संविधानवाद की विशेषताओं का वर्णन करें।

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संविधानवाद की सामान्य विशेषताएं 

संविधानवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  1. संविधानवाद मूल्य सम्बद्ध अवधारणा है
  2. संविधानवाद संस्कृति सम्बद्ध अवधारणा है
  3. संविधानवाद गत्यात्मक अवधारणा है
  4. संविधानवाद समभागी अवधारणा है
  5. संविधानवाद साध्य से सम्बन्धित अवधारणा है
  6. संविधानबाद संविधान पर आधारित अवधारणा है

(1) संविधानवाद मूल्य सम्बद्ध अवधारणा है- संविधानवाद का सम्बन्ध राष्ट्र के जीवन-दर्शन से है। यह उन मूल्यों, विश्वासों व राजनीतिक आदर्शों की ओर संकेत करता है जो राष्ट्र के हर नागरिक को प्रिय हैं और जो हर राष्ट्र का जीवन आधार होते हैं। यह संवैधानिक दर्शन राजनीतिक समाज को अभिजनों द्वारा प्रदान किया जाता है।

(2) संविधानवाद संस्कृति सम्बद्ध अवधारणा है- संविधानवाद की धारणा हर जगह उस स्थान विशेष की संस्कृति से सम्बद्ध पायी जाती है। हर देश के आदर्श, मूल्य व विचारधाराएँ उस देश की संस्कृति की ही उपज होते हैं।

(3) संविधानवाद गत्यात्मक अवधारणा है- संविधानवाद में विशिष्ट बात यह है कि इसमें स्थायित्व के साथ ही साथ गत्यात्मकता भी पायी जाती है। यही कारण है कि यह प्रगति में बाधक नहीं. प्रगति का साधक बना रहता है। इसकी गतिशील प्रकृति अति आवश्यक है, क्योंकि समय परिवर्तन के साथ मल्यों में परिवर्तन आता है तथा संस्कृति विकसित होती है। यह समाज के वर्तमान में प्रिय मल्यों के साथ ही उसकी भविष्य की आकांक्षाओं का प्रतीक भी होता है।

(4) संविधानवाद समभागी अवधारणा है- एक राष्ट्र के मूल्य, विश्वास व राजनीतिक आदर्श एवं संस्कृति के प्रति अन्य देशों में भी निष्ठा हो सकती है। अत: कई देशों के राजनीतिक आदर्श, आस्थाएँ व मान्यताएँ समान हो सकते हैं। ऐसे देशों में संविधानवाद आधारभूत समानताएँ रखता है। उदाहरणार्थ, पाश्चात्य संस्कृति वाले देशों में संविधानवाद में समानता पायी जाती है।

(5) संविधानवाद साध्य से सम्बन्धित अवधारणा है- संविधानवाद मूलतःसाध्यों से सम्बन्धित अवधारणा है, किन्तु यह साधनों की पूर्णतया अवहेलना नहीं कर सकता। फिर भी संविधानवाद मुख्यतः लक्ष्यों का ही सूचक है। इस प्रकार जब संविधानवाद साध्य-प्रधान अवधारणा है तो इसका अर्थ उन आदर्शों से है जिन्हें समाज साध्य के रूप में स्वीकार करता है।

(6) संविधानबाद संविधान पर आधारित अवधारणा है- सामान्य परिस्थितियों में हर लोकतान्त्रिक राजनीतिक समाज के मूल्यों व गन्तव्यों का संविधान में स्पष्ट उल्लेख किया जाता है। ऐसे संविधान पर ही संविधानवाद आधारित रहता है। यही उन संस्थागत प्रक्रियाओं का संगठन व स्थापना करते हैं जिनसे संविधानवाद व्यावहारिक व वास्तविक बनता है। 

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