Wednesday, 23 February 2022

विकासशील देशों में संविधानवाद के स्वरूप को समझाइए।

विकासशील देशों में संविधानवाद के स्वरूप को समझाइए।

विकासशील देशों में संविधानवाद का स्वरूप : विकाशील देशों में संविधानवाद के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित तथ्यों का उल्लेख किया जा सकता है

1. संविधानवाद निर्माणाधीन है - विकासशील देशों में संविधानवाद की अवधारणा पाश्चात्य अथवा विकसित राष्ट्रों से आयातित है। अत: विकासशील देशों में संविधानवाद अपने प्रारम्भिक चरण से गुजर रहा है जिसके अन्तर्गत संविधान निर्माण, विधि के शासन, शक्ति पृथक्करण इत्यादि धारणाओं की महत्ता को स्वीकार करते हए इनकी प्राप्ति के प्रयास भी किये जा रहे हैं। परन्तु विकासशील देशों में इन सभी धारणाओं के सैद्धान्तिक व व्यावहारिक स्तरों में अभी भी पर्याप्त भेद बना हुआ है, जिसे निरन्तर कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं।

2. संविधानवाद मिश्रित प्रकृति रखता है - विकासशील देशों में संविधान व संविधानवादी धारणाओं के क्रियान्वयन के प्रयास तेजी से हो रहे हैं परन्तु अभी भी संविधानवाद को इन राष्ट्रों में स्पष्ट पहचान प्राप्त नहीं हो सकी है। इन देशों में संविधानवाद मिश्रित प्रकृति का दृष्टिगोचर होता है। इसमें एक ओर तो संविधान की सर्वोच्चता की स्थापना के प्रयास दिखते हैं तो वहीं दूसरी ओर शासन की नीतियों व कार्यों में संविधान की मूल भावना का अप्रत्यक्ष उल्लंघन भी दिखाई पड़ता है। विकासशील देश संसदीय लोकतन्त्र के साथ-साथ समाजवादी व्यवस्था से भी प्रभावित है और दोनों के लाभों का उपयोग साथ-साथ करते प्रतीत होते हैं।

3. संविधानवाद प्रवाह के दौर में है - विकासशील देशों में संविधानवाद का प्रवाह निरन्तर हो रहा है। शासन-प्रशासन व विधायन के स्तर पर संविधानवाद के अनुरूप सुधार लाने के प्रयास निरन्तर जारी हैं। राज्यों में लोककल्याण एवं विधि के शासन के प्रति रुझान दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। राज्य द्वारा निरन्तर ऐसे प्रयास किये जा रहे हैं कि संविधानवादी मूल्यों की अधिकाधिक प्राप्ति व सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

4. संविधानवाद दिशारहित चरण में है - विकासशील देशों में संविधानवाद के स्वरूप का विश्लेषण करने पर यह भी तथ्य दृष्टिगोचर होता है कि संविधानवाद इन देशों में अभी तक एक सुनिश्चित मार्ग नहीं चुन पाया है। इन देशों में विकास की तीव्र लालसा के चलते पूंजीवादी व समाजवादी दोनों व्यवस्थाओं के लक्षण अपनाये जाते हैं। ऐसे में संविधानवाद की दिशा का निर्धारण अत्यन्त दुष्कर हो जाता है। ये एक ओर स्वयं को उदार लोकतन्त्र बनाना चाहते हैं तो वहीं दूसरी ओर समाजवादी व्यवस्था से भी प्रभावित हैं। अत: इन देशों में विधायन, शासन-प्रणाली, अर्थव्यवस्था इत्यादि तत्व मिश्रित प्रकृति के प्रतीत होते हैं जो कि संविधानवाद को दिशा-रहित बनाने में भूमिका का निर्वाह करते हैं।

5. राजनीतिक अस्थिरता - विकासशील देशों में राजनीतिक अस्थिरता भी संविधानवाद के स्वरूप को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है। राजनीतिक अस्थिरता के चलते संविधानवाद कई बार संकट में पड़ जाता है। तख्ता पलट, तानाशाही इत्यादि ऐसी घटनाएँ हैं जो कि संवैधानिक शासन पर कठाराघात करती हैं और जब भी ऐसा होता है तो संविधानवाद संकटग्रस्त प्रतीत होने लगता है। अत: विकासशील देशों में संविधानवाद का स्वरूप इसका संकटग्रस्त होना भी होता है।

अत: उपर्युक्त सम्पूर्ण विवेचन के आधार पर निष्कर्षतया यह कहा जा सकता है कि विकासशील देशों में संविधानवाद' की स्थिति अच्छी नहीं है। इसके स्वरूप का विश्लेषण करते हए हम कह सकते हैं कि विकासशील देशों में संविधानवाद एक नवोदित, परिवर्तनशील एवं संकटग्रस्त अवधारणा है। संविधान के विकास पर एक निबन्ध लिखिए।

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