परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये।

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परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिये।

  1. राजनीतिक सिद्धांत की परंपरावादी अवधारणा क्या है ?
  2. राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत को 'क्लासिकल राजनीतिक सिद्धांत' (Classical Political Theory), अथवा 'आदर्श राजनीतिक सिद्धांत' (Normative Political Theory) भी कहा है। यह कल्पना पर आधारित है और इसकी जड़ें इतिहास तथा दर्शन में हैं। कतिपय लेखकों के अनुसार परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों में व्यवहारवादी क्रान्ति से पूर्व प्रचलित विचार सामग्री, राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन, विचारधाराओं तथा राजनीतिक विचारों के विश्लेषण को शामिल किया जाता है। परंपरागत स्वरूप में सिद्धांत, विचार. दष्टिकोण विचारधारा. परिप्रेक्ष्य, उपागम आदि सभी पर्यायवाची बन जाते हैं। इनमें दार्शनिक, ऐतिहासिक नैतिक, संस्थात्मक, तुलनात्मक पद्धतियों तथा अन्य विषयगत दृष्टिकोणों जैसे समाजशास्त्रीय, मनोविज्ञानात्मक, अर्थशास्त्रीय आदि को महत्वपूर्ण माना जाता है। राज्य, राज्य की प्रकृति तथा उसका आधार, सरकार, कानून, नैतिकता, प्राकृतिक विधि, राजनैतिक संस्थाएँ आदि परंपरागत राजशास्त्र के प्रिय विषय रहे हैं।

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में विभिन्न चिन्तन प्रणालियों की ओर निर्देश किया जाता है जिनका विकास प्राचीन यग में छठी शताब्दी ई०प० से पाँचवीं शताब्दी में रोमन साम्राज्य के पतन तक हुआ। राजनीतिक दर्शन के इतिहास को देखने से ज्ञात होता है कि उसमें राजनीतिक सिद्धांत अपने प्रतिपादक के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण से प्रभावित रहे हैं।

प्लेटो से लेकर काण्ट, एक्विना और हीगल तक राजनीतिक सिद्धांतों को सदैव आचारशास्त्र (Ethics) या दर्शनशास्त्र (Philosophy) के अंश के रूप में प्रतिपादित किया गया है। उस समय के राजनीतिक विचारक अपने आपको किसी-न-किसी रूप में तात्कालिक राजनैतिक समस्याओं का स्थाई एवं शाश्वत समाधान प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध मानते थे। उन्होंने मानव जीवन और समाज के लक्ष्यों और मूल्यों की ओर अपना ध्यान लगाया। चाहे वह यूनानी विचारकों की तरह नैतिक जीवन की उपलब्धि का विचार हो अथवा मध्ययुगीन क्रिश्चियन सन्त राजनीतिज्ञों का ईश्वरीय राज्य स्थापित करने का या आदर्शवादियों द्वारा प्रतिपादित विवेक (Reason) के साक्षात्कार का। उनकी विचारधाराओं को राबर्ट ए० डहल ने परानुभववादी (Transempirical) या इन्द्रियों से परे माना है क्योंकि उनका आधार एक अलौकिक भावात्मक विश्व दृष्टि है। उनके विचार व्यक्तिगत दृष्टिकोण, चिन्तन, कल्पना अथवा आध्यात्मवादी सिद्धांतों से निःसृत हुए हैं। शाश्वत एवं उच्चस्तरीय तत्वों से सम्बद्ध होने के कारण उनकी चिन्तन प्रणाली तार्किक और निगमनात्मक (Deductive) है। वे आकाश में बैठकर पृथ्वी की ओर देखते हैं। 

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