Friday, 21 January 2022

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विकास की व्याख्या कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विकास की व्याख्या कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विकास की व्याख्या कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक का सिद्धांतों प्रारम्भिक विकास

  1. यूनानी राजनीतिक चिंतन - इस युग में न्याय, शिक्षा, आदर्श, शासन व्यवस्था संविधान विधि आदि राजनीतिक विषयों के बारे में विवरण प्रस्तुत किया गया था। इसके प्रतिनिधि दार्शनिक सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा सोफिस्ट थे। इन्होंने यूनानी राजदर्शन समृद्ध करने में अत्यधिक परिश्रम किया था। राजनीतिक सिद्धांतों के क्षेत्र में राजदर्शन का वर्णन निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है
    1. नगर-राज्य की संकल्पना - प्राचीनकाल में यूनान के प्रत्येक नगर को 'राज्य' कहा जाता था तथा उसकी मान्यता एक सामाजिक इकाई के रूप में थी। यह स्वशासित तथा आत्म-निर्भर था तथा सामाजिक इकाई के रूप में स्वीकार किया जाता था। मनुष्य का प्रमुख उद्देश्य यही था कि प्रत्येक प्रकार से समाज का कल्याण हो।
    2. मनुष्य सामाजिक प्राणी के रूप में - “मनुष्य स्वभाव से समाज में रहने के लिये बाधा है।" इस तथ्य को यूनानी राजदर्शन स्पष्ट किया है तथा साथ-ही-साथ उसने मनुष्य को सामाजिक प्राणी के रूप में मान्यता दी है। इसके अनुसार, मन्ष्य समाज में जन्म लेता है और समाज में मृत्यु को प्राप्त होता है। मानव के जन्म के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए समाज एक आवश्यक इकाई है। इस सत्य को भुलाया नहीं जा सकता।
  2. अरस्तू का राजदर्शन - अरस्तू ने अपने युग के राजदर्शन को वैज्ञानिक आधार पर व्यक्त किया। उसके अनुसार, समस्त प्रशासनिक प्रणालियाँ, जैसे-एक-तन्त्र, कुलीन-तन्त्र, जनतन्त्र, भ्रष्ट-तन्त्र, आतताई-तन्त्र का वर्गीकरण तथा राज सत्ता, राज्य व व्यक्ति के सम्बन्ध व्यावहारिक पर आधारित हैं। राजदर्शन में वैज्ञानिकता को लाने वाला वह एक महान् दार्शनिक था। अतः अरस्तू के राजनीतिक दर्शन में आधुनिक व्यवहारवाद, व्यवस्था सिद्धांत, वैज्ञानिक प्रणाली आदि के विचारों का अध्ययन किया जा सकता है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाए तो पता चलता है कि राजनीतिक को एक पृथक राज्य के रूप में प्रस्तुत करन का कार्य अरस्तू ने किया है प्लेटो ने नहीं।
  3. प्लेटो का राजदर्शन - प्लेटो ने अपने राजदर्शन को अपने शिधक नशा गुरु सुकरात के जीवन-दर्शन के अनुसार प्रस्तुत किया था। राजदर्शन के लिए रिपब्लिक नामक रचना लिखी। उसे रूसो ने शिक्षाशास्त्र की बहुमूल्य रचना के रूप में व्यक्त किया था। प्लेटो की दृष्टि में राजदर्शन का प्रमुख अंग आदर्श राज्य था। इसके अतिरिक्त, उसने शिक्षा, न्याय तथा स्त्रियों के साम्यवाद के विषय में भी मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किए थे। प्लेटो ने कहा था, "जब तक दार्शनिक राजा और राजा दार्शनिक नहीं होंगे, तब तक नगर राज्य से बुराइयाँ भी दूर नहीं होंगी।"

ईसाइयत की विचारधारा

ईसाइयत शक्ति ने सम्पूर्ण मध्यकालीन विचारधारा को प्रभावित किया। इसका सर्वाधिक प्रभाव यह हुआ कि पोप की सत्ता को अच्छा समझा जाने लगा। अब चर्च का मान बढ़ गया और संगठन का स्वरूप केन्द्रीकरण की ओर बढ़ गया। धर्म ने राजनीति को अपने अंक में समेट लिया।

क्रिश्चियन डान ने लिखा है, "सातवीं शताब्दी तक पोप राजनीतिक कार्यों में भाग लेने लगा। वास्तव में, वह राजनीतिक प्रभूता के ऊपर था। रोम का चच भी रोम साम्राज्य की भांति बन गया।"

इस विचारधारा का प्रभाव निम्न प्रकार रहा .

  1. दास प्रथा को समाप्त किया जाए तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए।
  2. ईसाइयत ने राज्य की वास्तविकता को सिद्ध करते हुए बताया कि राज्य ईश्वर प्रदत्त है।
  3. मनुष्य को धन संग्रह की ओर नहीं बढ़ना चाहिए। सम्पत्ति को निर्धनों में बाँट देना चाहिए।
  4. दैवीय नियमों को मानना तथा राज्य के नियमों को प्राकृतिक नियमों के रूप में स्वीकार करना व्यक्ति का परम धर्म है।
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये।

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  1. राजनीतिक सिद्धांत की परंपरावादी अवधारणा क्या है ?
  2. राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत को 'क्लासिकल राजनीतिक सिद्धांत' (Classical Political Theory), अथवा 'आदर्श राजनीतिक सिद्धांत' (Normative Political Theory) भी कहा है। यह कल्पना पर आधारित है और इसकी जड़ें इतिहास तथा दर्शन में हैं। कतिपय लेखकों के अनुसार परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों में व्यवहारवादी क्रान्ति से पूर्व प्रचलित विचार सामग्री, राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन, विचारधाराओं तथा राजनीतिक विचारों के विश्लेषण को शामिल किया जाता है। परंपरागत स्वरूप में सिद्धांत, विचार. दष्टिकोण विचारधारा. परिप्रेक्ष्य, उपागम आदि सभी पर्यायवाची बन जाते हैं। इनमें दार्शनिक, ऐतिहासिक नैतिक, संस्थात्मक, तुलनात्मक पद्धतियों तथा अन्य विषयगत दृष्टिकोणों जैसे समाजशास्त्रीय, मनोविज्ञानात्मक, अर्थशास्त्रीय आदि को महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य, राज्य की प्रकृति तथा उसका आधार, सरकार, कानून, नैतिकता, प्राकृतिक विधि, राजनैतिक संस्थाएँ आदि परंपरागत राजशास्त्र के प्रिय विषय रहे हैं।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में विभिन्न चिन्तन प्रणालियों की ओर निर्देश किया जाता है जिनका विकास प्राचीन यग में छठी शताब्दी ई०प० से पाँचवीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन तक हुआ। राजनीतिक दर्शन के इतिहास को देखने से ज्ञात होता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांत अपने प्रतिपादक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण से प्रभावित रहे हैं।

प्लेटो से लेकर काण्ट, एक्विना और हीगल तक राजनीतिक सिद्धांतों को सदैव आचारशास्त्र (Ethics) या दर्शनशास्त्र (Philosophy) के अंश के रूप में प्रतिपादित किया गया है। उस समय के राजनीतिक विचारक अपने आपको किसी-न-किसी रूप में तात्कालिक राजनैतिक समस्याओं का स्थाई एवं शाश्वत समाधान प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध मानते थे। उन्होंने मानव जीवन और समाज के लक्ष्यों और मूल्यों की ओर अपना ध्यान लगाया। चाहे वह यूनानी विचारकों की तरह नैतिक जीवन की उपलब्धि का विचार हो अथवा मध्ययुगीन क्रिश्चियन सन्त राजनीतिज्ञों का ईश्वरीय राज्य स्थापित करने का या आदर्शवादियों द्वारा प्रतिपादित विवेक (Reason) के साक्षात्कार का। उनकी विचारधाराओं को राबर्ट ए० डहल ने परानुभववादी (Transempirical) या इन्द्रियों से परे माना है क्योंकि उनका आधार एक अलौकिक भावात्मक विश्व दृष्टि है। उनके विचार व्यक्तिगत दृष्टिकोण, चिन्तन, कल्पना अथवा आध्यात्मवादी सिद्धांतों से निःसृत हुए हैं। शाश्वत एवं उच्चस्तरीय तत्वों से सम्बद्ध होने के कारण उनकी चिन्तन प्रणाली तार्किक और निगमनात्मक (Deductive) है। वे आकाश में बैठकर पृथ्वी की ओर देखते हैं। 

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख कमियाँ निम्न हैं -

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियाँ

  1. मूल्यों पर अत्यधिक बल
  2. अनुसन्धान उपकरणों का अभाव
  3. राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुत्थान पर बल
  4. निर्णय प्रक्रिया की अनदेखी
  5. परंपरागत चिन्तन समकालीन समाज में अप्रासांगिक

(1) मूल्यों पर अत्यधिक बल - ईस्टन ने तर्क दिया है कि परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत के अन्तर्गत मूल्यों के निर्माण पर विशेष बल दिया गया है, किन्तु आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में मूल्यों के विश्लेषण की कोई आवश्यकता नहीं है। मूल्य तो व्यक्तिगत अथवा समूहगत अधिमान्यताओं का संकेत देते हैं जो किन्हीं विशेष सामाजिक परिस्थितियों में जन्म लेती हैं तथा उन्हीं परिस्थितियों के साथ जुड़ी होती हैं। समकालीन समाज अपने लिए उपयुक्त मान्यताओं को स्वयं विकसित कर लेगा, राजनीति वैज्ञानिकों को केवल राजनीति व्यवहार के क्षेत्र में कार्य-कारण सिद्धांत के निर्माण में अपना योग देना चाहिए।

(2) अनुसन्धान उपकरणों का अभाव - ईस्टन के अनुसार, कार्ल मार्क्स व मिल के पश्चात् किसी महान् दार्शनिक का जन्म नहीं हुआ, अतः पराश्रितों की तरह एक शताब्दी प्राचीन विचारों के साथ चिपके रहने से क्या फायदा! ईस्टन ने तर्क दिया कि अर्थशास्त्रवेत्ताओं तथा समाज वैज्ञानिकों ने तो मनुष्य के यथार्थ व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया है किन्तु राजनैतिक वैज्ञानिक इस मामले में पिछड़े हुए हैं। इन्होंने फासीवाद तथा साम्यवाद के उदय तथा अस्तित्व की व्याख्या देने हेतु उपयुक्त अनुसंधान उपकरण भी विकसित नहीं किए हैं।

(3) राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुत्थान पर बल - 1969 ई० में American Politics Science Association के अध्यक्षीय व्याख्यान के अन्तर्गत ईस्टन ने परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की व्यवहारवादी क्रान्ति को एक नवीन मोड़ प्रदान करते हुए उत्तर-व्यवहारवादी क्रान्ति की घोषणा कर दी। वस्तुतः ईस्टन में राजनीति विज्ञान को एक शुद्ध विज्ञान के ऊपर उठाकर अनुपयुक्त विज्ञान का रूप देने की माँग की तथा वैज्ञानिक अनुसन्धान को समकालीन समाज की विकट समस्याओं के समाधान में लगाने पर बल दिया। इसका अर्थ यह है कि ईस्टन ने समकालीन समाज पर छाये हुए संकट को पहचाना तथा उसके निवारण हेतु राजनीति सिद्धांत के पुनरुत्थान की आवश्यकता अनुभव की।

(4) निर्णय प्रक्रिया की अनदेखी - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अर्थशास्त्रवेत्ताओं, समाज वैज्ञानिकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने निर्णयन प्रक्रिया में तो सक्रिय भूमिका निभाई है। किन्तु राजनीति-वैज्ञानिकों की ओर किसी ने ध्यान तक नही दिया। अतः ईस्टन ने राजनीति-वैज्ञानिकों को यह सलाह दी कि उन्हें अन्य सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ सहयोग कर एक व्यवहारवादी विज्ञान का निर्माण करना चाहिए जिससे उन्हें भी निर्णय प्रक्रिया में स्थान प्राप्त हो सके।

(5) परंपरागत चिन्तन समकालीन समाज में अप्रासांगिक - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत साधारण चिन्तन-मनन पर आधारित है, उसमें राजनीतिक यथार्थ के गहन निरीक्षण का नितान्त अभाव है, अतः राजनीतिक सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करने हेत चिर सम्मत ग्रन्थों तथा राजनीतिक विचारों के इतिहास की परम्परा से मुक्त कराना आवश्यक है।

परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत के निर्माता - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का विशेष रूप हमें प्लेटो की रचनाओं में देखने को मिलता है। आधुनिक युग में परंपरावादी राज सिद्धांत के प्रबल समर्थकों की काफी संख्या है। यहाँ हम रूसो, काण्ट, हीगल. ग्रीन बोसांके लास्की, ओकशॉट, लियो स्ट्रास इत्यादि की रचनाओं में प्लेटो और अरस्तू के विचारों के प्रतिबिम्ब देख सकते हैं। पश्चिम में परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों की निरन्तरता के प्रतिनिधि विचारक ओकशॉट. हन्ना आरेन्ट, बट्रैण्ट जुवैनल, लियो स्ट्रास, इरिक वोगेलिन आदि माने जाते हैं। इन्होंने न केवल शास्त्रीय दार्शनिक अथवा मानकीय चिन्तन का समर्थन एवं प्रतिपादन किया है अपित उस ओर नवीन दिशाओं में चिन्तन भी किया है।

परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत का मूल्यांकन - अमूर्त, निगमनात्मक, काल्पनिक और इस नाते ‘अवैज्ञानिक' होने के कारण परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत की आलोचना की जाती है। आलोचकों का मुख्य तर्क यह है कि यह बहुत मूल्य भारित या लक्ष्य अभिमुख है और इसलिए इसके सिद्धांतों की व्यावहारिक जांच नहीं की जा सकती। अतः आधुनिक युग में राजनीतिक सिद्धांत को इस तरह नए सिरे से ढाला जाना चाहिए कि यह एक वैज्ञानिक विषय का रूप धारण कर ले।

परंपरावादी विचारक पारम्परिक राजनीतिक सिद्धांत के हास (पतन) से दुःखी हैं और उसका पुनरोदय चाहते हैं। उनकी दृष्टि में परंपरागत सिद्धांत के मार्ग में बाधक तत्व रहे हैं - व्यवहारवाद, इतिहासवाद, नैतिक सापेक्षता तथा तकनीकी क्रान्ति। उनके अनुसार आधुनिक राजवैज्ञानिकों ने मूल्यों तथा आदर्शों को अलग करके राजनीति को ‘अराजनैतिक' (apolitical) बना दिया। उनकी दृष्टि से मानवता और मानव मूल्यों की रक्षा के लिए परंपरावादी सिद्धांत को शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए।&nstrongsp;

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण बताइए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण बताइए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण बताइए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण निम्न वर्णित हैं -

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत के प्रमुख लक्षण

  1. समकालीन समस्याओं के समाधान का उद्देश्य
  2. तार्किक तथा निगमनात्मक प्रणाली का प्रयोग
  3. विषय के विशेषीकरण का अभाव
  4. विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता
  5. वैज्ञानिक प्रणाली के प्रयोग का अभाव

समकालीन समस्याओं के समाधान का उद्देश्य - अरस्तू, प्लेटो आदि ने समकालीन समस्याओं के समाधान को ही उद्देश्य बनाया है।

तार्किक तथा निगमनात्मक प्रणाली का प्रयोग - परंपरागत सिद्धांतों में विद्वानों ने निगमनात्मक तार्किक प्रणाली का प्रयोग किया है। यद्यपि प्लेटो ने आगमनात्मक तथा निगमनात्मक दोनों प्रणालियों का समय-समय पर पालन किया था, किन्तु इसके तर्क द्वारा सत्यापित निगमनात्मक प्रणाली का ही प्रयोग किया था। अरस्तू ने एक स्थान पर वैज्ञानिक प्रणाली का प्रयोग अवश्य किया था, परन्तु उसने जिस विधि का प्रयोग किया है वह वास्तव में निगमनात्मक ही थी।

विषय के विशेषीकरण का अभाव - जिस प्रकार विभिन्न ग्रन्थों में जो विषय-सामग्री उपलब्ध है उसका विभाजन करना अत्यधिक कठिन है। परन्तु तथ्यों में वास्तविकता का पुट लाने का प्रयास किया, उदाहरणार्थ-प्लेटो द्वारा लिखित रिपब्लिक को ले सकते हैं। उसमें विषय में यह निष्कर्ष निकालना अत्यधिक कठिन है कि उसको किसके अन्तर्गत रखा जाए। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रस्तुत पुस्तक में जीवन के समस्त विषयों, कार्यों तथा घटनाओं का वर्णन किया गया है। यही कारण है कि रिपब्लिक को राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, मनोविज्ञान तथा नीतिशास्त्र आदि विषयों की उत्कृष्ट रचना माना जाता है। इसी हेतु कहा जाता है कि राजनीतिक सिद्धांत में स्वार्थत्तता तथा स्वायत्तता का अभाव है।

विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता पाई जाती है। इस सिद्धांत में प्रायः सभी विचारकों ने अपने पृथक-पृथक अध्ययन का विषय-क्षेत्र बना लिया है। इसके अन्तर्गत राज्य सरकार, राजनीतिक संस्थाएँ, राज्य के लक्ष्य, न्यायप्रियता, लोक कल्याण, राज्य की उत्पत्ति तथा समाज की बुराइयों को दूर करने की बातें ही बताई जाती हैं। इसमें न तो कोई अन्तर पाया जाता है और न नवीनता ही। प्राचीन यूनानी राजदर्शन में आधुनिक राजदर्शन का सृजन ह्यूम तथा वर्क तक सभी ने इन्हीं विषयों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। परन्तु आधुनिक काल में सभी प्रकार की राजनीति के अध्ययन पर विचार किया जाता है।

वैज्ञानिक प्रणाली के प्रयोग का अभाव - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विभिन्न अंगों में गणितीय परिणाम की वैज्ञानिक प्रणाली का प्रयोग नहीं हुआ है। यह सम्पूर्ण पद्धति अनुभव पर आधारित है। वैसे अरस्तू की अध्ययन पद्धति को वैज्ञानिक कहा जाता है, परन्तु उसे तुलनात्मक पद्धति के साथ-साथ अतीत के संचित अनुभव पर आधारित माना गया है। यही कारण है कि उसमें आधुनिक युग के समान वैज्ञानिक प्रणाली का अभाव है।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिये।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिये।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिये।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियाँ

  1. पद्धति सम्बन्धी नवीन समस्या - यदि एक ओर राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति की कमी है, तो दूसरी ओर उसके विकास में वैज्ञानिक पद्धति का अधिकाधिक प्रयोग भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है। इसका कारण यह है कि सिद्धांत को आधुनिकता के रंग में रंगने के लिये उसमें अनेक कमियाँ आ गई हैं उदाहरणार्थ - डेविड ईस्टन की व्यवस्था सिद्धांत व्यावहारिक तथा व्यापक होते हुए भी आनुभाविक नहीं है।
  2. वैज्ञानिक कौशल के विकास का अभाव - राजनीतिक विज्ञान में उस वैज्ञानिकता को स्थान नहीं मिल पाया है जिनका सम्बन्ध वैज्ञानिक उपकरणों, विधियों, प्रविधियों तथा वैज्ञानिक उपागमों से है। राजनीतिक सिद्धांत में अभी तक वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुरूप व्यक्ति के व्यवहार का विकास नहीं हो पाया है। मानवीय व्यवहार के अध्ययन के निश्चित सिद्धान्तों का अभाव पाया जाता है। यही कारण है कि राजनीति विज्ञान में अभी तक वैज्ञानिक कौशल के विकास की कमी है।
  3. अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध - राजनीतिक सिद्धांत के द्वारा राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध अन्य विज्ञानों से स्थापित करना भी आवश्यक है जिससे उसमें अनुसन्धान की सम्भावनाएँ उत्पन्न हो सकें, परन्तु इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिये राजनीति विज्ञान को सिद्धान्तों की सीमाओं में बाँधना आवश्यक नहीं है। .
  4. सामान्य राजनीतिक सिद्धांत सम्भव नहीं - राजनीति विज्ञान में वास्तव में सामान्य राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण सम्भव नहीं है। उसका कोई विशेष महत्त्व भी नहीं है। इस प्रकार के विचार प्रकट करने वाले विचारकों का मत है कि सामान्य सिद्धांत का विचार सैद्धान्तिक क्षेत्र में तो लागू किया जा सकता है किन्तु व्यावहारिक क्षेत्र में वह कारगार नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि राजनीतिक सिद्धांत की विषय-वस्तु मानव है जिसका व्यवहार और प्रकृति परिवर्तनशील है। वह देश, काल तथा परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि सामान्य राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण कठिन है।
  5. मूल्यों की समस्या - आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में मूल्यों की भी एक गम्भीर समस्या है। मूल्यों के कारण राजनीति के विद्वानों ने अपने-अपने अलग वर्ग बना लिये हैं। पहला वर्ग इस तथ्य पर जोर देता है कि राजनीति विज्ञान को मूल्य-निरपेक्ष बना दिया जाए। दूसरा वर्ग मूल्यों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करने का इच्छुक है। तीसरा वर्ग दोनों विचारकों के मध्य का मार्ग अपनाना चाहता है।
  6. विषय-सामग्री परिवर्तनशील - राजनीति विज्ञान की विषय सामग्री एक-सी नहीं रहती है। वह परिवर्तन होती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि वर्तमान यथार्थवादी सिद्धांत कालान्तर में अयथार्थवादी बन जाता है। इससे एक गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  7. प्राकृतिक विज्ञान के समान होना असम्भव - राजनीति विज्ञान में कतिपय विद्वान मानते हैं कि राजनीति विज्ञान किसी भी दशा में एक प्राकृतिक विज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि राजनीति विज्ञान की विषय-सामग्री भिन्न है। उसमें प्राकृतिक विज्ञान के सूत्र दिखाई नहीं देते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि वैज्ञानिक प्रणालियों का पूर्ण रूप से पालन करना राजनीतिक विज्ञान के वश के बाहर है। राबर्ट डहल ने लिखा है कि, “राजनीति का अध्ययन न तो शुद्ध रूप से वेज्ञानिक हो सकता है और न ही उसे होना चाहिये। राजनीतिक अध्ययन में आवश्यक वस्तुपरक दृष्टिकोण की कमी है। राजनीति विज्ञान को विज्ञान कह देने मात्र से वह विज्ञान नहीं बन जाता। उसे अपनी वैज्ञानिकता ठोस उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित करनी होगी।"
  8. राजनीति में वैज्ञानिक सिद्धान्तों की कमी&nstrongsp;-राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक सिद्धांत देखने को नहीं मिलते हैं। राबर्ट डहल के अनुसार, “राजनीति सिद्धांत अंग्रेजी भाषा-भाषी देशों में मृत हो चुका है, साम्यवादी देशों में वह बन्दी है तथा अन्य देशों में वह मरणासन्न है।" मेयो के अनुसार, “अनेक सिद्धांत अपूर्ण हैं। क्योंकि उनमें कोई भी पूर्ण व्यवस्था से सम्बन्धित नहीं है।" राजनीति विज्ञान में इस अवैधानिकता के कारण अनेक कमियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।
  9. राजनेताओं तथा राजनीति विज्ञान के विद्वानों में सम्पर्क का अभाव - राजनीति विज्ञान की एक गम्भीर समस्या यह है कि राजनीति सिद्धांत का निर्माण करने वाले शोधकर्ताओं से राजनीतिक नेताओं के सम्बन्ध नहीं बन पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि राजनीतिक सिद्धांत में यथार्थता तथा औपचारिकता का तो समावेश होता है, किन्तु सिद्धांत की वैज्ञानिकता कम हो जाती है।
  10. मानवीय सम्बन्धों की समस्या - राजनीति विज्ञान में कुछ विषय इस प्रकार के हैं कि जिनके कारण आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में अनेक समस्याएँ आ गई हैं। इन विषयों का सम्बन्ध चेतनायुक्त मनुष्यों से है; जैसे-शिक्षा, अशिक्षा, संकीर्णता, निर्धनता, रूढ़िवादिता आदि। ये विषय राजनीति विज्ञान को कुछ भी प्रदान नहीं करते हैं।

निष्कर्ष - परंपरागत तथा आधुनिक राजनीति शास्त्र के सम्बन्ध में राबर्ट डहल ने स्पष्ट रूप से कहा है कि, “यह विचार करने का पूर्ण आधार है कि एकता (परंपरागत तथा आधुनिक राजनीति शास्त्र में) पुनः स्थापित की जा सकती है।" इस दृष्टिकोण से आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का ही एक परिष्कृत रूप है। दोनों एक ही विषय के ऐतिहासिक विकास के दो रूप हैं। अतः दोनों दृष्टिकोणों को मिलाकर राजनीतिक सिद्धांत का सम्पूर्ण विस्तृत एवं परिपक्व प्रस्तुत किया जा सकता है।

Thursday, 20 January 2022

भारतीय चुनाव प्रणाली के दोषों को स्पष्ट कीजिए।

भारतीय चुनाव प्रणाली के दोषों को स्पष्ट कीजिए।

भारतीय चुनाव प्रणाली के दोषों को स्पष्ट कीजिए।

  1. भारत में चुनाव सुधारों की क्यों आवश्यकता है ?
  2. भारतीय निर्वाचन व्यवस्था के दो दोष लिखिए
  3. भारतीय चुनाव प्रणाली के कोई चार दोष लिखिए
  4. चुनाव में धन की बढ़ती हुई भूमिका बताइए।
  5. अथवा भारतीय चुनाव प्रणाली में क्या कमियाँ है ? 

चुनाव प्रणाली के दोष

वर्तमान भारत में निर्वाचन की पद्धति में कई दोष व्याप्त हैं भारत की निर्वाचन' पाली पर यदि हम दष्टिपात करें तो हमें निम्नलिखित दोष दिखाई पड़ते हैं -

  1. अल्पमत का प्रतिनिधित्व - भारत में अन्य देशों की तरह एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र होते हैं. जिनमें निर्वाचित होने के लिए कई-कई प्रत्याशी उम्मीदवार होते हैं उन सभी प्रत्याशियों में जिस प्रत्याशी को सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं उसे विजयी घोषित किया जाता है, किन्तु उस विजयी प्रत्याशी के मिले मत उसके अन्य सभी प्रत्याशियों को मिले कुल मतों से काफी कम होते हैं।
  2. चनाव में धन का प्रभाव - वर्तमान निर्वाचन प्रणाली में निर्वाचन की संस्कृति बदल गई है आज निर्वाचन प्रणाली में धन का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि उसके प्रभाव के कारण कोई गरीब उम्मीदवार कितना ही योग्य क्यों न हो वह चुनाव जीत ही नहीं सकता। चुनाव में धन पानी की तरह बहाया जाता है तथा कभी-कभी तो विभन्न प्रकार के आर्थिक प्रलोभनों से मतदाता को आकर्षित किया जाता है। आज चुनाव में एक अत्यन्त गम्भीर दोष चुनावों में धन की बढ़ती हुई भूमिका के रूप में उभरा है। यद्यपि हमारे क़ानून निर्माता इस दिशा सचेत थे। यही कारण है कि आज चुनाव आयोग ने धन के असीमित उपयोग को रोकने की दिशा में कठोर कदम उठाये हैं। जिसके कारण कुछ ऐसे मामले सज्ञान एवं प्रकाश में आये है कि कुछ राजनीतिक दल तथा प्रत्याशियों ने वोट के नाम पर नोट बांटकर चुनाव जीतने की कोशिश की है। चुनाव में धन का दुरुपयोग रोकने के लिए निम्न प्रयास किये जा सकते है
    1. राजनीतिक दलों के आय-व्यय की विधिवत जांच। 
    2. संसद तथा विधान सभाओं के लिए एक साथ चुनाव की व्यवस्था 
    3. एक समय में एक प्रत्याशी के एक से अधिक स्थानों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध 
    4. चुनाव अवधि में सार्वजनिक संस्थाओं को अनुदान देने पर रोक 
    5. चुनाव खर्च का भार पूर्णतया आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा वहन करना।
  3. गुण्डागर्दी तथा बूथ कैप्चरिंग - आजकल समाचार पत्रों में इस प्रकार की घटना आम रूप से पढ़ने को मिलती है कि गुण्डागर्दी के आधार पर धमकी देकर अपने पक्ष में मतदान कराया गया। कभीकभी तो मतदान केन्द्र पर कब्जा कर फर्जी मतदान करा दिया जाता है। इसे बूथ कैप्चरिंग कहते हैं।
  4. मतदान कर्मचारियों द्वारा पक्षपात - मतदान अधिकारी और कर्मचारी भी पूर्णतया निष्पक्ष नहीं होते । वे मतदान स्थल पर पक्षपात कर तथा मतगणना में हेराफेरी कर अपने पक्ष के उम्मीदवार को जिताने का भरसक प्रयास करते हैं।
  5. सत्तारूढ़ दल द्वारा सत्ता का चुनाव में दुरुपयोग - जिस दल के हाथ में निर्वाचन के समय सत्ता होती है वह प्रचार में तथा निर्वाचन में सत्ता से प्राप्त साधनों का जमकर दुरुपयोग करता है। कर्मचारियों का पदांकन अपनी सहूलियत से करता है।
  6. निर्वाचन क्षेत्रों का बड़ा होना - बडे-बडे निर्वाचन क्षेत्रों में अधिकांश लोग उम्मीदवार के निकट से नहीं जानते इसलिए वे अपने मत का सही व्यक्ति के निर्वाचन में प्रयोग नहीं कर पाते।।
  7. स्वतन्त्र उम्मीदवारों का कम चुना जाना - स्वतंत्रत उम्मीदवार बहुत कम चुने जाते हैं क्योंकि दलीय आधार पर उम्मीदवार को विभिन्न सुविधायें दी जाती हैं तथा जनता स्वयं भी उम्मीदवार के बारे में अधिक जानती नहीं है वह राजनीतिक दल के कार्यक्रम के आधार पर ही मतदान करना अधिक सुविधा जनक मानती है।
  8. निर्वाचन में जनता की घटती रुचि - वर्तमान काल में जनता की रुचि निर्वाचनों में बराबर घटती जा रही है। इसका प्रमाण मतदान का घटता प्रतिशत है। प्रायः निर्वाचनों में 50 प्रतिशत से कम लोग ही मत डालते हैं। यह निर्वाचनों में जनता की घटती रुचि का परिचायक है।

भारतीय निर्वाचन प्रणाली के दोषों को दूर करने के उपाय लिखिए।

भारतीय निर्वाचन प्रणाली के दोषों को दूर करने के उपाय लिखिए।

भारतीय निर्वाचन प्रणाली के दोषों को दूर करने के उपाय लिखिए।

  1. निर्वाचन आयोग का गठन दोषपूर्ण है, स्पष्ट कीजिए। 
  2. स्वतंत्र निर्वाचन प्रणाली से निर्वाचन पद्धति के दोषों को दूर किया जा सकता है, स्पष्ट कीजिए। 
  3. क्या भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है?
  4. भारतीय चुनाव प्रणाली के कोई चार दोष लिखिए

निर्वाचन पद्धति के दोषों को दूर करने के उपाय

निर्वाचन में धन (Money) और बाहुबल (Muscle) के बढ़ते प्रभाव ने स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन के समक्ष प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। निर्वाचन को और सार्थक और निष्पक्ष बनाने के लिए समय-समय पर राजनीतिक और गैर राजनीतिक स्तर पर अनेक उपाय दिये गये। जो निम्नलिखित हैं.

  1. निर्वाचन आयोग का पुनर्गठन 
  2. स्वतन्त्र निर्वाचन प्रणाली
  3. सभी स्तरों पर चुनाव एक साथ आयोजित हों
  4. चुनाव प्रचार का व्यय राज्य द्वारा उठाया जाना 
  5. जाली प्रत्याशियों को प्रतिबन्धित करना
  6. फोटो पहचान पत्र का प्रयोग 
  7. निर्वाचन समय-सारिणी को प्रभावशाली बनाना
  8. उप चनाव शीघताशीघ्र आयोजित किये जाये
  9. इलेक्ट्रॉनिक मशीन का प्रयोग

निर्वाचन आयोग का पुनर्गठन (Re-organization of Election Commission) - आलोचकों का मत है कि निर्वाचन आयोग का गठन दोषपूर्ण है। वर्तमान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति मन्त्रिमण्डल (व्यवहार में प्रधानमन्त्री) के परामर्श से राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

स्वतन्त्र निर्वाचन प्रणाली (Independent Election Machinery) - निवाचन आयोग की राज्य स्तर पर अपनी प्रशासकीय मशीनरी होनी चाहिए और इसके अधिकारों में भी वृद्धि की जानी चाहिए। वर्तमान में निर्वाचन आयोग अपने कार्यों के लिए पूर्णतया केन्द्र और राज्य सरकारों पर निर्भर है। राज्य सरकारों की सहायता के बिना यह मतदान पंजिकाओं (Electroal Rolls) को भी अद्यतन (Up-to-date) नहीं रख सकता।

सभी स्तरों पर चुनाव एक साथ आयोजित हों - (Elections at all levells should be Organized Simultaneously) - यदि लोकसभा, विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ आयोजित किये जायें तो खर्च में काफी कमी हो सकती है। संवैधानिक संशोधन करके ऐसी व्यवस्था सहज ही की जा सकती है।

चुनाव प्रचार का व्यय राज्य द्वारा उठाया जाना - विभिन्न स्तरों पर एक साथ निर्वाचन करवाने के साथ-साथ राज्य द्वारा एक निश्चित मात्रा में चुनाव प्रचार का खर्च भी उठाया जाना चाहिए। यह व्यवस्था की जा सकती है कि पिछले निर्वाचन में जिन दलीय स्वतन्त्र प्रत्याशियों ने 25 प्रतिशत या अधिक मत प्राप्त किये हैं, उन्हें आयोग द्वारा निर्धारित व्यय राशि का 75 प्रतिशत दो किश्तों में राज्य द्वारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

जाली प्रत्याशियों को प्रतिबन्धित करना - गैर गम्भीर (Non-Serious) - प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा अनेक उपाय किये गये हैं जैसे- प्रत्याशियों की जमानत राशि को लोकसभा के लिए 5,000 रुपये और विधानसभा के लिए 2,500 रुपये करना है स्वयं प्रत्याशियों के लिए टेलीफोन तथा रियायती दर पर छपाई हेतु कागज न उपलब्ध कराना तथा उन प्रत्याशियों को अयोग्य घोषित करना जो न्यूनतम 20 प्रतिशत वैध मत नहीं प्राप्त करते हैं।

फोटो पहचान पत्र का प्रयोग - फर्जी मतदान जोकि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिन्ता का विषय है को रोकने तथा बाहबलियों की बूथ कैपचरिंग की घटनाओं को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सभी मतदाताओं को फोटो युक्त पहचान पत्र दिये जाने सम्बन्धी चुनाव आयोग के सुझाव के तहत भारत सरकार ने भारत के सभी मतदाताओं को फोटो युक्त पहचान पत्र देने की प्रक्रिया का शुभारम्भ मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी० एन० शेषन के नेतृत्व में सन् 1993 में किया। यद्यपि यह कार्य काफी तीव्रगति से प्रारम्भ किया गया कि लोक सभा चुनाव के पूर्व ही समस्त मतदाताओं को फोटो युक्त पहचानपत्र दे दिये जायेंगे तथा फोटो युक्त पहचान पत्र के बिना मताधिकार का प्रयोग न किया जा सकेगा। किन्तु इस प्रक्रिया के अनुपालन में अनेकों कठिनाइयाँ आने के कारण इसे समय से पूरा नहीं किया जा सका । यह प्रक्रिया आज भी अधूरी है। फोटो युक्त पहचानपत्र को अनिवार्य बनाने से जाली मतदान को रोकने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की जा सकती है। यद्यपि अब भारत सरकार ने फोटो युक्त मतदान सूची तैयार कराने की व्यवस्था पर भी विचार कर रही है।

अभी फोटो युक्त पहचान पत्र की उपयोगिता मात्र चुनाव में मतदान तक सीमित है किन्तु यदि इस पहचान पत्र को बहुउद्देश्यीय जैसे - जन्मतिथि प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, व्यक्तिगत परिचय पत्र इत्यादि को भी इसमें सम्मिलित कर लिया जाये तो शायद इसकी उपादेयता सार्थकता एवं प्रासंगिकता और भी बढ़ जाये।

निर्वाचन समय-सारिणी को प्रभावशाली बनाना - प्रत्याशियों के चुनावी व्यय को कम करने के लिए यह वांछनीय होगा कि निर्वाचन की समय-सारणी को प्रभावी बनाया जाय एवं नामांकन की अंतिम तिथियों के तुरंत बाद नामांकन पत्रों की जाँच हो जानी चाहिए। 2 दिन का समय नाम वापसी के लिए होना चाहिए और चुनाव प्रचार के लिए अधिकतम 15 दिन का समय होना चाहिए। 

उप चनाव शीघताशीघ्र आयोजित किये जाये - प्रायः उप-चुनावों के आयोजन में अधिक समय लगता है। इससे सहज ही प्राधिकारियों के प्रति लोगों में सन्देह की भावना घर कर लेती है। समय लगता है। लोकसभा की संयुक्त संसदीय समिति ने यह सुझाव दिया है कि सभी उप-चुनाव अधिकतम 6 माह की अवधि के भीतर आयोजित कर लिए जाने चाहिए।

इलेक्ट्रॉनिक मशीन का प्रयोग - मतदान प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाने के लिए इलेक्ट्रानिक मशीन के प्रयोग का भी सुझाव दिया गया है। इससे मतदान प्रक्रिया को तेजी से तो पूरा किया ही जा सकेगा, व्यय भी कम होगा। 

राज्यपाल की स्वविवेक कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए।

राज्यपाल की स्वविवेक कार्यों एवं शक्तियों का वर्णन कीजिए।

राज्यपाल की स्वविवेक शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

राज्यों में राज्यपाल की स्थिति तथा भूमिका

राज्य का संवैधानिक प्रधान तथा संवैधानिक अध्यक्ष होने के नाते राज्यपाल की स्थिति तथा भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है, किन्तु कभी-कभी उसकी स्थिति में उसकी भूमिका के कारण आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं।

राज्य स्तरीय शासन में राज्यपाल की शक्तियाँ व्यावहारिक रूप से वास्तविक न होते हुए राज्य शासन में उसका स्थान सबसे अधिक सम्मानित और प्रतिष्ठित होता है। अपने निर्दलीय व्यक्तित्व के आधार पर राज्यपाल राज्य के शासन की दुलमुल और अस्थायी राजनीति में स्थायित्व और स्थिरता लाने की स्थिति में होता है, किन्तु व्यावहारिक रूप में प्रायः राज्यपाल केन्द्रीय सत्ताधारी दल के विश्वासपात्र ही होते हैं। यदि राज्यपाल प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला तथा कार्यशील व्यक्ति है तो वह विरोधी पक्ष तथा मंत्रिमंडल के मध्य अनेक मत भेदों को दूर करने तथा विकास की गति को अवधिकाल में सहायक साबित हो सकता है। बी. जी. खेर ने एक बार संविधान सभा में कहा था कि - "एक अच्छा राज्यपाल बहुत लाभ पहुंचा सकता है और एक बुरा राज्यपाल दुष्टता भी करता है, यद्यपि संविधान में उसको बहुत कम शक्ति दी गई है। राज्यपाल के कुछ स्वविवेकीय कार्य एवं शक्तियां ऐसी हैं जो उसकी स्थिति एवं भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं चर्चित बना देते हैं।

राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियां एवं कार्य

  1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में
  2. मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने के सम्बन्ध में
  3. विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के सम्बन्ध में
  4. विधानसभा भंग करने या न करने के सम्बन्ध में
  5. मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने के सम्बन्ध में

1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में - राज्य शासन में राज्यपाल का एक महत्वपूर्ण कार्य मुख्यमंत्री की नियुक्ति से सम्बन्धित होता है। यदि राज्य की नव निर्वाचित विधानसभा में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो जाता है तथा उस बहुमत दल ने अपना नेता चुन लिया है तो राज्यपाल के लिए यह आवश्यक एवं बाध्यता हो जाती है कि वह उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करे, लेकिन यदि राज्य की विधानसभा में दलीय स्थिति एवं बहुमत की स्थिति स्पष्ट नहीं है तो इस सम्बन्ध में राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करते हुए राज्यपाल यह निर्णय करेगा कि किस सदस्य को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करे ताकि स्थायी सरकार का गठन हो सके।

मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में राज्यपालों को कई बार स्वविवेक का इस्तेमाल करना पड़ा है। सबसे पहले सन् 1952 में मद्रास राज्य विधानमंडल के राज्यपाल श्री प्रकाश ने टी. प्रकाशम को बहमत प्राप्त होने के दावे की अवहेलना करते हुए सी. राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। इसके बाद भारतीय राजनीति में कई बार ऐसे अवसर आये जबकि राज्यपालों को अपने स्वविवेक का प्रयोग करना पड़ा. किन्तु स्वविवेकीय शक्ति का दुरुपयोग भी होता है। ऐसा ही उदाहरण था : उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने जगदम्बिका पाल (कांग्रेस) को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त कर दिया था।

2. मंत्रिमंडल को अपदस्थ करने के सम्बन्ध में - राज्यों के राज्यपाल को यह भी स्वविवेकीय शक्ति प्राप्त है कि वह मंत्रिमंडल को अपदस्थ कर राष्ट्रपति से यह सिफारिश करे कि राज्य में राष्टपति शासन लागू कर दिया गया है। राज्यपाल यह कार्य निम्न स्थिति में कर सकता है.

  1. जबकि उसे यह विश्वास हो जाये कि मंत्रिमंडल का सदन में बहुमत समाप्त हो गया है तथा मुख्यमंत्री पुनः बहुमत सिद्ध करने के लिए विधानसभा का अधिवेशन बुलाने को तैयार न हो।
  2. जबकि राज्य के मंत्रिमंडल के प्रति विपक्ष के द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया गया हो।
  3. जबकि मंत्रिमंडल संविधान के अनुसार कार्य न कर रहा हो।
  4. जबकि किसी स्वतंत्र ट्रिब्यूनल द्वारा मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी घोषित किया गया हो।

3. विधानसभा का अधिवेशन बुलाने के सम्बन्ध में - व्यावहारिक रूप में तो राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री की सलाह पर ही विधानसभा का अधिवेशन बुलाता है, किन्तु कुछ ऐसी राजनीतिक तथा संवैधानिक स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जबकि राज्यपाल को स्वविवेक का प्रयोग करते हुए विधानसभा का अधिवेशन बुलाना पड़ता है।

संविधान के अनुच्छेद 174 के अंतर्गत राज्यपाल विधानसभा के अधिवेशन की कोई तिथि निश्चित कर सकता है। इस सम्बन्ध में वह मुख्यमंत्री की सलाह मानने को बाध्य नहीं है। इसके अतिरिक्त राज्यपाल को यदि यह विश्वास हो जाय या सन्देह हो गया कि मुख्यमंत्री को सदन में बहुमत प्राप्त नहीं है तो वह मुख्यमंत्री को शीघ्र ही अधिवेशन बुलाने को कह सकता है यदि मुख्यमंत्री ऐसा करने में विलम्ब या टाल मटोल करता है तो राज्यपाल स्वयं ही अधिवेशन बुला सकता है।

4. विधानसभा भंग करने या न करने के सम्बन्ध में - सामान्यतः राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर विधानसभा को भंग करता है, किन्तु कुछ विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल व विधानसभा भंग करने के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री की सिफारिश मानने से इंकार कर सकता है। वह मुख्यमंत्री के परामर्श के बिना भी विधानसभा को भंग कर सकता है। सन् 1976 में तमिलनाडु तथा सन 1984 में जम्मू कश्मीर के ऐसे उदाहरण हैं जबकि राज्यपाल ने स्वविवेक से विधानसभा भंग करने या न करने का निर्णय लिया था।

5. मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने के सम्बन्ध में - संवैधानिक रूप से राज्यपाल की अनुमति के बगैर किसी भी पक्ष द्वारा मुख्यमंत्री के विरुद्ध मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और इस सम्बन्ध में राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय लेता है कि वह मुख्यमंत्री पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे अथवा न दे। ऐसा ही एक उदाहरण सन् 1993 में तमिलनाडु में जयललिता के सम्बन्ध में था।

इसके अतिरिक्त राज्यपाल मुख्यमंत्री से किसी विषय में कोई भी सूचना या जानकारी मांग सकता है। वह किसी भी मंत्री द्वारा अकेले लिए गये किसी निर्णय के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री से यह कह सकता है कि उस निर्णय को मंत्रिपरिषद के समक्ष प्रस्तुत करे। विधानमंडल द्वारा व्यक्ति विधेयक को वह पुनर्विचार के लिए वापस कर सकता है। इत्यादि से प्रकरण है जबकि राज्यपाल अपने स्वविवेक का प्रयोग करता है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का वर्णन कीजिए।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का वर्णन कीजिए।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का वर्णन कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय

  1. सर्वोच्च न्यायालय का गठन किस प्रकार होता है ?
  2. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यतायें बताइये।
  3. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
  4. न्यायाधीशों की पदावधि एवं पदमुक्ति पर टिप्पणी करें।
  5. सर्वोच्च न्यायालय के कार्यकाल का वर्णन कीजिये।
  6. सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार पर प्रकाश डालें।
  7. सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार का संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
  8. सर्वोच्च न्यायालय का परामर्शी क्षेत्राधिकार क्या है ?
  9. सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति से आप क्या समझते हैं ?
  10. अभिलेख न्यायालय से आप क्या समझते हैं ?
  11. संविधान के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर टिप्पणी कीजिये।
  12. सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
  13. मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका बताइये।

भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना

भारत में न्यायपालिका का एकीकृत पिरामिडनुमा मॉडल अपनाया गया है। संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत भारत के लिए एक सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य पीठ नई दिल्ली में स्थित है, किन्तु यह नई दिल्ली के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर सुनवाई कर सकता है, जिसे मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के अनुमोदन से निश्चित करें।

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

सर्वोच्च न्यायालय का गठन एक मुख्य न्यायाधीश तथा 25 अन्य न्यायाधीशों (कुल 26 न्यायाधीश) से किया जाता है। मूल संविधान के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में कुल 7 न्यायाधीश होते थे। इसे 1960 में बढ़ाकर 14 न्यायाधीश कर दिया गया। यह संख्या 1977 में बढ़कर 18 कर दी गयी तथा 1986 में बढ़ाकर 26 कर दी गयी, जोकि अभी भी चल रही है।

न्यायाधीशों की योग्यतायें

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति हेत किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यतायें होनी चाहिए -

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. किसी उच्च न्यायालय में कम से कम पांच वर्ष तक न्यायाधीश रहा हो।
  3. किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में कम से कम 10 वर्ष से विधि व्यवसाय (वकालत) कर रहा हो।
  4. राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता हो।

न्यायाधीशों की नियुक्ति

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों जिसे राष्ट्रपति आवश्यक समझे, की सलाह पर की जाती है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श पर की जाती है।

पदावधि एवं पदमुक्ति

सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक अपने पद पर कार्य कर सकता है। नियुक्ति के पश्चात् न्यायाधीशों को कुछ विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त पदमुक्त नहीं किया जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार बहुत विस्तृत है। इसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत निम्नलिखित मामले आते हैं -

1. प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार - प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार से तात्पर्य यह है कि कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष सीधे लाया जा सकता है तथा ऐसे मामलों पर निर्णय करना सर्वोच्च न्यायालय का अनन्य अधिकार है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है

(i) पारम्भिक अपवर्जक (एकमेव) अधिकार (Original Exclusive Jurisdiction) - सर्वोच्च न्यायालय के इस अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत निम्न विषय आते हैं .

  1. भारत सरकार, राज्य या कई राज्यों तथा एक या अधिक राज्यों के बीच विवाद
  2. दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद जिसमें कोई ऐसा प्रश्न अन्तर्निहित हो जिस पर किसी वैध अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर हो।

उपरोक्त के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय को केवल संघ सरकार तथा राज्य सरकारों के पारस्परिक विवादों के सम्बन्ध में प्रारम्भिक अपवर्जक (एकमेव) अधिकार प्राप्त हैं अर्थात् उपरोक्त विवाद केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही प्रस्तुत किए जा सकते हो बशर्ते 26 जनवरी 1950 के पूर्व देशी रियासतों तथा भारत संघ के बीच यदि कोई संधियाँ या संविदा हुई हो जो आज भी लागू हो, को छोड़कर।

(ii) समवर्ती प्रारम्भिक अधिकार (Concurrent Original Jurisdiction) - संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ उच्च न्यायालयों को भी अधिकार प्रदान किया गया है । संविधान के अनुच्छेद 32(1) के द्वारा विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय को ही उत्तरदायी ठहराया गया है कि “मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए समुचित कार्यवाही करें। इस प्रकार मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए अन्तिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय को ही अधिकार प्राप्त है।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार - सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा अपीलीय न्यायालय है। इसे भारत में स्थित सभी उच्च न्यायालयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय में निम्नलिखित मामले में अपील दाखिल की जा सकती है :

(i) संवैधानिक मामले में - भारत में स्थित किसी न्यायालय द्वारा दीवानी, आपराधिक या किसी अन्य कार्यवाहियों में दिये गये किसी निर्णय, डिक्री के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामले में कोई संवैधानिक प्रश्न निहित है।

(ii) दीवानी मामले में - भारत में स्थित किसी उच्च न्यायालय द्वारा किसी दीवानी मामले में दिये गये आदेश, निर्णय या डिक्री के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि -

  1. (क) मामले में विधि या सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न निहित है।
  2. (ख) उस मामले को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत किया जाना आवश्यक है।

(iii) आपराधिक मामले में - भारत में स्थित किसी उच्च न्यायालय द्वारा किसी आपराधिक मामले पर दिये गये निर्णय या अन्तिम आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है यदि

  1. उच्च न्यायालय ने किसी अभियुक्त के मुक्ति के आदेश को अपील में उलट कर मृत्युदंड दे दिया हो।
  2. उच्च न्यायालय ने किसी अधीनस्थ न्यायालय से कोई मामला अपने पास मंगा कर अभियुक्त को मृत्युदंड दे दिया हो।

(iv) विशेष आज्ञा से अपील - सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपने स्वविवेक से भारत में स्थित किसी न्यायालय द्वारा किसी मामले में दिये गये निर्णय, या आदेश के विरुद्ध अपील करने की इजाजत दे सकता है।

3. परामर्शी क्षेत्राधिकार - संविधान के अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को परामर्शी क्षेत्राधिकार प्राप्त है। अपने इस क्षेत्राधिकार के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय उन सभी मामलों पर परामर्श देने का कार्य करता है, जो राष्ट्रपति द्वारा समय-समय पर उसे सौंपे जायें।

4. अभिलेखीय क्षेत्राधिकार - संविधान का अनुच्छेद 129 सर्वोच्च न्यायालय को एक अभिलेख न्यायालय का दर्जा प्रदान करता है। अभिलेख न्यायालय का तात्पर्य ऐसे न्यायालय से है जिसके सभी निर्णय एवं लिखित कार्यवाहियाँ एक लिखित रिकार्ड के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं ताकि निचली अदालतों में उनका प्रयोग एक साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सके। इसके अतिरिक्त अभिलेख न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने का भी अधिकार होता है।

अयोध्या मामले में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को दंडित किया जाना न्यायालय की अवमानना का मुख्य उदाहरण है। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरणविद् तथा बुकर पुरस्कार विजेता अंरुधती राय को अपनी अवमानना के लिए दंडित किया था।

5. न्यायिक समीक्षा का अधिकार - भारत के सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक समीक्षा का भी अधिकार प्राप्त है। हालाँकि भारतीय न्यायालय की यह शक्ति इतनी व्यापक नहीं है जितनी अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है। न्यायिक समीक्षा के अधिकार से तात्पर्य ऐसे अधिकार से है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय विधायिका द्वारा बनाये गये किसी अधिनियम. कार्यपालिका द्वारा जारी किये गये आदेश तथा उच्च न्यायालयों द्वारा दिये गये किसी निर्णय की समीक्षा करता है और उनकी वैधता की जांच करता है। यदि कोई कानून या आदेश संवैधानिक प्रावधानों के प्रतिकूल होता है तो उसे अवैध घोषित करता है।

6. मौलिक अधिकारों या संरक्षक - इस शीर्षक के लिये लघु उत्तरीय प्रश्न सं. 5 देखें।

बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की मूल प्रस्तावना में किये गये सुधारों को बताइये।

बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की मूल प्रस्तावना में किये गये सुधारों को बताइये।

बयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की मूल प्रस्तावना में किये गये सुधारों को बताइये।

उत्तर - सन् 1976 में भारतीय संविधान ने 42वें संशोधन के द्वारा कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किये। इस संशोधन द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी कुछ बदलाव किये गये। 42वें संविधान संशोधन के उपरान्त संशोधित प्रस्तावना निम्नवत् है -

'हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखडता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. को (मिति मार्ग शीर्ष शक्ल सप्तमी. संवत 2006 विक्रमी) को एतदद्वारा उस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में व्यक्त किये गये उक्त विचार सर्वप्रथम पं. नेहरू द्वारा संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन में 13 दिसंबर 1949 के उद्देश्य प्रस्ताव में व्यक्त किये गये थे।

संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा की संज्ञा क्यों दी गई है

संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा की संज्ञा क्यों दी गई है

संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा की संज्ञा क्यों दी गई है?

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)

संवैधानिक उपचारों के अधिकार को संविधान का हृदय और आत्मा की संज्ञा दी गई है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वह संवैधानिक उपचारों के अधिकार के अंतर्गत मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण ले सकता है। इसी अनुच्छेद की शक्तियों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय अपने नागरिकों के मौलिक अधिकार, सुरक्षित और संरक्षित रखता है। इसलिये डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अनुच्छेद बताते हुए कहा था कि,“इसके बिना संविधान अर्थहीन है, यह संविधान की आत्मा और हृदय है।"

  1. इस भाग द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्यवाहियों द्वारा उच्चतम न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रत्याभूत किया जाता है।

  2. इस भाग द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को ऐसे निदेश या आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, जो भी समुचित हो, निकालने की शक्ति होगी।

  3. उच्चतम न्यायालय को खंड (1) और खंड (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संसद, उच्चतम न्यायालय द्वारा खंड (2) के अधीन प्रयोक्तव्य किन्हीं या सभी शक्तियों का किसी अन्य न्यायालय को अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर प्रयोग करने के लिए विधि द्वारा सशक्त कर सकेगी।

  4. इस संविधान द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अनुच्छेद द्वारा प्रत्याभूत अधिकार निलंबित नहीं किया जाएगा।


Wednesday, 19 January 2022

क्या निर्वाचन आयोग एक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र संस्था है?

क्या निर्वाचन आयोग एक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र संस्था है?

क्या निर्वाचन आयोग एक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र संस्था है?

  1. 'निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता' पर टिप्पणी लिखिए।
  2. अथवा निर्वचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक प्रावधान।

भारत में निर्वाचन आयोग एक स्वतन्त्र सांविधानिक निकाय है और संविधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि यह उच्चतम और उच्च न्यायालयों की भाँति कार्यपालिका के बिना किसी हस्तक्षेप के स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से अपने कार्यों को सम्पादित कर सके। इसकी स्वतंत्रता को बनाये रखने की दृष्टि से निम्नलिखित प्रावधान बड़े महत्वपूर्ण हैं .

निर्वाचन आयोग की स्वतन्त्रता के लिए संवैधानिक प्रावधान 

  1. निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है अर्थात इसका निर्माण संविधान ने किया है न कि कार्यपालिका या संसद ने।
  2. मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते है।
  3. मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। 
  4. मुख्य चुनाव आयुक्त का दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर है।
  5. नियुक्ति के पश्चात् मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तो में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
  6. मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य आयुक्तों का वेतन भारत की संचित निधि में से दिया जाता है।

संविधान निर्वाचन आयोग के पदाधिकारियों को पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है। जिससे वे अपने कार्यों को निडरता, निष्पक्षता तथा बिना किसी हस्तक्षेप के सम्पादित कर सकें।

निर्वाचन आयोग के पुनर्गठन और कार्यकरण हेतु सुझाव

चुनाव आयोग के गठन और कार्यकरण के प्रसंग में हमें व्यक्ति विशेष और परिस्थितियाँ विशेष से आगे बढ़कर व्यापक परिप्रेक्ष्य में 1951 से लेकर आज तक की स्थिति पर विचार करना होगा। इस सम्बन्ध में सुझाव और आम सहमति के कुछ सूत्र इस प्रकार हैं :

1. चुनाव आयोग बहुसदस्यीय (तीन-सदस्यीय) हो - गत 40 वर्षों में और विशेषतया 1971 से लेकर अब तक अनेक बार मुख्य चुनाव आयुक्त तथा चुनाव आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया जाता रहा है तथा इस स्थिति को समाप्त करने के लिए तारकुण्डे समिति तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग को 'बहुदलीय आयोग' बनाने का सुझाव दिया गया है।

प्रमुख राजनीतिक दलों में भी इस बात पर सहमति है कि चुनाव आयोग 'तीन सदस्यीय' होना चाहिए। भारत के तीन भूतपूर्व चुनाव आयुक्तों ने इस आधार पर सदस्यीया योग का विरोध किया था कि चुनाव सम्बन्धी मामलों में तत्काल निर्णय करने होते हैं तथा बहुसदस्यीय आयोग सम्भवतया तत्काल निर्णय नहीं ले सकेगा। बहसदस्यीय आयोग की समस्त कार्य-प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि वह अवसर के अनकल गतिशीलता को अपनाते हुए शीघ्र निर्णय ले सकें।

2. चुनाव आयुक्तो की नियुक्ति के सम्बन्ध में व्यवस्था - चुनाव आयोग के लिए राजनीतिक निष्पक्षता नितान्त आवश्यक है। अतः सभी पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि इस सम्बन्ध में शासन को मनमानी करने की स्थिति प्राप्त नहीं होनी चाहिए। विविध पक्षों की ओर से प्रस्तुत एक प्रमख सदान कि चनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति ऐसी समिति द्वारा की जाए, जिसके सदस्य प्रधानमन्त्री तथा संसद में विपक्ष का नेता हो।

3. चनाव आयोग की निष्पक्षता हेतु व्यवस्था - चुनाव आयोग से पद निवृत्त होने वाले आयुक्तों को भविष्य में किसी भी लाभ के पद पर नियुक्त न किया जाये। वस्तुतः चुनाव आयोग के सदस्यों मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों) को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, वरन उनकी निष्पक्षता सन्देह के परे होनी चाहिए। चुनाव आयोग, जिसका कार्यकरण राजनीतिक दलों से सम्बद्ध है। 'उसके सदस्यों पर पद निवृति के बाद एक निश्चित अवधि (2 या 3 वर्ष) तक किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित होने तथा विधायी पद प्राप्त करने पर रोक होनी चाहिए। इससे उनकी राजनीतिक तटस्थता की गारण्टी होगी तथा इस पद की विश्वसनीयता बढ़ेगी

4. बहुसदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका - चुनाव आयोग के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बहुसदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त की स्थिति अन्य चुनाव आयुक्तों के समान होनी चाहिए या उन्हें चुनाव आयुक्तों पर प्रमुखता की स्थिति प्राप्त होनी चाहिए। चूंकि चुनाव आयोग को चुनाव सम्बन्धी कुछ मामलों में तत्काल निर्णय लेने होते हैं और यह तभी सम्भव है जबकि चुनाव आयुक्त को चुनाव आयोग में महत्वपूर्ण स्थिति प्रदत्त की जाये।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 (3) में स्पष्ट रूप से निर्देशित किया गया है कि 'जब कोई अन्य निर्वाचित आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है तब मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा। इस प्रकार संविधान में अन्य चुनाव आयुक्तों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त की वरिष्ठता का प्रावधान किया गया है, यद्यपि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की उक्त वरिष्ठता या प्रमुखता सीमित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त से पहली अपेक्षा की जाती है कि वह अन्य चुनाव आयुक्तों को आयोग के कामकाज में सहयोग प्रदान करे। 

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  1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  2. चुनाव सुधारों में बाधाओं पर टिप्पणी कीजिए।
  3. चुनाव सुधार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।
  4. मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले तत्व बताइये।
  5. निर्वाचन विषयक आधारभूत सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।
  6. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1996 के अंतर्गत चुनाव सुधार के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1996 के अंतर्गत चुनाव सुधार के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1996 के अंतर्गत चुनाव सुधार के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1996 के अंतर्गत चुनाव सुधार के प्रावधानों का वर्णन कीजिए।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम -1996

भारतीय संविधान के अंतर्गत जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में इस संशोधन सन् 1996 को भारतीय संसद ने 31 जुलाई 1996 को पारित करके चुनाव सुधार की दिशा में अत्यन्त सराहनीय एवं महत्वपूर्ण प्रयास किया है। इस अधिनियम के द्वारा जन-प्रतिनिधित्व कानून में कुल 16 संशोधन किये गये हैं जोकि निम्नवत् है -

  1. मतदाता सूचियों की तैयारी से सम्बन्धित अपनी जिम्मेदारियों को न निभाने वाले कर्मचारियों पर पांच सौ रुपये का आर्थिक दंड या कम से कम तीन माह की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। कैद की अवधि अधिकतम दो वर्ष तक के लिए बढ़ाई जा सकती है।
  2. राष्ट्रीय प्रतीक अपमान निवारक अधिनियम 1971 की धारा दो या तीन के अंतर्गत दंडनीय अपराध की सजा पाये उम्मीदवारों को छ: वर्ष तक के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित करने का प्रावधान किया गया है।
  3. इस संशोधन के बाद चुनाव आयोग चुनाव के दौरान पर्यवेक्षक नियुक्त कर सकेगा तथा यह पर्यवेक्षक मतदान के केन्द्रों पर होने वाली किसी गडबड़ी के कारण मतगणना रोकने तथा परिणाम घोषित करने के निर्देश देने का अधिकार होगा।
  4. चुनाव प्रचार के लिए निर्धारित 21 दिनों की अवधि को कम करके 14 दिनों तक करने की व्यवस्था की गयी है।
  5. नये कानून के अनुसार निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए नामांकन करते समय कम से कम दस प्रस्तावकों के समर्थन की आवश्यकता होती है।
  6. संसद तथा विधानसभा चुनाव में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्रमशः 5,000 रुपये 2,500 रुपये जमानत राशि निर्धारित की गई है तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों के लिए जमानत की राशि क्रमशः 2500 रुपये तथा 1250 रुपये निर्धारित की गयी है।
  7. मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम मुद्रित करने की नई व्यवस्था के तहत सबसे ऊपर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार तत्पश्चात् पंजीकृत राजनीतिक दलों के और अन्ततः निर्दलीय उम्मीदवारों के नाम वर्णक्रमानुसार मुद्रित किये जाने की व्यवस्था की गई है।
  8. चुनाव के दौरान किसी भी उम्मीदवार की मृत्यु हो जाने की स्थिति में नई व्यवस्था के तहत चुनाव रद्द नहीं किया जा सकेगा बल्कि केवल स्थगित किया जायेगा। सात दिन के अन्दर नया उम्मीदवार का नाम देना होगा।
  9. कोई भी उम्मीदवार लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से अपना नामांकन नहीं कर सकेगा।
  10. चुनाव सभा में व्यवधान उत्पन्न करने वाले लोगों को छ: माह का कारावास या 2,000 रुपया का जुर्माना भरना होगा। सजा तथा जुर्माना दोनों साथ-साथ भी दिये जा सकते हैं।
  11. उम्मीदवार मतदान केन्द्र तक मतदाताओं को लाने ले जाने के लिए वाहनों का प्रयोग न कर सकेंगे इसके उल्लंघन के लिए उन्हें तीन माह का कारावास पर 1000 रुपये जुर्माना देना होगा।
  12. मतदान केन्द्र के आस-पास निर्धारित दूरी तक हथियार रखने पर सजा का प्रावधान है।
  13. मतदान केन्द्र पर कब्जा करने वाले साधारण नागरिकों को कम से कम एक वर्ष की सजा जो जुर्माने के साथ तीन वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है तथा सरकारी कर्मचारी के लिए कम से कम तीन वर्ष तथा जुर्माने के अलावा अधिकतम पांच वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है।
  14. औद्योगिक कर्मचारियों को वेतन सहित छुटटी का उल्लंघन करने वाले मालिकों के लिए जुर्माने की व्यवस्था है।
  15. स्थान रिक्त होने के छः माह के भीतर उप चुनाव की व्यवस्था का प्रावधान है, किन्तु यह प्रावधान शेष बचे एक वर्ष के लिए लागू नहीं होगी।
  16. मतदान प्रक्रिया पूरी होने की निर्धारित अवधि 48 घंटे के दौरान चुनाव क्षेत्रों में शराब य किसी प्रकार के मादक पदार्थों की बिक्री या लाने ले जाने पर प्रतिबन्ध होगा। 

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चुनाव सुधार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये।

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चुनाव सुधार (Election Reforms)

स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव एक स्वस्थ लोकतंत्र के अस्तित्व की पूर्व शर्त हैं। इसके अभाव में लोगों में आस्था समाप्त हो जाती है। मोहन धारिया के अनुसार, "वर्तमान निर्वाचन व्यवस्था, जो काले धन, जातिवाद प्रशासकीय मशीनरी के दुरुपयोग तथा बूथ कैप्चरिंग पर आधारित है, बड़ी तेजी से स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन में जनमानस की आस्था को समाप्त कर रही है।" यह तो सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई है परन्तु इसके साथ ही इस प्रक्रिया में अनेक विसंगतियाँ भी स्पष्ट हुई हैं। निर्वाचन में धन एवं बाहुबल के बढ़ते प्रभाव ने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन के समक्ष प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

चुनाव से सम्बंधित व्याधियों की विवेचना तथा चुनाव सुधार का विषय पिछले कुछ वर्षों से संसद एवं देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान आकर्षित करता रहा है। अनेक पक्षों द्वारा इस सम्बन्ध में अध्ययन कर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की गयी है। इन अध्ययनकर्ताओं में सबसे प्रमुख हैं - 'सिटिजन फॉर डेमोक्रेसी' नामक संगठन की ओर से जयप्रकाश नारायण द्वारा नियुक्त 'वारकुण्डे समिति'। इसी प्रकार 1972 में 'संयुक्त संसदीय समिति' ने अपने सुझाव दिये तथा अप्रैल 1975 में 'आठ दलीय स्मरण पत्र' प्रस्तुत किया गया।

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  5. क्या निर्वाचन आयोग एक निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र संस्था है?
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निर्वाचन विषयक आधारभूत सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

निर्वाचन विषयक आधारभूत सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

निर्वाचन विषयक आधारभूत सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिए।

निर्वाचन विषयक आधारभूत सिद्धान्त

भारतीय संविधान के निर्माता भारत के नवोदित लोकतन्त्र में निर्वाचन की जिम्मेदारी एक स्वतन्त्र संस्था को सौपने को उत्सुक थे। संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनावी व्यवस्था के विषय में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस सन्दर्भ में संविधान में कतिपय निम्नलिखित मूल सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है .

  1. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अब कोई स्थान नहीं है। इसके स्थान पर एक क्षेत्र विशेष के सभी वयस्क सदस्यों के लिए एक समान सूची बनाई जाती है।
  2. वर्तमान विधायिका में लगभग 22 प्रतिशत स्थान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन आरक्षित स्थानों के अतिरिक्त वे सामान्य स्थानों पर भी चुनाव लड़ सकते हैं।
  3. निर्वाचन से सम्बन्धित मामलों को निबटाने के लिए उच्च न्यायालय को मूल न्यायालय (Original Court) और सर्वोच्च न्यायालय को अपीलीय न्यायालय घोषित किया गया है। 

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