाहिए। उर्वरकों तथा कीटनाशकों का प्रयोग जरूरत पड़ने पर सीमित मात्रा में करना चाहिए।   

स्‍थल मण्‍डल में फास्‍फोरस, कैल्‍शियम आदि को शामिल किया गया है। वैश्‍वीकरण कामानव अधिकारों पर यह प्रभाव पड़ा है कि कैल्‍शियम के नाम पर आज उसे शुद्ध प्राकृतिक दूध भी नसीब नहीं है दूध व उससे बनी वस्‍तुओं में मिलावट के नाम पर उसकी जिन्‍दगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। किस चीज  का वैश्‍वीकरण हुआ है। मिलावट का, बेइमानीका, अशुद्धता का? वैश्‍वीकरण जरूर हुआ है और इस वैश्‍वीकरण का मानव अधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। वायुमण्‍डल में विश्‍व के बड़े देशों द्वारा तरक्‍की के मानव अधिकरों पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। वायुमण्‍डल में विश्‍व के बड़े देशों द्वारा तरक्‍की के नाम पर इतनी अधिक मात्रा में विषैली गैसें छोड़ी गई हैं जैसे कार्बन डाइआक्‍साइड, कार्बन मोनोआक्‍साइड, नाइट्रोजन आक्‍साइड आदि। क्‍लोरो फ्लोरो कार्बन पदार्थ आसमान में ओजोन पर्त को नष्‍ट करके नुकसानदे पराबैगनी किरणें जीवों को हानि पहुंचती है। वैश्‍वीकरण के नाम पर अमेरिका व चीन दुनिये के सबसे अधिक ईपीटीसी कार्बन 16.6: निर्गत कर वातावरण को दूषित कर रहा है। रूस, जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली, ईरान, फ्रांस, पौलेंड, मैक्‍सिको विश्‍वके तकरीबन 40 देश ऐसे हैं जिनसे कार्बन उत्‍सर्जन ज्‍यादा हो रहा है। इसके अतिरिक्‍त 28 देशों का समूह यूरोपीय संघ 7.3 प्रतिशत ईपीसीटी रेंज में है। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस आदि बड़े देशों में वैश्‍वीकरण से उद्योगों की समस्‍या अधिक बड़ गयी है जिसका प्रभाव मानव अधिकारों पर पड़ा है।

वायुमण्‍डल के दूषित होने से मानव के स्‍वास्‍थ्‍य पर नुकसानदेह असर पड़ रहा है परिणाम स्‍वरूप श्‍वसनतन्‍त्र प्रभावित हो रहा है तथा दमा, गले का दर्द, निमोनिया एवं फेफड़ो का कैन्‍सर आदि खतरनाक बीमारियाँ सामने आ रही हैं। ज्‍वालामुखियों से निकली राख, आंधी तूफान से उड़ती धूल, वनों में लगी आग से निकलने वाला धुंआ, कोहरा, ये सभी इन बीमारियों के लिए जिम्‍मेदार हैं। इसके अलावा अम्‍लीय वर्षा के जरिये फसलों व वनों का भी नुकसान पहुंच रहा है।

वायु मण्‍डल शुद्ध करने के लिये घरों से निकलने वाले धुंए को कम करना होगा। पेट्रोल व डीजल से निकलने वाले धुऐं को निर्वातक छन्‍ना (Vaccum Filter) के जरिये कम करना चाहिए। ईट के भट्टे गांव व शहरी आबादी से दूर होना चाहिए। सड़कों के किनारे अधिक पेड़ पौधे लगाने चाहिए।

इन तमाम कोशिशों के जरिये वैश्‍वीकरण का मानव अधिकारों पर जो नकारात्‍मक प्रभाव पड़ा है शायद कुछ हद तक उसको कम किया जा सके। वैश्‍वीकरण का जो जैव मण्‍डल पर क्षति वाला प्रभाव रहा है वे जलीय मण्‍डल, स्‍थलीय मण्‍डल, वायु मण्‍डल को शुद्ध करके जैव मण्‍डल को क्षति से बचाया जा सकता है, न केवल इन्‍सान बल्‍कि कुदरत की तमाम मखलूक कुदरत का हसीन शाहकार है। उसकी सुन्‍दरता में कम इजाफा होगा जब वैश्‍वीकरण के इस दौरन में मानव के अधिकारों को रक्षित किया जावे।

आज इस वैश्‍वीकरण के जमाने में न तो ठण्‍डी हवायें ही चलती हैं और न ही झूमते हुए शजर यानि (वृक्ष) नजर आते हैं, वैश्‍वीकरण की इस मदहोशी का मानव अधिकारों पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ा है। तरक्‍की के चक्‍कर में इन्‍सान ये भूल बैठा है कि वह स्‍वयं ही अपने पर्यावरण को नष्‍ट करने पर तुला है, कभी तकनीकी विकास के बहाने, कभी धार्मिकता की आड़ में उच्‍च स्‍तरीय व्‍यवस्‍था गड़बड़ा गई है। इस व्‍यवस्‍था में तकरीबन चार बातें आती हैं – (1) जनसंख्‍या, (2) जैव समुदाय (Biotic Community) घास का मैदान, तालाब (3) पारितन्‍त्र Ecosystem (Biosphere) जल, थल, वायु प्राकृतिक भाग जिसमें सूक्ष्‍म जीव, पौधे, जन्‍तु आदि रहते हैं जीव मण्‍डल कहलाता है। यही चार आधारों वाली व्‍यवस्‍था गड़बडा गई है जिसके कारण पर्यावरण को सुरक्षित रखने में खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है, वैश्‍वीकरण के कारण ये खतरा दिन दूना और रात चौगुना बड़ रहा है। जनसंख्‍या विस्‍फोट के कारण आवास, स्‍थान, भोजन ऊर्जा आदि की मांग बड़ती जा रही है। इसे पूरा करने के लिए मुनष्‍य वनों को काट रहा है वहां मकानों, सड़कों, खेती, मवेशियों के लिये चारागाहों का निर्माण कर रहा है। जल-विद्युत योजनाऐं बनानेके लिए सैकड़ों किलो मीटर वनों का नाश हो रहा है। मनुष्‍य के दैनिक कार्यव औद्योगिक किया-कलाप वायु-जल एवं मृदाका प्रदूषण कर रहे हैं तथा वन्‍य जीवों के आवास को नष्‍ट कर रहे हैं।

यदि वैश्‍वीकरण की वहज से मानव अधिकारों पर हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है, और मनुष्‍य स्‍वयं उस पर्यावरण का नाश कर रहा है जिसमें व स्‍वयं श्‍वास लेता है, इसे रोकने के लिये जिसमें पहले कदम पर वनों व पेड़ों का संरक्षण करना है। इसमें मानव के अधिकारों की रक्षा सर्वप्रथम कार्य है, मानव का कानूनी व मानवीय अधिकार है कि उसे ऐसा वातावरण राज्‍य व सरकार की ओर से देना चाहिए जिसमें वो साफ सुथरी फिजा में सांस ले सकें। प्राकृतिक संतुलन बनाये रखने के लिये वह मानव अधिकारों की रक्षा के लिये ये उपाय करना उचित होगा – विशाल वृक्ष पर अनेक जन्‍तु निवास करते हैं अत: वृक्षोंको ईधन व अन्‍य व्‍यापारिक उपयोगों के लिये काटने पर पूर्ण प्रतिबन्‍ध लगा देना चाहिए। वनों में चोरी एवं तस्‍करी रोकने के लिये सुदृढ़ एवं कठोर व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए। वनों को पर्यटक स्‍थलों के रूप में विकसित नहीं करना चाहिए। यदि औषधि निर्माण के लिये वृक्ष को काटा जाये तो उतनी ही मात्रा में नये वृक्ष रोपड़ कर दिया जाये।

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय व राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मनुष्‍यों के अधिकारों को संरक्षित किया गया है जिसमें यूनेस्‍को का मानव और जीवन मण्‍डल कार्यक्रम व विश्‍व संरक्षण नीति प्रमुख है। इसके अतिरिक्‍त भारतीय संविधान में अनधिकृत रूप से जंगलों को काटने पर पाबन्‍दी लगा दी गई। जुलाई 1995 ई. में सम्‍पूर्ण देश में प्रत्‍येक वर्ष 1 से 8 अक्‍टूबर तक जंगली जीव सप्‍ताह माना जाता है। आवश्‍यकता इन कानूनों पर अमल करने की है। तरक्‍कीकी इस दौड़ में यदा कदा वृक्षारोपण का कार्य भी चल रहा है लेकिन प्रकृति का नुकसान इतना अधिक हो चुका है कि इनते कम स्‍तर पर इस कार्य को किया गया तो वे दिन दूर नहीं जब पृथ्‍वी आग का गोला बनती नजर आयेगी। प्राकृतिक नुकसान के लिये जिम्‍मेदार ग्रीन हाउस गैसों के लगातार बड़ने से मानव अधिकार को खतरा हासिल है। ग्रीन हाउस गैसों के लगातार बढ़ने से धरतीव समुद्र सतह का तापमान इतना अधिक हो जायेगा उदाहाणर्थ 2015 का औसत वैश्‍विक तापमान 0.73 डिग्री सेल्‍सियस अधिक रहा है। यदि तापमान इसी रफतार से बढ़ता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब 2050 आते-आते दुनिया की एक चौथाई प्रजातियां लुप्‍त होने के कगार पर होंगी। प्रकृति में असन्‍तुलन इतना अधिक हो गया है जिसका विपरीत प्रभाव मानव अधिकारों पर पड़ रहा है। वातावरण में 6 सांपों की संख्‍या कम होने से चूहों की संख्‍या बढ़ गई है, जिससे न केवल फसलों को बल्‍कि इंसानों की जिन्‍दगी पर प्‍लेग (रोग) का खतरा भी बढ़ गया है। यही कारण है कि आज भारत में अधिकांश क्षेत्रों में सूखा और अमेरिका में बाड़ आ रही है। यही आलम रहा या पृथ्‍वी का तापमान औसत बड़ता रहा तो ग्‍लेशियरके पिगलने से समुद्र तट के किनारे बसे देश, शहर नष्‍ट हो जायेंगे। वर्तमान समय में न केवल भारत बल्‍कि वैश्‍वीकरण के इस दौर में पर्यावरण की रक्षा करके मानव अधिकारों पर पड़ने वाले नकारात्‍मक प्रभाव को रोकना सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

तकनीकी विकास के नाम पर वैश्‍वीकरण की इस दौड़ में राजनीतिक स्‍तर पर लोगों के हाथ में सेलफोन जिसे मोबईल फोन भी कहते हैं, का होना आवश्‍यक हो गया है, एक तरफ ये कहा जाता है कि हमें अपनी सभ्‍यता संस्‍कृति नहीं भूलनी चाहिए दूसरी तरफ ये कहा जाता है कि सबके हाथों में ऐनेरोइड फोन होगा तभी देश का विकास होगा। क्‍या आप जानते है कि विकिरण प्रदूषण (Radiation Pollution) से मानव अधिकांश को जितना नुकसान पहुंच सकता है, मोबइल फोन एवं टावरों द्वारा प्रसारित होने वाली विद्युत चुम्‍बकीय तरंगे इन्‍सानी दिमाग और तंत्रिका तंत्र में विद्युत स्‍पन्‍द उत्‍पन्‍न करती है, जिससे सिरदर्द, अपच, अनिद्रा तथा स्‍मरण शक्‍ति का अल्‍पका‍लीन क्षय, इसके अतिरिक्‍त इन विकिरणों के सम्‍पर्क में लम्‍बे समय तक रहने से मांसपेशियों की जकड़न, अन्‍धापन, बहरापन, मास्‍तिष्‍क में गांठ, रक्‍त कैंसर आदि रोगों की सम्‍भावना बनी रहती है।

वैश्‍वीकरण का मानव अधिकारों पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ने के साथ कहा जा सकता है कि जितना विकास या वैश्‍वीकरण इन तमाम सेल, मोबइल आदि चीजों का हुआ है उतना ही वैश्‍वीकरण इन तमाम रोगों का भी हुआ है। वैश्‍विक स्‍तर पर कैंसर से हुई है। 2015 आते-आते कैंसर के मरीजों की संख्‍या बड़ा गई है। अब तक 17 लाख नये मामले सामने आये हैं।

स्‍वास्‍थ शरीर में स्‍वरूप मन का विकास यह कथन मानव को उसके अधिकारों के बारे में जागरुक करता हे। जब स्‍वस्‍थ शरीर ही नहीं होगा और उसमें स्‍वस्‍थ मन कहाँ से आयेगा। जब शरीर-मन दोनों अस्‍वस्‍थ हैं तो मानव कैसे स्‍वस्‍थ हो सकता है। उसके अधिकार कहा गयें कौन विकास करेगा किसके लिये विकास होगा?

वैश्‍वीकरण का दूसरे पहलुओं पर जो अध्‍ययन किया जाता है उनमें गरीबी, असमानता, न्‍याय मिलने में देरी, पारम्‍परिक संस्‍कृति का क्षरण आदि शामिल है। गरीबी से न केवल भारत बल्‍कि एशियाई स्‍तर पर बांग्‍लादेश, भूटान, नेपाल, अफगानिस्‍तान आदि देशों में मानव को दो वक्‍त की रोटी जुटाना मुश्‍क‍िल हो रहा है। पहले व्‍यक्‍ति की मूल आवश्‍यकताओं की पूर्ति होगी।उसके उपरान्‍त विकास आदि से सम्‍बन्‍धित वस्‍तुओं पर ध्‍यान दिया जायेगा। मानव अधिकारों को प्राप्‍त करने में अक्षम व्‍यक्‍तियों को स्‍वयं अपने अधिकारों की जानकारी होना भी आवश्‍यक है। असमानता तो विश्‍व स्‍तर पर हर जगह देखने को मिल जायेगी लेकिन व्‍यक्‍तियों में इतनी समझ या साहस नहीं है कि अपने प्रति हो रही असमानता के विरूद्ध आवाज उठाये। न्‍यायिक आधार पर भी मानव के अधिकार रक्षित नहीं है। न्‍याय मिलने में अनआवश्‍यक देर या जुर्म के अनुपात में दण्‍ड का न मिलना ये भी मानव अधिरकारों पर कुठाराघात है जो आज उस वैश्‍वीकरण के जमाने में हो रहा है। पारम्‍परिक संस्‍कृति को भी तभी सुरक्षित रखा जा सकता है, तब नैतिक मूल्‍यों का मानव में वासहो आज के इस वैश्‍वीकरण के जमाने में ये बात नामुनकीन लगती है। जैसाकि विश्‍व स्‍तर पर हो रही घटनाओं को देख कर कहा जा सकता है। बताइये जलवायु जैसे नाजुक मुद्दों पर हो रहे पेरिस पर्यावरण सम्‍मेलन से पूर्व आतंकी हमला या फिर साम्‍प्रदायिक मतभेदों के होने से बिगड़ी सामाजिक व्‍यवस्‍था या फिर आतंकवाद के नाम पर अमेरिका द्वारा अफगानिस्‍तान के प्रति रवैया ये सब मानव अधिकारों के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव को नकारात्‍मक रूप में ही दर्शाता है।
मेजर ध्यानचंद पर निबंध। Major Dhyan Chand par Nibandh

मेजर ध्यानचंद पर निबंध। Major Dhyan Chand par Nibandh

मेजर ध्यानचंद पर निबंध। Major Dhyan Chand par Nibandh

मेजर ध्यानचंद पर निबंध। Major Dhyan Chand par Nibandh
मेजर ध्‍यानचंद, जिन्‍हें हॉकी के जादूगर के रूप में जाना जाता है, ने हॉकी खेलना फौज में शुरू किया। उन्‍हें 1926 में न्‍यूजीलैंड के दौरे पर जाने वाली हॉकी टीम में शामिल किया गया। अपने शानदार खेल की बदौलत ध्‍यानचंद की देश-विदेश में बेहद सराहना हुई। ध्‍यानचंद की सहायता से भारत ने लगातार तीन ओलंपिक खेलों एम्‍सटर्डस (1928), लॉसंए‍जलिस (1932) और बर्लिन (1936) में स्‍वर्ण पदक प्राप्‍त किए। ध्‍यानचंद ने ओलंपिक खेलों में 101 गोल और दूसरे अंतर्राष्‍ट्रीय खेलों में 300 गोल किये। भारत सरकार ने उन्‍हें 1954 में पद्मभूषण से नवाजा। ध्‍यानचंद का जन्‍मदिन (29 अगस्‍त) को राष्‍ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

ध्‍यानचंद की धाक इतनी थी कि वियना के र्स्‍पोर्ट्स क्‍लब में उनकी एक प्रतिमा स्‍थापित की गई, जिसके चार हाथ थे और उनमें चार हॉकी स्‍टिक थीं। ध्‍यानचंद हॉकी के मैदान में इतने चमत्‍कारिक होते थे कि संसार-भर में लोगों को संदेह होता था कि क्‍या उनकी स्‍टिक लकड़ी के अलावा किसी और वस्‍तु से बनी है! हॉलैंड में ध्‍यानचंद की हॉकी स्‍टिक को तोड़कर देखा गया कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं है। जापान में लोगों ने सोचा कि उनकी स्‍टिक के अंदर गोंद लगा है।

ध्‍यानचंद का जन्‍म 29 अगस्‍त, 1905 को इलाहाबार में हुआ था। उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में थे। ध्‍यानचंद ने अपना शुरूआती समय झांसी में बिताया। 16 वर्ष की उम्र में ध्‍यानचंद सेना में भार्ती हो गये औैर उन्‍होंने हॉकी को गंभीरता से लेना प्रारंभ किया। बर्लिन ओलंपिक में हिटलर उनके खेल से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्‍हें जर्मन सेना में कर्नल बनाने का प्रस्‍ताव दिया। उन्‍होंने पूर्वी अफ्रीका जाने वाली टीम का नेतृत्‍व किया। इस टूर में भारत द्वारा खेले 21 मैचों में ध्‍यानचंद ने 61 गोल किये। 30 वर्ष के उत्‍कृष्‍ट करियर के बाद ध्‍यानचंद ने 1949 में अंतर्राष्‍ट्रीय हॉकी को अलविदा कह दिया। वह नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ स्‍पोर्ट्स के मुख्‍य कोच के रूप सेवानिवृत हुए। उनके असाधारण योगदान के लिये, भारत सरकार ने 1956 में पद्मभूषण से सम्‍मानित किया।
3 दिसंबर, 1979 को इस महान हॉकी खिलाड़ी का निधन हो गया।
10 Lines on Amitabh Bachchan in Hindi

10 Lines on Amitabh Bachchan in Hindi

10 Lines on Amitabh Bachchan in Hindi

In this article, we are providing 10 lines about Amitabh Bachchan in Hindi. In this few / some lines on Amitabh Bachchan, you will get a few sentences to write a short essay on Amitabh Bachchan. हिंदी में अमिताभ बच्चन पर 10 वाक्य।
10 Lines on Amitabh Bachchan in Hindi
  1. अमिताभ बच्चन का जन्म 11 अक्टूबर 1942 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले में हुआ। 
  2. अमिताभ बच्चन बॉलीवुड के लोकप्रिय अभिनेता हैं उन्हें सदी का महानायक माना जाता है। 
  3. उनके पिता का नाम हरिवंश राय बच्चन तथा माता का नाम तेजी बच्चन है। 
  4. 3 जून 1973 को इन्होंने जया भादुड़ी  नामक एक अभिनेत्री से विवाह कर लिया। 
  5. उनकी पुत्री का नाम श्वेता नंदा तथा पुत्र का नाम अभिषेक बच्चन है। 
  6. अमिताभ बच्चन ने अपने फिल्मी करियर में 3 राष्ट्रीय पुरस्कार और 12 फिल्म फेयर पुरस्कार जीते। 
  7. फिल्मों के अलावा अमिताभ में गायन और राजनीति जैसे क्षेत्रों में भी अपना हाथ आजमाया। 
  8. 1984 में अमिताभ ने राजनीति में प्रवेश किया और इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव जीता। 
  9. अमिताभ ने धर्मेंद्र शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया। 
  10. इन्होंने "कौन बनेगा करोड़पति" जैसे चर्चित कार्यक्रम में होस्ट की भूमिका निभाई थी। 
  11. उन्होंने याराना, जंजीर, शोले और नमक हलाल जैसी सदाबहार फिल्मों में अभिनय किया। 
  12. बच्चन को २००५ में पोलियो उन्मूलन अभियान के लिए यूनिसेफ राजदूत नियुक्त किया गया था। 

Tuesday, 11 June 2019

10 lines on chandragupta maurya in hindi

10 lines on chandragupta maurya in hindi

10 Lines on Chandragupta Maurya in Hindi

In this article, we are providing 10 lines about Chandragupta Maurya in Hindi. In this few / some lines on Chandragupta Maurya, you will get a few sentences to write a short essay on Chandragupta Maurya. हिंदी में चन्द्रगुप्त मौर्य पर 10 वाक्य।
  1. चन्द्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। 
  2. चंद्रगुप्त मौर्य प्राचीन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजा हैं। 
  3. चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई. पूर्व में मौरिय कुल में हुआ था। 
  4. चंद्र गुप्त मौर्य की माता का नाम मुरा था। 
  5. चंद्रगुप्त का साम्राज्य अत्यंत विस्तृत था। 
  6. चंद्रगुप्त मौर्य ने 23 वर्ष की अल्पायु धनानंद को पराजित किया। 
  7. ३२२ ई.पू. में सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य मगध के सिंहासन पर बैठे। 
  8. चन्द्रगुप्त सैंड्रोक्रेट्स और अन्ड्रोक्रेट्स के नाम से भी जाने जाते है। 
  9. सम्राट चन्द्रगुप्त के वंश में बिन्दुसार और अशोक जैसे महान राजा हुए। 
  10. चाणक्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु, पुरोहित तथा मुख्यमंत्री थे। 
  11. पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) चंद्रगुप्त की राजधानी थी। 
  12. 305 ईसापूर्व में उन्होंने सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया। 
  13. सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलना का विवाह चंद्रगुप्त के साथ कर दिया। 
  14. लगभग-300 ई. पू. में चंद्रगुप्त ने अपने पुत्र बिंदुसार को गद्दी सौंप दी। 
  15. अपने अंतिम समय में सम्राट चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म अपना लिया। 
  16. 297 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त ने उपवास द्वारा अपने प्राणत्याग दिए।