Sunday, 21 April 2019

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्त्व व इतिहास पर लेख। National Youth Day in Hindi

देश के युवाओं को प्रेरित करने के लिए हर साल 12 जनवरी को पूरे उत्साह के साथ भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को क्यों मनाया जाता है, इसका महत्व क्या है, इसे कैसे मनाया जाता है, इसके उत्सव के पीछे का इतिहास क्या है, स्वामी विवेकानंद आदि कौन थे, आइए इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस 12 जनवरी को क्यों मनाया जाता है?

राष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। वह एक समाज सुधारक, दार्शनिक और विचारक थे। उत्सव के पीछे मुख्य उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के दर्शन और आदर्शों का प्रचार करना है, जिसका उन्होंने आजीवन पालन किया। कोई शक नहीं कि वह भारत के सभी युवाओं के लिए एक महान प्रेरणा थे। इस दिन देश भर में, स्कूल, कॉलेज आदि में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

राष्ट्रीय युवा दिवस: इतिहास

1984 में, भारत सरकार ने पहली बार स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन यानि 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इस दिन को 1985 से पूरे देश में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य स्वामी विवेकानंद के जीवन और विचारों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करके देश का बेहतर भविष्य बनाना है। यह युवाओं की अनन्त ऊर्जा को जगाने के साथ-साथ देश को विकसित बनाने का एक शानदार तरीका है।

स्वामी विवेकानंद के अनमोल विचार :
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये। ”- स्वामी विवेकानंद
“जब तक जीना, तब तक सीखना” – अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।" - स्वामी विवेकानंद
"जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।"-स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद का परिचय : आपका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। आपके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। “स्वामी विवेकानंद” नाम आपको आपके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने दिया था। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। वह अच्छे परिवार से ताल्लुक रखते थे। सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेंद्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया जहाँ वे स्कूल गए। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद, वह एकमात्र छात्र थे जिन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये। उनके एक अंग्रेजी प्रोफेसर ने उन्हें 'श्री रामकृष्ण परमहंस' के नाम से परिचित कराया और 1881 में, उन्होंने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में श्री रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात की और संत रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बन गए। उन्होंने वेदांत और योग के भारतीय दर्शन से पश्चिमी दुनिया को परिचित कराया। उन्होंने भारत में व्यापक रूप से फैली गरीबी की ओर भी ध्यान आकर्षित किया और देश के विकास के लिए गरीबी के मुद्दे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन ४ जुलाई १९०२ को उन्होंने ध्यानावस्था में ही महासमाधि ले ली। 

उन्हें 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपने भाषण के लिए जाना जाता है जब उन्होंने "अमेरिका की बहनों और भाइयों ....." कहते हुए अपना भाषण शुरू किया और उन्होंने भारत की संस्कृति, इसके महत्व, हिंदू धर्म आदि का परिचय दिया।

इसलिए, स्वामी विवेकानंद ज्ञान, विश्वास, एक सच्चे दार्शनिक हैं, जिनकी शिक्षाओं ने न केवल युवाओं को प्रेरित किया, बल्कि देश के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए, इसीलिए भारत में हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी

अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी


अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर की समस्या इन हिंदी

अनच्‍छेद - 370 : भारतीय संघ में जम्‍मू-कश्‍मीर का विलय इस आधार पर किया गया है कि संविधान के अनुच्‍छेद 370 के तहत इस प्रदेश की स्‍वायत्तता की रक्षा की जाएगी, यह एकमात्र प्रदेश है जिसका अपना संविधान है, तथा जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य का प्रशासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलता रहेगा। भारतीय संविधान द्वारा संघ और राज्‍यों के बीच जो शक्‍ति विभाजन किया गया इसके अंतर्गत अवशेष शक्‍तियां संघीय सरकार को सौंपी गई हैं, परंतु जम्‍मू–कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में अवशिष्‍ट शक्‍तियां जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य को प्राप्‍त हैं।
जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में संघ केवल निम्‍नलिखित तीन सेवाओं पर अपना नियंत्रण कर सकती है:
  1. रक्षा
  2. संचार
  3. विदेशी मामले

जम्‍मू-कश्‍मीर को विशेष राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त होने के कारण जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्‍त है। अन्‍य राज्‍यों का कोई व्‍यक्‍ति जम्‍मू-कश्‍मीर में कोई सम्‍पत्ति नहीं खरीद सकता।

अनुच्‍छेद 370 और जम्‍मू-कश्‍मीर समस्‍या के कारण

कश्‍मीर के भारत में विलय के बाद समय-समय पर भारत-पाकिस्‍तान के बीच युद्ध होते रहे और संबंधों में दिन-प्रतिदिन कटुता आती गई। कश्‍मीर समस्‍या से जुड़े कुछ प्रमुख कारण निम्‍नलिखित हैं:

कश्‍मीर के भारत में विलय में विलम्‍ब : महाराजा हरि सिंह ने कश्‍मीर को भारत में विलय करने का निर्णय करने के बाद भी अधिकारिक रूप से विलय करने में अत्‍यंत विलम्‍ब किया। महाराजा हरि सिंह ने 15 अगस्‍त, 1947 की घटना देखने के बाद भी भारत में विलय नहीं किया। बल्‍कि विलय को लटकाकर काफी समय तक विचार करते रहे और अक्‍टूबर 1947 में पाक सेना ने कश्‍मीर घाटी में रक्‍तपात मचाना शूरू किया, तो वे इस मामले को लेकर गंभीर हुए और अंतत: 26 अक्‍टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्‍ताक्षर किए और भारत में कश्‍मीर का विलय हो सका।

पं. जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक हस्‍तक्षेप : यह स्‍थापित सत्‍य है कि पं. नेहरू की राजनीतिक कूटनीति के कारण ही आज कश्‍मीर समस्‍या नासूर बन गई है। हरि सिंह ने कश्‍मीर विलय को लटकाकर जहाँ समस्‍या की नींव रखी वही दूसरी तरफ पं. नेहरू ने सही समय पर सही फैसला न लेकर समस्‍या को और गंभीर बना दिया। इसी के परिणामस्‍वरूप पाकिस्‍तान के अवैध कब्‍जे वाली भूमि पर उसी का नियंत्रण रह गया। आज उसी पाक अधिकृत कश्‍मीर से प्रशिक्षण प्राप्‍त जिहादी तत्‍वों में जम्‍मू-कश्‍मीर में अलगाववाद और हिंसा फैलाने के साथ-साथ पूरे भारत में अलगाववाद पैदा कर रहे हैं।

कश्‍मीर का भारत में विलय और विशेष राज्‍य का दर्जा : अन्‍य सभी देशी रियासतों और रजवाड़ो का भारत में विलय बिना किसी शर्त हुआ था, जबकि जम्‍मू-कश्‍मीर के विषय में ऐसा नहीं हो सका। भारत में जम्‍मू-कश्‍मीर का विलय सशर्त हुआ तथा जम्‍मू-कश्‍मीर को धारा 370 के तहत विशेष राज्‍य दर्ज प्रदान किया गया। साथही यहां पर राज्‍य का अपना संविधान भी है।
पं. नेहरू ने विलय से पूर्व अपने घनिष्‍ठ मित्र शेख अब्‍दुल्‍ला को सियासत का साझीदार बनाया, वही शेख अब्‍दूल्‍ला के दो प्रधान, दो विधान और दो निशान को धारा 370 का प्रारूप पहनाया। वस्‍तुत: सेकुलर व्‍यवस्‍था में धारा 370 के अंतर्गत जम्‍मू-कश्‍मीर में अलगाववाद को संवैधानिक मान्‍यता दे रखी है। कश्‍मीर को विशेष प्रांत का दर्जा देने का बाबा भीमराव अंबेडकर ने घोर विरोध किया था। भारत के कानून मंत्री होने के नाते उन्‍हें यह कतई मंजूर नहीं था कि भारत पर कश्‍मीर के सारे हक तो हो, किंतु कश्‍मीर पर भारत का कोई अधिकार न हो। पं. जवाहरलाल नेहरू ने डा. अंबेडकर की अनदेखी कर शेख अब्‍दुलला का साथ दिया।

महजब के आधार पर देश का विभाजन : भारत-पाकिस्‍तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। कश्‍मीर की 80% जनता मुस्लिम थी और तत्‍का‍लीन राजा हिंदु था। धर्म के आधार पर व जनमत के आधार पर पाकिस्‍तान को पूर्णता: विश्‍वास था। कश्‍मीर का विलय पाकिस्‍तान को पूर्णत: विश्‍वास था। कश्‍मीर का विलय पाकिस्‍तान में ही होगा, किंतु जब राजा हरि सिंह ने कश्‍मीर का विलय भारत में किया, तो पाक की सियासी जमातों के इरादों पर पानी फिर गया। इसी कारण पाकिस्‍तान ने कई बार भारत पर विफल आक्रमण किया। जिसके कारण पाकिस्‍तान वर्तमान समय में एक विफल राष्‍ट्र के कगार तक जा पहुंचने के बावजूद, उसने सिर्फ यही सिद्ध किया है कि वह अपने राष्‍ट्र को बर्बाद की तरफ ले जा रहा है।

जम्मू कश्मीर समस्या की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 
ब्रिटिशकाल में जम्‍मू व कश्‍मीर एक देशी रियासत थी, आजादी के समय यहाँ एक हिंदु शासक थे, जिनका नाम हरि सिंह था। आजादी के पूर्व ही वहाँ देशी राजा के विरुद्ध शेख अब्‍दुल्‍ला के नेतृत्‍व में लोकतंत्र की स्‍थापना हेतु आंदोलन चलाया गया था। मौजूदा भारत में कश्‍मीर को शामिल करने में महाराजा हरि सिंह का अभूतपूर्व योगदान रहा है। कश्‍मीर एक विस्‍तृत रियासत थी, जिसकी अधिकांश जनता मुस्लिम थी और राजा हिंदू था, कश्‍मीर रियासत के अलग-अलग हिस्‍सों गिलगिद, लद्दाख, जम्‍मू आदि के लोगों की महत्‍वाकांक्षाओं को ध्‍यान में रखते हुए महाराजा हरि सिंह को निर्णय लेना था। इसी कारण महाराज हरि सिंह 15 अगस्‍त 1947 को कोई निर्णय नहीं ले पाए, लिहाजा उन्‍होंने दोनों मुल्‍कों को समझौते का प्रस्‍ताव भेजा, पाकिस्‍तान भेजा, पाकिस्‍तान की सरकार ने इस प्रस्‍ताव को तत्‍काल मान लिया, दूसरी तरफ भारत ने इस प्रस्‍ताव को आपसी विचार-विमर्श द्वारा सुलझाने की बात कही। वहीं महाराजा हरि सिंह अंत तक भारत में ही विलय के पक्षधर बने रहे। 

इसके बाद पाकिस्‍तान को कश्‍मीर हाथ से खिसकता नजर आने लगा। इसी कारण से अक्‍टूबर 1947 में पाक सेना द्वारा समर्थित कबालियों ने कश्‍मीर घाटी पर कब्‍जा करने के लिए वहाँ आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण का सामना करने के लिए महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी, लेकिन भारत ने इस आधार पर मदद मदद देना स्‍वीकार किया कि पहले जम्‍मूव कश्‍मीर भारतीय संघ में शामिल हो गया, तत्‍पश्‍चात भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान के कबालियों को कश्‍मीर घाटी से खदेड़ दिया। फलत: महाराजा हरि सिंह ने कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय अतिशीघ्र करने का निर्णय लिय। 26 अक्‍टूबर 1947 का कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय करने के लिए महाराजाने विलय पत्र पर हस्‍ताक्षर कर दिए और 27 अक्‍टूबर 1947 को लार्ड माउन्‍टबेटन ने इसे मंजूरी दे दी। इसके साथ ही वैधानिक रूप में भारत की सीमाओं का विस्‍तार गिलगिट-बाटलिस्‍तान तक हो गया, किंतु वर्तमान में राज्‍य का बड़ा हिस्‍सा पाकिस्‍तान के कब्‍जे में है और दूसरा चीन के गैर-कानूनी नियंत्रण में है।

1947 में कश्‍मीर रियासत का भारत में विलय करने के उपरांत यह भारत का हिस्‍सा था। महाराजा हरि सिंह ने अपनी पूरी रियासत का विलय भारत में ही किया था। अत: गिलगिट-बाल्स्तिान सहित समूचा कश्‍मीर वैधानिक रूप से भारत का ही अंग है, लेकिन पाकिस्‍तान अवैध नियंत्रण वाली हमारी भूमि को अपनी भूमि को अपनी भूमि घोषित करने की नापाक कोशिश कर रहा है। इस गैर-कानूनी प्रयास के खिलाफ भारत सरकार द्वारा अब तक कोई बुलंद आवाज न उठाना इस बात का संकेत देता है कि हमारी सरकार अपनी सीमाओं व भूमि को लेकर सचेत और संवेदनशील नहीं है। इसी असचेतता व संवेदनहीनता का परिणाम है कि इन क्षेत्रों में चरमपंथी गुटों का वर्चस्‍व बढ़ता जा रहा है।
जम्‍मू-कश्‍मीर ( अनु. 370 ) विशेष राज्‍य
  1. 26 अक्‍टूबर 1947 को कबिलाई के सहयोग से पाकिस्‍तान द्वारा जम्‍मू-कश्‍मीर पर आक्रमण किया गया।
  2. जम्‍मू-कश्‍मीर के राजा हरि सिंह ने भारत में विलय के साथ रक्षा की माँग की।
  3. विलय पत्र में विदेश, रक्षा तथा संचार भारत को दिया गया, शेष सभी अधिकार राज्‍य के अधीन रखे गए।
  4. जम्‍मू-कश्‍मीर के लिए विशेष व्‍यवस्‍था के साथ अनु. 370 जोड़ा गया जो कि विशेष राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त करता है।
  5. जम्‍मू-कश्‍मीर को भारतीय संविधान संविधान के अनु. 2 में सम्मिलित किया गया है।
  6. अजु. 370 की व्‍यवस्‍था में अस्‍थाई संब्रमणकालीन विशेष उपबन्‍ध किया गया।
  7. 1951 में जम्‍मू–कश्‍मीर संविधान सभा गठन किया गया।
  8. 1951 में शेख अब्‍दुल्‍ला व पं. नेहरू के बीच समझौता हुआ। जिसको दिल्‍ली समझौता के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें जम्‍मू-कश्‍मीर की स्‍वायत्ताता पर हस्‍ताक्षर किया गया। जिसका अर्थ विदेश, रक्षा व संचार को छोड़कर शेष सभी अधिकार जम्‍मू-कश्‍मीर के पास रहेगे।
  9. 1953 में शेख अब्‍दुल्‍ला को देश चिरोधी गतिविधियों के कारण जेल जाना पड़ा।
  10. 1953 में शेख अब्‍दुल्‍ला की जगह बक्‍शी गुलाम मोहम्‍मद सत्तासीन हुए।
  11. जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान सभा ने फरवरी 1954 में औपचारिक रूप से भारत में जम्‍मू-कश्‍मीर को विलय कर दिया।
  12. 1954 में जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान सभा द्वारा भारत में विलय की मंजूरी जिससे केंद्रीय कानून लागू हो गया।
  13. जम्‍मू-कश्‍मीर का अपना संविधान 26 जनवरी 1957 को लागू किया गया।
  14. 1965 में सदर-ए-रियासत का नाम बदलकर राज्‍यपाल रख दिया गया जो अब राष्‍ट्रपति द्वारा नियुक्‍ति होगा (हम व्‍यवस्‍था जम्‍मू-कश्‍मीर संविधान के 6वाँ संविधान संशोधन द्वारा किया गया है।)
  15. राज्‍य की संवैधानिक तंत्र की विफलता में पहले 6 माह राज्‍यपाल शासन (धारा 92), इसके बाद राष्‍ट्रपति शासन (अनु. 356) लागू होता है।
  16. राज्‍य की विधान सभा में दो महिला विधायकों की व्‍यवस्‍था जो राज्‍यपाल द्वारा मनोनीत होगी।
  17. राज्‍य की राजभाषा उर्दू है।
  18. राज्‍य की विधान सभा का कार्यकाल 6 वर्ष होने के कारण मुख्‍यमंत्री का कार्यकाल 6 वर्ष का हो जाता है।
  19. अनु. 355 के तहत राज्‍य में सशस्‍त्र बल की तैनाती की जा सकती है।
  20. नियंत्रण रेखा पहले युद्ध विराम रेखा थी, जो 1 जनवरी 1949 को प्रभावी हुई और शिमला समझौता (1972) के बाद वह नियंत्रण रेखा में बदल गई।

Saturday, 20 April 2019

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

नेहरू पुरस्कार का इतिहास और उसके विजेता / प्राप्तकर्ता की सूची

जवाहरलाल नेहरु पुरस्कार एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार है जो भारत सरकार की तरफ से पंडित जवाहरलाल नेहरु की याद में प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है। नोबेल पुरस्कार की भाँति नेहरू पुरस्कार भी, विश्व में एक वर्ष में एक ही ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है, जो संसार के लोगों में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना व मैत्री को बढ़ावा देने के लिये असाधारण योग देता है। एक लाख रुपये का नेहरू पुरस्कार 1965 में भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया था, जिसका प्रथम पुरस्कार श्री नेहरू के जन्म दिवस पर 14 नवम्बर, 1966 को दिया जाना था।

26 सितम्बर, 1966 से 30 सितम्बर, 66 तक चार दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय नेहरू गोष्ठी का आयोजन था। विश्व के विद्वान् गोष्ठी में भाग लेने दिल्ली में एकत्रित हो रहे थे। भारत सरकार द्वारा नियुक्त नेहरू पुरस्कार निर्णायक समिति ने इसी शुभ अवसर पर अपने निर्णय की घोषणा करना उचित समझा। इस सात सदस्यीय निर्णायक समिति में भारत के उपराष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सदस्य होते हैं। अन्य पाँच सदस्यों में एक किसी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो वरिष्ठ भारतीय नेता, एक किसी विश्वविद्यालय के उपकुलपति और एक समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि विभिन्न देशों की सरकार, अन्तर्राष्ट्रीय संगठन और विश्व के विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा पुरस्कार योग्य नामों की सिफारिश की जाती है। इस प्रथम निर्णायक समिति के सदस्य थे, स्व० डॉ० जाकिर हुसैन अध्यक्ष, भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री के० सुब्बाराव, जस्टिस खलील अहमद, उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित, टाटा उद्योग के डाइरेक्टर श्री एन. ए. पालकीवाला, उस्मानिया विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ० डी० एस० रेड्री तथा नेशनल हेरल्ड के सम्पादक श्री चेलापति राव निर्णायक समिति की ओर से उपराष्ट्रपति ने 17 सितम्बर, 1966 को घोषणा की कि अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिये जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव ऊथान्ट को दिया जायेगा। विश्व की कई सरकारों, अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों और विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा पुरस्कार पाने के लिये नामों की सिफारिश की गई थी। बहुत सोच-विचार के बाद थान्ट का नाम तय किया गया।

निर्णायक समिति का यह निर्णय वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय था। राष्ट्र संघ के महासचिव के रूप में श्री ऊधान्ट की सेवायें इतिहास के पृष्ठ पर सदैव अंकित रहेंगी। युद्ध की विभीषिकाओं से त्रस्त विश्व को उन्होंने अनेक बार बचाया। अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव और शान्ति बनाये रखने में है। निरन्तर प्रयत्नशील थे। उस समय उनका और भी अधिक महत्त्व बढ़ गया था क्योंकि इस समय सारे संसार की आँखें वियतनाम व पश्चिम एशिया में शांति स्थापना की ओर लगी हुई थी।

28 सितम्बर, 1966 को नेहरू गोष्ठी की अध्यक्षता श्रीमती मिरदल ने की थी तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा प्राप्त “शान्ति पुरस्कार” स्वीकृति सम्बन्धी तार पढ़कर सुनाया। इस अवसर पर श्री ऊ-थान्ट ने कहा था-“अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए भारत ने मुझे जो नेहरू पुरस्कार दिया है, यह मेरे लिए बड़ी गौरव की बात है। उन्होंने कहा-“पुरस्कार की एक लाख रुपए की धनराशि में संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल (न्यूयार्क) को दे दूंगा। यह स्कूल आर्थिक संकट से गुजर रहा है।” 27 सितम्बर को श्री थान्ट ने एक वक्तव्य में कहा था कि जवाहरलाल नेहरू इस शताब्दी के एक महान् राजनेता थे। मुझे उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला। उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा थी। अत: यह पुरस्कार मिलना मैं अपने लिए गौरव की बात समझता है। खासकर बच्चों और युवकों में स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू को विशेष दिलचस्पी थी। अतः मैं पुरस्कार की राशि संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्राष्ट्रीय स्कूल को दान करना उचित समझता हूं।“

14 नवम्बर, 1966 के स्थान पर यू थांट 10 अप्रैल, 1967 को भारत सरकार के निमन्त्रण पर दिन की यात्रा पर भारत पधारे। 12 अप्रैल, 1967 को एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया तथा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० राधाकृष्णन ने “अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव का जवाहरलाल नेहरू पुरूस्कार” श्री यू थांट को समर्पित किया। यू थांट ने स्वर्गीय नेहरू की भावनाओं तथा उनके आदर्शो के लिये कार्य करते रहने का प्रण लेते हुए कृतज्ञतापूर्वक यह पुरस्कार स्वीकार किया।

इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने कहा कि यह पुरस्कार भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ तथा बर्मा और भारत को एक सूत्र में बाँधता है। यू थांट ने अपना जीवन एक शिक्षक के रूप में शुरू किया और आज भी वे एक शिक्षक की तरह अपना सब कुछ विश्व शान्ति और सद्भाव उत्पन्न करने में समर्पित कर रहे हैं। वे एक बौद्ध हैं। एक बौद्ध की ही तरह उनमें अगाध विश्व प्रेम और सद्भाव भरा है। वे शान्ति और समझौते के ध्येय पर चलते हैं। मतभेदों को दूर करने के लिए शक्ति का प्रयोग अनैतिक ही नहीं, गलत नीति भी है। मनुष्य के भाई-चारे की माँग है कि मानव सहयोग बढ़े। हमारी सुरक्षा मानवीय मूल्यों तथा आध्यात्मवाद के परिपालन में है। शान्ति की सुरक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय अनुशासन आवश्यक है। प्रधानमन्त्री तथा राष्ट्रपति ने महासचिव के रूप में यू थांट के कार्य की सराहना की और कहा कि वे विश्वशान्ति और सहयोग के पोषक हैं। उन्हें यह प्रथम पुरस्कार देने का फैसला बहुत ही उचित और प्रशंसनीय है। उन्होंने बर्मा की स्वतन्त्रता की लड़ाई में भी कार्य किया है। श्री नेहरू राष्ट्र को युद्ध से बचाना चाहते थे। स्वतन्त्रता के लिए शान्ति आवश्यक है। अशोक संसार में सबसे बड़े सम्राट माने जाते हैं। वे भी विश्व-शान्ति पक्ष के पोषक और प्रणेता थे। श्री नेहरू का संयुक्त राष्ट्र संघ में अटूट विश्वास था। हम भी राष्ट्रों के बीच शान्तिपूर्ण सहयोग तथा विवाद को बातचीत से हल करने के पक्ष में हैं। डॉ० राधाकृष्णन ने यू थांट  के वियतनाम में शान्ति स्थापित करने के प्रयास की सराहना की और आशा व्यक्त की कि जिनेवा सम्मेलन दुबारा बुलाया जायेगा। विश्वमत का लोग ध्यान रखेंगे। थान्ट शान्ति चाहते हैं, बिना किसी पक्ष की विजय अथवा पराजय के।

श्री यू थांट ने अपने भाषण में कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए पहला नेहरू पुरस्कार पाना किसी भी व्यक्ति के लिए गौरव की बात है, किन्तु महासचिव के लिए यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस तरह के पुरस्कार से प्रेरणा तथा प्रोत्साहन मिलता है। श्री नेहरू के प्रति भावभरी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यू थांट ने कहा “उन्होंने अपनी भावना की गहराई तथा बुद्धि के बल पर महत्ता प्राप्त की। जीवन के हर अंग के लिए वे नैतिक दृष्टिकोण रखते थे। उनमें अपार धैर्य, उत्साह और लगन थी। इसके बावजूद वे हम सब की तरह ही एक मानव थे। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में श्री नेहरू ने महान् नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में भारत ने संसार में एक उच्च स्थान पाया। विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले राष्ट्रों के बीच में आज सहयोग है, किन्तु सहयोग की बातों की चर्चा कम होती है और विवादों का प्रचार अधिक होता है। कांगों में सेना भेजने के उनके फैसले से संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्य में बड़ी मदद मिली और एक नया अध्याय शुरू हुआ। जहाँ तक अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना की बात है, एक-दूसरे को जानना ही पर्याप्त नहीं, सहानुभूति तथा आपस में सहयोग भी होना चाहिये और हमारा मस्तिष्क विस्तृत एवं हृदय विशाल होना चाहिये।

जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की सूची
संख्‍या
नाम
वर्ष
1
यू थांट
1965
2
मार्टिन लूथर किंग जूनियर (मरणोपरांत)
1966
3
खान अब्दुल गफ्फार खान
1967
4
यहुदी मेनुहिन
1968
5
मदर टेरेसा
1969
6
केनेथ डी कौंडा
1970
7
जोसिप बरोज़ टिटो
1971
8
आंद्रे मैल्रौक्स
1972
9
जूलियस के. न्येरेरे
1973
10
राउल प्रेबिस्च
1974
11
जोनास सॉल्क
1975
12
ग्यूसेप तुक्की
1976
13
तुलसी मेहर श्रेष्ठ
1977
14
निचिदात्सू फुजी
1978
15
नेल्सन मंडेला
1979
16
बारबरा वार्ड
1980
17
अल्वा और गुन्नार म्यर्दल (संयुक्त रूप से)
1981
18
लेओपोल्ड सदर सेंघोर
1982
19
ब्रूनो क्रेइस्क्य
1983
20
इंदिरा गांधी (मरणोपरांत)
1984
21
ओलोफ पाल्मे (मरणोपरांत)
1985
22
ज़ेवियर पेरिज डी कुईयार
1987
23
यासिर अराफात
1988
24
रॉबर्ट गेब्रियल मुगाबे
1989
25
हेल्मुट कोल
1990
26
अरुणा आसफ अली
1991
27
मौरिस एफ. स्ट्रॉंग
1992
28
आँन्ग सैन सू की
1993
29
महाथिर बिन मोहम्मद
1994
30
होस्नी मुबारक
1995
31
गोह चोक टोंग
2003
32
सुल्तान काबूस बिन सईद अल सईद
2004
33
वांगरी मुटा माथाई
2005
34
लुइज इनासियो लूला डा सिल्वा
2006
35
ओलाफुर रेगनर ग्रिम्सोन
2007
36
एंजेला डोरोथिया मार्केल
2009


विश्व शान्ति के लिए उल्लेखनीय तथा सर्वोत्कृष्ट प्रयास करने वाले व्यक्ति को हर वर्ष नेहरू पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। नेहरू पुरस्कार नोबेल शान्ति पुरस्कार के समकक्ष समझा जाता है।

श्री नेहरू ने अपने जीवनकाल में अपने देश और समस्त विश्व के लिए जो कुछ किया, वह श्री नेहरू की कीर्तिपताका को ज्यों-का-त्यों बनाये रखने में अपने में स्वयं पर्याप्त था, परन्तु फिर भी यह उपाय उस महा-मानव के यशोध्वज को सुरक्षित रखेंगे तथा साथ ही साथ श्री नेहरू के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा को प्रोत्साहन देते रहेंगे ऐसा हमारा विश्वास है।
विंस्‍टन चर्चिल का जीवन परिचय। Winston Churchill Biography in Hindi

विंस्‍टन चर्चिल का जीवन परिचय। Winston Churchill Biography in Hindi

विंस्‍टन चर्चिल का जीवन परिचय। Winston Churchill Biography in Hindi

नाम : विंस्टन चर्चिल
जन्‍म : 30 नवंबर, 1874
पेशा : राजनीतिज्ञ और युद्ध नेता
मृत्‍यु : 24 जनवरी, 1965
विंस्‍टन चर्चिल एक साहसी और दूरदर्शी नेता के साथ ही एक लेखक भी थे। द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान विंस्‍टन चर्चिल ने अपने देश का दृढ़ और साहसी नेतृत्‍व प्रदान किया। वह अपने साहसी और सफल नेतृत्‍व, जो उन्‍होंने गठबंधन देशों को द्वितीय विश्‍वयुद्ध (1940-1945) के दौरान प्रदान किया था, के कारण विश्‍व इतिहास में एक विशेष स्‍थान रखते हैं।

Winston Churchill Biography in Hindi
विंस्टन लियोनार्ड स्पेंसर चर्चिल का जन्म 30 नवंबर, 1874 को ब्‍लेनहेम पैलेस में हुआ था, जो महारानी ऐनी द्वारा चर्चिल के पूर्वज, ड्यूक ऑफ मार्लबोरो को दिया गया घर था। वह लॉर्ड रैंडोल्फ चर्चिल का सबसे बड़ा बेटा था। उनके पिता रैनडोल्‍फ चर्चिल ड्यूक ऑफ मार्ल बो के वंशज थे। उनकी मां, जेनी जेरोम, न्यूयॉर्क के एक व्यवसायी, लियोनार्ड जेरोम की सुंदर और प्रतिभाशाली बेटी थी। विंस्टन ने अपनी मां का बहुत सम्मान करते थे लेकिन उनके पिता के साथ उनके संबंध अच्छे नहीं थे। वह पढ़ाई में अच्‍छे नहीं थे, विशेष रूप से लैटिन या गणित का अध्ययन करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालाँकि, उन्होंने अंग्रेजी में एक अच्छी शिक्षा प्राप्त की, और थॉमस मैकॉले के (1800-1859) लेयस ऑफ़ एंशिएंट रोम (1842) के एक हिस्से को पढ़ने के लिए एक पुरस्कार जीता।

कॉलेज में प्रवेश होने के बाद उनके अकादमिक रिकॉर्ड में बहुत सुधार हुआ। जब उन्होंने 1894 में स्नातक किया तो वह अपनी कक्षा में आठवें स्थान पर थे।

लेकिन सेना में शामिल होने में सफल रहें, फिर वह मार्निंग पोस्‍ट के संवाददाता के रूप में दक्षिणी अफ्रीका चले गए। वहां उन्‍हें जेल में डाल दिया गया, लेकिन वह बच निकलने में सफल रहे और एक नायक के रूप में वापस इंग्‍लैंड लौटे।

वह राजनीति में शामिल हो गए। उन्‍होंने अपनी प्रेमिका से शादी की। चर्चिल राजनीति में सफल रहे और गृह सचिव बन गए। शीघ्र ही उन्‍होंने त्‍यागपत्र दे दिया और पर्वतारोहण बल में कमांड के लिए अर्जी दे दी। मई, 1940 में को नार्वे से मिली हार से ब्रिटिश जनता हताश हो गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री के प्रति  उसमे अविश्वास पैदा हो गया। १० मई को चैंबरलेन ने त्यगपत्र दे दिया और चर्चिल ने प्रधानमंत्री पद संभाला और एक सम्मिलित राष्ट्रीय सरकार का निर्माण किया।उन्‍होंने बड़े निर्णायक मोड़ पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पद संभाला, जब पूरा यूरोप ब्रिटेन के साथ जर्मनी के नाजी हमले को सहने वाले छोर पर था।

चर्चिल ने घोषणा की कि अंग्रेज दुश्‍मनों से हर जगह लड़ेगे, धरती पर, हवा में और पानी पर, लेकिन वह अन्‍यायपूर्ण सेनाओं के सामने समर्पण नहीं करेंगे। उनके इस वक्‍तव्‍य ने परेशान सेना और देशवासियों को आत्‍मविश्‍वास से भर दिया, फिर छह वर्षों के तीव्र संघर्ष के बाद चर्चिल अपने नेतृत्‍व में देश को विजय दिलाने में सफल रहे।

चर्चिल ने अपना प्रसिद्ध भाषण रक्‍त, आंसू और पसीना 1940 में ब्रिटिश हाउस ऑफ कामंस में दिया था। वह कुछ प्रसिद्ध किताबों के लेखक भी थे। उन्‍होंने मेमोरीज ऑफ सेकंड वर्ल्‍ड वार लिखी और उन्‍हें साहित्‍य के नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया।

अक्टूबर, १९५१ के निर्वाचन में उनके दल की विजय हुई और वह पुन: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए। वह विश्वशांति के लिये एकाग्रचित्त होकर प्रयत्नशील रहे उन्होंने अंग्रेजी भाषाभाषियों का एक वृहत् इतिहास अपने विशिष्ट दृष्टिकोण से लिखा है। वृद्धावस्था और अस्वस्थ्य के कारण उन्होंने 5 अप्रैल 1955 को प्रधान मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया और इस प्रकार राजनीति से अवकाश ग्रहण किया।