Sunday, 30 January 2022

डेविड ईस्टन के राजनीतिक सिद्धांत से सम्बन्धित विचारों पर प्रकाश डालिए।

डेविड ईस्टन के राजनीतिक सिद्धांत से सम्बन्धित विचारों पर प्रकाश डालिए।

डेविड ईस्टन का आगत निर्गत सिद्धांत पर टिप्पणी लिखिए। 

डेविड ईस्टन को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण, प्रसार एवं आवश्यकता का सबसे प्रबल समर्थक माना जाता है। उसने प्रारम्भ से ही अपनी सम्पादित पुस्तकों में इस विषय का महत्व बताया है। डेविड ईस्टन को राजनीति विज्ञान का टालकोट पारसन्स माना जाता है। सिद्धांत के अभाव में ईस्टन के अनुसार, स्वयं 'अमरीकी राज-वैज्ञानिक, स्वतन्त्र पैदा होता है किन्तु अति-यथातथ्यवादी अतीत से बँधा होने के कारण, वह सर्वत्र बन्दी है।' सामान्य-सिद्धान्त की अनुचित अवहेलना के कारण, वह अधिक विश्वसनीय ज्ञान के स्रोत से विलग है। उनकी मान्यता है कि इस अनुशासन का भविष्य, उसके भविष्य-निर्देशन एवं सामंजस्य की समस्या हल करने की शर्त राजनीतिक सिद्धांत का विकास है। अनुभवात्मक ज्ञान स्वयं में पर्याप्त नहीं हो सकता। आँकड़ों और तथ्यों की जो बाढ़ आ रही है, उसकी विशाल धारा में स्वयं वैज्ञानिक उद्यमों (enterprises) के ही बह जाने का खतरा है। अनुशासन के आत्मरक्षण की दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि आँकड़ों और तथ्यों के अथाह सागर से निबटा जाय तथा इन्हें नियन्त्रित एवं परिमापित किया जाय। इसके लिए एक सामान्य सिद्धान्त की आवश्यकता है, जो कि अनुशासन के रूप में राजविज्ञान के समस्त विषय-क्षेत्र को दिशा-निर्देश, सामंजस्य एवं व्यवस्था प्रदान कर सके। उसने सिद्धान्त का एक सजनात्मक रूप प्रतिपादित किया है। उसके अनुसार सिद्धान्त एक संवर्गो (categories) का प्रखर आनुभविक संगतिपूर्णता लिये हुए एक ऐसा तर्कपूर्ण एकीकृत सेट है जो कि राजनीतिक जीवन का विश्लेषण एक राजनीतिक व्यवहार-व्यवस्था के रूप में करना सम्भव बनाता है। उसका सिद्धान्त, व्याख्यात्मकता के साथ-साथ राजनीतिक तथ्यों का विश्लेषण करने की योजना भी लिये हए है।

अवधारणात्मक विचारबंध (Conceptual Framework)

डेविड ईस्टन ने अपने सिद्धांत को 'अवधारणात्मक विचारबंध' अथवा वैचारिक रूपरेखा के रूप में रखा है। ईस्टन की केन्द्रीय विषय-सामग्री 'राजनीति' है। यह राजनीति मूल्यों के आबंटन या बँटवारे से सम्बन्धित होती है। पद, शक्ति, प्रभाव, प्रशंसा, सुविधाएँ आदि को मूल्य कहा जाता है। वह समाज के लिए मूल्यों के प्रावधान से सम्बन्धित गतिविधियों को 'राजनीति' कहता है। इन मूल्यों के विनिधान या विनियोजन से सम्बन्धित गतिविधियों का विश्लेषण व्यवहारवादी एवं वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में पहले प्राक्कल्पनाएँ या परिकल्पनाएँ (hypothesis) आयेंगी। उनका आनुभविक अवलोकन एवं विश्लेषण करने के बाद सिद्धांत अथवा सामान्यीकरण (generalisations) प्राप्त होंगे। राजनीति को अच्छी तरह एवं पूर्णता से समझने के लिए उसने 'व्यवस्था' की धारणा दी है।

डेविड ईस्टन का अवधारणात्मक-विचारबन्ध

'अवधारणात्मक विचारबंध' में अवधारणाएँ या प्रत्यय (concepts) एवं प्रारूप (models) मिले होते हैं। उसका उद्देश्य सिद्धान्त का निर्माण करना होता है; जैसे, व्यवस्था-विश्लेषण, संरचनात्मक-प्रकार्यवाद, समूह सिद्धान्त आदि। इनमें से प्रत्येक अपने-अपने दृष्टिकोण से विषय-सामग्री, उसका चयन, प्रेक्षण, वर्गीकरण आदि करता है। अवधारणात्मक विचारबंध, जिसे सरल शब्दों में वैचारिक रूपरेखा भी कहा गया है, शोधक (researcher) या अध्येता को अनुसंधान की एक अमूर्त परियोजना (scheme) देता हुआ मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसके सहारे वह अपनी विषय-सामग्री का अन्वेषण, निर्धारण, अवलोकन, वर्गीकरण और एकीकरण करता है। विचारबंध के दो प्रकार हो सकते हैं

  1. राजनीतिक इकाइयों सम्बन्धी
  2. राजनीतिक प्रक्रियाओं सम्बन्धी।

इकाइयों में व्यक्ति, समूह संस्कृति, संगठन आदि आते हैं। प्रक्रियाओं में घटनाओं के लम्बे अनक्रम या सिलसिले का अध्ययन किया जाता है। इकाइयों में राजनीतिक घटना का, किसी निश्चित समय पर अध्ययन किया जाता है। इससे अवलोकन स्थैतिक हो जाता है। संचारण (communications), निर्णयन (decision-making), शक्ति आदि से सम्बन्धित सिद्धान्त प्रक्रियात्मक होते हैं। ये विचारबंध गतिमान (dynamic) माने जाते हैं।

व्याख्या (explanation) में, विचारबंध की उपयोगिता बताते हुए मीहान ने लिखा है कि सामाजिक वातावरण में परिवर्तन के कारण व्याख्या की आवश्यकता पड़ती है। इस उद्देश्य के लिए प्रेक्षक या अध्येता को वातावरण से कतिपय चरों, परिवों या कारकों का चयन करना पड़ता है। इनके आधार पर परिवर्तन की व्याख्या की जाती है।

होता यह है कि परिवर्तन या घटना का प्रकार उन चरों के चयन को निर्धारित करता है, और चरों का चयन अवधारणात्मक विचारबंध का निर्धारण करता है। इसकी सहायता से प्रेक्षक एक ओर अतिशय संकुचित दृष्टि से कुएँ, तथा दूसरी ओर अतिशय व्यापकता की खाई में, गिरने से बच जाता है। ईस्टन ने राजविज्ञान के अनुशासन को व्यवस्थित करने के लिए व्यापक विचारबंध की आवश्यकता पर बल दिया है। उसके अनुसार, राजनीतिक व्यवस्था या राजव्यवस्था (Political system) के उपयुक्त विश्लेषण के लिए ऐसा विचारबंध आवश्यक है। इसके द्वारा राजनीति के चरों को पहचाना तथा उनके पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन किया जा सकता है। इसे शोध का 'मास्टर-प्लान' या 'विश्लेषण परियोजना' माना जाना चाहिए। इससे शोध को अर्थ, सुसंगति और उपयोगिता मिल जाती है।

वस्तुतः कोई भी अनुसंधान किसी अवधारणात्मक विचारबंध को अपनाये बिना नहीं किया जा सकता है। अनुसंधान विचारबंध के भीतर रहकर ही किया जाता है। इसका अर्थ है कि कतिपय तथ्यों का चयन एवं वर्गीकरण किया जाये। फिर, उन वर्गों को अपेक्षाकृत बड़े वर्गों में रखकर 'प्रकारणाएँ' (typologies) बनायी जायें। यह सब करने से पहले आवश्यक है कि तथ्यों का चयन या वर्गीकरण करने से पूर्व अपनी विषय-सामग्री को स्पष्ट रूप से जान लिया जाये।

दूसरे शब्दों में, पहले परिकल्पित (hypothetical) 'सिद्धान्त' या 'व्यवस्थाएं' सोच ली जाएँ। ईस्टन ने इसी रूप में 'व्यवस्था-सिद्धान्त' के अवधारणात्मक विचारबंध को अपनाया है। यह स्पष्ट है कि ईस्टन ने सिद्धान्त को राजनीति के व्यवस्थित अध्ययन कर सकने के प्रयोगात्मक प्रयास के रूप में ग्रहण किया है। वह उसे एक अवधारणात्मक फ्रेम या सांचे के रूप में प्रस्तावित करता है। इस प्रकार उसकी सिद्धान्त सम्बन्धी विचार-धारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से केवल मात्र एक रूपरेखा अथवा एक व्यापक विषय-परिधि (frame of reference) के समान है। वह अपने सिद्धान्त में नैतिक तथ्यों और मूल्यों को भी प्रधान स्थान देता है, जिससे सैद्धान्तिक वैज्ञानिकता और भी अधिक विवादग्रस्त बन जाती है। मीहान ने स्थिति की समीक्षा इस प्रकार की है, 'पारसन्स की तरह, ईस्टन सिद्धान्त को, व्याख्या की शब्दावली में नहीं, किन्तु अवधारणात्मक विचारबंध (conceptual framework) के अर्थों में सोचता है। इसका परिणाम एक ऐसी अमूर्त संरचना है जो कि तार्किक दृष्टि से संदेहास्पद, अवधारणात्मक आधार पर धुंधली और आनुभविकता के बिन्दु से अनुपयोगी है।'

इस प्रकार, डेविड ईस्टन के विचार आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त की धारणानुसार वैज्ञानिक नहीं माने जा सकते। यद्यपि उसी ने अनुशासन की स्वायत्तता, विकास और एकरूपता की दृष्टि से सिद्धान्त के निर्माण और प्रसार पर सर्वाधिक जोर दिया है। आधुनिक राजनीतिक सिद्धान्त का अर्थ मुख्य रूप से वैज्ञानिक सिद्धान्त ही है। राजनीतिक दर्शन उसमें चिन्तनात्मक स्थापनाएँ (speculative thesis) या प्रस्तावनाएँ जोड़ सकता है किन्तु उनका स्थान कार्यकारी प्राक्कल्पनाओं (working hypothesis) का ही रहेगा, न कि सत्यापित वैज्ञानिक ज्ञान के स्तर का।


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