परिकल्पना का अर्थ, परिभाषा तथा विशेषताएं

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परिकल्पना का अर्थ, परिभाषा तथा विशेषताएं

    परिकल्पना का अर्थ (Meaning of Hypothesis):

    परिकल्पना शब्द दो शब्दों परि + कल्पना से मिलकर बना है। परि का अर्थ है- चारो ओर कल्पना का अर्थ है विचार करना। इस प्रकार परिकल्पना का अर्थ है बौद्धिक अनुमान या तार्किक अनुमान। परिकल्पना किसी भी अध्ययन को प्रारंभ करने से पहले बनाई गई योजना है। परिकल्पना द्वारा किसी भी विषय अथवा समस्या के बारे में पूर्वानुमान लगाया जाता है तथा अध्ययन की योजना बनाई जाती है। सामाजिक अनुसंधान में परिकल्पना का विशेष महत्व है।

    परिकल्पना का परिभाषा (Definition of Hypothesis):

    (1) लुण्डबर्ग के अनुसार, “परिकल्पना एक कामचलाऊ सामान्यीकरण है, जिसकी सत्यता की परीक्षा अभी बाकी है।"

    (2) गुडे एवं हाट के अनुसार, "परिकल्पना एक ऐसी मान्यता होती है जिसकी सत्यता को सिद्ध करने के लिए उसकी परीक्षा की जा सकती है।"

    (3) बोगार्डस के अनुसार, "परिकल्पना परीक्षण के लिए प्रस्तुत की गयी एक मान्यता है।"

    (4) पी.वी. यंग के अनुसार, "एक अस्थायी लेकिन केन्द्रीय महत्व का विचार जो उपयोगी अनुसंधान का आधार बन जाता है, उसे हम एक कार्यकारी परिकल्पना कहते हैं।"

    उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि परिकल्पना किसी विषय से सम्बन्धित प्रारंभिक अनुमान है जिसके संदर्भ में संपूर्ण अनुसंधान किया जाता है।परिकल्पना अनुसंधान के मार्ग की दिशा बताती है, अध्ययन के बीच में शोधकर्ता को इधर-उधर भटकने नहीं देती तथा अंत में अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत करने तथा पूर्व निष्कर्पो की जाँच में सहायता प्रदान करती है। अध्ययन के द्वारा एकत्रित तथ्यों के आधार पर यदि कोई परिकल्पना सत्य प्रमाणित होती है तो उसे एक सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है और यदि वह सत्य प्रमाणित नहीं होती है तो उसे अस्वीकार कर दिया जाता है। इसी आधार पर परिकल्पना को अक्सर ‘कार्यकारी परिकल्पना' भी कहा जाता है।

    उपयोगी परिकल्पना की विशेषताएं

    (1) स्पष्टता (Clarity)
    (2) अनुभवसिद्धता (Experientialism)
    (3) विशिष्टता (specificity)
    (4) उपलब्ध–प्रविधियों से संबद्ध 
    (5) सिद्धांतों से सम्बन्धित (Related with Available Theories)

    सामाजिक अनुसंधान में अनुसंधानकर्ता किसी न किसी सोंच या पूर्व विचार को लेकर कार्य करता है। इन सोंच या पूर्व विचारों में कुछ विशेषताएं जरूर होती हैं जिनके द्वारा वह अपने निष्कर्षों तक पहुंचता है। वैज्ञानिक प्रयोग के लिए परिकल्पना में कुछ विशेषताओं का होना आवश्यक होता है। गुडे और हाट ने परिकल्पना की पाँच विशेषताओं का उल्लेख किया है

    (1) स्पष्टता (Clarity): गुडे एवं हाट के अनुसार परिकल्पना की स्पष्टता के लिए दो बिन्दुओं का होना आवश्यक है प्रथम परिकल्पनाओं में निहित अवधारणाओं का स्पष्ट होना तथा द्वितीय परिभाषाओं का सरल भाषा में होना। परिकल्पना में प्रयुक्त शब्द ऐसे हों कि दूसरे लोग भी उनका सही अर्थ समझ सकें। परिकल्पना की स्पष्टता अनुसंधानकर्ता की सूझबूझ और अनुभव पर भी निर्भर करती है। 

    (2) अनुभवसिद्धता (Experientialism): परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि परिकल्पना किसी आदर्श को प्रस्तुत करने वाली न हो बल्कि उसके द्वारा किसी विचार अथवा अवधारणा की सत्यता की परीक्षा की जा सके । गुडे तथा हाट ने लिखा है कि ऐसी परिकल्पना आदर्शात्मक होती हैं कि सभी अधिकारी भ्रष्ट होते हैं अथवा उद्योगपति श्रमिकों का शोषण करते हैं। ऐसी परिकल्पना अनुभवसिद्ध नहीं होती और इसलिए इन्हें वैज्ञानिक परिकल्पनाएं नहीं कहा जा सकता। 

    (3) विशिष्टता (specificity): एक परिकल्पना को अध्ययन विषय के किसी विशिष्ट पहलू से संबंधित होना चाहिए। अध्ययन के सभी पक्षों को लेकर एक सामान्य परिकल्पना का निर्माण किया जाए तो अध्ययनकर्ता एक समय में ही विपय के सभी पक्षों का यर्थाथ अध्ययन नहीं कर सकता। ऐसी परिकल्पनाएँ तथ्य संकलन की दृष्टि से अनुपयोगी होती हैं। अतः यह आवश्यक है कि उपयोगी अध्ययन के लिए हम विशिष्ट और छोटी-छोटी परिकल्पनाएँ बनाएँ जो हमें तथ्यों के संकलन में, शोध को व्यवस्थित करने में एवं निष्कर्ष निकालने में सहायता प्रदान कर सकें।

    (4) उपलब्ध–प्रविधियों से संबद्ध (Related with Available Techniques): परिकल्पना का निर्माण करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी सत्यता की परख उपलब्ध प्रविधियों (Available Techniques) के द्वारा हो सके।

    गुडे एवं हाट लिखते हैं कि 'जो सिद्धांतकार यह नहीं जानता है कि उसकी प्राक्कल्पना की जाँच के लिए कौन-कौन सी प्रविधियाँ उपलब्ध हैं, वह उपयोगी प्रश्नों के निर्माण में असफल ही रह जाता है। वास्तविकता यह है कि यह कथन प्रत्येक स्थिति के लिए उपयुक्त नहीं है। 

    सामाजिक घटनाओं की प्रकृति इतनी जटिल और परिवर्तनशील है कि कभी-कभी उपलब्ध प्रविधियों (Available Techniques) के अनुरूप परिकल्पना का निर्माण करना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में शोधकर्ता अपनी परिकल्पना की सत्यता की जाँच के लिए नवीन प्रविधियों का निर्माण कर सकता है। वर्तमान में विभिन्न समस्याओं एवं परिकल्पनाओं के अध्ययन हेतु वैज्ञानिकों ने अनेक नवीन प्रविधियों को विकसित किया है। 

    (5) सिद्धांतों से सम्बन्धित (Related with Available Theories): परिकल्पना का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वह पहले प्रस्तुत किये गये किसी सिद्धान्त अथवा सिद्धान्तों से सम्बन्धित हो।

    यदि कोई परिकल्पना किसी भी सिद्धान्त से सम्बन्धित न हो तो उसकी सत्यता की परीक्षा अक्सर बहुत कठिन हो जाती है। यही कारण है कि किसी परिकल्पना का निर्माण करने से पहले अध्ययन विषय से सम्बन्धित साहित्य और ज्ञान को समझना आवश्यक होता है। पूर्व स्थापित सिद्धान्तों के संदर्भ में बनायी गयी परिकल्पना अधिक क्रमबद्ध होती है।

    यदि सभी अध्ययनकर्ता स्वतंत्र रूप से परिकल्पनाओं का निर्माण करने लगें तो इनके आधार पर विकसित ज्ञान की प्रकृति कठिनता से ही वैज्ञानिक हो सकती है। गुडे और हाट का विचार है कि " जब अनुसंधान व्यवस्थित रूप से पूर्व स्थापित सिद्धान्तों पर आधारित होता है तो ज्ञान में यर्थाथ योगदान की सम्भावना अधिक हो जाती है।"

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