परिकल्पना का निर्माण, अर्थ, महत्व तथा विशेषताएं

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परिकल्पना का निर्माण, अर्थ, महत्व तथा विशेषताएं

  • शून्य परिकल्पना का अर्थ एवं महत्व बताइए। 
  • परिकल्पना के प्रकार का वर्णन कीजिये। 
  • परिकल्पना का निर्माण कैसे होता है ?
  • अच्छी परिकल्पना की विशेषताएं लिखिए। 
  • परिकल्पना का अर्थ और परिभाषा। 

परिकल्पना का निर्माण

परिकल्पना का शाब्दिक अर्थ है- ‘पूर्व चिंतन'। परिकल्पना किसी भी शोध प्रक्रिया का महत्वपूर्ण तत्व है। किसी समस्या के विश्लेषण और परिभाषीकरण के पश्चात् परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। परिकल्पना एक शोध समस्या का प्रस्तावित उत्तर होता है। समस्या या शोध विषय का चयन कर लेने एवं सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन के साथ-साथ शोधकर्ता के मन में आने वाली शोध विषय से सम्बन्धित पूर्व विचार और कल्पनायें, शोध परिकल्पना कहलाती हैं। 

परिकल्पना एक ऐसा पूर्व विचार, पूर्वानुमान या कल्पनात्मक विचार होता है, जो शोधकर्ता समस्या के बारे में शोध से पूर्व बना लेता है। शोध के दौरान व उसकी सार्थकता की जाँच करने हेतु आवश्यक तथ्यों को एकत्र करता है। शोधकर्ता का यही पूर्व विचार उसका ध्यान निश्चित एवं आवश्यक तथ्यों पर केंद्रित करके शोध की दिशा को निर्धारित करता है। परिकल्पना का निर्माण शोधकर्ता को अपने अध्ययन विषय से भटकने से रोकता है और शोध को एक निश्चितता प्रदान करता है।

परिकल्पना का अर्थ

परिकल्पनाएं वे प्रस्तावित समस्या समाधान हैं जिन्हें सामान्यीकरणों या कथनों के रूप में व्यक्त किया जाता है तथा जिनकी सत्यता सिद्ध करने के लिए उसका परीक्षण किया जा सकता है।

शोध परिकल्पना प्रत्याशित परिणामों के बारे में ऐसा अभिकथन है जो पूर्व शोध या सिद्वान्त पर आधारित होता है।

परिकल्पना एक विचार, दशा या सिद्धांत होता है जो कि संभवतः बिना किसी विश्वास के मान लिया जाता है, जिससे कि उससे तार्किक परिणाम निकाले जा सकें और निर्धारित किए जाने वाले तथ्यों की सहायता से इस विचार की सत्यता की जांच की जा सके।

परिकल्पना दो या दो से अधिक चरों के अनुमान पर आधारित कल्पनात्मक, तर्कपूर्ण, प्रस्तावित और परीक्षण योग्य कथन है जो यह बताता है कि समस्या का सम्भावित हल क्या हो सकता है तथा शोध आगे कैसे होना है। परीक्षण के पश्चात् यह कथन सत्य भी सिद्ध हो सकता है और गलत भी सिद्ध हो सकता है। 

परिकल्पना किसी शोध समस्या से सम्बन्धित एक सामान्य पूर्वानुमान अथवा विचार है जिसके संदर्भ में ही सम्पूर्ण शोध कार्य किया जाता है। प्रारम्भ में परिकल्पना शोधार्थी का दिशा-निर्देश करती है एवं अध्ययनकर्ता को इधर-उधर भटकने से रोकती है तथा अन्त में यह उपयोगी निष्कर्ष प्रस्तुत करने तथा पूर्वनिष्कर्षों का सत्यापन करने में सहायता करती है। अध्ययन के द्वारा संकलित तथ्यों के आधार पर यदि कोई परिकल्पना सत्य प्रमाणित होती है तो उसे एक सिद्धान्त के रूप में स्वीकृत कर लिया जाता है और यदि वह सत्य प्रमाणित नहीं होती तो उसे अस्वीकृत कर दिया जाता है। इसलिये परिकल्पना को सामान्यतौर पर ‘कार्यकारी परिकल्पना' के नाम से भी जाना जाता है।

परिकल्पना के कार्य एवं महत्व

  1. परिकल्पना शोध समस्या को निश्चितता प्रदान करती है।
  2. परिकल्पना प्रमुख तथ्यों के संकलन में सहायक होती है।
  3. व्याख्या के रूप में परिकल्पना सहायक सिद्ध होती है।
  4. परिकल्पना चरों के विशिष्ट सम्बन्धों के ज्ञान पर प्रकाश डालती है।
  5. परिकल्पना प्रत्येक दशा में निष्कर्ष ढूंढ निकालने में सहायक होती है।
  6. शोध प्रक्रिया में विश्वसनीय ज्ञान प्राप्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम परिकल्पना है एवं इसके द्वारा ही शोधकर्ता स्पष्ट व मान्य निष्कर्षों तक पहुंचता है। 
  7. शोध समस्या के स्पष्ट रूप से निरूपण के उपरान्त परिकल्पना का निर्माण किया जाता है। यद्यपि परिकल्पनाएं पूर्ण यथार्थ न होकर अनुमान मात्र होती हैं परन्तु यह अनुमान तर्क, तथ्यों तथा साक्ष्यों पर आधारित होता है इसलिए इसको बौद्धिक अनुमान या तार्किक अनुमान भी कहा जाता है।
  8. परिकल्पना नवीन ज्ञान प्राप्ति की प्रेरणा प्रदान करती है।
  9. परिकल्पना आरंभ में ही अध्ययन के उद्देश्य तथा उसकी प्रकृति को निर्धारित कर देती है।
  10. परिकल्पना शोध कार्य को निश्चित दिशा प्रदान करती है व शोधकर्ता के लिए मार्गदर्शक का कार्य करती है।
  11. परिकल्पना सिद्धान्त की रचना में सहायक होती है।
  12. वैज्ञानिक शोध में परिकल्पनाओं के निर्माण के बाद शोध का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।
  13. परिकल्पना के निर्माण द्वारा शोध के अध्ययन क्षेत्र को उपयुक्त रूप से सीमित किया जाता है।

परिकल्पना की विशेषताएं

  1. परिकल्पना द्वारा अधिक से अधिक सामान्यीकरण संभव होना चाहिए।
  2. एक परिकल्पना परीक्षण के योग्य होनी चाहिये।
  3. इसमें दो या दो से अधिक चरों के मध्य संबंधों का अनुमान होना चाहिए।
  4. इससे शोध प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर मिलना चाहिए।
  5. यह सत्याभासी एवं तर्कयुक्त होनी चाहिए।

परिकल्पना के प्रकार

  1. विशेषताओं के आधार पर परिकल्पना के प्रकार
  2. उद्देश्यों के आधार पर परिकल्पना के प्रकार

विशेषताओं के आधार पर परिकल्पना के प्रकार

  1. साधारण परिकल्पना
  2. जटिल परिकल्पना
  3. सांख्यिकीय परिकल्पना

(1) साधारण परिकल्पना - ऐसी परिकल्पना जिसमें चरों की संख्या अधिकतम दो होती है एवं उन चरों में अनुमानात्मक संबंध का उल्लेख किया जाता है साधारण परिकल्पना कहलाती है। जैसे- 'कुपोषण और बीमारी बीच सकारात्मक सहसंबंध

(2) जटिल परिकल्पना - वह परिकल्पना जिसमें दो से अधिक चरों का प्रयोग कर उनके बीच अनुमानात्मक संबंध का उल्लेख किया जाता है जटिल परिकल्पना कहलाती है। इस प्रकार की परिकल्पना में आश्रित और स्वतंत्र चर दो से अधिक होते हैं। जैसे- धूम्रपान और अन्य नशीली दवाओं का प्रयोग कैंसर, तनाव, छाती संक्रमण आदि का कारण बनती हैं।

(3) सांख्यिकीय परिकल्पना - सांख्यिकीय परिकल्पना एक अनुमानात्मक कथन है,

जो सांख्यिकी भाषा में, तात्विक परिकल्पना से प्राप्त सांख्यिकीय सम्बन्ध को इंगित करता है। • 

शोध के उद्देश्यों के आधार पर परिकल्पना के प्रकार

  1. कार्यकारी परिकल्पना (Working hypothesis)
  2. शून्य परिकल्पना (Null hypothesis)
  3. वैकल्पिक परिकल्पना (Alternative hypothesis)

(1) कार्यकारी परिकल्पना (Working hypothesis)- यह परिकल्पना किसी न किसी सिद्धान्त पर आधारित या प्रेरित होती है। यह अस्थायी रूप से अपनाई जाती है। इससे शोध से संबंधित तथ्यों के बीच संबंधों को स्थापित के करने के लिए बनाया जाता है। जैसे-जैसे शोध की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, कार्यकारी परिकल्पना का परीक्षण किया जाता है और पुष्टि, संशोधित या त्याग किया जा सकता है। उदाहरण- उच्च रेशे युक्त आहार का सेवन मधुमेह से बचाव करता है। 

(2) शून्य परिकल्पना (Null hypothesis)- शून्य परिकल्पना, कार्यकारी परिकल्पना के विपरीत बनाई जाती है। दो चरों के बीच शून्य अन्तर या शून्य संबंध, शून्य परिकल्पना कहलाती है। इसे दो दशाओं में प्राप्त आँकड़ों में कोई अन्तर नहीं होने की परिकल्पना भी कहा जाता है। इसकी रचना इसे निरस्त करने के उद्देश्य से ही की जाती है। आँकडों में इसे अक्सर एच-0 (Ho) से चिह्नित किया जाता है। उदाहरण उच्च रेशे यक्त आहार का सेवन करने वाले समूह में व उच्च रेशे युक्त आहार का सेवन न करने वाले समूह में मधुमेह रोग की तीव्रता में सार्थक अन्तर नहीं है।

(3) वैकल्पिक परिकल्पना (Alternative hypothesis)- जब शोधकर्ता परी तरह से शन्य परिकल्पना को अस्वीकार या निरस्त करता है तो एक वैकल्पिक परिकल्पना तैयार की जाती है। यह परिकल्पना शून्य परिकल्पना के बिलकुल विपरीत होती है। इसे प्रायोगिक परिकल्पना भी कहते हैं। इस परिकल्पना में दो समूहों या दो चरों में अन्तर या सम्बन्ध का अनुमान लगाया जाता है। जैसे ‘उच्च रेशे युक्त आहार का सेवन करने वाले समूह में व उच्च रेशे युक्त आहार का सेवन न करने वाले समूह में मधुमेह रोग की तीव्रता में सार्थक अन्तर है। आँकड़ों में इसे अक्सर एच-1(H1) से चिह्नित किया जाता है।

शोध कार्य का एक महत्वपूर्ण सोपान परिकल्पना का परीक्षण होता है। सामान्यतः शोध कार्य हेतु शून्य परिकल्पना निर्मित की जाती है, और उसी का परीक्षण कर निष्कर्ष दिये जाते हैं।

शून्य परिकल्पना के परीक्षण के दौरान यदि तुलना किए जाने वाले समूहों के माध्य सार्थक अंतर होता है तो शून्य परिकल्पना को निरस्त कर दिया जाता है व वैकल्पिक परिकल्पना स्वीकार कर ली जाती है। इसके विपरीत सार्थक अंतर नही होने पर शून्य परिकल्पना को निरस्त नहीं किया जाता है।

शोध समस्या की मूल मान्यताएं

शोध अध्ययन में प्रयुक्त मूल मान्यताएं शोधकर्ता कि वे धारणाएं या कथन हैं जो उसने शोध समस्या से संबंधित व्यक्तियों, वस्तुओं, स्थानों, घटनाओं तथा विधियों के बारे में बना रखी हैं। यह ऐसी धारणाएं हैं जिन्हें शोधकर्ताओं द्वारा बिना वैज्ञानिक रूप से परीक्षण के सत्य या व्यवहारिक माना जाता है। शोध में निम्नलिखित मान्यताएं अपनाई जाती हैं

  • यह माना जाता है कि शोध में प्रयुक्त सभी चर स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं और मापनीय हैं।
  • उपयोग किए जा रहे उपकरण उन चरों को मापने के लिए मान्य और विश्वसनीय हैं।
  • शोध समस्या के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चयनित कार्यप्रणाली उपयुक्त है।
  • विश्लेषण करने से पहले शोधकर्ता मानता है कि चयनित विश्लेषण प्रक्रिया और प्रतिदर्श का आकार शोध समस्या के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पर्याप्त है।
  • यह माना जाता है कि प्रतिभागी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अध्ययन में भाग लेने के लिए तैयार हैं।
  • यह माना जाता है कि प्रतिभागी शोध से संबंधित सभी प्रश्नों के उत्तर ईमानदारी से पूर्वाग्रह के बिना देंगे।
  • विश्लेषण पूरा होने के बाद माना जाता है कि शोध अध्ययन के परिणाम सामान्यीकृत किये जा सकते हैं।
  • अंततः यह भी माना जाता है कि शोध अध्ययन के परिणाम हितधारकों के लिए प्रासंगिक और सार्थक होंगे।

शोध समस्या की अंतर्निहित त्रुटियां

शोध में अंतर्निहित त्रुटियां वे परिस्थितियाँ या प्रभाव हैं जिन्हें शोधकर्ता द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। परिणामों को प्रभावित करने वाली किसी भी अंतर्निहित त्रुटि का उल्लेख किया जाना चाहिए। 

अंतर्निहित त्रुटियां कार्यप्रणाली और निष्कर्षों का सीमांकन करती हैं। सीमांकन से तात्पर्य समस्या के भौगोलिक क्षेत्र का चयन, समस्या अध्ययन का समय, प्रतिदर्श का आकार व प्रकार, शोध अध्ययन पर व्यय को निश्चित करना है। उदाहरण: पहुँच की सुविधा अनुसार किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र, शहर, गाँव, स्कूल या महाविद्यालय का चयन

निश्चित समय सीमा में शोध अध्ययन पूरा करना, किसी विशेष कार्यप्रणाली का प्रयोग, समय सीमांकन के कारण प्रतिदर्श का आकार कम लेना 

जनसंख्या के किसी विशेष वर्ग पर (महिलाओं या किशोरियों पर) ही शोध करना

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