आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताओं पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

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आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएं बताइये।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विशेषताएं

1. आधुनिक सिद्धांत की एक महत्वपूर्ण विशेषता उनकी इतिहास से विमुखता थी। समकालीन राजनीतिक चिन्तकों का मानना है कि सिद्धांत को इतिहास से अलग नहीं किया जाना चाहिए। इन सिद्धांत ने राजनीतिक चिंतन के इतिहास के अध्ययन को पुनर्जीवित किया है।

2. मानव क्रियाओं से सम्बन्धित सम्पूर्ण ज्ञान की कई तरह की व्याख्यायें और पुनर्व्याख्यायें हो सकती हैं। अतः मूल्य-विहीन और तटस्थ राजनीतिक सिद्धांत की धारणा मूलतः गलत है।

3. राजनीतिक सिद्धांत का सम्बन्ध अवधारणाओं के विश्लेषण से भी है। इस सन्दर्भ में राजनैतिक सिद्धांत का कार्यक्षेत्र कुछ मुख्य अवधारणाओं जैसे प्रभुसत्ता, अधिकार, स्वतन्त्रता, न्याय आदि का क्रमबद्ध अध्ययन करना है।

4. राजनीतिक सिद्धांत में आदर्शक तत्व (normative element) भी महत्वपूर्ण है। समकालीन राजनीतिक सिद्धांत का सम्बन्ध एक तरफ हमारी राजनीतिक और नैतिक गतिविधियों के मूल ढाँचों का क्रमबद्ध विस्तार करना है, वहाँ दूसरी तरफ न्याय, स्वतन्त्रता, सार्वजनिक भलाई, सामुदायिक जीवन जैसे प्रमुख राजनीतिक मूल्यों का परीक्षण और उनकी पुनर्व्याख्या करना है।

5 राजनीतिक सिद्धांत का सम्बन्ध अमूर्त सैद्धान्तिक प्रश्नों और विशिष्ट राजनीतिक मुद्दों दोनों से होता है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि उन परिस्थितियों का व्यापक परीक्षण किये बिना जो इनकी उपलब्धि के लिये आवश्यक है, राजनीतिक धारणाओं को उनके सही अर्थों में नहीं समझा जा सकता। राजनीतिक सिद्धांत को समस्याओं के समाधान के प्रति जागरूक होना चाहिए और इन्हें प्रजातन्त्र, बाजार-अर्थव्यवस्था, समान अवसर जैसी समस्याओं की इस सन्दर्भ में जाँच करनी चाहिये। राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक विज्ञान का सैद्धान्तिक पक्ष है, जो प्रेक्षण के आधार पर सिद्धांत निर्माण करने का प्रयत्न करते हैं।

  1. डेविड हैल्ड के अनुसार, आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की चार विशिष्ट विशेषतायें हैं
  2. ये दार्शनिक हैं अर्थात् ये नैतिक और वैचारिक ढाँचों से सम्बन्धित हैं, 
  3. ये आनुभविक हैं, अर्थात् इसका सम्बन्ध विभिन्न अवधारणाओं की व्याख्या करना
  4. ये ऐतिहासिक हैं अर्थात् राजनीतिक सिद्धांत विभिन्न राजनीतिक धाराओं को ऐतिहासिक सन्दर्भ में समझना चाहते हैं,
  5. इनका सामरिक महत्व भी है अर्थात् ये इस सम्भावना का भी मूल्यांकन करते हैं कि हम इतिहास के किस मोड़ पर खड़े हैं और कहाँ पहुँच सकते हैं। इन चारों तत्वों के योग से ही राजनीतिक सिद्धांत की मूलभूत समस्यायें सुलझायी जा सकती हैं।

निष्कर्ष - राजनीतिक सिद्धांत एक निरन्तर चलने वाला संवाद है। राजनीतिक चिंतन और परिकल्पना चलती रहेंगी क्योंकि यह जीवन के उन मूल्यों से सम्बन्धित है जो व्यक्ति के लिये जीने और मरने का प्रश्न होते हैं। सिद्धांत का उद्देश्य सामाजिक वास्तविकता के प्रति हमारी समझ में विस्तार करना और अच्छे जीवन की परिस्थितियाँ पैदा करना होता है। इस सन्दर्भ में क्लासिकी और आनुभविक सिद्धांत में संश्लेषण जरूरी है। राजनीतिक सिद्धांत को विशुद्ध रूप में ना तो दर्शनशास्त्र पर और न ही विज्ञान पर आधारित किया जा सकता है। दर्शनशास्त्र द्वारा उठाये गये मुद्दों का व्यावहारिक स्तर पर परीक्षण करना जरूरी है। इसी तरह राजनीतिक विज्ञान भी भौतिक प्रश्नों की अवज्ञा नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, न्याय, समानता, स्वतन्त्रता आदि के अर्थों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। इसी तरह बेकारी, भ्रष्टाचार, राष्ट्रों के झगड़े, अत्यधिक जनसंख्या, प्रदूषण, जातीय तनाव जैसी समकालीन समस्यायें होती हैं जिनके हल के लिये सभी प्रकार के प्रयत्नों की आवश्यकता है। जहाँ राजनीतिक वैज्ञानिकों का काम इस बात की व्याख्या करना है कि राजनीति के संसार में घटनायें कैसे और क्यों घटती है, वहाँ राजनीतिक दार्शनिकों का काम इस ज्ञान को मानवता की गहन समस्याओं क साथ सम्बन्धित करना है और इस बात की खोज करना है कि समाज में स्वतन्त्रता, समानता, न्याय और भाई-चारे को कैसे बढ़ाया जा सकता है, ताकि लोगों के लिए अच्छे एवं सभ्य जीवन की परिस्थितियाँ पैदा की जा सकें।

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