Thursday, 15 November 2018

कन्या भ्रूण हत्या पर कविता संग्रह। Kanya Bhrun Hatya par Poem

कन्या भ्रूण हत्या पर कविता संग्रह। Kanya Bhrun Hatya par Poem

कन्या भ्रूण हत्या पर कविता संग्रह। Kanya Bhrun Hatya par Poem

Kanya Bhrun Hatya par Poem
संतान को धर्म के संस्कारों में डालने वाली मां होती है
नादानी में होने वाले भूलों को टालने वाली मां होती है
गर्भ में पल रहे भ्रूण की हत्यारिन को मां कैसे कह दें
खुद भूखे रहकर औलाद को पालने वाली मां होती है।

गर्भस्थ बेटी मां से यही पुकार करती है
हे मां ! मेरे प्राण बेवजह क्यों हरती है
यदि मेरी मौत से तेरी दुनिया आबाद रहे
तो यह बेटी दुआओं से तेरा दामन भरती है।

कोख में पल रहे भ्रूण से आज क्यों है दूरी
बेटी के जन्म का अधिकार छीनने की कैसी है मजबूरी
बेटियां इसी तरह मरती रही तो याद रखना
बहू के संग बेटे की गृहस्थी बसाने की हसरत रहेंगी अधूरी।

आज नारी अपने ही अस्तित्व को नकार रही है
अभिशाप है बेटिया धरती पर पुकार रही है
हद से गुजर कर शर्मसार हो गई है मां की ममता
जन्म से पहले ही मासूम को कोख में मार रही है।
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क्यों भ्रूण हत्या का चक्कर सिर पर मंडरा रहा है
नारियां ही नारी की क्यों दुश्मन बन रही है
एक दूजे से यह वादा करते हैं हम अभी
भ्रूण हत्या ने अपना योगदान देंगे नहीं कभी
अगर हमारे मां-बाप में भी भ्रूण हत्या की होती
तो हमारे जीवन की ज्योत कब की बुझ गई होती।

भ्रूण हत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं होता
हैवान को अपने किए पर पश्चाताप नहीं होता
बेबस मां को कोख उजाड़ने पर मजबूर कर दे
ऐसा निर्दयी असल में इंसान नहीं होता।

मत मारो बिटिया को, घर कैसे बनाओगे
नहीं संभले तो एक दिन पछताओगे
बेटी है कुल की शान बेटी है घर का मान
बेटा बेटी है समान, कन्या है  एक वरदान।

अब भी संभल जाओ, भ्रूण हत्या ना करो
आत्महत्या का,  त्याग तुम करो
निर्दोष प्राणी को कभी मत मारो
कभी मत मारो, भ्रृण जीवन तारों।
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मां मोम सा कोमल मन तेरा, कैसे पत्थर का हो गया
अभी तेरे गर्भ में आई ही थी, कैसे वध मेरा हो गया
जिसे तूने अपने खून से सींचा, क्या मैं वह क्यारी ना थी
होगी सभी को बेटे की आस, पर क्या मैं तुझको प्यारी ना थी।

बेटे से क्यों मोह है इतना, मुझसे मां क्यों इतना डर
अपना लूंगी मैं भी तो मां, तेरे सारे दुख और दर्द!
कोई नहीं एक दूसरे से कम
हीरा अगर बेटा है तो बेटी नहीं मोती से कम ।
अगर हीरा है बेटा तो मोती है बेटी
एक कुल रोशन करेगा बेटा,

पर दो कुलों की लाज रखती है बेटी।
बेटा तब तक हैं बेटा, जब तक ना बन जाता वर
बेटी सदगुण की पेटी, बेटी रहती जीवन भर
ममता का गला घोट क्यों, बेटे पर मां दीवानी
घटती संख्या नारी की है आज चुनौती भारी।
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यह दुनिया अगर गुलशन है तो नारी है उसकी माली
वह झुक जाए तो सीता उठ जाए तो चंडी काली ।
भारत माता के वतन में देखो कैसी नादानी
कन्या भ्रूण की हत्या युगों की क्रूर कहानी।
उठो बहनों यह प्रण लो, यह पाप नहीं होने देंगे
एक नन्ही सुगंधित कली को यूंही नहीं सोने देंगे।
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--- कन्या भ्रूण हत्या पर एक कविता---
कोर्ट में एक अजीब मुकदमा आया
एक सिपाही एक कुत्ते को बांध कर लाया
सिपाही ने जब कटघरे में आकर कुत्ता खोला
कुत्ता रहा चुपचाप, मुँह से कुछ ना बोला

नुकीले दांतों में कुछ खून-सा नज़र आ रहा था
चुपचाप था कुत्ता, किसी से ना नजर मिला रहा था
फिर हुआ खड़ा एक वकील
देने लगा दलील
बोला, इस जालिम के कर्मों से यहाँ मची तबाही है
इसके कामों को देख कर इन्सानियत घबराई है
ये क्रूर है, निर्दयी है, इसने तबाही मचाई है
दो दिन पहले जन्मी एक कन्या, अपने दाँतों से खाई है
अब ना देखो किसी की बाट
आदेश करके उतारो इसे मौत के घाट
जज की आँख हो गयी लाल
तूने क्यूँ खाई कन्या, जल्दी बोल डाल
तुझे बोलने का मौका नहीं देना चाहता
लेकिन मजबूरी है, अब तक तो तू फांसी पर लटका पाता
जज साहब, इसे जिन्दा मत रहने दो
कुत्ते का वकील बोला, लेकिन इसे कुछ कहने तो दो
फिर कुत्ते ने मुंह खोला
और धीरे से बोला
हाँ, मैंने वो लड़की खायी है
अपनी कुत्तानियत निभाई है
कुत्ते का धर्म है ना दया दिखाना
माँस चाहे किसी का हो, देखते ही खा जाना
पर मैं दया-धर्म से दूर नही
खाई तो है, पर मेरा कसूर नही
मुझे याद है, जब वो लड़की छोरी कूड़े के ढेर में पाई थी
और कोई नही, उसकी माँ ही उसे फेंकने आई थी
जब मैं उस कन्या के गया पास
उसकी आँखों में देखा भोला विश्वास
जब वो मेरी जीभ देख कर मुस्काई थी
कुत्ता हूँ, पर उसने मेरे अन्दर इन्सानियत जगाई थी
मैंने सूंघ कर उसके कपड़े, वो घर खोजा था
जहाँ माँ उसकी थी, और बापू भी सोया था
मैंने कू-कू करके उसकी माँ जगाई
पूछा तू क्यों उस कन्या को फेंक कर आई
चल मेरे साथ, उसे लेकर आ
भूखी है वो, उसे अपना दूध पिला
माँ सुनते ही रोने लगी
अपने दुख सुनाने लगी
बोली, कैसे लाऊँ अपने कलेजे के टुकड़े को
तू सुन, तुझे बताती हूँ अपने दिल के दुखड़े को
मेरे पास पहले ही चार छोरी हैं
दो को बुखार है, दो चटाई पर सो रही हैं
मेरी सासू मारती है तानों की मार
मुझे ही पीटता है, मेरा भरतार
बोला, फिर से तू लड़की ले आई
कैसे जायेंगी ये सारी ब्याही
वंश की तो तूने काट दी बेल
जा खत्म कर दे इसका खेल
माँ हूँ, लेकिन थी मेरी लाचारी
इसलिए फेंक आई, अपनी बिटिया प्यारी
कुत्ते का गला भर गया
लेकिन बयान वो पूरे बोल गया
बोला, मैं फिर उल्टा आ गया
दिमाग पर मेरे धुआं सा छा गया
वो लड़की अपना, अंगूठा चूस रही थी
मुझे देखते ही हंसी, जैसे मेरी बाट में जग रही थी
कलेजे पर मैंने भी रख लिया था पत्थर
फिर भी काँप रहा था मैं थर-थर
मैं बोला, अरी बावली, जीकर क्या करेगी
यहाँ दूध नही, हर जगह तेरे लिए जहर है, पीकर क्या करेगी
हम कुत्तों को तो, करते हो बदनाम
परन्तु हमसे भी घिनौने, करते हो काम
जिन्दी लड़की को पेट में मरवाते हो
और खुद को इंसान कहलवाते हो
मेरे मन में, डर कर गयी उसकी मुस्कान
लेकिन मैंने इतना तो लिया था जान
जो समाज इससे नफरत करता है
कन्याहत्या जैसा घिनौना अपराध करता है
वहां से तो इसका जाना अच्छा
इसका तो मर जान अच्छा
तुम लटकाओ मुझे फांसी, चाहे मारो जूत्ते
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते
लेकिन खोज के लाओ, पहले वो इन्सानी कुत्ते
.........प्रस्तुत कविता मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार के फेसबुक पेज से ली गयी है
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पूजा अर्चना कर देवी मां से वरदान है मांगते
इधर कोमल से बेटियों का घात है करते
लोग होते हैं ये इंसानियत के नाम पर धब्बा
ऐसे दानवो से मुझे बचाना मेरे रब्बा
क्यों दुनिया में आने से पहले मेरी दुनिया उजाड़ देते
अपने ही जिगर के टुकड़े का गला घोट देते
सुना है मैंने दयामय है भारतीय संस्कृति
फिर कैसे हो जाती है इनकी दानवभरी विकृति
तुम मेरी हत्या ऐसे ही करते रहोगे
तो कल अपने बेटे के लिए बहू कहां से लाओगे
मारकर मुझे तुम बच ना पाओगे
भगवान के घर जाकर क्या मुंह दिखाओगे
कानून ने भी दिया है मुझे जीने का अधिकार
मुझे मारने वालों का है धिक्कार धिक्कार धिक्कार। 

Wednesday, 14 November 2018

महिला सशक्‍तिकरण की परिभाषा, आवश्यकता एवं महत्व

महिला सशक्‍तिकरण की परिभाषा, आवश्यकता एवं महत्व

महिला सशक्‍तिकरण की परिभाषा, आवश्यकता एवं महत्व

women empowerment in india
विश्‍व के लगभग सभी समाजों में महिलाओं का स्‍तर पुरुषों के समान नहीं है। वर्तमान सामाजिक ढ़ाचे में पुरुषों को अधिक अधिकार संसाधन और निर्णय लेने की शक्‍ति प्राप्‍त है। महिलाओं को परंपरागत भूमिकाएं सौंपी गयी हैं। गांवों मे महिलाओं का कार्य खेती में अधिकांशत: बीज छीटना, पौधारोपण खाद पानी, फसल की कटाई एवं उन्‍हें घर लाना है, फिर भी महिलाओं को किसी श्रेणी में नहीं रखा गया है। एक समान कार्य के लिए पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को कम वेतन व कम मजदूरी दी जाती है। लगभग सभी क्षेत्रों में महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। ऐसा क्‍यों? अमेरिका जैसे विकसित देश में भी अभी तक कोई महिला राष्‍ट्रपति नहीं बनायी गयी है।

भारत में महिलाओं की स्थिति : महिला सशक्‍तिकरण जैसे विषय को अधार बनाकर विभिन्‍न कालों में महिलाओं की स्‍थिति का विवरण प्रस्‍तुत करना आवश्‍यक होगा, स्‍त्रियों के सम्‍बंध में भारतीय समाज में स्‍त्री को सम्‍मानपूर्ण स्‍थिति प्राप्‍त रही है। उसको शक्‍ति की साकार प्रतिमा के रूप में माना गया है। यहां लक्ष्‍मी सरस्‍वती दुर्गा की आराधना की जाती है, वैदिक और ऋगवैदिक काल में स्‍त्रियों की स्‍थिति काफी उन्‍नत थी। कालान्‍तर में पुरुष इनके अधिकारों को छीनता गया और इनकी स्‍थि‍ति में गिरावट आती गयी। 19वीं शताब्‍दी में इनकी स्‍थिति में सुधार लाने के लिए व्‍यापक प्रयास किए गए। इन प्रयासों में विभिन्‍न कालों में स्‍त्रियों की स्‍थिति में भिन्‍नता पायी जाती रही है।

महिला सशक्‍तिकरण की परिभाषा : सशक्‍तिकरण एक व्‍यापक शब्‍द है, जिसमें अधिकारों और शक्‍तियों का स्‍वाभाविक रूप से समावेश है, यह एक ऐसी मानसिक अवस्‍था है, जो कुछ विशेष आंतरिक कुशलताओं और शै‍क्षणिक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जिसके लिए समाज में आवश्‍यक कानूनों सुरक्षात्‍मक प्रावधनों और उनके भली-भांति क्रियान्‍वयन हेतु सक्षम प्रशासनिक व्‍यवस्‍था का होना है। इस प्रकार महिला सशक्‍तिकरण से तात्‍पर्य एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया से है, जिसमें महिलाओं के लिए सर्वसंपन्‍न और विकसित होने हेतु संभावनाओं द्वारा खुले नये विकल्‍प तैयार हों, भोजन, पानी घर शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, सुविधायें, पशुपालन, प्राक्रतिक संसाधन, बैंकिंग सुविधांए कानूनी हक और प्रतिमाओं के विकास में पर्यापत रचनात्‍मक अवसर प्राप्‍त हों।

महिला सशक्‍तिकरण की आवश्यकता : किसी भी समाज के विकास में दोनों पक्षों की भूमिका आवश्‍यक है अर्थात् स्‍त्री-पुरुषों दोनों की भागीदारी आवश्‍यक है, तभी किसी भी समाज में समृद्ध, सौहार्द्र और खशहाली के बीज बोये जा सक‍ते है, अन्‍यथा विषम परिस्‍थतियों में दोनों एक-दूसरे का काम नहीं आ सकेंगे, आज महिलाओं पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है। किसी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं, बस इस बात की चिंता है कि उनकी भागीदारी का प्रतिशत सभी क्षेत्रों में बहुत कम है, जबकि जनसंख्‍या में उनकी भागीदारी लगभग 50 प्रतिशत की है।

आज अगर महिलाओं का विभिन्‍न क्षेत्रों में योगदान देखा जाय तो ऐसा लगता है, कि महिलायें पुरुषों की अपेक्षा काफी सार्थक सिद्ध हो रही हैं। अखिर ऐसा, क्‍यों, ऐसा होने पर भी लड़का और लड़की में इतनी असमानता? हमें सोचना होगा कि क्‍यों एक मां लड़की के जन्‍म पर मातम मनाती है और लड़के के जन्‍म पर खुश होती है, मिठाइयां बाँटती है। आखिर स्‍त्री में इतना भेद क्‍यों? कहना न होगा इसके लिए हमारा समाज उत्‍तरदायजी है। जिसके कारण आज महिला सशक्‍तिकरण जैसा मुद्दा समाज को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। जबकि कारण वास्‍तव में महिलाओं सशक्‍तिकरण जैसा मुद्दा समाज को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। जबकि वास्‍तव में महिलाओं पृथ्‍वी से नभ तक अपनी प्रतिभाओं का परचम लहरा रही हैं, साहित्‍य जगत से लेकर उद्योगों, कल–कारखानें, चिकित्‍सा, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, फिल्‍म जगत, राजनीति, खेल, इत्‍यादि क्षेत्रों में उनका सराहनीय योगदान है।

महिला सशक्‍तिकरण और वर्तमान भारत : भारतीय सामाजिक ढांचा समाज में पुरुष और महिलाओं की अलग-अलग भूमिकायें निर्धारित करता है। विश्‍व के लगभग सभी समाजों में महिलाओं का स्‍तर पुरुषों के समान नहीं है। वर्तमान सामाजिक ढांचा पुरुषों को अधिक अधिकार, संसाधन और निर्णय लेने की शक्‍ति प्रदान करता है। महिलाओं को परंपरागत भूमिकाओं सौंपी गयी हैं-वे हैं माता, पत्‍नी बनाम गृहणी, रसोइया और बच्‍चों की देखभाल करने वाली। समान शैक्षिक याग्‍यता और समान पद के बावजूद भी विवाह के समय किया जाने वाला दहेज, समाज में महिलाओं की स्‍थिति स्‍वयं उजागर करता है। इन सब बाधक तत्‍वों के बावजूद महिलायें अपना परचम सभी क्षेत्रों में लहरा रही हैं, तभी पुरुष वर्ग महिलाओं को आगे आने के लिए सुअवसर प्रदान कर रहे हैं- तभी किसी ने खूब कहा है-

       तुम हो घर-घर लगता है।
                वरना इसमें डर लगता है।
                   तेरे माथे पर ये आंचल खूब अच्‍छा लगता है।
                    अगर तू इस आचंल को परचम बना लेती।

समाज के इतने बड़े भाग की उपेक्षा कर भारत प्रगति नहीं कर सकता। हमें कंधे से कंधा मिलाकरचलना होग। अपने विचारों में बदलवा लाना होगा तभी महिलओं को मां, पत्‍नी, बहन और एक बेटी का दर्जा दिलाने में हम सब उनके विश्‍वास को जीत पायेंगे। अन्‍यथा विषय की चर्चा करना निरर्थक साबित होगा। एक मां को सोचना होगा कि लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं, सभी समान हैं, हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा।

सरकारी आँकड़े : यदि प्रत्‍येक 10 वर्षों में होने वाली जनगणना के आंकड़ो को आधार बनाया जाये तो वर्ष 2001 की जनगणना में लिंगनुपात प्रति हजार पुरुषों पर 933 था जो वर्ष 2011 की जनगणना में बढ़कर 943 हुआ। 0-6 आयु वर्ग को लिंगानुपात में सकारात्‍मक परिवर्तन देखने को मिले अर्थात् 2001 की जनगणना से शिशु लिंगानुपात 914 था जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 927 हो गया। आंकड़ों में यह परिवर्तन महिलाओं की साक्षरता दर जो 53.67 थी। वह 2011 में बढ़कर 64.6 प्रतिशत के स्‍तर पर पहुंच गयी है। परन्‍तु फिर भी महिलाओं को दहेज, गर्भपात और यौन उत्‍पीड़न की आग में झुलसना पड़ रहा है। आखिर पुरुष स्‍वयं को सर्वोच्‍च् सिद्ध करने में क्‍यों तुला है?

आजकल युवाओं में एक प्रवृत्ति पनपती जा रही है कि नौकरी के पश्‍चात शारी करेंगे लेकिन लड़कियों के माता-पिता उन्‍हें ऐसा सोचने नहीं देते, लड़कियों को अपनी जिन्‍दगी का फैसला करने का कोई अधिकार नहीं दिया जाता। ऐसे भेद-भाव पूर्ण व्‍यावहार की नींव रखने में पिता के साथ माता की भी संलिप्‍तता रहती है। यह विडम्‍बना समाज कहां तक सहन करेगा। एक दिन जरूर इस अंधकारमय रुपी सोच, को प्रकाश का सामना करना पड़ेगा और उस दिन समाज उन्नति की राह पर चल पड़ेगा ।

महिला सशक्तिकरण में सरकार की भूमिका : इतने शोषण एवं उत्‍पीड़न के बावजूद महिलाओं ने प्रत्‍येक क्षेत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है। भारतीय संविधान का अनुच्‍छेद 14 महिलाओं और पुरुषों को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है। अनुच्‍छेद 15 महिलाओं को समानता का अधिकार प्रदान करता है। अनुच्‍छेद 16 सभी नगरिकों को रोजगार का समान अवसर देता है। अनुच्‍छेद 39 सुरक्षा तथा रोजगार का समान कार्य के लिए समान वेतन की भी घोषणा करता है। वर्ष 2001 को महिला शक्‍तिकरण वर्ष घोषित कर महिला सशक्‍तिकरण की नीति तैयार की गई है। फिर भी अगर देखा जाय तो केन्‍द्र राज्‍य सकरार की और से महिला विकास कार्यक्रम चला रही हैं, जिसमें उनके कल्‍याण के प्रावधान किए गए हैं। इस हेतु सरकार द्वारा महिला कल्‍याण के जो प्रयास किए गए हैं उनमें बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओ योजना, कामधेनु योजना, किशोरी बालिका योजना, स्‍वस्‍थ स्‍त्री योजना, सैनेट्री मार्ट योजना, अपनी बेटी, अपना धन योजना, पंचधारा योजना, आदि योजनाएं राज्‍य एवं केन्‍द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही हैं।

भारत सरकार द्वारा वर्ष 2001, महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में मनाने के निर्णय से इस वर्ष देश में महिलाओं को सामाजिक, अर्थिक, राजनैतिक दृष्टि से अधिक सशक्‍त बनाने का प्रयास किया जा रहा है, ये कल्‍याणकारी योजनाएं महिलाओं के प्रति बढ़ रहे दुर्व्‍यवहार और हिंसा की घटनाओं को कम करने में मदद करेगी।

सामाजिक, आर्थिक और सांविधानिक सशक्‍तिकरण के अतिरिक्‍त राजनैतिक सशक्‍तिकरण हेतु महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने का प्रयास किया गया है ताकि राजनैतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।

उपसंहार : केन्‍द्र सरकार द्वारा संसद तथा विधानमण्‍डलों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों पर आरक्षण प्रदान करने हेतु वर्ष 1998 एवं 1999 में प्रस्‍तावित विधेयक को पास करने हेतु सभी राजनैतिक पार्टियों में आम राय बनाने की कोशिश की गयी तथा इसको पास कराने का भरसक प्रयास किया गया। यद्यपि तमाम अड़चनों के बावजूद यह विधेयक पारित नहीं किया जा सका, फिर भी महिलायें पंचायती राज व्‍यवस्‍था के माध्‍यम से अपनी भूमिका को कहीं-न-कहीं उजागर कर रही हैं।

देश में महिलाओं को राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास में बराबरी की भागीदारी के अवसर प्रदान करने के लिए विशेष प्रयास किया जाना आवश्‍यक है। इस तरह निम्‍न कदम उठाने की जरूरत है:

देश में महिलाओं के लिए ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे कि वे महसूस कर सकें कि वे आर्थिक और सामाजिक नीतियां बनाने मे शामिल हैं। महिलाओं को मानव अधिकारों का उपयोग करने हेतु सक्षम बनाना।

देश में महिलाओं की शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा में भागीदारी सुनिश्चित करना, महिलाओं के प्रति किसी तरह के भेदभाव को दूर करने के लिए समुचित कानूनी प्रणाली सामुदायिक प्रक्रिया विकसित करना, समाज में महिलाओं के प्रति व्‍यवहार में परिवर्तन लाने के लिए महिलाओं और पुरुषों को समाज में बराबर की भागीदारी निभाने को बढ़ावा देना, महिलाओं और महिलाओं और बालिकाओं के प्रति किसी भी प्रकार के अपराध के रूप में व्‍याप्‍त असमानतओं को दूर करना इत्‍यादि।
अन्‍तत: कहना होगा कि –
        कोमल है कमजोर नही तू शक्‍ति का नाम ही नारी है।

         जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है

Tuesday, 13 November 2018

हिंदी निबंध - नारी सशक्‍तिकरण अवधारणा, गुण दोष एवं आवश्यक सुधार

हिंदी निबंध - नारी सशक्‍तिकरण अवधारणा, गुण दोष एवं आवश्यक सुधार

हिंदी निबंध - नारी सशक्‍तिकरण अवधारणा, गुण दोष एवं आवश्यक सुधार

nari sashaktikaran
उन्‍नीसवीं सदी को जहां हम मुख्‍यत: पुनर्जागरण के नाम से जानते हैं, वहीं इक्‍कीसवीं सदी को हम महिला की सदी  के नाम से जानेंगे, क्‍योंकि महिलाओं की बदली स्थिति यही ता रही है। जिस सउदी अरब में महिलाओं को कार चलाने पर पाबंदी थी वहाँ स्‍त्रियां विमान उड़ा रही हैं। मई 2005 में कुवैती महिलाओं को वोट का अधिकार दिया गया है। हाल ही में हमारे यहाँ घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून बनाया गया है। इसमें अन्‍य बातों के अलावा यौन प्रताड़ना और गाली-गलौज को भी हिंसा की कोटि में रखा गया है। यद्यपि उन्‍नीसवीं सदी के बहुत-से मसलों की अनुगूंजें अभी तक सुनाई देती रहती हैं। जैसा कि अभी तक बड़ी संख्‍या में विधवाओं का विवाह न होना या भिन्‍न अवसरों पर होने वाले बाल विवाह या फिर दहेज के न मिलने पर स्‍त्री को सताया जाना या फिर विदेशी दूल्‍हे के लालच में लड़की को बिना जांच-पड़ताल के ब्‍याह कर देना। कभी-कभी किसी स्‍त्री के सती होने की घटना भी सुनाई दे जाती है। दहेज की सताई गई स्‍त्री को न्‍याय नहीं मिला पाता हैं। बलात्‍कार से पीडि़त स्‍त्री को सताने वाले भी प्राय: दंड भागीदार नहीं बन पाते हैं।

नारी सशक्‍तिकारण अब अकादमिक बहस का मुद्दा नहीं रह गया है। संस्‍कृतिकवादी पुरातनपन्‍थी लोग समय-रथ को पीछे खीचनें का चाहे जितना प्रयास करें आज की नारी पारम्‍परिक सोच के दकियानूसी दायरे को तोड़कर चहुंमुखी विकास की ओर अग्रसर है। उसे एक प्रजननकारी कोख समझने की सामन्‍ती मानसिकता का खुलेआम समर्थन करने का साहस अब उनके शोषण करने वालों में भी नहीं है। नयी सदी में नारी प्रश्‍न पर एक मुक्‍तमयी चेतना का निर्माण हुआ है और यही चेतना नारी सशक्‍तिकरण के रूप में अभिव्‍यक्‍त हो रही है। निश्‍चय ही इसके व्‍यापक परिणाम हमारे सामाजिक जीवन पर पडेंगे।

नए आन्‍दोलन से जुड़ी सरकारी, गैर सरकारी और अर्द्ध सरकारी संस्थाओं द्वारा नारी सशक्‍तिकरण का मुद्दा काफी जोर-सोर से उठाया जा रहा है। ऐसे में प्रश्‍न उठता है कि नारी सशक्‍तिकरण है क्‍या? और इसका वाहक कौन हो सकता है?

नारी सशक्‍तिकरण की अवधारणा को समझने के लिए नारी मुक्‍ति आंदोलन की ऐतिहासिक परम्‍परा को समझना आवश्‍यक है। इसके तीन चरण स्‍पष्‍ट रूप से देखे जा सकते हैं जिसे कल्‍याण, पुनर्वास एवं सशक्‍तिकरण मॉडल कहा जा सकता है।

प्रथम चरण को 18वीं सदी के मध्‍य तक माना जा सकता है। सैद्धान्‍तिक रूप से इस दौरान औसत मर्द के मध्‍य गैर-बराबरी को लेकर मूलभूत प्रश्‍न उठाए गये और यह स्‍थापना की गयी कि वर्ग और जाति के समान ही लिंग को भी समाजिक न्‍याय के विवेचन में एक स्‍वतंत्र स्‍थान दिया जाना चाहिए। इस दौरान सारा जोर महिलाओं को मर्दों के समान ही समाज में बराबर अधिकार पाने के हक पर दिया गया है। यह सब उदारवादी नागरिक अधिकारों की वैचारिक दृष्टि के अंतर्गत था। पुरुषों के समान ही नारियों को समान कार्य के लिए समान वेतन, चिकित्‍सा सुविधाओं, गर्भपात के कानूनी अधिकार आदि के लिए समाज और राज्‍य की ओर से प्रयत्‍न किए गए। यह माना गया कि सारी दुनिया में स्‍त्रियों की समस्‍याएं और उनके हल एक समान है क्‍योंकि पितृसत्‍तात्‍मक समाज ही नारी शोषण का आधार है जिसका अन्‍त नारी पुरुष के मध्‍य कानूनी असमानता दूर करके ही संभव है। इसे नारी कल्‍याण मॉडल कहा गया। 

ईस्‍टर बोसेरप की पुस्‍तक Woman’s Role in Economic Development को हम नारी विकास मॉडल का आरंभिक स्‍त्रोत मान कते हैं। उसने दर्शाया कि कार्य सम्‍पादन,  संसाधनों की उपलब्‍धता और लाभों के बटवारे में लैंगिक असमानता है। आगे के शोध कार्यों से यह स्‍पष्‍ट हो गया कि यद्यपि दुनिया की पचास फीसदी आबादी महिलाओं की है तथापि वे लगभग दो-तिहाई कार्य घंटो का निष्‍पादन करती हैं परंतु आय का दसवां हिस्‍सा ही उन्‍हें प्राप्‍त होता है और वे सम्‍पत्ति के मात्र एक प्रतिशत की स्‍वामिनी हैं। इस प्रकार की लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए नारी विकास की विशिष्‍ट योजनाएं प्रारम्‍भ की गयीं। किन्‍तु इन प्रयत्‍नों से पता चला कि ऐसी योजनाओं से महिलाओं को बराबरी का स्‍थान नहीं मिल सका। बल्कि पहले से विद्यमान सामाजिक असमानताएं और मजबूत हुईं। कुछ विद्वान का मत था कि ऐसा विकास पूंजीवाद- पितृसत्‍तात्‍मक मॉडल के रहते स्‍वाभाविक ही था। जो भी हो, इस तथ्‍य ने लिंग-संवेदी विकास की नीतियों और उसे दर्शाने वाले लिंग संवेदी सूचकांक को जन्‍म दिया। अब सारा जोर महिलाओं को विकास कार्यक्रमों में भागीदार बनाने पर दिया जाने लगा, न कि सिर्फ उन्‍हें विकास के फायदों तक ही सीमित रखा गया, जैसा पहले होता था। नारी की पहचान आर्थिक विकास की एजेन्‍सी के रूप में हुई। इस प्रकार हम देखते हैं कि नारी विकास मॉडल भी दो चरणों में पूरा हुआ, नारी और विकास तथा लिंग और विकास। पहले जहां विकास नीतियों में नारी कल्‍याण पर समुचित ध्‍यान दिया गया था वहीं दुसरें में लिंग भेद को ही योजना का आधार बनाया गया।

नारी विकास मॉडल की आलोचना यह कहकर की गयी है कि विकासवादी मॉडल महिलाओं के व्‍यावहारिक हितों की पूर्ति के नाम पर उनके सामरिक हितों की अनदेखी कर देता है। इस मॉडल की सबसे तीखी आलोचना यह है कि इसमें शक्‍ति के आयाम की अनदेखी की गयी है। ऐसी मुख्‍य रूप से आर्थिक विकास को प्रधानता देने के कारण संभव हुआ है। कुछ अध्‍ययनों यह भी स्‍पष्‍ट हुआ कि आर्थिक रूप से महिलाओं का उठता स्‍तर उन्‍हें आवश्‍यक खुशी एवं समान सामाजिक स्‍तर नहीं प्रदान करता। कई स्थितियों में तो उनकी स्‍थ‍िति और खराब हो जाती है क्‍योंकि उन्‍हें परम्‍परागत भूमिकाओं के साथ ही नयी आर्थिक जिम्‍मेदारियों को भी निभाना होता हैं। इसलिए आवश्‍यक है कि निर्णय में इनकी भागीदारी हो। इसके लिए उसका घरेलू एवं समुदायिक शक्‍ति संरचनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेना आवश्‍यक है। इस तथ्‍य की पहचान ने ही नारी सशक्‍तिकरण की अवधारणा को जन्‍म दिया।

नारी सशक्‍तिकरण या सबलीकरण अपने शाब्‍दिक अर्थ से ही शक्‍ति के आयाम की अन्‍य आयामों पर प्रमुखता की ओर इंगित करता है। इसके अंतर्गत यह माना जाने लगा कि नारी सबलीकरण की कुंजी इसे स्‍वयं तथा शक्‍ति संरचना के ऊपर नियंत्रण में छुपी है। शक्‍ति संरचना पर धीरे-धीरे बढ़ते नियंत्रण के साथ की अन्‍य स्‍तरों पर लिंग समानता-भागीदारी संसाधनों की प्राप्‍ति, भौतिक कल्‍याण आदि स्‍वाभिक रूप से ही स्‍त्री को प्राप्‍त हो जाएंगी। नारी सशक्‍तिकरण का अर्थ घरेलू और समुदायिक दोनों ही शक्‍ति संरचनाओं में नारी की शक्‍ति को बढ़ता है। 

प्रसिद्ध समाजशास्‍त्री आन्‍द्र बीते भी मानते हैं कि नारी सबलीकरण के पीछे मुख्‍य धारणा शक्‍ति संबंधो के पुर्निर्धारण द्वारा समाज परिवर्तन है।
अन्थोनी गिंडिग्‍स ने इसे Transformative Capacity कहा तथा कुछ समाजशास्‍त्रियों ने तो इसे Power Over  के स्‍थान पर power to से परिभाषित करना चाहा।
जैव विविधता सम्‍मेलन (पृथ्‍वी सम्‍मेलन) 1992 में सशक्‍तिकरण को निर्णय लेने अथवा निर्णय को रोकने की क्ष्‍ामता कहा गया है।

किसी भी दृष्टि से नारी सशक्‍तिकरण का यह मॉडल शक्‍ति केन्द्रित ही है और जो हर स्‍तर पर शनै: शनै: लैंगिक असमानता का ह्यास करता है। यह नारी विकास मॉडल से अधिक व्‍यापक है क्‍योंकि यह केवल सामाजिक कल्‍याण या आर्थिक बराबरी को महत्‍व नहीं देता अपितु सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक सभी पहलुओं को एक सूत्र में पिरोकर उन पर विचार करता है।

नारी सशक्‍तिकरण की यह अवधारणा सबलीकरण के लिए उस आलोचनात्‍मक विवेक को प्राप्‍त करने को प्रमुखता देती है जो शोषण, दमन और अन्‍याय में छिपे संरचनात्‍मक पहलुओं को ठीक से पहचान सके। इस प्रक्रिया में तीन कडि़या हैं पहले में भौतिक सुविधाएं, आहार, मृत्‍युदर, जनसंख्‍या अनुपात, शिक्षा, वेतन, रोजगार, परिवार और समाज के निर्णयों में भागीदारी तथा अपने श्रम, आय और जीवन पर आत्‍म-नियंत्रण में लिंग भेद के कारण जो असमानताएं हैं, उनकी व्‍यापक चेतना फैलायी जाए। दूसरी कड़ी, यह बोध करना है कि असमानताएं ईश्‍वर प्रदत्‍त नहीं हैं। अत: उन्‍हें बदला जा सकता है। तीसरी कड़, उपरोक्‍त समझ के आधार पर लिंग समानता के उद्देश्‍ययों को प्राप्‍त करने के लिए महिलाओं को संगठित करना है।

नारी सशक्‍तिकरण के लक्ष्‍य प्राप्‍ति के दो तरीके सुझाए जाते हैं। पहला है, राज्‍य द्वारा कानूनी और प्राशास‍निक उपायों द्वारा नारी की शक्‍ति का उन्‍नयन। दूसरा है, महिलाओं द्वारा स्‍वयं संगठित होकर शक्‍ति प्राप्‍त करना। पहले का रास्‍ता ऊपर से नीचे जाता है, जबकि दूसरे का नीचे से ऊपर की ओर। सैद्धांतिक दृष्टि से दोनों भी भिन्‍नता होते हुए भी व्‍यवहारिक स्‍तर पर दोनों में द्वन्‍द्वात्‍मक एकता स्‍वीकार करनी पड़ती है।

उपरोक्‍त विवेचन से स्‍पष्‍ट है कि नारी सशक्‍तिकरण मॉडल नारी विकास मॉडल से कई महत्‍वपूर्ण बातों में काफी भिन्‍न है। जहां नारी विकास मॉडल एक सामाजिक-आर्थिक परियोजना है वहीं नारी सशक्‍तिकरण मुख्‍य रूप से एक राजनैतिक परियोजना। पहले में आर्थिक  रूप से नारी के स्‍थान को ऊंचा करने की बात है तो दूसरे में राजनितिक रूप से सशक्‍त करने पर। दोनों की माप के लिए अलग-अलग मापदंड (सूचकांक) बनाए गए हैं- जीडीआई और जीईएम। हालांकि विश्‍लेषाणत्‍मक दृष्टि से दोनों भिन्‍न हैं। किंतु तथ्‍यात्‍मक दृष्टि से दोनों जुड़े हैं।

नारी सशक्‍तिकरण की कमियां/सीमाएं

उदारवादी नजरिए से देखने पर जहिर होता है कि इसमें पुरुषों की सभी स्‍तरों पर उपक्षा की गयी है बल्कि कई बार यह पुरुष को शत्रु के रूप में भी चित्रित करते है । इसके कारण नारी सशक्‍तिकरण आंदोलन लिंग-युद्ध में बदल जाता है जिसमें काम संबंधों की सफलता एवं पारिवारिक शक्‍ति की बल्कि चढ़ जाती है।

संरचनात्‍मक दृष्टि से नारी सशक्तिकरण का उपरोक्‍त मॉडल तात्‍विक रूप से असंरचनात्‍मक, विशिष्‍ट वर्ग केन्द्रित तथा मनो‍केन्‍द्रित दिखाई देता है1 यह स्त्रियों के आंतरिक विवेक को जगाने पर अत्‍यधिक बल देता है। कितुं क्‍या पुरुषों के विवेक को जगाए बिना और उनकी मनोवृत्‍ति में परिवर्तन किए बिना लिंग संबंधों को न्‍यायपूर्ण बनाया जा सकता है? शायद नहीं। यह तो आवश्‍यक है ही किन्‍तु इसके साथ आर्थिक, राजनैतिक, संरचनात्‍मक परिवर्तन भी जरूरी है।

मार्क्‍सवादियों ने नारी सशक्‍तिकरण की अवधारणा पर आरोप लगाया कि यह नारी पुरुष पर आर्थिक निर्भरता के सामाजिक पक्ष की अनदेखी करता है, जोकि सम्‍पत्‍ति संबंधों की संरचना में अंतनिर्हित है। जब तक लिंग आधारित सम्‍पत्ति संबंधों को नष्‍ट नहीं किया जाता, मात्र चेतना में परिवर्तन से कुछ होने वाला नहीं।

संरचनातमक दृष्टि से एक महत्‍वपूर्ण आलेचना यह भी की जाती है कि नारी सशक्‍तिकरण मॉडल में सभी स्‍त्रियों को एक ही समान कोटि के अंतर्गत रखा गया है कि जबकि यथार्थ नहीं है। स्‍त्रियों के बीच व्‍यापक मतभेद हैं जिसे ध्‍यान में रखना आवश्‍यक है। नारी आंदोलन में मुख्‍यता: शहरी, पढ़ी-लिखी, कार्यशील, उच्‍च/मध्‍यम वर्ग की महिलाएं ही शामिल हैं।

संस्‍कृतिक दृष्टिकोण से नारी सशक्‍तिकरण मॉडल की आलेचना यह कह कर की जाती है कि यह पश्चिम केन्द्रित है और पूर्व के देशों, जिनमें भारत भी है, की संस्‍कृति के अनुकूल नहीं है क्‍योंकि यह लिंग संबंधों को मर्यादित करने वाले धर्म की भूमिका की अनदेखी करता है। भारत में अनेक कुरीतियों को धर्म मान्‍यता देता है और इसका पालन बढ़-चढ़कर महिलाओं द्वारा किया जाता है। स्‍पष्‍ट है कि नारी सशक्‍तिकरण मॉडल में अनेक कमियां हैं। यह एक आयामी दृष्टिकोण है। इसलिए वर्तमान अवधारणा पर पुनर्विचार की जरूरत है। चूकिं इसका ढांचा टकराव का है अत: क्‍यों केवल नारी सशक्तिकरण की चर्चा की जाए, क्‍यों नहीं लिंग सशक्तिकरण को लक्ष्‍य बनाया जाए। लिंग समानता के स्‍थान पर लिंग न्‍याय अधिक उपयुक्‍त होगा। यह पुरुष यह स्‍त्री का ही सशक्तिकरण नहीं होगा। यह तो लिंग संबंधों में असंतुलन को ध्‍यान में रखकर उसको इस तरह बदलने पर बल देती है कि उसे सेपानी व्‍यवस्‍था के स्‍थान पर समतापूर्ण स्‍वस्‍था बनाया जाए।

नारी सशक्‍तिकरण पर सुझाव

नारी सशक्‍तिकरण की बहुआयामी अवधारणा जो नारियों की सभी प्रकार की क्षमताओं को बढ़ाने पर बल देती है, को एक राजनैतिक शक्‍ति के‍न्‍द्रित अवधारणा का रूप लेने की आवश्‍यकता है। इसी दिशा में लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए महिलाओं में चेतना जगाने, संगठन बनाने व आंदोलन करने का अपना महत्‍व है। लेकिन मनोवृत्‍ति में परिवर्तन के लिए अन्‍य उपायों की भी मदद ली जानी चाहिए। शिक्षा सामान्‍य रूप से एवं स्‍त्री शिक्षा विशेष रूप से ऐसा ही तरीका है। विशेषकर तब जब पाठ्यक्रम लिंग न्‍याय के प्रति संवेदनशील हो। एक अन्‍य तरीका लिंग न्‍याय के प्रति संवेदनशील समाजीकरण की नीति हो सकती है। बच्‍चो का पालन पोषण इसी दिशा में होना चाहिए।

Ø संरचनात्‍मक परिवर्तन
Ø आर्थिक राजनीतिक परिवर्तन
Ø मनोवृत्‍ति में परिवर्तन
Ø सामाजिक मूल्‍यों का परिवर्तन

निष्‍कर्ष

अब समय आ गया है जब हम समझें कि लिंग-न्‍याय का लक्ष्‍य पुरुषों को छोड़कर प्राप्‍त नहीं किया जा सकता है। जब तक एवं पुरुष मिलकर लैंगिक संबंधों के वर्तमान-ऊंच नीच वाले ढांचे को चुनौती नहीं देते, न्‍यायपूर्ण लैंगिक संबंधों की स्‍थापना नहीं की जा सकती है। हो सकता है कि व्‍यक्‍तिगत स्‍तर पर कोई स्‍त्री और पुरुष आपस में न्‍यायपूर्ण संबंधों की स्‍थापना कर लें, लेकिन आवश्‍यकता उन न्‍यायपूर्ण संबंधों को संस्‍थागत स्‍तर पर प्राप्‍त करने की है। तभी नारी सशक्‍तिकरण का सपना सच होगा।

Monday, 12 November 2018

प्रवासी भारतीय दिवस पर निबंध। Essay on Pravasi Bharatiya Divas in Hindi

प्रवासी भारतीय दिवस पर निबंध। Essay on Pravasi Bharatiya Divas in Hindi

प्रवासी भारतीय दिवस पर निबंध। Essay on Pravasi Bharatiya Divas in Hindi

Pravasi Bharatiya Divas in Hindi
प्रवास की संकल्पना - प्रवास की संकल्पना, प्राचीन सभ्यताओं के समय से ही अस्तित्व में है। वैदिक सभ्याता से लेकर 18वीं शताब्दी तक इसका स्वरूप भारत में प्राय: ज्ञानार्जन के लिए, लोक कल्याण के लिए और धार्मिक अभिप्रायों से किए जाने वाले प्रवास का रहा है। बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद सम्राट अशोक ने ईसा-पूर्व तीसरी शताब्दी  में अपने पुत्र एवं पुत्री को धार्मिक अभिप्राय से प्रवास पर भेजा था। दक्षिण भारत के राजेन्द्र चोल जैसे शक्तिशाली सम्राटों ने सुदूर पूर्व के देशों (वर्तमान मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया आदि) तक अपनी नौसेनाओं को भेजकर राजनैतिक-आर्थिक संबंध स्थापित किए जो अभी तक विद्यमान हैं। अलबरूनी, मेगस्थनीज, मार्को पोलो, ह्यवेन सांग, इब्नैिबतूता आदि ने अरब एवं यूरोपीय देशों से आकर भारत में प्रवास किया था। मध्य‍ एशिया के देशों से आए तुर्क, हूण, पठान, उज्बेक आदि का भारत में आगमन तो आक्रमणकारियों के रूप में हुआ था लेकिन वे बाद में यहीं के होकर रह गए और इस प्रकार वे भी भारत में अन्य देशों के प्रवासी ही माने जांएगे। हजारों वर्ष तक भारतीय सभ्यता का अरब देशों एवं चीन, इंडोनेशिया, बर्मा, कम्बोडिया आदि देशों के साथ प्रत्यक्ष और युरोपीय देशों के साथ अप्रत्यवक्ष सम्पंर्क रहा है। 

वर्तमान प्रवासी भारतीय दिवस - व्यापारिक उद्देश्यों के लिए बड़े पैमाने पर प्रवजन एव प्रवास की शुरूआत 16वीं शताब्दी  में हुई। वास्कोडिगामा, कोलम्बस, पेड्रो अलवरेज कबराल आदि जैसे महान नाविकों ने भारत, अमेरिका, ब्राजील जैसे देशों का समु्द्री सम्पर्क यूरोपीय दशों से जोड़कर प्रवास के नए रास्ते खोल दिए। भारत के तटवर्ती प्रदशों से व्यापारियों ने अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ संबंध बनाना शुरू किया । गुजराती व्या्पारियों ने वर्तमान केन्या, उगांडा, जिम्बाबवे, जाम्बिंया, दक्षिण अफ्रीका में अठाराहवीं शताब्दी  में अपने कदम रखे। इन्हीं  में से एक व्यापारी दादा अब्दुल्ला सेठ के कानूनी प्रतिनिधी के रूप में महात्मा गांधी ने मई, 1893 में नटाल प्रान्त में पदार्पण किया। रंगभेद नीति के साथ उनका संघर्ष और प्रवासी भारतीय समुदाय से वे जन-जन के मानस में प्रतिष्ठि‍त हो गए। वर्ष 1915 की 09 जनवरी को वे भारत वापस लौटे और 22 वर्ष के प्रवास के बाद लौटे इस महान आत्मा से प्रेरणा लेकर इस दिवस को प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

दरअसल, प्रवासी भारतीयों के साथ भारत का औपचारिक संबंध तो था लेकिन एक निकटवर्ती, घनिष्ठ और आमिट जुड़ाव की आवश्यकता बहुत समय से महसूस की जा रही थी। नवम्बर, 1977 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक समारोह में तत्कालीन विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि दूर-दराज के देशों में बसे भारतवंशियों के साथ हमें अपना संबंध और प्रगाढ़ करना होगा और भारत, उन प्रवासियों की सेवाओं, त्याग और संघर्ष को किसी प्रकार नहीं भूल सकता। प्रवासी भारतीयों के साथ अपने जुड़ाव को प्रगाढ़ करने के लिए किस प्रकार की नीतियां बनाई जाएं, कौन से साधन अपनाए जांए और किस प्रकार का तंत्र तैयार किया जाए, इस पर चर्चा होती रही और फलस्वकरूप 18 अगस्त, 2000 को विधिवेत्ताक, संस्कृतिकर्मी, राजनयिक एवं राजनेता डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन विदेश मंत्रालय ने किया। इस समिति में पूर्व विदेश राज्यमंत्री श्री आर.एल.भाटिया, पूर्व राजनयिक श्री जे. आर. हिरेमठ, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री बालेश्वनयर अग्रवाल और राजनयिक श्री जे.सी शर्मा शर्मा शामिल थे। समिति ने 20 से अधिक देशों का प्रत्यक्ष दौरा करके, विश्व भर के यथासंभव अधिकतम प्रवासी भारतीय संगठनों से, पूर्व राजनयिकों से बातचीत करके और अपने संचित ज्ञान एवं अनुभव के आधार पर 19 दिसम्बर, 2001 को अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को सौंपी जिसमें, अन्य बातों के साथ-साथ प्रवासी भारतीय दिवस 09 जनवरी को मनाए जाने और प्रति वर्ष प्रवासी भारतीय सम्मान दिए जाने की सिफारिशें भी शामिल थीं।

समिति ने पाया ‍कि 19वीं शताब्दी में भारत में अंग्रजी शासन के चलते, नए अवसरों की तलाश में और आर्थिक कारणों से बड़े पैमाने पर लोग दूसरे देशों में प्रवास पर गए। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि ब्रिटेन की संसद ने जब वर्ष 1833-34 में गुलामी प्रथा को समाप्त कर दिया और दुनियाभर में फैले उनके साम्राज्यों को मजदूरों का अभाव सताने लगा तो गुलामी की एक नई तरकीब निकाली गई जिसे शर्तबंदी (अंग्रेजी में एग्रीमंट- जिसका अपभ्रंश रूप गिरमिट पड़ गया) कहा गया। इसमें अधिकतम पांच वर्ष के एग्रीमेंट पर कामगारों को त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, मारीशस और फीजी जैसे देशों में ले जाया गया। इन गिरमिटिया मजदूरों का जीवन, गुलामों से किसी प्रकार बेहतर नहीं था प्रवासियों की दूसरी खेप, भारत की आजादी के बाद, पेशेवर कार्मिकों के रूप में अमेरिका, ब्रिटेन तथा कनाडा जैसे विकसित देशों में और इसके समानांतर एक धारा, तेल-समृद्ध खाड़ी देशों में कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों के रूप में गई। वर्ष 1970 के बाद, उच्च्, कुशल एवं पेशेवर लोग, आगे की पढ़ाई के लिए या वैज्ञानिक एवं तकनीकी पदों पर काम करने के लिए गए। इस प्रकार, भारत के प्रवासी समुदाय में आज की स्थिति में लगभग 250 लाख लोग शामिल हैं और दुनिया में चीन ही संभवत: एकमात्र ऐसा देश है जिसका प्रवासी समुदाय, भारत जैसा विविध और विशाल है।

चीन की आर्थिक प्रगति में प्रवासी चीनियों के भारी योगदान के देखते हुए, प्रवासी भारतीयों के भारत से आत्मिक/अध्यामत्मिीक/सामाजिक जुड़ाव को देखते हुए और पश्चिम के देशों में अपनी कड़ी मेहनत के बल पर आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर लेने पर अपनी मातृभूमि के प्रति कुछ करने की आकांक्षा से साक्षात्काकर करते हुए समिति ने पुरजोर सिफारिश की कि इस विशाल भारतीय समुदाय से लाभ उठाने से पहले हमें उनकी समस्याओं एवं चिंताओं का समाधान करना होगा जैसे कि-
1- खाड़ी देशों में जाने वाले श्रमिकों के साथ भारत में भर्ती कंपनियों धोखाधड़ी करती हैं।
2-काम के दौरान मालिकों द्वारा उनके पासपोर्ट अपन कब्जेि में ले लिए जाते हैं, उन्हेंक पूरी मजदूरी नही दी जाती है, उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता है, उनका दैहिक शोषण किया जाता‍ है।
3- भारतीय दूतावासों से उन्हें पर्याप्त  मदद नहीं मिलती है। भारत में उनके परिजनों की सुरक्षा नहीं की जाती है।
4- भारत वापस लौटने पर उन्हें कस्टम अधिकारियों द्वारा परेशान किया जाता है।
5- अन्य देशों की नागरिकता गृहण कर चुके भारतीय मूल के व्यक्तियों को भारत आगमन के लिए विदेशियों की तरह वीजा़ लेना पड़ता है।
6- प्रवासियों की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक चिंताओं के समाधान के लिए भारत में उन्हें  बहुत भटकना पड़ता है।
7- पूर्वी अफ्रीकी देशों में, फीजी में तथा अन्य देशों में भी भारतीय मूल के व्यलक्तियों के सामने राजनैतिक/सामाजिक/जातीय आधार पर सकट आने की स्थिति में उनकी सहायता के लिए भारत को आगे आना चाहिए, अनिवासी भारतीयों को भारत में मताधिकार होना चाहिए, आदि ।

भारत सरकार ने इन समस्यादओं के लिए इन 10 वर्षों में कई उल्लेयखीनय कदम उठाए हैं-
1-खाड़ी देशों में या अन्यंत्र भी , अपत्ति में आए साधनहीन प्रवासियों की सहायता के लिए 43 देशों में भारतीय समुदाय कल्याण कोष की स्था पना की गई है। इसमें अन्य  व्य वस्थाीओं के साथ-साथ, मुसीबतजदा मजदूरों/घरेलू नौकर/ नौकररानियों को रहने-खाने की व्यसवस्थाओ, सरकारी खर्च पर उन्हेंज भारत पहुंचाने की सुविधा और दुर्भाग्यरवश मौत हो जाने पर पार्थिव शरीर को भारत लाया जाना शामिल है।
2-भारतीय मूल के व्यक्तियों के भारत की यात्रा के लिए अवधि का एकमुश्त वीसा एव रहने की अवधि में छूट प्रदान करने वाला पीआईओ कार्ड दिया गया। बाद में इसका नीवकृत रूप ओसीआई कार्ड दिया जा रहा है। इससे भारतीय मुल के व्यक्ति लंबी अवधि तक बिना वीजा के भारत आ-जा सकते हैं। यह योजना वर्ष 2005 से लागू है और अब तक 8 लाख से अधिक ओसीआई कार्ड जारी किए जा चुके हैं।
3-सैकड़ो वर्ष पूर्व गए प्रवासियों की चौथी-पांचवीं पीढ़ी अपने पैतृक स्था्न की खोज में बहुत पोशानियों का सामना करती थी। इसके लिए वर्ष 2008 से ट्रेसिंग द रूट्स नाम की योजना चलाई जा रही है।
4-प्रवासी भारतीय की युवा पीढ़ी को आधुनिक भारत का साक्षात्कार कराने के लिए 'भारत को जानों' (know India program) चलाया जा रहा है। अलग-अलग राज्यों के सहयोग से चलाई जाने वाली योजना में 18 से 26 वर्ष के युवाओं को भारत की प्रायोजित यात्रा कराई जाती है। अब तक 17 यात्रा-कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं जिनमें पांच सौ से अधिक युवा हिस्साा ले चुके हैं।
5-युवा पीढ़ी को भारत में उपलब्धे उच्च  स्तहरीय शिक्षा की सुविधा देने के लिए, उच्च1 शिक्षा संस्थाउनों में उके लिए स्था़न आरक्षित किए गए हैं और प्रति वर्ष 100 विद्यार्थियों को 5000 अमेरिकी डालर प्रति विद्यार्थी की दर से छात्रावृत्तिष दी जाती है। अलग से पीआईओ विश्वश विद्यालय स्थाकपित किए जा रहा है।
6-ओवरसीज इंडियन यूथ क्ल्ब, स्टअडी इंडिया प्रोग्राम, आदि के द्वारा नई को भारत से पोड़ने का काम किया जा रहा है।
7-वर्ष 2003 से लगातार प्रवासी भारतीय दिवस का आयोजन 7 से 9 जनवरी तक किया जाता है जिसमें भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रसपति, कई केन्द्रीपय मंत्री, राज्योंह के मुख्य मंत्री तथा मंत्रालयों/विभागों के उच्चाकधिकारी शामिल होते हैं। प्रवासी भारतीय दिवस, एक उल्लेयखनीय आयोजन बन गया है। अब तक दिल्ली् में 6 और मुम्ब ई, हैदराबाद, चैन्नेई और जयपुर में एक-एक प्रवासी भारतीय दिवस आयेजित किए जा चुके हैं। औसतन 1500 से 1800 प्रतिनिधि उन आयोजनों में प्रति वर्ष हिस्साज लेते हैं।
8-लघु प्रवासी दिवसों की योजना शुरू की गई है। अब तक न्यूतयार्क, सिंगापुर और कनाडा में ऐसे लघु प्रवासी दिवस मनाए गए हैं। अगला दिवस, दुबई में आयोजित किया जाएगा।

9-अपने-अपने प्रवास के देश में उल्लेदखनीय सफलतांए प्राप्तक करने वाले, मानव सेवा के क्षेत्र के काम करने वाले तथा भारत का नाम ऊँचा करने वाले, मानव सेवा के क्षेत्र के काम करने वाले तथा भारत का नाम ऊँचा करने वाले व्यपक्तिचयों/संस्थानओं को प्रति वर्ष राष्ट्रापति द्वारा सम्माेनित किया जाता है। वर्ष 2012 तक 133 व्येक्तिंयों एवं 03 संस्थातओं को उनकी उपलब्धिमयों/सेवाओं के लिए सम्मा नित किया जा चुका है।
10-अनिवासी भारतीयों द्वारा भारतीय महिलाओं से विवाह के बाद विदेश ले जाकर उन्हेंर परेशान किए जाने की घटनाओं को देखते हुए, प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय द्वारा एक विशेष प्रकोष्ठं का गठन करके तथा अलग-अलग देशों के महिला संगठनों की सहायतत से परित्यरक्तष/सताई गई महिलाओं की सहायतार्थ कदम उठाए जा रहे हैं।

इतना सम होने के बावजूद, अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। अनिवासी/प्रवासी भारतीय को ओसीआई कार्ड प्राप्त करने में, भारत में छूट गई अपनी अचल सम्पकत्तिायों की सुरक्षा में, यहां चलने वाले मुकदमें में बार-बार पेश होने में, चैरिटी के कार्यों हेतु उचि‍त चैनल उपलब्धि न होने के रूप में, उच्च स्तरीय स्वामस्य्तज सुविधाएं स्था पित करने में स्थाउनीय स्वीचकृतियां आसानी से उपलब्धू होने में, उचित पारिश्रमिक और आसान सेवा शर्तें न होने के कारण उत्कृथष्ट  शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थाीनों में अपनी सेवाएं देने में अड़चनों/समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। परन्तुे इतना तय है कि प्रवासी भारतीयों के साथ एक सक्रिय एवं व्या्पक संपर्क/संबंध/सहयोग क कार्यक्रम के रूप मे वर्ष 2003 से प्रारम्भ, प्रवासी भारतीय दिवस ने हमें एक रास्ता दिखाया है। हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि यह कार्यक्रम, केवल एक अर्थिक गतिविधि बनकर न रह जाए अपितु इसका सरोकार, प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक एवं सामाजिक चिंताओं से भी बना रहे।

इसके लिए न केवल प्रवासी भारतीय समुदाय की विशालता, विविधता और उपलब्धियों को भी भारतीय जनता के सामने रखना होगा और उनकी समस्याओं, भारत से उनकी अपेक्षाओं को भी समझना होगा बल्कि अपने नीतिगत ढांचे में और बदलाव लाकर, प्रवासीयों के प्रति अनुकूल वातावरण बनाकर, उनकी सेवाओं का लाभ उठाते हुए, उनके भारत के साथ गहरे अनुराग को सराहा जाना होगा।  

Sunday, 11 November 2018

भारत में नक्सलवाद पर निबंध व लेख। Essay on Naxalism in Hindi

भारत में नक्सलवाद पर निबंध व लेख। Essay on Naxalism in Hindi

भारत में नक्सलवाद पर निबंध व लेख। Essay on Naxalism in Hindi

Essay on Naxalism in Hindi
वर्तमान में नक्‍सलियों का प्रभाव पशुपति (नेपाल) से तिरूपति (आन्‍ध्र प्रदेश) तक हो चुका है। धनबल में भी वे काफी मजबूत हो चुके हैं। देश के लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग (20 राज्‍यों के 223 जिलों) पर उनका समानान्‍तर राज चलता है। एक अनुमान के अनुसार अकेले छत्‍तीसगढ़ में 20 हजार सशस्‍त्र नक्‍सली हैं। देश भर में इनकी संख्‍या एक से डेढ़ लाख मानी जाती है। इनका सालाना टर्न ओवर 1500 करोड़ रुपये से अधिक का है। नक्‍सली झारखंड, छत्‍तीसगढ़, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार, महाराष्‍ट्र तथा मध्‍य प्रदेश के व्‍यवसासियों पर कई तरह के कर लगाकर अपने धन बल को मजबूत करते हैं।

अब नक्‍सलियों के पास अत्‍याधुनिक हथियारों का जखीरा मौजूदा है। इनके खौफनाक चेहरे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2008 में 1591 नक्‍सल हमले हुए जिसमें 721 लोगों की मृत्‍यु हो गई। इस वर्ष के अगस्‍त महीने तक देश में 1405 वारदातें हो चुकी हैं, जिसमें 580 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इन हमलों का मुकाबला करते हुए जहां 2008 में हमारे 231 सुरक्षा बल शहीद हुए। वहीं इस साल अगस्‍त के महीने तक 270 सुरक्षा बलों ने अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्‍तनम् बंदरगाह से उड़ीसा के मलकानगिरी तथा कोरापुट के घने इलाकों से होते हुए छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले तक उन आतंकियों ने एक लाल-गलियारा बना लिया है। जिनसे उनके हथियार तथा‍ साजो-सामान विशाखापत्‍तनम बंदरगाह पर उतरकार सीधे दंतेवाड़ा तक पहुंच जाते हैं। कई इलाकों में नक्‍सली नकद की जगह व्‍यापारियों से हथियार तथा इलेक्‍ट्रानिक उपकरणों के सहारे सरकार के निगरानी योजनाओं तथा सप्‍लाई लाइन को ध्‍वस्‍त करते हैं। उनके पास से ऐसे बुलडोजर बरामद हुए हैं, जो सरकार द्वारा निर्मित सड़क मार्गों को खोदकर तथा सार्व‍जनिक भवनों को गिराकर अपने प्रभाव वाले क्षेत्र को दुर्गम बना देते हैं। गांवों में प्रभाव के बाद अब वह शहरों में अपना प्रभाव जमाने के लिए तत्‍पर दिखते हैं। नक्‍सलवादियों के अनुसार माओ की भी यही विचारधारा थी कि शहरों में प्रभाव अंतिम लक्ष्‍य होना चाहिए। अभी दिल्‍ली में पकड़े गए कोबाड गांधी ने कहा कि हमारा लक्ष्‍य काठमांडू से दिल्‍ली तक अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्‍तार करना है। आज हमारे शहरों की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्‍या मलिन बस्तियों में रहती है। जो नक्‍सलवादियों के लिए उर्वर जमीन को तैयार करती है।

गढ़चिरौली तथा लालगढ़ की नक्‍सली घटनाओं ने नक्‍सलवाद पर पुन: नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। प्रधानमंत्री ने स्‍वयं उस आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। गृहमंत्री के अनुसार नक्‍सलवाद मिटाने के लिए सही रणनीति पर काम होना चाहिए। बिना गरीबी व भ्रष्‍टाचार समाप्‍त किए तथा सुशासन सुनिश्चित किए बिना नक्‍सलवाद को समाप्‍त नहीं किया जा सकता। सरकार ने गृह मंत्रालय के साथ सेना को संयुक्‍त कर नक्‍सलवाद को जड़ से समाप्‍त करने के लिए ‘ऑपरेशन नक्‍सल ऑल आउट’ नामक एक विशेष रणनीति बनाई है।

इस रणनीति के अनुसार प्रभावित राज्‍यों में प्रथम चरण की कार्यवाही राज्‍य पुलिस तथा अर्द्ध-सैनिक बल करेंगे। दुसरे स्‍तर पर बीएसएफ-आईटीबीएफ कार्य करेगी। तीसरे स्‍तर पर आसमानी सुरक्षा, खोज तथा आपात स्थिति में बचाव कार्य की जिम्‍मेदारी वायुसेना पर होगी। आवश्‍यकता होने पर इसे गोलीबारी की भी इजाजत होगी। चौथे तथा अंतिम स्‍तर पर राज्य तथा केंद्र सरकार मिलकर प्रभावित क्षेंत्रों में विकास कार्य को गति देंगी। यह ऑपरेशन अलग-अलग स्‍तरों पर या एकसाथ भी चलाया जा सकता है। केंद्र सरकार विधानसभा चुनावों के सम्‍पन्‍न होने के बाद कभी भी इस ऑपरेशन को प्रारंभ कर सकती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि योजनाएं तथा इनकी नियत हमेशा से ही सही रहती है परंतु समस्‍या उस मशीनरी की है, जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत समस्‍याएं समाप्‍त कर सुशासन का सुनिश्चित किया जाता है। इन्‍ही सुशासन की अनुषंगी संस्‍थाओं में रिसाव ही किसी समस्‍या को हल करने में असफल रहती है तथा सा‍थ ही नई समस्‍याओं को उत्‍पन्‍न भी करती हैा। देश की स्‍वतंत्रता के बाद हमने सुशासन के लिए लोकतंत्र को पूर्व शर्त मानी थी। वर्तमान में हमारे सुशासन के हथियार नौकरशाही, पुलिस व्‍यवस्‍था, न्‍यायपालिका इत्‍यादि की स्थिति क्‍या है? इस पर भी हम दृष्टिपात करते हैं।

उपनिवेशकालीन भारतीय नौकरशाही कार्नवालिस की मानसिक उपज थी। सरकार के प्रति समर्पण तथा स्‍वामिभक्‍ति से हमारे प्रथम गृहमंत्री इतने प्रसन्‍न थे कि इसे यथारूप रहने दिया। उन्‍होंने यह माना कि देश की स्‍वतंत्रता के बाद यह अपने देश के हित में कार्य करेंगे। सरदार पटेल के निर्देशन के बाद किसी ने भी इन पर समुचित ध्‍यान नहीं दिया, जिसमें कोई सुधार हो सके। फलत: भारतीय नौकरशाही आज एशिया की सबसे खराब तथा भ्रष्‍ट नौकरशाही में बदल चुकी है। कमोबेश यही स्थिति हमारी पुलिस व्‍यवस्‍था के साथ भी है। 1861 में अंग्रेजों द्वारा किए गए पुलिस सुधार के बाद आज तक किसी भी सुधार की आवश्‍यकता ही नहीं समझी गई। पता नहीं यह पुलिस की कार्यकुशलता है या हमारी अकर्मण्‍यता, परन्‍तु 21वीं सदी के साइबर अपराध के शमन के लिए 1861 के पुलिस सुधार वाली व्‍यवस्‍था ही उपलब्‍ध है। जिसका पारिणाम यह है कि कानून तथा व्‍यवस्‍था को स्‍थापित करने वाली ये दोनों व्‍यवस्‍थांए आज आम आदमी को अपने विश्‍वास में नहीं ले पाई हैं। उच्‍चतम न्‍यायालय के बार-बार द्वारा निर्देश देने के बाद भी आज तक प्राशासनिक सुधारो को लागू तक नहीं किया जा सका है। रही बात न्‍यायालय की, तो इसके लिए जितना भी कहा जाए उतना ही कम है। कहा जाता है कि न्‍यायपालिका जनता की ओर से न्‍याय करती है। जिसकी ओर देश का आम व्‍यक्‍ति कर्तव्‍य वहन की आशा भरी निगाह से देखता है। संविधान के अनुच्‍छेद 21 में प्रत्‍येक नागरिक को त्‍वरित न्‍याय पाने का अधिकार तो दे दिया गया है परंतु यह आज तक व्‍यवहार में नहीं आ पाया है। आज आम व्‍यक्‍ति को न्‍याय पाने में कई पीढि़या लग जाती हैं। कहा भी जाता है कि देर का न्‍याय तो अपने-आपमें ही अन्‍याय है। हमारे देश में शीर्ष न्‍यायालयके न्‍यायाधीशों को न्‍यायमूर्ति कहते हैं। उच्‍च्‍तम न्‍यायालय की मुख्‍य पीठ भले ही दिल्‍ली में स्थित हो परन्‍तु इसका मुख्‍य  न्‍यायाधीश जहां बैठ जाता है वहीं उच्‍चतम न्‍यायालय मान लिया जाता है। परंतु आज अन्‍याय के पैमाने भरने के बाद देश में आंतरिक सुरक्षा के लिस खतरे उत्‍पन्‍न हो गए हैं फिर भी किसी न्‍यायमूर्ति ने आज तक पिछड़े इलाके में सांकेतिक रूप से भी बैठने की जहमत नहीं उठाई है। आदवासियों को प्रतिनिधित्‍व मिलेगा, जिसमें उनमें राजनैतिक चेतना तथा सशक्‍तीकरण का विकास होगा। परन्‍तु हाल ही में झारखंड के एक पूर्व आदिवासी मुख्‍यमंत्री तथा उनके मंत्रिपरिषद के सदस्‍यों के बारे में जिस प्रकार से पता चला है कि दक्षिण एशिया के देशों में गैर-कानूनी रूप से काले धन को लगाया है इससे यह मिथक भी टूटता प्रतीत होता है कि किसी वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्‍व बढ़ने से उस वर्ग का हमेशा विकास ही होता है।

चाहे नक्‍सली ऑपरेशन हो या नक्‍सलविरोधी अभियान, इन दोनों के मध्य अगर सबसे ज्‍यादा पीडि़त कोई है तो वह है आदिवासी। नक्‍सलबाड़ी तो एक स्‍वत: स्‍फूर्त घटना थी जिसमें शोषित किसानों के वर्ग से कुछ वामपंथी विचारधारा वाले उग्रवाली मिल गए तभी से यह समस्‍या प्रारंभ हो गई। ज्ञातव्‍य है कि वामपंथ में राष्‍ट्रीय हित का कोई स्‍थान नहीं होता है परन्‍तु ऐसा भी नहीं कि यह अन्तर्राष्ट्रवाद में विश्‍वास रखते हैं। वर्तमान में तो यह केवल कुत्सित लक्ष्‍यों की पुर्ति करना अपना उद्देश्‍य समझते हैं। साठ के दशकों में काई भी असंतोष होता था तो जमींदारों का सर कलम कर विरेध दर्ज कराया जाता था। शायद ही पुलिस को कभी भी निशाना बनाया गया हो। परन्‍तु आज उग्र नक्‍सली वर्ग के ऊपर तालिबानी मानसिकता हावी होती जा रही है। निरीह बच्‍चों के साथ, स्‍कूलों के वाहनों, स्‍कूल तथा सामुदायिक भवनों को विस्‍फोट से उड़ा देना, विकास के कार्यों को न होने देना। यह सब उनकी राष्‍ट्र विरोधी गतिविधियां है। सरकार की अब तक की जो रणनीति रही है वह है नकसलवाद प्रभावित क्षेत्रों में छापेमारी करना तथा किसी अप्रिय स्थिति में केंद्र तथा‍ राज्‍यों की संयुक्‍त पुलिस के द्वारा इनसे निपटना है। इससे हमारे पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बल काफी मात्रा में शहीद हो गए। पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक केपीएस गिल ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि इतनी पुरानी तकनीक तथा‍ दुर्गम मार्गों में पुलिस को बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के भेजना मौत के मुंह में धकेलने के समान है। उन्‍हीं के इलाकों में आधुनिकतम तकनीक से लैस नक्‍सलवादियों से मुठभेड़ एक बगैर सोची:समझी रणनीति है। आखिर पुलिस के जवान भी मानव हैं तथा उनके भी शहीद होने की एक सीमा है। इसके बाद भी देखा जाए तो उन्‍हें अनेक नौकरशाही तथा लालफीताशही दिक्‍कतों से भी दो-चार होना पड़ता है। इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति क्‍या होगी कि झारखंड में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद इंस्‍पेक्‍टर फ्रांसीस इंदुवर को पिछले छह महीने से वेतन तक नहीं मिला था। नक्‍सलवादियों का इतना प्रभावशाली होने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि पुलिस वनवासियों पर छोटी-मोटी बातों जैसे सूखी लकड़ी उठाना, चारे के लिए पत्तियां तोड़ लेना इत्‍यादि को लेकर मुकदमें दर्ज कर देती है। इसी प्रकार के एक लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इससे पुलिस पर आम वनवासी विश्‍वास नहीं कर पाता। नक्‍सली इसी स्थिति का फायदा उठाकर वनवासियों का आड़ लेकर रात-बिरात उनके घरों में शरण लेते रहते हैं तो सुबह पुलिस वनवासियों पर नक्‍सलवादियों से मिलीभगत का आरोप लगाकर जेल बंद कर देती है। इस प्रकार सरकार तथा नक्‍सलवादियों के बीच में आम वनवासी प्रताड़ना का शिकार बन जाता है। राजनैतिक लोकतंत्र तथा विकास के छह दशकों में देखा जाए तो आदिवासियों ने बहुत अधिक गंवाया है आदिवासी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं जैसे स्‍वस्‍थ्‍य, शिक्षा, रोजगार, आवास की स्थिति दलितों से भी बदतर है। राजनैतिक प्रतिनिधित्‍व तथा नौकरशाही में भी कमोबेश यही स्थिति है। यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि न केवल आज तक उनको हाशिए पर रखा गया है बल्कि उनके अधिकरों का जबरन हनन किया गया है। भारतीय विकास के पश्चिम मॉडल ने पहले ही उनके जीवन को छिन्‍न-भिन्‍न किया फिर बाँध तथा वन योजनाओं के चलते उन्‍हें घर से बेघर कर दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुछ वनवासी अवश्‍य ही नक्‍सवादियों के साथ सहानुभूति रखते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण प्राशसनिक है। स्‍पष्‍ट है कि हमारी न्‍यायपालिका में विवाद बहुत लंबे चलते हैं। वनवासियों के मुख्‍य मामले तो दीवानी के ही होते हैं वह भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं। दूसरी ओर नक्‍सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में नक्‍सवादियों की समानान्‍तर सरकारें चलती हैं। उनके तहसीलदार तथा लेखपाल उसी विवादास्‍पद भूमि पर मेज लगाकर त्‍वरित कार्यवीह करते हैं। यदि एक इंच भी भूमि इधर-उधर होती है तो उनको ऊपर से छह इंच छोटा (सर कलम) कर दिया जाता है। लेकिन वनवासी करें तो क्‍या करें? जब उनके लिए केंद्रीय सरकार के नाम की कोई चीज ही नहीं है तो नक्‍सलवादियों के ‘न्‍याय-अन्‍याय’ का वे किस प्रकार से प्रतिकार कर सकते हैं। यदि ऐतिहासिक रूप से देखें तो एक सदी से ज्‍यादा समय से आदिवासी कई प्रकार की त्रासदियों के शिकार होते रहे हैं। 

पहली त्रासदी की शुरुआत अंग्रेजो द्वारा वनों पर कब्‍जा किए जाने से हुई जो आजादी के बाद भी बाजारवाद के प्रभाव में जारी रही। भारत में चुनावी लोकतंत्र भी वनवासियों के लिए दुसरी त्रासदी सिद्ध हुई। जिससे आदिवासियों का एक छोटा, शक्‍तिहीन तथा अल्‍पसंख्‍यक वर्ग होने के कारण सत्‍ता के गलियारों तक उनकी आवाज नहीं पहुंच सकी। भारतीय संविधान में उनके अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए जो अर्थपूर्ण प्रावधान किए गए थे, वे सफल नहीं हो सके। आदिवासियों के जीवन की तीसरी त्रासदी माओवादियों के आगमन के साथ हुई जिसके हथियार, संघर्ष और तात्‍कालिक हिंसा के रास्‍ते ने आदिवासियों की समस्‍या का सुलझाने की कोई उम्‍मीद ही नहीं छोड़ी।

किसी भी व्‍यक्‍ति या समुदाय पर अधिकार करने के दो तरीके होते हैं उसके शरीर पर अधिकार तथा उसके मन पर अधिकार करना। शरीर पर अधिकार करने के लिए बन्‍दूक तथा भय का सहारा लिया जाता है परन्‍तु मन पर अधिकार करने के लिए नैतिक उपाय किए जाते हैं। जिसमें यह दिखाया जाता है कि वर्तमान तंत्र तुम्‍हारे लिए कुछ नहीं कर रहा है, इसलिए हमें सहयोग दो। वस्‍तुत: नक्‍सलवादियों की भी यही रणनीति है तथा इसका हल भी इसी को नष्‍ट करने में निहित है। कुछ पाश्‍चात्‍य तथा वामपंथ विचारक ऐसा मानते हैं कि नक्‍सलवाद “हैव एण्‍ड हैव्‍स नॉट” की स्‍वाभाविक उत्‍पत्ति है। परन्‍तु यह आवश्‍यक है पर्याप्‍त नहीं। 

सरकार को नक्सलवादी समस्या को हल करने के लिए विश्वास बहाली-समझौता- उन्मूलन की नीति पर कार्य करना चाहिए। आदिवासियों में विश्वास बहाली के लिए वह संविधान में दिए गए अधिकारों द्वारा आदिवासियों को विकास में पूर्ण भागीदार बनाए तथा नक्सलवादियों के बर्बर चेहरे को आदिवासियों के सामने निर्ममतापूर्वक उजागर करे। इससे निश्चित ही वनवासियों में अपने तंत्र के प्रति विश्वास उत्पन्न होगा और यही नक्सलवाद को समाप्त करने की प्रथम कड़ी भी होगी। लेकिन इसमें काफी सजगता की भी आवश्यकता है क्योंकि ‘सलवा-जुडूम’ जैसे उपायों का हम परिणाम देख ही चुके हैं। दूसरे चरण में नक्सलवादियों से बात कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वह तंत्र में शामिल होने तथा हिंसा का मार्ग छोड़ने के लिए तैयार हैं या नहीं। अगर वे चुनाव को अनावश्यक की कसरत मानने के अपने विचार को त्यागकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होना चाहते हैं तो उनसे ‘नेपाल मॉडल’ के तहत समझौता किया जाना चाहिए। परंतु जो इसके लिए तैयार नहीं हैं उनका पूर्णतया उन्मूलन करने की आवश्यकता है क्योंकि यही राष्ट्रहित में है। 

देश को नक्सलवाद की समस्या का जितना जल्दी हो इसे हल करने का उपाय करना चाहिए। क्योंकि इससे देश में ही इंडिया तथा भारत के मध्य सामाजिक विघटन होने का भय हए। भारत का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि सरकार को उनकी समस्याओं  से कुछ लेना-देना नहीं है। जब तक समस्याएं विकराल होकर शहरी भाग तक नहीं पहुंचती हैं तब तक सरकार इससे नहीं चेतती है। इसका उदाहरण यह है कि 26/11 की घटना के पूर्व देश में अनेक विस्फोट हुए परंतु सरकार ने वास्तविक कार्यवाही तब तक नहीं कि जब तक की यह घटना नहीं हो गई। अत: इस पर भी गहन चिंतन करने की आवश्यकता है। कहीं ऐसा न हो कि नक्सलवादी समस्या को हल करते-करते हम कई अन्य समस्याओं को निमंत्रण न दे बैठें। 

अब समय नीति-निर्धारण का नहीं अपितु इसके क्रियान्वयन का है। सरकार द्वारा बनाए गए ऑपरेशन नक्सल आल आउट को पूरी इच्छा शक्ति से लागू करना चाहिए। जिससे यह समस्या को हल करने की आखिरी कड़ी सिद्ध हो। नक्सलवाद चाहे आर्थिक समस्या हो या सामाजिक अथवा दोनों का मिला- जुला रूप परंतु इस शोध का समय बिल्कुल नहीं हैं। क्योंकि यह समाज के लिए नासूर बन चुका है। साथ ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया, विकास तथा शासन के अनुषंगी शांति तथा समावेशी विकास को सुनिश्चत करने के लिए नक्सलवाद का सफाया एक पूर्व शर्त बन गई है।

Saturday, 10 November 2018

महिला सशक्तिकरण का महत्व पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तिकरण का महत्व पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

महिला सशक्तिकरण का महत्व पर निबंध। Essay on Women Empowerment in Hindi

Women Empowerment in Hindi
आज की नारी में आगे बढ़ने की छटपटाहट है, जीवन और समाज के हर क्षेत्र में कुछ करिश्मा कर दिखाने की, अपने अविराम अथक परिश्रम से आधी दुनिया में नया सुनहरा सवेरा लाने की तथा ऐसी सशक्त इबारत लिखने की जिसमें महिला अबला न रहकर सबला बन जाए। यह अवधारणा मूर्त रूप ले रही है बालिका विद्यालयों, महिला कॉलेजों और महिला विश्व विद्यालयों में, नारी सुधार केन्द्रों में, नारी निकेतनों, महिला हॉस्टलों और आंदोलनों में, आज स्थिति यह है कि कानून और संविधान में प्रदत्त अधिकारों का सहारा लेकर नारी, अधिकारिता के लम्बे सफर में कई मील के पत्थर पार कर चुकी है।

भारत की पराधीनता की बेड़ियाँ कट जाने के बाद नारियों ने अपने उज्जवल भविष्य के लिए जोरदार अभियान चलाया। कई मोर्चों पर उसने प्रमाणित कर दिखया है कि वह किसी से कमतर नहीं, बेहतर है। चाहे सामाजिक क्षेत्र हो या शैक्षिक, आर्थिक क्षेत्र हो या राजनैतिक, पारिवारिक क्षेत्र हो या खेल का मैदान, विज्ञान का क्षेत्र हो या वकालत का पेशा, सभी में वह अपनी धाक जमाती जा रही है। अगर घर की चारदीवारी में वह बेटी, बहन, पत्नी, माँ अथवा अभिभाविका जैसे विविध रूपों में अपने रिश्ते-नाते बखूबी निभाती है और अपनी सार्थकता प्रमाणित कर दिखाती है तो घर की चौखट के बाहर कार्यलयों, कार्यस्थलों, व्यवसायों और प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान करने में किसी से पीछे नहीं। आज देश में कई संवैधानिक, वैधानिक और आर्थिक जगत में भारतीय महिलाएं सर्वोच्च  पदों पर आसीन हैं। जैसे इंदिरा नुई, चंद्रा कोचर, अमृता पटेल, सुनीता नारायणन, सुमित्रा महाजन इत्यादि। इसके अतिरिक्त भारत के कई राज्यों की मुख्यमंत्री महिलाएं हैं। 

राजनीतिक क्षेत्र से हटकर जब हम प्रशासनिक क्षेत्र पर नजर डालते हैं तो उसमें भी महिला अधिकारी वर्तमान को संवारने में किसी से पीछे नहीं है। विदेश सचिव तथा‍ अनेक मंत्रालायों के सचिव पद का दायित्वत निभाने में महिलाएं पूरी निष्ठा् और कार्याकुशलता का परिचय दे रहीं हैा। इस संदर्भ में इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि महिला उत्थान और अधिकारिता के नए-नए शिखरों पर विजय पाने की यह कामयाबी तब मिल रही है, जब महिला राजनीतिक सशक्तिकरण की दृष्टि से भारत का कद निरन्तर व कई पायदान चढ़कर 24वें सथान पर जा पहुंचा है। आज संसद के विभिन्नत  पदों में 11 प्रतिशत पर और मंत्री पदों में 10 प्रतिशतपर महिलाएं काबिज हैं। 

विभिन्न कुरीतियों और बाधाओं से निपटने के लिए जरूरी है कि न सिर्फ लड़को बल्कि लड़कियों में भी शिक्षा का प्रसार किया जाए। माँ परिवार की धुरी होती है, अगर वह शिक्षित हो तो न केवल पूरा परिवार शिक्षित हो जाएगा, बल्कि समाज में भी नई चेतना उत्पन्न हो जायेगी। यही वजह है कि आज महिलाओं में शिक्षा का प्रसार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 1961 की जनगणना के अनुसार साक्षर पुरुषों का प्रतिशत 40 और साक्षर महिलाओं का प्रतिशत मात्र 15 था। लेकिन पिछले चार दशकों में महिला साक्षरता दर ने लम्बी छलांग लगाई है। आंकड़ों की बात करें तो 1971 में महिला साक्षरता दर 22 प्रतिशत थी जो बढ़ते-बढ़ते 2011 में 64.6 प्रतिशत यानी ढाई गुना हो गई । यह जबरदस्त बदलाव इसलिए हो सका क्योंकि लड़कियों, विशेष रूप से निर्धन परिवारों की लड़कियों को समाज की मुख्याधारा में लाने के लिए विभिन्न् सरकारों ने मुफ्त पुस्तंकें, मुफ्त पोशाकें, छात्रवृत्तियां और दोपहर का मुफ्त भोजन देने, छात्रावास बनवाने तथा लाडलीयोजना जैसे प्रोत्साहनकारी कदम उठाए। 6 से 14 वर्ष तक के आयु समूह के लड़के-लड़कियों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के अधिकार का विधेयक संसद ने पारित कर सर्वशिक्षा के क्षेत्र में क्रान्तिकारी कदम उठाया है। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में अब पूरा जोर महिलाओं की शिक्षा पर देने का निर्णय भी किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 2017 तक देश की 80 प्रतिशत महिलाओं को साक्षर बनाया जायेगा।

महिलाओं में शिक्षा प्रसार के सुखद परिणाम दिखाई देने भी लगे हैं। पहला यह है किसरकारी और गैर-सरकारी कार्यलयों और स्वायत्त-संस्था्ओं में महिला कर्मचारियों की संख्या और वर्चस्व् बढ़ने लगा है। वर्ष 2004 में की गई सरकारी कर्मचारियों की जनगणना के अनुसार 1995 में पुरुषों में मुकाबले महिला कर्मचारियों का अनुपात मात्र 7.43 प्रतिशत था। वर्ष 2001 में यह बढ़कर 7.53 और 2004 में 9.68 प्रतिशत हो गया। महिला शिक्षा प्रसार का दूसरा लाभ यह हुआ है कि लड़कियों के प्रति पूर्वाग्रह की भावना और उन्हेर परिवार के लिए बोझ मानने की मन:स्थिति समाप्त हो जाने से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का संख्या् अनुपात बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले 48 प्रतिशत थी लेकिन इधर अनुपात की खाई कम होते जाने के ठोस प्रमाण मिले हैं। दिल्ली में तो वर्ष 2008 में स्त्रीं-पुरुष के बीच संख्यात अनुपात में महिलएं आगे निकल गई हैं।  

आधी दुनिया के बहुआयामी मानव-संसाधनों की महत्ता सवीकारते हुए संविधान में उन्हेु अपनी स्थिति सुधारने के लिए न केवल पुरुषों के बराबर अवसर प्रदान किए गए हैं बल्कि प्रत्येक क्षेत्र में अपनी नियति के नियंता बनने के पूरे अधिकार भी दिए गए हैं। वैसे भी महिला सशक्तिकरण एक बहुआयामी और बहुस्तरीय अवधारणा है। यह एक एसी प्रक्रिया है जो महिलाओं को संसाधनों पर अधिक भागीदारी और अधिक नियंत्रण प्रदान करती है। ये संसाधन नैतिक, मानवीय, बौद्धिक और वित्तीय सभी हो सकते हैं। सशक्तिकरण का मतलब है, घर समाज और राष्ट्र के निर्णय लेने के अधिकार में महिलाओं की हिस्सेदारी। दूसरे शब्दों में सशक्ति्करण का अभिप्राय है अधिकारहीनता से अधिकार प्राप्ति की तरफ बढ़ते कदम। शुरूआती कदम के रूप में लोकतंत्र का प्रथम सोपन है – पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं की भागीदारी। 73वां संविधान संशोधन पारित होने के बाद अनेक पंचायतों में कानून के अंतर्गत मिले एक-तिहाई आरक्षण से भी अधिक महिला प्रतिनिधी चुने जाने लगे हैं। अनेक पंचायतों में तो 50 प्रतिशत से भी अधिक महिलाएं चुनी जाती हैं औरकहीं-कहीं तो सभी सदस्य महिलाएं होती हैं। कंद्रीय मंत्रिमंडल ने पंचायतों और नगरपालिकाओं के सभी स्तरों पर महिलाओं का आरक्षण मौजूदा एक-तिहाई से बढ़ाकर कम से कम 50 प्रतिशत कर देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा। बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यअप्रदेश और छत्तीसगढ़ तो पहले से ही पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत स्थान आरक्षित कर सशक्तिकरण की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठा चुके है। यह कार्यवाही जनवरी,2006 में एक अध्यादेश के जरिए की गई। उत्तराखंड ने तो एक और कदम आगे बढा़ते हुए पंचायतों में महिलाओं को 55 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दे दिया है। राज्यसभा ने दो-तिहाई से अधिक बहुमत से महिला आरक्षण विधेयक पारित कर महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक युगान्तकारी कदम उठाया है। रही बात लोक सभा और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिशत एक-तिहाई कर देने का तो इसके लिए संघर्ष जारी है।

न्यूनतम साझा कार्यक्रम में दिए गए छह बुनियादी सिद्धांतों में भी महिलाओं को शैक्षिक, आर्थिक और कानूनी रूप से सशक्त बनाने के सिद्धांत को स्वीकारा गया है। इसके अनुसार महिला अधिकारिता को मूर्तरूप देने के लिए महिला सशक्तिकरण आयोग का गठन किया गया है। महिला अधिकारिता को दिल्लीं हाईकोर्ट के एक फैसले से बल मिला है, जिसके अंतर्गत सेना की नौकरी में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन देने का निर्देश सरकार को दिया गया है। 

वित्तीय वर्ष 2013-14 में महिला सशक्तिकरण का बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय महिला बैंक की स्थापना की गई, जिसमें महिला कर्मचारियों की प्रधानता रहेगी। इस प्रकार नये कम्पनी अधिनियम के अनुसार निदेशक मण्ड,ल में एक महिला निदेशक का होना अनिवार्य किया गया है। रेल बजट 2015-16 में महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष ध्यान दिया गया है जैसे हेल्पलाइन नम्बर, सीसीटीवी कैमरे ताकि महिलाएं स्वयं को सशक्तिकरण की दिशा में अग्रसर कर सके। इसी प्रकार 19 नवम्बर 2010 से प्रारंभ ‘सबल योजना’ जो 11 से 18 वर्ष की किशोर लड़कियों के सशक्तिकरण की दिशा में सरहानीय कदम है, के सकारात्मक परिणाम हो रहे हैं। 

लेकिन आधी आबादी के लिए तरह-तरह की सुविधाओं और अधिकारों की बारिश होने के बावजूद अभी सफर लंबा है। भले ही आज की नारी विगत काल की नारी से कोसों आगे निकल चुकी है, लेकिन फिर भी उसके लिए अभी कई और मंजिलों को छूना बाकी है।
कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध - Kanya bhrun hatya Essay in hindi for UPSC

कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध - Kanya bhrun hatya Essay in hindi for UPSC

कन्या भ्रूण हत्या पर निबंध – Kanya bhrun hatya Essay in hindi for UPSC

kanya bhrun hatya essay in hindi
हमारे देश में पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की कम होती संख्‍या चिंता का विषय है। घटता लिंगानुपात वर्तमान की एक ज्‍वलंत समस्‍या बन चुका है। इस समय स्त्रियों की कमी का मुख्‍य कारण कन्‍या भ्रूण हत्‍या को माना जा रहा है। भारत की भौगोलिक स्थिति, यहां का सामाजिक ताना-बाना एवं जातीय व्‍यवस्‍था, धर्म में विभिन्‍नता इत्‍यादि कारकों को लिंगानुपात में अंतर के लिए उत्‍तरदायी ठहराया जा सकता है कन्‍या भ्रूण हत्‍या कोई समस्‍या नहीं ब‍ल्‍कि समाज में व्‍याप्‍त दहेज प्रथा तथा अन्‍य प्रकार की संकुचित सामाजिक सोच का परिणाम है। इस अभिशाप को जन्‍म देने में प्राय: कन्‍या के माता, पिता, दादा, दादी, नाना और नानी की सहमति शामिल होती है। 
भारत में गर्भ में कन्‍या की हत्‍या करने का प्रचलन लगभग 20 साल पहले आया। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश में गर्भ में भ्रूण की पहचान कर सकने वाली अल्‍ट्रासउंडमशीन का चिकित्‍सकीय उपयोग प्रांरभ हुआ है। वास्‍तविकरूप से पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इस मशीन का आविष्‍कार गर्भ में पल रहे बच्‍चे तथा लोगों के पेट के दोषों की पहचान कर इनका इलाज करने की सोच से किया था। भारत के निजी चिकित्‍सालयों ने भी इस मशीन का इसी प्रकार से उपयोग करने और आम आदमी के जीवन को चिकित्‍सकीय लाभ से लाभांवित करने के संकल्‍प के साथ अपनाया था। इस प्रकार अंल्‍ट्रासाउंड मशीन बुरी नहीं थी परंतु इसके दुरूपयोग के चलते गर्भ मे बच्‍चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्‍या भ्रूण हत्‍या का प्रचलन प्रारंभ हुआ और इससे समाज की स्थिति बहुत ही विकृत हो गई।
सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्‍या भ्रूण हत्‍या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। दुर्भाग्य है कि संपन्‍न वर्ग में यह कुरीति ज्‍यादा है। स्‍त्री-पुरुष लिगांनुपात में कमी हमारे समाज कि लिए कई खतरे पैदा कर सकती है। इससे सामाजिक अपराध तो बढ़ेंगे ही, महिलाओं पर होने वाले अत्‍याचारों में भी वृद्धि हो सकती है। हाल ही में प्रकाशित केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2001 से 2005 के अंतराल में करीब 6,82,000 कन्‍या भ्रूण हत्‍याएं हुई हैं। इस लिहाज से देखें तो इन चार वर्षों में रोजाना 1800 से 1900 कन्‍याओं को जन्‍म लेने से पहले ही मार दिया गया। समाज के रूढि़वदियों को जीने की सही तस्‍वीर दिखाने के लिए सीएसओ की यह रिपोर्ट पर्याप्‍त है।
यह विडंबना ही है कि जिस देश में कभी नारी को गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं के रूप में सम्‍मान प्राप्‍त हुआ, वहीं अब कन्‍या के जन्‍म पर परिवार और समाज में दुख व्‍याप्‍त हो जाता है। जरूरत है कि लोग अपनी गरिमा पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाने वाली, ऐसी सोच से बचें और कन्‍या के जन्म को अपने परिवार में देवी अवतरण के समान मानें। एक नए अनुसंधान के मुताबिक भारत में पिछले 20 सालों में कम से कम सवा करोड़ बच्चियों की भ्रूण हत्‍या की गई। अगर इन बच्चियों को नहीं बचाया गया तो लड़को के साथ भी संकट खड़ा हो जाएगा। अंतरराष्‍ट्रीय पत्रिका द लैंसेट में हाल ही मे छपे इस शोध में दावा किया गया है कि भ्रूण में मारी गई बच्चियों की तदाद 1 करोड़ 50 लाख तक भी हो सकती है। सेंटर फॅार ग्‍लोबल हेल्‍थ रिसर्च के साथ किए गए इस शोध में वर्ष 1991से 2011 तक के जनगणना के आंकड़ों को नेशनल फैमिली हेल्‍थ सवें के आंकड़ों के साथ जोड़कर निष्‍कर्ष निकाले गए हैं।
महिलाओं से जुड़ी समस्‍या पर काम करने वाली संस्‍था सेंटर फार सोशल रिसर्च इस समस्‍या से काफी चिंति‍त है। संस्‍था काफी समय से सरकार से इस बीमारी को रोकने के लिए हस्‍तक्षेप की मांग करती आ रही है। उधर सरकारी तर्क में कहा गया है कि 0-6 साल के बच्‍चों का लिंग अनुपात 962 था, जो 1991 में घटकर 945 हो गया और 2001 में यह 927 रह गया है। इसका श्रेय मुख्‍य तौर पर देश में कुछ भागों में हुई कन्‍या भ्रूण की हत्‍या को जाता है। गौरतलब है कि 1995 में बने जन्‍म पूर्व नैदानिक अधिनियम नेटल डायग्‍नोस्टिक एक्‍‍ट 1995 के मुताबिक बच्‍चे के लिंग का पता लगाना गैर-कानूनी है।
इसके बावजूद इसका उल्‍लंघन सबसे अधिक होता है। सरकार ने 2011 व 12 तक बच्‍चों का लिंग अनुपात 935 और 2016-17 तक इसे बढ़ाकर 950 करने का लक्ष्‍य रखा है। देश के 328 जिलों में बच्‍चों का लिंग अनुपात 950 से कम है। जाहिर है, हमारे देश में बेटे के मोह के चलते हर साल लाखों बच्च्यिों की इस दुनिया में आने से पहले ही हत्‍या कर दी जाती है और सिलसिला रुकता दिखाई नहीं दे रहा है।
समाज में लड़कियों की इतनी अवहेलना, इतना तिरस्‍कार चिंताजनक और अमानवीय है। जिस देश में स्‍त्री के त्‍याग और ममता की दुहाई दी जाती हो, उसी देश में कन्‍या के आगमान पर पूरे परिवार में मायूसी और शोक छा जाना बहुत बड़ी विडंबना है। हमारे समाज के लोगों में पुत्र की बढ़ती लालसा और लगातार घटता स्‍त्री-पुरुष अनुपात समाजशास्‍त्रियों, जनसंख्‍या विशेषज्ञों और योजनाकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। यूनिसेफ के अनुसार 10 प्रतिशत महिलाएं विश्‍व की जनसंख्‍या से लुप्‍त हो चुकी हैं,  जो गहन चिंता का विषय है। स्त्रियों के इस विलोपन के पीछे कन्‍या भू्ण हत्‍या ही मुख्‍य कारण है। संकीर्ण मानसिकता और समाज में कायम अंधविश्‍वास के कारण भी बेटा और बेटी के प्रति लोगों की सोच विकृत हुई है। समाज में ज्‍यादातर मां-बाप सोचते है कि बेटा तो जीवन भर उनके साथ रहेगा और बुढ़ापे में उनकी लाठी बनेगा। समाज में वंश परंपरा का पोषक लड़को को ही माना जाता है।
पुत्र कामना के कारण ही लोग अपने घर में बेटी के जन्‍म की कामना नहीं करते। बड़े शहरों के कुछ पढ़े-लिखे परिवारों में सोच कुछ बदली है, लेकिन गांव, देहात और छोटे शहरों में आज भी बेटियों को लेकर पुरानी सोच बरकरार है। आज भी शहरों के मुकाबले गांव में दकियानूसी विचारधारा वाले लोग बेटों को ही सबसे ज्‍यादा महत्‍व देते हैं, लेकिन मां का भी यह कर्तव्‍य है कि वह समाज के दबाव में आकर लड़की और लड़का में अंतर न करे। दोनो को समान स्‍नेह और प्‍यार दें। दोनों के विकास में बराबर दिलचस्‍पी लें। बालक-बालिका दोनों प्‍यार के बराबर अधिकारी हैं। इनके साथ किसी भी तरह का भेद करना सृष्टि के साथ खिलवाड़ होगा। कन्‍या भ्रूण हत्‍या का असली कारण हमारी सामजिक परंपरा और मान्‍यताएं हैं जो मूल रूप से महिलाओं के खिलाफ हैं। आज भी सामाजिक मान्‍यताओं में शायद ही कोई परिवर्तन आया हो। हां, इतना जरूर है कि यदि कोई लड़की अपनी मेहनत और प्रतिभा से कोई मुकाम हासिल कर लेती है तो हमारा समाज उसे स्‍वीकार कर लेता है। हमने प्रशासन के लिए तो लोकतांत्रिक संस्थाएं अपना ली हैं, लेकिन उसका समाज तक विस्‍तार होना बाकी है। यही कारण है कि तमाम सकरारी कोशिशों के बावजूद कन्‍या भ्रूण हत्‍या पर रोक नहीं लग पा रही है।
अत: निष्‍कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सरकार द्वारा बनाए गए ये कानूनी प्रावधान, एक सीमा तक इस समस्‍या के समाधान के सार्थक प्रयास हो सकते हैं। इस सामजिक बुराई से निजात तब ही मिल पाएगी जब हम और हमारा परिवेश पूरी तरह इस बुराई को उखाड़ फेंकने के लिए दृढ़ संकल्‍पित होंगे। साथ ही जब कि स्‍त्रियां स्‍वयं इस बुराई के विरुद्ध संघर्ष नहीं करेंगी तब तक इसे पूर्णतया दूर नहीं किया जा सकता। माताओं एवं बहिनों को चाहिए कि वे इस बुराई का समर्थन करने वाला कोई कदम पारिवारिक दबाव या किसी के बहकावे में आकर न उठाएं। कभी ऐसी विकट परिस्‍थितियां उत्‍पन्‍न हो भी जाएं तो उन्‍हे कानून का सहारा लेना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह शादी, गर्भधारण, जन्‍म और मृत्‍यु के पंजीकरण करवाने के नियमों का पालन को प्रोत्‍साहन एवं जनचेतना द्वारा अनिवार्य बनाए। इसके बावजूद भी नियमों का उल्‍लघंन होने पर कठोर दंड का प्रावधान करे। इसके साथ ही चिकित्‍सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को नैतिक रूप से उन्‍नत करने के समुचित प्रयास करने होंगे। इन सकरात्‍मक प्रयासों से ही इस सामाजिक बुराई का अंत हो सकता है।