आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिये।

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आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिये।

आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की कमियाँ

  1. पद्धति सम्बन्धी नवीन समस्या - यदि एक ओर राजनीतिक सिद्धांत के निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति की कमी है, तो दूसरी ओर उसके विकास में वैज्ञानिक पद्धति का अधिकाधिक प्रयोग भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है। इसका कारण यह है कि सिद्धांत को आधुनिकता के रंग में रंगने के लिये उसमें अनेक कमियाँ आ गई हैं उदाहरणार्थ - डेविड ईस्टन की व्यवस्था सिद्धांत व्यावहारिक तथा व्यापक होते हुए भी आनुभाविक नहीं है।
  2. वैज्ञानिक कौशल के विकास का अभाव - राजनीतिक विज्ञान में उस वैज्ञानिकता को स्थान नहीं मिल पाया है जिनका सम्बन्ध वैज्ञानिक उपकरणों, विधियों, प्रविधियों तथा वैज्ञानिक उपागमों से है। राजनीतिक सिद्धांत में अभी तक वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुरूप व्यक्ति के व्यवहार का विकास नहीं हो पाया है। मानवीय व्यवहार के अध्ययन के निश्चित सिद्धान्तों का अभाव पाया जाता है। यही कारण है कि राजनीति विज्ञान में अभी तक वैज्ञानिक कौशल के विकास की कमी है।
  3. अन्य विज्ञानों से सम्बन्ध - राजनीतिक सिद्धांत के द्वारा राजनीति विज्ञान का सम्बन्ध अन्य विज्ञानों से स्थापित करना भी आवश्यक है जिससे उसमें अनुसन्धान की सम्भावनाएँ उत्पन्न हो सकें, परन्तु इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिये राजनीति विज्ञान को सिद्धान्तों की सीमाओं में बाँधना आवश्यक नहीं है। .
  4. सामान्य राजनीतिक सिद्धांत सम्भव नहीं - राजनीति विज्ञान में वास्तव में सामान्य राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण सम्भव नहीं है। उसका कोई विशेष महत्त्व भी नहीं है। इस प्रकार के विचार प्रकट करने वाले विचारकों का मत है कि सामान्य सिद्धांत का विचार सैद्धान्तिक क्षेत्र में तो लागू किया जा सकता है किन्तु व्यावहारिक क्षेत्र में वह कारगार नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि राजनीतिक सिद्धांत की विषय-वस्तु मानव है जिसका व्यवहार और प्रकृति परिवर्तनशील है। वह देश, काल तथा परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि सामान्य राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण कठिन है।
  5. मूल्यों की समस्या - आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में मूल्यों की भी एक गम्भीर समस्या है। मूल्यों के कारण राजनीति के विद्वानों ने अपने-अपने अलग वर्ग बना लिये हैं। पहला वर्ग इस तथ्य पर जोर देता है कि राजनीति विज्ञान को मूल्य-निरपेक्ष बना दिया जाए। दूसरा वर्ग मूल्यों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करने का इच्छुक है। तीसरा वर्ग दोनों विचारकों के मध्य का मार्ग अपनाना चाहता है।
  6. विषय-सामग्री परिवर्तनशील - राजनीति विज्ञान की विषय सामग्री एक-सी नहीं रहती है। वह परिवर्तन होती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि वर्तमान यथार्थवादी सिद्धांत कालान्तर में अयथार्थवादी बन जाता है। इससे एक गम्भीर समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  7. प्राकृतिक विज्ञान के समान होना असम्भव - राजनीति विज्ञान में कतिपय विद्वान मानते हैं कि राजनीति विज्ञान किसी भी दशा में एक प्राकृतिक विज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि राजनीति विज्ञान की विषय-सामग्री भिन्न है। उसमें प्राकृतिक विज्ञान के सूत्र दिखाई नहीं देते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि वैज्ञानिक प्रणालियों का पूर्ण रूप से पालन करना राजनीतिक विज्ञान के वश के बाहर है। राबर्ट डहल ने लिखा है कि, “राजनीति का अध्ययन न तो शुद्ध रूप से वेज्ञानिक हो सकता है और न ही उसे होना चाहिये। राजनीतिक अध्ययन में आवश्यक वस्तुपरक दृष्टिकोण की कमी है। राजनीति विज्ञान को विज्ञान कह देने मात्र से वह विज्ञान नहीं बन जाता। उसे अपनी वैज्ञानिकता ठोस उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित करनी होगी।"
  8. राजनीति में वैज्ञानिक सिद्धान्तों की कमी&nstrongsp;-राजनीति विज्ञान में वैज्ञानिक सिद्धांत देखने को नहीं मिलते हैं। राबर्ट डहल के अनुसार, “राजनीति सिद्धांत अंग्रेजी भाषा-भाषी देशों में मृत हो चुका है, साम्यवादी देशों में वह बन्दी है तथा अन्य देशों में वह मरणासन्न है।" मेयो के अनुसार, “अनेक सिद्धांत अपूर्ण हैं। क्योंकि उनमें कोई भी पूर्ण व्यवस्था से सम्बन्धित नहीं है।" राजनीति विज्ञान में इस अवैधानिकता के कारण अनेक कमियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।
  9. राजनेताओं तथा राजनीति विज्ञान के विद्वानों में सम्पर्क का अभाव - राजनीति विज्ञान की एक गम्भीर समस्या यह है कि राजनीति सिद्धांत का निर्माण करने वाले शोधकर्ताओं से राजनीतिक नेताओं के सम्बन्ध नहीं बन पाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि राजनीतिक सिद्धांत में यथार्थता तथा औपचारिकता का तो समावेश होता है, किन्तु सिद्धांत की वैज्ञानिकता कम हो जाती है।
  10. मानवीय सम्बन्धों की समस्या - राजनीति विज्ञान में कुछ विषय इस प्रकार के हैं कि जिनके कारण आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में अनेक समस्याएँ आ गई हैं। इन विषयों का सम्बन्ध चेतनायुक्त मनुष्यों से है; जैसे-शिक्षा, अशिक्षा, संकीर्णता, निर्धनता, रूढ़िवादिता आदि। ये विषय राजनीति विज्ञान को कुछ भी प्रदान नहीं करते हैं।

निष्कर्ष - परंपरागत तथा आधुनिक राजनीति शास्त्र के सम्बन्ध में राबर्ट डहल ने स्पष्ट रूप से कहा है कि, “यह विचार करने का पूर्ण आधार है कि एकता (परंपरागत तथा आधुनिक राजनीति शास्त्र में) पुनः स्थापित की जा सकती है।" इस दृष्टिकोण से आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का ही एक परिष्कृत रूप है। दोनों एक ही विषय के ऐतिहासिक विकास के दो रूप हैं। अतः दोनों दृष्टिकोणों को मिलाकर राजनीतिक सिद्धांत का सम्पूर्ण विस्तृत एवं परिपक्व प्रस्तुत किया जा सकता है।

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