Tuesday, 21 August 2018

राजगुरु की सवारी तेनालीराम की कहानी। Rajguru ki Sawaari Tenaliram stories in Hindi

राजगुरु की सवारी तेनालीराम की कहानी। Rajguru ki Sawaari Tenaliram stories in Hindi

राजगुरु की सवारी तेनालीराम की कहानी। Rajguru ki Sawaari Tenaliram stories in Hindi

बात उन दिनों की है जब तेनालीराम का विजयनगर के राजदरबार से कोई संबंध नहीं था। वह किसी भी तरह महाराज तक अपनी पहुंच बनाना चाह रहे थे। मगर यह आसान नहीं था। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने राजगुरु तक अपनी पहुंच बनाई और उनकी बहुत सेवा की। राजगुरु तेनालीराम से अपने सारे काम करवा लेते मगर राजमहल की बात आती तो टाल जाते। इससे तेनालीराम काफी दुखी हुए।

वह समझ गए कि राजगुरु मुझे महाराज तक पहुंचने नहीं देना चाहते। अतः एक दिन उसने राजगुरु को सबक सिखाने का मन बना लिया। एक दिन राजगुरु नदी में नहाने गए। किनारे पर जाकर उन्होंने वस्त्र उतारे और पानी में उतर गए। तेनालीराम उनके पीछे-पीछे था। वह पेड़ की ओट में छुप गया और राजगुरु के डुबकी लगाते ही उसने उनके कपड़े उठा लिए और जाकर पेड़ के पीछे छुप गया। कुछ देर बाद जब राजगुरु स्नान करके बाहर निकले तो अपने कपड़े वहां ना पाकर ठिठक गए।
“अरे यह कौन है ? वह चिल्लाया मेरे वस्त्र किसने उठाए हैं ? रामलिंग मैंने तुम्हें देख लिया है। तुम पेड़ के पीछे छिपे हो। देखो मजाक छोड़ो और मेरे कपड़े मुझे दे दो। मैं तुम्हें महाराज तक अवश्य पहुंचाऊंगा।” तेनालीराम का असली नाम राम सिंह ही था। बचपन से लेकर जवानी तक ननिहाल तेनाली में होने के कारण वह तेनालीराम के नाम से प्रसिद्ध हो गया था।

“आप झूठे हैं राजगुरु, आज तक आप मुझे झूठे दिलासे देते रहे हैं।” कहते हुए तेनाली रमन बाहर आ गया। राजगुरु बोले, “इस बार मैं पक्का वादा करता हूं।” तेनालीराम ने कहा, “ठीक है, तो वादा करें कि मुझे इसी वक्त कंधे पर बैठाकर आप राजमहल लेकर जाएंगे।” राजगुरु बोले, “कंधे पर बैठाकर, तुम पागल तो नहीं हो गए हो राम लिंग ?” तेनाली रमन ने कहा –“हां मैं पागल हो गया हूं आप के झूठे आश्वासन पा-पाकर। यदि मेरी शर्त मंजूर हो तो बोलो वरना मैं चला।”

“अरे नहीं नहीं मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।” हथियार डालते हुए राजगुरु बोले –“लाओ मेरे कपड़े मुझे दे दो।” तेनालीराम ने उनके कपड़े उन्हें दे दिए। राजगुरु ने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले, फिर उसे अपने कंधों पर बैठाकर महल की ओर चल पड़े। जब राजगुरु नगर में पहुंचे तो लोग यह विचित्र दृश्य देखकर हैरान थे। लड़के सीटियां और तालियां बजाते उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। चारों ओर शोर मच गया की –“राजगुरु का जुलूस, देखो राजगुरु का जुलूस।” राजगुरु अपने आप को ऐसा अपमानित महसूस कर रहे थे, जैसे भरे बाजार में वह नंगे चले जा रहे हो।

धीरे-धीरे यह काफिला राजमहल के करीब पहुंच गया। महाराज अपने कक्ष में विराजमान थे। शोर सुनकर वह बरामदे में आए, फिर बुर्ज में आकर नीचे का नजारा देखने लगे। उन्होंने देखा कि राजगुरु एक व्यक्ति को अपने कंधों पर बिठाए चले आ रहे हैं, शर्म से उनका सिर झुका हुआ है और शरीर पसीने-पसीने हो रहा है। पीछे आते लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं और कंधे पर बैठा व्यक्ति हंस रहा है। राजगुरु का ऐसा अपमान देखकर राजा को बेहद गुस्सा आया। उन्होंने अपने दो अंगरक्षकों को हुक्म दिया कि जो व्यक्ति राजगुरु के कंधे पर बैठा है, उसे नीचे गिरा दो और खूब पिटाई करके छोड़ दो। मगर दूसरे व्यक्ति को सम्मान सहित हमारे पास ले आओ।

राजगुरु महाराज को नहीं देख पाए, मगर तेनालीराम ने देख लिया कि उनकी ओर इशारा करके महाराज अपने अंगरक्षकों को कुछ बता रहे हैं। तेनालीराम समझ गया कि दाल में कुछ काला है। वह झट से कंधे से उतरा और राजगुरु से क्षमा याचना करके उन्हें अपने कंधे पर उठा लिया और उनकी जय-जयकार करने लगा। तभी राजा के अंगरक्षक वहां पहुंचे, उन्होंने राजगुरु को तेनालीराम के कंधे से नीचे गिरा दिया और बुरी तरह उनकी पिटाई करने लगे। बेचारे राजगुरु पीड़ा और अपमान में दिखने लगे। सैनिकों ने उनकी खूब पिटाई की, फिर तेनालीराम से बोले “आइए, आपको महाराज ने बुलाया है।”

राजगुरु भौचक्के थे कि यह सब क्या हुआ ? अंगरक्षक तेनालीराम को लेकर महाराज के पास पहुंचे तो उसे देखकर महाराज गुस्से से बोले, महाराज, “यह किसे ले आए। हमने ऊपर वाले की पिटाई करने को कहा था और नीचे वाले को लाने को कहा था।” सैनिक बोले, “यह नीचे वाले ही हैं महाराज। वह पाजी तो इनके कंधों पर बैठा था।” महाराज बोले, “ओह, इसका मतलब यह व्यक्ति बहुत धूर्त है। इसने पहले ही अंदाजा लगा लिया कि क्या हो सकता है। इसे ले जाकर मौत के घाट उतार दो। इसने राजगुरु का अपमान किया है।”

उस समय वहां कुछ दरबारी भी आ गए थे। वह ऊपर से गंभीर लेकिन मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे कि इस युवक ने राजगुरु की अच्छी दुर्गति की। जब सैनिक तेनालीराम को लेकर चले तो कुछ दरबारी भी पीछे हो लिए। एक स्थान पर जाकर उन्होंने तेनालीराम से इस दुस्साहस का कारण पूछा तो उन्हें लगा कि तेनालीराम निर्दोष है। उसे किसी प्रकार राजदरबार में लाया जाए ताकि उन्हें राजगुरु और दूसरे बेईमान दरबारियों को सबक सिखाने का अवसर मिले। उन्होंने तेनालीराम से दोनों सैनिकों को दस-दस स्वर्ण मुद्राएं दिलवा कर इस वादे के साथ छुड़वा लिया कि वह नगर छोड़कर चला जाएगा।

सिपाहियों ने तबेले में जाकर एक बकरे को हलाल करके अपने खून से सनी तलवार राजा को दिखा दी। तेनालीराम को अपनी जान बचने की खुशी थी, परंतु बीस स्वर्ण मुद्राओं के जाने का दुख भी था। वह इस बात के लिए किसी भी तरह चुप बैठने वाला नहीं था। उसने अपने घर जाकर अपनी मां और पत्नी को सिखा-पढ़ाकर महल में भेज दिया। दोनों सास-बहू महाराज के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगी। महाराज बोले, “क्या बात है ? तुम कौन हो और यहां आकर तुम्हारे रोने का क्या कारण है ?” तेनालीराम की मां सिसक-सिसक कर रोने लगी और बोली, “महाराज, एक मामूली अपराध के लिए आपने मेरे बेटे रामलिंग को मृत्युदंड दे दिया। अब मैं किसके सहारे जी लूंगी ? कौन होगा मेरे बुढ़ापे का सहारा ?” इसके बाद तेनालीराम की पत्नी बोली, “मेरे इन मासूम बच्चों का क्या होगा महाराज ? मैं अबला इन बच्चों और इस बूढ़ी सास का पेट कैसे बनूंगी ?”

महाराज को फौरन अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें लगा कि उस छोटी सी भूल के लिए इतनी बड़ी सजा नहीं देनी चाहिए थी। अब वह कर भी क्या सकता था। उन्होंने आज्ञा दी “इन्हें हर माह दस स्वर्ण मुद्राएं राजकोष से दे दी जाएं जिससे यह अपना व बच्चों का भरण-पोषण कर सकें।” दस स्वर्ण मुद्राएं तत्काल लेकर दोनों सास-बहू घर पहुंची और तेनालीराम को पूरी बात बताई। तेनालीराम खूब हंसा “चलो, दस स्वर्ण मुद्राएं अगले माह मिल जाएंगी अब हुआ हिसाब बराबर।” 

Monday, 20 August 2018

हिंदी कहानी मायावी सरोवर

हिंदी कहानी मायावी सरोवर

हिंदी कहानी मायावी सरोवर 

हिंदी कहानी मायावी सरोवर

12 वर्ष का वनवास पूरा होने को आया। एक दिन पांडवों ने जंगल में एक हिरण का पीछा किया। वह एक मायावी हिरण था। तेज दौड़कर पांडवों को जंगल में बहुत दूर ले गया, फिर गायब हो गया। तंग आकर पांडव एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गए। युधिष्ठिर ने कहा, “भैया बहुत प्यास लग रही है।” नकुल ने एक पेड़ पर चढ़कर आसपास नजर दौड़ाई। और बोला, “पास में खूब हरियाली है और सारस भी वहां पर उड़ रहे हैं। वहां पानी जरूर होगा। मैं अभी पानी ले कर आता हूं।”

थोड़ी दूर जाने पर उसे तालाब दिखाई दिया। उसने तालाब में हाथ डाला। अचानक आसमान से आवाज आई, “ठहरो यह तालाब मेरा है। मेरे सवालों का जवाब दो, फिर पानी पीना।” नकुल चौक गया। पर उसे बहुत तेज प्यास लगी थी। चेतावनी को अनसुना कर वह पानी पी गया। पानी पीते ही वह जमीन पर गिर पड़ा। बहुत देर तक नकुल वापस नहीं आया तो युधिष्ठिर ने सहदेव को उसे ढूंढने भेजा।

वह भी तालाब पर पहुंचा। आवाज की परवाह ना करते हुए उसने भी पानी पी लिया और बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। फिर अर्जुन उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचा। अपने भाइयों की हालत देखकर दंग रह गया। तभी उसे एक अजीब तरह की प्यास ने बेचैन कर दिया। वह पानी की ओर खिंचता चला गया और पानी में हाथ डाला। फिर से वही आवाज आई, “पहले मेरे सवालों का जवाब दो, बाद में पानी पीना, वरना तुम्हारी भी यही हालत होगी।”

अर्जुन क्रोध से झल्ला उठा। हिम्मत हो तो सामने आकर लड़ो यह कहते हुए अर्जुन ने अपना धनुष उठाया। लेकिन उसने पानी पीकर ताकत के साथ लड़ने का निश्चय किया और पानी पी लिया। पानी पीते ही वह भी गिर पड़ा। फिर भीम ने भी वही आवाज सुनी। तुम कौन होते कौन हो मुझे आज्ञा देने वाले ? यह कहते हुए उसने भी पानी पी लिया और गिर पड़ा। अंत में युधिष्ठिर आया।

अपने भाइयों का हाल देखकर वह रो पड़ा। प्यास से पीड़ित विधि युधिष्ठिर पानी की ओर बढ़ा। उसी समय उसी अज्ञात आवाज ने उसे भी रोका। तुम्हारे भाइयों ने मेरी बात नहीं सुनी। कम से कम तुम तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे कर पानी पियो। युधिष्ठिर ने पहचान लिया कि यह किसकी आवाज़ है और कहा, “तुम अपने प्रश्न पूछो। मैं उत्तर दूंगा।” यक्ष ने लगातार प्रश्न पूछे और युधिष्ठिर उनके उत्तर देता गया।

वह क्या है जो मनुष्य का जीवन भर साथ देता है ?
उत्साह।
खतरे में मनुष्य को कौन बचाता है ?
साहस।
सफलता की पहली सीढी क्या है ?
निरंतर प्रयास है।
मनुष्य होशियार कैसे बनता है ?
बुद्धिमान लोगों के साथ रहकर।
यात्री का साथ कौन देता है ?
प्राप्त शिक्षा।
सभी लाभों में बेहतर लाभ क्या होता है ?
निरोग जीवन।
मनुष्य सबका प्यारा कब बन सकता है ?
घमंड को छोड़ने पर।
ऐसी क्या चीज है जिसे खाने से मनुष्य को खुशी मिलती है दुख नहीं ?
क्रोध, इसके हो जाने से दुख नहीं सताता।
दुख का कारण क्या है ?
इच्छा और क्रोध।
कौन धरती से अधिक सहनशील है ?
मां, जो अपनी संतान की देखरेख करती है।

युधिष्ठिर ने बिना हिचकिचाए ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर दिए। अंत में यक्ष ने कहा, “तुम्हारे जवाब से मैं प्रसन्न हुआ। मृत भाइयों में से तुम जिसे भी चाहो उसे मैं जीवित कर दूंगा।” युधिष्ठिर ने कहा, “नकुल जीवित हो जाए।” यक्ष ने तुरंत सामने प्रकट होकर पूछा, “भीम तो 16000 हाथियों के समान बलवान है। अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण है। इन दोनों को छोड़कर तुमने नकुल का नाम क्यों लिया ?” युधिष्ठिर ने कहा, “मेरे पिता की दो पत्नियां हैं कुंती और माद्री। कुंती का पुत्र मैं हूं। इसलिए माद्री के पुत्र को जीवित करना चाहता हूं।” यक्ष युधिष्ठिर की निष्पक्षता से बहुत प्रसन्न हुए और सभी भाइयों को जीवित कर दिया।

Sunday, 19 August 2018

बाघ की सवारी हास्य हिंदी कहानी। Funny Story in HIndi

बाघ की सवारी हास्य हिंदी कहानी। Funny Story in HIndi

बाघ की सवारी हास्य हिंदी कहानी। Funny Story in Hindi

Funny Story in HIndi
एक दिन किसी जंगल में भारी बरसात हो रही थी। चारों और घनघोर अंधेरा छाया हुआ था। कभी बिजली भी कड़क उठती। तूफान बहुत जोर का था। तूफान से बहुत सारे पेड़ उखड़ गए थे। एक भाग बाघ भयभीत होकर जंगल से भाग निकला। वह पास के एक गांव में जा पहुंचा और एक झोपड़ी की दीवार के सहारे जा खड़ा हुआ। झोपड़ी के अंदर एक औरत बड़बड़ा रही थी, “सिर्फ दो दिनों के लिए आराम मिला। अब ये टपटपी फिर से आ गई।” 

बारिश के कारण उसकी झोपड़ी चू रही थी। उसे मेज, बक्से और बर्तन इधर-उधर खिसकाने पड़ रहे थे। ढूम ढाम... ढूम ढाम... उसके टकराने की आवाज़ आ रही थी, जिससे दीवारें हिल रही थी। बाघ डर गया। टपटपी ! भला यह क्या है ? जब उसकी आवाज ही इतनी डरावनी है, तो वह जरूर बहुत भयानक होगी, “बाघ को कुछ समझ में नहीं आया। 

तभी गांव का भोलेनाथ अपने गधे को ढूंढता हुआ वहां आया। उसने बुढ़िया के घर की दीवार से लगकर खड़े हुए एक जानवर को देखा। घने अंधेरे में उसे लगा कि वह उसका गधा है। वह गुस्से में उसका कान खींचता हुआ चिल्लाया, “क्या तुम्हारा दिमाग खराब है ? इस बारिश में तुम्हें कहां-कहां ढूंढता फिरूं ? चल, अब चुपचाप घर चल।” वह बाघ पर चढ़ बैठा और उसकी सवारी करते हुए चल पड़ा। 

आज तक बाघ के कान किसी ने भी इस तरह नहीं मरोड़े थे। बाघ डर से कांपने लगा। टपटपी के डर से वह कुछ नहीं बोला। चुपचाप चलता रहा। घर पहुंचते ही भोलेनाथ ने उसे घर के सामने रस्सी से बांध दिया और घर के अंदर सोने चला गया। अगले दिन सुबह होते ही भोलेनाथ की पत्नी बाहर आई। घर के सामने बंधे हुए बाघ को देखकर वह जोर से चीख उठी। चीख सुनकर भोलेनाथ दौड़ा आया। बाघ को देखकर वह भी चिल्लाते हुए घर के अंदर घुस गया। दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया। 

गांव वाले भोलेनाथ के घर के सामने बंधे बाघ को देखकर चारों तरफ दौड़ने लगे। इस झमेले में भौचक्के बाघ ने रस्सी को काट लिया और बचकर जंगल में भाग गया। “भोलेनाथ ने बाघ की सवारी की” - यह खबर गांव में चारों तरफ फैल गई। सभी उससे मिलने आने लगे। आश्चर्य के साथ उससे पूछने लगे कि सुना है तुमने बाघ की सवारी की ? भोलेनाथ ने बड़े गर्व से कहा, “सिर्फ उसकी सवारी ही नहीं की बल्कि मैंने तो उसके कान भी मरोड़े।” 

यह खबर राजा के कानों तक पहुंची। राजा ने भोलेनाथ को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। कुछ महीने बीत गए। दुश्मन देश के सैनिकों ने राज्य पर हमला कर दिया। राजा ने फौरन ही मंत्री को हुक्म दिया, “जिस बहादुर व्यक्ति ने बाघ की सवारी की थी, उसे तुरंत दुश्मनों का मुकाबला करने भेजो। वह शत्रुओं को तहस-नहस कर देगा। जाओ और उसे यह शक्तिशाली घोड़ा भी दे दो।” भोलेनाथ राजा का हुक्म सुनकर परेशान हो गया। उसने सोचा, “अब कोई रास्ता नहीं है। मुझे युद्ध में जाना ही होगा।” 

उसने पहले कभी घोड़े की सवारी नहीं की थी। बड़ी मुश्किल से घोड़े पर बैठते हुए उसने अपनी पत्नी से कहा, “इससे पहले कि मैं गिर जाऊं, मुझे घोड़े पर कसकर बांध दो।” उसकी पत्नी ने उसके हाथ, पाँव और पूरे शरीर को घोड़े से कसकर बांध दिया। घोड़ा तेजी से भागने लगा। खेतों, नदियों को पार करते हुए वह शत्रुओं की सेना की ओर दौड़ा। “हाय रे ! उधर मत जाओ !” भोलेनाथ जोर से चिल्लाया। उसे समझ में नहीं आया कि घोड़े को कैसे रोके ? घबराहट में उसने अपने दोनों हाथ उठाएं और एक पेड़ की शाखा को पकड़ लिया। मगर घोड़ा भागता ही रहा। 

मिट्टी गीली होने के कारण पेड़ उखड़कर भोलेनाथ के हाथों में आ गया। शत्रुओं ने एक वृक्ष को हाथों में घुमाते हुए तेजी से उनकी तरफ आ रहे भोलेनाथ को देखा। उनमें से एक बोला, “अरे उस शक्तिशाली व्यक्ति को देखो। उसने पेड़ को भी भी उखाड़ लिया। हमसे युद्ध करने चला आ रहा है। निश्चय ही वह वही व्यक्ति है जिसने बाघ पर सवारी की थी।” वह सब के सब अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। थोड़ी देर के बाद घोड़ा एक झटका मारकर रुक गया। रस्सी टूट गई और भोलेनाथ गिर पड़ा। सौभाग्यवश तब वहां कोई भी नहीं था। भोलेनाथ बड़बड़ाया, “भगवान का शुक्र है कि मेरी जान बच गई।” 

वह घोड़े को लेकर चलते हुए अपने घर की तरफ बढ़ा। वह भला अब कहां घोड़े की सवारी करता। लोगों ने उसे वापस पैदल आते हुए देखा। आश्चर्य से वह सभी बोले, “देखो उसने अकेले ही सभी शत्रुओं को हरा दिया, इतना बड़ा काम करने के बाद भी वह एक साधारण व्यक्ति की तरह ही चल रहा है।” कितना महान है भोलेनाथ।

Saturday, 18 August 2018

राजा और गिलहरी हिंदी कहानी। King and Squirrel Hindi Story

राजा और गिलहरी हिंदी कहानी। King and Squirrel Hindi Story

राजा और गिलहरी हिंदी कहानी। King and Squirrel Hindi Story

King and Squirrel Hindi Story
एक समय की बात है। एक राजा था। वह विद्वान शक्तिशाली और चतुर था और धनवान भी। एक दिन बगीचे में टहलते टहलते उसने अपने मंत्री से कहा, “मेरे सामने कोई भी अपनी प्रशंसा करने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूं।” मंत्री मुस्कुराया और बोला, “महाराज, क्षमा कीजिए। हर व्यक्ति को अपने ऊपर गर्व होता है। कमजोर व्यक्ति को भी अपने आप को बलवान समझता है। जो लोग डींग मारे उन्हें नजरअंदाज करने में ही समझदारी है। दूसरों का घमंड देखकर अपने मन की शांति नहीं खोनी चाहिए।” तभी वहां एक गिलहरी आई। उसके पंजों में एक सिक्का था। सिक्के को दिखाते हुए वह गाना गाने लगी-

सुनो सुनो सब लोगों, कैसे पैसा छलता
मेरे धन को देख देखकर, राजा जलता भुनता

राजा क्रोधित हो उठा। उसे पकड़ने के लिए भागा। गिलहरी भाग निकली। पर सिक्का गिर गया। राजा ने उसे उठा लिया। उसी शाम को राजा अपने महल में बैठा मेहमानों से बातचीत कर रहा था। अचानक ऊपर से गिलहरी आई और गाने लगी-

धन की रानी हूं मैं, सब को बतला दूं यह बात
मेरे धन को पाकर, राजा इठला रहा है आज

राजा भड़क उठा। मगर मेहमानों के सामने कुछ ना कर सका। उसे अपने गुस्से को काबू में करना पड़ा। अगले दिन सुबह राजा गरीबों को दान दे रहा था। गिलहरी वहां आई और गाने लगी-

क्या कहूं ? कैसे कहूं ? यह भी समझ का फेरा है
दान-धर्म तो राजा करता, लेकिन धन सब मेरा है

राजा ने अपने सेवकों से कहा, “इस दुष्ट गिलहरी को पकड़कर मेरे सामने लाओ।” लेकिन गिलहरी कहां फसने वाली थी। वह चुपचाप वहां से खिसक गई। कुछ घंटों बाद राजा खाना खाने बैठा। गिलहरी ने खिड़की से झांका और गाना गाने लगी-

मेरे धन से देखो राजा, छत्तीस भोग लगाता है
आओ आओ तुम भी देखो, कितना मजा आता है

राजा गुस्से से झल्ला उठा और खाना छोड़कर चला गया। रात को खाना खाते समय गिलहरी फिर से आ गई और वही गाना गाने लगी। अब राजा के गुस्से का ठिकाना न रहा। उसने सिक्का उछाला और गिलहरी की तरफ फेंक दिया। गिलहरी ने सिक्के को उठाया और गाने लगी-

मैं जीती हूं देखो लोगों, राजा ने मुंह की खाई
डर के मारे उसने, मेरी सारी दौलत लौट आई

राजा ने पागलों की तरह गिलहरी का पीछा किया। लेकिन गिलहरी फिर गायब हो गई। राजा पूरी रात बेचैन रहा। सुबह उठते ही राजा ने मंत्री से कहा, “सेना भेजकर सारी गिलहरियों को मार डालो।” मंत्री ने कहा, “मैं आप के गुस्से को समझ सकता हूं। मगर खेतों, घने जंगलों, आदि में लाखों गिलहरियां होंगी। उन्हें पकड़ना इतना आसान नहीं है। पकड़ भी लें तब भी पड़ोसी देशों से गिलहरियां हमारे देशों में आ सकती हैं। आप जब अपने बहादुर सैनिकों को गिलहरियों से लड़ने को कहेंगे तो क्या वह आप का मजाक नहीं उड़ाएंगे ? यही नहीं, इतिहास की किताबों में आप गिलहरियों से युद्ध करने वाले राजा के नाम से प्रसिद्ध हो जाएंगे और उपहास का पात्र बन जाएंगे।” 

राजा ने परेशान होकर पूछा, “तो मैं क्या करूं ? मार्च मंत्री ने कहा, “आप गिलहरी की परवाह मत कीजिए। शुरू शुरू में जब गिलहरी डींगे मार रही थी, तब भी यदि आप बिना क्रोध के उसकी बातें सुन लेते तो बात ना बढ़ती।” दूसरे दिन गिलहरी फिर से आई। पहले दिन का गीत गाने लगी। राजा मुस्कुराया और गाने लगा-

यह तो सच है प्रिय गिलहरी दौलत की रानी हो तुम
कौन नहीं जानता यह कि सर्वज्ञानी भी हो तुम

गिलहरी हैरान रह गई। बिना कुछ कहे वहां से चली गई और फिर कभी दिखाई नहीं दी।

Friday, 17 August 2018

चालाक मेमना हिंदी लोककथा। Lok katha in Hindi

चालाक मेमना हिंदी लोककथा। Lok katha in Hindi

चालाक मेमना हिंदी लोककथा। Lok katha in Hindi

Lok katha in Hindi
मेमने ने बाहर झांककर देखा। सब कुछ कितना सुंदर है। वह धीरे-धीरे गुफा से बाहर आया। उसके मां-बाप चारा ढूँढने गए थे। वे उससे कहकर गए थे कि जंगल में बाघ, शेर, भेड़िए सभी घूमते रहते हैं। तुम्हें अकेले कहीं नहीं जाना। परंतु मेमने से रहा नहीं गया। घूमते-घूमते वह बहुत दूर चला गया। जैसे ही अंधेरा होने लगा, उसे घर की याद आई। पर उसे वापस जाने का रास्ता तो पता ही नहीं था। पास में ही एक गुफा थी। वह उसके अंदर घुस गया। उस गुफा में एक सियार रहता था। मगर सियार उस समय बाहर गया हुआ था।

अपने मां-बाप के लौटने तक मेमने ने वहीं पर इंतजार करने की सोची। सुबह हुई। सियार अपनी गुफा में वापस आया। गुफा तक पहुंचते ही सियार को एहसास हो गया कि गुफा में कोई नया जानवर बैठा है। वह गुफा के द्वार पर ही रुक गया। “अंदर कौन है ? जल्दी बाहर निकलो,” सियार ने धमकाते हुए कहा।

मेमना चालाक था। अपनी आवाज बदलकर वह बोला, “हा हा हा ! मैं शेर का बड़ा बाप हूं। मैं एक दिन में पचास बाघ खाता हूं। जल्दी से जाओ और मेरे लिए बाघ पकड़ कर ले आओ।” बस सियार तो घबरा गया। वह सरपट वहां से भाग निकला। वह बाघों के मुखिया के पास गया और कहा, “बाघ चाचा मुझे बचा लो, एक भयानक जानवर मेरे घर के अंदर घुस आया है। वह खाने के लिए पचास बाघ मांग रहा है।”

“हा हा हा ! बाघ हंस पड़ा। ऐसा कौन सा जानवर है जो पचास बाघ खा सकता है ? जरा मुझे भी तो दिखाओ। मैं उसे भगा दूंगा।” इस बीच मेमने के मां-बाप भी उसे ढूंढते हुए वहां पहुंच गए। मेमने के पांव के निशान के सहारे उन्होंने उसका पता लगा लिया। मेमने ने अपने मां-बाप को सब कुछ बता दिया। तभी उन्होंने दूर से सियार और बाघ को आते हुए देखा। तीनों की गुफा के अंदर छुप गए और एक योजना बनाई।

जैसे ही सियार और बाघ गुफा के पास आए, मेमने की मां ने मेमने का कान खींचा। आई आई आई ! बच्चा जोर से चीखा। बकरे ने अपनी आवाज बदलकर पूछा, “बच्चा क्यों चिल्ला रहा है ?” मेमने की मां कहने लगी, “बच्चा जिद कर रहा है कि जब से इधर आए हैं, भालू और भैंस को खा रहे हैं, आज उसे खाने के लिए बाघ चाहिए।”

बकरे ने कहा, “ठीक है, मैंने बाघ को लाने के लिए सियार को भेजा है। वह बाघ के साथ अभी आता ही होगा।” यह बात सुनकर सियार और बाघ डर के मारे कांपने लगे। बाप रे ! भीतर रहने वाला बच्चा तो भैंस और भालू आदि को निगल जाता है। मैं उसके हाथ लगा तो वह मेरा क्या हाल करेगा ? सियार और बाघ एक क्षण और रूके बिना वहां से निकल भागे।

Thursday, 16 August 2018

मूर्खों की खोज : अकबर बीरबल की कहानी। Akbar Birbal stories in Hindi

मूर्खों की खोज : अकबर बीरबल की कहानी। Akbar Birbal stories in Hindi

मूर्खों की खोज : अकबर बीरबल की कहानी। Akbar Birbal stories in Hindi

Akbar Birbal stories in Hindi

एक दिन अकबर और बीरबल में विवाद हो गया। अकबर ने कहा, “अकलमंद को पहचानना आसान है, मगर मूर्खों को पहचानना कठिन है।” लेकिन बीरबल का कहना था कि मूर्खों को पहचानना आसान है। तब अकबर ने कहा, “अगर यह बात है, तो कल दोपहर के पहले आप आठ मूर्खों को ले आइए। अगर आप ला सके तो मैं उन सबको इनाम दूंगा। लगे हाथ आपको भी इनाम मिल जाएगा।” 

बीरबल अगले दिन सुबह ही मूर्खों की खोज में निकल पड़े। रास्ते में एक आदमी गधे पर सवार होकर जा रहा था। उसके सिर पर कपड़ों की एक गठरी बंधी थी। बीरबल ने उससे पूछा, “तुमने इस गठरी का बोझ क्यों उठा रखा है ? गधे पर ही रख दो।” आदमी ने जवाब दिया, “साहब मेरा गधा बूढ़ा हो गया है, अब उसमें पहले जैसी ताकत भी नहीं है। उसका बोझ कम करने के लिए ही गठरी को अपने सिर पर लादकर ले जा रहा हूं।“ हंसते-हंसते बीरबल ने उससे कहा, “दोपहर को दरबार में आओ। राजा तुम्हें इनाम देंगे।” 

बीरबल ने यात्रा जारी रखी। थोड़ी ही दूर पर एक किसान और उसका बेटा खेत में कुछ ढूंढ रहे थे। बीरबल ने उससे पूछा, ”आप यहां क्या ढूंढ रहे हो ?“ किसान ने कहा, “अपनी बचत के पैसे हमने इसी खेत में कहीं गाड़कर रखे थे। वही ढूंढ रहे हैं।” बीरबल ने उससे पूछा, “क्या उस जगह पर कोई निशानी नहीं रखी थी ?“ बेटे ने कहा, “हां रखी तो थी। उस दिन वहां पर एक मोर नाच रहा था। उसी के पास छिपाए थे।” बीरबल ने हंसते हुए उन्हें भी दरबार में आने को कहा। 

फिर बीरबल थोड़ी और दूर गए। रास्ते में दो लोग लड़ रहे थे। बीरबल ने उन्हें अलग किया और पूछा, “मामला क्या है ?“ उनमें से एक ने कहा, “यह अपने बाघ से मेरे बैल को मरवाना चाहता है।” दूसरे ने कहा, “जरूर मार डालूँगा।” बीरबल ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, “कहां है तुम्हारे बाघ और बैल ?“ पहले आदमी ने कहा, “हम भगवान से एक-एक वरदान मांगने वाले हैं। जब मैंने कहा कि मैं एक बैल मांगूंगा तो यह कहने लगा कि मैं एक बाघ मांगूंगा। अगर उसे बाघ मिल गया तो क्या वह मेरे बैल को मार नहीं डालेगा ?“ बीरबल ने उन दोनों को भी दरबार में बुलाया। 

आगे चलकर बीरबल ने एक आदमी को कीचड़ में गिरा हुआ देखा। वह अपने हाथों को ऊपर की ओर फैला कर उठने की कोशिश कर रहा था। उसे उठाने के लिए बीरबल ने हाथ दिया। उस आदमी ने बीरबल से कहा पर भाई “मेरे हाथ को मत छूना। मैं जो अलमारी बनाने जा रहा हूं यह उसका नाप है। अगर आप मेरे हाथ पकड़ लेंगे तो मैं सही नाप को भूल जाऊंगा।“ बीरबल ने उसे भी दरबार में आने को कहा। 

बीरबल ने जिन छह लोगों से मुलाकात की वह सब दोपहर तक दरबार में पहुंच गए। सारी बातें विस्तार से राजा को बताई गई। दरबारियों ने मूर्खों की बातों का मजा लेकर खूब कहकहे लगाए। आए हुए छह लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आया। अकबर से इनाम पाकर वह खुशी-खुशी वापस चले गए। 

अकबर ने बीरबल को देखकर यह कहा, “आपको इनाम नहीं मिलेगा। क्योंकि आप आठ नहीं, सिर्फ छह मूर्खों को ही लाए हैं।“ इस पर बीरबल ने कहा, “दिनभर मूर्खों की खोज में भटका इसलिए मैं सातवां मूर्ख हूं और आठवां मूर्ख......“ यह कहकर बीरबल रुक गए। अकबर को समझ में आ गया। हंसते हुए बोले, “ इस काम पर आप को भेजने वाला आठवां मूर्ख मैं ही हूँ न ?“ पूरा दरबार हंसी से गूंज उठा।

Wednesday, 15 August 2018

तीन मूर्तियाँ तेनालीराम की कहानियां। Tenali Raman Stories in Hindi

तीन मूर्तियाँ तेनालीराम की कहानियां। Tenali Raman Stories in Hindi

तीन मूर्तियाँ तेनालीराम की कहानियां। Tenali Raman Stories in Hindi 

Tenali Raman Stories in Hindi

विजयनगर राज्य में काफी चहल-पहल थी। दूसरे देश से एक विद्वान सोने की तीन मूर्तियां जो लेकर आया था। सभी मूर्तियां एक जैसी थीं। उनमें जरा भी फर्क नहीं दिखाई देता था। विद्वान ने राजमहल में चुनौती दी, “इन तीनों मूर्तियों में कुछ फर्क है। जो व्यक्ति इस फर्क को पहचानेगा, मैं उसे दस हजार सोने के सिक्के दूंगा। यदि दस दिन में कोई प्रश्न हल नहीं कर पाया तो मुझे दस हजार सोने के सिक्के देने पड़ेंगे।” 

मूर्तियों की प्रदर्शनी की गई। नौ दिन बीत गए। मगर किसी को भी मूर्तियों में कोई अंतर दिखाई नहीं दिया। राजा को चिंता होने लगी कि  विद्वान को सोने के दस हजार सिक्के देने के साथ हार भी माननी पड़ेगी।” तेनालीराम ने कहा, “महाराज। चिंता ना कीजिए। अभी पूरा एक दिन बाकी है। किसी तरह तीनों में अंतर पता लगा लेंगे।” 

दसवां दिन आया। राजमहल में सभी चिंतित थे। तेनालीराम ने मूर्तियों को कई बार घूरकर देखा। उसने एक पतली डंडी को एक मूर्ति के कान में डाला। डंडी दूसरे कान से बाहर निकल आई। उसने डंडी को दूसरी मूर्ति के कान में डाला, अब डंडी मूर्ति के मुंह से बाहर निकली। जब उसने डंडी को तीसरी मूर्ति में के कान में डाला, तो वह अंदर ही रह गई। सभी दंग रह गए। 

तेनालीराम ने विस्तार से बताया, “तीनों मूर्तियों में यह फर्क है। एक मूर्ति मूर्ख जैसी है। वह जो भी सुनती है, उसे दूसरे कान से बाहर निकाल देती है। दूसरी मूर्ति सामान्य व्यक्ति के जैसी है। जो भी सुनती है, बिना सोचे समझे दूसरों को बता देती है। तीसरी मूर्ति महान व्यक्ति जैसी है। जो कुछ भी सुनती है, उस पर पहले गहराई से सोच विचार करती है। सभी मौजूद व्यक्तियों ने तेनालीराम की प्रशंसा की। 

विद्वान ने तेनालीराम को तीन मूर्तियां और दस हजार सोने के सिक्के इनाम में दिए। तेनालीराम ने मूर्तियां राजा को दे दी और सिक्के अपने पास रख लिए। 

Tuesday, 14 August 2018

पंचतंत्र की सभी कहानियों का संग्रह। Panchtantra Stories in Hindi with Moral

पंचतंत्र की सभी कहानियों का संग्रह। Panchtantra Stories in Hindi with Moral

पंचतंत्र की सभी कहानियों का संग्रह। Panchtantra Stories in Hindi with Moral

Panchtantra Stories in Hindi with Moral
पंचतंत्र की रचना पंडित विष्णु शर्मा द्वारा की गयी है। आज विश्व की 50 से भी अधिक भाषाओ में इनका अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इसकी सबसे ख़ास बात ये है कि पंचतंत्र की सभी कहानियाँ प्रेरणादायक है तथा नीति ज्ञान से परिपूर्ण हैं। कहानियों को इस तरह से लिखा गया है की अंत तक उसकी रोचकता समाप्त नहीं होती। इन कहानियों की जितनी प्रासंगिकता पहले थी, उतनी ही आज भी है। (कहानियों को पढने के लिए नीचे देखें। )

  1. बातूनी कछुए की कहानी
  2. बंदर और मगरमच्छ की कहानी
  3. मछलियों की मूर्खता
  4. बुद्धिमान वन हंस
  5. धोखेबाजी का फल
  6. चालाक खरगोश और शेर की कहानी
  7. चोर की सद्बुद्धि
  8. हाथी और खरगोश की कहानी
  9. सांप और कौवे की कहानी
  10. मूर्ख गधा और सियार
  11. विचित्र बालक की कहानी
  12. जैसे को तैसा
  13. शेरनी का तीसरा पुत्र
  14. नेवला और पंडिताइन
  15. चुहिया की शादी
  16. एकता में बल है
  17. ब्राह्मण का सपना
  18. चार मित्र पंचतंत्र की कहानी
  19. चालाक बिल्ला
  20. अकृतज्ञता का फल
  21. उल्लुओं की बस्ती
  22. राजा का रक्त
  23. नीला सियार 
  24. सच्ची मित्रता

Monday, 13 August 2018

चार मित्र पंचतंत्र की कहानी। Panchtantra Story of Four Friends in Hindi

चार मित्र पंचतंत्र की कहानी। Panchtantra Story of Four Friends in Hindi

चार मित्र पंचतंत्र की कहानी। Panchtantra Story of Four Friends in Hindi

Story of Four Friends in Hindi
एक झील के किनारे चार प्राणी रहते थे – कौवा, कछुआ, चूहा और हिरण। कौवा वृक्ष पर रहता था, कछुआ जल में निवास करता था, चूहा बिल में रहता था और हिरण झाड़ी में रहता था। चारों प्राणियों में बड़ी मित्रता थी। चारों साथ-साथ रहते थे, प्रेम से बातचीत और सुख तथा शांति के साथ जीवन व्यतीत किया करते थे। 

एक दिन दोपहर के पश्चात का समय था। कौवा, चूहा और कछुआ तीनों झील के किनारे बैठ कर आपस में बातचीत कर रहे थे। हिरण वहां नहीं था। वह सवेरे भोजन की खोज में गया था, पर अभी तक लौटकर नहीं आया था। चूहा चिंतित होकर बोला, ’सवेरे का गया हुआ हिरण अभी तक लौटकर नहीं आया। कहीं ऐसा तो नहीं, वह किसी विपत्ति में फंस गया हो।’ 

कछुआ बोला, ’अवश्य वह किसी विपत्ति में फंस गया है। नहीं तो लौटने में इतनी देर ना लगाता। वह प्रतिदिन दोपहर के पहले ही आ जाता था। कौवा बोला, ’यदि ऐसी बात है, तो मैं पता लगाने के लिए जा रहा हूं। हिरण जहां भी कहीं होगा, मैं पता लगा कर शीघ्र ही लौट आऊंगा।’ कौवा अपनी बात समाप्त करके उड़ गया। वह उड़ते-उड़ते इधर-उधर देखता हुआ हिरण को पुकारने लगा, ’मित्र हिरण, तुम कहां हो ?’ 

अचानक ही कौवे के कानों में किसी का मंद-मंद स्वर पड़ा, ’मैं यहां हूं, मित्र। मैं यहां हूं।’ वह आवाज हिरण की थी। कौवा हिरन की आवाज को पहचानकर आश्चर्य से अपने आप ही बोल उठा, ’अरे, यह तो मित्र हिरण की ही आवाज है।’ कौवा तुरंत ही नीचे उतरा और हिरण के पास जा पहुंचा। हिरण जाल में फंसा हुआ था। कौवा उसे जाल में फंसा हुआ देखकर बोला, ’अरे, यह क्या ? तुम तो जाल में फंस गए हो।’ हिरण बड़े ही दुख के साथ बोला, ’हां मित्र, मैं जाल में फंस गया हूं। अब तो कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मुझे जाल से मुक्ति मिल सके।’ 

कौवा बोला, ’घबराओ नहीं, धैर्य से काम लो। मैं शीघ्र ही मित्रों के पास जाकर उन्हें खबर करता हूं। हम तीनों तुम्हारी मुक्ति का कोई ना कोई उपाय अवश्य खोज लेंगे।’ कौवा हिरण को आश्वासन देकर उड़ चला और थोड़ी ही देर में मित्रों के पास जा पहुंचा। तीनों मित्र बड़ी उत्सुकता के साथ कौवे का इंतजार कर रहे थे। तीनों मित्र कौवे को देख कर एक ही साथ बोल उठे, ’कहो, मित्र, हिरण का कहीं पता चला ?’ कौवा बड़े ही दुखी स्वर में बोला, ’पता तो चल गया है, भाई, पर वह एक बहेलिया के जाल में फस गया है। हमें शीघ्र ही उसके छुटकारे के लिए कोई उपाय करना चाहिए। यदि देर हो गई तो बहेलिया उसे पकड़ के ले जाएगा और मार के खा जाएगा।’  

कौवे की बात सुनकर कछुआ बोला, ’हां भाई, हमें हिरण के छुटकारे के लिए अवश्य कोई उपाय करना  चाहिए। मित्र चूहे को जाल के पास पहुंचा कर जाल को काटा जा सकता है। अतः हम सब को बहेलिए के आने से पूर्व ही वहां पहुंचकर जाल को काटना होगा। फिर क्या था, कौवा, कछुए और चूहे के साथ हिरण को जाल से मुक्त कराने के लिए निकल पड़ा। चूहे ने फौरन ही जाल को काट कर हिरण को मुक्त करा लिया। जब बहेलिया वहां पहुंचा तो वह दुख से अपना माथा ठोककर रह गया। जाल के कटने का तो उसे इतना दुख नहीं था, जितना दुख मोटे-ताजे हिरण के निकल भागने का था, पर अब क्या हो सकता था ? 

बहेलिया जब वापस जाने लगा तो उसकी नजर कछुए पर पड़ी। कछुआ धीरे-धीरे रेंगता हुआ झाड़ी की ओर जा रहा था। कछुए को देखकर बहेलिए ने सोचा हिरण तो हाथ से निकल ही गया है, अब कछुआ ही सही। आज इसी से पेट की पूजा की जाएगी। बहेलिया ने कछुए को उठाकर थैले में रख लिया। वह थैला कंधे पर रखकर अपने घर की ओर चल पड़ा। जब बहेलिया दूर चला गया, तो कौवे ने अपने दोनों मित्रों को आवाज दी, “हिरण भाई, आओ। चूहे भाई, तुम भी बिल से बाहर निकलो।” कौवे की आवाज को सुनकर हिरण आ गया। चूहा भी बिल से निकल आया और कौवा भी नीचे उतर आया। तीनों मित्र इस नई मुसीबत पर विचार करने लगे। कौवे ने कहा, “बहेलिया कछुए को अपने थैले में रख कर ले गया है। हमें उसे छुड़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि वह उसे लेकर घर पहुंच गया, तो मार कर खा जाएगा।” 

कौवे की बात सुनकर हिरण बोला, “हां, हमें कछुए को छुड़ाने के लिए अवश्य कोई उपाय करना चाहिए। मुझे एक उपाय सूझा है। मैं बहेलिए के मार्ग में जाकर घास चरने लगूंगा। बहेलिया जब मुझे देखेगा तो उसके मन में लालच उत्पन्न हो जाएगा। वह थैले को जमीन पर रखकर मुझे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा। मैं पहले तो लंगड़ाता हुआ भागूंगा, पर कुछ दूर जाने पर चौकड़ी भरने लगूंगा। बहेलिया मुझे पकड़ नहीं सकेगा।” बहेलिया थैले को जमीन पर रख दे, तो चूहे को वहां पर पहुंचकर थैले को काटकर कछुए को छुड़ाना होगा। हिरण की बात दोनों मित्रों को पसंद आई। दोनों ने कहा, “ठीक है ऐसा ही करेंगे।” 

हिरण शीघ्र ही बहेलिए के मार्ग में जा पहुंचा और हरी-हरी घास चरने लगा। बहेलिए ने जब हिरण को देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया। वह झट से थैले को जमीन पर रखकर, हिरण को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा। पहले तो हिरण लंगड़ाता हुआ भागने का दिखावा करने लगा, पर जब कुछ दूर निकल गया, तो चौकड़ी भरता हुआ बहेलिए की आंखों से ओझल हो गया। बहेलिया ने जब थैले को कंधे से उतारकर जमीन पर फेंका, उसके तुरंत बाद ही चूहा वहां पहुंच गया। उसने थैले को काटकर कछुए को छुड़ा लिया। बहेलिया जब हिरण को पकड़ नहीं सका। तो निराश होकर थैले के पास लौटा, पर यहां तो थैला भी फटा हुआ था और कछुए का कहीं अता-पता नहीं था। 

बहेलिया माथा ठोकता रह गया और अपने आप ही बोल उठा, “हाय, आज ना जाने किसका मुंह देख कर चला था, जिसे भी पकड़ता हूं वह हाथ से निकल जाता है। हिरण तो निकल ही गया और कछुआ भी हाथ ना लग सका। आज तो भूखा ही रहना पड़ेगा।” बहेलिया जब अपने भाग्य को कोसता हुआ चला गया तो चारों मित्र पुनः एकत्र हुए और प्रसन्नता प्रकट करते हुए आपस में बातचीत करने लगे। चारों मित्र हंसते गाते हुए झील के किनारे गए और सुख तथा शांति से जीवन व्यतीत करने लगे। 

कहानी से शिक्षा: 
अधिक से अधिक मित्र बनाना सबसे बड़ा गुण है। 
सच्चा मित्र वही है, जो विपत्ति में काम आता है। 
अपने को संकट में डाल कर भी मित्र की सहायता करनी चाहिए।

Sunday, 12 August 2018

नीला सियार पंचतंत्र की कहानी। Nila Siyar Panchtantra Story

नीला सियार पंचतंत्र की कहानी। Nila Siyar Panchtantra Story

नीला सियार पंचतंत्र की कहानी। Nila Siyar Panchtantra Story

Nila Siyar Panchtantra Story
किसी जंगल में एक सियार रहता था। सियार बड़ा चालाक और झूठ था। वह दिनभर तो छिपा रहता था, पर जब रात होती थी तो शिकार के लिए बाहर निकलता और बड़ी ही चालाकी से छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाता था। एक बार रात में जब सियार शिकार के लिए बाहर निकला, तो बड़ी दौड़-धूप करने के बाद भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। उसने सोचा, जंगल में तो भोजन मिला नहीं, चलो, अब बस्ती की ओर चलें। हो सकता है बस्ती में कुछ भोजन मिल जाए।

बस्ती की बात सोचते ही सियार को कुत्तों की याद आई। उसने सोचा, बस्ती में कुत्ते रहते हैं। वह देखते ही भौंकते हुए पीछे लग जाएंगे। फिर तो लेने के देने पड़ जाएंगे। फिर भी सियार बस्ती की ओर बढ़ चला। वह ज्यों-ज्यों बस्ती के भीतर घुसा, कुछ कुत्तों की नजर उस पर पड़ गई। बस, फिर क्या था, कुत्ते भौंकते हुए उसकी ओर दौड़ पड़े। परंतु बस्ती में सियार भाग कर जाता तो कहां जाता ? सियार प्राण बचाने के लिए इधर से उधर और उधर से इधर चक्कर काटने लगा। आखिर एक घर का दरवाजा खुला देखकर सियार उसके भीतर घुस गया।

वह घर रंगरेज का था। घर के भीतर में बहुत बड़ा टब रखा था। जिसमें घुला हुआ नीला रंग भरा था। सियार प्राण बचाने के लिए जल्दी से उसी टब में घुसकर बैठ गया। कुछ देर तक टब में बैठा रहा। जब बाहर कुत्तों का भौंकना बंद हो गया, तो वह टब से बाहर निकला। बाहर निकलने पर वह यह देखकर विस्मित को उठा कि उसका पूरा शरीर नीले रंग का हो गया था। वह अपने शरीर को नीले रंग में रंगा हुआ देखकर आश्चर्यचकित हो उठा। सियार इस तरह प्राण बचा कर वापस जंगल में पहुंचा।

वन  के जीवो ने जब सियार को देखा, तो वह भयभीत हो उठे, भाग खड़े हुए, क्योंकि उन्होंने आज तक ऐसे अद्भुत जानवर को कभी नहीं देखा था। सियार ने जब जंगल के जीवो को भागते हुए देखा, तो वह समझ गया कि जंगल के जीव उसके शरीर के नीले रंग को देख कर भाग रहे हैं। वह धूर्त और चालाक तो था ही, उसने अपने शरीर के नीले रंग से लाभ उठाने का निश्चय किया। सियार भागते हुए जंगल के जीवो को पुकार पुकार कर कहने लगा, “अरे भाइयों, तुम सब मुझ से डर कर क्यों भाग रहे हो ? मुझे तो ईश्वर ने अपना दूत बनाकर तुम्हारे ही कल्याण के लिए भेजा है। तुम सब डरो नहीं । मेरे पास आओ, मैं तुम सबको भगवान का संदेश सुनाऊंगा।“

सियार की बात सुनकर जानवरों के मन में कुछ विश्वास पैदा हुआ, कुछ हिम्मत आई । हाथी, शेर, बाघ, भालू, बंदर आदि सभी जानवर सियार के पास इकट्ठे होने लगे। वह सब उसे ईश्वर का दूत समझकर उसका आदर करने लगे । सियार सभी जानवरों को अपने प्रभाव में लाता हुआ बोला, “भाइयों मैं ईश्वर की आज्ञा से इसी जंगल में रहूंगा और तुम्हारा कल्याण करूंगा, पर तुम्हारी ओर से प्रतिदिन मेरे खाने-पीने का तो प्रबंध होना ही चाहिए।“ बात उचित थी । इसलिए जंगल की जिन्होंने सियार की बात मान ली।

वे सभी बड़े आदर से प्रतिदिन उसके खाने-पीने का प्रबंध करने लगे। धूर्त सियार के दिन बड़े सुख से बीतने लगे। उसे अब और क्या चाहिए था। पर झूठ का व्यापार हमेशा नहीं चलता। एक ना एक दिन तो भेद खुल ही जाता है। सियार का भेद भी खुल गया। बात यह हुई कि चांदनी रात थी। जंगल के जानवर सियार के पास एकत्र थे और उसकी लच्छेदार बातों को सुन रहे थे रात थी। अचानक ही जंगल में कई सियार एक साथ बोल उठे, “हुआं, हुआं, हुआं, हुआं।“

बस, फिर क्या था ? जंगल के सभी जानवरों पर सियार का भेद प्रकट हो गया। अरे, यह तो सियार है। अपनी धूर्तता से ईश्वर का दूत बनकर हम लोगों को फंसाएं हुए था। फिर तो जंगल के सभी जानवरों ने सियार को एक क्षण भी जीवित नहीं रहने दिया।

कहानी से शिक्षा : झूठ का व्यापार ज्यादा दिन नहीं चलता। 

Saturday, 11 August 2018

पंचतंत्र की कहानी राजा का रक्त। Panchtantra Story in Hindi

पंचतंत्र की कहानी राजा का रक्त। Panchtantra Story in Hindi

पंचतंत्र की कहानी राजा का रक्त। Panchtantra Story in Hindi

Panchtantra Story in Hindi

एक खटमल था। उसके बाल बच्चे भी थे। बाल बच्चों के भी बाल बच्चे थे। खटमल का बहुत बड़ा परिवार था। वह अपने बहुत बड़े परिवार के साथ राजा के पलंग में निवास करता था। खटमल बहुत बुद्धिमान था। उसने अपने परिवार के लोगों को शिक्षा दे रखी थी, “यदि राजा के पलंग में रहना है, तो समय असमय का ध्यान रखना। राजा को उसी समय काटना होगा, जब वह शराब पीकर गहरी नींद में सोया हुआ हो। इसके विपरीत, यदि कोई राजा के रक्त को चूसने का प्रयत्न करेगा, तो वह तो मारा ही जाएगा, परिवार के अन्य लोग भी निर्दयतापूर्वक मार डाले जाएंगे।”

परिवार के सभी खटमल उस की दी हुई शिक्षा के अनुसार ही काम करते थे। वह राजा को कभी उस समय नहीं काटते थे, जब वह जाग रहा हो। खटमल अपने पूरे परिवार के साथ बड़े सुख से रहता था। राजा को पता नहीं चलता था, इसलिए वह कभी भी खटमलों को मारने का प्रयत्न नहीं करता था। कुछ दिनों पश्चात एक दिन कहीं से एक मच्छर उड़ता हुआ आ गया। वह राजा के कोमल बिस्तर पर लोटपोट होने लगा। उसे जब बिस्तर अधिक मुलायम लगा, तो वह उस पर जोर जोर से उछलने-कूदने लगा।

खटमल ने मच्छर को देख लिया। उसने प्रश्न किया, “तुम कौन हो और कहां से आए हो? मार्च मच्छर ने उत्तर दिया, “मैं मच्छर हूं। गंदे पानी के नाले में रहता हूं। वाह, वाह, यह बिस्तर तो बड़ा मुलायम है।” खटमल ने उत्तर दिया, “मुलायम नहीं होगा, को क्या होगा? यह राजा का बिस्तर है। इसे गंदा मत करो। भाग जाओ यहां से।” मच्छर बोला, “यह राजा का विस्तार है? तब तो राजा इस पर अवश्य सोता होगा। अरे भाई, मैं तुम्हारा मेहमान हूं। मेहमान को इस प्रकार लगाया नहीं जाता। मुझे भी जरा इस मुलायम बिस्तर का आनंद लेने दो।”

खटमल बोल उठा, “नहीं नहीं, तुम मेरे मेहमान नहीं हो सकते। मैं तुम्हें राजा के बिस्तर पर लौटने नहीं दूंगा। तुम भाग जाओ यहां से।” मच्छर विनती करने लगा, नम्रता से कहने लगा, “बस, आज रात भर रहने दो। मैं अब तक अनेक मनुष्य का रक्त का स्वाद ले चुका हूं, पर कभी राजा का रक्त चूसने का अवसर नहीं मिला। राजा अच्छे-अच्छे भोजन खाता होगा। अवश्य, उसका रक्त मीठा होगा। मुझ पर दया करो। मुझे राजा के रक्त का स्वाद ले लेने दो।” खटमल बोला, “अभी तो तुम मुलायम बिस्तर पर लोटपोट करने की बात कर रहे थे, अब रक्त चूसने की बात करने लगे। बड़े प्रपंची लग रहे हो। मैं तुम्हें यहां नहीं रहने दूंगा। जाओ, भाग जाओ यहां से।”

खटमल ने मच्छर से बराबर यही कहा कि तुम भाग जाओ यहां से, पर मच्छर खटमल से बराबर यही विनती करता रहा कि मैंने कभी राजा का रक्त नहीं चखा है। कृपया आज मुझे राजा के रक्त को चखकर यह जान लेने दो कि उसका स्वाद कैसा होता है? मच्छर ने जब बार-बार प्रार्थना की, तो खटमल के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने कहा, “अच्छी बात है। तुम एक रात यहां रह सकते हो, पर राजा का रक्त चूसने के संबंध में तुम्हें मेरी शर्तें माननी होंगी।”

मच्छर बोला, “बताओ, तुम्हारी शर्त क्या है? मार्च खटमल ने कहा, “तुम्हें दो बातों का ध्यान रखना होगा। एक तो यह कि जब राजा गहरी नींद में सो जाएगा, तभी तुम उसे काटोगे। और दूसरी बात यह कि तुम राजा के पैर के तलवों को छोड़कर और कहीं नहीं काटोगे।” मच्छर बोला, “मुझे तुम्हारी शर्तें मंजूर है। मैं तुम्हें वचन देता हूं, तुम्हारी दोनों बातों का ध्यान रखूंगा।” मच्छर के वचन देने पर खटमल चला गया और मच्छर स्वतंत्रतापूर्वक पलंग पर उछलने-कूदने लगा।

धीरे-धीरे दिन बीता। शाम हुई। और शाम के बाद रात आई। राजा खा पीकर पलंग पर सोने लगा। पर कुछ देर तक उसे नींद नहीं आई। राजा को देखकर मच्छर के मन में लालच पैदा हो गया। उसने सोचा, कैसा हष्ट पुष्ट है। इसका रक्त अवश्य बड़ा मीठा होगा। खटमल ने कहा था, जब राजा को गहरी नींद आए तभी काटना, पर न जाने इसे गहरी नींद कब आएगी। यह भी हो सकता है कि इसे गहरी नींद आएगी ना तो फिर मैं इसे कैसे काटूंगा? ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता। खटमल ने यह भी कहा था कि पैरों के तलवों को छोड़कर और कहीं मत काटना, पर इससे क्या होता है? जैसे पैरों के तलवे, वैसे ही शरीर के दूसरे अंग। में तलवों में ना काट कर गर्दन में काट लूंगा। गर्दन में रक्त भी अधिक होता है।

बस, फिर क्या था। मच्छर ने राजा की गर्दन में टांग अड़ाने आरंभ कर दिए एक बार, दो बार, तीन बार। राजा घबराकर उठा। उसने अपना दाहिना हाथ गर्दन पर जोर से पटक मारा, मच्छर उड़ कर भाग गया। पकड़ में नहीं आया। राजा ने व्याकुल होकर नौकरों को पुकारकर कहा, “न जाने किस कीड़े ने मेरी गर्दन में काट लिया है। बड़ी जलन हो रही है। बिस्तर और पलंग को झाड़कर देखो, क्या है ?

राजा पलंग से उठकर खडा हो गया। नौकर बिस्तर और पलंग को झाड़कर देखने लगे। मच्छर तो भाग गया था, मिला तो खटमल और उसका परिवार। नौकरों ने सभी खटमलों को बीन-बीनकर मार डाला।

कहानी से शिक्षा:
किसी की चिकनी-चुपड़ी बातों में नहीं आना चाहिए।

Friday, 10 August 2018

पंचतंत्र की कहानी उल्लुओं की बस्ती। Panchtantra Story in Hindi

पंचतंत्र की कहानी उल्लुओं की बस्ती। Panchtantra Story in Hindi

पंचतंत्र की कहानी उल्लुओं की बस्ती। Panchtantra Story in Hindi

Panchtantra Story in Hindi
एक वृक्ष पर एक उल्लू रहता था। उल्लू को दिन में कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उल्लू दिनभर अपने घोंसले में छिपा रहता था। जब रात होती थी, तो शिकार के लिए बाहर निकलता था। गर्मी के दिन थे, दोपहर का समय। आकाश में सूर्य आग के गोले की तरह चमक रहा था। बड़े जोरों की गर्मी पड़ रही थी। कहीं से उड़ता हुआ एक हँस आया और वृक्ष की डाल पर बैठ कर बोला, ‘बड़ी भीषण गर्मी है। आकाश में सूर्य आग के गोले की तरह चमक रहा है।’ 

हँस की बात उल्लू के कानों में भी पड़ी। वह बोल उठा, ‘क्या कह रहे हो ? सूर्य चमक रहा है ? बिल्कुल झूठ। चंद्रमा के चमकने की बात कहते तो मान भी लेता।हँस बोला, ‘चंद्रमा तो दिन में चमकता नहीं, रात में चमकता है। इस समय दिन है। दिन में सूर्य ही चमकता है। जब सूरज का प्रकाश तीव्र रूप से फैल जाता है तो भयानक गर्मी पड़ती है। आज सचमुच बड़ी भयानक गर्मी पड़ रही है।‘ 

उल्लू मजाक उड़ाते हुए हंसा और बोला।, ‘अभी तो तुम सूर्य की बात कर रहे थे, अब सूर्य के प्रकाश की बात करने लगे। बड़े मूर्ख लग रहे हो। अरे भाई, ना सूर्य है, ना प्रकाश। यह तो हमारे मन का भ्रम है।हँस ने उल्लू को समझाने का बड़ा प्रयास किया कि आकाश में सूर्य चमक रहा है और उसके कारण गर्मी पड़ रही है, पर उल्लू अपनी बात पर अड़ा रहा। हँस के अधिक समझाने पर भी वह यही कहता रहा कि ना तो सूर्य है, ना ही सूर्य का प्रकाश है और ना ही गर्मी पड़ रही है। 

उल्लू और हँस जब देर तक अपनी-अपनी बात पर अड़े रहे, तो उल्लू बोला की पास ही में दूसरे पेड़ पर मेरे सैकड़ों जाति भाई रहते हैं। वह बड़े बुद्धिमान हैं। चलो, उनके पास चलकर निर्णय कराएं कि आकाश में सूर्य है या नहीं।हँस ने उल्लू की बात मान ली। उल्लू उसे साथ लेकर दूसरे पेड़ पर गया। दूसरे पेड़ पर सैकड़ों उल्लू रहते थे। उल्लू ने अपने भाइयों को एकत्र करके कहा, ‘भाइयों, इस हँस का कहना है, इस समय दिन है और आकाश में सूर्य चमक रहा है। आप लोग ही निर्णय करें, इस समय दिन है या नहीं, और आकाश में सूर्य चमक रहा है या नहीं।‘ 

उल्लू की बात सुनकर उसके सभी जाति भाई बोले कि क्या कह रहे हो आकाश में सूर्य चमक रहा है ? बिल्कुल अंधे हो। हमारी बस्ती में ऐसी झूठी बात का प्रचार मत करो।पर हँस चुप नहीं रह सका, बोला, ‘मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं। इस समय दिन है और आकाश में सूर्य चमक रहा है।हँस की बात सुनकर सभी उल्लू क्रोधित हो उठे और हँस को मारने के लिए झपट पड़े। हँस अपने प्राण बचा कर भाग गया। खुशकिस्मती थी की दिन होने के कारण उन लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यदि दिखाई पड़ता, तो वह हंस को अवश्य मार डालते। उधर दिन होने के कारण हंस को दिखाई पड़ रहा था। उसने सरलता से भागकर उल्लूओं से अपनी रक्षा की। 

हँस ने बड़े दुख के साथ अपने आप से ही कहा, ‘यह बात सच है कि इस समय दिन है और आकाश में सूर्य चमक रहा है, पर उन लोगों ने संख्या में अधिक होने के कारण सच को भी झूठ से हरा दिया।' जहां मूर्खों का बहुमत होता है, वहां इसी प्रकार सत्य को भी असत्य सिद्ध कर दिया जाता है। 

कहानी से शिक्षा :
मूर्ख मनुष्य विद्वान की बात को भी सच नहीं मानता। 
मूर्खों की सभा में सत्य को भी असत्य ठहरा दिया जाता है। 
मूर्खों की बड़ाई से ना तो प्रसन्न होना चाहिए और ना ही बुराई करने से अप्रसन्न होना चाहिए, क्योंकि मूर्ख तो मूर्ख ही होते हैं।

Thursday, 9 August 2018

पंचतंत्र की कहानी अकृतज्ञता का फल। Panchtantra Stories in Hindi

पंचतंत्र की कहानी अकृतज्ञता का फल। Panchtantra Stories in Hindi

पंचतंत्र की कहानी अकृतज्ञता का फल। Panchtantra Stories in Hindi

Panchtantra Stories in Hindi

किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था। ब्राह्मण बड़ा गरीब था। भिक्षा को छोड़कर उसकी जीविका का कोई साधन नहीं था। वह प्रतिदिन सवेरा होते ही भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ता। परंतु ब्राह्मण को रोज पर्याप्त भिक्षा भी नहीं मिलती थी। अतः उसे और उसके परिवार के किसी भी सदस्य को किसी भी दिन भरपेट भोजन नहीं मिल पाता था। ब्राम्हण भूख के कष्टों को सहते-सहते ऊब गया, तो उसने विदेश जाने का निश्चय किया। पर उसने अपने निश्चय को अपने घरवालों पर प्रकट नहीं किया। उसे भय था कि उसके घर वालों को यदि यह बात मालूम हो गई, तो वे उसे विदेश नहीं जाने देंगे। 

एक रात, जब ब्राह्मण के बाल-बच्चे गहरी नींद में सो रहे थे, तो वह चुपके से विदेश के लिए रवाना हो गया। उसे कहां और किस ओर जाना है, इस बात का बिल्कुल भी पता नहीं था। वह एक ही दिशा में चलता चला गया। ब्राम्हण चलते-चलते एक जंगल में पहुंचा। जंगल में एक पक्का कुआं था। ब्राह्मण आराम करने के लिए पक्के कुएं की जगत पर बैठ गया। ब्राम्हण के कानों में कुछ ऐसी आवाजें पड़ी, जो कुए के भीतर से आ रही थी। वास्तव में बात यह थी कि कुएं में किसी तरह चार प्राणी गिर पड़े थे। बाघ, बंदर, सांप और सुनार। चारों कुएं से बाहर निकलने का प्रयत्न कर रहे थे, पर निकल नहीं पा रहे थे। कुएं के भीतर की आवाजों को सुनकर ब्राह्मण के मन में उत्सुकता पैदा हुई। वह कुए के भीतर झांकने लगा। बाघ की दृष्टि ब्राम्हण पर जा पड़ी। उसने बड़े ही नम्रता से कहा।’कौन हो, भाई ? दया करके मुझे इस कुएं से बाहर निकाल लो ?’

ब्राह्मण बोला, ’मैं तो ब्राम्हण हूं। तुम कौन हो ?’बाघ ने उत्तर दिया, ’मैं बाघ हूं, भाई, कुएं में गिर पड़ा हूं। मुझे बाहर निकालो, तो मैं तुम्हारा उपकार मानूंगा।’ब्राह्मण ने उत्तर दिया, ’ना ना भाई, मैं तुम्हें बाहर नहीं निकालूंगा। तुम बाहर निकलने पर मुझे मारकर खा जाओगे।’बाघ बोला, ’क्या कहते हो ? मैं उपकार करने वालों को मारकर खा लूंगा ? मैं तुम्हें वचन देता हूं, तुम्हें नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा। इसके विपरीत, तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगा।’ब्राह्मण के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने सोचा परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। बाघ संकट में पड़ा है। क्यों ना उसे बाहर निकाल दिया जाए। ब्राह्मण ने बाघ को किसी तरह ऊपर खींच लिया। बाघ ने कुएं से बाहर आकर कहा, ’मैं तुम्हारा उपकार सदा याद रखूंगा। हो सके, तो कभी मेरे घर आना। में सामने, पहाड़ी की एक गुफा में रहता हूं। जब भी तुम मेरे घर आओगे, मैं तुम्हारी सेवा करूंगा, तुम्हारा आदर-सत्कार करूंगा। देखो, इस कुएं में एक सुनार भी गिरा है। वह भी कितनी ही प्रार्थना क्यों ना करें, उसे बाहर मत निकालना। उसे बाहर निकालोगे, तो दुख में फंसोगे।’

बाघ के चले जाने पर उनके भीतर से बंदर बोला, ’ब्राम्हण देवता, कृपा करके मुझे भी कुएं से बाहर निकाल दो।’ब्राम्हण ने प्रश्न किया, ’तुम कौन हो भाई ?’ब्राम्हण ने उत्तर दिया, ’मैं बंदर हूं। बाघ की भांति ही मैं भी कुएं में गिर पड़ा हूं। मुझे भी बाहर निकाल दो। मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूंगा।’ब्राह्मण ने बंदर को भी बाहर निकाल दिया। बाहर निकलकर बंदर बोला, ’मैं सामने की पहाड़ी के नीचे वृक्ष पर रहता हूं। कभी मेरे घर अवश्य आना। तुम्हारा आदर-सत्कार करने से मुझे सुख मिलेगा। देखो, कुए के भीतर एक सुनार भी है। वह कितनी ही प्रार्थना क्यों ना करें, उसे बाहर मत निकालना।’

बंदर के बाहर आने पर कुए के भीतर से सर्प बोला, ’ब्राम्हण देवता मुझ पर भी दया करो। मुझे भी बाहर निकाल दो।’ब्राम्हण ने प्रश्न किया, ’तुम कौन हो, भाई ?’सर्प ने उत्तर दिया, ’मैं एक सांप हूं, कुएं में गिर पड़ा हूं। कृपया मुझे भी बाहर निकाल दो।’ब्राह्मण बोला, ’ना भाई ना। तुम्हें बाहर नहीं निकाल सकता। तुम्हारा क्या विश्वास, तुम मुझे ही डस लो ?’सांप ने उत्तर दिया, ’तुम मुझे बाहर निकालोगे और मैं तुम्हें डसूंगा ? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता। उपकार करने वाले को भी कोई हानि पहुंचाता है भला ? तुम मेरी बात का विश्वास करो, कृपा करके मुझे भी बाहर निकाल दो।’ब्राम्हण ने सांप को भी बाहर निकाल दिया। बाहर निकलकर सांप बोला, ’मैं तुम्हारा उपकार हमेशा याद रखूंगा। जब भी और जहां भी तुम पर कोई मुसीबत पड़े, मुझे याद करना। मैं याद करते ही तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा और तुम्हारी सहायता करूंगा। देखो, कुए के भीतर एक सुनार दी है। वह दुष्ट प्रकृति का है। उसे बाहर मत निकालना।’

सांप के चले जाने के बाद कुएं के भीतर से सुनार बोला, ’हे ब्राह्मण, मुझे भी कुएं से बाहर निकाल दो।’ब्राम्हण ने प्रश्न किया, ’तुम कौन हो, भाई?’सुनार बोला, ’मैं आदमी हूं, जाति का सुनार हूं। दया करके मुझे भी बाहर निकाल दो।’ ब्राम्हण कुछ उत्तर ना देकर मन ही मन सोचने लगा। उसे सोच-विचार में पड़ा हुआ देखकर सुनार फिर से बोला, ’तुमने बाघ, बंदर और सांप को तो बाहर निकाल दिया, मुझे निकालने में सोच विचार क्यों कर रहे हो? मैं मनुष्य जाति का हूं। मैं तुम्हारे उपकार को कभी नहीं भूलूंगा। एक सच्चे मित्र की भांति तुम्हारी सहायता करूंगा।’ ब्राम्हण के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने सुनार को भी बाहर निकाल दिया। सुनार बाहर निकल कर बोला, ’मैं अमुक नगर में रहता हूं, सुनारी करता हूं। आवश्यकता पड़ने पर मेरे घर अवश्य आना। मैं तुम्हारी सहायता के लिए सदैव तैयार रहूंगा।’ सुनार भी ब्राह्मण को धन्यवाद कह कर चला गया। 

ब्राम्हण कामकाज की खोज में वहां से आगे बढ़ा। कई महीनों तक इधर-उधर भटकता रहा, पर उसे ना तो कोई काम-काज मिला और ना ही किसी ने उसकी सहायता की। आखिर ब्राम्हण को बंदर की याद आई। उसने सोचा, बंदर ने सहायता करने का वचन दिया था, क्यों ना उसके घर चलूं? हो सकता है कुछ काम बन जाए। ब्राह्मण बंदर के घर जा पहुंचा। बंदर ने ब्राह्मण को देखकर प्रसन्नता प्रकट की। उसने ब्राह्मण का बहुत आदर-सत्कार किया। उसे मीठे-मीठे फल खिलाएं। ब्राम्हण कई दिनों तक बंदर के घर रहा। बंदर ने आदर-सत्कार तो किया, पर कुछ धन नहीं दिया। धन उसके पास था ही नहीं, तो वह कहां से देता। कई दिनों तक ब्राह्मण बंदर के घर रहने के पश्चात वहां से चल पड़ा। 

उसे बाघ की याद आई। उसने सोचा, बाघ भी इसी पहाड़ी की गुफा में रहता है, क्यों ना उससे भी मिल लूं? हो सकता है, वह मेरी कुछ सहायता कर दे। ब्राम्हण बाघ के घर जा पहुंचा। बाघ भी ब्राह्मण को देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ। ब्राम्हण बाघ के घर कई दिनों तक रहा। बाघ ने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया। ब्राह्मण जब बाघ के घर से जाने लगा तो बाघ ने सोने की एक जंजीर और सोने के कंगन उसे दिए। ब्राह्मण बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने सोचा, मेरी विदेश यात्रा सफल हो गई। वास्तव में सोने की जंजीर और दोनों कंगन एक राजकुमार के थे। राजकुमार शिकार के लिए पहाड़ पर गया था और बाघ के द्वारा मारा गया था। बाघ को दोनों वस्तुएं उसी से मिली थी। 

ब्राम्हण जब बाघ के घर से चला गया, तो उसने सोचा, सोने की दोनों चीजों को मुझे बेच देना चाहिए। बेचने से काफी धन मिलेगा। मैं घर जाकर जब वह धन अपनी पत्नी को दूंगा तो वह बहुत प्रसन्न होगी। परंतु दोनों चीजों को बेचूं तो कहां बेचूं ? अचानक ही ब्राम्हण को सुनार की याद आई। उसने सोचा, दोनों चीजों को बेचने के लिए क्यों ना सुनार के पास चला जाए ? सुनार ने कहा था, आवश्यकता पड़ने पर मेरे पास आना। मैं तुम्हारी सहायता करूंगा। ब्राम्हण सुनार के घर गया। सुनार ने उसे देख कर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की, उसका बड़ा आदर-सत्कार किया। ब्राह्मण ने कहा, ’सुनार भाई, मैं आपके पास एक विशेष काम के लिए आया हूं। मेरे पास सोने के दो आभूषण हैं। मैं उन्हें बेचना चाहता हूं।’ 

ब्राम्हण ने दोनों आभूषण को निकालकर सुनार के सामने रख दिया। सुनार दोनों आभूषणों को हाथ में लेकर बड़े ध्यान से उलट-पुलट कर देखने लगा। कुछ देर तक देखने के बाद सुनार सोचता हुआ बोला, ’दोनों आभूषण है तो अच्छे, पर खरीदने से पूर्व मैं इन्हें एक और सुनार को दिखाना चाहता हूं, तुम यहीं आराम करो। मैं अभी इन्हें दिखाकर आ रहा हूं।’ सुनार ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा, ’यह ब्राम्हण देवता मेरे मित्र हैं। तुम इनके खाने-पीने का प्रबंध करो। मैं अभी थोड़ी देर में लौट कर आ रहा हूं।’ 

सुनार दोनों आभूषणों को लेकर अपने घर से निकल पड़ा। वह सीधे राजा के पास गया। उसने राजा से कहा, ’महाराज, राजकुमार के गले की जंजीर और हाथ के दोनों कंगन मुझे मिल गए हैं। यह देखिए, मैं इन्हें अच्छी तरह पहचानता हूं, क्योंकि यह दोनों ही चीजें मेरे हाथों की बनाई हुई है।’ सुनार ने दोनों ही आभूषण राजा के सामने रख दिए। राजा ने आभूषणों को हाथ में लेकर देखते हुए कहा, ’तुम्हें यह दोनों आभूषण कहां से और कैसे प्राप्त हुए ?’ सुनार ने उत्तर दिया, ’महाराज, एक ब्राम्हण मेरी दुकान पर बैठा हुआ है। मैं उसे भली भांति पहचानता हूं।’ 

राजा क्रोधित हो उठा। उसने सिपाहियों को बुलाकर कहा, ’तुम सब सुनार के साथ जाओ। इसकी दुकान पर जो ब्राम्हण बैठा हुआ है, उसे बंदी बनाकर जेल में डाल दो। फिर मैं उसके भाग्य का निपटारा करूंगा।’ सिपाहियों ने राजा की आज्ञा का पालन किया और ब्राह्मण को जेल में डाल दिया। ब्राम्हण आश्चर्यचकित हो उठा। उसने जब सिपाहियों से अपना अपराध पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया, ’यह तो तुम्हें महाराज ही बताएंगे।’ राजा ने आभूषणों को देखकर सोचा, हो ना हो ब्राह्मणों ने ही ब्राम्हण ने ही राजकुमार की हत्या की है, क्योंकि बहुत खोजने पर भी राजकुमार का कहीं पता नहीं चल सका था। पता कैसे भी चलता, उसे तो बाघ मारकर खा गया था। राजकुमार के आभूषणों को देखकर सुनार ने भी यही समझा कि ब्राम्हण ने ही राजकुमार की हत्या की है। वह ब्राम्हण के उपकार को तो भूल गया और राजा से पुरस्कार पाने के लालच में उसे बंदी बनवा दिया। 

कारागार में ब्राम्हण दुखी होकर सोचने लगा, आखिर उसने ऐसा कौन सा अपराध किया है, जिसके कारण राजा के सिपाहियों ने उसे बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। ब्राह्मण ने बहुत सोच-विचार किया, पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। ब्राह्मण ने जब देखा, अब उसके छुटकारे का कोई उपाय नहीं है, तो संकट की इस घड़ी में उसे सांप की याद आई। उसने सोचा कि सांप ने कहा था, जब और जहां विपत्ति पड़े मुझे याद करोगे, तो मैं सहायता के लिए अवश्य आऊंगा। फिर मैं क्यों ना सांप को याद करूं। ब्राह्मण ने सांप को याद किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि याद करते ही सांप कारागार की कोठरी में उपस्थित हो गया और ब्राम्हण से बोला, ’मित्र ब्राम्हण, तुमने मुझे क्यों याद किया ?’ ब्राम्हण ने बड़े दुख के साथ अपनी कहानी सुना दी। सांप ब्राम्हण की कहानी सुनकर बोला, ’मैंने तुम्हें मना किया था कि सुनार को कुएं से बाहर मत निकालना, पर तुमने मेरी बात नहीं मानी। आखिर दुष्ट सुनार ने तुम्हें संकट में फंसा ही दिया।’ 

ब्राह्मण बोला, ’जो होना था वह तो अब हो चुका है। अब दया करके मुझे जेल से मुक्ति दिलाने का उपाय करो।’ सांप ने सोचते हुए उत्तर दिया, ’कुछ तो करना ही पड़ेगा। मुझे एक उपाय सूझा है। मैं राजभवन जाकर रानी को डस लूंगा। वह मेरे विष से मूर्छित हो जाएगी। होश तभी आएगा, जब तुम उसके सिर पर अपना हाथ रखोगे। रानी के बेहोश होने पर राजा देश-विदेश के चिकित्सकों को बुलाएगा, पर कुछ भी परिणाम नहीं निकलेगा। तुम भी रानी के पास जाना। जब तुम रानी के सिर पर हाथ रखोगे तो विष का प्रभाव नष्ट हो जाएगा। रानी होश में आ जाएगी। राजा प्रसन्न होकर तुम्हें जेल से तो छोड़ ही देगा, और सुनार को दंड भी देगा।’ 

सांप ब्राम्हण को समझाकर राजभवन में जा पहुंचा। उसने रानी को डस लिया। रानी विष के प्रभाव से मूर्छित हो गई। राजभवन में कोहराम छा गया। सारी प्रजा हाय हाय करने लगी। राजा ने अनेक प्रकार की दवाएं खिलायीं, झाड़-फूंक भी कराई, पर कुछ भी लाभ नहीं हुआ। आखिर राजा ने ढिंढोरा पिटवाया। जो भी आदमी रानी को होश में ला देगा, उसे बहुत बड़ा पुरस्कार दिया जाएगा। पुरस्कार के लोभ में देश-विदेश के चिकित्सक राजा की सेवा में उपस्थित हुए पर किसी की भी औषधि से रानी को होश नहीं आया। 

राजा निराश हो गया। उसने सोचा कि अब रानी के प्राण शायद ही बच सकें। राजा का ढिंढोरा ब्राम्हण के कानों में भी पड़ा। ब्राह्मण ने जेल के पहरेदार से कहा, ’भाई, यदि तुम मुझे रानी के पास ले चलो तो मैं उन्हें होश में ला सकता हूं।’ पहरेदार ने ब्राम्हण की बात राजा को बताई। राजा की आज्ञा से ब्राह्मण ने जैसे ही अपना दाहिना हाथ रानी के सिर पर रखा, विष का प्रभाव दूर हो गया और रानी होश में आ गई। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने ब्राम्हण से पूछा, तुम कौन हो ? तुम जेल में क्यों और किस तरह पहुंचाए गए ?’ ब्राम्हण ने प्रारंभ से लेकर अंत तक पूरी कहानी राजा को सुना दी। राजा बड़ा प्रभावित हुआ। उसने ब्राम्हण को कारागार से मुक्त कर दिया और अकृतज्ञ सुनार को बंदी बनाकर जेल में डलवा दिया। राजा ने ब्राह्मण का आदर-सत्कार किया और उसे पुरस्कार में ढेर सारा धन दिया। ब्राह्मण अपने बाल बच्चों को भी वही बुलाकर बड़े सुख के साथ रहने लगा। 

कहानी से शिक्षा:
अच्छे कामों का फल सदा अच्छा ही होता है।
मित्र के साथ सदैव मित्रता का व्यवहार करना चाहिए।
उपकारी के प्रति अकृतज्ञता करने पर दंड अवश्य भोगना पड़ता है।

Wednesday, 8 August 2018

चालाक बिल्ला पंचतंत्र की कहानी। The Clever Cat Story in Hindi

चालाक बिल्ला पंचतंत्र की कहानी। The Clever Cat Story in Hindi

चालाक बिल्ला पंचतंत्र की कहानी। The Clever Cat Story in Hindi

The Clever Cat Story in Hindi
बहुत दिनों पहले की बात है, एक वृक्ष की जड़ के पास एक बिल में तीतर रहता था। वृक्ष पर घोसले बनाकर और भी पक्षी रहते थे। तीतर और अन्य पक्षियों में परस्पर बड़ा प्रेम था। सब मिल-जुल कर रहते थे। संकट की घड़ी में एक दूसरे की सहायता करते थे। सवेरा होते ही सभी पक्षी भोजन की खोज में उड़ जाया करते थे और शाम होने पर फिर लौट आते थे। सवेरे और संध्या के समय वृक्ष पर बढ़ी चहल-पहल रहती थी, परंतु दिन में सन्नाटा छाया रहता था। 

तीतर भी प्रतिदिन सवेरे भोजन की खोज में उड़ जाता था और शाम को फिर लौट आता था। वह बिल्कुल अकेला था। जब तक वह लौटकर नहीं आता था, उसका घर खाली पड़ा रहता था। एक दिन प्रातः काल जब तीतर भोजन की खोज में निकला तो एक स्थान पर उसे धान के कटे हुए खेत दिखाई पड़े। खेतों में बहुत से चावल के दाने इधर-उधर बिखरे हुए पड़े थे। तीतर चावल के दानों को देखकर नीचे उतर गया और बड़े प्रेम से बीन-बीनकर चावल के दाने खाने लगा। 

उसे समय की भी याद नहीं रही। चावल के दाने खत्म ही नहीं हो रहे थे, क्योंकि सभी खेतों में बिखरे हुए थे,। तीतर पूरे दिन चावल के दानों को खाता रहा। शाम होने पर वह घर लौटकर नहीं गया। रात में खेत में ही रह गया। इस तरह तीतर चार-पांच दिनों तक चावल बीन-बीनकर खाता रहा और रात भी वही काटता रहा। 

पांच  से छह दिनों के बाद तीतर को अपने घर की याद आई। जब वह उड़कर अपने घर गया तो देखता है कि उसके घर में एक खरगोश जमा हुआ बैठा है। तीतर की अनुपस्थिति में घूमता-घूमता हुआ खरगोश वहां पहुंचा था। घर को खाली देखकर वह उसमें रहने लगा। उसने अपने घर में खरगोश को देखकर तीतर को बड़ा आश्चर्य हुआ वह बोला, ‘अजी मेरे घर में तुम कौन हो? निकलो बाहर।‘ 

खरगोश ने उत्तर दिया, ‘वाह, मैं क्यों बाहर निकलूं? यह घर तो मेरा है।‘ तीतर बोला, ‘घर तुम्हारा है? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? मैं अपने घर को नहीं पहचानता? मैं कई वर्षों से इस घर में रहता आ रहा हूं। घर तुम्हारा नहीं, मेरा है। निकलो शीघ्र बाहर।‘  खरगोश ने उत्तर दिया, ‘दिमाग मेरा नहीं, तुम्हारा खराब हो गया है। तुम मेरे घर को अपना बता रहे हो। भाग जाओ यहां से।‘ 

तीतर को क्रोध आ गया। वह क्रोध के साथ बोला, ‘मूर्ख, इस घर को मैंने अपने हाथों से तैयार किया है। छह-सात दिन हुए, मैं बाहर चला गया था। तुमने घर को खाली देखकर, उस पर अपना कब्जा कर लिया। एक  तो अपराध किया है और दूसरे अब सीनाजोरी कर रहे हो?‘ खरगोश भी तैश में आकर बोला।, ‘बनाया होगा तुमने घर को। तुम्हारे पास इसका क्या प्रमाण है कि घर तुम्हारा है? जो जिस घर में रहता है, घर उसी का होता है। घर में मैं हूं, तुम नहीं हो। अतः घर मेरा है, तुम्हारा नहीं। 

घर को लेकर तीतर और खरगोश में वाद-विवाद होने लगा। दोनों परस्पर बहस करते हुए चीखने-चिल्लाने लगे। शोरगुल सुनकर आस-पड़ोस के सभी पक्षी एकत्र हो गए। दोनों जोर-जोर से पक्षियों से अपनी-अपनी बात कहने लगे। तीतर कहने लगा, ‘मैं 5 से 6 दिनों के लिए घर से बाहर चला गया था। घर खाली था। ना जाने कहां से यह खरगोश आकर मेरे घर में घुस गया। और अब कहता है, यह घर मेरा है।‘ 

तीतर के उत्तर में खरगोश कहने लगा, ‘घर तीतर का नहीं, मेरा है। यह असत्य बोल रहा है। यदि घर इसका होता, तो यह घर में होता। घर में तो मैं हूं, अतः घर मेरा है।‘ वृक्ष पर रहने वाले पक्षियों को मालूम था कि घर खरगोश का नहीं, तीतर का ही है। पर कोई प्रमाण नहीं था। बिना प्रमाण के पक्षी कुछ निर्णय नहीं कर सकते। फलतः तीतर और खरगोश का वाद-विवाद बढ़ता ही चला गया। 

जब कोई निर्णय नहीं हो सका, तो तीतर और खरगोश ने निश्चय किया, झगड़े को निपटाने के लिए किसी को पंच बनाना चाहिए। परंतु पंच किसे बनाया जाए? दोनों पंच की खोज में चल पड़े। एक झोपड़ी के बाहर जंगली बिल्ला बैठा हुआ था। बिल्ली को देख कर दोनों आपस में बात करने लगे? बिल्ला बड़ा बुद्धिमान होता है। झगड़े को निपटाने के लिए हमें इसी को पंच बनाना चाहिए। पर बिल्ले को देख कर दोनों के मन में भय भी उत्पन्न हो गया था, क्योंकि बिल्ला उनका पुश्तैनी शत्रु था। 

बिल्ला बड़ा चतुर और धूर्त था। दोनों की बातें उसके कानों में पड़ गई। उसको यह समझ गया कि दोनों का आपस में कोई झगड़ा है और वह झगड़े को निपटाने के लिए मुझे पंच बनाना चाहते हैं, पर डर के कारण मेरे पास नहीं आ रहे हैं। अतः मुझे साधु का वेश धारण करके बैठना चाहिए जिससे दोनों के मन का भय दूर हो जाए। बिल्ला शीघ्र ही चंदन आदि लगाकर पैरों के बल खड़ा हो गया और हाथ में माला लेकर जपने लगा। 

तीतर और खरगोश बिल्ली को साधु के वेश में देखकर आश्चर्यचकित हो गए। दोनों एक दूसरे से कहने लगे, ‘हम तो बेकार में ही बिल्ले से भयभीत हो रहे थे। यह तो बहुत बड़ा महात्मा जान पड़ता है। हमें इसी को पंच मानकर अपने झगड़े का निपटारा कर आना चाहिए।‘ खरगोश और तीतर दोनों बिल्ले के पास जा पहुंचे, और कुछ दूर पर ही बैठ गए, क्योंकि बिल्ले के निकट जाने का साहस उनको नहीं हो रहा था। 

खरगोश और तीतर ने कुछ दूर से ही अपनी-अपनी बात बिल्ले को सुनाई। तीतर ने कहा, ‘महाराज, मैं 5 दिनों के लिए अपने घर से बाहर चला गया था। जब लौटकर आया तो देखता हूं, घर में खरगोश ने अपना अड्डा जमा रखा है। मैंने जब उससे कहा, घर से बाहर निकल जाओ, तो कहने लगा, घर मेरा है। आप बड़े बुद्धिमान हैं। आप हमको यह बताएं कि यह घर वास्तव में किसका हुआ? जिसकी गलती हो, आप उसे दंड भी दे सकते हैं।‘ 

खरगोश ने तीतर के विरुद्ध अपनी बात कही। उसने कहा, ‘मैं भी आपको अपना पंच मानता हूं। कृपा करके आप हम दोनों के झगड़े का निपटारा कर दें। तीतर असत्य बोल रहा है। घर इसका नहीं मेरा है। यह पहले घर में रहता था इस बात का इसके पास कोई प्रमाण नहीं है, पर मैं तो अब भी घर में रह रहा हूं।‘ बिल्ला दोनों की बातें सुनकर माला जपता हुआ बोला, ‘भाई, मैं वृद्ध हो गया हूं। बूढा होने के कारण नेत्रों की ज्योति घट गई है। कानों से भी कम सुनाई पड़ता है। तुम दोनों जो कुछ कहना चाहते हो, मेरे अधिक निकट आकर कहो, जिससे मैं तुम दोनों की बातें सुन सकूं।‘ 

तीतर और खरगोश को जब यह ज्ञात हुआ कि बिल्ला तो ना ही आंखों से देख सकता है और ना ही कानों से सुन सकता है, तो दोनों के मन का डर बिलकुल दूर हो गया। दोनों निर्भय और निश्चिंत होकर बिल्ले के अधिक निकट चले गए, पर जैसे ही दोनों बिल्ले के अधिक निकट पहुंचे, उस ने झपट्टा मारकर दोनों का काम तमाम कर दिया, दोनों बिल्ले के पेट में चले गए और सदा सदा के लिए उनके झगड़े का निपटारा हो गया। 

कहानी से शिक्षा : 
झगड़े के निपटारे के लिए शत्रु के पास नहीं जाना चाहिए। 
पुश्तैनी शत्रु का विश्वास करने से धोखा खाना पड़ता है। 
धूर्त लोग बड़ी सरलता से सरल हृदय लोगों को कपट जाल में फंसा लिया करते हैं।