Thursday, 25 April 2019

डॉन ब्रैडमैन की जीवनी, क्रिकेट करियर, पुरस्कार और उपलब्धियां

डॉन ब्रैडमैन की जीवनी, क्रिकेट करियर, पुरस्कार और उपलब्धियां

डॉन ब्रैडमैन की जीवनी, क्रिकेट करियर, पुरस्कार और उपलब्धियां

नाम : डोनॉल्‍ड ब्रेडमैन
जन्‍म : 27 अगस्‍त 1908

पत्नी-: जेसी मार्था मेन्ज़ीस
पिता: जॉर्ज ब्रैडमैन
माता : एमिली ब्रैडमैन
राष्ट्रीयता: ऑस्ट्रेलियाई
मृत्‍यु : 25 फ़रवरी 2001

सर डोनाल्ड जॉर्ज ब्रेडमैन का जन्‍म 27 अगस्‍त, 1908 को न्‍य साउथ वेल्‍स में एक बढ़ई किसाान की सबसे छोटी संतान के रूप में हुआ था। जिन्हें द डॉन के नाम से भी जाना जाता है। वह विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माने जाते हैं। उनका परिवार मितगोंग में रहता था, लेकिन उनकी मां के गिरते स्‍वास्‍थ्‍य के कारण 1911 में बोरवाल चला गया। उन्‍होंने क्रिकेट अपने मामाओं जार्ज और रिचर्ड व्‍हाटमैन से सीखा। उनकी मां घर के पिछवाड़े उनके लिये बायें हाथ से गेंदबाजी करती थीं। एक किशोर के रूप में ब्रैडमैन शानिवार की दोपहर में गांव में होने वाले क्रिकेट मौचों में खेलते। जल्‍दी ही उन्‍होंने बड़े-बड़े स्‍कोर खड़े करना शुरू कर दिए। 

डॉन ब्रैडमैन की जीवनी, क्रिकेट करियर, पुरस्कार और उपलब्धियां
करियर : 1926 में न्‍यू साउ‍थ वेल्‍स क्रिकेट संघ ने, जो एक गेंदबाज की तलाश कर रहा था, ब्रेडमैन से ट्रायल मैच में खेलने के लिये कहा। वह चयनकर्ताओं को आकर्षित नहीं कर पाये। उन्‍होंने सिडनी में सेंट जार्ज क्‍लब के लिये खेला। बाद में उन्‍होंने उत्तरी सिडनी और 1935 में दक्षिणी आस्‍ट्रेलिया के एडिलेड में जाने के बाद केनसिंगटन क्‍लब के लिये खेला। कुछ प्रभावकारी स्‍कोरों के बाद उन्‍होंने 1927 में दक्षिणी आस्‍ट्रेलिया के विरुद्ध न्‍यू साउथ वेल्‍स की ओर से कुछ शुरूआती प्रथम श्रेणी मैच खेले और एक शतक बनाया। 1928-29 के सत्र की शुरूआत में उन्‍होंने बड़े स्‍कोरों की एक श्रृंखला बनाई। उनका चयन पेरी चेपमैन की इंग्‍लिश साइड के विरुद्ध आस्‍ट्रेलिया के लिये खेलने के लिये कर लिया गया। पहले टेस्‍ट मैच में उन्‍होंने बहुत खराब प्रदर्शन किया। इसलिये उन्‍हें दूसरे मैच में 12 वे खिलाड़ी के रूप में शामिल किया गया। बचे हुए मैचों में आस्‍ट्रेलिया की टीम में अपना स्‍थान स्‍थ‍ापित करने के लिये दो शतक जड़ दिये।


ब्रेडमैन के खेल में शैली की कमी होने के कारण उनकी बहुत आलोचना हुई। उनकी आदत थी कि वह क्रॉस बैट शॉट खेलते थे और समस्‍या यह थी कि उन्‍हें तुलनात्‍मक रूप से सॉफ्ट इंग्लिश विकेट पर मुकाबला करना था। ब्रेडमैन ने लगातार बड़े स्‍कोर खड़े करके अपने आलोचकों को जवाब दे दिया। अपन पूरे करियर के दौरान वह बहुत तेज और बड़ा स्‍कोर खड़ा करने वाले खिलाड़ी थे। 1930 में इंग्‍लैंड के उनके शुरूआती दौरे में उन्‍होंने खुद को एक अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के खिलाड़ी के रूप में स्‍थापित कर लिया। उन्‍होंने इस दौरे में 98.66 के औसत से कुल 2,960 रन बनाये। टेस्‍ट मैचों में 139.14 के औसत से 974 रन बनाये, जिसमें 131, 254, 334 और 452 के स्‍कोर शामिल थे। 1930 में अपने इंग्‍लैंड दौरों में उन्‍होंने 1,000 रन बनाये। यह प्रतिष्‍ठता प्राप्‍त करने वाले वह इकलौते खिलाड़ी बन गये। 1938-1939 के सत्र में उन्‍होंने लगातार छह शतक लगाकर सी.बी. फ्राय के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।

केवल बॉडीलाइन बॉउलिंग, जहांपर बॉल शार्ट पिच होती है और सामान्‍य निशान सिर की दिशा में होता है, जिसका प्रयोग इंग्‍लिश साइड से डगलस जॉर्डिन द्वारा किया जा रहा था, ही ब्रेडमैन पर अंकुश लगा पायी। उनका औसत 56.57 रहा, जो आज भी अधिकतर बल्‍लेबाजों की ईर्ष्‍या का कारण हो सकता है। इस कारण बॉडीलाइन बॉउलिंग से गहरे मतभेद उत्‍पन्‍न हुए।

प्रथम श्रेणी क्रिकेटमें ब्रेडमैन का औसत 95.14 था और टेस्‍ट मैचों में 99.94 था, सौ के औसत से केवल 4 रन कम। उन्‍होंने प्रथम श्रेणी के क्रिकेट में 117 शतक बनाये (29 टेस्‍ट मैचों में) जबकि उन्‍होंने बल्‍लेबाजी की हर तीसरी मैच में शतक लगाया। उनके शतकों में 31 दोहरे शतक थे (10 टेस्‍ट मैचों में), पांच तिहरे (2 टेस्‍ट मैचों में) और एक चतुर्गण शतक, उनके प्रसिद्ध 452 रन 1930 में क्‍वींसलैंड के विरुद्ध बने। 1936 में इंग्‍लैंड दौरे के लिये ब्रेडमैन सर्वाधिक सफल कप्‍तान रहे। जिन 24 टेस्‍ट मैचों में उन्‍होंने आस्‍ट्रेलिया की कप्‍तानी की, उनमें से आस्‍ट्रेलिया ने 15 जीते, तीन हारे और 6 ड्रॉ रहे। 1948 में जिस टीम ने इंग्‍लैंड का दौरा किया, उसने एक भी मैच नहीं हारा था।

क्रिकेट से संन्‍यास लेने के बाद जनवरी, 1949 को उन्‍हें नाइट की उपाधि मिली। उन्‍होंने एक चयनकर्ता और एक प्रशासक के रूप में क्रिकेट से अपना संपर्क बनाये रखा। वह दो बार आस्‍ट्रेलियन क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन रहे। उनका सबसे महत्‍वपूर्ण निर्णय था 1971-71 में साउथ अफ्रीका का दौरा रद करना, उस कड़वाहट और हिंसा से बचने के लिये, जो दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति वाली राजनीति के विरोध से संबंधित थी। 1965 से 1973 तक ब्रेडमैन दक्षिण आस्‍ट्रेलियन क्रिकेट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष रहे। क्रिकेट छोड़ने के बाद वित्त उद्योग एक सफल करियर रहा।

पुरस्कार और उपलब्धियां
  • ब्रैडमैन ने 52 टेस्ट मैचों (80 इनिंग्स) में 99.94 की औसत से 6996 रन बनाए। उन्होंने 29 टेस्ट शतक बनाए, जो उस समय एक विश्व रिकॉर्ड था।
  • ब्रैडमैन का एक श्रृंखला में 974 रनों का रिकॉर्ड टेस्ट इतिहास में किसी भी खिलाड़ी द्वारा सर्वाधिक है और यह आज भी कायम है।
  • क्रिकेट के प्रति उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 1949 में नाइट बैचलर से सम्मानित किया गया। वह यह पुरस्कार पाने वाले एकमात्र ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर थे।
  • ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने उन्हें 1979 में कम्पैनियन ऑफ़ द ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया (AC), से सम्मानित किया।
  • 2000 में उन्हें विजडन क्रिकेट अल्मनैक द्वारा 20 वीं शताब्दी का सबसे बड़ा क्रिकेटर चुना गया, उन्होंने 100 मीटर के अंतर से सर्वसम्मति से फैसला किया।

1980 और 1990 के दशक में ब्रेडमैन के जीवन पर प्रकाशित होने वाली सामग्रियों की बाढ़ आ गई। 1988 में उन्‍होंने अपनी किताब द ब्रेडमैन एलबम्‍स जारी की। उनकी दो जीवनियां चार्ल्‍स विलियम की ब्रेडमैन : एन आस्‍ट्रेलियन हीरो और रोनाल्‍ड पेरी द डॉन प्रकाशित हुई।
लुई पाश्चर की जीवनी। Louis Pasteur Biography In Hindi

लुई पाश्चर की जीवनी। Louis Pasteur Biography In Hindi

लुई पाश्चर की जीवनी। Louis Pasteur Biography In Hindi

नाम : लुई पाश्चर
जन्‍म : 27 दिसंबर, 1822
मृत्‍यु : 28 सितंबर, 1895
खोज : रैबीज, एन्‍थ्रैक्‍स चेचक का उपचार खोजा

लुईस पॉश्‍चर संसारके सबसे महान वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्‍होंने कई बीमारियों, जैसे रैबीज, हाइड्रोफोबिया और चेचक का उपचार खोजा। उन्होंने दूध को पास्चुरीज़ करने और दुग्‍ध उत्‍पादों को रोगाणुओं से मुक्‍त रखने की पद्धति खोजी।

Louis Pasteur Biography In Hindi
प्रारम्भिक जीवन : लुईस पॉश्‍चर का जन्‍म 1822 में फ्रांस में हुआ। 16 साल की उम्र में उन्‍होंने निर्णय लिया कि कोई महान कार्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। स्‍कूली पढ़ाई खत्‍म करने के बाद उन्‍होंने कॉलेज ऑफ बेसैनकॉन में दाखिला ले लिया और वहां से बैचलर ऑफ सांइस की डिग्री प्राप्‍त की।

लुईस पॉश्‍चर ने आगे रसायनशास्‍त्र की पढ़ाई की और फिर स्‍ट्राबर्ग में रसायन-शास्‍त्र पढ़ाने लगे। वहां उन्‍होंने रैसेमिक एसिड की प्रकाश संबंधी विशेषताएं पता लगाने के लिए अध्‍ययन और प्रयोग किए। इसी दौरान उनकी रसायनशास्‍त्र के प्रख्‍यात प्रोफेसर जे.बी. बायट से मित्रता हो गई। इसने उन्‍हें फ्रांस का महान वैज्ञानिक बना दिया।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण खोजें रोगाणु अध्ययन के क्षेत्र में थीं। उन्होंने दिखाया कि कीटाणुओं को विकसित होने के लिए कुछ सूक्ष्म जीवों की आवश्यकता होती है; इस ज्ञान का उपयोग करते हुए, उन्होंने पाया कि खमीर के किण्वन में देरी हो सकती है। लुई पाश्चर ने दूध जैसे तरल पदार्थ में बैक्टीरिया को मारने के व्यावहारिक तरीकों की ओर रुख किया। पॉश्‍चराईजेशन की उनकी प्रक्रिया ने दूध के प्रोटीन को नष्ट किए बिना दूध में बैक्टीरिया को सफलतापूर्वक मार दिया। यह एक मौलिक खोज थी जिसने दूध पीने को सुरक्षित बनाया। 

"एक व्यक्ति जो कड़ी मेहनत करने की आदत डाल लेता है, वह इसके बिना कभी नहीं रह सकता है। कड़ी मेहनत इस दुनिया में सफलता की नींव है। ”- लुईस पॉश्‍चर 

एन्‍थ्रैक्‍स के टीके की खोज : उन्‍होंने एन्‍थ्रैक्‍स के कारण पता किए और टीके की प्रक्रिया खोज निकाली। 1880 में, जीन-जोसेफ-हेनरी टूसेंट, एक पशु चिकित्सा सर्जन ने एंथ्रेक्स बैक्टीरिया को मारने के लिए कार्बोलिक एसिड का उपयोग किया था। पाश्चर ने इसी तरह की पद्धति का इस्तेमाल किया, उनकी अधिक प्रसिद्धि के कारण उन्हें खोज का श्रेय दिया गया।

रेबीज के टीके की खोज : एंथ्रेक्स के टीके की सफलता ने पाश्चर को रेबीज के लिए एक इलाज विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया - यह उस समय एक बहुत ही सामान्य बीमारी थी। इसी तरह के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए, उन्होंने बीमारी का इलाज विकसित किया। रेबीज से प्रभावित जानवरों पर परीक्षण सफल रहा; हालाँकि, वह मनुष्यों पर परीक्षण करने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि उन्हें डर था कि शायद यह काम न करे। एक बार उन्होंने खुद पर परीक्षण करने की सोची। हालाँकि, इससे पहले कि वह अपनी योजना को लागू कर पाते, एक युवा लड़के को उसके पास लाया गया। जिसे एक पागल कुत्ते द्वारा 14 बार काट लिया गया था। उनके माता-पिता उनकी नई तकनीक को आजमाने के लिए तैयार हो गए। उनका उपचार सफल रहा और उपचार की खबर जल्द ही फैल गई। 350 से अधिक लोग लुई पाश्चर के पास इलाज के लिए आए। लुई और उनके वैज्ञानिकों की टीम ने रेबीज से पीड़ित लोगों को बचाने के लिए कड़ी मेहनत की और सफल रहे। इन्ही सब खोजों ने आगे चलकर पॉश्‍चर इंस्‍टीट्यूट की आधारशिला रखने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी। 

लुइस की मृत्यु 1895 में 73 वर्ष की आयु में हुई। उन सब सम्‍मानों के बावजूद, जो पॉश्‍चर को मिले, वह हृदय से बहुत सादे बने रहे। उन्‍होंने अपने ही तरीके से मानवता की पीड़ाओं को कम करने के प्रयासों में अपना जीवन जिया। अपने अंतिम दिन उन्होंने कहा:

"मुझे युवा होना पसंद है ताकि मैं खुद को नई बीमारियों के अध्ययन के लिए समर्पित कर सकूं।"

Wednesday, 24 April 2019

सर आर्थर कॉनन डॉयल का जीवन परिचय Arthur Conan Doyle Biography in Hindi

सर आर्थर कॉनन डॉयल का जीवन परिचय Arthur Conan Doyle Biography in Hindi

सर आर्थर कॉनन डॉयल का जीवन परिचय

नाम : आर्थर कॉनन डॉयल
जन्‍म : 22 मई 1859
मृत्‍यु : 7 जुलाई 1930
देश : स्कॉटलैंड
प्रमुख कार्य : शेरलॉक होम्स की रचना

22 मई 1859 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में आर्थर कॉनन डॉयल का जन्म हुआ था। आर्थर कानन डायल एक अंग्रेजी उपन्‍यासकार थे, जो जासूसी किरदार शेरलॉक होम्स के सृजक के रूप में दूर-दूर तक पहचाने जाते हैं। डायल पेशे से डॉक्‍टर थे।

प्रारंभिक जीवन
22 मई 1859 को आर्थर कॉनन डॉयल का जन्म स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में एक संपन्न, आयरिश-कैथोलिक परिवार में हुआ था। कला की दुनिया में डॉयल का परिवार काफी सम्मानित था। उनके पिता, चार्ल्स एक शराबी थे। आर्थर कॉनन डॉयल की मां, मैरी एक जीवंत और पढ़ी-लिखी महिला थीं, जिन्हें किताबें पढ़ना पसंद था। वह अपने बेटे को दंतकथाओं में सुनाया करती थी। 

Arthur Conan Doyle Biography in Hindi
9 साल की उम्र में, डॉयल को इंग्लैंड भेज दिया गया, जहां उन्होंने होडर प्लेस, स्टोइनहर्स्ट नामक एक प्रारंभिक विद्यालय में अध्ययन किया। इसके बाद डॉयल ने अगले पाँच वर्षों तक स्टोइनहर्स्ट कॉलेज में अध्ययन किया। डॉयल के लिए, बोर्डिंग-स्कूल का अनुभव क्रूर था: उसके कई सहपाठी उसे परेशान किया करते थे। समय के साथ, डॉयल ने कहानी लेखन में कौशल विकसित किया।

चिकित्सा शिक्षा और कैरियर
जब डॉयल ने 1876 में स्टोइनहर्स्ट कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, तो उसके माता-पिता को उम्मीद थी कि वह अपने परिवार के नक्शेकदम पर चलेगा और कला का अध्ययन करेगा, इसलिए जब उन्होंने एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में चिकित्सा की डिग्री लेने का फैसला किया तो वे आश्चर्यचकित रह गए। मेड स्कूल में, डॉयल ने अपने गुरु, प्रोफेसर डॉ जोसेफ बेल से मुलाकात की, जिन्होंने डॉयल को अपने प्रसिद्ध काल्पनिक जासूस, शर्लक होम्स को बनाने के लिए प्रेरित किया। एडिनबर्ग विश्वविद्यालय में, डॉयल को सहपाठियों और भविष्य के साथी लेखकों जेम्स बैरी और रॉबर्ट लुई हेवेंसन से मिलने का सौभाग्य भी मिला। एक मेडिकल छात्र के बावजूद, डॉयल ने लेखन में अपना पहला कदम रखा, द मिस्ट्री ऑफ साससा वैली नामक एक छोटी कहानी के साथ। इसके बाद एक दूसरी कहानी, द अमेरिकन टेल, जिसे लंदन सोसाइटी में प्रकाशित किया गया था।

डॉयल के मेडिकल स्कूल के तीसरे वर्ष के दौरान, उन्हें आर्कटिक सर्कल के लिए नौकायन व्हेलिंग जहाज पर एक जहाज सर्जन का पद मिला। यात्रा ने डॉयले में रोमांच की भावना जागृत की, जिसने उन्हें Captain of the Pole Star कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया। डॉयल ने बाद में अपना मेडिकल लेखन को पूरी तरह से छोड़ दिया, ताकि वह अपना सारा ध्यान अपने लेखन पर केंद्रित कर सकें।

व्यक्तिगत जीवन
1885 में, डॉयल की मुलाकात लुईसा हॉकिन्स से हुई, बाद में उन्होंने उससे शादी कर ली। दंपति अपर विंपोल स्ट्रीट चले गए। उनके दो बच्चे, एक बेटी और एक बेटा था। 1893 में, लुईसा तपेदिक से बीमार थी। जब लुईसा बीमार थी, डोयले जीन लेकी नामक एक युवा महिला की ओर आकर्षित हुई थी। अंततः लुईसा की 1906 में मृत्यु हो गई। अगले वर्ष, डॉयल ने जीन लेकी से शादी कर ली, जिसके साथ उनके दो बेटे और एक बेटी थी।

कहानी और उपन्यास : 
उनकी पहली कहानी, जिसमें होम्‍स का चरित्र था, ए स्‍टडी इन स्‍कारलेट, 1887 में प्रकाशित हुई थी। 1890 के बाद वह पूर्णकालिक लेखक बन गए। उन्‍होंने होम्‍स के रोमांचक कार्यों को द मेमोयर्स ऑफ शरलक होम्‍स (1894), द हाउंड ऑफ द बास्‍करविल्‍लेस (1902) और उनकी अंतिम पुस्‍तक, जिसमें इस जासूस का चरित्र था, द केसबुक ऑफ शरलक होम्‍स (1927) में लिखा। डायल ने 4 उपन्‍यास और 56 कहानियां लिखीं, जिनमें होम्‍स को शामिल किया गया था।

विडंबना देखिए, डायल अपनी जासूसी कहानियों के लिये याद नहीं रखे जाना चाहते थे, बल्‍कि अपने अधिक उल्‍लेखनीय कार्यों, ऐतिहासिक उपन्‍यास सर निगेल (1906), मिकाह क्‍लार्के (1889) और व्‍हाइट कंपनी (1890) के लिए विचलित थे, लेकिन ये कार्य आज कम प्रसिद्ध हैं।

डायल ने रहस्‍य और रोमांच की दूसरी कथाएं भी लिखी हैं, जिसमें साइंस फिक्‍शन, जिसके मुख्‍य पात्र प्रोफेसर चैलेंजर थे, द लॉस्‍ट् वर्ल्‍ड (1911) और द प्‍वॉयजंस बेल्‍ट (1912) थी। 1902 में नाइट की उपाधि से सम्‍मानित डायल ने दो प्रचार पुस्‍तिकाएं भी लिखीं, जिसमें बोअर युद्ध में इंग्‍लैंड की भूमिका की निंदा की गई थी। प्रथम विश्‍वयुद्ध में अपने पुत्र की मृत्‍यु के बाद,डायल को आध्‍यात्‍मिकता के अध्‍ययन में आराम मिला और उन्‍होंने हिस्‍ट्री ऑफ स्‍प्रिचुअलिज्‍म (दो खंड, 1926-27) प्रकाशित किये। 1924 में उनकी आत्‍मकथा मेमोरीज एंड एडवेंचर्स आई।

मृत्यु : दिल की बीमारी एनजाइना पेक्टोरिस से पीड़ित होने के बाद भी डॉयल ने अपने डॉक्टर की चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। 7 जुलाई 1930 को, डॉयल की हार्ट अटैक से उनके बगीचे में उनकी मौत हो गई।
सड़क सुरक्षा जीवन रक्षा पर निबंध। Road Safety Essay in Hindi

सड़क सुरक्षा जीवन रक्षा पर निबंध। Road Safety Essay in Hindi

सड़क सुरक्षा जीवन रक्षा पर निबंध। Road Safety Essay in Hindi

आज के दिनों में सड़क दुर्घटनाएं, चोटें और मौतें बहुत आम हो गई हैं। सड़क पर ऐसी दुर्घटनाओं का मुख्य कारण लोगों द्वारा सड़क यातायात नियमों और सड़क सुरक्षा उपायों की अनदेखी है। हमें यह समझना चाहिए कि सड़क सुरक्षा ही जीवन रक्षा का दूसरा नाम है। सड़क सुरक्षा का मतलब है कि सुरक्षित तरीके से सड़क पर चलना, यानी खुद को सड़कों पर होने वाली किसी भी प्रकार की दुर्घटनाओं से सुरक्षित रखना। यह अनुमान है कि हर साल सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 1 मिलियन लोग मारे जाते हैं।

हमें सड़कों पर सुरक्षित रहने के लिए कुछ नियमों का पालन करने की आवश्यकता है। इन नियमों को सड़क सुरक्षा नियम कहा जाता है।

सड़क दुर्घटनाओं के कारण : विकासशील देशों में यह मुद्दा अधिक महत्वपूर्ण है। स्पीड ड्राइविंग के कारण गंभीर चोटें आती हैं। अन्य कारक जो दुर्घटनाओं का कारण बन सकते हैं वे हैं चालक की बीमारी या थकान, नशे में गाड़ी चलाना, वाहन का ब्रेक फेल होना या स्टीयरिंग फेल होना और खराब सड़कें। किसी वाहन में क्षमता से अधिक सवारियों को बैठाकर चलाना भी सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण है। 

सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमें सड़कों पर चलने या सुरक्षित रूप से चलने में मदद करता है। यहां तक ​​कि एक वाहन के अंदर सवारी करते समय, हमें सुरक्षित यात्रा के लिए सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए।

सड़क सुरक्षा को कैसे बेहतर बनाया जाए : सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए हमें सड़क सुरक्षा में सुधार करने की आवश्यकता है। अगर हमारे देश के सभी लोग सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूक होंगे तो ही समस्या को रोका जा सकेगा। खुद को सुरक्षित और चोट से मुक्त रखने के लिए हमें निम्नलिखित सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए:
  • हमें हमेशा फुटपाथों पर चलना चाहिए।
  • सड़कों पर न तो कूदें और न ही दौड़ें।
  • हमें यातायात संकेतों का पालन करना चाहिए। अगर हम गाड़ी चला रहे हैं, तो सिग्नल लाल होने पर हमें रुक जाना चाहिए। सिग्नल ग्रीन होने पर ही हमें ड्राइव करना चाहिए।
  • हमें जेब्रा क्रॉसिंग पर ही सड़क पार करनी चाहिए।
  • सड़क पार करते समय, हमें अपने बाएं और दाएं ओर देखना चाहिए कि हमारे रास्ते में कोई भी चलने वाले वाहन तो नहीं हैं।
  • बच्चों को हमेशा अपने बड़ों के सड़क पार करनी चाहिए।
  • हमें सड़क पर चलते समय फोन पर बात नहीं करनी चाहिए।
  • चौपहिया वाहन चलाते समय हमें हमेशा सीट-बेल्ट पहननी चाहिए।
  • दोपहिया वाहन पर सवारी करते समय, हमें अपनी सुरक्षा के लिए हेलमेट पहनना चाहिए।
  • हमें चलते वाहन के अंदर जोर से बात नहीं करनी चाहिए। इससे ड्राइवर परेशान हो सकता है।
  • हमें चलते वाहन के अंदर खेलना या कूदना नहीं चाहिए।
  • बस में बैठते समय हमें एक कतार बनानी चाहिए और अपने मौके की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
  • हमें चलती गाड़ी की खिड़की से अपना सिर या हाथ बाहर नहीं निकालना चाहिए।

उपसंहार : इस प्रकार, हमने सड़क सुरक्षा की अवधारणा को समझा है। इसके अलावा, हमने सड़क सुरक्षा नियमों के बारे में भी जाना है जिनका हमें रोजमर्रा के जीवन में पालन करना चाहिए।

Tuesday, 23 April 2019

क्लियोपैट्रा का जीवन परिचय। Cleopatra Biography in Hindi

क्लियोपैट्रा का जीवन परिचय। Cleopatra Biography in Hindi

क्लियोपैट्रा का जीवन परिचय। Cleopatra Biography in Hindi

क्लियोपैट्रा प्राचीन मिस्र की रानी और अंतिम फिरौन थी। क्लियोपैट्रा ग्रीक भाषी टॉलमी राजवंश की सदस्य थी जिसने 300 ईसा पूर्व से 30 ईसा पूर्व तक मिस्र पर शासन किया। अपने भाई द्वारा सत्ता हड़प लिए जाने पर क्लियोपैट्रा ने जूलियस सीजर के साथ मिलकर सिंहासन को पुनः हासिल किया। सीजर की हत्या के बाद वह मार्क एंथोनी की प्रेमिका बन गई। लेकिन जब मार्क एंथोनी रोमन गृह युद्ध में ऑक्टेवियन सेनाओं द्वारा पराजित हो गया तब एंथोनी और क्लियोपैट्रा ने ऑक्टेवियस के हाथों में पढ़ने की बजाय आत्महत्या कर ली। और क्लियोपैट्रा की मौत के साथ ही इजिप्ट यानी मिश्र से टॉलमी राजवंश का अंत हो गया।

Cleopatra Biography in Hindi
क्लियोपैट्रा का जन्म लगभग 69 ईसा पूर्व हुआ था। उसके पिता टॉलमी द्वितीय की मृत्यु तभी हो गई थी जब क्लियोपैट्रा केवल 18 वर्ष की थी। जैसा कि उस समय का रिवाज था, क्लियोपेट्रा ने अपने भाई टॉलमी तृतीय से शादी की, और  उन्होंने मिस्र पर एक साथ शासन किया। हालांकि,  टॉलमी ने जल्द ही क्लियोपेट्रा को निर्वासित कर दिया था, जिससे वह साम्राज्य का एकमात्र शासक बन सके।

48 ईसा पूर्व में, रोमन साम्राज्य जूलियस सीज़र और पोम्पी के बीच एक गृह युद्ध में उलझा हुआ था। जब पोम्पी मिस्र की राजधानी अलेक्जेंड्रिया भाग गया, तो टॉलमी के आदेश पर उसकी हत्या कर दी गई। जब सीजर मिस्र आया तो टॉलमी ने पोम्पी का कटा हुआ सिर सीजर को उपहार में दिया लेकिन ऐसा माना जाता है कि उसके इस कृत्य से प्रसन्न होने की बजाय सीजर को गुस्सा आया और उसने आदेश दिया की पोम्पी के शरीर को रोमन सम्मान के साथ दफनाया जाए। क्लियोपैट्रा ने इस मौके का फायदा उठाया और सीजर को अपने प्रेम जाल में फंसा लिया। 

क्लियोपैट्रा ने जुलियस सीजर की सेना के सहयोग से अपने भाई टॉलमी द्वितीय को सिंहासन से हटा दिया और मार डाला। इस प्रकार की क्लियोपैट्रा दोबारा मिस्र की रानी बन गई। 47 ईसा पूर्व में क्लियोपैट्रा ने एक बच्चे को जन्म दिया जिसका नाम था "सिजेरियन" जिसका अर्थ होता है सीजर जैसा। हालांकि सीजर ने कभी भी इसे अपना पुत्र नहीं माना।

44BC में, जूलियस सीज़र की हत्या कर दी गई और इसने मार्क एंथोनी और सीज़र के दत्तक पुत्र ऑक्टेवियन के बीच सत्ता के संघर्ष को जन्म दिया।

ऑक्टेवियन की बहन (ऑक्टेविया) से विवाहित होने के बावजूद, मार्क एंथोनी का क्लियोपेट्रा के साथ प्रेम संबंध था। इसे एक पारिवारिक अपमान के रूप में भी देखा गया। मार्क एंथोनी और ऑक्टेवियन के बीच की दुश्मनी गृहयुद्ध में बढ़ गई और 31BC में, क्लियोपेट्रा ने अपनी मिस्र की सेना को मार्क एंथोनी की रोमन सेना के साथ मिला लिया और ग्रीस के पश्चिमी तट पर ऑक्टेवियन की सेना का मुकाबला किया।

क्लियोपेट्रा और मार्क एंथोनी बुरी तरह से युद्ध में पराजित हुए और मिस्र वापस भाग गए। हालाँकि, ऑक्टेवियन की सेना ने इस जोड़े का पीछा किया और 30BC में अलेक्जेंड्रिया पर कब्जा कर लिया। भागने का कोई मौका नहीं होने पर, मार्क एंथोनी और क्लियोपेट्रा दोनों ने 12 अगस्त 30BC को आत्महत्या कर अपनी जान ले ली। 

ऑक्टेवियन ने बाद में क्लियोपेट्रा के बेटे सिजेरियन का गला घोंटकर क्लियोपेट्रा राजवंश को समाप्त कर दिया। मिस्र रोमन साम्राज्य का एक प्रांत बन गया, और क्लियोपेट्रा मिस्र की फिरौन शासिका अंतिम साबित हुई।

Monday, 22 April 2019

पेले की आत्मकथा। Pele Biography in hindi

पेले की आत्मकथा। Pele Biography in hindi

पेले की आत्मकथा। Pele Biography in hindi

पेले दुनिया के सबसे महान फुटबाल खिलाड़ी हैं, जिन्‍होंने फुटबाल को नई दिशा दी और स्‍वयं को एक अत्‍यंत सम्‍मानित फुटबाल खिलाड़ी के तौर पर स्‍थापित किया। पेले का वास्तविक नाम है एडसन अरांटेस डो नेकसीमेंटो। उन्‍हें ‘फुटबाल सम्राट’ कहा जाता है। ब्राजील की फुटबाल टीम ने पेले की कप्‍तानी में अंतर्राष्‍ट्रीय फुटबाल में अत्‍यधिक सफलता प्राप्‍त की।

Pele Biography in hindi
पेले का जन्‍म 23 October 1940 को ब्राजील में हुआ था। वह गरीब नीग्रो परिवार से थे। बचपन से ही उन्‍होंने पढ़ाई में कोई रुचि नहीं दिखाई, लेकिन खेलों में अत्‍यधिक रुचि थी। उनके पिता ने उन्हें फ़ुटबॉल खेलना सिखाया, लेकिन अक्सर उन्हें अख़बारों से भरे मोज़े के साथ अभ्यास करना पड़ता था। क्योंकि उसके पास फुटबॉल खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। फुटबॉल खेलने के साथ-साथ उन्होंने स्थानीय चाय की दुकानों में वेटर का काम किया।

अपनी युवावस्था में, पेले इनडोर लीग में खेले, और इससे उन्हें एक बेहतर एथलीट बनने में मदद मिली। पेले ने अपने जीवन का पहला बड़ा मैच सैन्‍टोस क्‍लब टीम के एक सदस्‍य के रूप में खेला। मैच में उन्‍होंने अपना पहला गोल किया। इसने उन्‍हें विश्‍वस्‍तरीय फुटबाल खिलाड़ी बनने के लिए प्रेरित किया। तब से पेले ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और फुटबाल के सर्वश्रेष्‍ठ खिलाड़ी बन गए। सोलह साल की उम्र में ब्राजील की राष्‍ट्रीय फुटबाल टीम में शामिल किए गए। उन्‍होंने खेल में अपना दिल और आत्‍मा लगा दी। शीघ्र ही पेले फुटबाल में सफलता की महान ऊंचाइयों पर पहुंच गए।

1969 में अपने जीवन का एक हजारवां गोल किया। पेले ने देश-भक्‍ति की भावनाओं का परिचय दिया और वह इटली और अल्‍जीरिया से मोटी धनराशि के प्रलोभन से दूर रहे, क्‍योंकि उनका देश ब्राजील उनके ह्रदय के बहुत करीब था। 1970 के वर्ल्‍ड कप फुटबाल में पेले,जो ब्‍लैक डायमंड कहलाते थे, स्‍वर्ण पदक से सम्‍मानित किए गए।

पेले को फुटबाल के लिए किए गए शानदार प्रदर्शनों के लिए कई राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मान मिले। फुटबाल और खेलों की दुनिया को रियो डी जेनरेरियो के मराकाना स्‍टेडियम में पेले ने अलविदा कह दिया, फिर भी फुटबाल के लिए एक सलाहकार के रूप में सक्रिय रहे। अपने देश के उभरते हुए फुटबाल खिलाडि़यों के प्रशिक्षण देने के लिए उन्‍होंने एक फुटबाल अकेदमी स्‍थापित की।

पेले के कैरियर की कुछ मुख्य विशेषताएं
  • रायटर समाचार एजेंसी: 1999 द्वारा द एथलीट ऑफ़ द सेंचुरी
  • अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा चुने गए एथलीट ऑफ द सेंचुरी: 1999
  • यूनिसेफ फुटबॉल प्लेयर ऑफ़ द सेंचुरी: 1999
  • 20 वीं सदी के 100 सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक: 1999
  • फीफा प्लेयर ऑफ द सेंचुरी: 2000
जोहान सेबेस्टियन बाख का जीवन परिचय Johann Christian Bach Biography in Hindi

जोहान सेबेस्टियन बाख का जीवन परिचय Johann Christian Bach Biography in Hindi

जोहान सेबेस्टियन बाख का जीवन परिचय

नाम : जोहान सेबेस्टियन बाख
जन्‍म : 1685
देश : जर्मनी 
पेशा : संगीतकार
मृत्‍यु : 1750

जोहान सेबेस्टियन बाख का जन्‍म 21 मार्च, 1685 को जर्मनी के इसेनाच में हुआ था। वह चर्च में ऑर्गन बजाने वाले बाख दम्‍पत्ति सबसे छोटी संतान थे, जिनकी 1964 में मृत्‍यु हो गई। दस साल की उम्र में बाख जर्मनी के ओहरड्रफ चले गये, अपने भाई के पास, जो चर्च में ऑर्गन वादक थे। उन्‍होंने भाई से निर्देश प्राप्‍त किये।

1700 में बाख को लुनेबर्ग के सेंट माइकल स्‍कूल से छात्रवृत्ति मिली। उन्‍हें वाइलिन बजाने का काम सौंपा गया। उन्‍होंने कौरल प्रिल्‍गूड्स को संगीतबद्ध भी किया। 1702 में बाख ने स्‍नातक किया। 1703 में बाख को जर्मनी के एक चर्च में ऑर्गन वादक की नौकरी मिल गई। 1705 में छूट्टी प्राप्‍त की, जर्मनी के ल्‍यूबेक के एक चर्च जाने और वहां के  ऑर्गन वादकों को सूनने के लिये। बाख इतने प्रभावित हुए कि वह वहां चार महीने तक रहे। लौटने के बाद लंबी-लंबी ऑर्गन प्रिल्‍यूड्स की रचना शुरू कर दी।

1707 में बाख को जर्मनी के मुहल्‍हाउसेन के एक चर्च ने ऑर्गन वादक नियुक्‍त किया। साल के अंत में बाख ने मारिया बारबारा से शादी कर ली। सुव्‍यवस्‍थित चर्च संगीत देना चाहते थे। तब गॉड इस माई किंग की रचना की। काउंसिल इतनी प्रभावित हुई कि इसको सिटी रिकॉर्ड में रखा गया।

बाख 1708 में जर्मनी के वेयमर पहुंचे, ड्यूक विल्‍हेम अर्नेस्‍ट के दरबार के ऑर्गन वादक के रूप में। 1714 में स्‍वीडन के प्रिंस फ्रेडरिक इतने चकित हो गये कि अंगूठी उतारकर उन्‍हें दे दी। जर्मनी के कोथेम के प्रिंस लियोपोल्‍ड ने भी बाख को एक पद का प्रस्‍ताव किया। उनका काम था कि दरबार के ऑर्केस्‍ट्रा को संचालित करें, जिसमें प्रिंस स्‍वयं भाग लेते थे। 1720 में बाख की पत्‍नी की मृत्‍यु हो गई। 1721 में गायिका एन्‍ना से विवाह किया। बाख ने महानतम इंस्‍ट्रूमेंटल वर्क्‍स तैयार किए। प्रमुख ऑर्केस्‍ट्रा वर्क्‍स भी लिखे। प्रिंस लियोपोल्‍ड ने शादी के बाद उनसे लुथेरियन ने शादी के बाद उनसे लुथेरियन में कोई पद लेने के लिये कहा। 1723 में उन्‍हें जर्मनी के लेइपजिग का कनटॉर (कॉडर लीडर) नियुक्‍त किया गया। धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी चली गई।

28 जुलाई को बाख की मृत्‍यु हो गई।

जरथुस्त्र का जीवन परिचय। Zorashtra Information in Hindi

जरथुस्त्र का जीवन परिचय। Zorashtra Information in Hindi

जरथुस्त्र का जीवन परिचय। Zorashtra Information in Hindi

नाम : जरथुस्त्र
जन्म स्थान : ईरान
उपलब्धि : पारसी धर्म के संस्‍थापक
उम्र : 77 वर्ष
जन्‍म और मृत्‍यु : 600 ईसा पूर्व के आसपास

जरथुस्त्र पारसी धर्म के संस्‍थापक थे। प्राचीन ग्रीस के निवासियों तथा पाश्चात्य लेखकों ने इनको जारोस्टर नाम से संबोधित किया है। वह एक संत थे, जो 600 ईसा पूर्व ईरान में रहते थे और लोगों को करुणा, प्रेम और सहिष्‍णुता का संदेश देते थे। पारसी समुदाय द्वारा महात्मा जरथुस्त्र का जन्म दिवस 24 अगस्त को मनाया जाता है। उनके जन्‍म की वास्‍तविक तिथि तो ज्ञात नहीं है, लेकिन इतिहासकारों का विश्‍वास है कि उनका जन्‍म ईरान में 1400 से 600 ईसा पूर्व स्पित्मा (spitama) राजपरिवार में हुआ था और उन्‍हें सभी सांसरिक सुख प्राप्‍त थे। उनमें कई असाधारण योग्‍यताएं थीं। उन्‍होंने कभी सुखों का आनंद नहीं लिया और 15 साल की छोटी-सी उम्र में ही उनका त्‍याग कर दिया। गौतम बुद्ध की तरह वह भी कई वर्षों के लिये गहरे ध्‍यान में चले गये। अंतत: ज्ञानोदय प्राप्‍त हुआ और उन्‍हें दिव्‍य दर्शन हुए।

उन्‍होंने देखा कि लोग अंधविश्‍वासों और धार्मिक अज्ञानता से घिरे हुए हैं। लोग कई भगवानों को मानते हैं। जरथुष्‍ट ने अनेक ईश्‍वरों की आराधना का विरोध किया। वह जीवन में दो मुख्‍य मनोभावों की बात करते थे, अच्‍छे का आत्‍म-भाव, यानी प्रकाश और बुरे का आत्‍म-भाव, यानी अंधेरा।

ज्ञानोदय प्राप्‍त करने के बाद उन्‍होंने बड़ी संख्‍या में अपने अनुयायियों को उपदेश देय। लोगों ने उनके सदाचार के मार्ग को पसंद किया, क्‍योंकि यह सभी को स्‍वीकार्य था। इस तरह पारसी धर्म अस्तित्‍व में आया। इनका धार्मिक ग्रंथ जेंदाअवेस्‍ता है। इसके धर्मावलंबियों को पारसी या जोराबियन कहा जाता है। यह धर्म एकेश्वरवादी धर्म है। ये ईश्वर को 'आहुरा माज्दा' कहते हैं। आहुरा माज्दा को जीवन, प्रकाश और नैतिकता का स्रोत माना गया है और अहिरमन को अन्धकार तथा मृत्यु का।

ऐसा माना जाता है कि एक ईष्‍यालू शाह द्वारा उनकी हत्‍या कर दी गई, तब वह 77 वर्ष के थे।  

Sunday, 21 April 2019

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

देश के युवाओं को प्रेरित करने के लिए हर साल 12 जनवरी को पूरे उत्साह के साथ भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को क्यों मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है, इसे कैसे मनाया जाता है, इसके उत्सव के पीछे का इतिहास क्या है, स्वामी विवेकानंद आदि कौन थे, आइए इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को क्यों मनाया जाता है?

राष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। वह एक समाज सुधारक, दार्शनिक और विचारक थे। उत्सव के पीछे मुख्य उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के दर्शन और आदर्शों का प्रचार करना है, जिसका उन्होंने आजीवन पालन किया। कोई शक नहीं कि वह भारत के सभी युवाओं के लिए एक महान प्रेरणा थे। इस दिन देश भर में, स्कूल, कॉलेज आदि में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस: इतिहास

1984 में, भारत सरकार ने पहली बार स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन यानि 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इस दिन को 1985 से पूरे देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के जीवन और विचारों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करके देश का बेहतर भविष्य बनाना है। यह युवाओं की अनन्त ऊर्जा को जगाने के साथ-साथ देश को विकसित बनाने का एक शानदार तरीका है।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार :
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये। ”- स्वामी विवेकानंद
“जब तक जीना, तब तक सीखना” – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।" - स्वामी विवेकानंद
"जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।"-स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का परिचय : आपका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। आपके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। “स्वामी विवेकानंद” नाम आपको आपके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने दिया था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। वह अच्छे परिवार से ताल्लुक रखते थे। सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये। उनके एक अंग्रेजी प्रोफेसर ने उन्हें 'श्री रामकृष्ण परमहंस' के नाम से परिचित कराया और 1881 में, उन्होंने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में श्री रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की और संत रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बन गए। उन्होंने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन से पश्चिमी दुनिया को परिचित कराया। उन्होंने भारत में व्यापक रूप से फैली गरीबी की ओर भी ध्यान आकर्षित किया और देश के विकास के लिए गरीबी के मुद्दे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन ४ जुलाई १९०२ को उन्होंने ध्यानावस्था में ही महासमाधि ले ली। 

उन्हें 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपने भाषण के लिए जाना जाता है जब उन्होंने "अमेरिका की बहनों और भाइयों ....." कहते हुए अपना भाषण शुरू किया और उन्होंने भारत की संस्कृति, इसके महत्व, हिंदू धर्म आदि का परिचय दिया।

इसलिए, स्वामी विवेकानंद ज्ञान, विश्वास, एक सच्चे दार्शनिक हैं, जिनकी शिक्षाओं ने न केवल युवाओं को प्रेरित किया, बल्कि देश के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए, इसीलिए भारत में हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी

अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी


अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी

अनच्‍छेद - 370 : भारतीय संघ में जम्‍मू-कश्‍मीर का विलय इस आधार पर किया गया है कि संविधान के अनुच्‍छेद 370 के तहत इस प्रदेश की स्‍वायत्तता की रक्षा की जाएगी, यह एकमात्र प्रदेश है जिसका अपना संविधान है, तथा जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य का प्रशासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलता रहेगा। भारतीय संविधान द्वारा संघ और राज्‍यों के बीच जो शक्‍ति विभाजन किया गया इसके अंतर्गत अवशेष शक्‍तियां संघीय सरकार को सौंपी गई हैं, परंतु जम्‍मू–कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में अवशिष्‍ट शक्‍तियां जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य को प्राप्‍त हैं।
जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में संघ केवल निम्‍नलिखित तीन सेवाओं पर अपना नियंत्रण कर सकती है:
  1. रक्षा
  2. संचार
  3. विदेशी मामले

जम्‍मू-कश्‍मीर को विशेष राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त होने के कारण जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्‍त है। अन्‍य राज्‍यों का कोई व्‍यक्‍ति जम्‍मू-कश्‍मीर में कोई सम्‍पत्ति नहीं खरीद सकता।

अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर समस्‍या के कारण

कश्‍मीर के भारत में विलय के बाद समय-समय पर भारत-पाकिस्‍तान के बीच युद्ध होते रहे और संबंधों में दिन-प्रतिदिन कटुता आती गई। कश्‍मीर समस्‍या से जुड़े कुछ प्रमुख कारण निम्‍नलिखित हैं:

कश्‍मीर के भारत में विलय में विलम्‍ब : महाराजा हरि सिंह ने कश्‍मीर को भारत में विलय करने का निर्णय करने के बाद भी अधिकारिक रूप से विलय करने में अत्‍यंत विलम्‍ब किया। महाराजा हरि सिंह ने 15 अगस्‍त, 1947 की घटना देखने के बाद भी भारत में विलय नहीं किया। बल्‍कि विलय को लटकाकर काफी समय तक विचार करते रहे और अक्‍टूबर 1947 में पाक सेना ने कश्‍मीर घाटी में रक्‍तपात मचाना शूरू किया, तो वे इस मामले को लेकर गंभीर हुए और अंतत: 26 अक्‍टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्‍ताक्षर किए और भारत में कश्‍मीर का विलय हो सका।

पं. जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक हस्‍तक्षेप : यह स्‍थापित सत्‍य है कि पं. नेहरू की राजनीतिक कूटनीति के कारण ही आज कश्‍मीर समस्‍या नासूर बन गई है। हरि सिंह ने कश्‍मीर विलय को लटकाकर जहाँ समस्‍या की नींव रखी वही दूसरी तरफ पं. नेहरू ने सही समय पर सही फैसला न लेकर समस्‍या को और गंभीर बना दिया। इसी के परिणामस्‍वरूप पाकिस्‍तान के अवैध कब्‍जे वाली भूमि पर उसी का नियंत्रण रह गया। आज उसी पाक अधिकृत कश्‍मीर से प्रशिक्षण प्राप्‍त जिहादी तत्‍वों में जम्‍मू-कश्‍मीर में अलगाववाद और हिंसा फैलाने के साथ-साथ पूरे भारत में अलगाववाद पैदा कर रहे हैं।

कश्‍मीर का भारत में विलय और विशेष राज्‍य का दर्जा : अन्‍य सभी देशी रियासतों और रजवाड़ो का भारत में विलय बिना किसी शर्त हुआ था, जबकि जम्‍मू-कश्‍मीर के विषय में ऐसा नहीं हो सका। भारत में जम्‍मू-कश्‍मीर का विलय सशर्त हुआ तथा जम्‍मू-कश्‍मीर को धारा 370 के तहत विशेष राज्‍य दर्ज प्रदान किया गया। साथही यहां पर राज्‍य का अपना संविधान भी है।
पं. नेहरू ने विलय से पूर्व अपने घनिष्‍ठ मित्र शेख अब्‍दुल्‍ला को सियासत का साझीदार बनाया, वही शेख अब्‍दूल्‍ला के दो प्रधान, दो विधान और दो निशान को धारा 370 का प्रारूप पहनाया। वस्‍तुत: सेकुलर व्‍यवस्‍था में धारा 370 के अंतर्गत जम्‍मू-कश्‍मीर में अलगाववाद को संवैधानिक मान्‍यता दे रखी है। कश्‍मीर को विशेष प्रांत का दर्जा देने का बाबा भीमराव अंबेडकर ने घोर विरोध किया था। भारत के कानून मंत्री होने के नाते उन्‍हें यह कतई मंजूर नहीं था कि भारत पर कश्‍मीर के सारे हक तो हो, किंतु कश्‍मीर पर भारत का कोई अधिकार न हो। पं. जवाहरलाल नेहरू ने डा. अंबेडकर की अनदेखी कर शेख अब्‍दुलला का साथ दिया।

महजब के आधार पर देश का विभाजन : भारत-पाकिस्‍तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। कश्‍मीर की 80% जनता मुस्लिम थी और तत्‍का‍लीन राजा हिंदु था। धर्म के आधार पर व जनमत के आधार पर पाकिस्‍तान को पूर्णता: विश्‍वास था। कश्‍मीर का विलय पाकिस्‍तान को पूर्णत: विश्‍वास था। कश्‍मीर का विलय पाकिस्‍तान में ही होगा, किंतु जब राजा हरि सिंह ने कश्‍मीर का विलय भारत में किया, तो पाक की सियासी जमातों के इरादों पर पानी फिर गया। इसी कारण पाकिस्‍तान ने कई बार भारत पर विफल आक्रमण किया। जिसके कारण पाकिस्‍तान वर्तमान समय में एक विफल राष्‍ट्र के कगार तक जा पहुंचने के बावजूद, उसने सिर्फ यही सिद्ध किया है कि वह अपने राष्‍ट्र को बर्बाद की तरफ ले जा रहा है।

जम्मू कश्मीर समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 
ब्रिटिशकाल में जम्‍मू व कश्‍मीर एक देशी रियासत थी, आजादी के समय यहाँ एक हिंदु शासक थे, जिनका नाम हरि सिंह था। आजादी के पूर्व ही वहाँ देशी राजा के विरुद्ध शेख अब्‍दुल्‍ला के नेतृत्‍व में लोकतंत्र की स्‍थापना हेतु आंदोलन चलाया गया था। मौजूदा भारत में कश्‍मीर को शामिल करने में महाराजा हरि सिंह का अभूतपूर्व योगदान रहा है। कश्‍मीर एक विस्‍तृत रियासत थी, जिसकी अधिकांश जनता मुस्लिम थी और राजा हिंदू था, कश्‍मीर रियासत के अलग-अलग हिस्‍सों गिलगिद, लद्दाख, जम्‍मू आदि के लोगों की महत्‍वाकांक्षाओं को ध्‍यान में रखते हुए महाराजा हरि सिंह को निर्णय लेना था। इसी कारण महाराज हरि सिंह 15 अगस्‍त 1947 को कोई निर्णय नहीं ले पाए, लिहाजा उन्‍होंने दोनों मुल्‍कों को समझौते का प्रस्‍ताव भेजा, पाकिस्‍तान भेजा, पाकिस्‍तान की सरकार ने इस प्रस्‍ताव को तत्‍काल मान लिया, दूसरी तरफ भारत ने इस प्रस्‍ताव को आपसी विचार-विमर्श द्वारा सुलझाने की बात कही। वहीं महाराजा हरि सिंह अंत तक भारत में ही विलय के पक्षधर बने रहे। 

इसके बाद पाकिस्‍तान को कश्‍मीर हाथ से खिसकता नजर आने लगा। इसी कारण से अक्‍टूबर 1947 में पाक सेना द्वारा समर्थित कबालियों ने कश्‍मीर घाटी पर कब्‍जा करने के लिए वहाँ आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण का सामना करने के लिए महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी, लेकिन भारत ने इस आधार पर मदद मदद देना स्‍वीकार किया कि पहले जम्‍मूव कश्‍मीर भारतीय संघ में शामिल हो गया, तत्‍पश्‍चात भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान के कबालियों को कश्‍मीर घाटी से खदेड़ दिया। फलत: महाराजा हरि सिंह ने कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय अतिशीघ्र करने का निर्णय लिय। 26 अक्‍टूबर 1947 का कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय करने के लिए महाराजाने विलय पत्र पर हस्‍ताक्षर कर दिए और 27 अक्‍टूबर 1947 को लार्ड माउन्‍टबेटन ने इसे मंजूरी दे दी। इसके साथ ही वैधानिक रूप में भारत की सीमाओं का विस्‍तार गिलगिट-बाटलिस्‍तान तक हो गया, किंतु वर्तमान में राज्‍य का बड़ा हिस्‍सा पाकिस्‍तान के कब्‍जे में है और दूसरा चीन के गैर-कानूनी नियंत्रण में है।

1947 में कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय करने के उपरांत यह भारत का हिस्‍सा था। महाराजा हरि सिंह ने अपनी पूरी रियासत का विलय भारत में ही किया था। अत: गिलगिट-बाल्स्तिान सहित समूचा कश्‍मीर वैधानिक रूप से भारत का ही अंग है, लेकिन पाकिस्‍तान अवैध नियंत्रण वाली हमारी भूमि को अपनी भूमि को अपनी भूमि घोषित करने की नापाक कोशिश कर रहा है। इस गैर-कानूनी प्रयास के खिलाफ भारत सरकार द्वारा अब तक कोई बुलंद आवाज न उठाना इस बात का संकेत देता है कि हमारी सरकार अपनी सीमाओं व भूमि को लेकर सचेत और संवेदनशील नहीं है। इसी असचेतता व संवेदनहीनता का परिणाम है कि इन क्षेत्रों में चरमपंथी गुटों का वर्चस्‍व बढ़ता जा रहा है।
जम्‍मू-कश्‍मीर ( अनु. 370 ) विशेष राज्‍य
  1. 26 अक्‍टूबर 1947 को कबिलाई के सहयोग से पाकिस्‍तान द्वारा जम्‍मू-कश्‍मीर पर आक्रमण किया गया।
  2. जम्‍मू-कश्‍मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय के साथ रक्षा की माँग की।
  3. विलय पत्र में विदेश, रक्षा तथा संचार भारत को दिया गया, शेष सभी अधिकार राज्‍य के अधीन रखे गए।
  4. जम्‍मू-कश्‍मीर के लिए विशेष व्‍यवस्‍था के साथ अनु. 370 जोड़ा गया जो कि विशेष राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त करता है।
  5. जम्‍मू-कश्‍मीर को भारतीय संविधान संविधान के अनु. 2 में सम्मिलित किया गया है।
  6. अजु. 370 की व्‍यवस्‍था में अस्‍थाई संब्रमणकालीन विशेष उपबन्‍ध किया गया।
  7. 1951 में जम्‍मू–कश्‍मीर संविधान सभा गठन किया गया।
  8. 1951 में शेख अब्‍दुल्‍ला व पं. नेहरू के बीच समझौता हुआ। जिसको दिल्‍ली समझौता के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें जम्‍मू-कश्‍मीर की स्‍वायत्ताता पर हस्‍ताक्षर किया गया। जिसका अर्थ विदेश, रक्षा व संचार को छोड़कर शेष सभी अधिकार जम्‍मू-कश्‍मीर के पास रहेगे।
  9. 1953 में शेख अब्‍दुल्‍ला को देश चिरोधी गतिविधियों के कारण जेल जाना पड़ा।
  10. 1953 में शेख अब्‍दुल्‍ला की जगह बक्‍शी गुलाम मोहम्‍मद सत्तासीन हुए।
  11. जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान सभा ने फरवरी 1954 में औपचारिक रूप से भारत में जम्‍मू-कश्‍मीर को विलय कर दिया।
  12. 1954 में जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान सभा द्वारा भारत में विलय की मंजूरी जिससे केंद्रीय कानून लागू हो गया।
  13. जम्‍मू-कश्‍मीर का अपना संविधान 26 जनवरी 1957 को लागू किया गया।
  14. 1965 में सदर-ए-रियासत का नाम बदलकर राज्‍यपाल रख दिया गया जो अब राष्‍ट्रपति द्वारा नियुक्‍ति होगा (हम व्‍यवस्‍था जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान के 6वाँ संविधान संशोधन द्वारा किया गया है।)
  15. राज्‍य की संवैधानिक तंत्र की विफलता में पहले 6 माह राज्‍यपाल शासन (धारा 92), इसके बाद राष्‍ट्रपति शासन (अनु. 356) लागू होता है।
  16. राज्‍य की विधान सभा में दो महिला विधायकों की व्‍यवस्‍था जो राज्‍यपाल द्वारा मनोनीत होगी।
  17. राज्‍य की राजभाषा उर्दू है।
  18. राज्‍य की विधान सभा का कार्यकाल 6 वर्ष होने के कारण मुख्‍यमंत्री का कार्यकाल 6 वर्ष का हो जाता है।
  19. अनु. 355 के तहत राज्‍य में सशस्‍त्र बल की तैनाती की जा सकती है।
  20. नियंत्रण रेखा पहले युद्ध विराम रेखा थी, जो 1 जनवरी 1949 को प्रभावी हुई और शिमला समझौता (1972) के बाद वह नियंत्रण रेखा में बदल गई।

Saturday, 20 April 2019

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

जवाहरलाल नेहरु पुरस्कार एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार है जो भारत सरकार की तरफ से पंडित जवाहरलाल नेहरु की याद में प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है। नोबेल पुरस्कार की भाँति नेहरू पुरस्कार भी, विश्व में एक वर्ष में एक ही ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है, जो संसार के लोगों में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना व मैत्री को बढ़ावा देने के लिये असाधारण योग देता है। एक लाख रुपये का नेहरू पुरस्कार 1965 में भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया था, जिसका प्रथम पुरस्कार श्री नेहरू के जन्म दिवस पर 14 नवम्बर, 1966 को दिया जाना था।

26 सितम्बर, 1966 से 30 सितम्बर, 66 तक चार दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय नेहरू गोष्ठी का आयोजन था। विश्व के विद्वान् गोष्ठी में भाग लेने दिल्ली में एकत्रित हो रहे थे। भारत सरकार द्वारा नियुक्त नेहरू पुरस्कार निर्णायक समिति ने इसी शुभ अवसर पर अपने निर्णय की घोषणा करना उचित समझा। इस सात सदस्यीय निर्णायक समिति में भारत के उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सदस्य होते हैं। अन्य पाँच सदस्यों में एक किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठ भारतीय नेता, एक किसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति और एक समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि विभिन्न देशों की सरकार, अन्तर्राष्ट्रीय संगठन और विश्व के विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा पुरस्कार योग्य नामों की सिफारिश की जाती है। इस प्रथम निर्णायक समिति के सदस्य थे, स्व० डॉ० जाकिर हुसैन अध्यक्ष, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री के० सुब्बाराव, जस्टिस खलील अहमद, उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित, टाटा उद्योग के डाइरेक्टर श्री एन. ए. पालकीवाला, उस्मानिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ० डी० एस० रेड्री तथा नेशनल हेरल्ड के सम्पादक श्री चेलापति राव निर्णायक समिति की ओर से उपराष्ट्रपति ने 17 सितम्बर, 1966 को घोषणा की कि अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिये जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव ऊथान्ट को दिया जायेगा। विश्व की कई सरकारों, अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों और विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा पुरस्कार पाने के लिये नामों की सिफारिश की गई थी। बहुत सोच-विचार के बाद थान्ट का नाम तय किया गया।

निर्णायक समिति का यह निर्णय वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था। राष्ट्र संघ के महासचिव के रूप में श्री ऊधान्ट की सेवायें इतिहास के पृष्ठ पर सदैव अंकित रहेंगी। युद्ध की विभीषिकाओं से त्रस्त विश्व को उन्होंने अनेक बार बचाया। अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव और शान्ति बनाये रखने में है। निरन्तर प्रयत्नशील थे। उस समय उनका और भी अधिक महत्त्व बढ़ गया था क्योंकि इस समय सारे संसार की आँखें वियतनाम व पश्चिम एशिया में शांति स्थापना की ओर लगी हुई थी।

28 सितम्बर, 1966 को नेहरू गोष्ठी की अध्यक्षता श्रीमती मिरदल ने की थी तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा प्राप्त “शान्ति पुरस्कार” स्वीकृति सम्बन्धी तार पढ़कर सुनाया। इस अवसर पर श्री ऊ-थान्ट ने कहा था-“अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए भारत ने मुझे जो नेहरू पुरस्कार दिया है, यह मेरे लिए बड़ी गौरव की बात है। उन्होंने कहा-“पुरस्कार की एक लाख रुपए की धनराशि में संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल (न्यूयार्क) को दे दूंगा। यह स्कूल आर्थिक संकट से गुजर रहा है।” 27 सितम्बर को श्री थान्ट ने एक वक्तव्य में कहा था कि जवाहरलाल नेहरू इस शताब्दी के एक महान् राजनेता थे। मुझे उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला। उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा थी। अत: यह पुरस्कार मिलना मैं अपने लिए गौरव की बात समझता है। खासकर बच्चों और युवकों में स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू को विशेष दिलचस्पी थी। अतः मैं पुरस्कार की राशि संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल को दान करना उचित समझता हूं।“

14 नवम्बर, 1966 के स्थान पर यू थांट 10 अप्रैल, 1967 को भारत सरकार के निमन्त्रण पर दिन की यात्रा पर भारत पधारे। 12 अप्रैल, 1967 को एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया तथा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने “अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव का जवाहरलाल नेहरू पुरूस्कार” श्री यू थांट को समर्पित किया। यू थांट ने स्वर्गीय नेहरू की भावनाओं तथा उनके आदर्शो के लिये कार्य करते रहने का प्रण लेते हुए कृतज्ञतापूर्वक यह पुरस्कार स्वीकार किया।

इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कहा कि यह पुरस्कार भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ तथा बर्मा और भारत को एक सूत्र में बाँधता है। यू थांट ने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया और आज भी वे एक शिक्षक की तरह अपना सब कुछ विश्व शान्ति और सद्भाव उत्पन्न करने में समर्पित कर रहे हैं। वे एक बौद्ध हैं। एक बौद्ध की ही तरह उनमें अगाध विश्व प्रेम और सद्भाव भरा है। वे शान्ति और समझौते के ध्येय पर चलते हैं। मतभेदों को दूर करने के लिए शक्ति का प्रयोग अनैतिक ही नहीं, गलत नीति भी है। मनुष्य के भाई-चारे की माँग है कि मानव सहयोग बढ़े। हमारी सुरक्षा मानवीय मूल्यों तथा आध्यात्मवाद के परिपालन में है। शान्ति की सुरक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अनुशासन आवश्यक है। प्रधानमन्त्री तथा राष्ट्रपति ने महासचिव के रूप में यू थांट के कार्य की सराहना की और कहा कि वे विश्वशान्ति और सहयोग के पोषक हैं। उन्हें यह प्रथम पुरस्कार देने का फैसला बहुत ही उचित और प्रशंसनीय है। उन्होंने बर्मा की स्वतन्त्रता की लड़ाई में भी कार्य किया है। श्री नेहरू राष्ट्र को युद्ध से बचाना चाहते थे। स्वतन्त्रता के लिए शान्ति आवश्यक है। अशोक संसार में सबसे बड़े सम्राट माने जाते हैं। वे भी विश्व-शान्ति पक्ष के पोषक और प्रणेता थे। श्री नेहरू का संयुक्त राष्ट्र संघ में अटूट विश्वास था। हम भी राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण सहयोग तथा विवाद को बातचीत से हल करने के पक्ष में हैं। डॉ० राधाकृष्णन ने यू थांट  के वियतनाम में शान्ति स्थापित करने के प्रयास की सराहना की और आशा व्यक्त की कि जिनेवा सम्मेलन दुबारा बुलाया जायेगा। विश्वमत का लोग ध्यान रखेंगे। थान्ट शान्ति चाहते हैं, बिना किसी पक्ष की विजय अथवा पराजय के।

श्री यू थांट ने अपने भाषण में कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए पहला नेहरू पुरस्कार पाना किसी भी व्यक्ति के लिए गौरव की बात है, किन्तु महासचिव के लिए यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस तरह के पुरस्कार से प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिलता है। श्री नेहरू के प्रति भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यू थांट ने कहा “उन्होंने अपनी भावना की गहराई तथा बुद्धि के बल पर महत्ता प्राप्त की। जीवन के हर अंग के लिए वे नैतिक दृष्टिकोण रखते थे। उनमें अपार धैर्य, उत्साह और लगन थी। इसके बावजूद वे हम सब की तरह ही एक मानव थे। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में श्री नेहरू ने महान् नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में भारत ने संसार में एक उच्च स्थान पाया। विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले राष्ट्रों के बीच में आज सहयोग है, किन्तु सहयोग की बातों की चर्चा कम होती है और विवादों का प्रचार अधिक होता है। कांगों में सेना भेजने के उनके फैसले से संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य में बड़ी मदद मिली और एक नया अध्याय शुरू हुआ। जहाँ तक अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की बात है, एक-दूसरे को जानना ही पर्याप्त नहीं, सहानुभूति तथा आपस में सहयोग भी होना चाहिये और हमारा मस्तिष्क विस्तृत एवं हृदय विशाल होना चाहिये।

जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की सूची
संख्‍या
नाम
वर्ष
1
यू थांट
1965
2
मार्टिन लूथर किंग जूनियर (मरणोपरांत)
1966
3
खान अब्दुल गफ्फार खान
1967
4
यहुदी मेनुहिन
1968
5
मदर टेरेसा
1969
6
केनेथ डी कौंडा
1970
7
जोसिप बरोज़ टिटो
1971
8
आंद्रे मैल्रौक्स
1972
9
जूलियस के. न्येरेरे
1973
10
राउल प्रेबिस्च
1974
11
जोनास सॉल्क
1975
12
ग्यूसेप तुक्की
1976
13
तुलसी मेहर श्रेष्ठ
1977
14
निचिदात्सू फुजी
1978
15
नेल्सन मंडेला
1979
16
बारबरा वार्ड
1980
17
अल्वा और गुन्नार म्यर्दल (संयुक्त रूप से)
1981
18
लेओपोल्ड सदर सेंघोर
1982
19
ब्रूनो क्रेइस्क्य
1983
20
इंदिरा गांधी (मरणोपरांत)
1984
21
ओलोफ पाल्मे (मरणोपरांत)
1985
22
ज़ेवियर पेरिज डी कुईयार
1987
23
यासिर अराफात
1988
24
रॉबर्ट गेब्रियल मुगाबे
1989
25
हेल्मुट कोल
1990
26
अरुणा आसफ अली
1991
27
मौरिस एफ. स्ट्रॉंग
1992
28
आँन्ग सैन सू की
1993
29
महाथिर बिन मोहम्मद
1994
30
होस्नी मुबारक
1995
31
गोह चोक टोंग
2003
32
सुल्तान काबूस बिन सईद अल सईद
2004
33
वांगरी मुटा माथाई
2005
34
लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा
2006
35
ओलाफुर रेगनर ग्रिम्सोन
2007
36
एंजेला डोरोथिया मार्केल
2009


विश्व शान्ति के लिए उल्लेखनीय तथा सर्वोत्कृष्ट प्रयास करने वाले व्यक्ति को हर वर्ष नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। नेहरू पुरस्कार नोबेल शान्ति पुरस्कार के समकक्ष समझा जाता है।

श्री नेहरू ने अपने जीवनकाल में अपने देश और समस्त विश्व के लिए जो कुछ किया, वह श्री नेहरू की कीर्तिपताका को ज्यों-का-त्यों बनाये रखने में अपने में स्वयं पर्याप्त था, परन्तु फिर भी यह उपाय उस महा-मानव के यशोध्वज को सुरक्षित रखेंगे तथा साथ ही साथ श्री नेहरू के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा को प्रोत्साहन देते रहेंगे ऐसा हमारा विश्वास है।