Wednesday, 21 November 2018

बालिकाओं की घटती संख्या एक जटिल समस्या पर निबंध

बालिकाओं की घटती संख्या एक जटिल समस्या पर निबंध

बालिकाओं की घटती संख्या एक जटिल समस्या पर निबंध

balikaon ki ghatti sankhya par nibandh
हमारे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है यत्र नार्यस्‍ते पुजंते रमंते तत्र देवता यानी जहां नारी की पूजा होती है वहां ईश्‍वर का वास होता है। उपनिषदों में कहा गया है- एकम सत विपरह बहुदा वदंथी’- इस दुनिया में केवल एक सच्‍चाई है जिसे अनेक तरह से बताया गया है। पुरूष और महिला उस परम शक्‍ति की दो महत्‍वपूर्ण रचनाएं हैं जो बल, ताकत और स्‍वभाव के लिहाज से एक से/बराबर हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों और समाज में महिलाओं को इतना उच्‍च दर्जा प्राप्‍त था, लेकिन सदियों से महिलाओं को समाज में उनके अधिकारों से वंचित रखा गया और उन्‍हें शरीरिक और मानसिक रूप से कई यातनाएं दी गई।

आधुनिक भारत में असमानता के दुष्‍चक्र ने महिलाओं की सामाजिक स्‍थिति को कमजोर किया और एकांगी विकास पर बल दिया। 21वीं शताब्‍दी में कुछ महिलाओं ने हौसला दिखाते हुए अपनी अलग बनाई है। लेकिन फिर भी बड़ी संख्‍या में महिलाओं को गरिमा से जीने के उनके अधिकार से वंचित रखा गया है। इसके अतिरिक्‍त, शिशु अगर लड़की हो तो उसे जीने लायक ही नहीं समझा जाता। समावेशी विकास के लिए यह जरूरी है कि हर स्‍थिति में महिलाओं को जीने का समान अवसर मिले और वो भी उनकी पसंद का।

2011की जनगणना चौंका देने वाली है। इसके अनुसार, नवजात से 6 साल की उम्र में प्रत्‍येक एक हजार लड़को पर 918 लड़कियां है जो कि लड़के-लड़कियों का अब तक का सबसे कम अनुपात (सीएसआर) है। देश के हर हिस्‍से-गांवों, जनजातीय क्षेत्रों और यहां तक कि शहरों में शहरों में लड़कियों की संख्‍या घट रही है। ये ऐसी खतरनाक स्‍थिति है जिसका देश की जनसांख्‍यिकी संनचना पर असर पड़ेगा। भेदभाव की खतरनाक प्रवृत्‍ति को रोकने के लिए तुरंत कार्रवाई और महिलाओं के सामाजिक समावेश और उनके समग्र विकास की जरूरत है।

लड़के-लड़कियों के बीच के घटते अनुपात को कम करने और महिलाओं की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं (बीबीबीपी) अभियान शुरू किया गया है। प्रधानमंत्री ने इसकी शुरूआत इस साल 22 जनवरी को हरियाणा में पानीपत से की। यह अभियान महिला और बाल विकास मंत्रालय, स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण मंत्रलय तथा मानव संसाधन मंत्रालय का संयुक्‍त प्रयास है। इसका उद्देश्‍य बालिकाओं को जन्‍म लेने और जीने के उनके अधिकार की रक्षा करना और उसे शिक्षा और जीवन कौशल से सशक्‍त करना है। यह अभियान शुरू करने के लिए जिस जगह का चयन किया गया, वो भी बहुत महत्‍वपूर्ण थी क्‍योंकि हरियाणा में लड़को के मुकाबले बहुत कम लड़कियां है। हरियाणा में प्रत्‍येक 1000 पुरूषों के अनुपात में केवल 877 महिलाएं है और अगर 0-6 साल की उम्र का आंकड़ा देखें तो बेहद कम 830 बच्चियां हैं।

प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम की शुरूआत के दौरान लोगों से भावनात्‍मक अपील की कि इस स्‍थिति को तेजी से बदलने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि इस भयावह संकट को समाप्‍त करना सभी की जिम्‍मेदारी है क्‍योंकि इसका बहुत बड़ा असर भावी पीढ़ी पर पड़ेगा। उन्‍होंने लोगों से लड़कियों के जन्‍म को अनंदोत्‍सव के रूप में मनाने की अपील की। उन्‍होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए सुकन्‍या समृद्धि खाता की भी शुरूआत की। 2015-16 के आम बपट में इसके लिए सालाना 9.1 प्रतिशत की ब्‍याज दर और कर में छूट का प्रस्‍ताव है।

बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं के अंतर्गत शुरूआत में सभी राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 100 जिलों को चुना गया है जहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों का अनुपात बहुत कम है। इस अभियान के तहत समाज के हर वर्ग को इसमें शामिल करने, सामादायिक भागीदारी और जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। यह कार्यक्रम एक अभियान है जिसमें कई लक्ष्‍य निर्धारित किए गए हैं। एक तो चुने गए महत्‍वपूर्ण जिलों में जन्‍म के समय लड़के और लड़कियों के बीच अनुपात (एसआरबी) को सुधारकर एक साल में 10 अंक तक लाना है। दुसरा, पांच साल से कम उम्र के शिशुओं के मृत्‍यु दर को 2011 में 8 अंक से कम करके 2017 तक 4 अंक लाना है। साथ ही, लड़कियों के माध्‍यमिक शिक्षा में दाखिलेको 2013-14 में 76 प्रतिशत से बढ़ाकर 2017 तक 79 प्रतिशत करना और 2017 तक चुने गए 100 जिलों के हर स्‍कूल में लड़कियों के लिए शौचालय बनाना है।

बीबीबीपी अभियान के तहत इस पर विशेष ध्‍यान दिया जाएगा कि कन्‍या भ्रूण हत्‍या को रोकने वाले गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पीसी और पीएनडीटी) कानून का सख्‍ती से अमल हो। लड़कियों के पोषण पर ध्‍यान देते हुए पांच साल से कम उम्र की लड़कियों में कम वजन और खून की कमी की समस्‍या को घटाना है। यौन अपराधों से बच्‍चों का संरक्षण संबंधी अधिनियम, 2012 (पॉक्‍सो) को लागू करके लड़कियों को सुरक्षित माहौल देना भी इस अभियान का मकसद है।

स्‍थानीय नेताओं को शामिल करके सामुदायिक भागीदारी के जरिए ही कोई जन-जागरूकता अभियान सफल हो सकता है खासकर जिसका मुख्‍य लक्ष्‍य सोच और व्‍यवहार में बदलाव लाना हो। बीबीबीपी अभियान में सभी स्‍थानीय नेताओं और जमीनी स्‍तरपर काम करने वाले लोगों को एकसाथ लाने की जोरदार वकालत की गई है।

इस अभियान में मुख्‍य रूप से लड़कियों के जन्‍म के लिए बेहतर माहौल देने पर जोर है। प्रधानमंत्री ने पानीपत में अपने भाषण में वाराणसी के जयापूरा गांव का उदाहरण दिया लड़की के जन्‍म लेने पर उत्‍सव मनाया जाता है और इस अवसर पर पांच पेड़ लगाए जाते हैं। उन्‍होंने हर गांव से लड़की के जन्‍म पर ऐसा उत्‍सव मनाने को कहा।
मां और शिशु को बेहतर माहौल देना, गर्भवती महिलाओं के प्रसव और लड़कियों के महत्‍व को समझाने के प्रति जागरूकता लाना इस दिशा में एक कदम है। इसमें गर्भावस्‍था के दौरान आंगनवाड़ी केंद्रों/स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों में पंजीकरण कराने को भी बढ़ावा दिया गया है।

इस कार्यक्रम के तहत स्‍कूलों में लड़कियों का दाखिला सुनिश्चित करने के लिए स्‍कूल प्रबंधन समितियों को सक्रिय बनाने के बारे में भी कहा गया है। स्‍कूल छोड़ चुकी लड़कियों को फिर से स्‍कूल जाने के लिए प्रोत्‍साहन करने हेतु बालिका मंच बनाने पर भी ध्‍यान है। इसमें प्राथमिक स्‍तर पर 100 फीसदी लड़कियों का दाखिला करने और एक साल तक इसे बरकरार रखने तथा ऐसे स्‍कूलों में जहां पांचवी से छठी, आंठवी से नौंवी और दसवीं से ग्‍यारहवीं कक्षा तक शत-प्रतिशत लड़कियों जाती है, उन स्‍कूल प्रबंधन समितियों के लिए प्रोत्‍साहन और पुरस्‍कारों का प्रावधान है।

इसके अतिरिक्‍त, इस अभियान में नारी चौपाल लगाने, बेटी जन्‍मोत्‍सव मनाने तथा बेटी पढ़ओं को हर महीने उत्‍सव के रूप में मनाने के साथ-साथ राष्‍ट्रीय बालिका दिवस और अंतरर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस मनाने का भी प्रस्‍ताव है। इस अभियान में लड़कियों के पैदा होने पर लोहड़ी मनाने, रक्षा बंधन जैसे त्‍योहारों के जरिए सामाजिक-सांस्‍कृतिक पूर्वाग्रहों को दूर करने की कोशिश है।


लड़कियों की कम होती संख्‍या चिंता का विषय है जिसका असर समाज और आगे अपने वाली पीढ़ी पर पड़ेगा। लड़कियों को शिक्षित करने का मतलब है जनसंख्‍या के एक बड़े वर्ग को सशक्‍त करना। बीबीबीपी एक राष्‍ट्रवादी अभियान है जिसके जरिए समावेशी और टिकाऊ विकास के लिए मार्ग प्रशस्‍त करना है।

Tuesday, 20 November 2018

सरोगेसी (किराए की कोख) और भारतीय समाज पर निबंध - Essay on Surrogacy in Hindi

सरोगेसी (किराए की कोख) और भारतीय समाज पर निबंध - Essay on Surrogacy in Hindi

सरोगेसी (किराए की कोख) और भारतीय समाज पर निबंध - Essay on Surrogacy in Hindi

Essay on Surrogacy in Hindi
प्रजनन विज्ञान की प्रगति ने उन दंपत्‍तियों तथा अन्‍यों के लिए प्रकृतिक रूप से सं‍तानसुख को संभव बना दिया है, जिनकी अपनी संतान किन्‍हीं कारणों से नहीं हो सकती। इसने सरोगेट माँ की अवधारणा को जन्‍म दिया है। सरोगेसी सहायक प्रजनन की एक प्रणाली है। आईवीएफ/गर्भवधि सरोगेसी इसका अधिक सामान्‍य रूप है जिसमें सरोगेट संतान पूर्ण रूप से सामाजिक अभिभावकों से संबंधित होती है।

सरोगेसी के लिए भारत एक अनुकूल गंतव्‍य के रूप में उभरा है और सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) उद्योग 25 अरब रुपएके सालाना कारोबार के रूप में विकसित हुआ है, जिसे विधि आयोग ने स्‍वर्ण कलश की संज्ञा दी है। भारत में सरोगेसी के अभूतपूर्व रूप में बढ़ने का मुख्‍य कारण इसका सस्‍ता और सामाजिक रूप से मान्‍य होना है। इसके अलावा गोद लेने की जटिल प्रक्रिया के कारण भी सरोगेसी एक पंसदीदा विकल्‍प के रूप में उभरी है।

अनवासी भारतीयों सहित विदेशी नागरिकों द्वारा विभिन्‍न चिकित्‍सीय और व्‍यक्‍तिगत कारणों से सरोगेसी को अपनाए जाने ने भी भारतीय सरोगेसी उद्योग के उदय में योगदान दिया है। मुख्‍यत: इस कारण से क्‍योंकि उनके संबंधित देशों के मुकाबले यहां पर यह प्रक्रिया कम-से-कम दस गुना सस्‍ती है। भारत में संतान के लिए आने वाली विदेशी दंपत्‍तियों का कोई आंकड़ा मौजूदा नहीं है लेकिन एआरटी क्‍लिनिकों का कहना है कि यह संख्‍या उत्‍साहजनक रूप से बढ़ रही है।

भारत में 23 जून 1994 में प्रथम सरोगेस शिशु के साथ सरोगेसी की शुरूआत हुई, लेकिन विश्‍व का ध्‍यान इस ओर आकर्षित करने में और आठ वर्ष लग गए। जब 2004 में एक महिला ने अपनी ब्रिटेन में रहने वाली बेटी के लिए सरोगेट शिशु को जन्‍म दिया। एक चिकित्‍सीय प्रक्रिया के रूप में सरोगेसी पद्धति  में वर्षों के अंतराल में परिपक्‍वता आई है। धीरे-धीरे भारत प्रजनन बाजार का एक मुख्‍य केन्‍द्र बन गया है और आज देश भर में कृत्रिम गर्भाधान, आईवीएफ और सरोगेसी मुहैया कराने वाले अनुमानत: 200,000 क्‍लिनिक हैं। वे इसे सहायक प्रजनन तकनीक (एआरटी) कहते हैं।

भारत में सरोगेसी को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल कोई कानून नहीं है और किराए पर कोख देने (व्‍यावसायिक सरोगेसी) को तर्कसंगत माना जाता है। किसी की अनुप‍स्‍थिति में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएमआर) ने भारत में क्‍लिनिकों के प्रमाणन, निरीक्षण और नियंत्रण के लिए 2005 में दिशानिर्देशों को जारी किया। लेकिन आईसीएमआर के दिशानिर्देशों के उल्‍लंघन और कथित तौर बड़े पैमानेपर सरोगेट माताओं के शोषण और जबरन वसूली के मामलों के कारण इसकेलिए कानून की जरूरत महसूस की जा रही है।

सरोगेसी को कानूनी बनाने के लिए भारत सरकार के कहने पर एक विशेषज्ञ समिति ने सहायक प्रजनन तकनीक (निंयत्रण) कानून, 2010 का मसौदा तैयार किया। इससे पहले 2008 में परिकल्पित प्रस्‍तावित कानून में व्‍यापरिक सरोगेसी को भी कानून मान्‍यता देने पर विचार किया गया था। यह एक जोड़े को उन दो व्‍यक्‍तियों के रूप में परिभाषित करता है,  जो एक साथ रहते हैं और जिनके बीच यौन संबंध हैं। समलैंगिगता पर दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय के फैसले के बाद यह अकेले के अलावा समलैंगिकों को सरोगेट शिशुओं का कनूनी हक देता है। यह सरोगेट माताओं की आयु सीमा 21-35 वर्ष के बीच निर्धारित करता है और उसके अपने बच्‍चों सहित उसके लिए कुल पांच प्रसवों को सीमित करता है। प्रस्‍तवित विधान के अनुसार सरोगेट माताओं को कानूनी रूप से लागू किए जाने के योग्‍य सरोगेसी के समझौते पर अमल  करना होगा।

अनिवासी भारतीयों सहित विदेशी नागरिकों जो सरोगेसी की चाह में भारत आएंगे, उन्‍हें प्रस्‍तवित कानून के अंतर्गत इस आशय का प्रमाणपत्र देना होगा कि उनके देश में सरोगेसी को कानून मान्‍यता प्राप्‍त है और यह भी कि जन्‍म के बाद शिशु को उनके देश की नागरिकता दी जाएगी। सहायक प्रजनन तकनीक क्लिनिकों को और सरोगेसी से जुड़े विभिन्‍न पक्षों के अधिकरों और दायित्‍वों के नियमन के लिए कानून की जरूरत पर अपनी 228वीं रिपोर्ट में भारत के विधि आयोग ने भारत में सरोगेसी का मोटे तौर पर समर्थन किया है, लेकिन यह व्‍यापारिक सरोगेसी के पक्ष में नहीं है। आयोग ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में किराए पर कोख उपलब्‍ध है, जिससे विदेशियों को शिशु और इसके बदले में भारतीय सरोगेट माताओं की प्राप्‍ति होती है।

लेकिन मुंबई के एक बांझपन विशेषज्ञ के अनुसार आयोग द्वारा केवल परोपकार के तौर पर सरोगेसी का समर्थन करना ही कोई एकमात्र समाधान नहीं है। विशषज्ञ का कहना है कि, परोपकार के रूप में सरोगेट को तलाशना काफी मुश्किल हो जाएगा और इससे रिश्‍तेदारों पर सेरोगेट बनने का दबाव बढ़ेगा। गरीबी, अशिक्षा और भारत में महिलाओं के जीवन में शक्‍ति की कमी के परिदृश्‍य में यह एक वास्‍तविकता हो सकती है।

लेकिन अनेक कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बिल का मसौदा सही दिशा में है और यह मौजूदा अव्‍यवस्‍था को समाप्‍त करने और आईवीएफ केन्‍द्रों के कामकाज को नियमित करने में मददगार तथा एआरटी क्लिनिकों की गुणवत्‍ता और उत्‍तरदायित्‍व को सुनिश्चित करने में मददगार होगा। यह सरोगेट माताओं और शिशुओं दोनों के हितों को सुरक्षा और संतान की चाह रखने वाले अभिभावकों के लिए उनकी अपनी संगत के सपने को बगैर किसी मुश्किल के साकार करने में मददगार होगा।


चिंता के कुछ कारण भी हैं जैसे कि व्‍यावसायिकरण के संदर्भ में समाज पर इसका क्‍या प्रभाव होगा। गरीब अशिक्षित महिलाओं को पैसों का लालच देकर सरोगेसी के लिए बार-बार मजबूर किया जा सकता है, जिससे उनकी जिंदगी को खतरा हो जाएगा। सरोगेट माँ के अधिकारों के प्रश्‍न के अलावा इसमें नैतिक और मानवीय गरिमा का मुद्दा भी शामिल है। सरोगेसी के इस मसौदा विधेयक  को कानून बनाने से पूर्व सामाजिक, कानूनी और राजनैतिक सीभ क्षेत्रों में इस पर व्‍यापक बहस की जरूरत है।
संचार क्रांति और महिलाओं का बदलता सामाजिक स्‍वरूप पर निबंध

संचार क्रांति और महिलाओं का बदलता सामाजिक स्‍वरूप पर निबंध

संचार क्रांति और महिलाओं का बदलता सामाजिक स्‍वरूप पर निबंध

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देश को आजाद हुये 70 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन महिलायें आज भी अपने अधिकारों से वंचित है, जबकि देश की आधे से अधिक महिलायें गाँवों में निवास करती हैं। शहरी और ग्रामीण दोनो प्रकार की महिलाओं को आज भी पर्दे में रहना पड़ता है, अशिक्षा के कारण उनका विकास अवरुद्ध हुआ है, अभी हाल ही में महिलाओं पर हो रहे अत्‍याचार जैसे बलात्‍कार, यौन शोषण जैसी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। सत्‍य यह नहीं कि अचानक ऐसी घटनायें समाज में तेजी से बढ़ गयी, बल्कि सत्‍य तो यह है कि संचार क्रांति ने महिलाओं के शोषण के इस दबे स्‍तर को समाज के सामने ला दिया। निर्भया के साथ बलात्‍कार की घटना उजागर करने में मीडिया की अहम् भूमिका रही। जिसने हर आयु वर्ग के लोग, जिनका इस घटना से कोई निजी लेना-देना नहीं था, वो भी अधिकारों एवं इंसाफ के लिये सड़को पर उतर आये।

जनसंचार माध्‍यमों ने महिलाओं को केवल उनके अधिकारों के प्रति जागररूक नहीं किया है, अपितु उन्‍हें स्‍वालम्‍बी बनाने, उनकी आर्थिक-राजनैतिक स्थिति सुधारने में भी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में अब तक के अंगो से सबसे सषक्‍त अंग रेडियो और दूरदर्शन हैं। इसमें दो राय नहीं कि इसकी पहुँच रखने वाल इस माध्‍यम से कृषि को नया बल मिला। रेडियो, टी.वी., डी.टी.एच., इन्‍टरनेट, मोबाइल फोन आदि ने महिला उद्यमियों एवं कृषि क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के जीवन स्‍तर में सुधार कर उन्‍हें आर्थिक रूप से सशक्‍त किया है। महिलाओें के लिए कौन-कौनसी योजनायें चल रही हैं, कौन सी ब्‍याज रहित ऋण उपलब्‍ध हो रही है आदि की जानकारियाँ संचार माध्‍यमों से उन तक पहुँच रही हैं।

स्त्रियों पर परम्‍परागत व्‍यवस्‍था का प्रभाव बना है, परम्‍परायें उनके विचारों को प्रभावित करती हैं। मजदूर महिलायें, निम्‍न सामाजिक व आर्थिक वर्गों की महिलायें आज भी पुरूषों पर निर्भर है, जिससे उनकी स्थिति व भूमिकाओं में परिवर्तन नहीं आ रही है। लेकिन टी.वी., रेडियों पर आधारित कार्यक्रम जैसे कल्‍याणी इत्‍यादि प्रसारित किये जाते हैं, जिसमें विषय विशेषज्ञों द्वारा समस्‍याओं का समाधान किया जाता है, कृषि दर्शन द्वारा सम्‍बन्धित समस्‍याओं का निदान होता है, जिससे आय बढ़ती है व अर्थिक स्थिति में सुधार होता है। महिलाओं को घर से बाहर कार्य करने की अनुमति नगर निकट गाँवों में अधिक है, जबकि दूर दराज के गाँवों में कम है। गाँवों में उन महिलाओं की सामाजिक स्‍थिति ऊँची मानी जाती है जो कार्यरत हैं, ऐसी महिलायें जो घर के कार्यों तक सीमित है उनकी सामाजिक स्थिति अच्‍छी नहीं है, संचार क्रांति के कारण महिलाओं के जीवन स्‍तर में गुणात्‍मक परिवर्तन आया है। प्रारम्‍भ में टेलीविजन तथा फिल्‍मों के द्वारा महिलाओं के आदर्श बहू, आदर्श बेटी, आदर्श माँ के रूप में दिखाया जाता था। लेकिन आज तस्‍वीर बदल गयी हैं। महिलाओं के विभिन्‍न सख्‍त व सशक्‍त रूपों को भी समाज के सामने प्रस्‍तुत किया जा रहा है। जिससे महिलाओं उनका अनुकरण कर अपने अधिकारों को प्राप्‍त करने में सक्षम बन रही हैं।

आज केन्‍द्र सरकार व राज्‍य सरकारें ग्रामीण महिलाओं, बालिकाओं के सुरक्षा व विकास के लिये अनेकों योजनायें चला रही हैं, जिनका मीडिया द्वारा समाचार पत्रों, टी.वी. इत्‍यादि के द्वारा तेजी से प्रचार प्रसार किया जाता है और ग्रामीण महिलाओं आसानी से उनका लाभ प्राप्‍त कर लेती है। अनेकों जन सेवा केन्‍द्र व हेल्‍पलाइन नम्‍बर है जो आपको नि:शुल्‍क सूचनायें प्रदान करते हैं। महिलाओं की समस्‍याओंके निराकरण हेतु वर्तमान उत्‍तर प्रदेश सरकार द्वारा एक कम्‍पलेन नम्‍बर 1090 प्रारम्‍भ किया है जिस पर 24 घण्‍टे सुविधा उपलब्‍ध है। महिलायें बिना अपना नाम बताये अपने खिलाफ हो रहे शोषण की शिकायत दर्ज करा सकती हैं।

आज के इस आर्थिक युग में महिलायें स्‍वावलम्‍बी हुई हैं, उनमें आत्‍म विश्‍वास और मनोबल भी बढ़ा है। अपने अधिकारों के प्रति सचेत हुई हैं। कर्नाटक के कोलार जिले से नम्‍मा ध्‍वनि (हमारी आवाज) कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है, इसके श्रोता अधिकांश गरीब और निरक्षर महिलायें हैं, इसके अलावा उत्‍तराखण्‍ड में मंदाकिनी की आवाज, बंगलुरू में केलु सखी (सुनो साखी) इत्‍यादि कार्यक्रम में महिलाओं के लिये सुचनायें प्रसारित की जाती हैं। इसी प्रकार 26 जनवरी 1967 को दूरदर्शन पर कृषि दर्शन  नामक कार्यक्रम शुरू हुआ तथा विभिन्‍न विज्ञापनों द्वारा गर्भवती महिलाओं को पोषण, टीके, जाँच, रोग, बच्‍चे के पालन पोषण, बच्‍चों में अन्‍तराल व जनसंख्‍या नियंत्रण जैसी बातों से जागरूक कराया जाता है।

कोई भी राष्‍ट्र तभी विकास कर सकता है, जब उसकी आधी आबादी जो कि महिलाओं की है वह आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि समस्‍त क्षेत्रों में मजबूत एवं सशक्‍त हो, उनका स्‍वास्‍थ्‍य उत्‍तम हो एवं स्‍वयं के निर्णय लेने में पूर्णत: स्‍वतन्‍त्र एवं सक्षम हो। वर्तमान समय को पुरूष प्रधान समाज कहा जाता है, लेकिन जब हम इतिहास के पन्‍ने पलटते हैं तो भारत की प्रथम प्राचीन सिंधु सभ्‍यता को मातृ सत्‍तात्‍मक के रूप में देखते हैं, उसके उपरान्‍त वैदिक काल की महिलाओं को भी समाज में उच्‍च स्‍थान प्राप्‍त था। अपाला, घोपा, गार्गी, लोपामुन्‍द्रा जैसी महिलायें पठन-पाठन  करती थी तथा यज्ञों में बैठने का अधिकार प्राप्‍त था। रामायण-महाभारत में स्‍वयंवर के आयोजनों का प्रमाण मिलता है। जिसमें स्त्रियों को स्‍वयं वन चुनने का अधिकार दिया जाता था। महिलायें शिक्षित हुआ करती थीं तथा युद्धों में भाग लेती थी व शासन चलाती थीं। भारत में मुस्लिमों के आक्रमण के साथ ही महिलाओं की सामाजिक स्थिति कमजोर होने लगी। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मुट्ठी भर महिलाओं के सशक्‍त होने से महिलाओं की स्‍थ‍िति को उत्‍तम नहीं कहा जा सकता, क्‍योंकि लगभग आधी आबादी महिलाओं की होती है और उन्‍हें अधिकार के नाम पर अपमान, खरीद फरोख्‍त, वेष्‍यावृत्‍ति, बाल-विवाह, दहेज प्रथा आदि बुराइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्‍हें छुटकारा मिलना चाहिये ताकि उनके सम्‍पूर्ण व्‍यक्‍तित्‍व का विकास हो सके।


आज संचार क्रान्‍ति के कारण सुचनायें शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी घर-घर तक पहुँच रही हैं। अत: महिलायें यह समझने लगी हैं कि उनी दुर्गति के लिये अशिक्षा, अंधविश्‍वास, रूढि़वादिता, परम्‍परागत मान्‍यतायें व समाज का पुरूष प्रधान होना है, जिससे उन्‍हें गरीबी, शोषण, पक्षपात, दहेज प्रथा, बलात्‍कार, यौन शोषण इत्‍यादि का शिकार होना पड़ता है, जो संचार साधनों व मीडिया द्वारा तेजी से लोगों तक पहुँच रही है। अत: आवश्‍यकता इस बात की है कि महिलाओं के उस आधुनिक व ग्‍लैमर रूप के साथ-साथ खेत खलिहानों की महिलाओं व गोद में नवजात शिशु को लिये ईंट बनाती औरत की बेबसी को भी समाज के सामने वास्‍तविक रूप में प्रस्‍तुत करें तथा ग्रामीण महिलायें संचार के साधनों का भरपूर उपयोग कर अपने आपको आत्‍म निर्भर करते हुये देश की उन्‍नति में सहायक बनकर गोरवान्वित महसूस कर सकें एवं हमारे देश की महिलाओं के समक्ष ऐसा उदाहरण प्रस्‍तुत कर सकें ताकि अन्‍य सहयोगी महिलायें भी उनका अनुकरण कर स्‍वयं का तथा राष्‍ट्र को भी शक्‍तिशाली बना सकें ।
शिक्षा का उद्देश्य तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर निबंध

शिक्षा का उद्देश्य तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर निबंध

शिक्षा का उद्देश्य तथा वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर निबंध

जन्‍म को मानवीय रूप देने के लिए शिक्षा की जरूरत पड़ती है। शिक्षा जीने की कला सिखाती है। यह कला विचार से पैदा होती है और विचारों के द्वारा जीवन की संगतियों और विसंगतियों की पहचान होती है। विचार से ही संतोष और असंतोष पैदा होता है।

विचार, असंतोष और संदेह जीवन की कलाएं हैं। विश्‍वास को केन्‍द्र पर रख कर भी जिया जा सकता है। लेकिन इनसे जीवन में ठहराव आ सकता है। यह जीवन को तालाब बना देगा जबकि जीवन का लक्ष्‍य नदी बनना है। नदी विचारों की खोज है, जो नहीं है उसे पाने की चेष्‍टा है। शिक्षा का उद्देश्‍य यही होना चाहिए।

शिक्षा चुनाव करने की कला सिखाती है। युग्‍मों पर आधारित जीवन के अवसरों को शिक्षा विवेक संगत बनाती है। जैसे कोई बेईमानी करने के अवसरों से वंचित है तो उसकी ईमानदारी का कोई अर्थ नहीं है। उसी प्रकार जो शिक्षा संगत विवेक नहीं पैदा करती है, वह शिक्षा सारवान तथा मूल्‍यवान नहीं हो सकती है।

हमारी सम्‍पूर्ण शिक्षा व्‍यवस्‍था उत्‍तर पर निर्भर है। प्रश्‍न निर्भर नहीं। यह व्‍यवस्‍था उत्‍तर को मूल्‍य के रूप में स्‍थापित करती है। जबकि शिक्षा की बुनियादी चुनौती प्रश्‍न पैदा करना है। प्रश्‍न करने से चेतना का विकास होता है और व्‍यक्‍तित्‍व का रूपान्‍तरण होता है। जबकि उत्‍तर चेतना में संतोष पैदा करता है। ऐसी शिक्षा व्‍यवस्‍था में डिग्रीधारी मानवी ढांचों का उत्‍पादन होता है, चैतन्‍य मनुष्‍य का नहीं।

आधुनिक शिक्षा प्राणाली की एक कमी यह है कि यह स्‍मृति पर आधारित शिक्षा है। जबकि इसे बोधगम्‍य शिक्षा होना चाहिए। स्‍मृति अतीत से सम्‍बन्धित है जबकि बोध [sense] भाविष्‍य से। स्‍मृति सूचनाओं का संग्रह है जो जीवन के पूर्व निर्धारित निर्णयों और निष्‍कर्षों पर आधारित है। जबकि बोधगम्‍यता शिक्षा इस चेतना से सम्‍बन्धित है जो अनजान और अज्ञात है। यह शिक्षा पद्धति सिर्फ पंडित बना सकती है, ज्ञानी नहीं। ज्ञान अस्तित्‍व के केन्‍द्र से फूटता है। अज्ञान और उसको प्रकट करने के आत्‍म संघर्ष से ज्ञान का उदय होता है।

शिक्षा व्‍यवस्‍था की एक बड़ी समस्‍या है-सूचनाओं का संज्ञान। शिक्षा में सूचनाओं का निषेध नहीं हो सकता। यह चाहिए कि सूचनाओं को विचार में परिव‍र्तित कर दिया जाय। इसको जीवंत बना दिया जाय। इसमें विद्यार्थी के अनुभव, उसके बेहद मामूली सवाल और उसकी कल्‍पानाओं को शामिल किया जाय।

हमारी पूरी शिक्षा व्‍यवस्‍था का मूल है सफलता
“पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब .............” यह विद्यार्थियों में लालच पैदा करती है। यह विद्यार्थीयों को प्रलोभन है। जबकि विद्यार्थी को यह बताना चाहिए कि “यदि पढ़ोगे तो तुम्‍हारे चित्‍त का विस्तार होगा, विकास होगा, वि‍वेक पैदा होगा।” शिक्षा व्‍यवस्‍था को सफलता के रंगीन सपनों से निकालकर सुफल बनाने की जरूरत है।

अधुनिक शिक्षा व्‍यवस्‍था में ‘शिक्षक’ की अवधारणा है। जबकि पहले गुरू की अवधारणा थी। गुरू का शिक्षा, व्‍यवसाय नहीं था। गुरू होने का एक अपना अर्थ और आनंद था।
“गुरू गोविन्‍द दोऊ खड़े ................ ”
आज का शिक्षक व्‍यवसायी बन गया है। आज वह स्‍कूल से लेकर विश्‍व विद्यालय स्‍तर तक परीक्षार्थियों की मॉस प्रोडक्‍शन तथा मध्‍यस्‍थ्‍य की भूमिका में है। वह पहले से स्‍थापित सूचनाओं को विद्यार्थियों में संक्रमित कर देता है। यही कारण है कि सभी पुरानी सामाजिक बीमारियाँ, सारे पाखंड और अंधविश्‍वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती जा रही है। इस व्‍यवस्‍था में विद्यार्थी से पहले शिक्षक ही व्‍यक्‍तिहीन हो गया है। जबकि शिक्षक होना जीने और होने की सार्थकता में हैं। जिस प्रकार धर्म में अधार्मिक भर गये हैं उसी प्रकार शिक्षा व्‍यवस्‍था में गैर-शिक्षक भर गये हैं। जैसे पटना विश्‍व विद्यालय के एक प्रोफेसर, लखनऊ के एक नर्सिंग कॉलेज के मैनेजर और शिक्षक। अत: शिक्षक को कैसा चाहिए इस पर गाँधी जी के विचार – “जो शिक्षक पाठ्य पुस्‍तकों में से सीखता है वह अपने विद्यार्थियों को मौलिक विचार करने की शक्‍ति‍ नहीं देता पुस्‍तकें जितनी कम होंगी उतने ही शिक्षक और विद्यार्थी दोनों लाभान्वित होंगे”।

इस व्‍यवस्‍था में शिक्ष‍क की भूमिका व्‍यवस्‍था के रक्षक के रूप में है, जो शिक्षण कार्य और व्‍यवस्‍था की सबसे बड़ी बिडंबना है। शिक्षक वही ज्ञान समाज में बांटता है जो सत्ता वर्ग के द्वारा बनाया गया पाठ्यक्रम है, जो इनके हितों की रक्षा करता है। इस तरह आज शिक्षक ‘एजेंट’ मात्र रह गया है।
कोई व्‍यक्‍ति सही मायने में शिक्षक तभी हो सकता है जब इसके भीतर विचार, विद्रोह और चिं‍तन की आग हो। यदि ऐसा नहीं है तो वह एक व्‍यवसायी है।

आज शिक्षा का निजीकरण एक ज्‍वलंत मुद्दा है। इसकी शुरूआत औपनिवेशिक भारत में हुयी थी। अंग्रेजों ने अपनी व्‍यवस्‍था को बनाए रखने के लिए तन से भारतीय किन्‍तु मन से ब्रिटिश नागरिक बनाने के लिए कांवेन्‍ट स्‍कूल स्‍थापित किये थे। आज यही भारत में ‘इंगलिश मिडियम पब्लिक स्‍कूल’ कहलाते हैं जहाँ भारी कैपिटेशन फीस देकर प्रवेश पाया जाता है। इन स्‍कूलों की उन लाखों सरकारी स्‍कूलों से कोई तुलना नहीं है जहाँ बच्‍चे टूटे-फूटे बरामदों या कमरों में पढ़ते हैं।
शिक्षा का निजीकरण सत्‍ता और शक्‍ति में साधारण की भागीदारी को असंभव बनाता है। शिक्षा यदि समाज नहीं एक वर्ग बनाता है तो यह अनर्थकारी है, यह शिक्षा के बुनियाद को ध्‍वस्‍त करेगा। यह दो नैतिकताएं पैदा करेगा एक समाज का तो एक प्रभु(सत्ता) वर्ग का।

सरकारी विद्यालय और अंग्रेजी विद्यालय में अंतर
सरकारी स्‍कूलों में कई प्रकार के पृष्‍ठभूमियों से आने वाली बच्‍चों में संबंध बनाने का अवसर मिलाता है। यह अवसर जीवन में विविधता का बोध पैदा करता है। इसके विपरित ऊँची कैपिटेशन फीस तथा तथाकथित योग्‍यता के गुणगान वाले ये स्‍कूल बच्‍चों को गरीबी, बेरोजगारी जैसे समस्‍याओं को सिर्फ किताबों में पढ़ाते है। यथार्थता में वे इन समस्‍यों से आंख मूंदना तथा निजी सुख संतुष्‍ट होना सिखाते हैं। अत: शिक्षा का निजीकरण शिक्षा व्‍यवस्‍था को अमानवीय और आक्रमक बना रही है।

साक्षरता की अवधारणा : साक्षरता एक आधुनिक अवधारणा है जिसका सीधा संबंध प्रचारित ज्ञान से है। यह व्‍यक्‍ति को प्रचारित साहित्‍य के सम्‍पर्क मात्र में लाती है। साक्षरता भारत में सरकारी तंत्र के माध्‍यम से फैलायी जा रही है सर्व शिक्षा अभियान। किन्‍तु इससे शिक्षा का प्रसार नहीं हो रहा हैं। साक्षर व्‍यक्‍ति शब्‍द तो सीख लेता है, किन्‍तु शब्‍द का भाव तथा बोध नहीं प्राप्‍त कर पाता है। यह बच्‍चों को समाज की चेतना से जोड़ने की जगह उन्‍हें अजनबी बना देती है। जीवन के हिस्‍से से बचपन गायब हो गया है। साक्षरता को शिक्षा में बदलने की चुनौती को हमारे देश के विचार को समझना होगा।

यौन शिक्षा का मुद्दा : देश में यौन शिक्षा को लेकर बहस चल पड़ी है। पांरपरिक लोगों को तर्क है कि यौन शिक्षा विद्यार्थियों के नैतिक ढ़ांचे को ध्‍वस्‍त करेगी। भारतीय समाज में नैतिकता केन्‍द्र यौनिक है। चरित्र की उच्‍चता और पतन को यौन संबंधों से परिभाषित करने की प्रथा है। यह नैतिकता के प्रति अत्‍यंत सतही और आरोपित दृष्टि है। लेकिन वास्‍तविक सवाल यह है कि क्‍या यौन नैतिकता की शिक्षा उसी भाषा में दिया जायेगा जिसमें यह अन्‍य विषय पढ़ाते आए हैं? यदि भाषा यही होगी तो इसके सकारात्‍मक प्रभाव संभव नहीं हैं।
यौन शिक्षा का गहरा संबंध धर्म से भी है। यौन शिक्षा धर्म आधारित शिक्षा की परिभाषा में खरोंच पैदा करती है। अत: सर्वप्रथम शिक्षा को धर्म से अलग करना होगा। तभी शिक्षा ज्ञान की सार्थक और प्राकृतिक भूमि पर स्‍थापित होगी। अत: जब तक समाज को शिक्षा को और शिक्षक को धर्म शासित संस्‍कार से मुक्‍त नहीं किया जाता तब तक यौन शिक्षा की धारणा विकृति ही पैदा करेंगी।

शिक्षा के संबंध में कोई चर्चा राजनीति से अलग होकर नहीं की जा सकती। किसी भी देश का राजनीतिक चरित्र ही शिक्षा व्‍यवस्‍था का स्‍वस्‍थ निर्धारण करता है। हमारे देश की शिक्षा व्‍यवस्‍था में तर्क और विवेक की भाषा को जानबूझ कर दबाया गया है। इस शिक्षा से विद्यार्थी समाज और पर्यावरण से जुड़ने की बजाय दूर होता गया है। इस व्‍यवस्‍था का कारण हमारी राजनीतिक संरचना में है।
वस्‍तुत: शिक्षा राजनीतिक व्‍यवस्‍था का एक हिस्‍सा है और इसे होना भी चाहिए लेकिन आधुनिक भारत में शिक्षा को निरंतर गैर-राजनीतिक बनाने की कोशिश हुई है। जैसे शिक्षा का राजनीतिकरण।
अत: भविष्‍य की वैकल्पिक शिक्षा क्‍या हो? कैसे हो? इस मुद्दे पर विचार करने पर यह विचार आता है कि इसे कुछ इस तरह होना चाहिए:

  • मनुष्‍य की छवि
  • जीवन शैली
  • समाज व्‍यवस्‍था को समझने का विवेक
उपसंहार : शिक्षा में परिवर्तन के लिए यह जरूरी है कि माँ-बाप भी अपने बच्‍चों के शैक्षिक जीवन में रुचि लें। बच्‍चों को शिक्षित करना महज स्‍कूल की जिम्‍मेदारी नहीं, परिवार का भी जिम्‍मेदारी है। अत: यह प्रक्रिया स्‍वयं को भी शिक्षित करना है। शिक्षित व्‍यक्‍ति को एक नया रूपक चुनना होगा जिसमें आदमी होना महज जानकार होना नहीं बल्कि स्‍वयं के अस्‍तित्‍व और अपनी सक्रियता को संभव बनाना भी होता है।

Monday, 19 November 2018

किशोरियों की समस्याएं एवं सबला योजना पर हिंदी निबंध

किशोरियों की समस्याएं एवं सबला योजना पर हिंदी निबंध

किशोरियों की समस्याएं एवं सबला योजना पर हिंदी निबंध

kishoriyon ki samasya par nibandh
दुनिया में 10 से 19 वर्ष की आयु 1.2 अरब व्‍यक्‍ति रहते हैं, जिसे आमतौर पर किशोरावस्‍था के रूप में जाना जाता है। किशोरावस्‍था उम्र का ऐसा दौर है जब बच्‍चों के जीवन में प्रमुख शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक बदलाव होते हैं तथा इसके साथ ही उनकी सामाजिक बोध और आकांक्षाओं में भी परिवर्तन होते हैं। किशारावस्‍था ऐसी अवस्‍था भी होती है जब युवा वर्ग माता-पिता एवं परिवार से परे संबंध बनाता है तथा अपने समकक्ष व्‍यक्‍तियों एवं बाहरी जगत से प्राभवित होता है। ये उम्र के ऐसे वर्ष भी होते हैं जब व्‍यक्‍ति अनुभव प्राप्‍त करता है और महत्‍वपूर्ण मसलों पर असूचित निर्णय लेने का जोखिम उठाता है। अधिकांश किशोर विकासशील देशों में रहते हैं तथा भारत किशोरों की सबसे अधिक राष्‍ट्रीय आबादी वाला देश है। अध्‍ययन दर्शाते हैं कि आज लाखों किशोर अच्‍छी शिक्षा, बुनियादी लैंगिक एवं प्रजनन स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल, मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य मसलों और विकलांगता के लिए सहायता, हिंसा, दुर्व्‍यवहार और शोषण से रक्षा तथा सक्रिय भागीदारी के लिए मंचों तक पहुंच का आनदं नहीं ले पाते।

किशोर जगत में लैंगिक अंतर
देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं लेकिन सामाजिक-सांस्‍कृतिक परिदृश्‍य में लड़के-लड़की के बीच विषमता के कारण संतुलित न्‍यायोचित विकास पर बुरा असर पड़ता है। स्‍वास्‍थ्‍य, पोषण, साक्षरता, शिक्षा हासिल करने, कौशल स्‍तर, व्‍यावसायिक दर्जे जैसे महत्‍वपूर्ण सामाजिक विकास संकेतकों से इस विषमता का पता चलता है। किशोरियों की स्‍थिति में भी इसका पता चलता है।

10-19 वर्ष की किशोरियों की संख्‍या देश में कुल किशोर आबादी का करीब 47 प्रतिशत है। लेकिन उनका विकास विविध प्रकार की समस्‍याओं के त्रस्‍त है। करीब 41 प्रतिशत महिलाओं की शादी 18 वर्ष की कानूनी आयु से पहले ही हो जाती है जबकि इसकी तुलना में 10 प्रतिशत युवकों की शादी 18 वर्ष की कानूनी आयु से पहले होती है। कुल मिलाकर 15-19 वर्ष के आयु वर्ग में छह में से एक महिला मां बन जाती है। कम उम्र में बच्‍चे जनना ग्रामीण क्षेत्रों में तथा अशिक्षित महिलाओं में बहुत आम बात है। कुल जच्‍चाओं की मृत्‍यु में से करीब 41 प्रतिशत मौत 15-24 वर्ष की आयु वाली महिलाओं की होती है। 56 प्रतिशत किशोरियां अनीमिक (अल्‍परक्‍तता) होती हैं जबकि इसकी तुलना में 30 प्रतिशत किशोर अरक्‍तता के शिकार होते हैं। अल्‍परक्‍ता की शिकार किशोरी माताओं को गर्भपात, जच्‍चा मृत्‍यु और मृत शिशु पैदा होने तथा कम वजन के बच्‍चे पैदा होने का उच्‍च जोखिम होता है। स्‍कूली शिक्षा अधूरी छोड़ने वालों में लड़कियों की संख्‍या बहुत अधिक होती है। 21 प्रतिशत किशोरियां और 8 प्रतिशत किशोर अशिक्षित होते हैं। स्‍कूली शिक्षा अधूरी छोड़ने वालों में लड़कियों की संख्‍या बहुत अधिक होने का कारण स्‍कूलों का दूर होना, पुरुष शिक्षक, स्‍कूल में स्‍वच्‍छता सुविधाएं, कम उम्र में शादी और कम उम्र में घरेलू जिम्‍मेदारियों को अपनाना है।

दुनिया में लड़को को विकल्‍पों एवं अवसरों की ज्‍यादा आजादी होती है लेकिन लड़कियों को ऐसी आजादी कम होती है तथा यही नहीं, लड़के-लड़कियों के समूह में लड़ेकियों के साथ पक्षपात और भेदभाव किया जाता है। किशोरियां शर्मीली होती हैं तथा सबके सामने आने और माता-पिताओं, शिक्षकों, डाक्‍टरों इत्‍यदि को अपनी समस्‍याएं एवं मसले बताने में हिचकिचाती हैं। इसका दुष्‍परिणाम यह होता है कि वे अपने मसलों के समाधान के बिना बड़ी होती हैं या अपनी धारणाओं के आधार पर चलने से प्राय: राह भटक जाती हैं।

किशोरियां राष्‍ट्र की वृद्धि का मुख्‍य स्‍त्रोत होती हैं। उनके स्‍वास्‍थ्‍य और विकास के लिए निवेश करना देश की भलाई के लिए निवेश करना है। इनमें से अनेक लड़कियां स्‍कूली शिक्षा छोड़ देती हैं, कम उम्र में उनकी शादी कर दी जाती है, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा एवं अन्‍य सेवाएं हासिल करने में भेदभाव का सामना करती हैं, संवेदनशील हालात में काम करती हैं और बड़ों का दबाव झेलती है; जिसके मद्देनजर उन पर विशेष ध्‍यान देने की जरूरत है। किशोरियों के लिए सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य चु‍नौतियों में गर्भवस्‍था, जच्‍चा–बच्‍चा मृत्‍यु का जोखिम, यौन संक्रामक रोग, प्रजनन अंगो पर संक्रमण, एचआईवी के मामले तेजी से बढ़ना शामिल हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए किशारियों की स्‍वास्‍थ्‍य जरूरतों पर ध्‍यान देने की जरूरत है। समूह के साथ-साथ व्‍यक्‍तिगत स्‍तर पर उन पर विशष ध्‍यान देने की आवश्‍यकता है क्‍योंकि वे समाज में भावी पीढि़यों को जन्‍म देती हैं। किशारियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए राजीव गांधी किशोरी सशक्‍तिकरण योजन-सबला शुरू की गई है। इस योजना के तहत स्‍कूल जाने वाली लड़कियों पर ध्‍यान देने के साथ 11-18 वर्ष के आयु वर्ग की किशोरियों के लिए व्‍यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है जो प्रायोगिक आधार पर देश के 200 जिलों में चलाई जा रही है।

सबला योजना के मुख्‍य क्षेत्र
समेकित बाल विकास योजना के मंच के इस्‍तेमाल से यह योजना सेवाओं के समेकित पैकेज के साथ देश के 200 जिलों में 11-18 वर्ष के आयु वर्ग की करीब एक करोड़ किशारियों को उपलब्‍ध कराई जा रही है। सबला का उद्देश्‍य 11-18 वर्ष के आयु वर्ग की (स्‍कूली शिक्षा छोड़ने वाली सभी किशारियों पर विशेष ध्‍यान देने के साथ) किशारियों को आत्‍मनिर्भर बनाकर उनका चहुंमुखी विकास करना है। आंगनबाडी केंद्रों पर 600 किलो कैलोरी और 18-20 ग्राम प्रोटीन उपलब्‍ध कराने के जरिए अनुपूरक पोषण उपलब्‍ध कराया जाता है तथा आंगनबाडी केंद्रों पर हर रोज गरम पकाए हुए भोजन के रूप में या स्‍कूली शिक्षा से वंचित 11-14 वर्ष की किशारियों को घर ले जाने के लिए और 14-18 वर्ष की सभी लड़कियों को साल में 300 दिन के लिए भोजन उपलब्‍ध कराया जाता है।

इसके अतिरिक्‍त स्‍कूल जाने वाली किशोरियों को पोषाहार से भिन्‍न सेवाएं उपलब्‍ध कराई जा रही हैं, जिनमें कौशल शिक्षा, सुपरवाइज्‍ड साप्‍ताहिक आईएफए (100 मिग्रा एलीमेंटल आइरन और 0.5 मिग्रा फोलिक ऐसिड) सप्‍लीमेंटेशन तथा पोषाहार परामर्श, यौन एवं प्रजनन स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा एवं परामर्श, नेतृत्‍व कोशल, समस्‍या समाधान, निर्णय लेना और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच शामिल हैं। इसके अलावा ज्‍यादा उम्र की किशोरियों (16-18 वर्ष की आयु) को आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए व्‍यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यक्रम के उद्देश्‍य हासिल करने के लिए इस योजना में स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, युवा मामले एवं खेल और पंचायती राज संस्‍थाओं जैसे विभिन्‍न कार्यक्रमों के तहत सेवाओं के रूपांतरण पर बल दिया गया है।

समुदाय आधारित फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं (आंगनवाडी कार्यकर्ता) तथा सिविल सोसायटी समूहों की सहायता से किशोरियों के समूह बनाए गए हैं जिन्‍हें किशोरी समूह कहते हैं। प्रत्‍येक समूह का नेतृत्‍व वरिष्‍ठ किशोरी (किशोरी सखी) करती है तथा पीयर सपोर्ट समूह के रूप में कार्यक्रम सेवाएं और कार्य प्राप्‍त करने के लिए सप्‍ताहमें कम से कम 5-6 घंटे की बैठक होती है। सबला में नामांकित प्रत्‍येक लड़की को किशोरी कार्ड दिए जा रहे हैं जो सबला के तहत किशोरी की सेवाओं तक पहूंच और सेवाएं लेने की निगरानी करने पात्रता साधन है। सबला कार्यक्रम के तहत पोषाहार से भिन्‍न सेवाओं को किशोरी समूहों अर्थात किशोरी समूह बैठकों के लिए जरिए स्‍कूल नहीं जाने वाली किशोरियों तक भी पहुंचाया जाता है। प्रत्‍येक किशोरी समूह में 15-25 किशोरियां होती हैं जिनका नेतृत्‍व वरिष्‍ठ किशोरी अर्थात किशोरी सखी करती है तथा उसकी दो सहयोगी अर्थात सहलियां होती हैं। सखियां और सहेलियां प्रशिक्षण देती हैं तथा किशोरियों के लिए पीयर मॉनिटर/शिक्षक के रूप में कार्य करती हैं। वे एक वर्ष तक समूह के लिए कार्य करती हैं तथा प्रत्‍येक लड़की रोटेशनल आधार पर सखी के रूप में चार महीनों की अवधि के लिए कार्य करती हैं। किशोरियां प्री-स्‍कूल, शिक्षा, विकास निगरानी और एसएनपी जैसी आंगनवाडी कार्यकर्ता की दिन प्रति दिन की गतिविधियों एवं अन्‍य गतिविधियों में आंगनवाडी कार्यकर्ता की सहायता करने में भी भाग लेती हैं। वे घर पर विजिट (एक समय पर 2-3 लड़कियां) के लिए आंगनवाडी कार्यकर्ताओं के साथ भी जाती हैं जो भविष्‍य के लिए प्रशिक्षण की बुनियादी तैयार करती हैं।

राज्‍य विशेष के सबला प्रयास
मध्‍य प्रदेश और ओडिशा जैसे अनेक राज्‍यों में जागररूकता संबंधी सभी गतिविधियों के लिए तथा सखियों एवं सहेलियों के प्रशिक्षण के लिए स्‍वंय सेवी संगठनों का इस्‍तमेल किया जा रहा है। सप्‍ताह में एक बार स्‍कूल जाने वाली और स्‍कूल नहीं जाने वाली किशोरियों की बैठक आयोजित की जाती है ताकि स्‍कूल जाने वाली एवं स्‍कूल न जाने वाली लड़ेकियों के बीच बातचीत को बढ़ावा दिया जा सके तथा स्‍कूल जाने वाली किशोरियों को स्‍कूल जाने के लिए प्रोत्‍साहन दिया जा सके। तीन महीनों में एक बार किशोरी दिवस निर्धारित किया जाता है और सामान्‍य स्‍वस्‍थ्‍य जांच, लंबाई एवं वजन की माप तथा रेफरल सेवाओं की सुविधा दी जाती है। इन सबका आयोजन आंगनवाडी कार्यकर्ता स्‍वास्‍थ्‍य कर्मियों की मदद से करती हैं तथा ऐसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या के लिए विशिष्‍ट स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल केंद्र द्वारा किया जाता है। प्रत्‍येक किशोरी को किशोरी कार्ड उपलब्‍ध कराया जाता है जो सबला योजना के तहत सेवाओं के किशोरी द्वारा उपयोग करने की निगरानी का साधन है।

योजना की बुनियादी रूपरेखा के साथ राज्‍य सरकारों ने किशारियों के कल्‍याण के लिए उन तक पहुंचने के विशेष प्रयास किए हैं। बिहार में राज्‍य सरकार ने 16-18 वर्ष की किशारियों के व्‍यावसायिक प्रशिक्षण को इस योजना के साथ मिलाया है तथा शिक्षा विभाग की हुनर स्‍कीम के जरिए किशोरियों तक पहुंच रही है। हुनर स्‍कीम राज्‍य स्‍तरीय विशिष्‍ट पहल है जो अल्‍पसंख्‍यकों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सशक्‍त बनाने के लिए चलाई जा रही है। इसके तहत कम से कम 8वीं पास युवतियों को व्‍यावसायिक रूप से वहनीय प्रशिक्षण उपलब्‍ध कराने तथा रोजगार योगय कौशल विकसित करने प्रयास किए जा रहे हैं।

ओडिशा जैसे राज्‍य सरकार ने किशोरियों को वस्‍त्र दस्‍तकारी में प्रशिक्षण देने का प्राथमिकता दी है तथा व्‍यावसायिक प्रशिक्षण देने के लिए मौजूदा कुटीर उद्योगों के साथ समझौते किए हैं। इसके तहत मार्केट लिंक संबंधी प्रशिक्षण भी दिया जाता है ताकि वरिष्‍ठ किशोरियां आर्थिक रूप से आत्‍मनिर्भर बन सकें। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक सरकार ऐसे ही प्रयास कर रही हैं।

गुजरात में राज्‍य सरकार ने किशोरियों की पर्याप्‍त स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल एवं समय पर परामर्श सुनिश्चित करने के लिए ममता तरुणी कार्यक्रम शुरू किया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्‍य ऐसी किशोरियों को स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल उपलब्‍ध कराना है जो स्‍कूल छोड़ चुकी हैं, क्‍योंकि वहां स्‍कूल जाने वाले बच्‍चों के लिए पहले ही स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल उपलब्‍ध कराने का कार्यक्रम मौजूद है। इस कार्यक्रम के जरिए युवतियों में किशोरावस्‍था के दौरान होनेवाले बदलावों के बारे में शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक परामर्श दिया जा रहा है। हर छह महीने में किशोरियों की पोषाहार स्‍थिति और हीमोग्‍लोबिन स्‍तर की जांच की जाती है तथा यदि आवश्‍यकता हो तो उनका एनीमिया का इलाज किया जाता है। कार्यक्रम में अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राज्‍य सरकार ने मामूली आर्थिक सहायता का भी प्रावधान किया है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों से अधिक से अधिक लड़कियां शामिल हो सकें और इसका लाभ उठा सकें। राज्‍य सरकार सखियों को 25 रुपये हर बैठक के लिए उपलब्‍ध कराती है ताकि वे किशोरी समूहों में अधिक से अधिक लड़कियों को ला सकें तथा उन्‍हें जागरूक कर सकें। इसके साथ-साथ आंगनवाडी कार्यकर्ता को भी बैठक और किशोरियों का परामर्श देने के लिए 50 रुपये की प्रोत्‍साहन राशि दी जा रही है।

झारखंड में राज्‍य सरकार ने किशोरियों को तकनीकी और व्‍यावसायिक कौशल देने के लिए व्‍यावसायिक प्रशिक्षण के वास्‍ते प्रभावी लिंकेज स्‍थापित करने के लिए विशष प्रयास किए हैं। व्‍यावसायिक प्रशिक्षण एवं प्‍लेसमेंट के लिए एनएसडीसी (राष्‍ट्रीय कौशल विकास निगम) तथा 30 स्‍थानीय स्‍वयं सेवी संगठनों के साथ लिंकेज स्‍थापित किया गया है। किशोरियों के समूहों को मौजूदा स्‍वयं सहायता समूहों के साथ जोड़ा जा रहा है ताकि वे इन समहों के साथ बात कर सकें और आर्थिक निर्भर होने में उनसे मदद हासिल कर सकें। शिक्षा विभाग के सहयोग से राज्‍य सरकार विशेष पाठ्यक्रम तैयार कर रही है ताकि स्‍कूल छोड़ चुकी किशोरियों को स्‍कूलों में पुन: दाखिल कराया जा सके और विशेष रूप से तैयार किए गए शैक्षिक पाठ्यक्रम से उनकी साक्षरता उपलब्‍ध कराने के लिए उपाय किए हैं। इसके लिए राष्‍ट्रीय बालिका शिक्षा कार्यक्रम और कस्‍तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के साथ लिंकेज स्‍थापित किया गया है। खासतौर से जनजातीय लड़कियों के गैर-कानूनी व्‍यापार से निपटना राज्‍य के समक्ष प्रमुख चुनौती है। इस समस्‍या से निपटने के लिए झारखंड सरकार ने जीवन कौशल शिक्षा के जरिए समुचित व्‍यावसायिक प्रशिक्षण और साक्षरता बढ़ाने की योजना पर काम शुरू किया है। आशा है कि इससे बालिकाओं के गैर कानूनी व्‍यापार को कम किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्‍त कार्पोरेट सामाजिक दायित्‍व कोष को इस्‍तेमाल प्रत्‍येक आंगनवाडी केंद्र मे लघु पुस्‍त्‍कालय एवं शिक्षण केंद्र बनाने के लिए किया जा रहा है। राज्‍य सरकार ने किशोरियों के स्‍वास्‍थ्‍य एवं पोषाहार के लिए राज्‍यव्‍यापी सामाजिक एकजुटता अभियान भी शुरू किया है जिसका उद्घटन एक समारोह में राज्‍य के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने किया था जहां सबला के तहत सारे कार्यक्रम शुरू किए गए।


सबल पहल से किशारियों को ज्‍यादा आत्‍मनिर्भर बनाने, पोषाहार एवं स्‍वास्‍थ्‍य दशा में सुधार, कौशल सुधार और सूचित विकल्‍प उपलब्‍ध कराने के जरिए उनकी क्षमता बढ़ाने में मदद मिली है। सबला सहित विभिन्‍न योजनाओं के जरिए सरकार किशोरियों के स्‍वास्‍थ्‍य, पोषाहार एवं विकास जरूरतों को पूरा करने के लिए निवेश कर रही है जिससे उनको शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य एवं संरक्षण के अधिकार प्रदान किए जा सकें। इससे किशोरियों को लैंगिक रूप स बराबरी एवं न्‍यायपूर्ण भविष्‍य के निर्माण में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर इससे महिलाओं को आत्‍मनिर्भर एवं आत्‍मविश्‍वास से भरपूर बनाया जा सकेगा।

Sunday, 18 November 2018

10 lines on Kangaroo in Hindi

10 lines on Kangaroo in Hindi

10 lines on Kangaroo in Hindi

10 lines on Kangaroo in Hindi
  1. कंगारू आस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला एक स्तनधारी पशु है।
  2. यह एक शाकाहारी जीव है जो घास-पत्ते खाकर जीवन निर्वाह करता है।
  3. यह आस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पशु है और केवल यहीं पाया जाता हैं। 
  4. यह मुख्य रूप से लाल तथा ग्रे रंग के होते हैं। 
  5. इसके एक जोड़ी बड़े-बड़े कान तथा एक मोटी तथा लम्बी पूँछ होती है। 
  6. इनके अगले पैर छोटे तथा पिछले पैर बहुत विशाल होते हैं। 
  7. कंगारू के पेट के निचले भाग में एक थैली रहती है।
  8. कंगारू अपने बच्चों को इसी  खाल में बने थैले में रखता है।
  9. यह अपने पिछले पैरों तथा पूँछ का प्रयोग अपनी रक्षा में करते हैं। 
  10. कंगारू सामाजिक प्राणी होते हैं जो समूह बनाकर रहते हैं। 
  11. कंगारू अपनी पूँछ को टेककर ऐसे बैठे रहते हैं मानों कुर्सी पर बैठे हों। 
  12. यह एकमात्र ऐसे स्तनधारी जीव है उछल-उछलकर चलते हैं। 
  13. कंगारू हमेशा आगे की ओर ही चलता है, पीछे कभी नहीं चलता।

Saturday, 17 November 2018

10 lines on Atal Bihari Vajpayee in Hindi

10 lines on Atal Bihari Vajpayee in Hindi

10 lines on Atal Bihari Vajpayee in Hindi

10 lines on Atal Bihari Vajpayee in Hindi
  1. अटल जी का जन्म 18 दिसंबर 1925 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले में हुआ था।
  2. उनकी माता का नाम कृष्णा देवी तथा पिता का नाम कृष्ण बिहारी वाजपेयी था। 
  3. वे एक कुशल राजनेता होने के साथ-साथ हिन्दी कवि, पत्रकार व एक प्रखर वक्ता भी थे।
  4. उनकी याद में 25 दिसंबर को प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
  5. मात्र 16 वर्ष की आयु में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक सक्रिय सदस्य बन गए। 
  6. चाचा नेहरु के बाद वे ऐसे दुसरे नेता थे जो तीन बार भारत के प्रधानमन्त्री बने। 
  7. वे क्रमशः 13 दिन, 13 महीने तथा 1999 से 2004 में पूर्णकालिक प्रधानमंत्री बने। 
  8. एक प्रधानमंत्री के रूप में उनकी छवि एक इमानदार व जनप्रिय नेता की रही। 
  9. अटल जी ने आजीवन राष्ट्रसेवा के लिए गृहस्थ जीवन का विचार तक त्याग दिया। 
  10. अटल जी को भारत रत्न, पद्म विभूषण आदि सम्मानों से सुशोभित किया गया। 
  11. पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह जी उन्हें राजनीति का भीष्म पितामह मानते थे। 
  12. सन 2005 में इस भीष्म पितामह ने राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लिया। 
  13. 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स अस्पताल में अटल जी की मृत्यु हुई। 
  14. उनका जीवन दर्शन सभी भारतवासियों को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।


Friday, 16 November 2018

जनसंख्‍या विस्‍फोट की समस्या, पर्यावरण पर प्रभाव एवं राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का लक्ष्य के समीक्षा

जनसंख्‍या विस्‍फोट की समस्या, पर्यावरण पर प्रभाव एवं राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का लक्ष्य के समीक्षा

जनसंख्‍या विस्‍फोट की समस्या, पर्यावरण पर प्रभाव एवं राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 का लक्ष्य के समीक्षा

ऐसा पूर्वानुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर विश्‍व का सबसे अधिक जनसंख्‍या वाला राष्‍ट्र बन जाएगा। पहले से ही अधिक जनसंख्‍या का भार झेल रहे विश्‍व में, धनी देशों को भी गरीबी की वजह से बढ़ रही जनसंख्‍या विस्‍फोट की समस्‍या को जिम्‍मेदारी लेने के लिए कहा जा रहा है। पलायन, जन्‍म एंव मृत्‍यु दर के कार्य ही किसी भी देश में जनसंख्‍या वृद्ध‍ि दर को निर्घारित करते हैं। जन्‍म दर और मृत्‍यु दर के बीच के अंतर को ही जनसंख्‍या वृद्धि दर के रूप में आंका जाता है। एक अनुमान के अनुसार, भारत की जनसंख्‍या 1,270,272,105 (एक अरब सत्‍ताईस करोड़ के लगभग) पहुंच चुकी है, जिसमें से 614,397,079 (करीब 61 करोड़) महिलाएं, 655,875,026 (करीब 65 करोड़) पुरुष और 104,281,034 (करीब 10 करोड़) आदिवासी हैं। उच्‍च जन्‍मदर और बेहतर सफाई व स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍था के चलते घट रही मृत्‍यु दर उच्‍च जनसंख्‍या वृद्धि दर की मुख्‍य वजहें हैं। हालांकि तेजी से बढ़ती जनशक्‍ति को समाहित करने की क्षमता काफी कमजोर है। साथ, ही अधुनिक प्रौद्योगिकी स्‍थिति के बीच आर्थिक विकास प्रक्रिया का झुकाव अधिक पूंजी अर्जित करने की ओर है। अत: इस प्रक्रिया के तहत अल्‍प अवधि में रोजगार सृजन की संभावनाएं काफी कम हैं। जनसंख्‍या का कुल आकार पहले से ही काफी बड़ा है, ऐसे में निम्‍न जनसंख्‍या वृद्धि के लिए उच्‍च जन्‍म दर से निम्‍न जन्‍म दर के लिए तीव्र गति आधारित जनसांख्यि‍की परिवर्तन की अति आवश्‍यकता है। भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्‍या के बेहतर उपयोग की समस्‍या, ढांचागत निर्माणों पर अधिक बोझ, भूमि एवं अन्‍य नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव, उत्‍पादन की बढ़ती लागत और आय का असंतुलित तरीके से वितरण आदि समस्‍याएं देश के विकास में रुकावट पैदा कर रही हैं। विश्‍व जनसंख्‍या दिवस दुनियाभर में प्रत्‍येक वर्ष 11 जुलाई को मनाया जाता है।

जनसंख्‍या एवं लिंग अनुपात

लिंग अनुपात एक महत्‍वपूर्ण पैमाना है, जिसमें समाज में महिलाओं की स्थिति का पता चलता है। भारत और चीन जैसे दक्षिण एवं पूर्ण एशियाई देशों में महिलाओं के अधिकरों का उल्‍लंघन करने वाले लिंग अनुपात के कई बुरे उदाहरण सामने आए हैं। भारत में लिंग अनुपात घटकर प्रति 1000 पुरुषों पर 928 महिलाओं के स्‍तर पर पहुंच गया है। लेकिन सामाजिक, शैक्षणिक एवं अर्थिक विकास के क्षेत्र में भी लिंग अनुपात की बुरी स्थिति होना सबसे गंभीर विषय है। जनगणना के अनुसार बिहार, गुजरात और जम्‍मु-कश्‍मीर को छोड़कर बाकी सभी राज्‍यों में लिंग अनुपात में सुधार हुआ है। दादरा एवं नागर हवेली और दमन एवं दीव को छोड़कर बाकी सभी केंद्र शासित प्रदेशों में भी लिंग अनुपात की स्थिति में सुधार हुआ है। उत्‍तर भारत के ज्‍यादातर इलाकों में पिछले कुछ समय में महिला मृत्‍युदर काफी कम रही है लेकिन तुलनात्‍मक रूप से दक्षिण भारत में लिंग अनुपात काफी उच्‍च स्‍तर पर है। लिंग अनुपात के निम्‍न स्‍तर और कन्‍याओं की अनदेखी के मुख्‍य कारण लड़कों को प्राथमिकता दिया जाना, महिलाओं का निम्‍न सामाजिक स्‍तर, लड़कों के साथ जुड़ी सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा, महिलाओं के खिलाफ दहेज एवं हिंसा से जुड़ी सामाजिक-सांस्‍कृतिक प्रथाएं हैं। बाल लिंग अनुपात को कम करने में छोटा परिवार के नियम उत्‍प्रेरक साबित हो सकते हैं।

जनसंख्‍या एवं पर्यावरण

संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के सन् 1972 में स्‍टॉकहोम (संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ 1973) में मानव पर्यावरण विषय पर आयोजित सम्‍मेलन में इस बात पर जोर दिया गया था कि पलायन एवं राष्‍ट्र वृद्धि के द्वारा चुनिंदा इलाकों में हो रही जनसंख्‍या वृद्धि, सुरक्षि‍त एवं स्‍थिर वातावरण को बनाए रखने और गरीबी एवं पिछड़ेपन को दूर करने के राष्‍ट्रों के प्रयासों को विफल कर सकती है। स्‍थिर आर्थिक वृद्धि, गरीबी और पर्यावरण के बीच अंतरसमूह को 1994 में आईसीपीडी में अभूतपूर्व सर्वसम्‍मति के साथ रेखांकित किया गया था। पर्यावरण अवकर्षण को रोकने और प्रोत्‍साहित करने वाले संसाधनों के उपयोग के क्रम में योजना एवं निर्णय प्रक्रिया और अस्‍थिर उपभोग में बदलाव और उत्‍पादन के तरीके के संबंध में कार्यवाही कार्यक्रम एकीकृत जनसंख्‍या और पर्यावरण मुद्दों की जरूरतों पर बल देता है। जनसंख्‍या गतिशीलता के पर्यावरणीय संबंधों से निपटने की नीतियों को लागू करने के लिए इसका आहवान किया जाता है। जनसंख्‍या वृद्धि और गरीबी प्रतिकूल रूप से पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं। 
हम 21वीं सदी में हैं, तेजी से बढ़ती जनसंख्‍या और प्रति व्‍यक्‍ति उपभोग का बढ़ता स्‍तर प्रकृतिक संसाधनों को कम करने के साथ ही पर्यावरण का अवकर्षण भी कर रहा है। भारत में, तेजी से बढ़ती जनसंख्‍या के तह‍त बढ़ती गरीबी और स्‍थानीय संसाधनों का दोहन भी शामिल है। ये वही संसाधन हैं, जिन पर हमारी वर्तमान और भावी पीढ़ी की अजीविका निर्भर करती है। जनसंख्‍या आकार और वृद्धि से वातावरण पर मानव की आवश्‍यकताओं की पूर्ति का दबाव बढ़ेगा। चिंता का विषय यह है कि जैसे-जैसे जनसंख्‍या बढ़ेगी, वैसे-वैसे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ेगा।

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति, 2000 का लक्ष्य
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राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति 15 फरवरी, 2000 को गर्भनिरोध, स्‍वस्‍थ्‍य देखभाल अवसंरचना, स्‍वास्‍थ्‍यकर्मी और समेकित सेवा सुपुर्दगी को पूरा करने की आवश्‍यकता के उद्देश्‍य से शुरू किया गया था। इस नीति का मध्‍यावधि उद्देश्‍य अंत:क्षेत्रीय रणनीतियों के कार्यन्‍वयन द्वारा कुल प्रजनन कर को प्रतिस्‍थापन स्‍तर-एक परिवार में दों बच्‍चों पर लाने का था। इस योजना का दीर्घावधि उद्देश्‍य 2045 तक जनसंख्‍या में स्‍थिरता लाना है। इस योजना में 16 प्रेरणादायक उपायों को चिन्हित किया गया है, जिन्‍हें प्रभावशाली तरीके से लागू किया जाएगा। इनमे से महत्‍वपूर्ण हैं- छोटे परिवार के आदर्श को बढ़ावा देने के लिए पंचायतों और जिला परिषदों को पुरस्‍कार,बाल विवाह रोकथाम अधिनियम और जन्‍म से पूर्व रोग निदान प्रविधि अधिनियम को सख्‍त रूप से लागू करना, गरीबी रेखा से नीचे वाले दंपत्‍तियों के लिए 5,000 रुपए का स्‍वास्‍थ्‍य बीमा। यह स्‍वास्‍थ्‍य बीमा नसबंदी करवाने वाले गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले उन दंपत्‍तियों को प्रदान किया जाता है, जिनके दो बच्‍चो हैं। इसक अलावा इस बीमा में उन बीपीएल दंपत्‍तियों को भी शामिल किया जाता है जिन्‍होंने कानूनी उम्र के बाद विवाह किया हो और उनके पहले बच्‍चे का जन्‍म मां की उम्र 21 वर्ष होने के बाद हुआ हो और दो बच्‍चों के जन्‍म बाद नसबंदी कराकर छोटे परिवार के आदर्श को स्‍वीकार किया हो।

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या आयोग

राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या आयोग का गठन मई 2000 में किया गया था। इस आयोग के अध्‍यक्ष और उपाध्‍यक्ष क्रमश: प्रधानमंत्री और योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष होते हैं। इसके अलावा सभी राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री, संबंधित केन्‍द्रीय मंत्रालयों के मंत्री, संबंधित विभागों के सचिव, प्रतिष्ठित चिकित्‍सक, जनसांख्यिक नीति में निर्धारित सोसाइटी के प्रतिनीधि आयोग के सदस्‍य होते हैं। इस आयोग का उद्देश्‍य जनसंख्‍या नीति में निर्धारित किए गए लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने के लिए राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या नीति के कार्यान्‍वयन की समीक्षा और निगरानी करना तथा निर्देश देना, स्‍वस्‍थ्‍य शैक्षिक परिवेश और जनसंख्‍या स्थिरता की गति को तेज करने के लिए विकासात्‍मक कार्यक्रमों के बीच तालमेल स्‍थापित करना, केन्‍द्र और राज्‍यों में विभिन्‍न क्षेत्रों और एजेंसियों के माध्‍यम से कार्यक्रमों की योजना और कार्यक्रम में अंत:क्षेत्रीय समन्वय को प्रोत्‍साहित करना और इस राष्‍ट्रीय प्रयास में योगदान के लिए विभिन्‍न कार्यक्रम विकसित करना है। जुलाई 2000 में राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या आयोग के अधीन राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या निधि का गठन किया गया था। इसके परिणामस्‍वरूप इस निधि को अप्रैल 2002में स्‍वास्‍थ्‍य और परिवार कल्‍याण विभाग को हस्‍तांतरित कर दिया गया।

जनसंख्‍या और खाद्य सुरक्षा

राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (खाद्य अधिकार अधिनियम) भारत का अधिनियम है जिसका लक्ष्‍य भारत की 1.2 बिलियन जनसंख्‍या के दो-तिहाई लोगों को रियायती दरों पर खाद्य अनाज उपलब्‍ध कराना है। इस विधेयक के प्रावधनों के अंतर्गत प्रत्‍येक पात्र लाभार्थी 5 किलाग्राम प्रति माह प्रति व्‍यक्‍ति की दर से 3 रुपये किलो और मोटा अनाज 1 रुपए प्रति किलों की दर से खरीद सकता है। प्रत्‍येक राज्‍य को संतुलित खाद्य उत्‍पादन और संतुलित जीवन सुरक्षा के मार्ग को सुनिश्चित करने के लिए अपनी-अपनी रणनीतियां तैयार करनी होंगी। इसके लिए अच्‍छी नीतियां और प्रकृतिक संसाधनों जैसे भूमि और जल, जीव-जंतु, पेड़-पौधों तथा जंगल और उत्‍पादन को तीव्र करने के लिए जैव-विविधता बहुत आवश्‍यक होती है। इस संदर्भ में जनसंख्‍या दबाव और जलवायु परिवर्तनों का भी ध्‍यान रखना चाहिए। खाद्य सुरक्षा के तीन घटक हैं प्रथम घटक खाद्य उपलब्‍धता है, जो कि खाद्य उत्‍पादन और आयातों पर निभर्र होता है। दूसरा घटक खाद्य पर पहुंच है जो कि खरीदने की शक्‍ति पर निर्भर होता है। तीसरा घटक खाद्य अवशोषण है जो कि सरक्षित पेय जल, परिवेशीय जीवों, प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल और शिक्षा पर निर्भर होते हैं।

विलंबित मानसून के लिए उपाय

विलंबित मानसून से निपटने के लिए विभिन्‍न उपाय किए गए हैं। ठोस उत्‍पादन और भंडारण योजना, वैकल्पिक फसलों की बुआई और किस्‍में जिनमें विलंबित मानसून के दौरान भी से बोया जा सकता है, इन उपायों में शामिल हैं। आरंभिक फसलों/प्रकारों के प्रजनन बीजों की उपलब्‍धता सुनिश्चित करना, गांव स्‍तरीय बीज बैंक (फसल और चारा), सूखा और बाढ़ के प्रभावक्षक फसलों का उपयोग, पोषक तत्‍व प्रबंधन तंत्र की उपलब्‍धता, खंड स्‍तर पर किसानों के बीच लचीली कृषि-विज्ञान संबंधी प्रथाओं के बारें में जागरूकता उत्‍पन्‍न करके मोटे अनाजों, रुई आदि की बुआई, अधिक वर्षा की स्‍थ्‍िति में उचित जल निकासी के लिए कुछ महत्‍पूर्ण उपाय हैं, जिससे सूखे या विलंबित मानसून के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

जनसंख्‍या और स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल

उद्योगों की रिपोर्ट के अनुसार, स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल क्षेत्र 2020 तक 280 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने के लिए 19 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृद्धि कर रहा है। भारत स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल के लिए विश्‍व स्‍तरीय स्‍थान बनकर उभरा है। पिछले दशक के दौरान निजी क्षेत्र ने सबसे अधिक स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं प्रदान की हैं। अस्‍पतालों में निजी क्षेत्र का बेडों में शेयर 2002 के 49 प्रतिशत से बढ़कर 2010 में 63 प्रतिशत हो गया है। भारत सरकार ने भी कई सुधार किए हैं। 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं तथा मिलेनियम विकास के लाभों पर अंतर्राष्‍ट्रीय ध्‍यान के कारण भारत की प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र मे सफलता प्राप्‍त हुई है। मातृ एवं शिशु स्‍वास्‍थ, संक्रामक रोग आदि प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल का हिस्‍सा हैं। राष्‍ट्रीय ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य मिशन न स्‍वास्‍थ्‍य सेवा तंत्र में निपुणता और दक्षता प्राप्‍त की है। दूसरी ओर राष्‍ट्रीय ग्रामीण स्‍वास्थ्‍य मिशन ने स्‍वास्‍थ्‍य सेवा तंत्र में निपुणता और दक्षता प्राप्‍त की है। दूसरी ओर राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना-राष्‍ट्रीय सामाजिक स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना है। इसका लक्ष्‍य रोगी उपचार, गुणवत्‍तापूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य देखभाल का निर्माण करना और गरीबों को निजी क्षेत्र की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं का लाभ प्रदान करना है। उच्‍च शिक्षा स्‍तर पर सार्वजनिक चिकित्‍सा महाविद्यालयों का एक स्‍वायत्‍त समूह है अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्‍थान (एम्‍स),  दिल्‍ली एम्‍स (1956 में स्‍थापित) के अलावा देशभर में भोपाल, भुवनेश्‍वर, जोधपुर, पटना और रायपुर समेत कुल 6 एम्‍स हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य नीति का निर्माण 2002 में केन्‍द्र सरकार ने किया था। अपने सामाजिक दायित्‍व के तहत सरकार ने जनसंख्‍या को उच्‍च स्‍तरीय स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं देने के लिए अनेक प्रमुख नीतियों को मंजूरी दी है। समय-समय पर स्‍वास्‍थ्‍य संबंधित दिशा-निर्देशों को समाहित करके सरकार ने वर्ष 1983 में राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य नीति बनाई। इस नीति की घोषणा के बाद 80 के दशक में प्राथमिक चिकित्‍सा का कुछ विस्‍तार किया गया। वर्ष 2002 राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य नीति और वृहत स्‍वास्‍थ्‍य एवं विकास आर्थिक आयोग की रिपोर्ट में निम्‍नलिखित बातों पर जोर दिया गया (जन-स्‍वास्‍थ्‍य पर कुल व्‍यय सकल घरेलू उत्‍पाद का 2 से बढ़ाकर 3 फीसदी करने को कहा।) महिलाओं एवं बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए दी जा रही सुविधाओं पर बिना कटौती किए स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की बढ़ती कीमतों पर अंकुश रखने के लिए सामाजिक सुरक्षा में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने को जरूरी बताया। ग्रामीण आबादी, विशेष तौर पर कमजोर वर्गों को गुणात्‍मक स्‍वास्‍थ्‍य सेवाएं उपलब्‍ध कराने के लिए 12 अप्रैल, 2005 को राष्‍ट्रीय मिशन (एनयूएचएम) की शूरूआत राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन (एनएचएम) के सहयोगी कार्यक्रम के तौर पर की गई। इसका उद्देश्‍य शहरी गरीबों की स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी सेवाओं की आवश्‍यक जरूरतों को पूरा करना है।

जनसंख्‍या और रोजगार

विश्‍व बैंक के एक अनुमान के अनुसार भारत विश्‍व के कुछ ऐसे देशों में शामिल है, जहां न काम करने वालों की अपेक्षा काम करने वालों की संख्‍या अधिक है। भारत का श्रम एवं रोजगार मंत्रलय देश में बेरोजगारों का रिकार्ड रखता है। लेबर ब्‍यूरों शिमा की वार्षिक रोजगार एवं बेरोजगार सर्वेंक्षण रिपोर्ट 2012-13 के अनुसार वर्ष 2012-13 में भारत में बेरोजगारी की दरें निम्‍नलिखित रही
Ø सर्वाधिक बेरोजगारी दर वाला राज्‍य               :     केरल (10.1%)
Ø समग्र बेरोजगारी दर                                       :     4.7%
Ø ग्रमीण क्षेत्र में बेरोजगारी दर                           :     4.4%
Ø शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर                           :     5.7%
Ø सर्वाधिक बेरोजगारी व्‍यक्ति वाला राज्‍य          :     सिक्‍किम
Ø सबसे कम बेरोजगारी व्‍यक्‍ति वाला राज्य      :     छत्तीसगढ़

जनसंख्‍या और गरीबी उन्‍मूलन

इन न्‍यूनतम सेवाओं में अन्‍य बातों के अलावा साक्षरता, शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा देखभाल, सुरक्षित पेयजल और पोषण सुरक्षा शामिल हैं। सरकार ने मूलभूत न्‍यूनतम सेवाओं की पहचान करने के लिए मुख्‍यमंत्रियों की बैठक बुलाई थी जिसमें सर्वसम्‍मति से सात सेवाओं की सूची पर सहमति हुई। ये सात सेवांए हैं पेयजल, प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, स्‍कूल और पूर्व-स्‍कूली बच्‍चों के लिए पोषण, गरीबों के लिए मकान सभी गांव व बस्‍तियों को सड़कों से जोड़ना और गरीबों पर केंद्रित सार्वजनिक वितरण प्रणाली। 

सातवीं योजना में इन सात मूलभूत न्‍यूनतम सेवाओं पर विशेष जोर दिया गया और राज्‍य सरकारों तथा पंचायती राज संस्‍थानों, (पीआरआई) के साथ भागीदारी में संतुष्टि के न्‍यूनतम स्‍तर को प्राप्‍त करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (अईआरडीपी) का उद्देश्‍य उत्‍पादक परिसंपत्तियों के अधिग्रहण या गांव के गरीबों को लगातार अतिरिक्‍त आय जुटाने के लिए उचित कौशल प्रदान करने के माध्‍यम से स्‍वरोजगार उपलब्‍ध कराना है ताकि उन्‍हें गरीबी की रेखा से ऊपर उठने के योग्‍य बनाया जा सके। भारत में गरीबी नियंत्रण के लिए राष्‍ट्रीय वृद्धावस्‍था पेंशन योजना (एनओएपीएस) राष्‍ट्रीय परिवार लाभ योजना (एनएफबीएस), राष्‍ट्रीय मतृत्‍व लाभ योजना अन्‍नपूर्णा, समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, ग्रामीण आवास इन्दिरा आवास योजना (आईवाई 1985 में शुरू), महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी अधिनियम (मनरेगा) जैसे अन्‍य कार्यक्रम भी शुरू किए गए थे।

अधिक उत्‍पादन देने वाले बीजों की किस्‍मों की उपलब्‍धता और रासायनिक खादों और सिंचाई के उपयोग में बढ़ोतरी को सामूहिक रूप से हरित क्रांति के रूप में जाना जाता है, जिससे भारत को खाद्यान्‍नों के मामले में आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए आवश्‍यक उत्‍पादन वृद्धि अर्जित की गई, जिससे देश की कृषि में सुधार हुआ।

गरीबी रेखा का निर्धारण

तेंदुलकर समिति का रिपोर्ट के अनुसार देश में हर तीसरा व्‍यक्‍ति गरीबी रेखा से नीचे रहता है। रिपोर्ट में गरीबी की गणना के लिए कैलोरी के उपयोग की उपेक्षा वस्‍तुओं और सेवाओं को पैमाने के रूप में लिया गया है। गरीबी रेखा खीचनें की नई विधि से देश में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्‍या में वृद्धि हुई है। ऐसी जनसंख्‍या 27.5 प्रतिशत से बढ़कर 37.2 प्रतिशत हो गई है। इस प्रकार 2004-05 में गरीबी रेखामें 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अर्थशास्‍त्री सुरेश तेंदुरलकर के नेतृत्‍व में इस समिति ने गरीबी का मूल्‍यांकन करने के लिए नया फार्मूला तैयार कियाहै। यह रिपोर्ट योजना आयोग को सौंपी गई है। डांडेकर-रथ गरीबी रेखा फार्मूला 1971 से प्रयोग किया जा रहा है जिसमें किसी भारतीय की खुराक में कैलोरी तत्‍व का ही आकलन किया जाता है। अगर किसी व्‍यक्‍ति की प्रतिदिन की खुराक में 2250 कैलोरी से कम ऊर्जा है तो उस व्‍यक्‍ति को गरीबी रेखा नीचे घोषित किया जा सकता है। इस मानदंड में 35 वर्षों से कोई संशोधन नहीं हुआ है। तेंदुलकर समिति ने कैलोरी के मापन की विधि को हटाकर जीवन सूचकांक लागत का उपयोग किया है इसका तात्‍पर्य है कि कोई मनुष्‍य कितना धन खर्च करता है। इसमें गृहस्‍थी की वस्‍तुओं और स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा जैसी सुविधाओं पर नजर रखी गई है। नई गरीबी रेखा विभिन्‍न राज्‍यों के लिए अलग-अलग है यहां तक कि एक ही राज्‍य में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी अलग-अलग गरीबी रेखाएं है। अखिल भारतीय औसत ग्रामीण गरीबी रेखा 446.68 रुपये तथा राष्‍ट्रीय शहरी गरीबी रेखा 578.8 रुपये प्रतिमाह खर्च पर निर्धारित की गई है। गोवा की ग्रामीण गरीबी रेखा सबसे अधिक 608.76 प्रतिमाह है जबकि दिल्‍ली की 541 रुपय। स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय ने संयुक्‍त राष्‍ट्र जनसंख्‍या निधि (यूएनएफपीए) के सहयोग से पीएनडीटी एक्‍ट के बारे में बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्‍नों को विकसित किया है, जो लोगों के लिए बहुत लाभदायक होंगे। इनसे जनसंख्‍या को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। प्रजनन स्‍वास्‍थ्‍य, मातृ स्‍वास्‍थ्‍य, बाल स्‍वास्‍थ्‍य, किशोर स्‍वास्‍थ्‍य इंफर्टिलिटी, गर्भनिरोधी परिवार नियोजन के बारे में राष्‍ट्रीय हेल्‍प लाइन सेवा का उद्देश्‍य शादी करने वाले किशोरों और नये शादीशुदा युग्‍लों तक पहुंच बनाना है जो ऊपर लिखे गए मुद्दों के बारे में आसानी से विश्‍वसनीय जानकारी प्राप्‍त नहीं कर सकते हैं।