Monday, 14 March 2022

स्थाई / टिकाऊ शहरी विकास पर लेख

स्थाई / टिकाऊ शहरी विकास पर लेख

वर्तमान समय में टिकाऊ शहरी विकास का अर्थ है बदलाव की ऐसी प्रक्रिया जिसमें संसाधनों का उपयोग, निवेश की दिशा, तकनीकी विकास, संस्थानात्मक बदलाव- मानव जीवन की दशा को सुध पारने में इन सभी का योगदान होना चाहिए। यह योगदान निरंतर चलता रहना चाहिए तथा इसे आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए। टिकाऊ विकास इस बात पर बल देता है कि अर्थव्यवस्था एवं पर्यावरण दोनों की स्थिरता बनी रहे, क्योंकि तभी तो विकास भी लंबे समय तक टिक पाएगा। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनाइटेड नेशंज़ एन्वायरन्मेंट प्रोग्रॅम अथवा UNEP) अपने सहयोगी देशों द्वारा अन्य देशों को यह समझाने का प्रयत्न कर रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों के सही प्रबंधन एवं उपयोग से कौन-कौन से अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन लाभ होते हैं। डबल्यू.सी.ई.डी. (WCED) जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है, ने घोषणा की है कि “प्रत्येक मनुष्य को एक स्वच्छ वातावरण में जीने का अधिकार है- ऐसा वातावरण जिसमें उसका स्वास्थ्य बना रहे। प्रत्येक स्थान पर ऐसा विकास होना चाहिए जो स्थायी एवं चिरकालिक हो, तथा वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए लाभकारी हो।"

टिकाऊ शहरी विकास हर विकासशील देश का ध्येय होना चाहिए। मानव बस्तियों पर संयुक्त राष्ट्र की गोष्ठी (यूनाइटेड नेशंज़ कौन्फरेंस ऑन ह्यूमन सटल्मेंट- यू.एन.सी.एच. एस.) ने टिकाऊ शहर की परिभाषा इस प्रकार दी है- “एक ऐसा शहर जहां सामाजिक, आर्थिक एवं भौतिक विकास की उपलब्धियाँ चिरकालिक हों।" किसी भी टिकाऊ शहर का प्राकृतिक संसाधनों का एक स्थाई स्रोत होना चाहिए क्योंकि उसका विकास संसाधनों की पूर्ति पर निर्भर होता है। इसके साथ ही एक टिकाऊ शहर प्राकृतिक विपत्तियों से सुरक्षित होना चाहिए क्योंकि ऐसी विपत्तियाँ उसके विकास में बाधा डालती हैं। 

टिकाऊ शहरी विकास इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में उसके शहरों का बड़ा योगदान होता है। वर्तमान युग में निर्यात में शहरों का योगदान बढ़ रहा है तथा यह मूलधन की स्थापना के लिए भी उपयुक्त स्थान है। शहरों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे श्रेष्ठ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, कलाएँ, विज्ञान एवं तकनीकी, परिवहन तथा संचार के साधन प्रदान करते हैं।

स्थाई शहरी विकास की आवश्यकता

  1. कुल आय एवं उत्पाद एक समान रहना चाहिए या फिर उसमें वृद्धि होनी चाहिए। 
  2. शहरी प्रशासन को अपने निवासियों को एक स्वीकार्य जीवन स्तर उपलब्ध कराना चाहिए।
  3. शहर के निवासियों को उद्यमी मानसिकता के साथ काम करना होगा। 
  4. शहर को स्वावलंबी बनना चाहिए तथा अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए किसी बाहरी स्रोत पर निर्भर नहीं करना चाहिए।
  5. विकास के संस्थानों को निरंतर अपना नवीनीकरण करना चाहिए ताकि शहरों की आवश्यकताओं के लिए उनकी प्रासंगिकता बनी रहे। 
  6. विकास का अच्छा स्तर बनाए रखने के लिए, निजी कंपनियों एवं गैर-सरकारी संस्थाओं को भी विकास कार्यों में भागीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  7. शहरों का फैलाव इस प्रकार हो कि पर्यावरणीय पूंजी का न्यूनतम प्रयोग हो, किंतु साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति होती रहे।

'मानव बस्तियों का टिकाऊ विकास' (सस्टेनेबल ह्यूमन सैटलमेंट डिवेलप्मेंट) विषय पर सन् 1992 में रिओ द जैनियरो शहर में होने वाली डब्ल्यू.सी.ई.डी. (W.C.E.D.) में तैयार होने वाला ‘एजेन्डा 21' इस प्रकार है:

एजेंडा 21 का उद्देश्य

  • प्रत्येक मानव के सिर पर छत हो। 
  • मानव बस्तियों के प्रबंधन में सुधार लाना। 
  • भूमि के सही उपयोग, नियोजन तथा प्रबंधन को बढ़ावा देना। 
  • पर्यावरण सम्बंधी मूलभूत सुविधाओं जैसे जल, स्वच्छता, जल-निकासी, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (ठोस अवशेष तथा कूड़ा करकट की निकासी) के आपसी तालमेल पर बल देते हुए, इन सभी सुविधाओं को उपलब्ध कराना। 
  • मानव बस्तियों में ऊर्जा एवं परिवहन की टिकाऊ तथा स्थाई व्यवस्था उपलब्ध कराना। 
  • जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएँ आने की अधिक आशंका है, उन क्षेत्रों में मानव बस्तियों के नियोजन एवं प्रबंधन को बढ़ावा देना। 
  • ऐसे निर्माण कार्यों को बढ़ावा देना जिनसे पर्यावरण पर कुप्रभाव न पड़े। 
  • मानव संसाधन विकास को बढ़ावा देना तथा मानव बस्तियों के विकास के लिए क्षमता बनाना।

संक्षेप में, स्थाई शहरी विकास का लक्ष्य है एक ऐसा शहर बनाना जो चिरकालिक तथा टिकाऊ हो, जिसमें रहने वाले निवासी सुख से एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर सकें।


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