समाज एवं सिद्धांत की आवश्यकता की विवेचना कीजिए

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समाज एवं सिद्धांत की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।

समाज व सिद्धांत की आवश्यकता

समाज की भूमिका - हम लोग समाज में रहते हैं। किसी उद्देश्य के लिए संगठित मनुष्यों के संमुदाय को समाज कहते हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक शक्तियों का केन्द्रीकरण हुआ। जनता के नाम समूची सत्ता मुट्टीभर अभिजन के हाथों में निहित हो गई। कोटा, परमिट, लाइसेन्स राज ने जनता को अनावश्यक कनूनों, नियमों व बन्धनों में जकड़ लिया गया।

मैकाइवर के शब्दों में, समाज शब्द का प्रयोग सामाजिक सम्बन्धों के ताने-बाने का अध्ययन करने के लिए किया जाता है। कालान्तर में राज्य नाम की संस्था का उदय हुआ यद्यपि मैकाइवर के अनुसार-“राज्य समाज के भीतर स्थित है। तथापि धीरे-धीरे राज्य समाज पर छा गया, राज्य सर्वोपरि संस्था बन गया। समाजवादी व लोक कल्याणकारी राज्य के सिद्धांतों में राज्य की भूमिका में वृद्धि की। वे राज्य के माध्यम से ही समस्त आर्थिक व्यवस्था का संगलन करने लगे। फलतः राज्य की शक्तियों में वृद्धि हुई, राज्य एक प्रशासकीय राज्य बन गया।"

अर्नेस्ट बार्कर के शब्दों में-“समाज का क्षेत्र ऐच्छिक सहयोग है उसकी शक्ति सम्भावना में निहित है, उसकी कार्यपद्धति लचीली है जबकि राज्य का क्षेत्र यांत्रिक कार्यवाही है उसकी शक्ति बल में निहित है और उसकी कार्य पद्धति कठोर है।"

लॉस्की के अनुसार - "ये समुदाय राज्य से किसी भी प्रकार कम नहीं है और इस प्रकार से जब समाज का संगठन संघीय है तो शक्ति की व्यवस्था भी संघीय होनी चाहिए।"

बर्कर के अनुसार - “राज्य को समुदाय की बढ़ती हुई महत्ता स्वीकार कर लेनी चाहिए।"

अतः समाज का आशय एक स्वयं सेवी संस्थाओं का सुदृढ़ आधार है जो राज्य और अर्थव्यवस्था के बाहर विकसित होता है। समाज सामाजिक निवास है जिसे पूँजी निर्माण व बाजार व्यवस्था से भिन्न माना जाता है। निजी क्षेत्र की स्वतंत्रता के साथ यह भागीदारी करता है और स्वतंत्र व्यक्ति व समूहों के साथ मिलकर सक्रिय भूमिका का निर्वाह करता है। तथापि निजी क्षेत्र से भिन्न इसका ध्येय सार्वजनिक भलाई, आम सहमति एकात्मकता तथा सामूहिकता है।

सिद्धांत की भूमिका - सिद्धांत का आरम्भ सैद्धान्तिक रूप में, प्राकृतिक विज्ञानों व विशेषकर जीव विज्ञान में हुआ परन्तु सामाजिक विज्ञान में उसका व्यवहार सबसे पहले मानव विज्ञान में होना आरम्भ हुआ इसके बाद समाजशास्त्र में कुछ समय बाद मनोविज्ञान में और काफी समय के पश्चात् राजनीति विज्ञान में हुआ। सन् 1920 के दशक में लुडविग बॉन बर्टलनफी नाम के प्रसिद्ध जीव विज्ञानशास्त्री की रचनाओं में सिद्धांतों की महत्त्वपूर्ण संकल्पनाएँ मानी जाती हैं। सन् 1920-30 ई० में विज्ञान के एकीकरण की आवश्यकता पर बल दिया था। सामाजिक शास्त्रों में इसका प्रारम्भ सबसे पहले सामाजिक विज्ञान में पुर्कह्यूम, रैडफिर्लक ब्राऊन, मालीनाओस्वी की रचनाओं में स्पष्ट हुआ। सामाजिक व राजनीतिक मानव जीवन के क्षेत्र में इन लेखकों ने सैद्धान्तिक आविष्कार किए और यह मर्टन व पार्सन्स के माध्यम से आया। सन 1960 के दशकों के मध्य तक यह दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान की खोज व विश्लेषण की प्रमुख प्रविधि बन गया। राष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्र में डेविड ईस्टन व ग्रेबिम्ल आमण्ड व अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में मार्टन ने इस सिद्धांत के विचारों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया यह सिद्धांत राजनीतिक, सामाजिक व अन्य क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। अन्यथा इनके अभाव में सदढ विकास सम्भव नहीं है।

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