Sunday, 6 February 2022

व्यवहारवाद के अर्थ, विशेषता एवं उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।

व्यवहारवाद का अर्थ, विशेषता एवं उद्देश्यों की विवेचना कीजिए।

  1. व्यवहारवाद से क्या तात्पर्य है ?
  2. व्यवहारवाद की परिभाषा बताइए। 
  3. व्यवहारवाद की प्रमुख विशेषताएं / लक्षण बताइये। 

व्यवहारवादी दृष्टिकोण या व्यवहारवाद के तात्पर्य के विषय में विद्वानों के दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न हैं। कुछ व्यवहारवादी इसे केवल एक मनोदशा (Mood) या मनोवृत्ति (Attitude) मानते हैं तथा कुछ के अनुसार व्यवहारवाद एक कार्यविधि है। डेविड ईस्टन के व्यवहारवाद को वैज्ञानिक मनोदशा का प्रतिबिम्ब कहा है। उनकी दृष्टि में यह बौद्धिक प्रवृत्ति और 'तथ्यात्मक शैक्षणिक आन्दोलन' (Concrete academic Movement) है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि व्यवहारवाद का निश्चित अर्थ करना कठिन है। इसके पश्चात् भी किर्क पैट्रिक का मत वर्तमान परिस्थितियों में सर्वमान्य है, “व्यवहारवाद का तात्पर्य निश्चित है। राजनीतिक जीवन के अध्ययन में इसके अन्तर्गत धारणाएँ, क्रिया विधियन तकनीक, लक्षण आदि आते हैं। अतः व्यवहारवाद को समझने के लिए सभी का अध्ययन करना चाहिए।"

व्यवहारवाद की परिभाषा

लेखक परिभाषा 
एस० पी० वर्मा के अनुसारव्यवहारवाद के अध्ययन दृष्टिकोण हैं, जिसका उद्देश्य राजनीतिक जीवन के आनुभविक पहलुओं का स्पष्टीकरण देते हुए हमारी राजनीति की समझ को बढ़ाना है।
डहल के अनुसारव्यवहारवाद विषय के आनुभविक तत्त्वों को अधिक वैज्ञानिक बनाने के प्रयत्न से अधिक कुछ नहीं है।
डेविड टूमैन के अनुसारव्यवहारवाद एक ऐसे विचार का प्रतिनिधित्व करता है जिसका उद्देश्य सभी राजनीतिक घटनाओं को मानव के अवलोकित तथा अवलोकनात्मक व्यवहार बढ़ाना है।
अल्फेड डी० ग्राजिया के अनुसारव्यवहारवादी राजनीति विज्ञान अपने आप में एक विषय, एक अन्तः शास्त्रीय विज्ञान, परिमाणीकरण, नई प्रविधियों के आविष्कार का प्रयत्न नहीं है। यह आदर्शवादिता के विपरीत यथार्थवादिता, निगमन पद्धति के विपरीत अनुभववाद भी नहीं है अर्थात् यह राजनीति विज्ञान का वह रूप है जिस रूप में कुछ लोग उसे अब देखना चाहते हैं।
डेविड ईस्टन के अनुसारव्यवहारवाद एक विशेष मनोस्थिति मात्र नहीं है वरन उससे कुछ अधिक है, इस अर्थ में कि शोधकर्ता जब राजनीतिक व्यवहार की संकल्पना को आधार मानकर कार्य करता है तो वह राजनीतिक व्यवस्थाओं में भाग लेने वाले घटकों को व्यक्तियों के रूप में देखता है। व्यवहारवादी शोध वास्तविक व्यक्ति पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करती है।

व्यवहारवाद अथवा व्यवहारवादी क्रान्ति एक राजनीतिक घटना है। इसकी उत्पत्ति वास्तव में परम्परावादी राजनीतिशास्त्र की कमियों के कारण हुई है। जब राजनीतिक विज्ञान के विद्वानों ने परम्परागत पद्धतियों में निराशाजनक परिणाम देखे तो वे नई पद्वतियों को खोजने की ओर अग्रसर हए। इसी क्रम में, विशेषतः उन्होंने अमेरिका में इस प्रकार की अध्ययन पद्वति की खोज कर ली जिसके द्वारा राजनीतिक घटनाओं का वैज्ञानिक आधार पर अध्ययन राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत सरलतापूर्वक होने लगा। संक्षेप में, कहा जा सकता है कि "व्यवहारवाद एक विशेष मनोस्थिति मात्र नहीं है वरन् उससे कुछ अधिक है, इस अर्थ में कि शोधकर्ता जब राजनीतिक व्यवहार की संकल्पना को आधार मानकर कार्य करता है तो वह राजनीतिक व्यवस्थाओं में भाग लेने वाले घटकों को व्यक्तियों के रूप में देखता है। व्यवहारवादी शोध वास्तविक व्यक्ति पर अपना समस्त ध्यान केन्द्रित करती है।" । 

व्यवहार का उद्देश्य शासन एवं राजनीति सम्बन्धी घटनाओं को देखना तथा उनको मानव व्यवहार के रूप में प्रकट करना है। व्यवहारवाद में राजनीतिशास्त्र को विशद्ध विज्ञान के स्तर पर लाने का एक प्रयास है। इस दृष्टि से व्यवहारवाद के मुख्य आधार वैज्ञानिक शुद्धता, प्रेक्षण, सत्यापन, परीक्षण, परिणाम आदि हैं। व्यवहारवादी चाहते हैं कि राजनीति विज्ञान में भी सामान्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाए।

व्यवहारवाद का उद्देश्य

  1. व्यवहारवाद मानवीय व्यवहार में 'व्यापक सिद्धांत' के निर्माण के कार्य को प्रशस्त करना चाहते थे।

  2. व्यवहारवादियों का प्रमुख उद्देश्य राजनीति विज्ञान को पूर्ण विज्ञान बनाना है, जिससे उसे प्राकृतिक विज्ञानों की श्रेणी में प्रतिष्ठित किया जा सके।

  3. व्यवहारवादियों का उद्देश्य समस्याओं के अध्ययन के स्थान पर व्यक्ति, व्यक्ति-समूह तथा व्यक्ति-व्यवहार का अध्ययन किया जाना है। जिससे कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन मानवीये समस्याओं से सम्बद्ध हो सके।

  4. व्यवहारवाद का उद्देश्य विश्लेषण की नई इकाइयों, नई पद्धतियों, नई तकनीकों, नए तथ्यों तथा एक व्यवस्थित सिद्धांत के विकास को प्राप्त करता है।

  5. व्यवहारवाद का उद्देश्य प्राकृतिक विज्ञानों तथा समाज विज्ञानों के मध्य गुणात्मक निरन्तरता स्थापित करना है।

  6. व्यवहारवाद, चिन्तक राजनीतिक प्रक्रियाओं के अध्ययन को महत्त्व प्रदान करते हैं।

  7. व्यवहारवादी राजनीति विज्ञान को दर्शन, इतिहास अथवा कानून की परिधि से निकालकर विशुद्ध राजनीति विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे

व्यवहारवाद का तात्पर्य व्यवहारवाद के महत्त्व को द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्वीकार किया गया है। इस दृष्टिकोण को विकसित करने का श्रेय अमेरिकी राजनीति वैज्ञानिकों को है। यह दृष्टिकोण राजनीतिक तथ्यों की व्याख्या, विश्लेषण तथा प्रेक्षण नए ढंग से करता है। इसका ध्यान मानव के राजनीतिक व्यवहार पर केन्द्रित रहता है। इस दृष्टिकोण का मानना है कि व्यवहारवाद की  निम्न विशेषताएँ है -

व्यवहारवाद की विशेषताएँ / लक्षण

1. विशुद्ध विज्ञान - राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन शुद्ध विज्ञान के रूप में करना चाहिए । विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग करके निष्कर्षों को इस स्थिति में ले जाना चाहिए जिससे कि वे ठोस सिद्धान्तों का रूप धारण कर लें तथा राजनीति विज्ञान को प्राकृतिक विज्ञानों की श्रेणी में रखा जा सके।


2. मूल्य निरपेक्षता - व्यवहारवाद में व्यक्तिगत मूल्यों को पृथक् रखा जाता है तथा अध्ययनकर्ता को तथ्यों का संग्रह करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना | चाहिए कि उसके मूल्यों तथा मान्यताओं का उत्तरदाता पर प्रभाव नहीं पड़े।


3. सत्यापित या सत्यापन विधि वैधानिकता का आधार है - इस क्रिया के अनुसार मानव-व्यवहार के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी इस प्रकार की हो जिसे वैज्ञानिक विधियों से जाँचा-परखा जा सके। अतः व्यवहार के सम्बन्ध में सामान्यी करणों की प्रामाणिकता परीक्षणीय होनी चाहिए।


4. परिमाणीकरण - व्यवहारवादियों का कथन है कि यथासम्भव मापन और परिमाणीकरण का सहारा लेना चाहिए। राजनीतिक जीवन की पेचीदगियों का शुद्ध व सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए कठोरतम नियमों को अपनाना परमावश्यक है। 


5. नियमितताएँ - यद्यपि मानव के व्यवहार में अनेक असमानताएँ देखने को मिलती हैं, परन्तु यदि मानव व्यवहार का गहन विश्लेषण किया जाए तो उसमें कुछ महत्त्वपूर्ण समानताएँ भी पाई जाती हैं जिन्हें व्याख्यात्मक एवं पूर्वकथनीय मूल्य के लिए सामान्यीकरणों या सिद्धान्तों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।


6. क्रमबद्धीकरण - व्यवहारवादियों का मत है कि शोध या अनुसन्धान कार्य क्रमबद्ध और व्यवस्थित होना चाहिए। दूसरे शब्दों में सिद्धान्त और अनुसन्धान को ज्ञान के एक सम्पूर्ण और व्यवस्थित समूह के घनिष्ठ रूप से अन्तर्ग्रसित भागों में देखना चाहिए। सिद्धान्तहीन शोध का कोई महत्त्व नहीं होता है।


7. एकीकरण - व्यवहारवादी इस विचार को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा उसके बीच सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा अन्य कार्यों के बीच सीमा रेखा को निर्धारित किया जा सकता है, परन्तु किसी भी पक्ष से सम्पूर्ण जीवन को विस्तृत रूप से नहीं समझा जा सकता, इसलिए किसी भी राजनीतिक घटना का अध्ययन करने के लिए आवश्यक है कि समाज की सभी प्रकार की घटनाओं का अध्ययन किया जाए। यदि विभिन्न सामाजिक विज्ञान की इस सम्बद्धता को ध्यान में रखा जाता है, तो इससे राजनीति विज्ञान को सामाजिक विज्ञानों की श्रेणी में लाने में पूर्ण सहायता मिलेगी। इस प्रकार राजनीति विज्ञान तथा राजनीतिक अनुसन्धान अन्य सामाजिक विज्ञानों के शोधों के प्रति तरस्थ नहीं रहना चाहिए।


8. प्रविधियाँ - व्यवहारवादी, अध्ययन सामग्री को प्राप्त करने के लिए शोध के उपकरणों तथा पद्धतियों के उपयोग पर अधिक बल देते हैं। विभिन्न प्रविधियों की सहायता से आँकड़ों को प्राप्त किया जाता है। व्यवहारवादियों का कथन कि प्रविधियाँ तथा उपकरण प्रामाणिक होने चाहिए जिससे व्यवहार का पर्यवेक्षण और विश्लेषण करने के लिए परिशद्ध साधनों की खोज की जा सके परिशुद्धीकरण की प्रक्रिया विकासशील होनी चाहिए।


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