Friday, 18 January 2019

रसखान जी का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय और रचनाएँ

रसखान जी का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय और रचनाएँ

रसखान जी का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय और रचनाएँ

रसखान सगुण काव्यधारा की कृष्णाश्रयी शाखा के मुस्लिम कवि थे। हिंदी-साहित्य में रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में रसखान का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होंने अपनी काव्य-रचनाओं में ईश्वर के निर्गुण व सगुण दोनों ही रूपों का वर्णन अत्यधिक सुंदर रूप से किया है। डॉ० राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘‘ रसखान भक्तिकाल के सुप्रसिद्ध लोकप्रिय एवं सरस कवि थे। उनके सवैये हिंदी-साहित्य में बेजोड़ हैं।’’
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जीवन-परिचय कृष्णभक्त कवि रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था तथा वे शाही खानदान से संबंधित थे। उनका जन्म 1548 ई. (अनुमानित) में माना जाता है। ये दिल्ली के आसपास के रहने वाले थे। बाद में वे ब्रज में चले आए और फिर जीवन पर्यंत यहीं रहे। मूलत: मुसलमान होते हुए भी वे कृष्ण भक्त थे। श्रीरामचरितमानस का पाठ सुनकर इनके मन में काव्य-रचना की प्रेरणा हुई। इनकी भगवद् भक्ति को देखकर बल्लभाचार्य के सुपुत्र गोसाई बिट्ठलनाथ ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। कवि रसखान कृष्ण की भक्ति में अत्यधिक तल्लीन हो गए थे। उन्होंने अपनी काव्य-रचनाओं में भी कहा है कि वे अगले जन्मों में भी ब्रजभूमि को त्यागना नहीं चाहते भले ही पशुपक्षीपत्थर आदि के रूप में ही क्यों न जन्म मिले। इनका निधन 1628 ई. (अनुमानित) में हुआ।

साहित्यिक परिचय रसखान की कविता का मूलभाव कृष्ण भक्ति है। कृष्ण प्रेम में आकृष्ट होकर वे ब्रजभूमि में बस गए थे। उनकी कविता में प्रेमभक्तिशृंगार व सौंदर्य का अनुपम मेल हुआ है। कृष्ण के रूप लावण्य की जो झाँकी उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रस्तुत कीवह अत्यंत मनोहर बन पड़ी है। मुसलमान होते हुए भी रसखान कृष्ण भक्ति में सराबोर ऐसे भक्त कवि थेजिनके लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है
इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिंदू वारिए।
रसखान ने अपनी कविता कवित्तसवैया और दोहों में लिखी है। इन तीनों छंदों पर उनका पूरा अधिकार था। उनके सवैये जनता में विशेष लोकप्रिय हुए। अपनी रसपूर्ण कविता के कारण वे अपने नाम को सार्थक करते हुए वास्तव में रस की खान थे।

रचनाएँ रसखान की रचनाएँ कृष्ण प्रेम से सराबोर हैं। अब तक इनकी चार कृतियाँ उपलब्ध हुई हैं
(अ) प्रेम-वाटिका 
(ब) सुजान रसखान
(स) बाल लीला  
(द) अष्टयाम
इन रचनाओं का संकलन रसखान रचनावली’ के नाम से भी किया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि रसखान की केवल दो रचनाएँ ही प्रामाणिक हैंसुजान रसखान और प्रेम-वाटिका।

भाषागत विशेषताएँ रसखान ब्रजभाषा के कवि हैं। उनकी भाषा सरलसुबोध व सहज है। उसमें आडंबर-विहीनता है। अलंकारों का सहज प्रयोग उनके काव्य में हुआ है। शब्दों के माध्यम से ऐसे गतिशील चित्र उन्होंने अंकित किए हैंजिससे भाषा में चित्रोपमता का गुण आ गया है। रसखान ने अपनी रचनाओं में कवित्तसवैया तथा दोहों छंदों का प्रयोग किया है। इनकी कविताओं में प्रेमभक्तिशृंगार व सौंदर्य का अनुपम मेल हुआ है। कृष्ण के रूप लावण्य की इन्होंने गोपी रूप में भक्ति की है।

Thursday, 17 January 2019

मित्रता पाठ का सारांश - आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मित्रता पाठ का सारांश - आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मित्रता पाठ का सारांश - आचार्य रामचंद्र शुक्ल

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मित्रता आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित प्रसिद्ध निबंध हैजिसे उन्होंने जीवनोपयोगी विषय पर लिखा हैजिसमें इनकी लेखन-शैली संबंधी अनेक विशेषताओं के दर्शन हो जाते हैं। शुक्ल जी ने मित्रता के संबंध में बताते हुए कहा है कि जब कोई युवक किशोरावस्था में घर से बाहर जाता हैउसे मित्र चुनने में कठिनाई होती है। यदि उसका व्यवहार मेल-मिलाप वाला होता हैतो उसकी लोगों से जान-पहचान बढ़ जाती है जो बाद में मित्रता का रूप धारण कर लेती है। मित्रों के चुनाव पर उसके जीवन की सफलता निर्भर होती है क्योंकि अच्छे व बुरे मित्रों की संगति ही उसे अच्छा व बुरा बना सकती है। युवा लोग मित्र बनाने से पहले मित्रों के आचरण व प्रकृति का ध्यान नहीं रखतेवे केवल उनकी बाहरी विशेषताओं पर मुग्ध हो जाते हैंजबकि मनुष्य अगर घोड़ा भी खरीदता है तो उसके गुण-दोषों को परख लेता है। किसी प्राचीन विद्वान ने कहा भी है ‘‘विश्वासपात्र मित्र से बड़ी रक्षा रहती है।’’ जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि खजाना मिल गया। 

जब व्यक्ति छात्रावास में रहता है तब उस पर मित्र बनाने की धुन सवार रहती है। बचपन की मित्रता भी अद्भुत है उसमें जितनी जल्दी दूसरे की बातें मन को लगती हैंउतनी जल्दी ही रूठना मनाना भी हो जाता है। मित्रता व प्रेम के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दो लोगों के आचरण व स्वभाव में समानता हो जैसे राम और लक्ष्मण के स्वभाव एक दूसरे से विपरीत थेपरंतु दोनों में प्रगाढ़ प्रेम था। उसी तरह कर्ण और दुर्योधन के स्वभाव में विपरीतता होने के बाद भी दोनों में गहरी मित्रता थी। इसी प्रकार चाणक्य व चंद्रगुप्तअकबर व बीरबल आदि अनेक उदाहरण हैं। मित्र का परम कर्तव्य अपने मित्र की सहायता व उसे विकास के लिए प्रोत्साहित करना है। हमें ऐसे ही मित्रों की खोज करनी चाहिएजो हमारे शुभचिंतक हों जैसे राम व सुग्रीव। यदि कोई हमारे भले बुरे के बारे में हमें सचेत न कर सके तो हमें उससे दूर ही रहना चाहिए। ऐसे युवक जो आवारागर्दी करते हैं उनसे शोचनीय जीवन किसी और का नहीं है। क्योंकि उन्हें फूल-पत्तियोंझरनों की कल-कल की आवाज आदि में कोई सौंदर्य नजर नहीं आता है। जो दिन-प्रतिदिन विषयवासनाओं में लिप्त रहता है और जिनके हृदय में केवल बुरे विचार ही उठते हैं ऐसे युवकों का भविष्य अंधकारमय होता हैअत: हमें ऐसे लोगों की मित्रता से दूर रहना चाहिए। बुरी संगति बहुत भयानक होती है क्योंकि यह व्यक्ति के सभी सद्गुणों का नाश कर देती है और दिन-प्रतिदिन मनुष्य को पतन के गड्ढे में गिरा देती है। इसके विपरीत अच्छी संगति मनुष्य को पतन के गड्ढे से बाहर निकालने वाली बाहु के समान होगी। 

शुक्ल जी कहते हैं कि इंग्लैंड का एक विद्वान इस बात के लिए हमेशा खुश होता था कि उसे युवावस्था में राजदरबार में स्थान नहीं मिला क्योंकि वहाँ के लोगों की बुरी संगति उसके आध्यात्मिक विकास में बाधक होती। लेखक कहते हैं कि अश्लील व फूहड़ बात करने वालों को तुरंत रोक देना चाहिए। यदि तुम सोचोगे कि तुम्हारे चरित्र के प्रभाव के कारण वह स्वयं चुप हो जाएगा तो ऐसा संभव नहीं है। क्योंकि एक बार मनुष्य जब बुराई की तरफ बढ़ता है तो वह नहीं देखता कि वह कहाँ जा रहा है और उस बुराई के प्रति धीरे-धीरे तुम्हारी घृणा कम हो जाएगी। अंत में तुम भी बुराई के भक्त बन जाओगे। इसलिए मन को स्वच्छ और उज्ज्वल रखने का सर्वोत्तम उपाय बुरी संगति से दूर रहना है क्योंकि काजल की कोठरी में कितना भी चतुर व्यक्ति प्रवेश करेउसे कालिख लग ही जाती है।
भारतीय संस्कृति पाठ का सारांश - डॉ. राजेंद्र प्रसाद

भारतीय संस्कृति पाठ का सारांश - डॉ. राजेंद्र प्रसाद

भारतीय संस्कृति पाठ का सारांश डॉ. राजेंद्र प्रसाद

भारतीय संस्कृति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एक भाषण का अंश है। इसमें उन्होंने बताया है कि भारत जैसे विशाल देश में जीवन व रहन-सहन की विविधता में भी एकता के दर्शन होते हैं। विभिन्न भाषाजाति व धर्म की मणियों को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली हमारी भारतीय संस्कृति विशिष्ट है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी कहते हैं कि यदि कोई विदेशी व्यक्ति जो भारत की विभिन्नता से पूरी तरह से अनभिज्ञ होअगर वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा करें तो वह इस देश की विभिन्नताओं को देखकर कहेगा कि यह एक देश नहीं हैबल्कि कई देशों का एक समूह है जो बहुत-सी बातों में एक-दूसरे से बिलकुल अलग है। यहाँ प्राकृतिक विभिन्नताएँ भी एक महाद्वीप के समान नजर आती हैं। यहाँ एक ओर उत्तर में बर्फ से ढ़की हुई हिमालय की चोटियाँ हैं तो दूसरी तरफ दक्षिण में बढ़ने पर समतल मैदान व फिर विंध्यअरावलीसतपुड़ा आदि की पहाड़ियाँ। पश्चिम से पूर्व में भी विभिन्न विषमताएँ हैं। भारत में एक तरफ हिमालय में कठोर सर्दी वहीं दूसरी ओर समतल मैदानों में जलती हुई लू (गर्म हवाएँ) और कन्याकुमारी का सुहावना मौसम भी है। यहाँ अगर असम में वर्षा तीन सौ इंच है तो जैसलमेर में दो से चार इंच है। भारत में सभी तरह के अन्न का उत्पादन होता है। यहाँ सब प्रकार के फलसभी प्रकार के खनिजवृक्षजानवर आदि पाए जाते हैं। यहाँ पर रहन-सहनखान-पान का अंतर वहाँ के लोगों की शारीरिक बनावट में भी देखने को मिलता है। इसी प्रकार यहाँ भिन्न-भिन्न भाषाएँ व बोलियाँ प्रचलित हैं। भारत में प्राय: सभी धर्मों के लोग पाए जाते हैं। अगर भारत की विभिन्नता को देखकर कोई अपरिचित इसे देशों का समूह या जातियों का समूह कहेतो इसमें कोई अचंभा करने वाली बात नहीं है। परंतु सूक्ष्मता से विचार करने पर इन विभिन्नताओं में भी एकता नजर आती हैजैसे विभिन्न फूलों को पिरोकर सुंदर हार तैयार किया गया हो। भारतीय संस्कृति में व्याप्त विभिन्नताएँ भी ऐसे फूलों व मणियों के समान ही हैं। भारत की बहुरंगी संस्कृति की अनेकता में व्याप्त एकता किसी कवि की कल्पना मात्र नहीं हैबल्कि एक ऐतिहासिक सत्य हैजो हजारों वर्षों से विद्यमान है। भारतीय संस्कृति के विशाल सागर में गिरने वाली जातिधर्मभाषारूपी आदि नदियों में एक ही रूप से वही जल बहता हैजो भारत देश के अस्तित्व को कायम रखने में कामयाब हुआ है। डॉ. प्रसाद कहते हैं कि भारत में नीति व अध्यात्म ऐसा दााोत है जो संपूर्ण भारत में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में बहता रहता है। हमारे देश में उच्च चरित्र वाले तथा आत्मिक चेतना से संपन्न महापुरुषों का जन्म होता रहा है जिनके सत्य और अहिंसा के सिद्धांत मानवता के लिए आवश्यक हैं। भारत में स्थापित प्रजातंत्र से मानव को अपना पूरा विकास करने की स्वतंत्रता प्राप्त हुई है और सामूहिक व सामाजिक एकता के विकास का मार्ग भी अग्रसर हुआ है। भारतीय संस्कृति का मूल आधार अहिंसा है और अहिंसा का दूसरा रूप त्याग है। हिंसा का दूसरा रूप स्वार्थ है जो भोग के रूप में हमारे सामने आता है। परंतु हमारी सभ्यता के अनुसार भोग की उत्पत्ति त्याग से हुई है व त्याग भोग में ही पाया जाता है। त्याग की भावना का मन में उद्भव होने पर मन में अपार सुख व शांति का अनुभव होता है। भारत में विभिन्न धर्मों और संप्रदायों को विकास करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। भारत ने विभिन्न देशों की संस्कृति को अपने में मिलाया व स्वयं भी उनमें मिश्रित हो गया और देश व विदेशों में एकताप्रेम व भाईचारे के साथ स्थापित की। भारत ने दूसरों पर कभी अत्याचार नहीं किया बल्कि उनके हृदयों को जीतकर अपना प्रभुत्व कायम किया। वैज्ञानिक व औद्योगिक विकास के भयंकर परिणामों के प्रति हमें सचेत रहना चाहिए व विपत्तियों के आने पर घबराना नहीं चाहिए। पहले भी प्रकृति द्वारा या मानव द्वारा किए गए अत्याचारों से हम विचलित नहीं हुए। यहाँ साम्राज्य बने और समाप्त हुए’ संप्रदायों का उत्थान व पतन हुआ परंतु हमारी संस्कृति निरंतर बनी रही। अपने बुरे दिनों में भी हमारे यहाँ बहुत से विद्वान हुए। अंग्रेजों द्वारा परतंत्र होने पर भी यहाँ गाँधीरवींद्रअरविंदरमन जैसे लोगों का जन्म हुआजो सारे संसार के लिए आदर्श न बन गए। हमारे देश के प्राण व जीवन रेखा देश में व्याप्त सामूहिक चेतना हैजो नगर और ग्रामप्रदेश और संप्रदायवर्ग व जातियों को एक सूत्र में बाँधती है। अब हमें अपने देश भारत में उन अन्यायों व अत्याचारों को नहीं दोहराना है जो समाज में संघर्ष को जन्म देते हैं। हमें अपनी ऐतिहासिकनैतिकसांस्कृतिक चेतना के आधार पर अपनी आर्थिक व्यवस्था को मजबूत करना है। हमारे अंदर स्वयं के कल्याण की भावना न होकर जन कल्याण की भावना होनी चाहिए। आज विज्ञान के विकास के फलस्वरूप व्यक्ति के हाथ में अतुलनीय और अद्भुत शक्ति हैजिसका उपयोग व्यक्ति व समूह के उत्थान व पतन के लिए होता रहता है। इसलिए हमें जन कल्याण की भावना को जाग्रत करना ही होगा। वर्तमान में भारत की प्रत्येक प्रादेशिक भाषा की सुंदर कृतियों के स्वाद को संपूर्ण भारत को चखाने के लिए उसका देवनागरी हिंदी में प्रकाशन साहित्यिक संस्थानों को करवाना चाहिए। दूसरी तरफ एक ऐसी संस्था की स्थापना की आवश्यकता है जो इन सभी भाषाओं के आदान-प्रदान को अनुवाद के माध्यम से कर सके। साहित्य संस्कृति का एक रूप है। इसके अतिरिक्त गाननृत्यचित्रकला व मूर्तिकला इसके दूसरे रूप हैं। भारत इन सब कलाओं में एकरूपता के द्वारा अपनी एकता को प्रदर्शित करता रहा है। भारत के विषय में शाहजहाँ ने भी एक भवन पर गुदवाया है ‘‘यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहाँ ही हैयहाँ ही हैयहाँ ही है।’ यह स्वप्न तभी सत्य होगा तथा पृथ्वी पर स्वर्ग तभी स्थापित होगा जब भूमंडल के सारे मानव अहिंसासत्यसेवा को अपना आदर्श मानने लगेंगे।

Wednesday, 16 January 2019

कवि नागार्जुन का जीवन परिचय रचनाएँ और साहित्यिक परिचय

कवि नागार्जुन का जीवन परिचय रचनाएँ और साहित्यिक परिचय

कवि नागार्जुन का जीवन परिचय रचनाएँ और साहित्यिक परिचय

सही अर्थों में नागार्जुन भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं। ये प्रगतिवादी युग के कवि हैं। जन संघर्ष में अडिग आस्थाजनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपनाये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहींउनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैंजिन्होंने इतने छंदइतने ढंगइतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमान किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करने वाले वे अद्वितीय कवि हैं।
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जीवन परिचय प्रगतिवाद के गौरवपूर्ण स्तंभ नागार्जुन का जन्म सन् 1911 ई़ में दरभंगा जिले के सतलखा ग्राम में हुआ था। नागार्जुन हिंदी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिंदी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गाँव के एक किसान थे और खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में आस-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे। उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही यात्री’ हो गए। आरंभिक शिक्षा प्राचीन पद्धति से संस्कृत में हुई किंतु आगे स्वाध्याय पद्धति से ही शिक्षा बढ़ी। राहुल सांकृत्यायान के संयुक्त निकाय’ का अनुवाद पढ़कर वैद्यनाथ की इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल पालि में पढ़ा जाए। इसके लिए वे लंका चले गएजहाँ वे स्वयं पालि पढ़ते थे और मठ के भिक्खुओं’ को संस्कृत पढ़ाते थे। यहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली।
बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध शिष्य के नाम पर इन्होंने अपना नाम नागार्जुन’ रख लिया। इनका आरंभिक जीवन अभावों से ग्रस्त रहा। जीवन के अभावों ने ही इन्हें शोषण के प्रति विद्रोह की भावनाओं से भर दिया। 1941 ई़ में वे भारत लौट आए। नागार्जुन जी ने कई बार जेल यात्रा भी की। अपने विरोधी स्वभाव के कारण ये स्वतंत्र भारत में भी जेल गए। यह महान विभूति 87 वर्ष की अवस्था में 5 नवंबर 1998 को पंचतत्वों में विलीन हो गई।

काव्यगत विशेषताएँ इनके काव्य में निम्नलिखित विशेषताएँ हैं
  • नागार्जुन जी की भाषा सरल, सरसव्यावहारिक एवं प्रभावोत्पादक है। उन्होंने तत्सम और तद्भव दोनों शब्दों का प्रयोग किया है।
  • इन्होंने अपनी रचनाओं में अनुप्रास, उपमारूपक और अतिशयोक्ति अलंकारों का प्रयोग किया है।
  • इनकी काव्य रचनाओं में अभिव्यक्ति का ढंग तिर्यक बेहद ठेठ और सीधा भी है।
  • अपनी तिर्यकता की प्रस्तुति में ये जितने बेजोड़ हैं, अपनी वाग्मिता में ये उतने ही विलक्षण भी हैं।
  • उन्होंने अपनी रचनाओं में मुक्तक तथा प्रबंध शैली को अपनाया है।
  • इनकी शैली प्रतीकात्मक और व्यंग्य प्रधान है।

रचनाएँ नागार्जुन ने छ: से अधिक उपन्यासएक दर्जन कविता-संग्रहदो खंडकाव्यदो मैथिली (हिंदी में भी अनूदित) कविता-संग्रहएक मैथिली उपन्यासएक संस्कृत काव्य धर्मलोक शतकम’ तथा संस्कृत की कुछ अनूदित कृतियों की रचना की।
(अ) कविता-संग्रह अपने खेत मेंयुगधारासतरंगे पंखों वालीप्यासी पथराई आँखेंखून और शोलेतालाब की मछलियाँखिचड़ी विपल्व देखा हमनेहजार-हजार बाँहों वालीपुरानी जूतियों का कोरसतुमने कहा थाइस गुबार की छाया मेंओम मंत्रभूल जाओ पुराने सपनेरत्नगर्भभस्मांकुर (खंडकाव्य)
(ब) उपन्यास: रतिनाथ की चाचीबलचनमाबाबा बटेसरनाथनई पौधवरुण के बेटेदुखमोचनउग्रताराकुंभीपाकपारोआसमान में चाँद तारे
(स) व्यंग्य अभिनंदन
(द) निबंध संग्रह अन्नहीनम क्रियानाम
(य) बाल साहित्य कथा मंजरी भागकथा मंजरी भागमर्यादा पुरुषोत्तमविद्यापति की कहानियाँ
(र) मैथिली रचनाएँ पत्रहीन नग्न गाछ (कविता-संग्रह)हीरक जयंती (उपन्यास)
(ल) बांग्ला रचनाएँ मैं मिलिट्री का पुराना घोड़ा (हिंदी अनुवाद)
(व) नागार्जुन रचना संचयन ऐसा क्या कह दिया मैंने

साहित्यिक परिचय- नागार्जुन हिंदी और साहित्य के अप्रतिम लेखक और कवि थे। हिंदी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन’ तथा मैथिली में यात्री’ उपनाम से रचनाएँ की। नागार्जुन ने जीवन के कठोर यथार्थ एवं कल्पना पर आधारित अनेक रचनाओं का सृजन किया। अभावों में जीवन व्यतीत करने के कारण इनके हृदय में समाज के पीड़ित वर्ग के प्रति सहानुभूति का भाव विद्यमान था। अपने स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण करने वाले व्यक्तियों के प्रति इनका मन विद्रोह की भावना से भर उठता था। 

सामाजिक विषमताओं शोषण और वर्ग-संघर्ष पर इनकी लेखनी निरंतर आग उगलती रही। अपनी कविताओं के माध्यम से इन्होंने दलितपीड़ित और शोषित वर्ग को अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा दी। अपने स्वतंत्र एवं निर्भीक विचारों के कारण इन्होंने हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान बनाई। इनकी गणना वर्तमान युग के प्रमुख व्यंग्यकारों में की जाती है।
उद्धव-गोपी संवाद का सारांश - भ्रमरगीत

उद्धव-गोपी संवाद का सारांश - भ्रमरगीत

उद्धव-गोपी संवाद का सारांश - भ्रमरगीत

उद्धव-गोपी संवाद ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग का एक सरस अंग है। श्रीकृष्ण के मथुरा जाने के बाद गोपियां अति व्याकुल हैं। उद्धव जी श्रीकृष्ण का संदेश लेकर ब्रज आते हैं और गोपियों को योग की शिक्षा देते हैं जिस पर असमर्थता जताते हुए गोपी कहती हैं– उद्धव हमारे दस-बीस मन नहीं हैं जो हम निर्गुण बह्म की उपासना करेंहमारा तो एक ही मन हैजो श्रीकृष्ण के प्रेम में लीन है और उन्हीं के साथ मथुरा चला गया है। उनके जाने के बाद हमारा शरीर उसी प्रकार शक्तिहीन व निर्बल है जिस प्रकार बिना सिर वाला धड़। श्रीकृष्ण के मथुरा से वापस लौटने की आशा में ही हमारे शरीर में श्वास चल रही है और इस आशा में हम करोड़ों वर्षों तक जीवित रह सकती हैं। तुम तो श्रीकृष्ण के परममित्र व सभी प्रकार के योग के स्वामी होआप ही श्रीकृष्ण से हमारा मिलन करा दो। उद्धव से गोपियाँ कहती हैं कि श्रीकृष्ण के अलावा हमारा कोई भी आराध्य नहीं है। गोपियाँ उद्धव से परिहास करती हुई कहती हैं कि उद्धव हमें लगता है कि श्रीकृष्ण ने तुम्हें नहीं भेजा हैतुम तो कहीं से भटकते हुए आ गए हो। तुम्हें ब्रज की नारियों से योग की बात करते हुए लज्जा नहीं आती है। वैसे तो तुम बड़े सयाने बनते हो परंतु तुम विवेक की बात नहीं करते हो। तुमने हमसे जो कुछ भी कहा वह हमने सहन कर लिया परंतु क्या तुमने योग की अवस्था का विचार किया हैइसलिए अब तुम चुप रहो। गोपियाँ उद्धव से शपथ देकर उद्धव को गोकुल भेजते समय श्रीकृष्ण की प्रतिक्रिया के बारे में पूछती हैं।
गोपियाँ उद्धव की निर्गुण ब्रह्म की उपासना के उपदेश से परेशान होकर उससे पूछती हैं कि हे उद्धव! निर्गुण ब्रह्म किस देश का वासी हैउसके माता-पिता कौन हैंस्त्री और दासी कौन हैंउसका रंग व वेश वैâसा हैउन्हें किस रंग से लगाव हैतुम हमें ठीक से बताओयदि तुम कपट करोगेतो इसका फल अवश्य पाओगे। गोपियों के ऐसे तर्कपूर्ण प्रश्न सुनकर उद्धव ठगे से रह गए और उनका सारा ज्ञान का गर्व समाप्त हो गया।

Tuesday, 15 January 2019

सूरदास जी की जीवनी और साहित्यिक परिचय Surdas Biography in Hindi

सूरदास जी की जीवनी और साहित्यिक परिचय Surdas Biography in Hindi

सूरदास जी की जीवनी और साहित्यिक परिचय Surdas Biography in Hindi

सूरदास जी को भक्तिकाल की कृष्णाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि व वात्सल्य रस का सम्राट माना जाता है। इन्होंने अपने पदों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और प्रेमलीलाओं का बहुत मनमोहक चित्रण किया है। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया हैवह अद्वितीय है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनके विषय में लिखा भी है, ‘‘वात्सल्य और शृंगार के क्षेत्रों का जितना अधिक वर्णन सूर ने अपनी बंद आँखों से कियाउतना संसार के किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का वे कोना-कोना झाँक आए।’’
जीवन परिचय सूरदास जी के जन्म व जन्म-स्थान के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। साहित्यलहरी सूरदास जी की रचना है। इसमें साहित्यलहरी के रचना-काल के संबंध में निम्न पद मिलता है
मुनि पुनि के रस लेख।
दसन गौरीनंद को लिखि सुवल संवत् पेख।।
इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् 1607 वि. माना हैइसलिए ‘साहित्यलहरी’ का रचना-काल संवत् 1607 वि. माना जाता है। सूरदास जी का जन्म सं. 1537 वि. के लगभग मानते हैं क्योंकि बल्लभ संप्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ल पंचमीसंवत् 1535 वि. मानते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार सूरदास जी का जन्म आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकता नामक गाँव में सन् 1478 ई. (वैशाख शुक्ल पंचमीमंगलवारसंवत् 1535 वि.) में हुआ था। कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही ग्राम में मानते हैं। इनके पिता पं. रामदास थेजो एक सारस्वत ब्राह्मण थे। सूरदास जन्मान्ध थे या नहींइस संबंध में भी अनेक मत हैं। श्यामसुंदर दास ने इनके बारे में लिखा है–‘‘सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थेक्योंकि शृंगार व रंग-रूपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।’’ अत: ऐसा माना जाता है कि ये जन्म के बाद अंधे हुए होंगे। सूरदास जी द्वारा लिखित निम्न पंक्ति से इस बात का पता चलता है–‘श्री गुरु बल्लभ तत्व सुनायोलीला भेद बतायो।’ सूरदास जी पहले दीनता के पद गाया करते थेकिंतु बल्लभाचार्य के संपर्क में आने के बाद ये कृष्ण लीला का गान करने लगे। सूरदास से प्रभावित होकर ही तुलसीदास ने ‘श्रीकृष्णगीतावली’ की रचना की थी।
बल्लभाचार्य के पुत्र बिट्ठलनाथ ने ‘अष्टछाप’ के नाम से आठ कृष्णभक्त कवियों का संगठन किया था। सूरदास अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। बिट्ठलनाथ ने इन्हें ‘पुष्टिमार्ग का जहाज’ कहा है। इनका देहावसान सन् 1583 ई. में गोसाई बिट्ठलनाथ के सामने गोवर्द्धन की तलहटी में पारसोली नामक ग्राम में हुआ था। निम्नलिखित गुरु वंदना संबंधी पद का गान करते हुए इन्होंने अपने शरीर को त्यागा
भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो।
श्रीबल्लभ नख-छंद-छटा बिनु सब जग माँझ अँधेरो।।
साहित्यिक परिचय सूरदार ने प्रेम और विरह के द्वारा सगुण मार्ग से कृष्ण को साध्य माना था। उनके कृष्ण सखा रूप में सर्वशक्तिमान परमेश्वर थे। सूरदास ने कृष्ण की बाल-लीलाओं का बड़ा ही मनोरम वर्णन किया है। बाल-जीवन का कोई पक्ष ऐसा नहींजिस पर इनकी दृष्टि न पड़ी हो। इसलिए इनका बाल-वर्णन विश्व-साहित्य की अमर-निधि बन गया है। ‘सूरदास’ का एक प्रसंग ‘भ्रमरगीत’ कहलाता है। इस प्रसंग में गोपियों के प्रेमावेश ने ज्ञानी उद्धव को भी प्रेमी व भक्त बना दिया। इनके विरह-वर्णन में गोपियों के साथ-साथ ब्रज की प्रकृति भी विषादमग्न दिखाई देती है।
पानी में चंदा और चाँद पर आदमी’ का सारांश

पानी में चंदा और चाँद पर आदमी’ का सारांश

पानी में चंदा और चाँद पर आदमी का सारांश

प्रस्तुत वैज्ञानिक लेख जयप्रकाश भारती जी द्वारा लिखित हैजिसमें विचार सामग्रीविवरण और इतिहास के साथ एक रोमांचकारी कथा का आनंद प्राप्त होता है। लेखक ने पृथ्वी और चंद्रमा की दूरीचंद्रयान और उसको ले जाने वाले अंतरिक्ष यान तथा चंद्र-तल के वातावरण का सजीव परिचय प्रस्तुत किया है तथा अंतरिक्ष यात्रा का संक्षिप्त इतिहास भी दिया है। लेखक 21 जुलाई सन् 1969 के दिन का वर्णन करते हुए कहता है कि जिस दिन मनुष्य को अपना पहला कदम चंद्रमा की सतह पर रखना थाउस समय सारी दुनिया के लगभग सभी भागों में सभी स्त्री-पुरुष व बच्चे रेडियों से संपूर्ण घटना को सुन रहे थे जिनके पास टी०वी० था वे आँखें गड़ाए इसे देख रहे थे और इस रोमांचकारी घटना के क्षण-क्षण के गवाह बन रहे थे।

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सोमवार 21 जुलाई 1969 को भारतीय समयानुसार सुबह एक बजकर सैंतालीस मिनट पर ईगल नामक चंद्रयान नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन को लेकर चंद्रमा के जलविहीन शांति सागर में उतरा। पृथ्वी से चार लाख किलोमीटर दूर चंद्रमा पर पहुँचने में मानव को 102 घंटे 45 मिनट और 42 सेकेंड का समय लगा। अपोला-11 ने बुधवार 16 जुलाई 1969 को केप केनेडी से अपनी यात्रा शुरु की जिसमें तीन यात्री नील आर्मस्ट्रांगएडविन एल्ड्रिन और माइकल कांलिस थे। चंद्रमा की कक्षा में पहुँचकर चंद्रयान मूलयान कोलम्बिया से अलग होकर चंद्रतल पर उतर गया और मूलयान 16 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करने लगा जिसमें माइकल कालिंस था।

नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रतल से पृथ्वी की सुंदरता का वर्णन करते हुए इसे बड़ीचमकीली और सुंदर बताया। दोनों यात्रियों ने चंद्रयान का निरीक्षण करके व कुछ देर आराम करके चंद्रतल पर उतरने का निर्णय लिया। पहले सीढ़ियों से धीरे-धीरे नील आर्मस्ट्रांग नीचे उतरे और अपना बायाँ पैर चंद्रतल पर रखा। इस बीच आर्मस्ट्रांग दोनों हाथों से चंद्रयान को पकड़े रहे। आश्वस्त होने के बाद वह यान के आसपास ही कुछ कदम चले। चंद्रयान के अंदर बैठे एल्ड्रिन ने मूवी कैमरे से आर्मस्ट्रांग के चित्र लेने शुरू कर दिए। बीस मिनट बाद वह भी चंद्रयान से बाहर निकल गए। तब तक आर्मस्ट्रांग ने चंद्रधूल का नमूना जेब मे रख लिया था व टेलीविजन कैमरे को त्रिपाद पर जमा दिया था। मानव चंद्रतल पर अरबों डॉलर खर्च करने के बाद पहुँचा था इसलिए सीमित समय के एक-एक क्षण का उपयोग करके दोनों यात्रियों को चंद्रमा की चट्टानों व मिट्टी के नमूने लेने थे तथा चंद्रतल पर कई तरह के वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करने थे। इन यात्रियों ने वहाँ पर भूकंपमापी यंत्र व लेसर परावर्त्तक रखा। इन्होंने वहाँ तीनों चंद्र यात्रियों और अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के हस्ताक्षरयुक्त धातु फलक रखा और अमेरिकी ध्वज फहराया। विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों के संदेशों की माइक्रो फिल्म भी वहाँ पर छोड़ी और विभिन्न अंतरिक्ष यात्रियों को दिए गए पदकों की अनुकृतियाँ वहाँ रखी।

मानव का चंद्रमा पर उतरने का यह प्रयास प्रथम होते हुए भी सफल रहा। जिस चंद्रमा को कवियों ने सलोना तथा सुंदर कहा था उसे वैज्ञानिकों ने बदसूरत व जीवनहीन करार दे दिया। चंद्रमा के बारे में संसार की हर जाति ने कहानी बनाई और उसे रजनीपति व रात्रि की देवी माना। श्रीराम व कृष्ण भी उस खिलौने को पाने का हठ करते थे तब बालक को बहलाने का उपाय था– चंद्रमा की छवि को पानी में उतारना। मानव की प्रगति की यात्रा को महादेवी वर्मा ने एक सूत्र में बाँधते हुए कहा– ‘‘पहले पानी में चंदा को उतारा जाता था और आज चाँद पर मानव पहुँच गया है।’’

अंतरिक्ष युग का सूत्रपात 4 अक्टूबर 1957 को हुआ था जब सोवियत रूस के स्पुतनिक यान में यूरी गागरिन प्रथम अंतरिक्ष यात्री बना। इसके ठीक 11 वर्ष 9 मास 17 दिन बाद मानव चंद्रमा पर पहुंचा। दिसंबर १९६८ में अपोलो-8 के तीनों यात्री चंद्रमा के पड़ोस तक पहुँचे। अपोला-10 के द्वारा इस नाटक का पूर्वाभिनय किया गया। जिसमें एक यात्री यान को चंद्रमा की कक्षा में घुमाता रहा और अन्य दो यात्री चंद्रयान को चंद्रमा से केवल ९ मील की दूरी तक ले गए थे। अपोलो-यान-सैटन-5 रॉकेट से प्रक्षेपित किया जाता है। यह विश्व का शक्तिशाली वाहन है। जिसके तीन भाग होते हैंकमांड माड्यूलसर्विस माड्यूल और ईगल। जिसके दो भाग-अवरोह व आरोह थे। नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन ने चंद्रतल पर 21 घंटे 36 मिनट बिताए। उन्होंने लाखों डालर का सामान भी वहाँ छोड़ा।

दोनों चंद्र-विजेताओं ने ऊपर उड़ान भरते हुए चंद्रकक्ष में परिक्रमा करते हुए मूलयान से अपने यान को जोड़ा ओर अपने साथी माइकल कालिंस से मिल गए। उन्होंने चंद्रयान को अलग करके उसे चंद्रकक्ष में छोड़ दिया और इंजन दागकर वापसी के लिए बढ़ चले। वे प्रशांत महासागर में उतरे। जहाँ से उन्हें चंद्र प्रयोगशाला ले जाया गयाउनके अनुभव रिकार्ड किए गए व उनकी जाँच भी की गई कि ये यात्री मानव जाति के लिए हानिकारक कीटाणु तो साथ नहीं लाए हैं। चंद्रतल की मिट्टी व चट्टानों के नमूनों को विभिन्न देशों के विशेषज्ञों को अनुसंधान के लिए दिया गया।

अपोलो-11 के बाद अपोलो-12 को भी चंद्रतल की खोज के लिए भेजा गया व अपोलो-13 की यात्रा दुर्घटनावश बीच में रोकनी पड़ी।

अभी चंद्रमा के लिए बहुत-सी यात्राएँ होगी। अंतरिक्ष में परिक्रमा करने वाला स्टेशन स्थापित करने की दिशा में तेजी से प्रयास हो रहे हैं। मानव हमेशा से जिज्ञासु रहा है। अज्ञात की खोज में वह कहाँ पहुँचेगायह नहीं कहा सकता है।

Monday, 14 January 2019

क्या लिखूँ पाठ का सारांश - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

क्या लिखूँ पाठ का सारांश - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

क्या लिखूँ पाठ का सारांश - पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

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'क्या लिखूँ’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी का एक ललित निबंध है। जिसके विषय-प्रतिपादन, प्रस्तुतीकरण एवं भाषा-शैली में इनकी सभी विशेषताएँ सन्निविष्ट हैं। इस निबंध की उत्कृष्टता के दर्शन उस समन्वित रचना-कौशल में होते हैं, जिसके अंतर्गत लेखक ने दो विषयों पर निबंध की विषय सामग्री करने आदि का संकेत ही नहीं किया है, वरन् संक्षिप्त रूप में उन्हें प्रस्तुत भी कर दिया है। 

बख्शी जी के अनुसार आज उनके लिए लेखन कार्य करना अनिवार्य है। उन्हें अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर का कथन याद आ गया कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है, जब मनुष्य लेखन के लिए उद्धत होता है। उस समय उसे विषय के बारे में ध्यान ही नहीं रहता है। जिस प्रकार हैट को टाँगने के लिए किसी भी खूँटी का प्रयोग किया जा सकता है, उसी प्रकार मन के भावों को किसी भी विषय पर प्रस्तुत किया जा सकता है। गार्डिनर साहब का यह कथन सर्वथा उपयुक्त है, परंतु लेखक बख्शी जी को लेखन कार्य के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता है। लेखक को नमिता ने ‘दूर के ढोल सुहावने’ व अमिता ने ‘समाज सुधार’ पर निबंध लिखने को दिया, जिस पर आदर्श निबंध लिखकर उन्हें निबंधरचना का रहस्य समझाना था। इसके लिए लेखक ने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं। एक विद्वान का कथन था कि निबंध छोटा होना चाहिए क्योंकि यह बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। परंतु निबंध के दो अंग सामग्री और शैली है। इसलिए लेखक को सामग्री एकत्र करने के लिए मनन करना होगा। लेखक के पास ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर निबंध लिखने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। विद्वानों के अनुरूप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। जिसमें लेखक कठिनाई का अनुभव करता है। 

जिस प्रकार ए. जी. गार्डिनर को अपने लेखों का शीर्षक बनाने में कठिनाई होती थी। इसी प्रकार शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई नहीं होती थी जितनी कि उनके नामकरण से होती थी, इसलिए उन्होंने अपने नाटक का नाम ‘जैसा तुम चाहो’ रख दिया। लेखक को दूसरा प्रमुख कार्य निबंध की शैली का निश्चय करना था, जिससे अमिता और नमिता यह न समझें कि यह निबंध मोटी अक्ल वालों के लिए लिखा गया है। अंग्रेजी के निबंधकार मानटेन ने जो कुछ स्वयं देखा, सुना, अनुभव किया उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। जो कि उनके मन की स्वच्छंद रचनाएँ थी। लेखक ने यहाँ अमीर खुसरो की प्रतिभा का उदाहरण दिया है कि एक बार वे एक कुएँ पर गए जहाँ चार औरतें पानी भर रही थी। पानी माँगने पर एक ने खीर, दूसरी ने चर्खे, तीसरी ने कुत्ते व चौथी ने ढोल पर कविता सुनाने की इच्छा प्रकट की। अमीर खुसरो विद्वान थे। उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छा पूरी कर दी–
खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।
लेखक कहता है मैं उनके जितना प्रतिभाशाली नहीं हूँ कि एक ही निबंध में दोनों विषयों का समावेश कर दूँ। लेखक कहता है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं क्योंकि जब ढोल पास में बजता है तो लोगों के कानों को पीड़ा होती है, परंतु जब ढोल की ध्वनि दूर से आती है तो वही मधुर ध्वनि बनकर लोगों के मन को आनंदित करती है और मनुष्य के मन में विभिन्न कल्पनाएँ जन्म लेने लगती हैं। लेखक के अनुसार जिसने अभी तक जीवन-संघर्षों का सामना नहीं किया है उन्हें भविष्य सुंदर लगता है पर जो इससे गुजर चुके हैं उन्हें अतीत की स्मृतियों में ही रहना अच्छा लगता है। दोनों ही अपने वर्तमान से संतुष्ट नहीं होते, युवा, भविष्य को वर्तमान व वृद्ध, अतीत को वर्तमान बनाना चाहते हैं। जिस कारण वर्तमान सदैव सुधारों का काल बना रहता है। मनुष्य के इतिहास में हमेशा सुधारों की आवश्यकता हुई है। कितने ही सुधारक जैसे– बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य आदि हुए। अत: न दोषों का अंत होता है और न सुधारों का। जो अतीत में सुधार थे वे भविष्य में दोष बन जाते हैं। हिंदी में भी प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है, परंतु वह भी समय के साथ-साथ अतीत का स्मारक होता जाता है। आज जो युवा हैं वे ही कल वृद्ध होकर अतीत को याद करेंगे और नए युवा वर्ग का जन्म होगा, जो भविष्य की सुखद कल्पना करेगा। दोनों ही सुखद कल्पनाओं में रहते हैं। क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
ममता कहानी का सारांश - जयशंकर प्रसाद

ममता कहानी का सारांश - जयशंकर प्रसाद

ममता कहानी का सारांश - जयशंकर प्रसाद 

ममता कहानी जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित छोटी, किंतु अत्यधिक समृद्ध कृति है। नारी पात्र ममता के चरित्र के ताने- बाने से इसका कथानक निर्मित है। प्रसाद जी ने ममता के माध्यम से बाल-विधवा की करुण कथा चित्रित की है, साथ ही भारतीय नारी की गरिमा भी। 

ममता एक बाल-विधवा युवती है, जो रोहतास-दुर्ग के महल में बैठी सोन नदी के प्रबल बेग को देख रही थी। बालविधवा होने के कारण उसका जीवन दु:खों से भरा था। वह रोहतास दुर्ग के मंत्री चूड़ामणि की पुत्री थी। उसके पास सभी सुख-साधन थे परंतु भारतीय समाज में नारी का विधवा होना उसका सबसे बड़ा अपराध है, इसलिए उसके दु:खों का कोई अंत नहीं था। तभी चूड़ामणि महल में आते हैं, परंतु ममता उनके आगमन को न जान सकी। वह अपने दु:खों में बेसुध थी। चूड़ामणि अपनी पुत्री के दु:ख को देखकर चिंतामग्न होकर वापस लौट जाते हैं। एक पहर के बाद वे पुन: ममता के पास आए उनके साथ सेवक चाँदी के थाल लेकर आए थे। थाल देखकर ममता ने पूछा ‘‘यह क्या है?’’ थालों में स्वर्ण देखकर ममता को आभास हो जाता है कि उसके पिता ने मलेच्छ की रिश्वत स्वीकार कर ली है। उसके पिता भविष्य के प्रति उसे आगाह करते हैं परंतु ममता भगवान की इच्छा के विरुद्ध किए गए कृत्य को अपराध मानते हुए अपने पिता को धन को वापस लौटा देने को कहती है। 

दूसरे दिन रोहतास-दुर्ग में डोलियों का रेला आने पर चूड़ामणि उसे रोकते हैं। पठान उसे महिलाओं का अपमान बताते हैं। युद्ध होने पर चूड़ामणि मारा जाता है व राजा-रानी और कोष सब पर शेरशाह का आधिपत्य हो जाता है। पर ममता कहीं नहीं मिलती, वह दुर्ग से निकल जाती है। 

काशी के उत्तर में धर्मचक्र विहार में जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए मिले थे, उसी स्तूप के खंडहरों में एक झोपड़ी में एक महिला भगवत्गीता का पाठ कर रही है। तभी झोपड़ी के दरवाजे पर एक व्यक्ति आश्रय माँगने आता है, जो कि एक मुगल है, जो चौसा युद्ध में शेरशाह से पराजित होकर आया था। ममता उसे आश्रय देने से मना कर देती है। वह सोचती है कि सभी विधर्मी दया के पात्र नहीं होते। मुगल के वापस लौटने के प्रश्न पूछने पर वह ब्राह्मणी होने के नाते अपने आतिथ्य धर्म का पालन करना अपना कर्तव्य समझती है। वह सैनिक को अपनी झोपड़ी में आश्रय देकर स्वयं टूटे हुए खंडहरों में चली जाती है। प्रभात में ममता बहुत से सैनिकों को उस पथिक को ढूँढ़ते हुए देखती है। पथिक अपने सैनिकों से ममता का ढूँढ़ने को कहता है, पर ममता वहाँ नहीं मिलती। पथिक लौटते हुए ममता का घर बनवाने का आदेश देता है। अब ममता सत्तर वर्ष की वृद्धा हो चुकी थी। चौसा के मुगलों व पठानों के युद्ध को भी काफी समय बीत गया था। ममता बीमार थी, उसकी झोपड़ी में कई महिलाएँ उसकी सेवा कर रही थीं क्योंकि वह भी उनके सुख-दु:ख में उनके काम आती थी। अचानक एक घुड़सवार वहाँ आता है, वह हाथ में एक चित्र लिए होता है। ममता उसे अपने पास बुलाती है और कहती है कि ‘मैं नहीं जानती वह कौन था, जिसने मेरी झोपड़ी में विश्राम किया था। उसने मेरा घर बनवाने का आदेश दिया था। आज मैं स्वर्गलोक जाती हूँ, अब तुम यहाँ जो चाहो करो।’ ममता के प्राण-पखेरु उड़ जाते हैं। बाद में अकबर ने वहाँ एक अष्टकोण मंदिर बनवाया और उस पर लिखवाया कि ‘‘सातों देश के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था।’’ पर उस पर ममता का कहीं जिक्र नहीं किया।

Sunday, 13 January 2019

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय Padumlal Punnalal Bakshi ka Jeevan Parichay

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय Padumlal Punnalal Bakshi ka Jeevan Parichay

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जीवन परिचय Padumlal Punnalal Bakshi ka Jeevan Parichay

Padumlal Punnalal Bakshi ka Jeevan Parichay
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, द्विवेदी युग के प्रसिद्ध साहित्यकार थे। ये एक कुशल आलोचक, हास्य-व्यंग्यकार तथा गंभीर विचारक थे। बख्शी जी अपने ललित निबंधों के लिए विशेष रूप से स्मरणीय रहेंगे। ये अंग्रेजी कवि वर्ड्सवर्थ से बहुत प्रभावित थे, जिनसे प्रेरित होकर इन्होंने स्वच्छांदतावादी कविताएँ लिखी। बख्शी जी की प्रसिद्धि का मुख्य आधार आलोचना और निबंध लेखन है।

जीवन परिचय पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 27 मई 1894 को खैरागढ़, छत्तीसगढ़ में हुआ था। इनके पिता उमराव बख्शी व पितामह पुन्नालाल बख्शी ‘खैरागढ़’ के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। 14वीं शताब्दी में बख्शी जी के पूर्वज श्री लक्ष्मीनिधि राजा के साथ मंडला से खैरागढ़ में आए थे ओर तब ये यहीं बस गए। बख्शी जी के पूर्वज फतेह सिंह और उनके पुत्र श्रीमान राजा उमराव सिंह दोनों के शासनकाल में श्री उमराव बख्शी राजकवि थे। पदुमलाल बख्शी की प्राइमरी की शिक्षा खैरागढ़ में ही हुई। 1911 में यह मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में बैठे। हेडमास्टर एन. ए . गुलाम अली के निर्देशन पर उनके नाम के साथ उनके पितामह का नाम पुन्नालाल लिखा गया। तब से यह अपना पूरा नाम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी लिखने लगे। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में यह अनुत्तीर्ण हो गए। उसी वर्ष इन्होंने साहित्य जगत में प्रवेश किया। 1912 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने बनारस के सेंट्रल हिंदू कॉलेज में प्रवेश लिया। सन् 1913 में लक्ष्मी देवी के साथ उनका विवाह हो गया। १९१६ में उन्होंने बी़ ए. की उपाधि प्राप्त की तथा फिर उनकी नियुक्ति स्टेट हाईस्कूल राजानंदगाँव में संस्कृत अध्यापक के पद पर हुई। सन् 1971 ई. में हिंदी साहित्य के इस महान आधार स्तंभ का निधन हो गया।

रचनाएँ— बख्शी जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं–
(अ) काव्य— अश्रुदल, शतदल
(ब) आलोचना— विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य
(स) निबंध-संग्रह— पंच-पात्र, पद्म वन, प्रबंध-पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने, कुछ यात्री
(द) कहानी संग्रह— झलमला, अंजलि
(य) अनूदित— तीर्थस्थल, प्रायश्चित, उन्मुक्ति का निबंध

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी की भाषा-शैली : बख्शी जी की भाषा में जटिलता और रूखापन नहीं है। इनकी भाषा में कहीं-कहीं उर्दू अंग्रेजी के शब्द भी मिलते हैं, जो भाषा को सरल व प्रवाहमय बनाते हैं। इनकी भाषा एक आदर्श भाषा है। बख्शी जी के अनुसार भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें सभी प्रकार के विषयों का विवेचन किया जा सके। बख्शी जी ने अपने कथात्मक निबंधों में भावात्मक शैली का प्रयोग किया है, जिसमें छोटे-छोटे वाक्य हैं, जिनकी सहायता से भावों की अभिव्यंजना बड़ी कुशलता के साथ हुई है। यह शैली सरल व सरस है तथा इसमें चित्रात्मकता, सजीवता व गतिशीलता भी है। इनके आलोचनात्मक निबंधों में गंभीर विषयों को प्रस्तुत करने के लिए व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है, जो कहीं-कहीं पर क्लिष्ट भी हो गई है। इनके कुछ निबंधों में विचारात्मक शैली के भी दर्शन होते हैं।
ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से का सारांश - रामधारी सिंह दिनकर

ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से का सारांश - रामधारी सिंह दिनकर

ईर्ष्या तू न गयी मेरे मन से का सारांश - रामधारी सिंह दिनकर

irshya to na gayi mere man se
ईर्ष्या तू न गई मेने मन से’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित एक निबंध हैं। इसमें लेखक ने ईर्ष्या की उत्पत्ति का कारण एवं उससे होने वाली हानियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। साथ ही ईर्ष्या से विमुक्ति का साधन भी प्रस्तुत किया है। लेखक कहता है कि उसके घर के दाहिनी तरफ एक वकील साहब रहते हैं, जिनके पास सभी सुख साधन हैं, परंतु वे फिर भी सुखी नही हैं। उनके अंदर कौन-सी अग्नि जल रही है, वह मैं जानता हूँ। उसका नाम ईर्ष्या है क्योंकि उनके बराबर में रहने वाले बीमा एजेंट अधिक संपन्न हैं, उनके पास मोटर व अच्छी मासिक आय है। वकील साहब अपनी सुविधाओं का आनंद न उठाकर केवल बीमा एजेंट की सुविधाओं को प्राप्त करने की चिंता में जल रहे हैं। ईर्ष्या मनुष्य को यही विचित्र वरदान देती है जिसमें मनुष्य बिना दु:ख के दु:ख भोगता है। जिस व्यक्ति के मन में ईर्ष्या वास करने लगती है, वह उन चीजों का आनंद नहीं ले पाता जो उसके पास होती है वरन् उन वस्तुओं के लिए दु:ख उठाता है जो दूसरे व्यक्तियों के पास होती हैं। वह अपनी तुलना निरंतर दूसरों के साथ करता रहता है। ईष्यालु व्यक्ति असंतोषी प्रवृत्ति के होते हैं। वे भगवान द्वारा दिए गए उपवन अर्थात् सुख सुविधाओं को पाकर उसका धन्यवाद करने व आनंद लेने के विपरीत इस चिंता में मग्न रहते हैं कि मुझे बड़ा उपवन (अधिक सुविधाएं) क्यों प्राप्त नहीं हुआ। इसके लिए वह लगातार विचार करते हुए अपनी उन्नति के प्रयासों को छोड़कर दूसरों को हानि पहंँुचाने के प्रयत्न करने लगता है। लेखक ने ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निंदा बताया है। ईर्ष्या के कारण ही व्यक्ति दूसरों की निंदा करता है जिससे वह व्यक्ति दूसरों की नजरों से गिर जाए और स्वयं दूसरों की नजरों में श्रेष्ठ बन जाए। परंतु आज तक ऐसा नहीं हुआ। निंदा के कारण कोई भी व्यक्ति नजरों से नहीं गिरता बल्कि उसके गिरने का कारण उसके गुणों का ह्रास है। ईर्ष्या का काम जलाना है। सबसे पहले यह उसी को जलाती है जिसके हृदय में वास करती है। चिंता को चिता कहा जाता है क्योंकि चिंता में मग्न व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है,परंतु ईर्ष्या तो चिंता से भी बुरी है, क्योंकि इसमें मनुष्य के मौलिक गुण समाप्त हो जाते हैं।

ईर्ष्या किसी मनुष्य का चारित्रिक दोष होने के साथ-साथ उसके जीवन आनंद में भी रुकावट डालती है, उसे जीवन का सुख नजर ही नहीं आता है। जो व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वियों को बेधकर हंसता है वह राक्षस के समान होता है और उससे प्राप्त आनंद भी राक्षसों का ही होता है। ईर्ष्या प्रतिद्वंद्विता से संबंधित होती है। प्रतिद्वंद्विता से मनुष्य का विकास होता है, किंतु अगर आप संसार का लाभ चाहते हैं तो रसेल के अनुसार आप स्पर्द्धा नेपोलियन से करेंगे। नेपोलियन भी सीजर से और सीजर भी हरकुलिस से प्रतिस्पर्धा रखता था। अर्थात् सभी प्रतिभाशाली व्यक्ति स्वयं से श्रेष्ठ लोगों से प्रतिस्पर्धा करते हैं।

जो व्यक्ति सादा व सरल होता है, वह यह सोचकर परेशान होता है कि दूसरा व्यक्ति मुझसे ईर्ष्या क्यों करता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी कहते हैं कि ‘‘तुम्हारी निंदा वही करता है, जिसकी तुमने भलाई की है।’’ और जब महान् लेखक नीत्से इससे होकर गुजरे तो इसे उन्होंने इसे बाजार में भिनभिनाने वाली मक्खियाँ बताया, जो सामने व्यक्ति की प्रशंसा और पीठ पीछे उसी की निंदा करती है।’’ ये मक्खियाँ हमारे अंदर व्याप्त गुणों के लिए हमें सजा देती हैं और अवगुणों को माफ कर देती हैं। उन्नत चरित्र वाले ईर्ष्यालु व्यक्तियों की बातों पर नहीं चिढ़ते क्योंकि ईर्ष्यालु व्यक्ति तो स्वयं ही छोटी प्रवृत्ति के होते हैं। मगर छोटी सोच वाले व्यक्ति संपन्न लोगों की निंदा को ही सही मानते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हम इन लोगों का जितना भी भला करें ये हमारा बुरा ही करेंगे। ऐसे व्यक्ति निंदा का उत्तर न देने वाले लोगों को उनका अहंकार समझते हैं, अगर हम भी उनके जैसे बन जाते हैं, तो वे खुश हो जाते हैं। नीत्से ने भी कहा है आदमी के गुणों के कारण भी लोग उनसे जलते हैं। इन ईर्ष्यालु लोगों से बचने का उपाय है कि एकांत में रहा जाए । जो लोग संसार में नए मूल्यों का निर्माण करते हैं वे इनसे दूर ही रहते हैं और ईर्ष्या से बचने के लिए ईर्ष्यालु व्यक्ति को सोच-विचार की आदत का त्याग कर देना चाहिए। उसे अपनी सुविधाओं के अभाव को पूरा करने का रचनात्मक उपाय खोजना चाहिए। इस उपाय को खोजने की ललक उसके अंदर ईर्ष्या को समाप्त कर देगी।

Saturday, 12 January 2019

पन्ना धाय का चरित्र चित्रण - दीपदान एकांकी

पन्ना धाय का चरित्र चित्रण - दीपदान एकांकी

पन्ना धाय का चरित्र चित्रण - दीपदान एकांकी

पन्ना दीपदान एकांकी की केंद्रीय पात्र है। वह तीस वर्ष की है तथा चंदन की माँ है। वह कुँवर उदयसिंह का संरक्षण करनेवाली धाय है। उसे अपने राज्य और कुँवर उदयसिंह से प्यार है। वह अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है तथा राजवंश की रक्षा के लिए अपने पुत्र का उत्सर्ग करने में थोड़ा-सा भी संकोच नहीं करती है। वह तत्काल निर्णय लेने की क्षमता रखती है। आनेवाली विपत्तियों से सावधान रहती है। व्यक्ति से किस तरह की बात करना है, वह अच्छी तरह जानती है। कुँवर उदयसिंह की रक्षा करने के लिए कुँवर को नाराज करने से भी वह नहीं हिचकती है। वह साहसी है तथा दुर्दांत बनवीर जैसे व्यक्ति से भी नहीं डरती है। सोना हो अथवा बनवीर, वह इन दोनों से तर्कशक्ति में भारी पड़ती है। उसमें ममत्व है, किन्तु राज्य के प्रति उसकी निश्ठा उसके पुत्र-प्रेम की भावना से कहीं बहुत अधिक है। वह संवेदनशील है और अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरूक है। पन्ना को किस समय क्या कार्य किस कुशलता से करना चाहिए, इस बात का अभिज्ञान उसे रहता है। जिस योजनाबद्ध तरीके से सफलतापूर्वक वह कुँवर उदयसिंह को कीरत के माध्यम से दुर्ग के बाहर पहुँचाती है, वह किसी साधारण बुद्धि की औरत के लिए बिल्कुल भी संभव नहीं है। इस दृष्टि से पन्ना धाय का चरित्र अप्रतिम, अतुलनीय, प्रेरणास्पद एवं स्तुत्य है। पन्ना के चरित्र की संरचना करते समय डॉ. रामकुमार वर्मा ने बहुत कुशलता का परिचय दिया है।

Friday, 11 January 2019

पथ की पहचान कविता का भावार्थ - हरिवंशराय बच्चन

पथ की पहचान कविता का भावार्थ - हरिवंशराय बच्चन

पथ की पहचान कविता का भावार्थ - हरिवंशराय बच्चन

पथ की पहचान कविता में कवि ने मनुष्य को जीवन पथ पर आगे बढ़ने से पहले सावधान किया है कि यात्रा आरंभ करने से पहले मनुष्य को अपने लक्ष्य व मार्ग का निर्धारण कर लेना चाहिए। इस लक्ष्य का निर्धारण हमें स्वयं ही करना पड़ता है। यह कहानी पुस्तकों में नहीं छपी होती। जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने भी अपने लक्ष्य का निर्धारण स्वयं ही किया था। कवि ने पथिक को अच्छे -बुरे की शंका किए बिना आस्था के साथ अपने मार्ग पर चलने को कहा है, जिससे लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा सरल हो जाएगी। यदि हम अपने मन में यह सोच लें कि यही मार्ग सही एवं सरल है तो हम लक्ष्य की प्राप्ति आसानी से कर सकते हैं। जितने भी महापुरुषों ने अपने लक्ष्य की प्राप्ति की है, वे मार्ग की कठिनाइयों से नहीं घबराए और अपने मार्ग पर निरंतर बढ़ते रहे। उचित मार्ग की पहचान से ही जीवन में सफलता प्राप्त की जा सकती है। जीवन के मार्ग में कब कठिनाइयाँ आएँगी और कब सुख मिलेगा, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। अर्थात् यह सब अनिश्चित है कि कब कोई हमसे बिछड़ जाएगा और कब हमें कोई मिलेगा, कब हमारी जीवन यात्रा समाप्त हो जाएगी। कवि मनुष्य को हर विपत्ति से सामना करने का प्रण लेने की प्रेरणा देते हैं। कल्पना करना मनुष्य का स्वभाव है। कवि के अनुसार जीवन के सुनहरे सपने देखना गलत बात नहीं है। अपनी आयु के अनुरूप सभी कल्पना करते हैं। परंतु इस संसार में कल्पनाएँ बहुत कम और यथार्थ बहुत अधिक हैं। इसलिए तू कल्पनाओं के स्वप्न में न डूब, वरन् जीवन की वास्तविकताओं को देख। जब मनुष्य स्वर्ग के सुखों की कल्पना करता है तो उसकी आँखों में प्रसन्नता भर जाती है। पैरों में पंख लग जाते हैं और हृदय उन सुखों को पाने को लालायित हो जाता है परंतु जब यथार्थ (सत्य) सामने आता है तो मनुष्य निराश हो जाता है।
हमारे आँखों में भले ही स्वर्ग के सुखों के सपने हो परंतु हमारे पैर धरातल पर ही जमे होने चाहिए। राह के काँटे हमें जीवन मार्ग की कठिनाइयों का संदेश देते हैं। इसलिए इन कष्टों से लड़ने के लिए सोच-विचारकर ही कार्य करो और एक बार आगे बढ़ने पर विघ्न-बाधाओं से मत घबराओ।