Friday, 11 February 2022

राजनीतिक समाजशास्त्र की प्रकृति एवं उनके क्षेत्र का वर्णन करें।

राजनीतिक समाजशास्त्र की प्रकृति एवं उनके क्षेत्र का वर्णन करें।

  1. राजनीतिक समाजशास्त्र के क्षेत्र के विभिन्न अंगों को समझाइए
  2. राजनीतिक समाजशास्त्र पर एक निबंध लिखिए।
  3. राजनीतिक समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा बताइए

राजनीतिक समाजशास्त्र

राजनीति एक प्रक्रिया व अध्ययन शाखा के रूप में अत्यधिक प्राचीन धारणा या अनुशासन है। राजनीतिशास्त्र की बात करें तो अरस्तू कृत' पॉलिटिक्स', कौटिल्य द्वारा लिखित 'अर्थशास्त्र' राजनीतिशास्त्र से सम्बन्धित महानतम ग्रन्थ हैं जोकि प्रमाणित करते हैं कि राजनीतिशास्त्र के अध्ययन की परम्परा अति प्राचीन है, परन्तु कालान्तर में राज्य के क्षेत्र, जनसंख्या, कार्यों व उत्तरदायित्वों में अत्यधिक वृद्धि होती गयी जिस कारण राजनीतिशास्त्र के अध्ययन का केन्द्र बिन्दु महज राज्य व सरकार तक सीमित न रहा। इसके अन्तर्गत शक्ति, प्रभाव, सत्ता, विशिष्टजन, लोकमत एवं लोकव्यवहार, समुदाय, समितियाँ इत्यादि धारणाओं का समावेश हुआ। इस प्रकार सामाजिक प्रक्रियाओं के मध्य विभाजन समाप्त होने लगा।

अतः समाजशास्त्र के प्रभाव के कारण जहाँ एक ओर राजनीतिशास्त्र का दृष्टिकोण और सन्दर्भ की सीमाओं का विस्तार हुआ, तो वहीं दूसरी ओर इसकी विषय वस्तु और चरित्र इतना परिवर्तित हो गये कि एक नवीन अध्ययन विषय के रूप में 'राजनीतिक समाजशास्त्र' का उदय हुआ। इस प्रकार राजनीतिक समाजशास्त्र राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र दोनों से सम्बन्धित है। अतः राजनीतिक समाजशास्त्र अत्यन्त महत्वपूर्ण व समकालीन अध्ययनशाखा अथवा उपागम है, इसके विविध पक्षों का विस्तृत विवेचन निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है:

राजनीतिक समाजशास्त्र की परिभाषाएँ

राजनीतिक समाजशास्त्र को विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया है, जिनमें से कुछ परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं -

डॉ. वात्स्यायन के अनुसार - "राजनीतिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की एक नवीन शाखा है, जो राजनीतिक संस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं के परस्पर सम्बन्ध का अध्ययन करती है।"

लेविस कोजर लिखते हैं कि - "राजनीतिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध सामाजिक कारकों तथा तात्कालिक समाज में शक्ति वितरण से है।"

डाउसे एवं यूज के अनुसार - "राजनीतिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की ही एक शाखा है, जिसका सम्बन्ध मुख्य रूप से राजनीति और समाज में अन्तः क्रिया का विश्लेषण करता है।"

डेविड पोपीनो लिखते हैं कि - "राजनीतिक समाजशास्त्र, वृहद सामाजिक संरचना, समाज की राजनीतिक संस्थाओं के आपसी सम्बन्धों का अध्ययन है।"

टी.बी.बोटोमोर के अनुसार - "राजनीतिक समाजशास्त्र का सम्बन्ध सामाजिक सन्दर्भ में शक्ति से है।"

इस प्रकार उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि - "राजनीतिक समाजशास्त्र अध्ययन की वह नवोदित विधा है जिसके अन्तर्गत राजनीतिक व सामाजिक महत्व की इकाइयों, संरचनाओं व घटकों का एक विशिष्ट अन्तर्सम्बन्धनीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है।

राजनीतिक समाजशास्त्र की विशेषताएँ

राजनीतिक समाजशास्त्र की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई जा सकती हैं -

  1. राजनीतिक समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की एक नवीन शाखा है।
  2. राजनीतिक समाजशास्त्र, राजनीतिक संस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन करता है।
  3. राजनीतिक समाजशास्त्र राजनीति के विविध पक्षों का विश्लेषण समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण व पद्धतियों से करता है।
  4. राजनीतिक समाजशास्त्र इस विश्वास पर आधारित है कि मानव की राजनीतिक व सामाजिक क्रियाओं का प्रभाव राजव्यवस्था व समाज दोनों पर पड़ता है।
  5. राजनीतिक समाजशास्त्र में राजनीतिक और सामाजिक दोनों चरों को समान महत्व दिया जाता
  6. राजनीतिक समाजशास्त्र शक्ति व प्रभाव के सामाजिक सरोकारों का विश्लेषण करता है।
  7. राजनीतिशास्त्र व समाजशास्त्र से सम्बद्ध होने के बावजद राजनीतिक समाजशास्त्र की पृथक् विषय के रूप में पहचान कायम है।

राजनीतिक समाजशास्त्र का क्षेत्र / विषय वस्तु

राजनीतिक समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र का निर्धारण एक जटिल कार्य है, क्योंकि यह अपने प्रारम्भिक चरण से गुजर रहा है। अनेक विद्वानों ने इसके विषय क्षेत्र को अपने अनुसार निर्धारित करने का प्रयास किया है, इनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं -

गियर एवं ओरलियन्स ने राजनीतिक समाजशास्त्र की विषय वस्तु का बताते हुए इसके निम्नलिखित क्षेत्र बताए हैं -

  1. राज्य की संरचना, 
  2. राजनीतिक औचित्य की प्रकृति एवं उसकी स्थापना की शर्ते। 
  3. राजनीतिक शक्ति के एकाधिकार की प्रकृति एवं राज्य द्वारा इसका प्रयोग।
  4. उप इकाइयों - दबाव समूह, राजनीतिक दल, स्वैच्छिक संघ तथा अन्य समूहों की प्रकृति तथा राज्य के साथ उनके प्रतिरोध की स्थिति।

लिपसेट एवं बैंडिक्स ने राजनीतिक समाजशास्त्र की विषय वस्तु में निम्नलिखित घटकों कों सम्मिलित किया है

  1. मतदान व्यवहार। 
  2. विभिन्न आर्थिक एवं सृजनात्मक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण। 
  3. दबाव गुटों एवं राजनीतिक आन्दोलनों का अध्ययन। 
  4. राजनीतिक दल। 
  5. राजनीतिक अल्पसंख्यक। 
  6. सरकार और नौकरशाही। 

मिचेल्स के अनुसार राजनीतिक समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र में निम्नलिखित तत्व सम्मिलित हैं - 

  1. औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाएँ। 
  2. विशिष्ट जन एवं उनकी सदस्यता। 
  3. संघर्ष के आर्विभाव एवं नियमन। 
  4. हित समूह एवं दबाव समूह। 
  5. राजनीतिक मतों का निर्माण।
  6. राजनीतिक संस्थाओं के रूप में राजनीतिक दलों तथा विभिन्न प्रकार की शासन पद्धतियों का अध्ययन।

इस उपर्युक्त भिन्न-भिन्न मतों के विश्लेषण के आधार पर राजनीतिक समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के अन्दर निम्नलिखित तत्वों का उल्लेख किया जा सकता है -

  1. विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन। 
  2. राजनीतिक संरचनाओं तथा संस्थाओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन। 
  3. नौकरशाही एवं अभिजन वर्ग का अध्ययन। 
  4. जनतन्त्रात्मक समाज का अध्ययन। 
  5. जनमत एवं प्रचार का अध्ययन। 
  6. राजनीतिक आन्दोलनों का अध्ययन। 
  7. सामाजिक संस्तरण एवं राजनीतिक विचार का अध्ययन। 
  8. शक्ति तथा सत्ता का अध्ययन। 
  9. युद्ध और शान्ति का अध्ययन। 
  10. राजनीतिक त्वरित परिवर्तनों (क्रान्तियों) का अध्ययन।

राजनीतिक समाजशास्त्र की प्रकृति

राजनीतिक समाजशास्त्र की प्रकृति की बात करें तो सामान्यतया एक विज्ञान है और विशिष्ट परिस्थितियों में यह कला के रूप में भी दृष्टिगोचर होती है। वस्तुतः राजनीतिक समाजशास्त्र की प्रकृति को निम्न शीर्षकों में समझा जा सकता है :

1. राजनीतिक समाजशास्त्र - विज्ञान के रूप में - राजनीतिक समाजशास्त्र सामाजिक विज्ञानों की कसौटी पर खरा उतरता है। इसे विज्ञान होने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं -

    1. इसमें अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग होता है। 
    2. राजनीतिक समाजशास्त्र का अध्ययन तथ्यात्मक है। 
    3. राजनीतिक समाजशास्त्र के सिद्धान्त सार्वभौमिक हैं। 
    4. इसके सिद्धान्तों का प्रमाणन सम्भव है। 
    5. इसमें भविष्यवाणी करने की अच्छी क्षमता है। 
    6. यह कार्य-कारण सम्बन्धों की व्याख्या करता है।

2. राजनीतिक समाजशास्त्र - कला के रूप में : कला से अभिप्राय किसी ज्ञान अथवा कौशल को व्यवहार में लाना होता है। इस परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक समाजशास्त्र को एक कला भी माना जा सकता है क्योंकि इसमें निर्णय शक्ति है, नियोजन की क्षमता, कौशल व व्यूह रचना है। इसी प्रकार इसमें विधियों तथा प्रविधियों के उपयोग पर भी विशेष बल दिया जाता है।

इस प्रकार उपर्युक्त दोनों ही रूपों का विश्लेषण करते हुए हम कह सकते हैं कि राजनीतिक समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की भाँति प्रकृति से एक ऐसा विज्ञान है जिसमें कला के लक्षण भी निहित हैं।

निष्कर्ष - अन्ततः उपर्युक्त समस्त विवेचन के आधार पर निष्कर्षतया कहा जा सकता है कि राजनीतिक समाजशास्त्र वर्तमान राज्यों के वृहद् कार्यक्षेत्र, दायित्वों व जटिलताओं के सन्दर्भ में विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक समस्याओं के सटीक समाधान खोजने हेतु विकसित एक नवीन अध्ययन विधा है, जोकि राजनीति व समाजशास्त्र दोनों विषयों के मध्य अन्तर्सम्बन्ध स्थापित करते हए सटीक विश्लेषणों व समाधानों को सझाने हेतु निरन्तर तत्पर है। कालान्तर में इसके विकास की अत्याधिक सम्भावनाएँ मौजूद हैं।


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