परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिए।

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परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियों पर प्रकाश डालिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों के प्रमुख कमियाँ निम्न हैं -

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की कमियाँ

  1. मूल्यों पर अत्यधिक बल
  2. अनुसन्धान उपकरणों का अभाव
  3. राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुत्थान पर बल
  4. निर्णय प्रक्रिया की अनदेखी
  5. परंपरागत चिन्तन समकालीन समाज में अप्रासांगिक

(1) मूल्यों पर अत्यधिक बल - ईस्टन ने तर्क दिया है कि परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत के अन्तर्गत मूल्यों के निर्माण पर विशेष बल दिया गया है, किन्तु आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में मूल्यों के विश्लेषण की कोई आवश्यकता नहीं है। मूल्य तो व्यक्तिगत अथवा समूहगत अधिमान्यताओं का संकेत देते हैं जो किन्हीं विशेष सामाजिक परिस्थितियों में जन्म लेती हैं तथा उन्हीं परिस्थितियों के साथ जुड़ी होती हैं। समकालीन समाज अपने लिए उपयुक्त मान्यताओं को स्वयं विकसित कर लेगा, राजनीति वैज्ञानिकों को केवल राजनीति व्यवहार के क्षेत्र में कार्य-कारण सिद्धांत के निर्माण में अपना योग देना चाहिए।

(2) अनुसन्धान उपकरणों का अभाव - ईस्टन के अनुसार, कार्ल मार्क्स व मिल के पश्चात् किसी महान् दार्शनिक का जन्म नहीं हुआ, अतः पराश्रितों की तरह एक शताब्दी प्राचीन विचारों के साथ चिपके रहने से क्या फायदा! ईस्टन ने तर्क दिया कि अर्थशास्त्रवेत्ताओं तथा समाज वैज्ञानिकों ने तो मनुष्य के यथार्थ व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत किया है किन्तु राजनैतिक वैज्ञानिक इस मामले में पिछड़े हुए हैं। इन्होंने फासीवाद तथा साम्यवाद के उदय तथा अस्तित्व की व्याख्या देने हेतु उपयुक्त अनुसंधान उपकरण भी विकसित नहीं किए हैं।

(3) राजनीतिक सिद्धांत के पुनरुत्थान पर बल - 1969 ई० में American Politics Science Association के अध्यक्षीय व्याख्यान के अन्तर्गत ईस्टन ने परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत की व्यवहारवादी क्रान्ति को एक नवीन मोड़ प्रदान करते हुए उत्तर-व्यवहारवादी क्रान्ति की घोषणा कर दी। वस्तुतः ईस्टन में राजनीति विज्ञान को एक शुद्ध विज्ञान के ऊपर उठाकर अनुपयुक्त विज्ञान का रूप देने की माँग की तथा वैज्ञानिक अनुसन्धान को समकालीन समाज की विकट समस्याओं के समाधान में लगाने पर बल दिया। इसका अर्थ यह है कि ईस्टन ने समकालीन समाज पर छाये हुए संकट को पहचाना तथा उसके निवारण हेतु राजनीति सिद्धांत के पुनरुत्थान की आवश्यकता अनुभव की।

(4) निर्णय प्रक्रिया की अनदेखी - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अर्थशास्त्रवेत्ताओं, समाज वैज्ञानिकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने निर्णयन प्रक्रिया में तो सक्रिय भूमिका निभाई है। किन्तु राजनीति-वैज्ञानिकों की ओर किसी ने ध्यान तक नही दिया। अतः ईस्टन ने राजनीति-वैज्ञानिकों को यह सलाह दी कि उन्हें अन्य सामाजिक वैज्ञानिकों के साथ सहयोग कर एक व्यवहारवादी विज्ञान का निर्माण करना चाहिए जिससे उन्हें भी निर्णय प्रक्रिया में स्थान प्राप्त हो सके।

(5) परंपरागत चिन्तन समकालीन समाज में अप्रासांगिक - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत साधारण चिन्तन-मनन पर आधारित है, उसमें राजनीतिक यथार्थ के गहन निरीक्षण का नितान्त अभाव है, अतः राजनीतिक सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करने हेत चिर सम्मत ग्रन्थों तथा राजनीतिक विचारों के इतिहास की परम्परा से मुक्त कराना आवश्यक है।

परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत के निर्माता - परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का विशेष रूप हमें प्लेटो की रचनाओं में देखने को मिलता है। आधुनिक युग में परंपरावादी राज सिद्धांत के प्रबल समर्थकों की काफी संख्या है। यहाँ हम रूसो, काण्ट, हीगल. ग्रीन बोसांके लास्की, ओकशॉट, लियो स्ट्रास इत्यादि की रचनाओं में प्लेटो और अरस्तू के विचारों के प्रतिबिम्ब देख सकते हैं। पश्चिम में परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों की निरन्तरता के प्रतिनिधि विचारक ओकशॉट. हन्ना आरेन्ट, बट्रैण्ट जुवैनल, लियो स्ट्रास, इरिक वोगेलिन आदि माने जाते हैं। इन्होंने न केवल शास्त्रीय दार्शनिक अथवा मानकीय चिन्तन का समर्थन एवं प्रतिपादन किया है अपित उस ओर नवीन दिशाओं में चिन्तन भी किया है।

परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत का मूल्यांकन - अमूर्त, निगमनात्मक, काल्पनिक और इस नाते ‘अवैज्ञानिक' होने के कारण परंपरावादी राजनीतिक सिद्धांत की आलोचना की जाती है। आलोचकों का मुख्य तर्क यह है कि यह बहुत मूल्य भारित या लक्ष्य अभिमुख है और इसलिए इसके सिद्धांतों की व्यावहारिक जांच नहीं की जा सकती। अतः आधुनिक युग में राजनीतिक सिद्धांत को इस तरह नए सिरे से ढाला जाना चाहिए कि यह एक वैज्ञानिक विषय का रूप धारण कर ले।

परंपरावादी विचारक पारम्परिक राजनीतिक सिद्धांत के हास (पतन) से दुःखी हैं और उसका पुनरोदय चाहते हैं। उनकी दृष्टि में परंपरागत सिद्धांत के मार्ग में बाधक तत्व रहे हैं - व्यवहारवाद, इतिहासवाद, नैतिक सापेक्षता तथा तकनीकी क्रान्ति। उनके अनुसार आधुनिक राजवैज्ञानिकों ने मूल्यों तथा आदर्शों को अलग करके राजनीति को ‘अराजनैतिक' (apolitical) बना दिया। उनकी दृष्टि से मानवता और मानव मूल्यों की रक्षा के लिए परंपरावादी सिद्धांत को शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए।

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