राजनीति शास्त्र के गुण एवं दोष बताइए।

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राजनीति शास्त्र के गुण एवं दोष बताइए।

राजनीति शास्त्र के गुण

बिना मूल्यों का अधिग्रहण किये राज्य अथवा राजनीति का वैज्ञानिक ज्ञान ऐसे उपकरणों की भाँति है, जिसके उपयोग का उसे पता नहीं है। व्यवहारवादी क्रान्ति से प्रभावित होकर यह विचार उभरा कि राजनीति तथा मूल्यों में कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तु वैज्ञानिक मल्य-सापेक्षवाद के सिद्धान्त द्वारा यह सिद्ध हो चका है कि वैज्ञानिक पद्धति द्वारा मूल्यों का अध्ययन हो सकता है।

लासवैल ने शक्ति और मूल्यों के पारस्परिक सम्बन्धों को अपने अध्ययन का आधार बनाया है। ईस्टन भी मूल्यों के विनिधान तथा क्रियान्वयन को महत्त्वपूर्ण स्थान देता है। राजनीति तथा राज्य जीवन के पक्ष से सम्बन्धित होने के कारण आंशिक, सीमित, आनभाविक तथा भौतिक हैं। उन्हें व्यापकता, सम्पूर्णता तथा ज्ञान के सन्दर्भ में देखने के लिए दार्शनिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। दार्शनिक दृष्टिकोण राजनीति विज्ञान को (1) उच्चतर मूल्यों की ओर ले जाता है, तथा (2) दूसरे विषयों के संदर्भ में व्यापक तथा वास्तविक ज्ञान करवाता है। इसी माध्यम से स्वतन्त्रता, समानता, न्याय, लोक-कल्याण, लोक राज, शक्ति, शान्ति जैसी अवधारणाओं को सही अर्थ प्रदान किये जा सकते हैं।

राजनीति शास्त्र के दोष (सीमाएँ)

  1. दार्शनिक दृष्टिकोण कल्पना प्रधान, व्यक्तिनिष्ठ, वास्तविकताओं से दूर, आरोपित तथा विज्ञानेतर है। परिणामतः उसके मूल्य, पद्धतियां और निष्कर्ष अविश्वसनीय हो सकते हैं।
  2. इस ढंग द्वारा 'जो है' तथा 'जो चाहिए' का भेद नहीं किया जाता। विशुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण दार्शनिक उपागम की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं करता।
  3. इस उपागम में विचारवादी ;कमवसवहपबंसद्ध तत्त्व भी घुल-मिल जाते हैं।

4. सादृश्यात्मक पद्धति (Analogical Approach)- अधिकांश लेखक इसे तुलनात्मक उपागम का ही एक विशेष रूप मानते हैं। इस पद्धति का व्यापक प्रयोग हरबर्ट स्पेन्सर तथा ब्लुशली ने किया।

गिलक्राइस्ट ने इसकी विस्तृत चर्चा की है। स्पेन्सर ने इस पद्धति द्वारा राज्य तथा जीवधारी के शरीर के बीच कितने ही सादृश्य ढूँढे और इन्हीं के आधार पर अपने आंगिक सिद्धान्त (Organic Theory) का प्रतिपादन किया। किन्तु जैसा कि डा० आशीर्वादम ने कहा है, इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सादृश्यता प्रमाण नहीं है। यह तो एक सम्भावना का सुचक मात्र है, निश्चितता का नहीं। यह पद्धति भ्रमपूर्ण धारणाएँ उत्पन्न करती है। अतः इस पर अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए।

कछ विद्वानों ने इस पद्धति के कई उपविभागों की चर्चा की है-समाजशास्त्रीय (Sociological), जीव विज्ञानीय (Biological), न्यायमूलक (Juridical), मनोवैज्ञानिक (Psychological) उपागम आदि। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि परम्परागत रूप से राजनीति का अध्ययन अनेक दृष्टिकोणों एवं पद्धतियों के द्वारा किया जाता है।

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