परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विकास की व्याख्या कीजिए।

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परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विकास की व्याख्या कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक का सिद्धांतों प्रारम्भिक विकास

  1. यूनानी राजनीतिक चिंतन - इस युग में न्याय, शिक्षा, आदर्श, शासन व्यवस्था संविधान विधि आदि राजनीतिक विषयों के बारे में विवरण प्रस्तुत किया गया था। इसके प्रतिनिधि दार्शनिक सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा सोफिस्ट थे। इन्होंने यूनानी राजदर्शन समृद्ध करने में अत्यधिक परिश्रम किया था। राजनीतिक सिद्धांतों के क्षेत्र में राजदर्शन का वर्णन निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है
    1. नगर-राज्य की संकल्पना - प्राचीनकाल में यूनान के प्रत्येक नगर को 'राज्य' कहा जाता था तथा उसकी मान्यता एक सामाजिक इकाई के रूप में थी। यह स्वशासित तथा आत्म-निर्भर था तथा सामाजिक इकाई के रूप में स्वीकार किया जाता था। मनुष्य का प्रमुख उद्देश्य यही था कि प्रत्येक प्रकार से समाज का कल्याण हो।
    2. मनुष्य सामाजिक प्राणी के रूप में - “मनुष्य स्वभाव से समाज में रहने के लिये बाधा है।" इस तथ्य को यूनानी राजदर्शन स्पष्ट किया है तथा साथ-ही-साथ उसने मनुष्य को सामाजिक प्राणी के रूप में मान्यता दी है। इसके अनुसार, मन्ष्य समाज में जन्म लेता है और समाज में मृत्यु को प्राप्त होता है। मानव के जन्म के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए समाज एक आवश्यक इकाई है। इस सत्य को भुलाया नहीं जा सकता।
  2. अरस्तू का राजदर्शन - अरस्तू ने अपने युग के राजदर्शन को वैज्ञानिक आधार पर व्यक्त किया। उसके अनुसार, समस्त प्रशासनिक प्रणालियाँ, जैसे-एक-तन्त्र, कुलीन-तन्त्र, जनतन्त्र, भ्रष्ट-तन्त्र, आतताई-तन्त्र का वर्गीकरण तथा राज सत्ता, राज्य व व्यक्ति के सम्बन्ध व्यावहारिक पर आधारित हैं। राजदर्शन में वैज्ञानिकता को लाने वाला वह एक महान् दार्शनिक था। अतः अरस्तू के राजनीतिक दर्शन में आधुनिक व्यवहारवाद, व्यवस्था सिद्धांत, वैज्ञानिक प्रणाली आदि के विचारों का अध्ययन किया जा सकता है। यदि गम्भीरता से विचार किया जाए तो पता चलता है कि राजनीतिक को एक पृथक राज्य के रूप में प्रस्तुत करन का कार्य अरस्तू ने किया है प्लेटो ने नहीं।
  3. प्लेटो का राजदर्शन - प्लेटो ने अपने राजदर्शन को अपने शिधक नशा गुरु सुकरात के जीवन-दर्शन के अनुसार प्रस्तुत किया था। राजदर्शन के लिए रिपब्लिक नामक रचना लिखी। उसे रूसो ने शिक्षाशास्त्र की बहुमूल्य रचना के रूप में व्यक्त किया था। प्लेटो की दृष्टि में राजदर्शन का प्रमुख अंग आदर्श राज्य था। इसके अतिरिक्त, उसने शिक्षा, न्याय तथा स्त्रियों के साम्यवाद के विषय में भी मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किए थे। प्लेटो ने कहा था, "जब तक दार्शनिक राजा और राजा दार्शनिक नहीं होंगे, तब तक नगर राज्य से बुराइयाँ भी दूर नहीं होंगी।"

ईसाइयत की विचारधारा

ईसाइयत शक्ति ने सम्पूर्ण मध्यकालीन विचारधारा को प्रभावित किया। इसका सर्वाधिक प्रभाव यह हुआ कि पोप की सत्ता को अच्छा समझा जाने लगा। अब चर्च का मान बढ़ गया और संगठन का स्वरूप केन्द्रीकरण की ओर बढ़ गया। धर्म ने राजनीति को अपने अंक में समेट लिया।

क्रिश्चियन डान ने लिखा है, "सातवीं शताब्दी तक पोप राजनीतिक कार्यों में भाग लेने लगा। वास्तव में, वह राजनीतिक प्रभूता के ऊपर था। रोम का चच भी रोम साम्राज्य की भांति बन गया।"

इस विचारधारा का प्रभाव निम्न प्रकार रहा .

  1. दास प्रथा को समाप्त किया जाए तथा उनके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए।
  2. ईसाइयत ने राज्य की वास्तविकता को सिद्ध करते हुए बताया कि राज्य ईश्वर प्रदत्त है।
  3. मनुष्य को धन संग्रह की ओर नहीं बढ़ना चाहिए। सम्पत्ति को निर्धनों में बाँट देना चाहिए।
  4. दैवीय नियमों को मानना तथा राज्य के नियमों को प्राकृतिक नियमों के रूप में स्वीकार करना व्यक्ति का परम धर्म है।

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