Sunday, 13 February 2022

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का अर्थ बताइए तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विवेचना कीजिये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का अर्थ बताइए तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विवेचना कीजिये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत है। मार्क्स यह प्रतिपादित करता है कि समाज का जो विकास हुआ है उसका कारक आर्थिक तत्व है जिसे वह पदार्थ कहता है। आर्थिक तत्व के अंतर्विरोध के कारण उसकी अवस्था में परिवर्तन होता है। इन आर्थिक शक्तियों के परिवर्तन के कारण आर्थिक संबंधों में परिवर्तन होना प्रारंभ हो जाता है इस परिवर्तन की दिशा ही सामाजिक संबंधों में परिवर्तन कर देती है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का अर्थ

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द 'Dialectical materialism' का हिन्दी रूपान्तर है जिसका अर्थ है कि परम्परा वाद-विवाद करने से सत्य का पता चलता है। इस सिद्धांत के आधार पर मार्क्स ने यह स्पष्ट किया है कि विश्व में जो भी परिवर्तन होते हैं वे पदार्थों के पारस्परिक संघर्षों के कारण होते हैं इस प्रकार द्वंद्वात्मक भौतिकवादी पदार्थ को सक्रिय मानते हैं उनका मत है कि पदार्थ सदैव गतिशील रहता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की व्याख्या

मार्क्स ने इस सिद्धांत को हीगल के सिद्धांत की तरह दर्शाया है। हीगल ने इसके अन्तर्गत द्वंद्वावाद को विचार (आत्मा) में देखा जबकि मार्क्स ने इसे पदार्थ में देखा। मार्क्स का कहना है कि भौतिक जगत का विकास क्रमबद्ध न होकर अबाध गति से निरन्तर होता रहता है। इस विकास की क्रिया में वाद प्रतिवाद व संवाद का क्रम निरन्तर जारी रहता है। इसमें प्रत्येक अपने पूर्वगामी का विरोधी होता है मार्क्स सम्पत्ति का उदाहरण देकर स्पष्ट करता है कि सम्पत्ति के जन्म के साथ ही सर्वहारा वर्ग की उत्पत्ति हई है। पूँजीपति वर्ग व सर्वहारा वर्ग में निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। अन्त में क्रान्ति द्वारा सामूहिक स्वामित्व की स्थापना हो जाती है। इस प्रक्रिया में पूँजीपति वर्गवाद,सर्वहारा वर्ग 'प्रतिवाद' व सामूहिक स्वामित्व 'संवाद' होता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के सिद्धांत की आलोचना

मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की निम्नलिखित बिन्दुओं पर आलोचना की गई है जो इस प्रकार से है।

  1. मार्क्स ने हीगल द्वंद्वात्मक सिद्धांत को अपनाया परन्तु उसको पदार्थ पर लागू करके उसके मूल तत्त्व को ही नष्ट कर डाला।
  2. मार्क्स ने भौतिकवाद को आर्थिक शक्तियों का आधार माना है किन्तु विश्व का उत्पादन शक्तियों के माध्यम से ही होता है यह कैसे स्वीकार किया जाए।
  3. मार्क्स ने इसमें विकास की शक्ति पशुबल है तथा क्रान्ति ही विकास का एकमात्र साधन है यह गलत धारणा है।
  4. मार्क्स ने यह सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया कि पदार्थ किस प्रकार गतिशील होता है।
  5. मार्क्स ने यह माना है कि संघर्ष मानवीय विषयों में प्रमुख भूमिका निभाता है परन्तु मार्क्स ने उसको विश्वव्यापी रूप में उपयुक्त करके भ्रामक बना दिया।


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