Friday, 21 September 2018

छोटे भाई को धूम्रपान की हानियों का वर्णन करते हुए पत्र

छोटे भाई को धूम्रपान की हानियों का वर्णन करते हुए पत्र

छोटे भाई को धूम्रपान की हानियों का वर्णन करते हुए पत्र 

chote bhai ko patra
15-B ब्लॉक
कुतुब रोड दिल्ली 
दिनांक : 2 मार्च 2018 
प्रिय मनोज,
कल आप के छात्रावास से लौटा तो मन कुछ उदास और भावी आशंका से बड़ा खिन्न रहा। वहां कुछ विद्यार्थियों को सिगरेट पीते देखकर आप पर भी उसका प्रभाव पड़ने की संभावना सी दिखने लगी। वैसे तो मुझे आप पर पूर्ण विश्वास है कि आप भूलकर भी ऐसे विद्यार्थियों की संगति ना करेंगे, फिर भी धूम्रपान के कारण होने वाली कुछ एक हानियों से मैं आपको सूचित करना अपना कर्तव्य मानता हूं।

धूम्रपान स्वास्थ्य का नाश करने वाला होता है। वह अनेक प्रकार की बुरी आदतों को जन्म देने वाला होता है, शिष्टाचार के विरुद्ध एक गंदा व्यसन है। आपको विदित है कि सिगरेट, 20, बीड़ी, तंबाकू, चरस, अफीम इत्यादि वस्तुओं का धुआं हमारे फेफड़ों के लिए हानिकारक होता है। इससे खांसी दमा कैंसर तथा क्षय रोग जैसी बीमारियां एक स्वस्थ मनुष्य को लग जाती हैं जो उसे घुन की भांति खाकर खोखला कर जाती हैं। धूम्रपान करने वाले को और भी कई व्यसन आ घेरते हैं। झूठ बोलकर तथा चोरी करके पैसे लेना, बुरी संगति, शराब, जुआ का आदि बन जाना इत्यादि।

धूम्रपान से अपव्यय होता है वही पैसा यदि फल या पौष्टिक आहार पर व्यय किया जाए तो स्वास्थ्य बनता है। जबकि धूम्रपान पर खर्च करके हम अपना स्वास्थ्य अपने हाथों खो देते हैं। अतः मेरी आपको यही सलाह है कि आप इस बुराई से बचकर रहे तथा यदि आप किसी को आपसे तो मुझे भूलकर भी इस दुर्व्यसन को अपनाने की आशा नहीं हो सकती। आशा है कि आप सावधान रहोगे।
आपका भाई 
सुरेश गोयल

Thursday, 20 September 2018

परीक्षा में असफल होने पर मित्र को सहानुभूति पत्र

परीक्षा में असफल होने पर मित्र को सहानुभूति पत्र

परीक्षा में असफल होने पर मित्र को सहानुभूति पत्र

pariksha me asafal hone par mitra ko patra
राजकीय माध्यमिक बाल विद्यालय,
रामनगर, नई दिल्ली।
दिनांक 15 जून 1992
प्रिय मित्र रमेश,
मुझे यह जानकर बहुत दुख हुआ कि तुम जब दसवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए हो। तुम्हारे सहपाठी रवि ने बताया कि इससे तुम्हें निराशा हुई है। मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि निराश होना बेकार है। इस समय तुम्हारा कर्तव्य है, फिर से कमर कसकर भविष्य में सफलता प्राप्ति के लिए तैयार होना, नाकी निराश होकर घर के कोने में दुबक कर आंसू बहाना। किसी कवि ने कहा है एक बार यदि सफल ना हो तो पुनः करो उद्योग।

वह कहानी भी तुम भूले नहीं होगे कि किस प्रकार एक मकड़ी ने 10 बार गिरकर भी साहस नहीं छोड़ा था और वह ऊंची दीवार पर चढ़ने में सफल हो गई थी। दूर क्यों जाते हो, अपने जीवन के वह दिन स्मरण करो, जब तुम हिंदी और गणित में बहुत कमजोर हुआ करते थे। क्या वह दिन भूल गए, जब हमने और तुमने मिलकर प्रतिज्ञा की थी कि छमाही तक हम अपनी सारी कमजोरी दूर करके रहेंगे, नहीं तो फुटबॉल नहीं खेलेंगे। फिर मैंने और तुमने पढ़ाई में दिन रात एक कर दिए थे। छमाही में जब परिणाम निकला तो हम दोनों सब विषयों में उत्तीर्ण थे। मित्र, सच पूछो तो तुम्हें गर्व होना चाहिए कि निर्धनता और घरेलू काम का इतना भार होते हुए भी तुम विद्यालय में पढ़ने का उचित अवसर पा रहे हो। यदि कोई साधारण छात्र होता तो वह कब का हिम्मत हार चुका होता। देखते नहीं, अन्य सब विषयों में तुमने कितने अधिक अंक प्राप्त किए हैं। तुम केवल अंग्रेजी में अनुत्तीर्ण हो, वह भी केवल 5 अंकों की कमी से।

अनुत्तीर्ण होना कोई असाधारण बात नहीं है इसलिए मित्र साहस मत छोड़ो। कमर कस लो। उठो। अभी और इसी क्षण से तैयारी करना शुरु कर दो और निरीक्षण करो कि इंग्लिश विषय में तुम्हारी क्या-क्या कमियां हैं और अपनी असफलता का कारण ढूंढो। बस, फिर अपनी कमियों पर विजय पाने के लिए जुट जाओ। अगले वर्ष तुम अवश्य सफल होंगे। सफल ही नहीं, अब तुम प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर दिखाना।
तुम्हारा मित्र
राकेश

Wednesday, 19 September 2018

मेरा गाँव पर हिंदी निबंध

मेरा गाँव पर हिंदी निबंध

मेरा आदर्श गाँव पर हिंदी निबंध

mera-adarsh-gaon-hindi-nibandh
मानव सृष्टि के आदि आश्रय स्थल और पालक गांव, जो वास्तव में आज भी उसका पालन कर रहे हैं। परंतु आज गांव का नाम सुनकर ही शहरों की चकाचौंध और बनावटी वातावरण में रहने वाले लोग अक्सर नाक भौं सिकोड़ना करते हैं। वह यह भूल जाते हैं कि अपने मुख्य सांस्कृतिक परिवेश में विश्व के अन्य सभी देशों महानगरों के समान भारत वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। इसकी सभी प्रकार की स्थितियों की रीढ़ आज भी गांव ही है। इस दृष्टि से वास्तव में मेरा गांव आदर्श है। मेरा गांव थोड़े से घरों की एक छोटी सी बस्ती है। मिट्टी के घर, खपरैलों की छतें, आंगन में बंधे हुए दो-दो जोड़ी बैल, एक-दो गाय-भैंस जैसे दुधारू पशु, चार-छह मुर्गे-मुर्गियों और सामने लहलहाते हुए खेत, यही है मेरा वह संसार जिसमे मैंने अपनी पलकें खोली। मेरे सुनहले बचपन का मनोरम क्रीड़ास्थल भी बस इतना सा ही है।

प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है। गांव में चक्की के मधुर गीत से ही सवेरा आरंभ होता है। वहां उषा की लालिमा अपने हाथों में सोने की थाल लिए नित्य नए दिन की आरती उतारती है। वृक्षों और लता कुंजो पर बैठे चहचहाते हुए पक्षी प्रभात बेला का स्वागत करते हैं और सूर्य की पहली किरण के साथ उठकर गांव का किसान खेत की ओर चल पड़ता है। जब हल कंधे पर रखकर अपने सखा समान बैलों को हांकता हुआ वह जाता है, तो बैलों के गले में बंधी हुई घंटियों से सारा वातावरण संगीतमय हो उठता है। ऐसा है सुंदर, सपने सलोना मेरा गांव।

इन गांवों में धरती के वे लाल बसते हैं जो खेतों की मिट्टी और नहरों के पानी में सनकर हिम्मत से काम करते और हरियाली का आवाहन करते हैं। जहां-जहां उनके शरीर का पसीना गिरता है, वहां-वहां चांदी जैसे चमकीले और मोतियों जैसे मोटे गेहूं के दाने उगते हैं। जो भूखे के पेट की भूख को शांत करते हैं, जवानों की नसों में नया रक्त बनाते हैं और हमारे देश के उन बुद्धिमानों के मस्तिष्क में नई सूझ व नई प्रेरणा बनकर उन नीतियों का निर्धारण करते हैं जो राष्ट्र की समस्याएं सुलझाती और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में सम्मान पाती हैं। इस प्रकार हर बात का मूल बीज गांवों की उर्वरा भूमि में ही छिपकर अंकुरित हुआ करता है।

हमारे गांव में अभी-अभी एक नहर आ पहुंची है। नहर नहीं उसे जीवन की धारा कहिए, क्योंकि जहां-जहां भी वह पहुंची है, सूखे खेतों में नया जीवन लहलहा उठा है। बंजर भूमि भी सोना उगलने लगी है। स्वयं उन्नत होकर मेरा गांव देश की उन्नति में भी भागीदारी निभाने लगा है। जिस दिन मेरे गांव में बिजली का पहला खंभा लगा उस दिन गांव वालों ने दिवाली मनाई थी। आज घर-घर बिजली के प्रकाश से जगमगा उठा है। ट्यूबवेल बिजली की शक्तियां बिजली की मशीनें। बिजली के सहारे चलने वाले कई कुटीर उद्योग गांव का कायाकल्प करने के लिए दिन रात एक कर रहे हैं। बेरोजगारों को वर्षभर रोजगार मिलने लगा है। यहां की महिलाएं पहले दूरदराज के पनघट से पानी भर कर लाया करती थी। आज बिजली ने पानी पास में ही सुलभ कर दिया है।

जब हम घर-द्वार से दूर किसी नगर में या वहां से भी दूर परदेश में होते हैं तो भी अपना गांव स्वप्न बनकर हमारे ह्रदय में समाया रहता है। रह-रहकर उसका स्मरण तन मन में उत्तेजना भरता रहता है। मेरे लिए मेरी मातृभूमि का यही पवित्र आंचल है, यही मेरा स्वर्ग है। मैं अपने गांव से प्यार करता हूं और मुझे मेरा गांव बहुत प्यार करता है। मेरा गांव मेरे सारे देश का प्रतीक बने, सारा देश मेरे गांव के समान ही लहलहा उठे, यही मेरी कामना और प्रयत्न है। हम सभी को इसी ढंग से सोचना समझना चाहिए।

Tuesday, 18 September 2018

शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन पत्र

शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन पत्र

शिक्षक की नौकरी के लिए आवेदन पत्र

shikshak ki naukri ke liye aavedan patra
28, निरंकारी कॉलोनी,
दिल्ली।
दिनांक 15 अगस्त 2018
सेवा में,
       श्रीयुत शिक्षा निदेशक महोदय,
       शिक्षा निदेशालय,
       पुराना सचिवालय, दिल्ली।
विषय : सामान्य प्रशिक्षित स्नातक के अध्यापक पद के लिए आवेदन पत्र।
महोदय,
       ‘दैनिक हिंदुस्तान’ दिनांक 17, 2018 में प्रकाशित विज्ञापन के संदर्भ में, मैं हिंदी विषय के अध्यापक पद के लिए अपनी सेवाएं प्रस्तुत करता हूं। मेरा पूर्ण शैक्षिक विवरण निम्नलिखित रुप से है:-
1.      नाम                                            अविनाश अग्रवाल
2.       जन्मतिथि                                  4 अगस्त 1980
3.       राष्ट्रीयता                                    भारतीय
4.       घर का पता                                 172 पश्चिमी विकासपुरी, दिल्ली।
5.       शिक्षा                                          इंग्लिश द्वितीय श्रेणी, B.A. 55% अंक,
                                                            (i)   विषय-हिंदी, अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, इतिहास।
                                                            (ii)  B.Ed -प्रथम व्यावहारिक परीक्षा में, तथा द्वितीय सिद्धांत में।
6.       अनुभव                                                     नगर निगम विद्यालय में 2 वर्ष का अध्यापन।
7.       विशेष                                                       मेरी माताजी और पिताजी दोनों ही अध्यापक हैं।
आशा है कि उपर्युक्त विवरण को हृदयंगम करते हुए मुझे अपने विभाग में नियुक्ति देकर अनुग्रहित करेंगे। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि अपनी योग्यता और कार्यकुशलता से आपको सर्वदा सर्वथा संतुष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।
       अनुकूल तथा सहानुभूतिपूर्ण उत्तर की प्रतीक्षा में-
भवदीय,
अविनाश अग्रवाल
संलग्न:- हाई स्कूल हायर सेकेंडरी b.a., m.a., B.Ed प्रमाण पत्रों की सत्यापित प्रतिलिपिया।

Monday, 17 September 2018

जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय पर निबंध

जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय पर निबंध

जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय पर निबंध

यह एक अतिप्रचलित कथन है, जिसका तात्पर्य यह है कि जिसकी रक्षा ईश्वर स्वयं करना चाहते हैं, उसे कोई भी मार नहीं सकता, चाहे संपूर्ण संसार दुश्मन हो जाए लेकिन कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर सकता। ईश्वर जब तक किसी व्यक्ति के साथ होते हैं तब तक कोई भी उस व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। भगवान जिसे आश्रय प्रदान करते हैं, वह सुरक्षित हो जाता है। अतः जिसकी वे रक्षा करते हैं, उसे कोई कदापि नहीं मार सकता। 
हमारी यह मान्यता रही है कि संपूर्ण सृष्टि ईश्वर निर्मित है। उन्होंने ही संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माण किया है। विभिन्न ग्रह, पृथ्वी, समुद्र, पर्वत, नदियां, विभिन्न प्राणी, मनुष्य आदि सभी उन्ही की रचना है। जड़-चेतन सभी उन्हीं की इच्छा का परिणाम बताए गए हैं। तात्पर्य यह है कि भगवान सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है तथा जन्म और मृत्यु दोनों के संचालक माने गए हैं। इसी कारण लोग यह मानते हैं कि ईश्वर की कृपा जिस पर हो जाती है, उसे कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा सकता क्योंकि सब कुछ का संचालक तो स्वयं ईश्वर ही है। 

जो चीज निर्मित होती है उसे नष्ट भी होना है। जो उत्पन्न हुआ है उसकी समाप्ति भी निश्चित है। इसी प्रकार जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी तय है, लेकिन समय से पूर्व किसी दुर्घटना का शिकार होने पर भी यदि कोई मृत्यु से बच जाता है, तो उसमें दैवीय शक्ति का ही हाथ मानना चाहिए। परमात्मा यदि किसी से प्रसन्न है तो वह उसे सभी प्रकार की आपदाओं से सुरक्षित रखते हैं। हम देखते हैं कि बाग-बगीचों में प्रयत्नपूर्वक लगाए गए पौधे नष्ट हो जाते हैं परंतु जंगल में अपने आप उत्पन्न पौधे, जिन की रक्षा और सिंचाई की कोई प्रवाह नहीं करता, वे हरे भरे तथा विकसित हो जाते हैं। इससे यही पता चलता है कि भगवान जिसकी रक्षा करते हैं उसका कुछ भी नहीं बिगड़ सकता और जिनकी मृत्यु भाग्य में होती है, में तमाम उपाय करने के बाद भी वह बाख नहीं सकता।

भारतीय संस्कृति में कई ऐसी कहानियां प्रचलित हैं जो बताती हैं कि परमात्मा की कृपा प्राप्त अकेला होते हुए भी सुरक्षित रहा और उसे मारने के विभिन्न उपाय विफल हो गए। भक्त प्रहलाद को उसके पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने मारने के कई प्रयत्न किए, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ा। अपितु हिरण्यकश्यप को ही भगवान ने प्रकट होकर मार डाला तथा अपने भक्त की रक्षा की। इसी प्रकार कृष्णभक्त मीरा को मारने के लिए मेवाड़ के राजा विक्रमादित्य ने विष का प्याला, सांप आदि भेजा, परंतु मीरा का बाल बांका भी न हो सका। कबीर को मारने के लिए उन्हें जंजीर से बांधकर गंगा नदी में डाल दिया गया, परंतु उन्हें कुछ नहीं हुआ और वह सुरक्षित नदी से बाहर आ गए। आज के समय में भी हम किसी प्राकृतिक आपदा या दुर्घटना में लोगों के जीवित बचे जाने की खबर समाचार पत्र में पढ़ते हैं या टेलीविजन पर देखते हैं। इस प्रकार सुरक्षित बच निकलना चमत्कार प्रतीत होता है। इससे सिद्ध होता है कि भगवान जिसकी रक्षा करते हैं उसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। जब ईश्वर का आदेश होता है तभी वह हंसते-हंसते प्राण छोड़ते हैं उससे पहले नहीं।

ईश्वर किसी की रक्षा कैसे करते हैं, इस विषय में कई तरह के मत हो सकते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति खतरे में पड़ा होने के बाद भी सुरक्षित निकलता है या कई बार किसी आपदा में बड़ी संख्या में लोगों के मर जाने के बाद भी जीवित बच निकलता है तो उसे हम दैवीय कृपा मान लेते हैं। वस्तुतः कई ऐसे साधन उपस्थित हो जाते हैं, जिनसे व्यक्ति खतरे में पड़ा होने के बावजूद भी सुरक्षित हो जाता है। उदाहरण के लिए पांडवों को मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षाग्रह बनवाया। पांडवों को इसकी जानकारी भी नहीं थी, लेकिन विदुर के गुप्त संदेश से वे उससे बच निकले और फिर पांचाल जाकर स्वयं द्रौपदी का वरण किया। दुर्योधन कुछ और ही करना चाहता था, परंतु ईश्वरीय साधनों के द्वारा पांडव न केवल सुरक्षित ही रहे, बल्कि अधिक शक्तिशाली भी हो गए। अतः भगवान की कृपा किस रूप में और किस माध्यम से प्राप्त हो जाए यह कोई भी नहीं जान सकता। लेकिन चमत्कार होने पर हम उसे भगवत कृपा ही समझते हैं और ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।

अतः इस सूक्ति से हमें प्रेरणा मिलती है कि जब तक हमारा जीवन है, तब तक हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हमें सांसारिक लोगों से अधिक उस सर्वशक्तिमान भगवान पर भरोसा रखना चाहिए। इसलिए हमें किसी से डरने या भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। यदि ईश्वर की कृपा हम पर होगी तो वे स्वयं हमारी रक्षा और समृद्धि के साधन प्रस्तुत कर देंगे। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि हम सद्मार्ग पर चलें, सत्य और न्याय का साथ दें, परोपकार करें, दीन-दुखियों की सहायता करें एवं प्राणीमात्र के कल्याण के लिए तत्पर रहें। जो ईश्वर को सदा अपने साथ समझता है तथा पीड़ित-दुखियों की सेवा करता है, परमात्मा भी उसकी रक्षा के लिए अवश्य आते हैं।

Sunday, 16 September 2018

मित्र की माता की मृत्यु पर संवेदना पत्र

मित्र की माता की मृत्यु पर संवेदना पत्र

मित्र की माता की मृत्यु पर संवेदना पत्र

samvedna patra
71-ए करोल बाग 
नई दिल्ली। 
दिनांक 10 मार्च 2018 
प्रिय मित्र राकेश, 
       आज प्रातः अपने सहपाठी तथा मित्र रवि की जबानी तुम्हारी पूजनीय माता जी के स्वर्गवास की बात जानकर मैं स्तब्ध रह गया। पहले तो मुझे इस घटना पर विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि अभी पिछले महीने ही जब नैनीताल से लौटते हुए मैंने उनके दर्शन किए थे तो वह स्वस्थ थी। वक़्त अचानक ही झपट कर उन्हें हमसे इतनी जल्दी ले जाएगा, इसकी मुझे कल्पना भी ना थी। इस स्थिति में आप की माता जी के देहावसान का समाचार सुनकर मुझे अत्यधिक दुख पहुंचा है। 
उनकी मृत्यु का दुखद समाचार सुनकर एक बार उनकी सौम्य में मूर्ति मेरी आंखों के सम्मुख घूम गई। रह-रहकर मुझे उनके वे आशीर्वाद और उपदेश स्मरण आते हैं, जिनकी वह हम पर वर्षा किया करती थी। हाय, सचमुच अब हम उन्हें कभी ना देख सकेंगे। 
मित्रवर, काल की यही गति है। सभी प्राणियों का यही अंत है यह सोचकर हमें अपने मन में धैर्य धारण करना पड़ता है। मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि वह तुम्हें इस महान आगाज आघात को सहन करने की शक्ति दे तथा दिवंगत आत्मा को सद्गति प्रदान करें। 
तुम्हारा सह्रदय 
कृष्ण

Saturday, 15 September 2018

जिला अधिकारी को टाइपिस्ट क्लर्क पद के लिए आवेदन पत्र।

जिला अधिकारी को टाइपिस्ट क्लर्क पद के लिए आवेदन पत्र।

जिला अधिकारी को टाइपिस्ट क्लर्क पद के लिए आवेदन पत्र

jila adhikari ko avedan patra
सेवा में, 
           जिलाधीश महोदय, 
           नॉर्थ ब्लॉक जिला कार्यालय, 
           दिल्ली। 
माननीय महोदय, 
साप्ताहिक रोजगार समाचार में यह पढ़कर, दूरदर्शन पर घोषणा सुनकर पता चला कि आप के कार्यालय में टाइपिस्ट क्लर्कों के कुछ पद रिक्त हैं। उसमें से एक पद के लिए अपनी सेवाएं अर्पित करते हुए मुझे हर्ष हो रहा है। मेरा पूर्ण ब्यौरा, शैक्षिक योग्यता तथा अन्य विवरण इस प्रकार हैं :

नाम                                      मनोज कुमार गुप्त
पिता का नाम                        श्री मोहन कुमार गुप्त
जन्मतिथि                            9 नवंबर 1995 
शिक्षा                                    प्रथम श्रेणी में 12वीं पास 

अन्य योग्यताएं : 
       मैं पिछले 2 वर्षों से अंग्रेजी तथा हिंदी टाइपिंग सीख कर उनका निरंतर अभ्यास कर रहा हूं। मेरी अंग्रेजी हिंदी दोनों में टाइप करने की गति 40 शब्द प्रति मिनट से भी अधिक है। इसके साथ-साथ मुझे फाइलिंग आदि उन कार्यों का भी काफी अनुभव है, जो किसी कार्यालय में आवश्यक होते हैं। क्रिकेट और हॉकी के खेलों में भी मेरी विशेष रूचि है। 
      आशा है, मेरी इन योग्यताओं का ध्यान रखते हुए मुझे सेवा का यह अवसर अवश्य प्रदान किया जाएगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि अपने कर्तव्य पालन में कभी कोई कमी नहीं छोडूंगा।
 धन्यवाद। 
दिनांक 15 नवंबर 20XX 
भवदीय 
मनोज कुमार गुप्ता 
पता : श्री मोहन कुमार गुप्त, 
         30, कुंज गली, मधु विहार, 
         दिल्ली-25 

संलग्न : एक शिक्षा योग्यता का प्रमाण पत्र। 
              टाइपिंग गति का प्रमाण पत्र। 
              खेल योग्यता के प्रमाण पत्र। 
              चरित्र प्रमाण पत्र।

Friday, 14 September 2018

नर हो न निराश करो मन को पर निबंध

नर हो न निराश करो मन को पर निबंध

नर हो न निराश करो मन को पर निबंध

nar ho na nirash karo man ko par nibandh
संसार में छोटे-बड़े अनेक प्राणी रहते हैं। उनकी वास्तविक संख्या का ज्ञान अभी तक शायद किसी को भी नहीं है। फिर भी हमारे देश की परंपरा में माना जाता है की 8400000 योनियों को भोगने के बाद अच्छे कर्म करने के बल पर, मनुष्य का जन्म मिला करता है। इस मान्यता का अर्थ हुआ कि संसार में जन्म लेने वाले प्राणियों की संख्या कम से कम 8400000 तो है ही। क्योंकि उन सबके कष्ट भोगने के बाद मनुष्य का जन्म मिल पाता है, इस प्रकार कहा जा सकता है कि मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। श्रेष्ठ प्राणी होकर भी यदि किसी कारणवश मनुष्य उदास या निराश हो जाता है तो इसे उचित और अच्छी बात नहीं कहा जा सकता। विषय से संबंधित शीर्षक पंक्ति का सामान्य अर्थ यही किया जा सकता है।

नर शब्द एक जातिवाचक संज्ञा है। किसका मुख्य अर्थ तो मनुष्य ही लिया जाता है परंतु इस संज्ञा का एक भाववाचक अर्थ भी लिया जाता है। एक आम प्रयोग में आने वाले वाक्य में इस भावात्मक अर्थ को ठीक से समझा जा सकता है। अक्सर बातचीत में किसी वीर, साहसी और क्रियाशील व्यक्ति के लिए कहा जाता है कि वह तो बड़ा नर आदमी है। साधारण अर्थ में नर और आदमी एक ही अर्थ हैं पर जब आदमी संज्ञा के साथ नर का विशेषण के तौर पर प्रयोग किया जाता है तब नर का अर्थ वीर, साहसी, कर्मशील व्यक्ति हो जाया करता है। हमारे विचार में इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि शीर्षक पंक्ति में कवि ने नर शब्द का प्रयोग आदमी या मनुष्य के अर्थ में तो किया ही है, ऊपर बताए गए विशेषणों के अर्थ में भी किया है। ऐसा मानकर ही हम कवि के कथन की गहराई तक पहुंच सकते हैं। कवि मनुष्यों से कहना चाहता है भाई, आप मनुष्य हो। आप रणवीर, साहसी, और बुद्धिमान व कर्मशील भी हो। ठीक है, अपना कर्म करने पर भी इस बार तुम्हें सफलता नहीं मिल सकती। साहस करके भी मनचाहा फल नहीं पा सके। वीरता और बुद्धिमानी से काम ले कर भी जो चाहते थे, वह नहीं कर पाए। फिर भी इसमें निराश होने की क्या बात है? अरे भाई, यदि इस बार मनचाहा फल नहीं प्राप्त हो सका, को क्या हो गया? निराश और उदास होकर बैठ जाने से काम थोड़े ही चलने वाला है। नहीं, निराशा और उदासी त्यागकर ही कुछ कर पाना संभव हुआ करता है।

तुम नर अर्थात मनुष्य हो। फिर यह क्यों भूल जाते हो कि मनुष्य सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। आखिर इस श्रेष्ठता का कारण क्या है? यही ना कि मनुष्य के पास सोचने-विचारने के लिए बुद्धि होती है। भावना, कल्पना और दृढ़ता के लिए मन होता है। सुख-दुख के क्षणिक भावों से ऊपर और आनंद में लीन रहने वाली जागृत आत्मा रहती है। चलने और दौड़ कर आगे बढ़ने के लिए दो शक्तिशाली पैर होते हैं। कार्य करने के लिए दो मजबूत हाथ होते हैं। फिर वह इन सब का उचित ढंग से प्रयोग करना भी जानता है। इन्हीं सब बातों या विशेषताओं के कारण ही तो मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा गया है। नहीं तो खाना-पीना, सोना, डरना, कामवासना पूरी करके बच्चे पैदा करना आदि काम तो पशु भी कर लेते हैं। यदि जीवन का अर्थ इतना सब करना ही होता, तो फिर मनुष्य और पशु में क्या अंतर रह जाता? वही अंतर तो है ना कि जिनकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। अर्थात मनुष्य के पास बुद्धि और भाव हैं। मनुष्य के पास मनुष्यता के धर्म का ज्ञान है। वह सोच-समझकर योजना बनाकर, लगातार परिश्रम करके काम कर सकता है। सफलता पा सकता है। जबकि पशु के पास यह सारी बातें नहीं होती और वह परिश्रम से सफलता के कार्य नहीं कर सकता। सोच-विचार और भाव की राह पर नहीं चल सकता। इतनी सारी विशेषताएं, गुणों और धर्मों के रहते हुए भी निराश होना। नहीं, ये नरता या मनुष्यता का गुण, धर्म या लक्षण नहीं माना जा सकता।

यह ठीक है कि जीवन के साथ तरह-तरह के सुख-दुख लगे हुए हैं। मनुष्य जीवन के साथ हार-जीत की अनेक कहानियां जुड़ी हुई है। बीमारियां महामारियां आकर भी पीड़ित तथा परेशान करती रहती हैं। प्रकृति के अनेक प्रकार के प्रकोप भी मनुष्य को सहने पड़ते हैं। परंतु इन सब का अर्थ यह कहां है कि निराश होकर बैठ जाओ और कर्तव्यों का पालन या कर्म करना क्या दो। नहीं, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है। नरता या मनुष्यता हिम्मत हारकर, निराश होकर बैठ जाना नहीं है। बल्कि उस तरह की समस्त आपदाओं से लड़ने और संघर्ष करने में नरता है। मनुष्यता की भावना ने ही जागकर आज संसार में बड़े-बड़े और महान कार्य किए हैं। आज तक मनुष्य ने जितनी भी और जहां भी प्रगति की है, नए-नए अन्वेषण और आविष्कार किए हैं, वह सब नर की नरता का जीता-जागता उदाहरण है। सदियों का इतिहास बताता है कि निराशा त्यागकर मनुष्य ने जब जो कुछ करना चाहा वह उसमें अवश्य सफल हुआ। इसलिए यदि किसी कारणवश तुम सफलता नहीं पा सके, तो कोई बात नहीं। अभी भी निराशा छोड़कर कर्म पथ पर डट जाओ। सफलता अवश्य मिलेगी।

मनुष्य के लिए संसार में असंभव कभी कुछ भी नहीं रहा। उसने अपने कर्मों से सब कुछ संभव करके दिखाया है। राष्ट्र निर्माण की इस नवजागरण बेला में तुम्हें भी निराश होकर अपना समय, शक्ति और जीवन नष्ट नहीं करना चाहिए। निराशा और उदासी छोड़कर, लगातार परिश्रम करके उसे सार्थक बनाना चाहिए। नई ताजा मनुष्यता के माथे पर निराशा का कलंक नहीं लगने देना चाहिए। ऐसा सोचना, ऐसा करना ही नरता है।

Thursday, 13 September 2018

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे पर अनुच्छेद लेखन

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे पर अनुच्छेद लेखन

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे पर अनुच्छेद लेखन

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एक आदमी ही दूसरे आदमी के काम आ सकता है, कोई अन्य नहीं। मनुष्य जो कर सकता है, पशु-पक्षी वह सब कभी नहीं कर पाते। इस प्रकार मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहा और समझा जा सकता है। जीने को तो सभी मनुष्य जीते ही हैं, पशु-पक्षी भी अपने-अपने लिए जिया करते हैं, पर केवल अपने या अपनों का स्वार्थ सिद्ध करने के लिए जीना ना तो मनुष्यता का लक्षण है और ना ही सच्चे अर्थों में जीवित रहने का लक्षण ही माना जा सकता है। मनुष्य अपने लिए नहीं, अपने पूरे समाज, पूरे देश, राष्ट्र और सारी मानवता के लिए जिया करता है। इसी कारण वह सर्वश्रेष्ठ और सामाजिक प्राणी माना जाता है। सच्चे मनुष्य का हर कदम, हर कार्य सामूहिक चिंतन और हित साधना की भावना से भरा रहता है। तभी तो कई बार उसे दूसरों के लिए अपने प्राणों का बलिदान करते हुए भी देखा जा सकता है। मनुष्य जीवन में जो अतिथि देवता आदि की कल्पना की गई है, इन्हें देवता के समान महत्व दिया गया है। उसके मूल में भी अपने लिए नहीं, बल्कि सारी मनुष्यता के लिए जीने की परिकल्पना छिपी हुई है। बौद्ध, जैन तीर्थंकर, गांधी आदि महान व्यक्ति महापुरुष इसी कारण माने जाते हैं कि वह लोग केवल अपने लिए नहीं बल्कि मानवता के लिए जिए और मानवता के लिए ही मरे। केवल अपने पेट पर हाथ फेरते रहना, अपने ही घर द्वार की चिंता करना तरह-तरह के भ्रष्टाचारों को जन्म देकर देश का सर्वनाश कर रहा है। इस तथ्य से हम सभी भली भांति परिचित हैं। अतः यदि हम पूरे समाज, देश जाति और राष्ट्र का उत्थान करना चाहते हैं, तो हमें अपने आप का विस्तार सारे राष्ट्र और सारी मानवता में करना होगा। यही सच्ची मनुष्यता और उसका रहस्य है।

Wednesday, 12 September 2018

बीता हुआ समय कभी नहीं लौटता हिंदी निबंध

बीता हुआ समय कभी नहीं लौटता हिंदी निबंध

बीता हुआ समय कभी नहीं लौटता हिंदी निबंध

bita hua samay kabhi wapas nahi aata

संसार में कुछ बातें ऐसी भी हैं, जिन पर बड़े से बड़े, समर्थ से समर्थ व्यक्ति का भी कोई वश नहीं चलता। चाह कर भी कोई कुछ नहीं कर सकता। एकदम लाचार और असमर्थ होकर लौट जाया करता है। यदि सब बातों पर आदमी का वश चल पाता, तो राजा महाराजा और बड़े-बड़े धनवान आदमी कभी भी मरना तो क्या बूढ़े तक ना हो पाते। अपनी इच्छा अनुसार वह लोग किशोर या जवान बने रहते। परंतु ऐसा कोई भी नहीं कर सकता। मैं अगर चाहूं कि 3-4 साल की उम्र में पहुंच जाऊं, जब मैं बिना किसी चिंता के सिर्फ खाया पिया, खेला और सोया करता था, मेरी शरारतों को बच्चा कह कर टाल दिया जाता था, नुकसान करने पर भी मुझे कुछ ना कह सिर्फ प्यार से समझा दिया जाता था, नहीं, उस आयु में आज चाह कर भी मैं नहीं पहुंच सकता। क्योंकि वह सब जो पीछे छूट गया है, बीत गया है, वहां चाहकर भी नहीं पहुंच सकता। आयु का जो भाग हम पीछे छोड़कर आज तक पहुंचे हैं, उसी का नाम है समय। समय, को एक बार बीत कर फिर कभी लौट आ नहीं सकता।

आज मनुष्य ने ज्ञान विज्ञान के सभी क्षेत्रों में बहुत उन्नति कर ली है। जीवन को सुखी और उन्नत बनाने वाले नए-नए आविष्कार कर लिए हैं और नित्यप्रति और आविष्कार करता जा रहा है। भयानक बीमारियों को ठीक करने के लिए नई नई जीवनदायक औषधियां खोजनी है। धरती, आकाश, पाताल, पानी, हवा, आग आदि हर चीज पर अपना अधिकार जमा लिया है। हर चीज मनुष्य के इशारे पर नाचने लगी है, और उसका कहना मान कर चलने को विवश है, पर समय ? नहीं, उस पर आदमी का आज भी कोई वश नहीं है। यदि ऐसा हो पाता तो महंगाई के और मुसीबतों भरे युग को यहीं छोड़ कर हम लोग फिर से उसी सुख समृद्धि भरे युग में पहुंच जाते, जिसे इतिहास में स्वर्ण युग कहा जाता है।

आज बच्चों-बूढ़ों को दूध तक नसीब नहीं हो पाता, यदि समय को वापस ला पाते तो हम उस युग को फिर से धरती पर ले आते जब यहां दूध की नदियां बहती थी। कहीं किसी भी वस्तु का अभाव नहीं था। यदि समय लौट पता तो इस सारी भारत भूमि को फिर से बृज भूमि बना दिया जाता। फिर से कृष्ण की मधुर मुरली गूंजती, जिसे सुनकर सभी सुखचैन और प्रेम भाव में मग्न होकर आनंद मनाते। लेकिन नहीं, आज हम इन सब बातों को केवल पुस्तकों में पढ़ सकते हैं। सबके सुखचैन भरे जीवन की मात्र कल्पना कर सकते हैं, पर चाह कर भी उस समय में लौट नहीं सकते। यही वह समय है, जिसे वापस नहीं लाया जा सकता।

सच तो यह है कि अगर बीता हुआ समय लौट पाता तो मानव आलसी बन कर आज भी किसी पत्थर युग में पड़ा रहकर प्रकृति के हर प्रकोप को सामान्य पशु के समान सहन कर रहा होता। मानव ने जो इतनी प्रगति करके विकास किया है, वह कभी भी ना कर पाता। जीवन में कुछ भी नयापन नहीं आ पाता। सभी कुछ बासी और सड़ा-गला ही होता। समय को हम पानी की बहती धारा कह सकते हैं। जैसे बहता हुआ पानी ही स्वच्छ और प्राण दायक रह पाता है, उसी प्रकार अनवरत बीत रहा समय ही मनुष्य जीवन में नवीनता, स्वच्छता और उच्च प्रगतिशीलता का संचार करता है। पानी की धारा अगर रुक जाए तो पहले वह सड़-गलकर दुर्गंधित हो जाती है, फिर धीरे-धीरे सूखकर नदी को मात्र बेकार के गड्ढों में परिवर्तित कर दिया करती है। ठीक यही गति दशा समय के रुक या ठहर जाने से, या फिर बीता समय लौट आने से निरंतर प्रगतिशील मानव जीवन और समाज की भी होती है।

रुका हुआ समय अर्थात जीवन अपने पुरानेपन और रूढ़िवादिता के कारण पहले सड़-गल अर्थात तरह-तरह की कुरीतियों का शिकार हो जाता है। फिर उस जीवन रूपी धारा में प्रगतिरुपी विकास का नया जल संचार तथा प्रवाहित ना होने पर धारा के समान ही जीवनरुपी समाज भी नष्ट होकर खंडहर बन कर रह जाता है। जिन्हें देखकर लोग कल्पना किया करते और कहा करते हैं कि कभी यहां नदी बहा करती थी। या फिर कभी यहां कोई बस्ती थी। उसमें जीवन जल हमेशा प्रवाहित रहा करता था पर अब सब समाप्त हो चुका है। अतः प्रवाह या गतिशीलता को ही जीवन मानकर समय की धारा को भरसक आगे बढ़ाने की चेष्ठा करनी चाहिए। जो बीत चुका है, उसे लौट आने की सोच और चेष्टा समय शक्ति और साधन का दुरुपयोग ही है।

Tuesday, 11 September 2018

छोटे भाई को पाठ्य विषय निर्वाचन के लिए पत्र

छोटे भाई को पाठ्य विषय निर्वाचन के लिए पत्र

छोटे भाई को पाठ्य विषय निर्वाचन के लिए पत्र

chote-bhai-ko-vishay-nirvachan-ke-liye-patra
शक्ति नगर दिल्ली
दिनांक 5, 1992
प्रिय रमेश,
         प्रसन्न रहो।
आपका पत्र, जिसमें आपने मुझे नौवीं कक्षा में विषय परिवर्तन के लिए परामर्श मांगा है, कल मिला। मेरे विचार में वैसे तो विषयों का चुनाव विद्यार्थी को अपनी रुचि और ग्रहण योग्यता के अनुसार स्वयं करना चाहिए, परंतु कई बार हमें अपनी रुचि का भी ठीक से पता नहीं चलता। अतः अपने बड़ों से परामर्श लेना ही उचित होता है। इस दृष्टि से कुछ विचार मैं आपके सामने रखता हूं। यदि आप इन विचारों से सहमत हो तो इन के अनुसार विषय चुनकर मुझे सूचित करना ना भूलें।

आप की बचपन की प्रवृतियों तथा गणित व विज्ञान में अत्यधिक रुचि से यह लगता है कि आप एक अच्छे इंजीनियर बन सकते हैं। इन विषयों में आप अपने अध्यापकों से सदा सराहना प्राप्त करते रहे हैं। इसी प्रकार यदि आप थोड़ा और परिश्रम करते रहे तो एक दिन इंजीनियरिंग की परीक्षा भी अच्छे अंको से प्राप्त कर सकते हैं। आप जैसे तीव्र बुद्धि और परिश्रमी बालकों के लिए यह कार्य कठिन नहीं। यदि आप इस विचार को अपना लक्ष्य बना लेते हैं, तो विश्वास रखिए सफलता आपके पाँव चूमेगी।

मेरा तो यह निश्चित मत है कि आप भौतिकी, रसायन शास्त्र तथा उच्चतर गणित विषय ही अपने अध्ययन के लिए चुने।

इस पत्र को पाकर अच्छी प्रकार सोच समझकर अपना निर्णय लेना। यदि मेरा सुझाव ठीक लगा हो तो अपने लक्ष्य को पाने के लिए शीघ्र ही उसमें जुट जाएं। अपनी मूल प्रवृतियों का पूर्ण सदुपयोग कर अपनी उन्नति करके राष्ट्र निर्माण में भी सहयोग दें। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
आपका भाई

सुरेश

Monday, 10 September 2018

वृक्ष पर संस्कृत निबंध। Essay on Tree in Sanskrit

वृक्ष पर संस्कृत निबंध। Essay on Tree in Sanskrit

वृक्ष पर संस्कृत निबंध। Essay on Tree in Sanskrit

Essay on Tree in Sanskrit
वृक्षाः जनाः स्वच्छम् वायुः ददाति। वृक्षाः पर्णैः पुष्पैः च शोभन्ते। अस्य वर्णः हरितः भवति। वृक्षः CO2 ग्रहति O2 वमति। वृक्षाः प्राणरहिताः जडपदार्थाः न। तेषामपि प्राणोऽस्ति। तेऽपि रोगग्रस्ता भवन्ति। वृक्षाः पादैः पातालं स्पृश्यन्ति। वृक्षाः पादैः(मूलैः) जलं पिबन्ति। वृक्षे काकः, चटकः शयेन च तिष्ठन्ति। वृक्षेषु भ्रमराः भ्रमन्ति मधुपानं च कुर्वन्ति। वानराः वृक्षेषु कूर्दन्ति। वृक्षेण फलानि विकसन्ति। जनाः वृक्षाणां फलानि भक्षयन्ति। वृक्षाः परोपकाराय फलन्ति। 

Sunday, 9 September 2018

छोटे भाई को सफाई और स्वास्थ्य रक्षा के लाभ बताते हुए पत्र

छोटे भाई को सफाई और स्वास्थ्य रक्षा के लाभ बताते हुए पत्र

छोटे भाई को सफाई और स्वास्थ्य रक्षा के लाभ बताते हुए पत्र

safai ka mahatva batate hue chote bhai ko patra
15वी कीर्ति नगर
इलाहाबाद।
दिनांक 20 2018
प्रिय भूषण,
अपने पत्र में तुमने अस्वस्थ रहने की बात लिखी है, जिसे पढ़कर मन चिंतित हो उठा है। भैया, स्वस्थ रहने के लिए कई बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है। अतः अपने इस पत्र द्वारा मैं आपको स्वास्थ्य रक्षा के कुछ नियम और लाभ बताना चाहता हूं।

शरीर का स्वस्थ रहना ही वास्तविक जीवन है। इसके लिए दांत, आंख, नाक, बाल, हाथ पैर, नाखून इत्यादि शरीर के सभी अंगो की सफाई रखना अनिवार्य है। यदि हम गंदे हाथों द्वारा भोजन करें या गंदे दांतो तले उसे दबा लें, तो कई प्रकार के कीटाणु हमारे शरीर में भोजन के साथ प्रवेश कर पाचन क्रिया को बिगाड़ देते हैं। तब शरीर को कई बीमारियां आकर घेर लेती हैं। एक रोगी व्यक्ति अपने लिए ही नहीं समाज के लिए भी बोझ बन जाता है। जबकि स्वस्थ, साफ-सुथरा व्यक्ति अपने घर परिवार और समाज के लिए भी कई काम कर सकता है।

मनुष्य की कार्य क्षमता भी तभी बढ़ती है जब कार्य करने का स्थान साफ-सुथरा, खुला, धूप तथा प्रकाश युक्त हो। इसी कारण हमें अपने घर, गली मोहल्ले इत्यादि की सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके लिए नगरों में नगर पालिका के स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रबंध किया जाता है। यदि स्वास्थ्य विभाग की अच्छी व्यवस्था ना करें, तो उसका ध्यान इस ओर आकृष्ट करना हमारा कर्तव्य हो जाता है। यदि हमारा काम करने का वातावरण अच्छा होगा, तो काम करने की गति तीव्र होगी और मन उक्ताने की संभावना कम हो जाएगी। इसके विपरीत गंदे, अंधेरे, संघ स्थान पर काम करने से न तो काम में भी मन लगता है और ना ही पूरा यह सही उत्पादन हो पाता है। इसलिए सफाई बहुत आवश्यक होती है।

यदि लोगों में सफाई की आदत हो तो वह अपने साथ-साथ राष्ट्र को भी ऊंचा उठा सकते हैं। सफाई के आधार पर देश की सभ्यता का अनुमान लगाया जाता है। यदि हम गंदे रहेंगे तो विदेशी लोग हमें असभ्य समझकर हमसे घृणा करेंगे। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने शरीर, कार्य क्षमता तथा देश की मानहानि का विचार करते हुए सफाई का पूरा ध्यान रखें। स्वस्थ रहने का मूलमंत्र भी यही है। आशा है, मेरी बातों पर ध्यान दोगे, जिससे आपको अपने स्वास्थ्य को तो लाभ पहुंचेगा ही, पूरे समाज और राष्ट्र का कल्याण भी होगा।
आपका भाई

महेंद्र सिंह 

Saturday, 8 September 2018

सबै दिन होत न एक समान पर अनुच्छेद लेखन

सबै दिन होत न एक समान पर अनुच्छेद लेखन

सबै दिन होत न एक समान पर अनुच्छेद लेखन

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हमारा जीवन प्रकृति के नियमों में बंधकर चलता है। आज यदि वसंत ऋतु है तो कल पतझड़ भी आएगा। इसी प्रकार सर्दी के बाद गर्मी, बरसात के बाद शीत, शरद ऋतु आदि ऋतुओं का क्रम चलता रहता है। रात के बाद दिन, दिन के बाद रात का यह चक्र हमेशा चलता रहता है। इसी प्रकार व्यवहार के स्तर पर भी मनुष्य के जीवन के सभी दिन एक जैसे नहीं व्यतीत होते। एक छोटे से सेल्समैन को कल का कारखाना मालिक बनते भी देखा जाता है। इसी प्रकार आज का धन्नासेठ कल का भिखारी बन कर सामने आता है। इस परिवर्तन को ही हम ऋतु परिवर्तन के समान मानव जीवन का बसंत और पतझड़, या सर्दी गर्मी कह सकते हैं। इससे आज तक कोई ना बच पाया है, ना भविष्य में ही बच पाएगा। कल तक हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था परंतु आज आजाद है। कल तक देश में सैकड़ों रियासतें और उनके राजा थे परंतु आज वह सब बीते कल की कहानी बन चुके हैं। कल तक देश में बड़े बड़े जमींदार घराने थे, आज वह सामान्य काश्तकार बनकर रह गए हैं। कल जहां खेत-खलियान और बाग-बगीचे लहलहा या करते थे, आज वहां कंक्रीट के जंगल उठ गए हैं। अर्थात नई नई बस्तियां बस गई हैं। कल तक मनुष्य आग, पानी, हवा को अपना स्वामी समझता था, पर आज स्वयं उन सबका स्वामी बन बैठा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि परिवर्तन मानव जीवन और समाज का शाश्वत नियम है। अतः यदि मनुष्य के जीवन में समय चक्र से कभी दुख दर्द की घटाएं गिर आती हैं, तो घबराना नहीं चाहिए। अपना उत्साह किसी भी हालत में मंद नहीं पढ़ने देना चाहिए। साहस और शक्ति से विचार पूर्वक कार्य करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन यह सोच कर करते रहना चाहिए, यदि वह दिन नहीं रहे, तो आज के दिन भी नहीं रहेंगे। ऐसा सोचकर गतिशील बने रहने से ही सुख शांति की आशा की जा सकती है।

Friday, 7 September 2018

नर हो ना निराश करो मन को पर अनुच्छेद लेखन

नर हो ना निराश करो मन को पर अनुच्छेद लेखन

नर हो ना निराश करो मन को पर अनुच्छेद लेखन

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‘नर’ संज्ञा का सामान्य अर्थ ‘पुरुष’ होता है, जबकि विशेष अर्थ-समर्थ या हर प्रकार से शक्तिशाली लिया जाता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नर अर्थात पुरुष या मनुष्य सब प्रकार से और सब कुछ कर पाने में समर्थ प्राणी है। जो सबसे समर्थ, सब कुछ कर पाने में समर्थ है, वह यदि किसी कारणवश उदास या निराश होकर बैठ जाता है तो वास्तव में यह बड़ी शर्म की बात है। हार-जीत या सफलता-असफलता तो मनुष्य जीवन के साथ लगी हुई है। अगर वह निराश होकर बैठा नहीं रहता, किसी भी अवस्था में हार नहीं मानता, तो कोई कारण नहीं कि वह हार और असफलता को अपनी विजय एवं सफलता में ना बदल सके। बच्चे गिर-गिरकर ही चलना सीखते हैं। सफल और पक्के घुड़सवार कई-कई बार गिरने-उठने के बाद ही ऐसे बन पाते हैं। आवश्यकता रहा करती है दृढ़ विश्वास और इच्छाशक्ति की। इनके रहने पर अपनी सफलता की राह में अड़ंगा बनने वाले पहाड़ को भी मनुष्य काटकर गिरा सकता है, समुद्र को भी काट सकता है और छलांग लगाकर घने वनों, रेगिस्तानों के पार उतर सकता है। इसके विपरीत जब निराशा व्यक्ति के तन-मन में घर जमा लिया करती है, तब धीरे-धीरे उसके सोचने समझने और कार्य करने की शक्तियां जवाब दे दिया करती हैं। इच्छा शक्ति का अंत हो जाता है। अच्छा भला व्यक्ति निस्तेज हो जाता है। आलसी और निकम्मा बन कर रह जाता है। कुछ भी कर पाने में समर्थ नहीं रह जाता। रोटी-पानी तक के लाले पड़ जाया करते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने और घर परिवार के लिए ही नहीं, समूचे जीवन और समाज के लिए भी एक तरह का बोझ बन कर रह जाता है। सभी प्रकार की हीनताएं और दुर्बलताएं उसे अपना शिकार बना लिया करती है। इस प्रकार निराशा को हम मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु,, सबसे बढ़कर घातक रोग या महामारी कह सकते हैं। विचारवान प्राणी होने के नाते मनुष्य को इन सभी प्रकार की असफलताओं के मूल कारण निराशा को कभी पास फटकने तक नहीं देना चाहिए। हिम्मत से काम ले कर अपनी सफलताओं का रास्ता खुद ही बनाना चाहिए।