Tuesday, 8 February 2022

विचारधारा के अन्त के सिद्धांत को मॉस्कविचोव द्वारा दी गई चुनौती को समझाइये।

विचारधारा के अन्त के सिद्धांत को मॉस्कविचोव द्वारा दी गई चुनौती को समझाइये। 

विचारधारा के अन्त के सिद्धांत को चुनौती : मॉस्कविचोव का विचार

विचारधारा के अन्त के सिद्धांत को सबसे गम्भीर चुनौती मार्क्सवादी विद्वान एल० एन० मॉस्कविचोव (1974) (L.N. Moskvichov) ने दी। उसने इस सिद्धांत पर जैसे आक्रमण ही बोल दिया। सोवियत साम्यवादी दल की केन्द्रीय समिति की सामाजिक विज्ञानों की अकादमी के मार्क्सवादी-लेनिनवादी दर्शन के पद के उपाध्यक्ष मॉस्कविचोव (Moskvichov) ने स्वीकार किया कि मार्क्सवादी इस सिद्धांत के सबसे अधिक स्थिर तथा तीव्र आलोचक हैं; मॉस्कविचोव ने तर्क दिया कि यह सिद्धांत मौलिक रूप से गलत है क्योंकि यह सामाजिक प्रक्रियाओं तथा गतिविधियों का गलत अर्थ लेता है। फिर यह निश्चितविचारधारात्मक कार्यों को पूरा करने में आत्म-विरोधी है क्योंकि यह स्वयं निश्चित सैद्धान्तिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है तथा राज्य से शक्ति विशिष्ट वर्ग के हितों - एकाधिकार पूँजीवाद की अभिव्यक्ति करता है।

मॉस्कविचोव के अनुसार, सिद्धांत के पक्षधरों की निश्चित तथा अत्यन्त उल्लेखनीय सीमाएँ हैं। प्रथम, यह कहा जाता है कि विचारधारा के मद्धिम प्रकाश का प्रकरण सामान्य तौर पर राजनीति में प्रयुक्त न होकर केवल आन्तरिक राजनीति, एक देश या कुछ देशों के समूह की सीमा के अन्तर्गत राजनीतिक सम्बन्धों पर ही लागू होता है। दूसरे, उनके मस्तिष्क में केवल यूरोप, उत्तरी अमरीका के औद्योगिक दष्टि से विकसित राज्य तथा समाजवादी राज्य ही हैं। विचारधारात्मक दृष्टिकोण एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमरीका के विकासशील देशों में राजनीति तथा समाजीय-वर्ग सम्बन्धों पर भी लागू होता है। तीसरे, पश्चिम के औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में विचारधारा के अन्त का अर्थ यह तो नहीं कि विचारधारा का अन्त हो गया है। या किसी राजनीतिक या विचारधारात्मक भिन्नता की अनुपस्थिति है। इसके लेखकों तथा समर्थकों के अनुसार 'विचारधारात्मक भिन्नता की अनुपस्थिति है। इसके लेखकों तथा समर्थकों के अनुसार 'विचारधारा के अन्त' अर्थ केवल इतना है कि प्रथम, तथाकथित व्यापक विचारधाराएँ अब जन-राजनीतिक क्रियाओं का मार्ग-दर्शन नहीं करतीं तथा यह सबसे पहले मार्क्सवाद-लेनिनवाद पर लागू होता है; तथा दूसरे, उन्नत पूँजीवादी राज्यों में तीव्र विचारधारात्मक तथा राजनीतिक विवाद से धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं

आगे तर्क देते हुए मॉस्कविचोव कहता है कि बूर्जुआ बुद्धिजीवियों द्वारा विकसित विभिन्न सिद्धांत मार्क्सवाद-लेनिनवाद को बदनाम करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। उनके लिए विचारधारा सामाजिक वास्तविकता को समझने का स्वरूप नहीं अपितु राजनीतिक, आर्थिक, नैतिक तथा अन्य आदर्शों को न्यायसंगत प्रकट करने का एक साधन मात्र है। वह कहता है : 'बुर्जुआ विचारधारा' पर एक संकट ने आक्रमण किया है। यह संकट पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत संरचनात्मक परिवर्तनों में प्रतिबिम्बित होता है। विचारधारा के अन्त का सिद्धांत इस संकट के सबसे स्वाभाविक प्रकटीकरणों में से एक है। यह सिद्धांत प्राथमिक रूप में नई समस्याओं के प्रति बर्जआ (Bourgeoise) दृष्टिकोण की सैद्धान्तिक अभिव्यक्ति है तथा यह अभिव्यक्ति राज्य-एकाधिकार-नौकरशाही के हितों की संरचना से निर्देशित होती है। इसका विचारधारात्मक उद्देश्य एकाधिकारों तथा बूर्जुआ (Bourgeoise) राज्य के गिर्द, जहाँ तक सम्भव हो. सामाजिक तथा राजनीतिक शक्तियों का एकीकरण करना होता है तथा विचारधारा के अन्त का सिद्धांत उन्हें ऐसे एकीकरण के लिए सैद्धान्तिक तथा विचारधारात्मक आधार प्रदान करता है।

इस सिद्धांत की कड़ी आलोचना करते हुए मॉस्कविचोव कहता है कि विचारधारा के अन्त के सिद्धांत में असभ्य तथा घटिया प्रचार के तत्व सम्मिलित हैं। इस सिद्धांत के लेखकों ने अपने पूर्वजों तथा समकालीनों के विचारधारात्मक सम्मान में सम्मिलित धारणाओं, जैसे 'आधुनिकीकर्ता पूँजीवाद', 'कल्याणकारी राज्य', 'प्रबन्धकीय क्रान्ति', 'श्रमिक वर्ग का बूर्जुआकरण' सर्व-शक्तिमान् तकनीकीतन्त्र वर्ग शांति तथा साम्यवाद के भय को स्वीकार करते हैं। पश्चिमी विद्वानों द्वारा विचारधारा के अन्त की ओर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने के कई कारण हैं। पश्चिमी विद्वानों द्वारा विचारधारा के अन्त की ओर बहत अधिक ध्यान दिए जाने के कई कारण हैं। पश्चिमी विद्वानों द्वारा विचारधारा के अन्त की ओर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने के कारण हैं। सर्वोपरि, लोगों के मनों पर अविभाजित शासन रखने के लिए, श्रमिक लोगों, जो बूर्जुआ विचारधारात्मक सिद्धान्तों तथा क्षेत्रों में तेजी से विश्वास खो रहे हैं, के ऊपर विचारधारात्मक तथा मनोवैज्ञानिक दबाव के पेचों को कसने के लिए बड़े पैमाने पर एकाधिकार-पूँजी द्वारा परिश्रम। मनोवैज्ञानिक दबाव तथा प्रचार का प्रयोग करने की इच्छा सभी साम्राज्यवादी विचारधाराओं तथा जनता के लिए बनाई गई प्रचार के लिए एक विलक्षण गुण होता है। फिर, विरोधी सामाजिक व्यवस्थाओं-समाजवाद तथा पूँजीवाद के संसार में विचारधारा का संघर्ष भी बढ़ता जा रहा है। 1950 के दशक के अन्तिम तथा 1960 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय रूप में विकसित होने वाली स्थिति में विचारधारा का अन्त' का नारा साम्यवाद-विरोधी योजना के रूप में कार्य करता रहा। तीसरे, जर्मनी, इटली तथा अन्य निकटवर्ती राज्यों में फासीवादी विचारधारा के जंगली और असभ्य परिणामों तथा अमानवीय सार के सम्बन्ध में पश्चिम में विस्तृत रूप से प्रसारित जागृति तथा सम्बद्धता की भावना भी है। बहुत-से लोग कुछ पूँजीवादी देशों में उत्पन्न नव-नाजीवाद (Neo-Nazism) का विकास, दक्षिण पक्ष का उग्रवाद (Rightwing extremism) तथा नस्लवादी विश्व के विकास का निरीक्षण करते हुए वाकिन्ज (Watkins) यह भविष्यवाणी करने में नहीं हिचका कि “जहाँ तक अधिकतर विश्व का सम्बन्ध है, बीसवीं शताब्दी विचारधारा के अन्त के रूप में नहीं बल्कि विचारधारा के आरम्भ के युग में इतिहास लिखे जाने के लिए वचनबद्ध है।"

बेल तथा लिप्से ने भी एशिया तथा अफ्रीका में 'विचारधारा के उदय' के विचार की पुष्टि की। लिप्से ने विचार दिया कि “नए राज्यों में अभी भी तीव्र विवाद तथा विचारधारा की आवश्यकता है। औद्योगिकीकरण, धर्म का स्थान तथा राजनीतिक संस्थानों के चरित्र के विषय अभी भी निश्चित नहीं किए गए हैं और समस्याएँ अभी भी बिना समाधान के नहीं खड़ी हैं तथा उनके विषय में तर्क अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष से सम्बन्धित हो गए हैं।"

बेल ने भी लिप्से के साथ सहमति प्रकट की तथा उसने कहा कि, “असाधारण तथ्य यह है कि जबकि उन्नीसवीं शताब्दी की पुरानी विचारधाराएँ तथा बौद्धिक चर्चाएँ समाप्त हो चुकी हैं, एशिया तथा अफ्रीका के नए उभरने वाले राज्य अपने लोगों के प्रति एक भिन्न दृष्टिकोण के साथ नई विचारधाराओं को अपना रहे हैं।


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