Friday, 21 January 2022

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण बताइए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण बताइए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख लक्षण निम्न वर्णित हैं -

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत के प्रमुख लक्षण

  1. समकालीन समस्याओं के समाधान का उद्देश्य
  2. तार्किक तथा निगमनात्मक प्रणाली का प्रयोग
  3. विषय के विशेषीकरण का अभाव
  4. विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता
  5. वैज्ञानिक प्रणाली के प्रयोग का अभाव

समकालीन समस्याओं के समाधान का उद्देश्य - अरस्तू, प्लेटो आदि ने समकालीन समस्याओं के समाधान को ही उद्देश्य बनाया है।

तार्किक तथा निगमनात्मक प्रणाली का प्रयोग - परंपरागत सिद्धांतों में विद्वानों ने निगमनात्मक तार्किक प्रणाली का प्रयोग किया है। यद्यपि प्लेटो ने आगमनात्मक तथा निगमनात्मक दोनों प्रणालियों का समय-समय पर पालन किया था, किन्तु इसके तर्क द्वारा सत्यापित निगमनात्मक प्रणाली का ही प्रयोग किया था। अरस्तू ने एक स्थान पर वैज्ञानिक प्रणाली का प्रयोग अवश्य किया था, परन्तु उसने जिस विधि का प्रयोग किया है वह वास्तव में निगमनात्मक ही थी।

विषय के विशेषीकरण का अभाव - जिस प्रकार विभिन्न ग्रन्थों में जो विषय-सामग्री उपलब्ध है उसका विभाजन करना अत्यधिक कठिन है। परन्तु तथ्यों में वास्तविकता का पुट लाने का प्रयास किया, उदाहरणार्थ-प्लेटो द्वारा लिखित रिपब्लिक को ले सकते हैं। उसमें विषय में यह निष्कर्ष निकालना अत्यधिक कठिन है कि उसको किसके अन्तर्गत रखा जाए। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रस्तुत पुस्तक में जीवन के समस्त विषयों, कार्यों तथा घटनाओं का वर्णन किया गया है। यही कारण है कि रिपब्लिक को राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, मनोविज्ञान तथा नीतिशास्त्र आदि विषयों की उत्कृष्ट रचना माना जाता है। इसी हेतु कहा जाता है कि राजनीतिक सिद्धांत में स्वार्थत्तता तथा स्वायत्तता का अभाव है।

विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में विषय-सामग्री की रूढ़िवादिता पाई जाती है। इस सिद्धांत में प्रायः सभी विचारकों ने अपने पृथक-पृथक अध्ययन का विषय-क्षेत्र बना लिया है। इसके अन्तर्गत राज्य सरकार, राजनीतिक संस्थाएँ, राज्य के लक्ष्य, न्यायप्रियता, लोक कल्याण, राज्य की उत्पत्ति तथा समाज की बुराइयों को दूर करने की बातें ही बताई जाती हैं। इसमें न तो कोई अन्तर पाया जाता है और न नवीनता ही। प्राचीन यूनानी राजदर्शन में आधुनिक राजदर्शन का सृजन ह्यूम तथा वर्क तक सभी ने इन्हीं विषयों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। परन्तु आधुनिक काल में सभी प्रकार की राजनीति के अध्ययन पर विचार किया जाता है।

वैज्ञानिक प्रणाली के प्रयोग का अभाव - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के विभिन्न अंगों में गणितीय परिणाम की वैज्ञानिक प्रणाली का प्रयोग नहीं हुआ है। यह सम्पूर्ण पद्धति अनुभव पर आधारित है। वैसे अरस्तू की अध्ययन पद्धति को वैज्ञानिक कहा जाता है, परन्तु उसे तुलनात्मक पद्धति के साथ-साथ अतीत के संचित अनुभव पर आधारित माना गया है। यही कारण है कि उसमें आधुनिक युग के समान वैज्ञानिक प्रणाली का अभाव है।

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