Sunday, 30 January 2022

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीति विज्ञान के परस्पर सम्बन्ध पर संक्षेप में प्रकाश डालिये।

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीति विज्ञान में परस्पर संबंध बताइये।

अथवा राजनीति विज्ञान एवं सिद्धांत में समानता बताइये।

राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीति विज्ञान में संबंध

राजनीति विज्ञान तथा राजनीति सिद्धांत के परस्पर सम्बन्धों पर तीन दृष्टिकोण बताए जाते हैं

प्रथम के अनुसार सिद्धांत एक व्यापक पद है जिसमें राजनीति विज्ञान समाहित हो जाता है। वह राजनीति दर्शन को भी इसी के अन्तर्गत स्थान देते हैं।

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति विज्ञान अधिक व्यापक शब्द है. जिसमें राजदर्शन, राजनीतिक सिद्धांत एवं राजनीति विज्ञान तीनों का एक समचित स्थान है। पिछले अर्थों में राजविज्ञान जहाँ एक ओर मूल्यों से जुड़ा है, वहाँ उसके सिद्धांत-निर्माण में वैज्ञानिक पद्धतियों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। भारत एवं यूरोपीय विश्वविद्यालय इसी दृष्टिकोण को स्वीकार करते हैं। केवल एक सीमित उग्रव्यवहारवादियों का समुदाय राजविज्ञान को एक ऐसा विश्लेषणात्मक अनुशासन मानता है जिसके मूल्यों एवं असत्यापित सिद्धांतों का यत्किंचित स्थान भी नहीं है। वे मूल्य-निरपेक्षवादी दृष्टिकोण है।

आधुनिक युग में, विशेषतः व्यवहारवादी क्रान्ति एवं वैज्ञानिक पद्धतियों के आविर्भाव के पश्चात् इस विषय (subject) में विज्ञान-तत्व को ही प्रधानता दी जाती है। किन्तु साथ ही साथ मूल्यों एवं सिद्धांत की भूमिका को भी स्वीकार किया जाता है। यद्यपि इनके समुचित सन्तुलन की समस्या निरन्तर बनी रहती है फिर भी, यह स्वीकार किया जाता है कि "वह राजवैज्ञानिक जो सैद्धान्तिक सूक्ष्मताओं से अपिरचित है, असावधान और अपरीक्षणीय प्राक्कल्पनाएँ प्रस्तुत करेगा; अपुष्ट निष्कर्षों को वैज्ञानिक कानूनों की तरह उदघोषित करेगा और टिपूर्ण भविष्य-कथनों में संलग्न रहेगा। वह उस साहित्य को पहचानने में भी असमर्थ रहेगा जो स्वयं के, और दूसरे के कार्यों का मार्ग-दर्शन कर सके क्योंकि वह स्वयं ऐसी शोध प्रायोजनाएँ प्रस्तुत करेगा जिन्हें दूसरे वैज्ञानिकों द्वारा दोहराया और सत्यापित नहीं किया जा सकेगा।

सिद्धांत, विज्ञान और मूल्यों के प्रयोगकर्ताओं के परस्पर सम्बन्धों के विषय में भी विचार करने की आवश्यकता है। पहले विज्ञान और सिद्धांत के विषय में जान लेना चाहिए। कुछ विचारकों के अनुसार सिद्धांत और वैज्ञानिकता का कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। उनके अनुसार यह आवश्यक नहीं है कि कोई सिद्धांत अनिवार्य रूप से वैज्ञानिक हो। इसी प्रकार प्रत्येक वैज्ञानिक विवरण अथवा विश्लेषण का सैद्धान्तिक होना जरूरी नहीं है। केवल पर्यवेक्षण और तथ्यों का विवरण या वर्गीकरण भले ही विज्ञान में महत्वपूर्ण हो, उन्हें सिद्धांत नहीं बनाता। एक तथ्यात्मक शोध बिना सिद्धान्तात्मक हुए, वैज्ञानिक हो सकता है। विज्ञान से यहाँ तात्पर्य वैज्ञानिक विधि से ज्ञान का उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण है।

सिद्धांत और विज्ञान सम्बन्धी कार्य अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा भी किये जा सकते हैं। एक राजसिद्धान्ती (Political theorist) राजवैज्ञानिक को विचार और क्रिया में सम्बद्धता स्थापित करने के लिए सीमित तथ्यात्मक सामान्यीकरण एवं प्राक्कल्पनाएँ दे सकता है। इसी प्रकार वह आधुनिक समस्या सुलझाने में निरत नागरिकों और नीति-निर्माताओं को नैतिक अथवा मूल्यात्मक सुझाव भी दे सकता है। ऐसे सुझाव देने से पहले उसे राजदर्शन के इतिहासकारों की पद्धतियों को त्यागकर अधिक सूक्ष्म पद्धतियों को अपनाना पड़ेगा। राजवैज्ञानिक भी आनुभाविक अध्ययन के आधार पर, मूल्यों को निर्धारण करने वाले सिद्धान्ती, नीति-निर्माता, राजनीतिज्ञ या प्रशासक अथवा नागरिकों को उनके होने वाले परिणामों, दिशाओं आदि के विषय में अभिज्ञान करा सकता है। कुछ विषयों में राजसिद्धान्ती, राजवैज्ञानिक तथा राजनीति-निर्माता की भूमिकाएँ एक कार्यकारी समूह में संयुक्त की जा सकती हैं। इस प्रकार सिद्धांत, विज्ञान और मूल्य एक-दसरे के निकट हैं और इनकी एकता सम्भव है। वैज्ञानिक राजनीतिक सिद्धान्ती दसरों की अपेक्षा जल्दी ही समाज के राजनीतिक जीवन की प्रभविष्णु (potential) एवं तात्कालिक समस्याओं को देखता है, और विश्लेषण करता है। वह एक साथ राजवैज्ञानिक, दार्शनिक, राजदार्शनिक, पद्धति-वैज्ञानिक (methodologist), सलाहकार (consultant), समाज-व्यवस्था का अभियन्ता (engineer), भविष्यदशी आदि की भूमिकाएँ प्रस्तुत कर सकता है, किन्तु एक वैज्ञानिक के रूप में प्रत्येक भूमिका के साथ संलग्न मूल्यों एवं प्रविधियों को दूसरी भूमिकाओं से पृथक् रखना आवश्यक है। इस ग्रन्थ में इसी दृष्टिकोण को अपनाया गया है।


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