Saturday, 1 January 2022

लोकतंत्र के गुण एवं दोष का वर्णन कीजिए। भारतीय लोकतंत्र के समक्ष कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं ?

लोकतंत्र के गुण एवं दोष का वर्णन कीजिए। भारतीय लोकतंत्र के समक्ष कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं ?

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. प्रजातन्त्र से क्या तात्पर्य है ?
  2. प्रजातंत्र के गुण लिखिए।
  3. प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में कौन-कौन से दोष पाये जाते हैं ?
  4. भारतीय प्रजातन्त्र के सम्मुख कौन-कौन सी चुनौतियाँ हैं ?

प्रजातन्त्र का अर्थ / लोकतंत्र का अर्थ

लोकतंत्र का अंग्रेजी रूपान्तरण डेमोक्रेसी (Democracy) ग्रीक भाषा के दो शब्दों 'डेमोस' (Demos) तथा क्रेशिया (Cratio) को मिलाने से बना है। जिनका उसी भाषा में अर्थ क्रमशः 'जनता' तथा 'शक्ति' होता है। इस रूप में लोकतन्त्र का अर्थ हुआ 'जनता की शक्ति'।

लोकतन्त्र अपने संकुचित अर्थ में केवल शासन की पद्धति हो सकती है किन्तु अपने व्यापक अर्थ में यह जीवन की पद्धति है। प्रजातन्त्र में सभी व्यक्तियों को भाषण करने, व्यवसाय करने, रहन-सहन के तौर-तरीके अपनाने, आलोचना करने, परस्पर सहमति तथा असहमति व्यक्त करने पूरे देश में कहीं भी आने-जाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। प्रजातन्त्र में शासन का अधिकार जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों के द्वारा संचालित किया जाता है। जिस प्रजातान्त्रिक देश की जनता का चरित्र तथा उसके संस्कार जिस प्रकार के होंगे उस देश की शासन व्यवस्था भी उसी प्रकार की होगी। यही कारण है कि प्रजातन्त्र में जहाँ एक ओर कई गुण विद्यमान हैं तो वहीं दूसरी ओर कई दोष भी पाये जाते हैं। प्रजातन्त्र के गुण-दोषों का वर्णन निम्न प्रकार है -

लोकतंत्र के गुण

लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में निम्नलिखित गुण पाये जाते हैं -

  1. व्यक्ति की सकारात्मक इच्छा को सम्मान
  2. समानता
  3. स्वतंत्रता
  4. भ्रातृत्व
  5. न्याय
  6. नैतिकता
  7. राजनैतिक समझ का विकास
  8. अधिकार एवं कर्तव्यों से परिचय
  9. क्रान्तियों का भय कम
  10. जनता का शासकों पर दबाव
  11. शासन कार्यों की पारदर्शिता एवं सूचना का अधिकार

व्यक्ति की सकारात्मक इच्छा को सम्मान - हाक्कग के अनुसार, “लोकतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था में हम इस बात के लिए आश्वस्त हो सकते हैं कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाओं को पूर्ण सम्मान मिलेगा और उन पर किसी दूसरे की इच्छा जबरन नहीं थोपी जायेगी। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि व्यक्ति की हर इच्छा का परिपालन सुनिश्चित कराया जायेगा।'

समानता - प्रजातन्त्र समानता पर आधारित शासन व्यवस्था होती है। प्रजातन्त्र में सामाजिक समानता, आर्थिक समानता तथा अवसरों की समानता रहती है। इस शासन व्यवस्था में बेन्थम के उपयोगितावाद 'अधिकतम् व्यक्तियों का अधिकतम् सुख' के दर्शन पर आधारित है।

स्वतंत्रता - स्वतंत्रता लोकतन्त्र का आधारभूत तत्व होता है। स्वतंत्रता के बिना प्रजातन्त्र का कोई अस्तित्व नहीं होता। नागरिक स्वतन्त्रताओं एवं अधिकारों पर जिस प्रकार से इस शासन व्यवस्था में जोर दिया गया है अन्य किसी शासन व्यवस्था में देखने को नहीं मिलता है। लोकतन्त्र का आधार सहमति आधारित एकता का निर्माण है न कि शक्ति आधारित।

भ्रातृत्व - लोकतन्त्र का एक अन्य आधारस्तम्भ है भ्रातृत्व क्योंकि लोकतन्त्र की सफलता का आधार भी यही है। लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था में भ्रातृत्व बना रहे तथा भ्रातृत्व की भावना का विकास बराबर होता रहे। इसका भी ध्यान रखा जाता है।

न्याय - लोकतंत्र के चार महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जिनमें चौथा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तम्भ है न्याय का। क्योंकि यदि समाज में न्याय ही न रह जायेगा तो उसे एक सभ्य समाज की संज्ञा नहीं दी जा सकती और लोकतन्त्र सभ्य लोगों की शासन व्यवस्था मानी जाती है।

नैतिकता - लोकतंत्र का एक गुण यह भी है कि यह लोगों के द्वारा समाज का चारित्रिक एवं नैतिक उत्थान भी करता है। मिल के अनुसार, “अन्य शासन प्रणाली की अपेक्षा लोकतन्त्र एक उत्तम और उच्चकोटि के राष्ट्रीय चरित्र का विकास करता है।' इंग्लैण्ड, अमेरिका, स्विट्जरलैण्ड इस गुण के अच्छे उदाहरण हैं। लावेल ने नैतिकता एवं चरित्र के महत्व को दर्शाते हुए लिखा है कि, "किसी भी सरकार की उत्तमता की सबसे बड़ी कटौती शक्ति व्यवस्था, आर्थिक समृद्धि या न्याय नहीं है बल्कि यह कसौटी है. राज्य व्यवस्था को स्थिर रखने वाले नागरिकों का वह चरित्र जिसका निर्माण शासन प्रणाली करती है। अन्तिम रूप में सबसे अच्छा शासन वह है जो जनता की नैतिकता, ईमानदारी, परिश्रम, आत्मनिर्भरता और साहस को दृढ़ करता है।

राजनैतिक समझ का विकास - प्रजातन्त्रीय शासन व्यवस्था में जनता की भागीदारी होने के कारण उनमें राजनीतिक समझ का विकास होता है। वे राजनीतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं तथा अपने मताधिकार का स्वविवेक से प्रयुक्त करके अपने राजनैतिक अधिकारों एवं राजनैतिक समझ का परिचय देते हैं।

अधिकार एवं कर्तव्यों से परिचय - लोकतंत्र में नागरिकों को उनके अधिकारों तथा कर्तव्यों से परिचित कराया जाता है। यह ज्ञान नागरिकों के सामाजिक जीवन जीने तथा व्यक्तित्व के विकास में लाभकारी होता है। इससे नागरिकों में देश के प्रति समाज के प्रति एक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करने तथा अपने अधिकारों का उचित इस्तेमाल करने की समझ विकसित होती है।

क्रान्तियों का भय कम - चूंकि लोकतंत्र में नागरिक शासन के कार्यों में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीकों से भागीदारी निभाते हैं अतः शासन तथा सत्ता के प्रति असन्तुष्ट होने पर उग्र नहीं होते। यही कारण है कि प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में सरकार के विरुद्ध उग्र तथा खुनी संघर्षों तथा क्रान्तियों का भय अपेक्षाकृत कम ही रहता है।

जनता का शासकों पर दबाव - लोकतंत्र जनकल्याण पर आधारित शासन व्यवस्था है जिसके निर्माण में जनता का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग रहता है। यही कारण है कि जनकल्याण के लिए शासकों पर निरन्तर दबाव बना रहता है। यदि शासक वर्ग जनकल्याण की उपेक्षा करते हैं तो निश्चित रूप से जनता उन्हें पुनः अपना प्रतिनिधि बनाने तथा न बनाने के प्रति स्वतंत्र रहती है और चुनाव के समय वह अपना निर्णय मतदान के रूप में देती है।

शासन कार्यों की पारदर्शिता एवं सूचना का अधिकार - लोकतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था चूँकि जनमत तथा सहमति पर आधारित शासन व्यवस्था होती है जिसके कारण इसके कार्यों में पारदर्शिता पायी जाती है। शासन के कार्यों को जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टि से गोपनीय रखना आवश्यक हो के अतिरिक्त खुले तौर पर किये जाते हैं। संसद के अन्दर मन्त्रिमण्डल के सदस्यों को अन्य सांसदों द्वारा पछे गये सवालों के जवाब देने पड़ते हैं जिससे सरकारी काम-काज में गापनीयती नहीं रखी जाती है साथ ही सूचना के अधिकार न तो इस व्यवस्था को और भी उपयोगी निष्पक्ष एवं पारदर्शी बना दिया है।

लोकतंत्र / प्रजातंत्र के दोष

लोकतंत्र यद्यपि आज विश्व के अधिकांश देशों की तथा सभ्य समाज की सर्वमान्य शासन व्यवस्था है तथा अन्य शासन व्यवस्थाओं की अपेक्षा अधिक उपयोगी एवं आदर्श शासन व्यवस्था है तथापि लोकतंत्र / प्रजातंत्र में कई दोष हैं -

  1. सहमति के बजाय बहुमत का बोलबाला
  2. प्रजातन्त्र में अयोग्य भी शासक बन सकता है
  3. समय तथा धन का अपव्यय
  4. समय तथा धन का अपव्यय
  5. बहुमत का अत्याचार
  6. शासन के अंगों में गतिरोध
  7. लोगों का नैतिक पतन
  8. दलीय व्यवस्था के दुष्प्रभाव
  9. जनता का शासन एक मिथ्या धारणा

सहमति के बजाय बहुमत का बोलबाला - लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत ही बहुमत की जीत के साथ होती है। जिस व्यक्ति को अधिक मत प्राप्त होते हैं वह व्यक्ति ही उस क्षेत्र का प्रतिनिधि बनकर उस क्षेत्र की समस्त जनता का शासन में प्रतिनिधित्व करता है। संसद में समस्त निर्णय भी संख्या बल के आधार पर लिये जाते हैं। संख्या बल का प्रभाव कभी-कभी कुछ विधानसभाओं तथा संसद में ऐसा भी देखना पड़ा है कि लगता ही नहीं कि यह सभ्य लोगों का शासन है। लोकतन्त्र के इसी चरित्र के कारण कुछ विद्वान इसे भीड़तन्त्र की संज्ञा देते हैं।

लोकतंत्र में अयोग्य भी शासक बन सकता है - लोकतंत्र चूँकि प्रतिनिधित्यात्मक शासन है जिसमें जनता अपना प्रतिनिधि चुनकर शासन में भेजती है। कम से कम भारत में ऐसा कोई कानून नहीं बना है कि चुनाव लड़ने वाले की न्यूनतम योग्यता निर्धारित हो और चुनने वाले की न्यूनतम योग्यता निर्धारित हो ऐसे में कई बार ऐसे अनपढ़ तथा अयोग्य व्यक्ति डरा-धमकाकर या किसी लोभ-लालच में फंसाकर या जातिवादी घुट्टी पिलाकर चुनाव जीत जाते हैं जिनको ठीक से बातचीत तक करनी नहीं आती, सभ्यता तो उनसे हजारों मील दूर रहती है यहाँ तक कि उन्हें लिखना-पढना तक नहीं आता अंग्रेजी तो दूर शुद्ध हिन्दी तक लिखना तथा पढ़ना नहीं आता है। इस प्रकार प्रजातन्त्र में चुने जाने वाले वालों की न्यूनतम योग्यता का निर्धारण किया जाना प्रजातन्त्र अर्थात् सभ्य लोगों के शासन के साथ एक भद्दा मजाक नहीं तो क्या है ?

समय तथा धन का अपव्यय - प्रजातन्त्र शासन व्यवस्था में समय तथा धन का अपव्यय साधारण बात है वैसे तो प्रत्येक पाँच वर्षों बाद चुनाव का प्रावधान है किन्तु आजकल तो गठबन्धन का युग चल रहा है और वह भी दो दलों का ही नहीं बल्कि कई-कई दलों का अलग-अलग विचारधाराओं का गठबन्धन । चुनाव में जो दो दल एक-दूसरे को पराजित कर रहे थे वे आज मिलकर सरकार बना बैठे हैं। ऐसे में उनके गठबन्धन का टूटते रहना सामान्य बात है और जब अंक गणित असफल होती है तो चुनावी गणित चालू होती है और जनता को पुनः चुनाव का सामना करना पड़ता है जिससे समय तथा धन का अपव्यय होता है।

बहुमत का अत्याचार - प्रजातन्त्र में बहुमत का बोलबाला रहने के कारण अत्याचार तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। बहुमत अपनी संख्या बल के कारण अल्पमत पर अपनी इच्छाओं को थोपा करता है। जिससे जनता में विसंगति उत्पन्न होती है तथा समाज में भेदभाव बढ़ता है। इसी भेदभाव को बढ़ावा देकर तथा कथित नेता वर्ग भोली-भाली जनता का शोषण करते हैं।

शासन के अंगों में गतिरोध - फैगवे ने लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को मानव शरीर के विभिन्न अंगों के समन्वय तथा सफल संचालन की संज्ञा दी है किन्तु वास्तव में लोकतन्त्र में शासन व्यवस्था के व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में प्रायः कोई न कोई मतभेद देखने को मिलता है क्योंकि जिस प्रकार मस्तिष्क शरीर के सभी अंगों में समन्वय करके सफल संचालन करता है वैसा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नहीं देखने को मिलता। क्योंकि यह बहुजन का शासन है।

लोगों का नैतिक पतन - यद्यपि लोकतन्त्र सभ्य समाज का शासन माना जाता है और यह कहा जाता है कि इससे नैतिकता, उदारता, समानता, भातृत्व तथा न्यायपूर्ण जीवन शैली की सीख मिलती है किन्तु यह सब सैद्धान्तिक बातें हैं जोकि प्रजातन्त्र विषय की किताबों में लिखी हैं तथा उनकी शोभा बढ़ा रही है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। आज नैतिकता न तो जनता में है जोकि प्रतिनिधियों को चुनती है और न उन प्रतिनिधियों में हैं जिसको जनता इस आशा से चुनकर भेजती है कि वे दिन में बैठकर उनकी समस्याओं को उठाएंगे तथा उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे लेकिन आज अनेक सांसदों को इसलिए संसद की सदस्यता अयोग्य घोषित किया गया कि उन्होंने कुछ धनी व्यापारियों से पैसे लेकर उनकी व्यक्तिगत लाभ के सवाल सदन में उठाये थे। ऐसे प्रजातान्त्रिक शासन से क्या उम्मीद की जा सकती है जहाँ इस तरह के चरित्र के लोग हों।

दलीय व्यवस्था के दुष्प्रभाव - दलीय व्यवस्था लोकतंत्र का प्राण समझी जाती है किन्तु आज तो दलीय व्यवस्था रोजगार बन चुकी है। लोगों की महत्वाकांक्षाएं इतनी अधिक हो चुकी हैं कि अपने स्वार्थ में अंधे होकर पार्टी तो पार्टी राष्ट्र को भी तोड़ने को तैयार हैं। अगर उन्हें मौका मिले तो वे भारत के भी टुकड़े बनाकर कई छोटे-छोटे देशों में विभाजित कर दें। किसी एक दल की सरकार का न बनना, बार-बार चुनाव का होना इससे अत्यधिक व्यय की मार तो जनता को सहनी पड़ती है। दलों की बहुलता का एक दोष यह भी है कि इससे सरकारें प्रायः अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती और किसी एक दल का नेतृत्व न होने से उस सरकार की नीति भी खिचड़ी रहती है।

जनता का शासन एक मिथ्या धारणा - लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है किन्तु वास्तविकता यह है कि जनता के शासन के नाम पर जनता के कुछ प्रतिशत लोगों के द्वारा शत-प्रतिशत बाहुबल है जिनके पास दबंगों की, अपराधियों की एक बहुत बड़ी कतार है। जिनकी वजह से आम जनता की प्रजातान्त्रिक शासन से भागीदारी को समाप्त किया जा रहा है। आज निर्वाचन इतना मंहगा हो चुका है कि जब लोग पैसा लगाकर चुनाव जीतते हैं तो वे उस पैसे के साथ-साथ अर्थात जो पैसा खर्च किया है उस मूल धन के साथ उससे अधिक लाभ कमाने की भावना रखते हैं, अन्यथा इतना पैसा समाज सेवा के लिए खर्च करने की क्या आवश्यकता ? करोड़ों की कोठी, करोड़ों के गहने अथाह पैसा जमीन के मालिक कोई ऐसे ही नहीं बन जाता है। बात करते हैं गरीबों की, पिछड़ों की, दलितों की, दलित उत्थान की, परन्तु उत्थान स्वयं का करते हैं। इसलिए प्रजातंत्र को जनता का शासन कहना मिथ्या ही है।

भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख चुनौतियाँ

भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे अनोखा प्रजातन्त्र है। भारत बहुभाषी, बहुजातीय, बहुधार्मिक देश है यहाँ पर भिन्न-भिन्न भाषा के बोलने वाले भिन्न-भिन्न जाति के लोग तथा भिन्न मतों, सम्प्रदायों तथा धर्मों का पालन करने वाले लोग निवास करते हैं। भारत की भौगोलिक परिस्थितियाँ भी अलग-अलग क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हैं। भारतीय लोकतंत्र की प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित है :-

  1. लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास का अभाव
  2. शिक्षा का अभाव
  3. स्वस्थ दलीय भावना का अभाव
  4. शासन के अंगों में तालमेल का अभाव
  5. जातिवाद का प्रभाव
  6. साम्प्रदायिकता का प्रभाव
  7. राजनीतिक अवसरवादिता

लोकतान्त्रिक मूल्यों में विश्वास का अभाव - प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था के लिए यह अहम है कि जिस देश में इस व्यवस्था को अर्थात प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था को लागू किया जाना है उस देश के लोगों में इस शासन व्यवस्था के मूल्यों के प्रति विश्वास हो। लोकतान्त्रिक मूल्य हैं स्वतन्त्रता, समानता, भ्रातृत्व तथा न्याय । भारत जब अंग्रेजों के शासन से उनके अत्याचार एवं शोषण से मुक्त हुआ और देश में प्रजातन्त्र को शासन व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया तो यहाँ के शीर्ष नेतृत्व ने लोगों को प्रजातान्त्रिक मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया। लोगों को सैकड़ों वर्षों बाद मिली इस आजादी ने उनमें यह भावना भर दी कि वे अब स्वतंत्र हैं जिसके कारण भारतीय समानता, भ्रातृत्व तथा न्याय के मूल्यों को भूलते गये और स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने लगे। अतः आज आवश्यकता है कि उनमें पुनः लोकतन्त्र के मूल्यों में विश्वास उत्पन्न किया जाये ताकि लोकतन्त्र की नींव को पुनः मजबूत किया जा सके।

शिक्षा का अभाव - प्रजातन्त्र सभ्य एवं शिक्षित लोगों की शासन व्यवस्था मानी जाती है। शिक्षा के अभाव में तथा शिक्षित व्यक्तियों के अभाव के कारण लोकतन्त्र शासन व्यवस्था रूपी नौका उसी प्रकार हवा के झोकों तथा लहरों के थपेड़ों के सहारे इधर-उधर डगमगाती, कभी डूबती, कभी उबरती चलती रहेगी। वर्तमान समय में शिक्षा का जहाँ एक ओर असीम विकास हुआ है वहीं दूसरी ओर गलत तरीके से इसकी प्रक्रिया को संचालित किया जा रहा है। आज हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट तथा स्रातक स्तर में परीक्षा परिणाम लगभग शत-प्रतिशत तथा प्राप्तांकों का प्रतिशत भी 70% से 95% तक रहता है किन्तु समाज में लोगों का नैतिक, चारित्रिक तथा उनके ज्ञान का स्तर अत्यन्त ही कम है। छात्र, अभिभावक, शिक्षक, परीक्षक शिक्षा प्रशासन सभी को मालूम है कि गड़बड़ी कहाँ है लेकिन इनमें से कोई भी इसको ठीक नहीं करना चाहता क्योंकि इससे सभी को लाभ हो रहा है। और यही सोच लोकतन्त्र के लिए दीमक के समान है।

स्वस्थ दलीय भावना का अभाव - भारतीय राजनीति में आज बहुदलीय व्यवस्था का प्रचलन है किन्तु स्वस्थ दलीय भावना का पर्याप्त अभाव देखने को मिलता है। किसी दल के सदस्य की यदि उस दल के किसी अन्य सदस्य या मुखिया से मन-मुटाव हो जाये या उसकी कोई बात न मानी जाये या उनके स्वार्थ जहाँ आपस में टकराते हैं वहीं दलीय फूट हो जाती है। इस प्रकार की घटनाओं का समाज तथा प्रजातन्त्र पर बुरा प्रभाव देखने को मिलता है। किसी भी दल के सदस्य की उस दल के साथ सदैव निष्ठा बनी रहेगी तथा वह दल अपने सिद्धान्तों पर सदैव चलता रहेगा इस बात की कोई निश्चितता नहीं है। अर्थात् दलीय भावना का पूर्णतः अभाव देखने को मिलता है।

शासन के अंगों में तालमेल का अभाव - लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था में मात्र शक्तियों. कार्यों एवं अधिकारों का विकेन्द्रीकरण तो देखने को मिलता है लेकिन शासन के विभिन्न अंगों के मध्य तालमेल बैठाने वाली मस्तिष्क जैसी शक्तिशाली संस्था का अभाव रहता है यही कारण है कि शासन के विभिन्न अंगों के मध्य हितों को लेकर या प्रतिष्ठा को लेकर वाक संघर्ष चलता रहता है। यह बात स्वस्थ प्रजातन्त्र के निर्माण के लिए शुभ नहीं माने जाते हैं।

जातिवाद का प्रभाव - प्रो० श्रीनिवास का कहना है कि “कोई भारत में कहीं भी रहे वह जाति के संसार में ही रहता है। आज भारत में जातिवाद की भावना बढ़ाने का कार्य राजनीतिक दलों ने करना प्रारम्भ कर दिया है। इन दलों का एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता है किसी तरह से जीत हासिल की जाये और जातीय समीकरण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका के रूप में सभी दलों के लिए रहता है।

बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु जैसे कुछ प्रदेशों में तो जातीय तनाव इतना अधिक बढ़ चुका हैं कि ये प्रजातन्त्र के सम्मुख बहुत बड़ी चुनौती प्रस्तुत कर रहा है।

साम्प्रदायिकता का प्रभाव - भारत के निर्माण के साथ ही साम्प्रदायिता के निर्माण की नींव भारत में पड़ चुकी है जोकि हिन्दू-मुस्लिम एकता के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता तथा प्रजातन्त्र दोनों ही के लिए गंभीर खतरा तथा चुनौती है। यद्यपि भारतीय संविधान में पंथनिरपेक्ष राज्य के सिद्धान्त को स्वीकार किया गया है लेकिन वे सैद्धान्तिक बाते हैं व्यावहारिकता में भारत में साम्प्रदायिकता राष्टव्यापी है। इसका खतरा सदैव बना ही रहता है। चाहे वे चुनावी दाँवपेच के रूप में हों, मन्दिर-मस्जिद विवाद के रूप में हो या गोधराकाण्ड के रूप में हों। भारत की स्वतंत्रता से लेकर अब तक कभी न कभी, कहीं न कहीं साम्प्रदायिकता अपना असर दंगे के रूप में दिखाता ही रहा है। साम्प्रदायिकता भारतीय लोकतन्त्र के लिए एक बहुत बड़ा कलंक है।

राजनीतिक अवसरवादिता - भारत की राजनीतिक अवसरवादिता ने तो सबसे अधिक नुकसान भारतीय प्रजातन्त्र को पहुँचाने का किया है। देश के राजनीतिक दल जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र इत्यादि के बल पर चुनाव जीतने का कोई भी अवसर हाथ से निकलने नहीं देना चाहते। राजनीतिक दल प्रादेशिक तथा क्षेत्रीयता की संकीर्ण भावनाओं को फैलाकर भारत के मजबूत लोकतन्त्र को तोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसा करते समय वे विघटनकारी तत्वों के साथ साँठ-गाँठ करने से भी नहीं हिचकते। चुनाव लड़ने के पहले से लेकर चुनाव लड़ने के बाद तक यहाँ तक कि सरकार बनने के पहले से लेकर सरकार बनाने के बाद तक अवसरवादिता के खेल इन राजनीतिक दलों द्वारा चलता रहता है। और यह गतिविधि सभ्य शासन अर्थात् प्रजातन्त्र के स्वास्थ्य के लिए कतई ठीक नहीं मानी जाती।


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