Monday, 21 February 2022

संविधान और संविधानवाद में अंतर बताइए।

संविधान और संविधानवाद में अंतर बताइए।

  1. संविधान और संविधानवाद में अंतर क्या है?

संविधान और संविधानवाद में अंतर

संविधानवाद संविधान पर आधारित होता है और संविधान की संविधानवाद की अभिव्यक्ति करता है। इस आधार पर कुछ व्यक्ति इस मत का प्रतिपादन करते हैं कि संविधान पर आधारित शासन ही संविधानवाद है और संवैधानिक शासन तथा संविधानवाद में अंतर नहीं किया जा सकता। डॉ० सी० एफ० स्ट्रांग और कोरी तथा अब्राहम के द्वारा इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाया गया है। सी० एफ० स्ट्रांग के शब्दों में, “संविधान उन सिद्धान्तों का समूह है जिनके अनुसार राज्य के अधिकारों, नागरिकों के अधिकारों और दोनों के सम्बन्धों में सामंजस्य स्थापित किया जाता है।"

कौरी तथा अब्राहम लिखते हैं, "स्थापित संविधान के निर्देशों के अनुरूप शासन को संविधानवाद माना जाता है।"

यदि संविधान शासन और शासक वर्ग की शक्तियों को मर्यादित करता है तो यह बात सही भी है, लेकिन संविधान और संविधानवाद या संवैधानिक शासन और संविधानवाद को सभी परिस्थितियों में एक नहीं कहा जा सकता। यदि संविधान शासन की शक्तियों को मर्यादित करने के बजाय शासन और शासक वर्ग को असीमित शक्तियाँ प्रदान कर देता है तो ऐसी स्थिति में संविधान, संविधानवाद के अनुकूल नहीं वरन् प्रतिकूल बन जाता है। बलपूर्वक स्थापित सैनिक शासन, तानाशाही का अन्य कोई रूप या अन्य कोई आततायी शासन ऐसा ही उदाहरण है। ऐसी स्थितियों को लक्ष्य करते हुए ही विलियम जी० एण्ड्रयूज लिखते हैं कि "संविधान संविधानवाद की गारण्टी नहीं है। निरंकुश शासक संविधान को अपनी शता छिपाने का एक बहुत अच्छा साधन बना सकते और मान सकते हैं।" इस सम्बन्ध में पूर्व सोवियत संघ का उदाहरण देते हुए एण्ड्रयूज आगे लिखते हैं, "सोवियत नेता अपने तथाकथित सर्वाधिक लोकतन्त्रीय संविधान का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। इसके विपरीत, वस्तुत: वह संविधान (सोवियत संविधान) ही संविधानवाद की मूल धारणा के अनुरूप नहीं है। इसके द्वारा शासन की कोई प्रभावी सीमाएँ ही निर्धारित नहीं की गयी हैं।" के० सी० हीयर, ब्लोण्डेल और अन्य आधुनिक लेखक भी इस मत का प्रतिपादन करते हैं कि 'संविधानवाद निश्चित रूप में संविधान के अनुरूप शासन से कुछ अधिक हैं।'

संविधान और संविधानवाद में अंतर

संविधान और संविधानवाद सभी परिस्थितियों में एक नहीं होते उनमें कुछ अंतर होते हैं, जिनका उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है

  1. परिभाषा की दृष्टि से जहाँ संविधानवाद एक विचारधारा का प्रतीक है, वहाँ संविधान एक संगठन का प्रतीक है। संविधान में किसी राष्ट्र के मूल्य, विश्वास और आदर्श निहित रहते हैं, जबकि संविधानवाद उन सिद्धान्तों का समूह है जिनके आधार पर शासन शक्तियों और शासकों के अधिकारों तथा उनकी सीमाओं का निर्धारण होता है।
  2. प्रकृति की दृष्टि से भी दोनों में अंतर किया जा सकता है। संविधानवाद में लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्रमुखता होती है जबकि संविधान में साधनों की सुव्यवस्था को प्रधानता दी जाती है। संविधान रूपी साधन के माध्यम से ही संविधानवाद के लक्ष्यों को प्राप्त करने की चेष्टा की जाती है।
  3. उत्पत्ति की दृष्टि से जहाँ संविधानवाद सदैव और आवश्यक रूप से विकास का प्रतिफल होता है, वहाँ वर्तमान समय में संविधान सामान्यतया निर्मित होते हैं जो औपचारिक संशोधनों तथा परम्पराओं के विकास के आधार पर अपने आपको बदलती हुई परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं के अनुरूप ढालते रहते
  4. औचित्य (Legitimacy) के आधार पर यदि अंतर करें तो जहाँ संविधानवाद में आदर्शों के औचित्य का प्रतिपादन मुख्यतया विचारधारा के आधार पर होता है, वहाँ संविधान का औचित्य मुख्यतया विधि या कानून के आधार पर ठहराया जाता है।
  5. संविधान और संविधानवाद में सबसे अधिक प्रमुख अंतर क्षेत्र की दृष्टि से है और संविधान की तुलना में संविधानवाद बहुत व्यापक है। संविधानवाद एक अन्तर्भूतकारी (Inclusive) धारणा है, लेकिन संविधान एक अपवर्जक (Exclusive) धारणा है।

एक देश के मूलभूत नियमों और कानूनों के संग्रह को संविधान कहा जाता है, लेकिन संविधानवाद नियमों और कानूनों का संग्रह मात्र ही नहीं होता है। राजनीतिक जीवन के मूल्य, विश्वास, राजनीतिक आदर्श और संस्कृति सभी कछ संविधानवाद में समाये हए रहते हैं। संविधानवाद निश्चित रूप में संविधान से कुछ अधिक है।

प्रत्येक देश का अपना एक अलग संविधान होता है जिसे अन्य संविधानों से कुछ विशिष्टता प्राप्त होती है, लेकिन प्रत्येक देश का अपना एक मौलिक संविधानवाद नहीं होता। संविधानवाद की दो-तीन अवधारणाएँ ही बतलायी जा सकती हैं, यथा-पाश्चात्य संविधानवाद, साम्यवादी संविधानवाद और विकासशील देशों का संविधानवाद। अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि संविधानवाद की इन अवधारणाओं में पाश्चात्य संविधानवाद या उदारवादी संविधानवाद ही संविधानवाद की मूल अवधारणा है। संविधानवाद की एक अवधारणा से सम्बन्धित विभिन्न देशों के संविधानवाद में एक मलभत समानता पायी जाती है. लेकिन संविधान विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम होता है, अतः प्रत्येक देश के संविधान की अपनी विशिष्टता होती है।

संविधान और संविधानवाद में उपर्युक्त अंतरों के बावजूद संविधान और संविधानवाद एक-दूसरे के सहायक तथा पूरक हैं। संविधान संविधानवाद का मूल आधार है और संविधान के बिना संविधानवाद की कल्पना नहीं की जा सकती। दूसरी ओर संविधान का लक्ष्य संविधानवाद होना चाहिए, तभी संविधान की कोई सार्थकता है।

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