संविधानवाद से आप क्या आशय है? संविधानवाद की परिभाषा बताइये।

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संविधानवाद से आप क्या आशय है? संविधानवाद की परिभाषा बताइये। 

    संविधानवाद की परिभाषा

    पिनॉक और स्मिथ के अनुसार, "संविधानवाद केवल प्रक्रिया और तथ्य का नाम ही नहीं है, वरन यह राजनीतिक शक्ति के संगठनों का प्रभावशाली नियन्त्रण भी है एवं प्रतिनिधित्व प्राचीन परम्पराओं तथा भविष्य की आशाओं का प्रतीक भी है।"

    राजनीतिक चिन्तन में संविधानवाद अरस्तू के समय से चला आ रहा है और सेबाइन के अनुसार, "अरस्तू के मत में संविधानवाद के तीन मुख्य तत्व हैं। प्रथम, यह शासन जनता के या सर्वसाधारण के हित में होता है; द्वितीय, यह विधि-सम्मत शासन होता है और तृतीय, यह इच्छुक प्रयोजनों का शासन है।"

    जे० एस० राऊसैक के अनुसार, "एक धारणा के रूप में संविधानवाद अनिवार्य रूप से सीमित सरकार और शासक तथा शासित के ऊपर नियन्त्रण की एक व्यवस्था है।"

    ब्लोण्डेल के अनुसार, "संवैधानिक शासन वह है जो कि विशेषतया उदारवादी हो, जो शासन की शक्तियों और उनके प्रयोग को प्रतिबन्धित करता हो और राज्य के नागरिकों को अधिकतम स्वतन्त्रता प्रदान करता हो।"

    के० सी० हीयर ने संविधानवाद को अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है कि "संविधानवादी शासन का अर्थ किसी संविधान के नियमों के अनुसार शासन चलाने से कुछ अधिक है। इसका अर्थ है, निरंकुश शासन के विपरीत नियमानुकूल शासन।.............संविधानवाद की वास्तविक सार्थकता और उसके पीछे मौलिक उद्देश्य यही है कि शासन की सीमाएँ बाँधी जा सकें और शासन चलाने वालों पर कानूनों तथा नियमों के मानने का बन्धन रहे।" 

    संविधानवाद का आशय

    शासन और शासक वर्ग पर नियंत्रण की आवश्यकता प्राचीन काल से ही अनुभव की जाती रही है। प्राचीन काल में इस प्रकार से नियंत्रण नैतिक धारणाओं, धार्मिक उपदेशों और औचित्य-अनौचित्य की सामान्य धारणाओं के रूप में थे, लेकिन अनुभव यह रहा है कि उपर्युक्त प्रकार के नियन्त्रणों की प्रभावशीलता स्वयं शासक वर्ग की इच्छा पर निर्भर करती है और जब कभी विद्यमान शासक वर्ग की सत्ता के लिए चुनौती उत्पन्न हो, शासक वर्ग औचित्य की धारणाओं की मनमानी व्याख्या करते हुए सत्ता पर निहित नियन्त्रणों की अवहेलना और उल्लंघन का मार्ग अपना लेता है। अत: यह सोचा गया है कि शासक वर्ग की शक्तियों पर प्रभावी कानूनी नियंत्रण होने चाहिए।

    प्रत्येक देश में दो प्रकार के कानून होते हैं-साधारण कानून और संवैधानिक कानून अर्थात् संविधान। इनमें सामान्यतया संवैधानिक कानून को सामान्य कानून की तुलना में उच्च स्थिति प्राप्त होती है। शासन और शासक वर्ग को सामान्यतया साधारण कानून और कुछ सीमा तक संवैधानिक कानून से शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। आधुनिक राजनीतिक चिन्तन में इस बात की आवश्यकता अनुभव की गयी है कि शासन और शासक वर्ग पर नियन्त्रण की व्यवस्था स्वयं संविधान में ही होनी चाहिए और नियन्त्रणों की यह व्यवस्था संस्थागत होनी चाहिए, जिससे उसकी अवहेलना अपेक्षाकृत कठिन कार्य हो जाये। शासन और शासक वर्गपर नियन्त्रण की संविधान द्वारा स्थापित संस्थागत व्यवस्था ही संविधानवाद है। विलियम जी० एण्ड्यू ज के शब्दों में कहा जा सकता है-"संविधानवाद का आशय है सीमित शासन-संविधानवाद के अन्तर्गत सरकार पर दो प्रकार की सीमाएँ लगायी जाती हैं। कुछ बातों के सम्बन्ध में शासन शक्ति के प्रयोग का निषेध किया जाता है और अन्य बातों के सम्बन्ध में शक्ति के प्रयोग की प्रक्रिया निश्चित की जाती है। इस प्रकार संविधानवाद के दो पहलु स्वतन्त्रता सम्बन्धी और प्रक्रिया सम्बन्धी हैं।"

    संविधानवाद शासन और नागरिक के सम्बन्धों को ऐसे ढंग से निर्धारित करता है कि शासन सत्ता नागरिक के लिए आतंक का विषय न बन जाय। संविधानवाद केवल उसी राजनीतिक व्यवस्था में सम्भव है, जहाँ संविधान हो और इस संविधान द्वारा राजनीतिक शक्ति के प्रयोगकर्ताओं की न केवल भूमिका निर्धारित की जाये, अपितु इस भूमिका की व्यावहारिकता की व्यवस्था भी की जाये अर्थात् सरकार संविधान की व्यवस्था के अनुरूप ही संचालित हो और इसे व्यवहार में सम्भव बनाने के लिए संवैधानिक नियन्त्रणों व प्रतिबन्धों की प्रभावशाली व्यवस्था हो। सीधे-सादे शब्दों में संविधानवाद का आशय है 'सीमित शक्तियों वाला शासन'।

    संविधानवाद आज के राजनीतिक चिन्तन की एक प्रमुख धारणा और प्रेरणा है और इस कारण लगभग सभी आधुनिक राजनीतिक चिन्तकों द्वारा इस पर अपने विचार व्यक्त किये गये हैं। 

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