Friday, 15 February 2019

राष्‍ट्रीय पेंशन योजना - National Pension Scheme in Hindi

राष्‍ट्रीय पेंशन योजना - National Pension Scheme in Hindi


राष्‍ट्रीय पेंशन योजना - National Pension Scheme in Hindi

National Pension Scheme in Hindi
जब व्‍यक्‍ति रोजगार से मुक्‍त अथवा कार्य करने में अक्षम हो जाता है, वैसी स्‍थ‍िति में पेंशन उसके लिए वित्‍तीय प्रबंध सुनिश्‍चित करती है। भारत में जीवन प्रत्‍याशा बढ़ाने के कारण आज पेंशन योजनाएँ अधिक लाभप्रद बन गई हैं। भारत के निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में कई पेंशन योजनाएँ प्रचलन में हैं। यद्यपि प्रत्‍येक पेंशन योजना में अलग-अलग लाभों का प्रावधान देखने को मिलता है किन्‍तु सभी योजनाओं का उद्देश्‍य सामाजिक सुरक्षा ही होता है। भारत सरकार ने अपने नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए विभिन्‍न पेंशन योजनाएँ लागूकी हैं जिनमें स्‍वतंत्र सैनिक सम्‍मान पेंशन योजना 1980, सेवारत सरकारी कर्मचारी की मृत्‍यु होने पर पारिवारिक पेंशन, आंतकवादी अथवा असामाजिक तत्‍वों द्वारा किए गए हमले में मृत व्‍यक्‍ति के परिवार हेतु योजनाएँ, प्राधिकृत बैंकों के माध्‍यम से सरकारी कर्मियों को पेंशन, ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा संचालित राष्‍ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) आदि प्रमुख हैं।

पेंशन फंड विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) ने मई 2009 में 18 से 55 वर्ष आयु वर्ग के भारतीय नागरिकों के लिए राष्‍ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) की शुरुआत की थी। इस योजना के अंतर्गत निवेशक द्वारा अपनी सेवावधि के दौरान पेंशन फंडल में निवेश की गई राशि में से आधी राशि का एकमुश्‍त भुगतान और आधी राशि का वार्षिक अथवा पेंशन के रूप में भुगतान किया जाता है।

सरकार ने पेंशन कोष और नियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) विधेयक, 2011 पर संसद की मंजूरी ले ली है। लम्‍बे समय से अधर में लटका यह विधेयक पेंशन विनियामकको अधिकार देने के साथ ही पेंशन फंडों के शेयर बाजार में निवेश का रास्‍ता भी खोल देगा। पीएफआरडीए विधेयक के पास हो जाने के बाद केंद्र सरकार के सभी विभागों में फंड मैनेजरों की नियुक्‍त‍ि का रास्‍ता साफ हो गया है। ये फंड मैनेजर पीएफआरडीए के अधीन काम करेंगे और इनके पास कर्मचारियों की ग्रेच्‍युटी, फंड और पेंशन संबंधी जानकारी उपलब्‍ध होंगी‍।

सामाजिक सुरक्षा पर जोर
अगर हम भारत की काम काजी आबादी का विश्‍लेषण करें तो पाएंगे कि कुल जनसंख्‍या के अनुपात में काम करने की उम्र बढ़ती जा रही है। इसीलिए भारत को एक मजबूत पेंशन प्रणाली की जरूरत थी। भारत के युवाओं का देश कहा जा रहा है लेकिन आने वाले दस से बीस वर्षों के बाद बुजुर्गों की संख्‍या बढ़ेगी और पेंशन एवं स्‍वास्‍थ्‍य सेवा पर जीडीपी का ज्‍यादा हिस्‍सा खर्च होगा। इस समय हमारे नीति-निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती उच्‍च विकास दर को बनाए रखने की है, ताकि आर्थि‍क‍ सुरक्षा के न बिगड़ें। ऐसे हालात में जीडीपी के ज्‍यादा से ज्‍यादा हिस्‍से को एक बड़ी आबादी में समान और सक्षम तौर पर बांटना होगा। बजट में इस बार स्‍वालम्‍बन योजना से बाहर जाने की उम्र घटा कर 50 वर्ष कर दी गई है जो अब तक 60 वर्ष थी। संभवत: इस योजना में मार्च 2012 तक 20 लाख लोग और जुड़ जाएंगे।

इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय वृद्धावस्‍था पेंशन स्‍कीम के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बुजुर्गों के लिए बजट मुहैया कराया जाता है। बजट में इस योजना का लाभ 65 साल की बजाय 60 साल में देने का प्रावधान किया गया है। अस्‍सी साल से ज्‍यादा की उम्र के लोगों के लिए केंद्र का योगदान 200 रुपए से बढ़ा कर 500 रुपए कर दिया गया है। राज्‍य केंद्र के योगदान में पूरक योगदान करने के लिए स्‍वतंत्र है। राज्‍यों में पेंशन के लिए मानक उम्र अलग-अलग है, लेकिन इस बात में गलती की आशंका बनी रहती है कि योजना में किस शामिल किया जाए और किसे नहीं। इस गलती को सुधारा जाना जरूरी है। इसलिए इस संबंध में समीक्षा करने की जरूरत है। साथ इस दिशा में ट्रंजेक्‍शन लागत भी कम करना जरूरी हो गया है। वर्ष 2010 में पेंशन फंड रेग्‍यूलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी बिल लैप्‍स हो गया था। बजट में इसे दोबारा लाने की बात कही गई। एक मजबूत पेंशन नियामक नई पेंशन स्‍कीम जैसी योजनाओं के प्रति विश्‍वसनीयता पैदाकर सकेगा और वह आम निवेशकों को अपनी दक्षता का फायदा भी दिलाएगा। वर्ष 2010-11 के आर्थिक सर्वेक्षण में नीतिगत मुद्दों पर काफी कुछ कहा गया है। बिहार औैर मध्‍य प्रदेश में सेवा का अधिकार कानून लागू हो चुका है। यह सही दिशा में उठाया गया उचित कदम है। इसमें सिविल सेवा और राजनीतिक प्राधिकरणों की जिम्‍मेदारी को स्‍पष्‍ट कर दिया गया है। भविष्‍य निधि संगठन और कर्मचारी राज्‍य बीमा निगम को इन प्रावधानों का लाभ उठाकर उसे अपनी कार्यप्रणाली में सुधार का मौका बनाना चाहिए। बहरहाल भारत के सामने इस समय बड़ी चुनौती है; देश की अधिकतर कामकाजी आबादी के पास सामाजिक सुरक्षा की कोई स्‍कीम नहीं है। संगठित क्षेत्रों में कुछ जगहों पर पेंशन योजनाएं हैं, लेकिन बड़ी आबादी को पेंशन योजना के तहत लाने के लिए व्‍यापक अभियान चलाने की जरूरत है। अब सरकार को एक मजबूत पेंशन प्रणाली बनानेके लिए अपना ध्‍यान केन्‍द्रित करना चाहिए। बगैर बेहतर गवर्नेंस, नियमन और प्रबंधन के बगैर ऐसी योजनाओं का लाभ मिलना मुश्‍किल है। पेंशन सुधारों की दिशा में देश को एक लंबा सफर तय करना है। यह ठीक है कि आने वाले सालों में सरकारी खजाने पर इसका बोझ बढ़ेगा, लेकिन विकसित देशों की तुलना में यह बहुत कम होगा। भारत में औसत आयु बढ़ती जा रही है। आने वाले वर्षों में एक बड़ी आबादी को सेवानिवृत्ति के बाद भी लंबे समय तक जीवन-यापन करना होगा, इसलिए सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं लाना सरकार की अहम प्राथमिकताओं में से एक होनी चाहिए।

विशाल आबादी वाले हमारे देश में पेंशन और बीमा का दायरा केवल चुनिंदा तक सीमित है और अधिकांश लोग सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे से बाहर हैं। मौजूदा पेंशन प्रणाली से केवल संगठित क्षेत्रों के कर्मचारियों को फायदा मिलता है, जो देश की कार्यरत आबादी का महज 12 फिसदी है। हमारे देश के 90 फीसदी बुजुर्ग पेंशन योजना से बाहर हैं। वहीं विकसित देशों में यह आंकड़ा पांच फीसदी से भी कम है। सरकार ज्‍यादा-से-ज्‍यादा लोगों तक पेंशन योजनाओं का लाभ पहुंचाने का अलग-अलग योजनाओं के माध्‍यम से प्रचार-प्रसार कर रही है, निकट भविष्‍य में इसके अच्‍छे परिणाम मिलेंगे।

कर्मचारियों और सरकार के योगदान से जमा रकम के रिटर्न से पेंशन दी जाएगी। पहले सरकार यह योगदान नहीं देती थी और इसकी एवज में पेंशन का भुगतान किया जाता था। अब एनपीएस योजना में निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को भी शामिल कर लिया गया है। इस क्षेत्र के नियमन और समुचित विकास के लिए सरकार ने पेंशन फंड रेग्‍युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी यानी पीएफआरडीए का गठन किया है। असल में यह पेंशन योना न होकरएक निवेश योना है। कर्मचरियों की जमा रकम का 50 फीसदी धन इक्‍विटी निवेश में लगाया जाएगा। इस निवेश का रिर्टन एनपीएस को नियंत्रित करने वाले एसबीआई व यूटीआई समेत छह म्‍युचुअल फंड के गैर-परिसंपत्ति मूल्‍य यानी एनएवी के आधार पर मिलेगा।

पेंशन योजनाओं में भागीदारी
भारत में अपनाए गए आर्थिक उदारीकरण के वर्तमान समय में सरकार ने भारत में पेंशन योजना लागू करने के लिए विदेशी कंपनियों और पेंशन फंडों के भागीदारी करने की अनुमति प्रदान की है। ये विदेशी कंपनियाँ अपने भारतीय प्रति‍पक्षियों के सहयोग से ही बीमा एवं पेंशन फंडों का कारोबार करने में समर्थ होंगी। निजी क्षेत्र की वित्‍तीय कंपनियों ने विदेशी साझेदारों के साथ लोकप्रिय पेंशन योजनाएं पेश की हैं। इन कंपनियों में बजाज एलायंस, टाटा-एआईजी, बिडला सन, भारतीय एएक्‍सए, आईएनजीवैश्‍य, फ्यूचर जनरली, एजियान रेलिगएवं आईसीआईसीआई प्रूस्‍डेंशियल प्रमुख हैं, जो भारत में अपनी पेंशन योजनाएं चला रही हैं। भारतीय जीवन बीमा निगम एवं भारतीय स्‍टेट बैंक जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के निगम तथा कोटक लाइफ एवं सहारा लाइफ जैसी निजी क्षेत्र की कंपनियाँ भी भारतीय नागरिकों के लिए पेंशन योजनाएं प्रदान कर रही हैं।

भारलतीय जीवन बीमा निगम भारत में जीवन निधि, जीवन अक्षय, जीवन धारा एवं जीवन सुरक्षा नामक चार पेंशन योजनाएँ चला रहा है। इन योजनाओं के माध्‍यम से पॉलिसीधारक चुनी गई समयावधि के लिए नियमित आय की व्‍यवस्‍था कर लेता है। कामकाजी लोगों का इन पेंशन योंजनाओं में निवेश करने का उद्देश्‍य अपना भविष्‍य सुरक्षित करने का है। सार्वजनिक क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र अथवा निजी क्षेत्र के कर्मचारी जब देखते हैं कि भविष्‍य में उनके पास पेंशन के अलवा आय का कोई स्‍त्रोत नहीं है, तो वे अपनी वित्‍तीय सुरक्षा सुनिश्‍चित करने के लिए पेंशन योजनाओं को चुनते हैं।

पेंशन विनियामक का विचार
सरकार और निजी क्षेत्र के पेंशन फंडों हेतु अर्जित राशि का संरचनात्‍मक विकास अथवा इक्‍विटी बॉण्‍ड आदि में निवेश किया जाता है। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए पेशन नियामक ने राष्‍ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) के अंतर्गत संरचनात्‍मक विकास में निवेश के किसी भी स्‍वरूप पर आपत्ति जताई है। उल्‍लेखनीय है कि संरचनाऋण कोष तैयार किया जा रहा है और इसकी रूपात्‍मकता का निर्धारण वित्‍त मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है। जहां तक निेवेश का संबंध है, पेंशन उत्‍पाद पूरी तरह बाजार जोखिम से जुड़े हुए हैं और ये सारे जोखिम पेंशन पॉलिसी धारक को ही वहन करने होंगे। पेंशन फंडों के नियमन के लिए नियुक्‍त किए जाने वाले पेंशन फंड मैनेजर अपने विवेक के अनुसार निवेश करेंगे तथा किसी भी क्षेत्र का निर्धारण पीएफआरडीए नहीं करेगा।

पेंशन विनियम में किसी भी प्रकार की प्रतिस्‍पर्धा नहीं है। बीमा कंपनियों के पेंशन उत्‍पादों का नियमन इरडा करेगा, जबकि पीएफआरडीए राष्‍ट्रीय पेंशन योजना का प्रबंधन करेगा। इसलिए इस क्षेत्र में कोई टकराव होने की संभावना ही नहीं है। वित्‍तीय विश्‍लेषक पहले से ही कहतेआ रहे हैं कि राष्‍ट्रीय पेंशन योजना के बहुआयामी स्‍वरूप को देखते हुए लोगों का झुकाव बीमा कंपनियों के पेंशन उत्‍पादों कें बजाय राष्‍ट्रीय पेंशन योजना की तरफ हो जाएगा। इसके लक्षण अभी से दिखाई भी देने लगे हैं।

पेंशन फंड एवं विनियामक विकास प्राधिकरण का कहना है कि बीमा एवं म्‍युचुअल फंडों की तुलना में पेंशन उत्‍पाद अच्‍छा रिटर्न दे रहे हैं। अगर इसके ट्रेथ रिकार्ड को देखें तो स्‍पष्‍ट होता है कि पेंशन उत्‍पादों ने 12 से 14 प्रतिशत तक रिटर्न दिया है। इस समय राष्‍ट्रीय पेंशन योजना के 20 लाख ग्राहक हैं जिनमें से 6 लाख गैर-सरकारी हैं। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि राष्‍ट्रीय पेंशन योजना केवल केन्‍द्र सरकार अथवा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कर्मियों में ही लोकप्रिय है। इस योजना में गैर-सरकारीकर्मी भी सक्रियरूप से भागीदारी कर रहे हैं।

पेंशन योजना की लोकप्रियता का मूल कारण
समय बदलने के साथ-साथ सामाजिक संरचना में भी बहुत तेजी के साथ बदलाव आ रहा है। पहले एक कामकाजी व्‍यक्‍ति पूरे परिवार का पालन-पोषण कर लेता था, उसका एक कारण संयुक्‍त परिवार प्रथा भी रहा है, लेकिन आज आधुनिकतावादी सोच और कैरियर के प्रति युवाओं के मोह के कारण एकल परिवार प्रथा ने जन्‍म ले लिया। युवा वर्ग आत्‍मनिर्भर होने के कुछ ही समय के बाद अपनी पत्‍नी और बच्‍चों के साथ अलग रहने लगता है अथवा किसी सुदूरवर्ती कंपनी में नौकरी करने के लिए काम करने में अक्षम माता-पिता को छोड़ा जाता है। ऐसे वृद्धों के लिए सरकार ने वृद्धावस्‍था पेंशन योजना जैसे कई कार्यक्रम चलाए हैं। ऐसी सामाजिक योजनाओं का असर कभी-न-कभी अर्थव्‍यवस्‍था एवं आर्थिक विकास दर पड़ना स्‍वाभाविक है।

इन सामाजिक उत्‍तरदायित्‍वों को पूरा करते हुए आर्थिक विकास दर पड़ने वाले प्रभाव से बचाने के लिए सरकार द्वारा जारी राष्‍ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) काफी कारगर सिद्ध हो सकती है। इस पेंशन योजना के लिए इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर फंड बनाने की योजना है, जिसके लिए राशि इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर फंड में जमा करानी होगी। इसी फंड से पेंशन योजना क्रियान्‍वित की जा रही है।
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काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहु‍रि करोगो कब इस संदर्भ में यह दोहा सर्वोत्‍तम है क्‍योंकि दोनों ही बातें हमें समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा दे रहे हैं और यह निर्देशित कर रहे हैं कि किसी भी कार्य को करने की उपयोगिता उसके निश्‍चित समय पर करने से ही अधिक है न कि समय पश्‍चात्।

समय के मूल्‍य को पहचान कर उसके अनुकूल कार्य करके ही मनुष्‍य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है तथा उच्‍च लक्ष्‍यों की प्राप्‍ति कर सकता है। समय को ही सर्वोच्‍च धन की संज्ञा भी दी गई जिसे अंग्रजी भाषा में Time is money कहकर सम्‍बोधित किया गया है। समय की उपयोगिता इस प्रकार समझी जा सकती है जब मात्र दो सेकेण्‍ड के अंतराल से (दौड़ में) एक एथेलिट को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित कर दिया जाता है। उस विद्यार्थी की दुविधा से समझी जा सकती है जिसने पूरे वर्ष मेहनत करी और मात्र दो अंकों की कमी के द्वारा असफल रहा। उस मां की पीड़ा समझी जा सकती है जो अपने शिशु को नौ माह गर्भ में रखती हे और जन्‍मोपरान्‍त किसी कारणवश वह स शिशु को खो देती है। समय की बहुत बड़ी भूमिका किसी व्‍यक्‍ति की सफलता और असफलता के रूप में देखी जा सकती है। समय के अनुकूल चलने वाला व्‍यक्‍ति जीवन में सदैव सफलता और अवसरों का सदुपयोग करता हुए आगे बढ़ता रहता है, उसके लिए कोई भी कार्य उसके साहस से बड़ा नहीं होता है। समय की महत्‍ता जीवन में कई रूपों में देखी जा सकती है, एक शिशु का जन्‍म फिर उसकी बाल्‍यावस्‍था, किशोरावस्‍था, युवास्‍था और वृद्धावस्‍था तक उसके जीवन में बहुत सी घटनाओं का आमना-सामना कराते हैं जिनसे उसे विभिन्‍न समस्‍याओं से जूझना, कठिन परिस्थितियों में विचलित न होना, दृढ़ता से अपने व्‍यक्‍तित्‍व को निखारने का अवसर प्राप्‍त होता है। इस अवस्‍थाओं के दौरान व्‍यक्‍ति अपने समक्ष जीवन के कई कटु सत्‍यों से भी रूबरू होता हे और उनका पहचान कर अपने भावी जीवन के लिए अभिाप्रेरित भी होता है। समय के संबंध में महान पुरुषों ने कहा कि समय इतना बलवान होता है कि वह सभी के समक्ष उसके द्वारा किये गये अच्‍छ-बुरे कर्मों का फल देताहै, यदि कोई व्‍यक्‍ति सत्‍कर्म करता है तो यह नि‍श्‍चित है कि उसका परिणाम भी उसे सकारात्‍मक ही प्राप्‍त होता है न कि नकारात्‍मक और दुर्जन को उसके द्वारा किये गये दुर्गुणों को परिणाम भी प्राप्‍त होता है। इस प्रकार सभी मनुष्‍यों को यह कह कर सचेत किया जाता है कि समय का सदुपयोग करें एवं सत्‍कर्मों द्वारा जीवन का उद्वार करें, यदि समय के अनुसार ही किसी बालक को शिक्षित किया जाए तो उसमें शिक्षा के प्रति उत्‍सा‍ह जागृत होगा और वह शिक्षा ग्रहण करने के लिए उत्‍साहित रहेगा, इसी प्रकार यदि किसी बीज को समय से सिचिंत किया जाए खाद दी जाए तो वह निश्‍चित ही भविष्‍य में एक छायादार विशाल वृक्ष के रूप में परिवर्तित होगा, इसी प्रकार यदि समय पर ही अध्‍ययन कर लिया जाए तो परीक्षा में उच्‍च अंकों का प्राप्‍त करना भी तय हो जाता है।

समय का उचित उपयोग किसी व्‍यक्‍ति समूह, समाज, राज्‍य अथवा राष्‍ट्र के हित में ही होता है, यदि समय का उपयोग किसी राष्‍ट्र की उन्‍नति होती है क्‍योंकि सभी नागरिक अपने जीवन का समय उत्‍पाकता के कार्यों में लगाते हैं जिससे उस राष्‍ट्र की अर्थव्‍यवस्‍था को बल मिलता है और वह विकासशील देश से विकसित देशों की श्रेणी में चिन्‍हित किया जाने लगता है। समय का उपयोग व्‍यक्‍ति को परिश्रमी बनाता है, और जीवन के हर पक्ष का निर्देशनकर्ता बनाता है, समय के अनुकूल ही चलकर कोई भी व्‍यक्‍ति अपने जीवन की सभी भौतिक सुख सुविधाओं को प्राप्‍त कर सकता है तथा अपने एवं स्‍वयं से संबंधित सभी व्‍यक्‍तियों का उत्‍थान कर सकता है।

यदि इस तथ्‍य को जांचा जाय कि समय का क्‍या महत्‍व होता है तो यह देखा जा सकता है कि ऐतिहासिक काल से आधुनिक काल तक सभी महान पुरुषों एवं संघर्षरत विद्वानों ने अपने समय का सदैव सदुपयोग ‍किया है जिसके परिणाम में वे आज भी मनुष्‍यों के लिए एक दृष्‍टांत बन पाये हैं। समय का पालन करने वाला व्‍यक्‍ति सदैव अपने वर्तमान को ही नहीं अपितु अपनी दूरदृष्‍टिता से उपने भावी जीवन का भी सरल बना लेता है, समय के अनुकूल ही एक छोटी-सी चीटीं भी अपने लिए भोजन एकत्र करती है ताकि सर्दियों में वह उसका सेवन कर सके जबकि टिड्डा जैसे जीव कभी इस वास्‍तविकता को नहीं समझ पाते और वे अपना जीवन क्षणिक आनंद की प्राप्‍ति मे ही गंवाते रहते हें, अत: हमें चींटी और टिडडा की कहानी से प्रेरणा लेते हुए अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए।

Thursday, 14 February 2019

टेलीफोन की आत्मकथा पर निबंध Telephone ki Atmakatha in Hindi

टेलीफोन की आत्मकथा पर निबंध Telephone ki Atmakatha in Hindi

टेलीफोन की आत्मकथा पर निबंध Telephone ki Atmakatha in Hindi

मैं टेलीफोन हूं। हिंदी प्रेमी मुझे दूरभाष के नाम से जानते हैं। मुझे कौन नहीं जानता? मेरे माध्यम से दूर बैठे व्यक्ति से इस तरह बात हो जाती है मानो वह आपके सामने ही बैठा हूं और मध्य में कोई दीवार हो। इस समय मेरे परिवार की सदस्य संख्या इतनी ज्यादा है कि उनकी गिनती करना कोई आसान काम नहीं। मेरे संबंधियों ने एक कमरे को दूसरे कमरे से, एक नजर को दूसरे नगर से और एक देश को दूसरे देश से इस तरह जोड़ दिया है कि उनके बीच की दूरी मनुष्य को महसूस नहीं होती।
Telephone ki Atmakatha in Hindi

मेरे आविष्कारक का नाम ग्राहम बेल है लेकिन उससे पहले भी कई व्यक्तियों के मन में मेरी कल्पना हिलोरे मार रही थी। सबसे पहले मेरा मस्तक अपने पितामह हेमहोल्टेज के चरणों में श्रद्धा से नत होता था जिन्होंने लहरों की वैज्ञानिक सच्चाई को दुनिया के सामने रखा। इस जर्मन वैज्ञानिक ने दो प्यालों के बीच एकता रखकर दूर तक आवाज भेजने के कई परीक्षण किए लेकिन इस संबंध में उसने एक बहुत ही महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी। इसमें प्रतिपादित सिद्धांत ही मेरे जन्मदाता ग्राहम बेल की प्रेरणा के स्त्रोत सिद्ध हुए। सन् 1821 में चार्ल्स व्हीटस्टोन ने भी अपने अद्भुत यंत्र द्वारा दूर तक आवाज पहुंचाने के अनेक परीक्षण किए। जर्मनी के एक अन्य वैज्ञानिक ने इस दिशा में कुछ प्रयत्न किए लेकिन उसका यंत्र मानव ध्वनि को अधिक दूर तक ले जाने में सफल नहीं हो सका। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक मैं केवल कल्पना की ही वस्तु बना रहा। अंत में, 1876 में ग्राहम बेल इस कल्पना को साकार रुप देने में सफल हुए।
ग्राहम बेल ने अमेरिका के फिलाडेल्फिया नगर में लगने वाली एक प्रदर्शनी में मुझे जनता के सामने रखा। 1 दिन ब्राजील के राजा और रानी प्रदर्शनी देखने आए उन्होंने मेरा प्रयोग करके देखा और अनायास ही उनके मुंह से निकल पड़ा है भगवान यह तो बोलता है। महान अंग्रेज वैज्ञानिक केल्विन ने भी मुझे इस प्रदर्शनी में देखा। अब लोग मुझ में रुचि लेने लगे थे। कुछ ही समय में मेरा तथा मेरे जन्मदाता का नाम सारी दुनिया में फैल गया। जगह-जगह टेलीफोन फैलाने का काम शुरु हो गया और बहुत ही कम समय में मैं सारी दुनिया में एक लोकप्रिय वस्तु बन गया।
मार्च, 1976 में मैं अपने जीवन की पूरी कर चुका हूं। मैं पहले पहल जिस रूप में मुझे जन्म दिया था और उसने और मेरे आज के रूप में बहुत अंतर आ गया है। मैं तो मैं बहुत लंबा तथा भारी था। कान से सुनने और मुंह से बोलने के लिए एक यंत्र होता है जिसे अंग्रेजी में कहते हैं रिसीवर कहते हैं।
तुमने मेरा इतिहास तो जान लिया लेकिन शायद अब यह जानने के लिए अचूक होगी उत्सुक होगे कि मैं किस जादू के जोर पर तुम्हारी आवाज मिलो दूर बैठे तुम्हारे मित्र के पास पहुंचा देता हूं।
जिसे तुम रिसीवर कहते हो उसके बोलने वाले हिस्से के अंदर धातु की एक शक्ति और पतली पतरी होती है जिसे डिस्क कहते ।हैं इस डिस्क के पीछे कार्बन के पतले तथा छोटे टुकड़े पड़े रहते हैं। जैसे ही तुम बोलते हो तुम्हारी आवाज से इस में कंपन पैदा होता है। यह कंपन जिसे तुम ध्वनि की तरंगे भी कह सकते हो तारों के जरिए दूसरी और सुनने वाले के रिसीवर के कान वाले हिस्से में पहुंच जाता है। रिसीवर के हिस्से में बेलन के आकार का एक टुकड़ा होता है जिसके आगे रेशम के तारों से लिपटा हुआ लोहे का टुकड़ा रहता है। इसका आखिरी छोर तारों से जुड़ा रहता है और इसके बिल्कुल सामने लोहे की एक डिस्क होती है जब बोलने वाले की आवाज का रिसीवर के कान वाले भाग में जाता है और रेशम से लिपटे हुए तार से गुजरता हुआ आयरन के टुकड़े में पहुंचता है तो उसमें चुंबकीय प्रभाव पैदा हो जाता है। आवाज तेज होने पर यह प्रभाव अधिक होता है और धीमी होने पर कम। अब लोहे का टुकड़ा अपने चुंबकीय प्रभाव के कारण लोहे की डिस्क को अपनी ओर खींचता है जिससे एक कंपन पैदा होता है यही तुम्हें शब्दों के रूप में सुनाई देता है। क्यों समझ में आय न यह जादू।
यह तो सामान्य रूप में मैंने तुम्हें अपनी कार्यप्रणाली बता दी लेकिन शायद तुम अधिक विस्तार से मेरी कार्यप्रणाली जानना चाहोगे। सुनो। एक छोटे शहर में एक टेलीफोन केंद्र होता है, केंद्र का काम होता है कि जिस व्यक्ति से तुम बात करना चाहते हो उसका नंबर मिला दे। जब तुम अपना टेलीफोन उठाते हो तो विद्युत तरंगो द्वारा केंद्र की घंटी बजने लगती है। और आपरेटर तुरंत तुम्हारी बात सुनने के लिए रिसीवर उठा लेता है और तुम्हारे मांगे गए नंबर को प्लग द्वारा तुम्हारे नंबर से मिला देता है। अब ऊपर बताए गए सिद्धांत के अनुसार तुम अपने मित्र से बात कर लेते हो। यह रही स्थानीय लोगों से टेलीफोन मिलाने की बात लेकिन अगर तुम किसी दूसरे नगर में बैठे हुए मित्र से टेलीफोन मिलाओ तो उसके लिए तुम्हारे नगर का ऑपरेटर दूसरे केंद्र का नंबर मिला देता है। 1 एक्सचेंज से दूसरे एक्सचेंज को तारों द्वारा जोड़ा जाता है। अब टेलीफोन के तार जमीन के अंदर बिछाई जाने लगे हैं । जमीन के अंदर बिछाई जाने वाले इन तारों को केबिल कहते हैं।
अब मेरी कार्यप्रणाली में पहले से काफी सुधार हो गया है। उदाहरण के लिए बड़े-बड़े शहरों में एक्सचेंज से नंबर मांगने की जरूरत नहीं है। डॉयल नामक अंग की सहायता से यह अपने आप ही हो जाता है। दूसरों शहरों के नंबर भी डायल की सहायता से ही मिलाने का कार्य तेजी से फैलाया जा रहा है ।

इतना ही नहीं अब तो सेल्युलर सेवा रूप में विकास हो चुका है। इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति से चाहे वह कार में घूम रहा हूं, किसी सभा में बैठा हूं या मनोरंजन में संलग्न हो जहां से दूरभाष बहुत दूर है तब भी सेलुलर फोन से संपर्क कर सकता है। अर्थात सेल्यूलर फोन द्वारा किसी भी व्यक्ति से कहीं भी संपर्क किया जा सकता है इसे एअरटेल प्रणाली कहते हैं।
उपग्रह द्वारा मोबाइल टेलीफोन रूप में विकसित विकास ने तो मेरी काया ही पलट दी है। इस सेवा का नाम है जी एन पी सी एस। यह सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी प्रदान करती है। इसके जरिय ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में भी बात की जा सकती है जो संचार संपर्क की दुनिया से सर्वथा अछूते हों। है ना यह आश्चर्य की बात।
नदी की आत्मकथा पर निबंध Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

नदी की आत्मकथा पर निबंध Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

नदी की आत्मकथा पर निबंध Nadi ki Atmakatha Essay in Hindi

Nadi ki Atmakatha
हिमगिरी से निकलकर कल कल छल छल करती निरंतर प्रवाहमान मैं नदी हूं। पर्वतराज मेरी माता है समुद्र मेरा पति है। माता की गोद से निकल कर कहीं धारा के रूप में और कहीं झरने के रूप में इठलाते हुई आगे बढ़ती हुई वसुधा के वक्षस्थल का प्रचालन करती हूं सिंचन करती हूं। अंत में पति अंक में शरण लेती हूं।
हृदय की विशालता देख कर मुझे दरिया कहा गया। सदा सतत बहाव के कारण प्रवाहिणी मेरा नाम पड़ा। जलप्रपात के कारण मुझे निर्झरिणी नाम से पुकारा गया। निरंतर सरकने या चलते रहने के कारण मुझे सरिता नाम दिया गया और अनेक स्त्रोत के कारण स्त्रोतस्विनी कहा गया है। मेरे सर्वाधिक पवित्र रूप को गंगा कहा गया है। गंगा के समानांतर बहने वाले रूप को यमुना नाम से पहचाना गया। दक्षिण भारत की गंगा को गोदावरी कहा गया। सतलुज की सहायक होने के कारण मुझे ऋग्वेद में सरस्वती नाम से पहचाना गया। पवित्रता की इस श्रृंखला में मुझे कावेरी, नर्मदा तथा सिंधु नाम दिए गए।

भूमि सिंचन मेरा धर्म है। मुझसे नहरें निकालकर खेती तक पहुंचाई जाती हैं सिंचाई से भूमि उर्वरा होती है अनाज अधिक पैदा होता है। अन्न ही जीवन का प्राण है। मैं जीवो की प्राणदात्री हूं। मैं पेड़-पौधों का सिंचन करती हूं और प्राणियों की प्यास बुझाती हूं।
मेरी धारा को ऊंचे प्रपात के रूप में परिवर्तित करके विद्युत का उत्पादन किया जाता है। विद्युत वैज्ञानिक संविदा का सूर्य है। भौतिक उन्नति का मूल कारण है। आविष्कार और उद्योगों का प्राण है। यह दैनिक चर्चा में मानव की चेरी है और बुद्धि प्रयोग में वह मानवीय चेतना का कंप्यूटर है। यदि मेरे जल से विद्युत तैयार ना हो तो उन्नति के शिखर पर पहुंची विश्व सभ्यता वसुधा पर औंधी पड़ी कराह रही होगी।

मैं परिवहन के लिए भी उपयोगी माध्यम सिद्ध हुई हूं। परिवहन समृद्धि का अनिवार्य अंग है। प्राचीन काल में तो प्रायः संपूर्ण व्यापार ही मेरे द्वारा होता था किंतु आज जबकि परिवहन के अन्य सुगम साधन विकसित हो चुके हैं तब भी भारत भर में नौका परिवहन योग्य जलमार्गों द्वारा 66 लाख टन सामान की धुलाई की जाती है। यही कारण है कि मेरे तट पर बसे नगर व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।
मेरे जल से प्राणी अपनी प्यास बुझाते हैं, बहता नीर में स्नान करके ना केवल आनंदित होते हैं अपितु स्वास्थ्यवर्धन भी करते हैं। आज का अभिमानी नागरिक कह सकता है कि हम तो नगर निगम द्वारा वितरित जल पीते हैं जो नलों से आता है। अरे! आत्म अभिमानी मानव। यह न भूल कि यह जल मेरा ही है जिसे संग्रहित करके रासायनिक विधि द्वारा शुद्ध तथा पर बनाकर नलों के माध्यम से तुम्हारे पास पहुंचाया जाता है। इसलिए कहती हूं मेरा जल अमृत है और पहाड़ों से जड़ी बूटियों के संपर्क के कारण औषधि युक्त है।
मेरे तट तीर्थ बन गए। शायद इसलिए घाट को तीर्थ कहा गया क्योंकि तीर्थ भवसागर पार करने के घाट ही तो है। सात पुरियों- अयोध्या, मथुरा, माह, काशी, कांची, अवंतिका, तथा द्वारिका एवं असम के पवित्र धार्मिक स्थान मेरे तट पर ही बसे हैं। इतना ही नहीं वर्तमान भारत के बापू महात्मा गांधी और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू लाल नेहरू, बहादुर शास्त्री की समाधियां भी मेरे ही यमुना तट को अलंकृत कर रही हैं। मेरे गंगा जमुना, नर्मदा आदि रूपों को मोक्ष दायिनी का पद प्रदान कर मेरी स्थिति पाई जाती है और आरती उतारी जाती है।

मेरे जल में स्नान पुण्यदायक कृत्य माना गया है। अमावस्या, पूर्णमासी, कार्तिक पूर्णिमा, गंगा दशहरा तथा अन्य पदों पर मेरे दर्शन, स्नान तथा मेरे जल से सूर्य की अर्चना तो हिंदू धर्म में पवित्र धर्म कर्म की कोठी में सम्मिलित हैं।
मैं मानव के आमोद-प्रमोद के काम आई, उसके मनोरंजन का साधन भी बनी। एक ओर मानव मेरी धारा में तैराकी का आनंद लेने लगा तो दूसरी ओर जल क्रीडा से प्रसन्न रहने लगा। नौका विहार का आनंद लेने के लिए तो वह मचल उठा। चांदनी रात हो समवयस्क हमजोलियों की टोली हो, गीत-संगीत का मूड हो, तालियों की गड़गड़ाहट हो, तो उसमें नौका विहार के समय किसका ह्रदय नहीं उछलेगा?
भारतेंदु हरिश्चंद्र तो मेरे रूप को देखते हुए मुग्ध होकर कहते हैं-
नव उज्जवल जलधार हार हीरक सी सोहती।
बिच बिच छहरति बूंद मनु मुक्तामणि पोहति।।
मनो मुग्धकारी फूल के साथ कष्टदायक और चुभने वाले कांटे भी होते हैं। अति शीतल अग्नि प्रकट हो जाती है जिसके कारण बरसाती नाले पवित्र जल को गंदा करने लग जाते हैं तो मेरा जल गंदा हो जाता है। में अमर्यादित होकर जल प्लावन का दृश्य उपस्थित कर देती हूं। तब मेरे कारण काफी हानि होती है। कुछ काल पश्चात मेरी दुखी आत्मा अपना रोष प्रकट कर पुनः अपने मंगलकारी रूप में परिवर्तित हो जाती है।
मानव मरने के बाद भी मेरी ही शरण में आता है। उसकी अस्थियां मुझे ही समर्पित की जाती है। आदि काल से अब तक कितने ही ऋषि, मुनियों, महापुरुषों, समाज सुधारको, राजनीतिज्ञ और अमर शहीदों के फूलों से मेरा जल उत्तरोत्तर पवित्र हुआ है। अतः मेरे पवित्र जल में डुबकी लगाने का अर्थ मात्र स्नान नहीं उन पवित्र आत्माओं के सानिध्य से अपने को कृतार्थ करना भी है।
निर्मल ग्राम योजना पर निबंध Essay on Nirmal Gram Yojana in Hindi

निर्मल ग्राम योजना पर निबंध Essay on Nirmal Gram Yojana in Hindi

निर्मल ग्राम योजना पर निबंध Essay on Nirmal Gram Yojana in Hindi

भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गांवों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए स्‍वच्‍छ, स्‍वास्‍थ्‍यकर एवं साफ सुथरा वातावरण उपलब्‍ध कराना सरकार के ग्रामीण स्‍वच्‍छता कार्यक्रम के समक्ष के लिए प्रमुख चुनौती रही है। सरकारी ग्रामीण स्‍वच्‍छता भारत में 1980 के विश्‍व जल दशक में केन्‍द्र बिन्‍दु बनी जब केन्‍द्रीय ग्रामीण स्‍वच्‍छता कार्यक्रम (सीआरएसपी) 1986 में ग्रामीण क्षेत्रों में स्‍वच्‍छता सुविधाएं उपलब्‍ध कराने के लिए शुरू किया गया था। यह आपूर्ति संचालित, उच्‍च आर्थिक सहायता एवं आधारभूत संरचनाजन्‍य कार्यक्रम के रूप में प्रारंभ हुआ, लेकिन इसने विशेष प्रगति नहीं की। बाद में कुछ राज्‍यों में समुदाय-संचालित, जागरूकता बढ़ाने वाले अभियान की सफलता और सीआरएसपी के मूल्‍यांकन से 1999 में सम्‍पूर्ण स्‍वच्‍छता अभियान (टीएससी) के गठन को बढ़ावा मिला। तब से ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत पेयजल आपूर्ति एवं स्‍वच्‍छता विभाग द्वारा कार्यक्रम के क्रियान्‍वयन की मजबूती के लिए अनेक नए प्रयास किए गए।
Nirmal Gram Yojana
ग्रामीण स्‍वच्‍छता करवेज 2001 में केवल 22 प्रतिशत था, उसे वर्तमान 2010-11 में 70.37 प्रतिशत से अधिक करने के लिए नई नीतियों का उपयोग सफल रहा है। सन् 2005 से संचालित कार्यक्रम में से एक निर्मल ग्राम पुरस्‍कार या एनजीपी रहा है। यह एक समग्र प्रोत्‍साहन राशि आधारित कार्यक्रम है, जो पूर्ण स्‍वच्‍छता कवरेज प्राप्‍त करने वाले तथा खुले में शौच जाने की प्रथा को पूर्णरूपेण समाप्‍त करने वाली पंचायती राज संस्‍थाओं को इनाम देकर उनके प्रयासों को मान्‍यता देता है। पंचायती राज संस्‍थाओं को स्‍वच्‍छता कार्यक्रम अपनाने के लिए बढ़ावा देने के लिए उन पीआरआई को इनाम दिया जाता है, जिन्‍होंने खुले में शौच जाने से मुक्‍त वातावरण का लक्ष्‍य शत-प्रतिशत अर्जित कर लिया है। निर्मल ग्राम पुरस्‍कार के अंतर्गत प्रोत्‍साहन राशियों ने स्‍वच्‍छता कवरेज में वृद्धि लाने में योगदान दिया है।

सिक्‍किम पूर्ण-स्‍वच्‍छता कवरेज प्राप्‍त करने वाला देश का पहला निर्मल राज्‍य हो गया है। निर्मल ग्राम पुरस्‍कार की अवधारणा का सामाजिक अभियां‍त्रिकी एवं समुदाय गतिशीलता के एक मात्र अस्‍त्र के रूप में अंतर्राष्‍ट्रीय जयघोष हुआ। इसने ग्रामीण स्‍वच्‍छता जैसे कठिन कार्यक्रम को गति देने में सहायता प्रदान की है। 1999 में टीएससी शुरू होने के बाद औसत कवरेज 2001 से 2004 के मध्‍य 3 प्रतिशत वार्षिक रूप से बढ़ा। 2004 में एनजीपी शुरू होने के बाद औसत कवरेज में प्रत्‍येक वर्ष लगभग 7-8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

एनजीपी प्राप्‍त करने वाली प्रत्‍येक ग्राम पंचायत आस-पास के गांवों में लहर लाने वाला प्रभाव पैदा कर रही है। प्रोत्‍साहन राशि ने पूरे देश में पंचायती राज नेताओं की कल्‍पना शक्‍ति को प्रज्‍वलित कर दिया है तथा उन्‍हें स्‍वच्‍छता का विजेता बना दिया है। यह ग्रामीण स्‍वच्‍छता कवरेज में 2005 से आश्‍चर्यजनक प्रगति के पीछे मुख्‍य प्रवर्तक रही है। एनजीपी के अंतर्गत पिछले 5 वर्षों में निम्‍नलिखित पीआरआई एवं अन्‍य संस्‍थानों ने पुरस्‍कार अर्जित किए हैं:

वर्ष
एनजीपी पाने वाली ग्राम   पंचायतों की संख्‍या
एनजीपी पाने वाली ब्‍लॉक पंचायतों की संख्‍या
एनजीपी पाने वाली जिला पंचायतों की संख्‍या
एनजीपी पाने वाले संस्‍थाओं की संख्‍या
2005
38
2
-
-
2006
760
9
-
4
2007
4945
14
-
9
2008
12144
112
8
10
2009
4566
28
2
-
2010
2808
1
-
-
वर्ष 2010-11 में 21 राज्‍यों की 2808 से अधिक ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्‍कार के लिए चुना गया है, जो इस प्रकार है:

क्र.सं.
राज्‍य का नाम
2010-11 एनजीपी के लिए चुनी गई ग्राम पंचायतें
क्र.सं.
राज्‍य का नाम
2010-11 एनजीपी के लिए चुनी गई ग्राम पंचायतें
1
आंध्र प्रदेश
44
2
अरूणाचल प्रदेश
3
3
असम
2
4
बिहार
13
5
छत्तीसगढ़
172
6
गुजरात
189
7
हरियाणा
259
8
हिमाचल प्रदेश
168
9
कर्नाटक
121
10
केरल
103
11
मध्‍य प्रदेश
344
12
महाराष्‍ट्र
694
13
मेघालय
160
14
मिजोरम
5
15
नागालैंड
23
16
ओडिशा
81
17
पंजाब
51
18
राजस्‍थान
82
19
तमिलनाडु
237
20
उत्तर प्रदेश
44

कुल योग



2808

निर्मल ग्राम की पहल में एक साफ स्‍वास्‍थ्‍यकर एवं स्‍वच्‍छ ग्रामीण भारत की ओर ले जाने की क्षमता है, जहां समुदाय सामन से मार्गदर्शन करता है और समर्थ वातावरण बनाने की दिशा में अपने तरीके कार्य करता है। निर्मल ग्राम पुरस्‍कार चयन किए गए पीआरआई के प्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ाता है और समग्र स्‍वच्‍छता अभियान को देश में लागू करने के लिए प्रोत्‍साहन देता है।
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