गांव को एक जीवन विधि क्यों कहा जाता है व्याख्या कीजिए।

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गांव को एक जीवन विधि क्यों कहा जाता है व्याख्या कीजिए।

  • गांव को एक जीवन विधि क्यों कहा जाता है 
  • गांव की अवधारणा और इसके महत्व पर प्रकाश डालिए

गाँव : एक जीवन विधि

डॉ. मजूमदार ने गाँव की एकता को सबसे अलग दृष्टिकोण से देखते हुए एक जीवन विधिऔर एक अवधारणा के रूप में परिभाषित किया है। गाँव एक इकाई, एक सम्पूर्णता भी है। अत: गाँव के सभी व्यक्तियों की एक संगठित जीवन-विधि, विचार, अनुभव और संस्कृति होती है। प्रत्येक गाँव की एक भूतकाल, एक मूल्य व्यवस्था और एक, भावात्मक व्यवस्था होती है। गाँव एक पृथक इकाई है, क्योंकि गाँव के सभी व्यक्ति का सम्बन्ध भूतकाल के गहरे अनुभव से होता है। ये सभी विशेषतायें गाँव की सीमा तक ही सीमित नहीं रहती हैं। गाँव वाले व्यक्तियों की रिश्तेदारियाँ व नातेदारियाँ न केवल गाँव में होती हैं बल्कि आस-पास के गाँवों में भी होती है। गाँव में जब कोई संकट (जैसे - सामाजिक, प्राकृतिक, आर्थिक या राजनीतिक) आ जाता है तो गाँव के सभी लोग एकजुट हो कर पारस्परिक रूप से एक-दूसरे की सहायता करते हैं। अतः इस स्थिति में गाँव को एक पृथक इकाई के रूप में देखना उचित नहीं है। देश की सम्पर्ण अर्थव्यवस्था से प्रत्येक गाव किसी न किसी रूप से सम्बन्धित अवश्य है और इनके सम्बन्ध गाँव से बाहर भी हैं। जैसे - गाँव की बेटियों के जब विवाह होते हैं तो वे गाँव से बाहर चली जाती हैं, ठीक इसी प्रकार जब गाँव के लड़कों का विवाह होता है तो वे दूसरे गाँव की बेटियों को बहुओं के रूप में अपने गाँव लाने हैं। इस प्रकार गाँव के सम्बन्ध बाहरी गाँव से हो जाते हैं। इनके साथ पारिवारिक परम्परायें और मल्य सम्बन्धित होते हैं जो ग्रामीण जीवन में अकस्मात होने वाले परिवर्तनों को स्वीकार करने में बाधक होते हैं। गाँव की उपर्युक्त एकता और संरचना व्यवस्था में ध्यान देने पर गाँव एक सम्पूर्णता के रूप में दिखाई देता है।

गाँव में अनेक समानतायें व विभिन्नतायें भी पायी जाती हैं। गाँव में जातियों के आधार पर मोट बने होते हैं तथा उच्च एवं निम्न जातियों के मध्य अनेकों विभिन्नतायें पायी जाती हैं जैसे मतभेद विश्वासों में मतभेद, शिक्षा व आय का स्तर आदि। जातियाँ एवं अन्तर्जातीय सम्बना पनि दौर से गुजर रहे हैं। इन सभी परिवर्तनों एवं विभिन्नताओं के बावजूद भी गाँव एक संगठित इकाई के रूप में दिखाई पड़ता है। क्योंकि यहाँ के लोगों में वर्षों से एक साथ मिलकर रहने व सहयोग करने, आदान-प्रदान करने तथा हितों की समस्याओं में भागीदार होने की प्रवृत्ति पायी जाती है।

गाँव वालों का बाहरी सम्पर्क होने के बावजूद वे आज भी अपना जीवन उसी प्रकार व्यतीत कर रहे हैं, जैसा वे भूतकाल में व्यतीत करते थे। गाँव वालों की जीवन-विधि नगर वालों की जीवन-विधि से अलग होती है। गाँव एक अवधारणा के रूप में तब तक विद्यमान रहेगा जब तक ग्रामीण मूल्य समूह में परिवर्तन नहीं आता अथवा गाँव के लोगों का व्यक्तित्व, विद्यमान है। डॉ. मजूमदार के अनुसार, गाँव और नगर के मध्य आदान-प्रदान की प्रक्रिया भारत में दृष्टिगत नहीं होती है। अर्थात यहाँ पर गाँव वालों एवं नगर वालों की जीवन-विधि में भिन्नता पायी जाती है। शहरों के पास बसे हुए गाँवों में भी अपनी ग्रामीण मूल्य व्यवस्था विद्यमान है और वे गाँव आज भी नगरों में परिवर्तित नहीं हुए हैं। यहाँ तक कि जिन गाँवों की जनसंख्या 5,000 या इससे अधिक है, ऐसे गाँव भी ग्रामीण-मूल्य व्यवस्था बनाए हुए हैं जबकि ऐसे गाँव जनगणना विभाग के अनुसार नगरों की श्रेणी में आते हैं। गाँव में जाने वाला नगर का कोई भी व्यक्ति गाँव एवं नगरों के अन्तर को स्पष्ट रूप से देख सकता है। ऐसे गाँव बहुत से हैं जिनके लोग शहरों से सम्पर्क बनाये हुए हैं और गाँव में भी अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। ऐसे लोगों की प्रशंसा की जाती है और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सलाह भी ली जाती है। गाँव और नगरों के मध्य सम्बन्ध बनाये रखने वाले लोगों का भी यह मानना है कि गाँव एवं नगरों में अन्तर पाया जाता है।

गाँव के लोगों की ऐसी धारणा होती है कि नगरवासियों का जीवन आराम का होता है, उनका व्यवहार असामान्य होता है, वे स्वार्थी होते हैं और उनमें नैतिकता का अभाव होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने बच्चे को नगरों के स्कूल में दाखिल नहीं करवाता तो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वह अपने बच्चों को शहरों के प्रतिकूल बनाकर गाँवों के अनुकूल बनाना चाहता है। 

ग्रामीण नगरीय भेद ने ही भारत की परम्परात्मक संस्कृति के जीवन को रखा है अन्यथा हमारे यहाँ कोई चर्च जैसी व्यवस्था नहीं रही है, जिससे प्राचीन धर्म, कला, सांस्कृतिक व्यवहारों, संस्कृति, लोकगीत एवं हिन्दू आदि की रक्षा की जाती है। गाँव एवं नगर के मध्य विभिन्नता ही इन दोनों को एकता के सूत्र में नहीं पिरोती है। गाँवों की भावात्मक व्यवस्था व मूल्य-व्यवस्था गाँवों को परिवर्तित होने से रोकती है।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि गाँव की एक भावात्मक व्यवस्था, मूल्य व्यवस्था व संस्कृति होती है, जो गाँव की एक विशिष्ट जीवन-विधि निर्मित करती है और उसे एक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करती है अर्थात् गाँव एक जीवन-विधि और अवधारणा दोनों ही है।

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