राजनीति विज्ञान में सिद्धांत निर्माण की समस्याओं को संक्षेप में समझाइये।

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राजनीति विज्ञान में सिद्धांत निर्माण की समस्याओं को संक्षेप में समझाइये।

राजनीति विज्ञान में सिद्धांत निर्माण की समस्याएँ

20वीं शताब्दी को प्रगति और विकास की शताब्दी कहा गया है। उसके बावजूद राजनीति विज्ञान में 'सिद्धांत निर्माण' की गति अत्यन्त धीमी और अवरुद्ध रही। राज विज्ञान के पास न तो कोई सार्वभौमिक वैज्ञानिक सिद्धांत (Universal Scientific Theory) है, न अपने अध्ययन के तकनीकी उपकरण हैं और न ही अपनी विकसित पद्धतियाँ हैं। वस्तुतः राजनीतिक विज्ञान चौराहे पर खड़ा है। राज वैज्ञानिकों को यह ज्ञात नहीं है कि उनकी दिशाएँ कौन-सी हैं और उन्हें किधर जाना है ?

आधुनिक राजनीति विज्ञान में सिद्धांत निर्माण से सम्बन्धित अनेक कठिनाइयाँ और समस्याएँ हैं, जैसे -

  1. राजनीति विज्ञान के सभी सिद्धांत अधूरे हैं, उनमें से कोई भी समस्त व्यवस्था से सम्बन्ध नहीं रखता।
  2. ऐसा कोई वैज्ञानिक सिद्धांत विकसित नहीं हो पाया है जो व्यष्टि एवं समष्टि स्तर पर उच्चतर व्याख्या शक्ति रखता हो।
  3. राजनीतिशास्त्र में अध्ययन के बहुत सारे विविध उपागम हैं किन्तु उनमें से सर्वसम्मत सामन्जस्यपूर्ण राज सिद्धांत का विकास नहीं हो पाया है।
  4. राजनीतिज्ञों का एक बहुत बड़ा वर्ग सिद्धांत निर्माण का विरोधी है। उनके अनुसार सिद्धांत यथार्थ का विरोध व्यवहार में अनपयोगी तथा गमराह करने वाला है। उसका भले ही थोड़ा-बहुत शैक्षिक जगत में महत्व हो सकता है, किन्तु राजनीतिज्ञों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए उसका कोई विशेष महत्व नहीं है। ऐसे निरुद्देश्य कार्य में धन, समय और जनशक्ति को नष्ट करना निरर्थक है।
  5. कुछ आलोचक इस बात को लेकर आक्षेप करते हैं कि व्यवहारवाद आधुनिक राजनीतिशास्त्रियों पर इतना अधिक छा गया है कि इससे लाभ की अपेक्षा हानि हो रही है। मानव व्यवहार का सुनिश्चित परिमाणन अपने आप में कठिन ही नहीं, एक सीमा के बाद निरर्थक भी है। व्यवहार में पद्धतियों पर अत्यधिक जोर दिया जाता है जो अधिकतर वैज्ञानिकता की तलाश का प्रयास कहा जाता है। राजनीति विज्ञान कभी भी प्राकृतिक विज्ञानों के समक्ष स्थान ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि इसकी विषय-वस्तु अर्थात् मनुष्य और संगठित-असंगठित समूहों आदि की प्रकृति प्राकृतिक विज्ञानों से पूर्णतः भिन्न है।
  6. सिद्धांत निर्माण की प्रक्रिया में पुरानी अवधारणाओं के स्थान पर जिन नई अवधारणाों को अपनाया गया है उन पर सहमति नहीं है। हर अवधारणा का अलग-अलग अर्थ लगाया जाता है। जैसे राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति, समाजीकरण, राजनीतिक विकास इत्यादि पर इतना अर्थ विभेद है कि हर लेखक ने इनका अपनी आवश्यकतानुसार प्रयोग किया है। 

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