Tuesday, 1 February 2022

राजनीति के परम्परागत दृष्टिकोण पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

राजनीति के परम्परागत दृष्टिकोण पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

राजनीति का परम्परागत दृष्टिकोण: परम्परागत राजनीति-शास्त्र मुख्यतः राज्य, सरकार, राजनीतिक विचारधारा, संकुचित अन्तर्राष्ट्रवाद तथा केवल संस्थात्मक अध्ययन के साथ ही सम्बन्धित है। उसका संबंध निम्नलिखित संस्थाओं तथा तत्त्वों के साथ है -

1. राज्य के साथ संबंध (Concerned with the State)- राजनीति (Politics) राज्य का विज्ञान है तथा इसमें मुख्य रूप से राज्य का अध्ययन किया जाता है। इसमें राज्य का पूर्ण अध्ययन किया जाता है।

ब्लूंशली (Bluntschlli) का मत है कि “राजनीति में राज्य के आधारभूत तत्त्वों. उसके आवश्यक स्वरूप, उसकी अभिव्यक्ति के विविध रूपों और उसके विकास आदि के बारे में अध्ययन किया जाता है।"

गैटेल (Gettel) के विचारानुसार, “ऐतिहासिक पहलू से राजनीति-शास्त्र राज्य की उत्पत्ति, राजनीतिक संस्थाओं के विकास तथा भूत के सिद्धान्तों का अध्ययन करता है। वर्तमान पर विचार करते हुए यह वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं तथा विचारधाराओं का वर्णन, उनकी तुलना तथा वर्गीकरण करने का प्रयत्न करता है। परिवर्तनशील परिस्थितियों तथा नैतिक मान्यताओं के आधार पर राजनीतिक संस्थाओं तथा क्रिया-कलापों को उन्नत बनाने के उद्देश्य से यह भविष्य की ओर देखता है कि राज्य कैसा होना चाहिए।"

  • राज्य कैसा था? (What was State?)- वर्तमान का भूतकाल से संबंध होता है। इसलिए राज्य की वर्तमान स्थिति उस समय तक पूरी तरह समझ में नहीं आ सकती जब तक कि हम इसकी भूतकालीन परिस्थितियों के बारे पता न लगाएँ। राज्य के बारे में हमें इतिहास की सहायता से राज्य से सम्बन्धित बातों का पता लगाना पड़ता है कि राज्य की उत्पत्ति क्यों हुई, कैसे हुई और कब हुई ? भूतकाल में राज्य का स्वरूप क्या था, राज्य ने किन-किन परिस्थितियों (conditions) से गुजर कर विकास किया है तथा वह कैसे अपनी वर्तमान स्थिति में पहुँचा है। हमें यह भी देखना पड़ता है कि भूतकाल में राज्य का संबंध किन-किन संस्थाओं के साथ था। लोगों का अब तक अपने राजनीतिक जीवन में किन-किन बातों से संबंध था।
  • राज्य क्या है? (What is State?)- परम्परागत राजनीति-शास्त्र में इन बातों का अध्ययन किया जाता है कि राज्य क्या है, राज्य का स्वरूप क्या है, इसके उद्देश्य क्या हैं, नागरिकों के साथ इसके कैसे संबंध हैं, राज्य अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन-से साधनों का प्रयोग करता है। अपने जीवन के विकास के लिए व्यक्ति समाज में बने विभिन्न राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, शिक्षा सम्बन्धी तथा अन्य समुदायों का सहारा लेता है और राज्य इन सब समुदायों में श्रेष्ठ तथा शक्तिशाली माना गया है। राज्य के वर्तमान अध्ययन में यह देखा जाता है कि राज्य व्यक्ति के कल्याण के लिए कौन-कौन सा कार्य कर रहा है।
  • राज्य कैसा होना चाहिए ? (What the State ought to be)- राज्य का वर्तमान स्वरूप पूर्ण नहीं है। राज्य सदा विकास की ओर बढ़ता आया है तथा बढ़ता रहेगा। परिवर्तन प्रकृति का नियम है (Change is the Law of Nature)। परम्परागत राजनीति-शास्त्र में हम इस बात पर विचार करते हैं कि भविष्य में राज्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए। भूतकाल (Past) के अनुभवों तथा वर्तमान स्थिति की जाँच के पश्चात् यह निश्चित किया जाता है कि एक आदर्श राज्य (Ideal State) में राज्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए ? उसे नागरिकों के कल्याण के लिए क्या-क्या करना चाहिए ? राज्य का संगठन कैसा होना चाहिए ? राज्य का वर्तमान संगठन दोषपूर्ण है। इसलिए यह देखना बड़ा आवश्यक है कि भविष्य में राज्य का स्वरूप कैसा होना चाहिए।

2. सरकार के साथ संबंध (Concerned with Government) - सीले और लीकॉक जैसे लेखकों का कहना है कि राजनीति का संबंध सरकार से है। उन्होंने इसकी परिभाषा भी इसी ढंग से की है लेकिन उसमें 'राज्य' (State) शब्द को सम्मिलित नहीं किया है. परन्तु यदि विचार किया जाए तो ज्ञात होगा कि ये मत अपूर्ण हैं, क्योंकि राजनीति-शास्त्र में जिस प्रकार राज्य का अध्ययन किया जाता है, उसी प्रकार सरकार का भी। राज्य और सरकार यद्यपि दो भिन्न धाराणाएँ हैं तथापि इन्हें एक-दसरे से अलग नहीं किया जा सकता। सरकार के बिना कोई राज्य नहीं हो सकता. और इसी प्रकार राज्य के बिना कोई सरकार नहीं रह सकती। इसी प्रकार राज्य का अध्ययन तब तक पूरा नहीं समझा जा सकता जब तक इसमें सरकार का अध्ययन सम्मिलित न हो। सरकार वह संस्था है जिसके माध्यम से राज्य ही अपनी इच्छाओं को प्रकट करता है तथा उसकी पूर्ति करता है। इस कारण राज्य का अध्ययन उस समय तक पूरा नहीं कहा जा सकता जब तक सरकार का भी अध्ययन न किया जाए। सरकार राज्य का आवश्यक तत्त्व है। वह कैसे बनती है, उसके कितने रूप हैं, और प्रत्येक अंगों तथा रूपों के लाभ या हानियाँ क्या-क्या हैं ? सरकार के कितने अंग हैं और प्रत्येक अंग का क्या कार्य है तथा दूसरे के साथ क्या संबंध है, सैनिक तथा असैनिक कर्मचारियों की नियुक्ति कैसे होती है और इनके कर्तव्य क्या हैं, इन सब बातों का अध्ययन परम्परागत राजनीति के अन्तर्गत किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह भी अध्ययन किया जाता है कि स्थानीय तथा केन्द्रीय सरकार में क्या संबंध है। अतः सरकार के कार्यों का बँटवारा किस प्रकार होता है।

यही कारण है कि लॉस्की, गैटेल और गिलक्राइस्ट जैसे आधुनिक युग के राजनीति वैज्ञानिकों ने राजनीति-शास्त्र के क्षेत्र में राज्य और सरकार दोनों को ही सम्मिलित किया है।

विलोबी के मतानुसार, “राजनीति-शास्त्र में तीन बड़े विषयों पर विचार किया जाता है। वे इस प्रकार हैं-राज्य, सरकार और कानून।"

3. राजनीतिक विचारधारा के साथ संबंध (Concerned withPolitical Ideology) - इसमें राजनीतिक सिद्धान्तों, विचारधारा तथा मान्यताओं पर भी विचार किया जाता है। इन सिद्धान्तों तथा मान्यताओं ने सदैव राज्य के विकास और संगठन को तथा उसकी क्रियाशीलता को प्रभावित किया है। राजनीति-शास्त्र का इन सबसे मुख्य संबंध रहता है।

जिन राजनीतिक सिद्धान्तों का राजनीति-शास्त्र में हम अध्ययन करते हैं उनमें से मुख्य ये हैं-समाजवाद (Socialism), आदर्शवाद (Idealism), व्यक्तिवाद (Individualism), फासीवाद, (Fascism) गान्धीवाद (Gandhism), साम्यवाद (Communism) आदि।

4. संकुचित अन्तर्राष्ट्रीयवाद के साथ संबंध (Concerned with Narrow Internationalism) - राजनीति-शास्त्र का संबंध केवल राष्ट्रीय मुद्दों के साथ न होकर राज्य के बाहर के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के साथ भी होता है। परम्परागत राजनीति में राज्यों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों (International Relations) का भी अध्ययन शामिल होता है। राजनीति ही अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के बारे में जानकारी देती है। इसका संबंध लीग ऑफ नेशन्स (League of Nations), संयुक्त राष्ट्र (United Nations) आदि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से भी होता है। विश्व संघ (World Federation) की धारणा का अध्ययन तथा विकास भी राजनीति में ही हुआ है। परन्तु परम्परागत राजनीति में अन्तर्राष्ट्रीयता का अध्ययन केवल संकुचित रूप में ही किया जाता है।

5. केवल औपचारिक संस्थाओं के साथ संबंध (Concerned with formal Institutions only) - परम्परागत राजनीति का संबंध केवल सरकार के ढाँचे के साथ ही होता है। राजनीति में केवल सरकार की संरचनाओं, इकाइयों आदि का संस्थात्मक (Institutional) तथा संरचनात्मक (Structural) अध्ययन ही किया जाता है। जैसे, इसमें राजनीति केवल कार्यपालिका (Executive), विधानपालिका (Legislature) तथा न्यायपालिका (Judiciary) के ढाँचे से ही सम्बन्धित मानी जाती है। परम्परागत रूप में राजनीतिक क्रिया-कलापों (Political processes) को कम महत्त्वपूर्ण समझा जाता है।।

अतः परम्परागत राजनीति में राजनीति का अध्ययन वर्णनात्मक (Descriptive), संस्थात्मक (Institutional), संकीर्ण (Parochial), गतिहीन (Static), आदर्शात्मक (Normative) तथा औपचारिक संस्थागत (Formal Institutional) रूप में ही किया जाता रहा है।

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