Wednesday, 19 June 2019

भारत की सांस्कृतिक समस्या निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

भारत की सांस्कृतिक समस्या निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

भारत की सांस्कृतिक समस्या निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

विश्व में अनेक संस्कृतियाँ प्रकट हुई हैं, जिनमें भारतीय संस्कृति बहुतप्राचीन है। भारतीय संस्कृति पर अनेक संस्कृतियों का प्रभाव है। विभिन्नप्रभावों से समय-समय पर हमारी इस संस्कृति के समक्ष अनेक समस्यायेंआईं, जो विशेष काल के लिए विकट बनी रहीं किन्तु फिर से समय के प्रबलवेग में वे बहती भी रहीं, हमारी संस्कृति पनपती रही।

द्विवेदी जी के अनुसार संस्कृति की तीन विशेषतायें हैं।

१. साधनाओं की परिणति २. विरोधहीन वस्तु ३. सामंजस्य स्थापित करने वाली। नाना प्रकार की जातियों का मिलन क्षेत्र भारतवर्ष है। इन मनुष्यों को कल्याण मार्ग की ओर अग्रसर करना ही हमारी असली समस्या है।

मुसलमानों के आगमन एवं मुस्लिम धर्म के प्रचार होने पर भारतीय समाज में विषमता पैâली। आचार्य द्विवेदी जी कहते हैं कि पेशा, धर्म तभी कहा जा सकता है जब उसमें व्यक्तिगत लाभ हानि की अपेक्षा सामाजिक लाभ की भावना प्रधान हो। तीन दिशाओं में हिन्दू मुसलमानों को एक करने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं।

१. आध्यात्मिक क्षेत्र में २. लौकिक क्षेत्र में और ३. विज्ञान क्षेत्र में।

भारत में सदैव कला, धर्म, दर्शन और साहित्य पनपा, जिसका परिचय उसने समूचे विश्व को दिया। वर्तमान भारत में हम सबको अपना यही लक्ष्य बनाकर योजनाएँ बनानी है जिससे हमारी संस्कृति की यह समस्या दूर हो सके।

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

हमारी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

भारतीय मनीषियों ने जीवन की अनेक समस्याओं को अनेक प्रकार की परिस्थितियों में देखा था और यथासमय उनके समाधान का मार्ग सोचा था। हमारी शिक्षा प्रणाली और ज्ञान प्रसार में भी परिवर्तन हुआ है।
भारत की उपलब्ध प्राचीन साहित्यों में ब्राह्मण और विद्या का घनिष्ठ सम्बन्ध है। जाति व्यवस्था भारतीय समाज की सदैव से अपनी विश्ोषता है। संसार में आदि युग से ही विशेष कार्य वर्ग होते थे। विद्या पिता से ही सीखी जाती थी जिसके कारण विशेष विद्यायें विशेष कुलों में ही सीमाबद्ध रह जाती थीं। महाभारत में दो प्रकार के अध्यापकों का उल्लेख है- अपरिग्रही अध्यापक और वृत्ति पर नियुक्त अध्यापक।
ब्राह्मणों के लिए आदर्श था कि वह अत्यन्त निरीह भाव से गरीबी की जिन्दगी में रहे किन्तु ऊँचे से ऊँचा ज्ञान और चरित्रबल रखे प्रतिग्रह, याजन और अध्यापन इनसे वे अपना जीविकोपार्जन कर सकते थे। स्मृतिचन्द्रिका में यम के एकवचन के अनुसार ‘प्रतिग्रहं अध्यापनं याजनानं प्रतिग्रहं श्रेष्ठतमं बदंति’।
सिद्धार्थ को ८६ कलायें ६४ काम कलायें सिखाई गयी थीं। महाभारत और पुराणों से पता चलता है कि यज्ञों तथा तीर्थों में आयोजित शास्त्रार्थों से जनता को ज्ञान मिलता है।
हमारे इतिहास में नाना प्रकार से शिक्षण के उदाहरण हैं जिनमें देशकाल पात्र के अनुसार किसी को कम एवं किसी को अधिक प्राप्त होता रहा है। निस्पृह, उदार, प्रेमी और चरित्रवान गुरु ही श्रेष्ठ माना जाता है। हमें योजनाओं में मनुष्य को नहीं ढालना है। वरन् योजनाओं को मनुष्य के आदर्श के अनुसार बनाना है। गुरु को महत्ता दिलानी है, एवं आदर्श गुरु की स्थापना करनी है।
आपने मेरी रचना पढ़ी होगी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

आपने मेरी रचना पढ़ी होगी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

आपने मेरी रचना पढ़ी होगी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तुत व्यंग्य प्रधान लेख में हास्य का पुट देते हुये द्विवेदी जी ने साहित्य क्षेत्र में रंगे स्यारों की कलई खोली है। यद्यपि स्वयं द्विवेदी जी गम्भीरतापूर्ण शैली में साहित्य सृजन करते हैं, फिर भी इस निबन्ध में उन्होंने बड़े संयम से विनोद की सृष्टि करके उथले साहित्यकारों पर व्यंग्य बाण बरसाये हैं।

विनोद, मानव में सरसता का संचार करता है। दार्शनिक मत के अनुसार विनोद का प्रभाव रासायनिक होता है। दुर्दान्त डाकू में विनोदप्रियता का मिश्रण कर देने से वह प्रजातंत्र का लीडर बन सकता है। समाजसुधारक अखबारनवीस भी बन सकता है।

कलकत्ते के चिड़ियाघर के वनमानुष को देखकर लेखक की धारणा हुई कि वह चिन्तनशील है। अध्ययन के पश्चात् मालूम हुआ कि वे चिन्तित इसलिए हैं क्योंकि वे मानवों का भविष्य एवं संसार के रहस्य को जानते हैं।

साहित्य से सम्बन्ध रखने वाले पाँच प्रकार के जीवों लेखक, पाठक, सम्पादक, प्रकाशक तथा आलोचक के क्षेत्र और काम अलग-अलग हैं। एक ही व्यक्ति सब काम वैâसे कर सकता है?

लेखक ने इसी कारण से प्रारम्भ में बताया था कि एक लेखक का दूसरे लेखक से अपने लेख के विषय में पूछना उस लेखक की रसशून्यता तथा विनोदहीनता प्रकट करता है। डॉक्टर भी उसका इलाज नहीं कर पाता अगर किसी दिन मानव को हसोड़ बना दे सकने वाली औषधि तैयार हो जाय। लेखक को दृढ़ विश्वास है कि उसके साहित्य से संसार में क्रान्ति का संचार किया जा सकता है।

Tuesday, 18 June 2019

अशोक के फूल निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

अशोक के फूल निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

अशोक के फूल निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रस्तुत निबन्ध में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने ‘अशोक के फूल’ की सांस्कृतिक परम्परा की खोज करते हुए उसकी महत्ता प्रतिपादित की है। इस फूल के पीछे छिपे हुये विलुप्त सांस्कृतिक गौरव की याद में लेखक का मन उदास हो जाता है और वह उमड़-उमड़ कर भारतीय रस-साधना के पीछे हजारों वर्षों पर बरस जाना चाहता है। वह उस वैभवशाली युग की रंगस्थली में विचरण करने लगता है; जब कालिदास के काव्यों में नववधू के गृह प्रवेश की भाँति शोभा और गरिमा को बिखेरता हुआ ‘अशोक का फूल’ अवतरित हुआ था। कामदेव के पांच वाणों में सम्मिलित आम, अरविन्द, नील कमल तो उसी प्रकार से सम्मान पाते चले आ रहे है। हां, बेचारी चमेली की पूछ अवश्य कुछ कम हो गयी है, किन्तु उसकी माँग अधिक भी थी, तब भी एकमात्र अशोक ही भुलाया गया है। ऐसा मोहक पुष्प क्या भुलाने योग्य है, क्या संसार में सहृदयता मिट गयी है?

लेखक ईस्वी सन् की पृष्ठभूमि पर पहँुचकर सोचने लगता है, जबकि अशोक का शानदार पुष्प भारतीय साहित्य और शिल्प में अद्भुत महिमा के साथ आया था। सम्भवत: अशोक गन्धर्वों का वृक्ष है जिसकी पूजा गन्धर्वों और यक्षों की देन है । प्राचीन साहित्यों में मदनोत्सव के रूप में अशोक की पूजा का बड़ा सरस वर्णन मिलता है। राजघरानों की रानी के कोमल पद प्रहार से ही यह खिल उठता था। अशोक वृक्ष में रहस्यमयता है। यह उस विशाल सामन्ती सभ्यता की परिष्कृत रूचि का परिचायक है जो प्रजा के खून पसीने से पोषित होकर जवान हुई थी, लाखों और करोड़ों की उपेक्षा करके समृद्ध हुई थी।

मनुष्य की जीवन शक्ति बड़ी निर्मम है। यह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है। वह सभ्यता, संस्कृति, धर्माचारों, विश्वास, उत्सव, वृत्त किसी की भी परवाह न कर मस्तानी चाल से अपने रास्ते जा रही है। इस तेज धारा में अशोक कभी वह गया है। अशोक वृक्ष में एक प्रकार से कोई परिवर्तन नहीं आया है। वह उसी मस्ती में हँस रहा है। हाँ, उसे हमारा देखने का दृष्टिकोण अवश्य बदलता है। हम व्यर्थ उदासी को ओढ़े हुये मरे जा रहे हैं। कालिदास ने अपने ढंग से उसे रूप दिया है और हमें भी अपने दृष्टिकोण से आनन्द लेना चाहिए।
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बसन्त आ गया है निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

बसन्त आ गया है निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

यह निबन्ध उस समय लिखा गया है जबकि द्विवेदी जी ‘शांति निकेतन’ में निवास करते थे। द्विवेदी जी ने अपने समीपस्थ वृक्षों का अवलोकन करते हुए बताया है कि जब ‘बसन्त आ गया है’ इस आदर्श की प्रतिध्वनि कवि समाज के साथ ही साथ इतर प्राणियों पर भी गूँज उठी है, तब इस शांति निकेतन में स्थित कुछ वृक्षों पर ऋतुराज के आगमन की सूचना पूर्व से ही मिल गयी है। जिससे वे अपने को स्वागत के लिए पुष्पों और नई कोपलों के रूप में सज्जित किये हुए हैं पर कुछ कारणों से बसन्तागमन के पूर्व सूचना ही उपलब्ध नहीं हो सकी। अत: वे ज्यों के त्यों नव विकास से ही अपने पूर्व रूप में ही खड़े हुए हैं।

बसन्त जब आता है तो प्रथमत: सबको न्यस्त व्यागमूर्ति बनाकर उनका पूर्व-संचित धन उन्मुक्त भाव से (पतझड़ के द्वारा) दान करा देता  तब अपार सौन्दर्य रूप में पल्लवों, कोयलों और पुष्पों की सम्पत्ति  बाँट देता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ के हाथ से से लगाई दो कृष्ण चूड़ायें हैं, जो अभी नादान हैं। अत: हरी-भरी रहकर भी फाल्गुन आषाढ़ मास की दशा को प्राप्त हैं। अमरूद के लिए तो हमेशा बसन्त ही रहता है। इसके अलावा विषमता यहाँ तक है कि कुछ समान परिस्थिति वाले वृक्ष भी समान रूप से विकसित नहीं हो पा रहे हैं।

लेखक के निवास के सामने कचनार का वृक्ष है जो स्वस्थ और सबल होते हुये भी फूलता नहीं है। पड़ोसी का कमजोर कचनार, शाखा-शाखा में पुष्प को धारण किये हुये है। ‘कमजोरों’ में भावुकता ज्यादा होती होगी। इस कथन से लेखक ने इसकी अविकसितता की पुष्टि की है।

भारत के नवयुवक उमंग और उत्साह से हीन दिखाई देते हैं। ऐसा पढ़ने में आया है किन्तु लेखक की दृष्टि में तो भारत के पेड़ पौधे भी उमंगों से हीन दिखाई देते हैं, क्योंकि जो अविकसित वृक्ष है उन्हें अभी तक यही पता नहीं चल पाया है कि ‘बसंत आ गया है’। महुआ और जामुन को देखने से लगता है कि बसन्त आता नहीं है, ले आया जाता है। संवेदन की स्थिति में कचनार की

प्रायश्चित्त की घड़ी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रायश्चित्त की घड़ी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रायश्चित्त की घड़ी निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

आज का समय चेतना एवं जागृति का है। अत: दलितों एवं पिछड़े हुये लोगों की आवाज भी ऊँचे स्वर में स्वरित होने लगी है। भारतमाता का सजीव चित्र उपस्थित करते हुये लेखक ने व्यक्त किया है कि जिस काल्पनिक भारतमाता की हम जयघोष करते हैं, उसकी सीमाओं का भी अवलोकन करना आवश्यक है। वस्तुत: भारतमाता के समृद्ध और उच्चवर्गीय ही पुत्र नहीं है; अपितु करोड़ों दलित निरन्तर एवं निर्वस्त्र लाल भी उसके बालक हैं। जागरणकाल में उच्च वर्ग के संचित संस्कारों को बड़ी ठेस लगेगी, उस महाआघात के लिए हमें पूर्व सतर्क हो जाना चाहिए।

विभिन्न जातियों के ऐतिहासिक विभाजन पर बल देते हुये लेखक ने कहा है कि इस देश में हिन्दू, मुसलमान, इसाई आदि अनेक जातियाँ रहती हैं जिसमें प्रमुखता हिन्दुओं की ही है। छूआछूत के आधार पर इन जातियों को चार भागों में बाँटा जा सकता है। (१) वे जातियाँ जिनके देखने मात्र से ब्राह्मण आदि ऊँची जातियों के वस्त्र अपवित्र हो जाते हैं। (२) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से शरीर और अन्न अपवित्र हो जाते हैं। (३) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से शरीर तो नहीं, पानी, घृत, पक्व भोजन आदि अपवित्र हो जाते हैं। (४) वे जातियाँ, जिनके स्पर्श से कच्ची रसोई अपवित्र हो जाती है। सचमुच देखा जाय तो इन सबकी मिली-जुली प्रतीकात्मक संघमूर्ति का नाम भारतमाता है और भारतमाता का जय निनाद इन स्तर भेदों को विलीन करने के लिए ही है। इन युगों-युगों से संस्कारित वहमों को नष्ट करने के लिए बड़े संबल की आवश्यकता है।

भारत में कुछ पण्डितजन सभी परम्पराओं का मूल वेदों से खोजने में अभ्यस्त हैं। यही बात जातियों के विषय में भी है पर निश्चित् रुप से वर्तमान जटिलताओं का मूल, वैदिक वर्ण व्यवस्था नहीं है। अत: जाति निर्माण का कोई दृढ़ आधार नहीं है फिर भी सांकेतिक रुप में निम्न आधारों को प्रमुखता दी जा सकती है। (१) जन्म से बनी हुई जातियाँ (२) कर्म-परम्परा से बनी हुई जातियाँ (३) धन वितरण की असमानता से बनी हुई जातियाँ (४) राजनैतिक कारणों पर अवलम्बित जातियाँ । वैदिक आधार को लेकर (१) ब्राह्मण (२) क्षत्रिय (३) वैश्य (४) शूद्र जातियों का निर्माण हुआ । आम्भीर जाति देश की सीमा में घूमने वाली एवं लुटेरी जाति समझी जाती थी। परन्तु इनकी मर्यादा क्षत्रियों के समान मान ली गयी है। 

दूसरे प्रकार की जातियाँ कार्य के आधार पर निर्मित हुई हैं। जैसेचमार, सुनार, लुहार आदि। पेशे के कारण जाति का निर्माण बड़ा आश्चर्य उत्पन्न करता है। रिजली तथा धुर्य जैसे नृतत्वशास्त्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि उत्तर भारत के चमारों में बंगाल के ब्राह्मणों की अपेक्षा अधिक आर्य सादृश्य है। स्तव में जाति का सम्बन्ध जन्म, छूआछूत और विवाह तीन माने गये हैं। 

तीसरे इस देश में रूढ़ियों को रोकने के लिए अनेक क्रान्तिकारी आन्दोलन हुये, फिर भी जाति प्रथा में किसी प्रकार का उन्मूलन नहीं हो सका एवं उसकी सफलता तो संदेहास्पद रही, आन्दोलनकारियों ने धार्मिक सम्प्रदाय को एक जाति ही बना डाला। 

चौथे कुछ जातियाँ राष्ट्रीयता के आधार पर निर्मित हुई हैं जैसे नेपाल की नैवार जाति राष्ट्रीय जाति कही जाती है। 

पाँचवें आर्थिक विषमता से बनी जातियों के लिए भी इतिहास का साक्ष्य प्राप्त है। धनवान व्यक्ति या धनी समाज उच्च जाति का माना गया है और निर्धनों की निम्न जाति स्वीकृत की गयी। 

छठें राजनैतिक कारणों से भी जातियों का विकास और पतन हुआ है। वेदों के आधार पर पण्डितों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ये तीन जातियाँ ही स्वीकार की है। राजपूती सेना का वह अंग जो कलेवा की रक्षा करता था ‘‘तलवार’’ जाति में परिवर्तित हो गया। 

इसी प्रकार यह जाति उपजाति में विभक्त हिन्दू समाज शता छिद्री है। इसको मनुष्यता के दरबार में ले जाने के लिए युग-युग से चली आती हुई संस्कार की शृंखला को शिथिल करना होगा। उस समय भारतीय सभ्यता, हिन्दू संस्कृति सचमुच नया रुप धारण करेगी।
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घर जोड़ने की माया निबंध का सारांश - हजारी प्रसाद द्विवेदी

प्रतिभायें हमेशा से अपने युग के बाह्याचारों, प्राचीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों एवं निरर्थक विधानों की विरोधिनी रही है, किन्तु विचित्र तथ्य यह है कि परवर्ती काल में वे ही बाह्य जंजाल जिनका विरोध करते-करते उन्होंने अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये थे, उन्हीं की परम्परा पर हावी हो जाते हैं। जैसे धर्मवीर, कबीर के पीर, पैगम्बर, औलिया आदि के भजन पूजन की तीव्र भर्त्सना की गयी थी, किन्तु वह उन्हीं के गले पड़ी। संस्कृत को कूप जल कह कर हिन्दी को बहता नीर माना था, किन्तु आगे चलकर उन्हीं की प्रशस्ति में अनेक स्तोत्र लिखे गये।

जिस बुद्धदेव ने ईश्वर के अस्तित्व के विषय में सन्देह प्रकट किया उसी को बाद में मान लिया। अहिंसा के महान पुजारी विश्वबंधु बापू की हत्या भीिं हसा के हाथों हुई। अन्तत: ऐसा विरोधाभास क्यों होता है? हमें इसे इतिहास के द्वारा सन्तुलित मस्तिष्क से सोचना चाहिए। 

प्रत्येक बड़े यथार्थ का सम्प्रदाय के साथ मेल बैठाना ही मुख्य लक्ष्य हो जाता है। फलस्वरूप साधना की शुद्धता भी शनै: शनै: समाप्त हो जाती है, किन्तु यह भी गौण है। मुख्य है ‘घर जोड़ने की माया’।

माया के चक्कर में पड़कर धन, मान, यश, कीर्ति के प्रलोभन में वे अनुयायी प्रवर्तक द्वारा प्रचारित ‘‘सत्य’’ से बहुत दूर जाते हैं। घर फूंकने वाली प्रकृति का लोप हो जाता है। 

यह घर जोड़ने की माया निश्चित ही बड़ी प्रबल है। संसार में कोई एकाध ही ऐसा माँ का लाल होगा जो इस मायाविनी का शिकार होने से बच जाय। घर जोड़ने की माया का मूल आधार पैसा है। इसी मूलक राम के इर्द- गिर्द सारी साधना समाप्त हो गयी है। यदि पैसे का राज्य समाप्त हो जाता तो वह समूचा बेहूदा साहित्य लिखा ही न जाता जो केवल पन्थों और उनके प्रवर्तकों की महिमा बढ़ाने के उत्साह में बराबर उन बातों को ढंकने का प्रयास करता है, जिन्हें पंथ के प्रवर्तक ने बड़ी कठिन साधना से प्राप्त किया था। मेरा मन कहता है कि यह सम्भव है।
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प्रत्येक प्राणी में अपनी जन्मभूमि के प्रति स्नेह और श्रद्धा होती है। आचार्य द्विवेदी जी भी अपने जन्मस्थली के प्रति अत्यन्त स्नेह, श्रद्धा एवं गौरव का अनुभव करते थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी जन्मभूमि के इतिहास को जितनी पैनी दृष्टि एवं भावुक हृदय से देखा है उतना अन्य साधारणजन नहीं देख पाता। उनके उस छोटे से गाँव में, अनेक जातियाँ, भारत की संस्कृति का इतिहास, भग्नावशेष की ईटों एवं कला आदि सभी का समावेश हैं। आचार्य द्विवेदी जी ने साहित्य के इतिहास को केवल कुछ बड़े व्यक्तियों के उदय एवं अस्त होने के लिखित रूप को ही नहीं माना वरन् वह कहते हैं कि ‘‘साहित्य का इतिहास मनुष्य के धारावाहिक जीवन के सारभूत रस का प्रवाह है।’’

उनके जन्मे ग्राम का नाम उनके बाबा आरत दूबे के नाम पर पड़ा जो ओझवलिया ग्राम का ही एक भाग है। इनके गांव के पास गंगा, यमुना दोनों नदिया वास करती हैं। गाँव में छप्परों के मकान अधिकांशत: हैं।

द्विवेदी जी का कहना है कि बुद्धदेव जहाँ-जहाँ गये, यदि उन-उन स्थानों का मानचित्र बनायें तो यह ग्राम उसमें अवश्य आ जायेगा, क्योंकि वे अवश्य ही इस ग्राम से निकले होंगे, स्कन्दगुप्त की विशालवाहिनी भी इस ग्राम में रुकती हुई गयी होगी और स्कन्दगुप्त ने अवश्य यहाँ कोई घोषणा की होगी।


जातियों की पूर्व परम्परा से उनकी जन्मभूमि के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विकास को जाना जा सकता है। इनके गांव में कांटु (भड़भूजा) और कलवार, तुरहा जाति भी रहती है। ग्राम में मग ब्राह्मण भी निवसित हैं। वहाँ एक जाति ‘दुसाध’ भी रहती है, जो अति वीर और विनम्र होते हैं।

गांव में काली, भगवती, हनुमान जी, प्लेग मैया आदि देवी देवताओं के मंदिर भी हैं। प्लेग मैया का स्वरुप आश्चर्य का विषय है। इस देवी का स्वरुप पाश्चात्य सभ्यता का प्रतीक है।

प्रयत्नशील मानव की पिछली झाँकी को दिखाने का कार्य ऐतिहासिक अवशेष ही करते हैं। इन्हीं अवशेषों को देखकर मानव निरन्तर प्रगति करता है। लोगों में मनुष्यता भरनी है, तभी यथार्थ में  नव का विकास और कल्याण हो सकता है।
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Monday, 17 June 2019

सरदार भगत सिंह पर निबंध। Essay on Bhagat Singh in Hindi

सरदार भगत सिंह पर निबंध। Essay on Bhagat Singh in Hindi

सरदार भगत सिंह पर निबंध। Essay on Bhagat Singh in Hindi

सरदार भगत सिंह पर निबंध। Essay on Bhagat Singh in Hindi
सरदार भगत सिंह भारतीय स्‍वतंत्रता संघर्ष के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक थे। चन्द्रशेखर आजाद व अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर इन्होंने देश की आज़ादी के लिए अभूतपूर्व साहस के साथ ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया। भगत सिंह ने यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्‍ययन किया। उन्‍होंने अनुभव किया कि ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के साथ ही भारतीय समाज की पुनर्रचना भी होनी चाहिए।

भगत सिंह का जन्‍म पंचाब की नवांशहर तहसील के खतकर कालन गांव मे एक सिख परिवार में हुआ था। वह सरदार किशन सिंह और विद्यावती की तीसरी संतान थे। उनका परिवार सक्रिय रूप से स्‍वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह गदर पार्टी के सदस्‍य थे। बचपन से ही उनकी रगों में राष्‍ट्र-भक्‍ति दौड़ रही थी।

जब 1916 में लौहार के डी.ए.वी स्‍कूल में पढ़ रहे थे, तब युवा भगत सिंह कुछ प्रसिद्ध राजनीतिक नेताओं, जैसे लाला लाजपत राय और रासबिहारी बोस के संपर्क में आये। 1919 में जब जलियावाला बाग नरसंहार हुआ तब  भगत सिंह केवल बारह साल के थे। इस नरसंहार ने उन्‍हें अंदर तक हिला दिया। उनके अंग्रेजों को भारत से निकालने के संकल्‍प को और दृढ़ कर दिया।

1921 में जब महात्‍मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया, तब भगत सिंह ने स्‍कूल छोड़ दिया और सक्रिय रूप से इस आंदोलन में भाग लिया। 1922 में जब गांधी जी ने चौरी-चौरा में हुई हिंसक घटना के विरोध में अपना आंदोलन रद्द कर दिया, भगत सिंह अत्‍यधिक निराश हुए। अहिंसा में उनका विश्‍वास कमजोर पड़ गया और वह इस निष्‍कर्ष पर पहुंचे कि स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने का सशस्‍त्र विद्रोह ही एक मात्र विकल्‍प है। अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिये भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया। कॉलेज क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था। यहां भगवतीचरण, सुखदेव और कई क्रांतिकारियों के संपर्क में आये।

छोटी उम्र में शादी से बचने के लिये घर से भाग गये और कानपुर चले गये। यहां वह गणेशंकर विद्यार्थी के संपर्क में आये और एक क्रांतिकारी के रूप में अपना पहला पाठ सीखा। उन्‍होंने अपने गांव से ही क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखीं। वह लाहौर गये और क्रांतिकारियों का एक संगठन बनाया, जिसे ‘नौजवान भारत सभा’ नाम दिया। 1928 में दिल्‍ली में उन्‍होंने क्रांतिकारियों की एक सभा में भाग लिया और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आये। दोनों ने ‘हिंदुस्‍तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ का गठन किया। इसका उद्देश्‍य सशस्‍त्र क्रांति द्वारा भारत में प्रजातंत्र की स्‍थापना करना था।

फरवरी, 1928 में भारत में साइमन कमीशन आया। इस कमेटी में कोई भारतीय नहीं था। इस बात ने भारतीयों को उत्तेजित कर दिया और साइमन कमीशन के बहिष्‍कार का निर्णय लिया। लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय पर क्रूरतापूर्वक लाठीचार्ज किया गया और बाद में गंभीर चोटों के कारण उनकी मृत्‍यु हो गई। भगत सिंह ने ब्रिटिश डिप्‍टी इंस्‍पेक्‍टर जनरल स्‍कॉट को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मृत्‍यु का प्रतिशोध लेने का दृढ़ निश्‍चय किया। उन्‍होंने स्‍कॉट को पहचानने में गलती की और असिस्‍टेंट सुप्रिंटेंडेंट सैंण्‍डर्स को मार गिराया।

भारतीयों के असंतोष के मूल कारण को समझने के बजाय डिफेंस ऑफ इंडिया एक्‍ट के अंतर्गत पुलिस को और अधिक शक्‍तियां दे दीं। यह एक्‍ट केंद्रीय विधानसभा में लाया गया, जहां पर एक मत से गिर गया। इसके बावजूद इसे एक अध्‍यादेश के रूप में लाया गया। भगत सिंह को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई, जहां इस अध्‍यादेश को पास करने के लिये बैठक होने वाली थी। यह सावधानीपूर्वक बनाई गई योजना थी, सरकार का ध्‍यान आकर्षित करने के लिये कि उनके दमन को अब और नहीं सहा जाएगा। यह निर्णय लिया गया कि बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्‍वर दत्त अपनी गिरफ्तारी दे देंगे।

8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्‍वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा के हॉल में बम फेंका और मैंने जानबूझकर खुद को गिरफ्तार करवाया। मुकदमे के दौरान भगतसिंह ने बचाव के लिये वकील लेने से इंकार कर दिया। 7 अक्‍टूबर, 1930 को एक विशेष अदालत द्वारा भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई गयी। भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च, 1931 को तड़के फांसी के तख्‍ते पर लटका दिया गया।
मैक्सिम गोर्की की जीवनी। Maxim Gorky Biography in Hindi

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नाम : मैक्‍सिम गोर्की
व्यवसाय  : विश्‍वप्रसिद्ध लेखक
जन्‍म : 28 मार्च 1868
मृत्‍यु : 18 जून 1936
मैक्‍स‍िम गोर्की को गरीब लोगों के साहित्‍य का पिता कहा जाता है। उन्‍होंने रूसी समाज के मेहनतकश आम लोगों के लिए भावनात्‍मक विवरण के साथ लिखा। एक उपन्‍यास मदर भी लिखा था, जिसे साहित्‍य में एक कालजयी रचना माना जाता है। इस उपन्‍यास का अनुवाद विश्‍व के सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ।

मैक्सिम गोर्की की जीवनी। Maxim Gorky Biography in Hindi
मैक्‍सिम गोर्की का जन्‍म 28 मार्च 1868 में रूस में हुआ था। उनका वास्‍विकनाम एलेक्‍सी मैक्‍सीमोनिच पेशकोव गोर्की था। चार साल की उम्र में ही उन्‍होंने अपने पिता को खो दिया। गोर्की अपने नाना-नानी के साथ रहे। उन्‍हें पढ़ने का बहुत शौक था। अजीविका चलाने के लिए गोर्की ने कई तरह के कार्य किए। वह खुद का स्‍वयं शिक्षित करने और ज्ञान प्राप्‍त करने के लिए पत्रकार बन गए। गोर्की ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भी भाग लिया और 1889 में गिरुफ्तार कर लिए गए। बाद में उन्‍हें मुक्‍त कर दिया।

एक बार गोर्की को राजनीतिक निर्वासन मिला हुआ था, तब उन्‍हें लिखने की प्रेरणा मिली। उन्‍होंने एक प्रसिद्ध कहानी मकर चुद्र लिखी, जो एक स्‍थानीय दैनिक में प्रकाशित हुई। इस कहानी का प्रकाशित होना गोर्की के लिए एक प्रेरित करने वाली घटना थी। इसके बाद उन्‍होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक समर्पित लेखक बन गए। गोर्की के लेखन में दिल को हिला देने वाली क्रूरता और अन्‍याय के विवरण मिलते हैं, जिन्‍हें रूस के लोगों ने क्रांति के पहले भोगा था। गोर्की की लोगों के अधिकार संपन्‍न देखने कि जो आकांक्षा थी, वह 1917 में रूस की क्रांति के रूप में सत्‍य सिद्ध हुई। गोर्की ने रूस में अलग-अलग स्‍थानों की यात्राएं कीं और अपने देशवासियों की दयनीय अवस्‍था को देखा। वह एक असाधारण साहित्‍यकार थे, जिन्‍होंने उपन्‍यासों, नाटकों, कहानियों और आत्‍मकाथा द्वारा जीवन की कठिन परिस्‍थ‍ितियों के बारे में लिखा।
मैक्‍सिम गोर्की की मृत्‍यु 1936 में हुई।

Sunday, 16 June 2019

भ्रमणध्वनी / मोबाइल : शाप की वरदान मराठी माहिती। Essay on Mobile in Marathi Language

भ्रमणध्वनी / मोबाइल : शाप की वरदान मराठी माहिती। Essay on Mobile in Marathi Language

भ्रमणध्वनी / मोबाइल : शाप की वरदान मराठी माहिती। Essay on Mobile in Marathi Language

गरज ही शोधाची जननी आहे', ह्या उक्तीनुसार मानवाने गरजेपोटी आपल्या बुद्धि व विज्ञानाच्या आधारे निरनिराळे क्रांतिकारक शोध लावले. त्यापैकीच एक भ्रमणध्वनीचा शोध हा सर्वात महान शोध म्हणावा लागेल. `कर लो दुनिया मुठ्ठी में' म्हणत या भ्रमणध्वनीने जघच पादाक्रांत केलेले दिसते. श्रीमंतांपासून ते तळा-गाळातील वर्गापर्यंत या भ्रमणध्वनीचा प्रसार आाणि प्रचार झालेला दिसतो आहे.

अगदी अल्पावधीतच सर्वच वयोगटातील लोक या भ्रमणध्वनीच्या पूर्ण आहारी गेले आहेत. कुठेही जा, लोक भ्रमणध्वनीवरून कोणाशी ना कोणाशी तरी बोलत असतातच. गाड्यांतून प्रवास करताना, रस्त्याने चालताना, गाडी चालवत असतानाही लोक बोलत असतात. त्यामुळे अपगाताचा धोका दिवसेंदिवस वाढतो आहे. सतत भ्रमणध्वनीवर बोलत राहिल्याने कुटुंबातील सदस्य, नातेवाईक, मित्र-मंडली यांच्या सहवासातील संवादाचे सुख दुरापास्त झाले आहे. यामुळे माणसे भावानिकदृष्टया एकमेकांपासून दुरावत चाललेली आहेत. दिवसातील जास्तीत जास्त वेळ भ्रमणध्वनीमध्ये घालवल्यामुळे आज माणसाला स्वत:कडेही निवांतपणे पाहता येत नाही.

या भ्रमणध्वनीचे शारीरिक दुष्पारिणामही तेवढेच गंभीर आहेत. सतत भ्रमणध्वनी कानाला लावून बोलत असल्याने किंवा गाणी ऐकत राहिल्यामुळे, त्यातून निघणान्या किरणोत्सर्गाचा मेंदूवर विपरीत पारिणाम होतो. इतरांना बदनामी-कारक मजकूर पाठवले जातात. त्यामुळे माणसातील विकृतीला वाव मिळून गुन्ह्यांचे प्रमाणसुद्धा वाढत आहे. बरेचदा समाजात अफवांचे पीक वाढवण्यास समाजकंटक याच भ्रमणध्वनीचा उपयोघ करतात. हे सर्व बघता असे वाटते की, भ्रमणध्वनीचा हा शोध शाप तर नाही ना?

मात्र भ्रमणध्वनीला शाप म्हणणे म्हणजे एकाच पैलूचा विचार केल्यासारखे होईल. कारण खरे पाहता भ्रमणध्वनी हे कमी वेळात व कमी खर्चात दूरवर असलेल्या व्यक्तींशी संपर्क  साधण्याचे एक उत्तम माध्यम आहे. भ्रमणध्वनी नसता तर आपल्याला पूर्णपणे पोस्ट खात्यावर अवलंबून रहावे लाघले असते. सण समारंभ व इतर आनंदाच्या प्रसंगी आपण आपल्या माणसांपासून दूर असलो, तरी भ्रमणध्वनीमुळे त्यांना शुभेच्छा देता येतात. त्यांची खुशाली विचारता येते. म्हणजेच ही नाती जपण्यासाठी भ्रमणध्वनी महत्त्वाची भूामिका बजावतो. भ्रमणध्वनीवर छायाचित्र गेण्याची सोय असते. त्यामुळे आपण सुंदर स्थळांची व आविस्मरणीय ठरणान्या प्रसंगांची छायाचित्रे घेऊ शकतो. ती छायाचित्रे एकमेकांना पाठवण्याची सोय यात असल्यामुळे आपल्या आप्तेष्टांनाही या गोड आठवणींचा भाघ होता येते.

आधुानिक काळातील गतिमान जीवनशैलीचा भ्रमणध्वनी हा एक आविभाज्य भाग बनलेला आहे. या भ्रमणध्वनीमुळे घरबसल्या बिलांची माहिती मिळते. नाटक, सिनेमा, रेल्वे, विमान यांची तिकीटे खरेदी करणे सहज शक्य होऊन लांबच लांब रांगा लावण्याचा त्रास कमी होतो. भ्रमणध्वनी नसता तर आपल्याला पूर्णपणे संगणकावर अवलंबून रहावे लाघले असते. भ्रमणध्वनी हा संगणकाच्या तुलनेत हलका असल्यामुळे तो हाताळणे सोपे जाते व सहज कुठेही नेणे शक्य होते.

भ्रमणध्वनी हा सघळ्या उपयुक्त साधनांचा जणू पेटाराच आहे. भ्रमणध्वनीत संपर्कसाठी, संदेश पाठवण्यासाठी सोय तर असतेच, पण छायाचित्र घेण्यासाठी कॉमेरा , वेळ पाहण्यासाठी घड्याळ, तारीख व वार बघण्यासाठी दिनदर्शिका अशा सघळ्या सोयी एकत्र उपलब्ध असतात, त्यामुळे या सघळ्या गोष्टी वेघवेघळ्या सोबत बाळघण्याची आवश्यकता रहात नाही.

भ्रमणध्वनीचे फायदे आहेतच ! पण तोटेही असले तरी तो भ्रमणध्वनीचा दोष नसून ते उपकरण वापरणान्या माणसाचा दोष आहे. तेव्हा भ्रमणध्वनीला केवळ शाप म्हणून कसे चालेल?

Saturday, 15 June 2019

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi

श्रीनिवास रामानुजन अय्यंगार यांचा जन्म २२ डिसेंबर १८८७ रोजी तामिळनाडू प्रांतातील इरोड या गावी झाला. त्यांच नाव संत रामानुजा यांच्यावरुन ठेवण्यात आल होत. त्यांचे वडील श्रीनिवास अय्यंगार एका कापडाच्या व्यापारीकडे नोकरी करत होते. त्या व्यवसायातील प्राप्ती अत्यंत तुटपुंजी असल्याने त्यांनी आपला मुक्काम कुंभकोणम या टुमदार शहरात हलवला आणि एका व्यापार्‍याकडे मुनिमाची नोकरी करण्यास सुरुवात केली.

श्रीनिवास रामानुजन यांची माहिती मराठी। Essay on Srinivasa Ramanujan in Marathi
रामानुजन यांचे गणितातील ज्ञान आश्चर्यकारक होते व त्यातील बहुतेक त्यांनी स्वतःच प्राप्त केलेले होते. परंपरित अपूर्णांकासंबंधी यापूर्वी काय विकसित केले गेलेले आहे यासंबंधी त्यांना आजिबात माहिती नव्हती, तरीही या विषयातील त्यांचे प्राविण्य त्या काळच्या इतर गणितज्ञांच्या तुलनेने अनन्यसाधारण होते. विवृत्तीय समाकल [⟶ अवकलन व समाकलन ], अतिगुणोत्तरीय श्रेढी [⟶ श्रेढी ], रीमान श्रेढी, झीटा फलनाची समीकरणे व त्यांचा स्वतःचा अपसारी श्रेढींसंबंधीचा सिद्धांत हे त्यांनी स्वतः संशोधन करून शोधून काढले. याउलट गणितातील पद्धतशीर प्रशिक्षण न मिळाल्याने किंवा उत्तम दर्जाच्या ग्रंथालयाचा उपयोग करण्याची संधी उपलब्ध न झाल्याने त्यांच्या ज्ञानातील वैगुण्येही तितकीच आश्चर्यकारक होती. गणितीय सिद्धतेविषयीची त्यांची कल्पना अतिशय संदिग्ध होती. 

मद्रासच्या श्रीनिवास रामानुजन या एका सामान्य कारकुनाचं असामान्य गणिती ज्ञान मद्रासचा इंग्रज कस्टम ऑफिसर ट्रिनीटी कॉलेजमधील जी. एच. हार्डी या गणितज्ञाच्या लक्षात आणून देतो. हार्डी त्याला १९१३ साली केंब्रिजला बोलावून घेतो. रामानुजनची विधवा सनातनी आई समुद्रपर्यटन निषिद्ध मानणारी असते. तिची समजूत घालून आणि तरुण पत्नीला घरी सोडून रामानुजन इंग्लंडला पोचतो. रामानुजनचे निर्भेळ गणिती सिद्धान्त बरोबर असले तरी त्यासाठी इतर गणितज्ञांना पटतील असे पुरावे देण्याचा आग्रह हार्डी धरतो. त्यावरून दोघांमध्ये वाद होतात. रामानुजनचे सिद्धान्त केम्ब्रिजच्या दृढ्ढाचार्यांना मान्य करायला लावून त्याला रॉयल सोसायटीचा फेलो करण्याचा हार्डीचा पहिला प्रयत्न असफल होतो, पण दुसऱ्या खेपेस यशस्वी होऊन रामानुजनला फेलो होण्याचा मान मिळतो.

रामानुजनच्या मते प्रत्येक समीकरण ईश्वराशी निगडित असतं, तर हार्डी पडला पूर्ण नास्तिक. पण ही मतभिन्नता त्यांच्या बौद्धिक किंवा वैयक्तिक मैत्रीच्या आड येत नाही. हे होत असताना पाच वर्षांच्या इंग्लंडमधील वास्तव्यात रामानुजनला क्षयाची सुरुवात झालेली असते. शाकाहारी रामानुजनच्या जेवणाचेही हाल होतात. भारतात परतल्यावर एका  वर्षातच वयाच्या ३२ व्या वर्षी तो मृत्यू पावतो. इंग्लंडमधील टॅक्सीत बसण्याच्या वेळेस तिचा १७२९ हा नंबर दोन घनांची बेरीज असलेला सर्वांत लहान आकडा आहे हे रामानुजन दाखवून देतो. गणितातल्या अशा काही विक्षिप्त संख्यांना आजही taxicab numbers असं संबोधलं जात.
विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi

विलहम कॉनरैड रॉटजन का जन्‍म 27 मार्च, 1845 को जर्मनी के लेन्‍नेप में हुआ और वह नीदरलैंड में पले-बढ़े। उन्‍होंने मेकेनिकल इंजीनियरिंग की ओर 1869 में पीएच.डी. की डिग्री प्राप्‍त की। रॉटजन ने सन् 1901 के एक्स रे की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार जीता। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लैबोरेटरी असिस्‍टेंट के रूप में कार्य किया। इसके बाद कुछ जगह प्रोफरेसर, कहीं डायरेक्‍टर बनकर स्‍कॉलर के रूप में ऊपर उठते गए।
विलहम कॉनरैड रॉटजन की जीवनी। Wilhelm Rontgen Biography in Hindi
Wilhelm Rontgen
रॉटजन ने 8 नवंबर, 1895 को संयोगवश ही एक खोज कर ली, जब वह क्रूक्‍स ट्यूब (एक कांच की निर्वात नली, जिसके दोनों ओर इलेक्‍ट्रॉड थे) से होने वाले उत्‍सर्जन की जांच कर रहे थे। जिस उत्‍सर्जन को रॉटजन देख रहे थे। वह कैथोड किरणें थीं, जो अत्‍यधिक गति वाले इलेक्‍ट्रॉन्‍स से बनी थीं, जिससे नेगेटिव इलेक्‍ट्रॉड बाहर आते थे, जब क्रूक्‍स ट्यूब के इलेक्‍ट्रॉड पर वोल्‍टेज एप्‍लाई किया जाता, तब निर्वात पर्याप्‍त शक्‍तिशाली होता है और वोल्‍टेज उस पर एप्‍लाई किया जाता है तब कैथोड किरणें निर्वात नली को चमका रही थीं। यह वह चमक थी, जिसे विलहम कॉनरैड रॉटजन देख रहे थे, जब उन्‍होंने अपनी खोज की।
रॉटजन एक एलयूमिनियम खिड़की के बिना क्रूक्‍स टृयूब का उपयोग कर रहे थे और उन्‍होंने नली को काले गत्‍ते से घेरा हुआ था, ताकिवह ट्यूब को चमकते हुए अच्‍छे तरीके से देख सकें। इसलिये जब उन्‍होंने ने देखा कि एक चमक बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन से आ रही है, जो थोड़ी ही दूर थी, वह जानते थे कि इसका कारण कैथोड किरणें नहीं हैं, क्‍योंकि कैथोड किरणें न तो कांच की नली से, न ही गत्‍ते से गुजर सकती हैं। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने इसे प्रमाणित करने के लिये कई और परीक्षण किये के क्रूक्‍स ट्यूब उस उत्‍सर्जन का स्‍त्रोत है, जो स्‍क्रीन को चमका रहा है। उन्‍होंने अनुमान लगाया कि ये उत्‍सर्जन उनकी तरह के सभी उत्‍सर्जनों में उपस्‍थित थे, लेकिन वह पहले थे, जिन्‍होंने इन्‍हें नोटिस किया।
विलहम कॉनरैड रॉटजन ने नये खोजे हुए उत्‍सर्जन को एक्‍स-रे (गणित में एक्‍स अज्ञात का प्रतीक है) ना‍म दिया और इसके प्रमाण के लिये आगे और कार्य किया। उन्‍होंने देखा कि मेज की दराज में एक फोटोग्रॉफिक प्‍लेट रखी थी, उसी कमरे में, जिसमें क्रूक्‍स ट्यूब थी और नोटिस किया कि वह अनावृत हो गई है। जब उन्‍होंने इसे विकसित किया, तो उन्‍हें उस पर चाबी की इमेज मिली, जो मेज पर रखी थी, उन्‍हें समझ में आया कि एक्‍स-रे आसानी से मेज की लकड़ी के पार हो जाती है, लेकिन चॉबी की धातु से कम अंश में। बैरियम प्‍लैटिनोसायनाइड से पेंट की हुई स्‍क्रीन और एक क्रूक्‍स ट्यूब का उपयोग करके विलहम कॉनरैड रॉटजन ने लेड की डिस्‍क की एक इमेज उत्‍पन्‍न की और उनकी उंगलिया की हड्डी की, जो उस डिस्‍क को पकड़े हुए थीं।
उनके प्रयोगों ने यह दिखा दिया एक्‍स-रे अलग-अलग सामाग्रियों से अलग-अलग अंशों में पार होती हैं। जब उनकी इस खोज को सार्वजनिक किया गया, तो सारे विश्‍व में एक्‍स-रे के बारे में सनसनी फैल गई। इसे विलहम कॉनरैड रॉटजन किरणें का नाम भी दिया गया। रोग की पहचान में इसके चिकिस्‍तकीय उपयोग तुरंत ही प्रारंभ हो गये। एक्‍स-रे का इस्‍तेमाल चिकित्‍सीय उपचार, दंत परीक्षण, औद्योगिक निरीक्षण और कई दूसरे क्षेत्रों में किया जाने लगा। विलहम कॉनरैड रॉटजन ने अपने तीन वैज्ञानिक पत्रों में एक्‍स–रे के कई आधारभूत नियमों का वर्णन किया, जो 1895, 1896 और 1897 में प्रकाशित हुए। उन्‍हें 1901 में नोबल पुरस्‍कार मिला। 10 फरवरी, 1923 को उनका निधन हो गया। 
बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi

बादल पर बाल कविता - Poem on Clouds in Hindi
Poem on Clouds in Hindi : दोस्तों आज हमने बादल पर बाल कविताएं लिखी है क्योंकि बादल हमारे जीवन में एक अहम स्थान रखते हैं वे बरसात कराते हैं धरती की प्यास बुझाते हैं। बादल बच्चों को बहुत आकर्षक लगते हैं। इसीलिए आज हमने बादल पर कुछ कविताएं पोस्ट की हैं जो छोटे बच्चों को बहुत पसंद आएँगी। 

यदि मैं बादल बन जाऊं

कितना ही अच्छा हो,
यदि मैं बादल बन जाऊं। 
नीले नीले आसमान में,
इधर-उधर मंडराऊं। 
जब भी देखूं सूखी धरती,
झट से पिघल में जाऊं। 
गर्मी से तंग लोगों को,
ठंडक में पहुंचाओ। 
खुशी खुशी से गड़ गड़ करके,
छम छम बुंदे लाऊं। 
इसीलिए तो कहता हूं,
मैं बादल बन जाऊं। 
लेखक : अज्ञात 

झूम-झूम कर बरसे बादल।

झूम-झूम कर बरसे बादल।
गरज-गरज कर बरसे बादल॥
समन्दर से भर कर पानी।
घूमड़-घूमड़ कर बरसे बादल॥
काले, भूरे और घने ये।
सब हिल-मिलकर बरसे बादल॥
खेत, खलिहान, नदी, नालों पर।
ठहर-ठहर कर बरसे बादल॥
जीवन, जहीर और जॉन के।
खुले सिर पर बरसे बादल॥
प्रेम-प्यार और अमन चैन का।
आंचल भर कर बरसे बादल॥
लेखक : परमानंद शर्मा 'अमन'
प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध। Short Essay on Plastic Pollution in Hindi

प्लास्टिक हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसे किसी भी मनचाहे आकार में ढाला जा सकता है। यह अन्य सामग्रियों की तुलना में सस्ती होती है तथा टिकाऊ भी होती है। यह हमारे प्रतिदिन के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन किसी भी दूसरी चीज की तरह प्लास्टिक के कई फायदे हैं तो इससे नुकसान भी हैं। यह हमारे पर्यावरण के लिए हानिकारक है। यह आसानी से अपघटित नहीं होती और इसे जलाने पर वायुमंडल प्रदूषित होता है। 

प्लास्टिक के हानिकारक प्रभाव : जब प्लास्टिक का निर्माण किया जाता है तो इसके निर्माण के दौरान विषैला धुआ निकलता है। जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए तो उत्तरदाई है ही, वायु प्रदूषण भी फैलाता है। प्लास्टिक के सामान नालियों को चोक करते हैं और सीवरेज सिस्टम को नष्ट करते हैं। इसलिए, यह आवश्यक है कि इन चीजों के उपयोग पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाए। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए जन जागरूकता आवश्यक है।

महासागरीय प्रदूषण : प्लास्टिक की वस्तुओं का आसानी से क्षय  नहीं होता इसलिए उन्हें समुद्र में छोड़ दिया जाता है। समुद्र में प्लास्टिक का तेजी से क्षरण होता है। लेकिन क्षरण के दौरान यह समुद्र में हानिकारक विषय रसायन विसर्जित करती है, जिससे समुद्र में रहने वाले जलीय जीवो पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। समुद्र में विभिन्न प्रकार का कचरा फेंका जाता है जैसे :-प्लास्टिक के बर्तन, पॉलीथिन, बोतलें आदि जो समुद्र में तैरते रहते हैं। नतीजतन समुद्र के भीतर पर्याप्त मात्रा में सूरज का प्रकाश प्रवेश नहीं कर पाता। इस प्रकार यह समुद्र के भीतर वनस्पतियों के विकसित होने में बाधा उत्पन्न करता है। 

उपसंहार : जहां समस्या होती है वहां समाधान भी होता है। इसी तरह प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का भी समाधान है। हमें अपनी धरती को स्वच्छ, रहने योग्य और प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए केवल एक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।  आज हम जिस प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का सामना कर रहे हैं। उस पर अंकुश लगाने के लिए हमें कुछ उपाय अपनाने होंगे जैसे रीसाइकिल्ड और बायोडिग्रेडेबल सामग्री का उपयोग करना। हमें प्लास्टिक बैग के स्थान पर पेपर बैग या जूट के बने हुए बैग का उपयोग करना चाहिए। प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण या बिक्री पर रोक लगाने के लिए नियमों को अधिक सख्त बनाने की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि ऐसे उत्पादों के किसी भी अवैध निर्माण या बिक्री से संबंधित मामले की सख्ती से जांच होनी चाहिए।