Thursday, 17 February 2022

सोरोकिन के सिद्धांत की विशेषताएं बताइए।

सोरोकिन के सिद्धांत की विशेषताएं बताइए।

सोरोकिन के सिद्धांत की विशेषताएं सोरोकिन के सिद्धांत की निम्नलिखित विशेषताएं हैं, जो इस प्रकार से हैं

सोरोकिन के सिद्धांत की विशेषताएं

(1) संस्कृति में प्रवाह का सिद्धांत - समाज कभी स्थिर नहीं रहता इस सिद्धांत में उतार-चढ़ाव को अधिक महत्व दिया गया है। यह उतार-चढ़ाव संवेगात्मक से संस्कृति से भावात्मक व पुनःसंवेगात्मक में होता रहता है, इसी से हमारी सामाजिक संस्थाएँ समितियाँ, परिवार, राhज्य दर्शन, कला, विज्ञान व धर्म आदि व्यवस्थाएँ बदल जाती हैं।

(2) सांस्कृतिक अर्थों का केन्द्रीयता का सिद्धांत - इनके अनुसार संस्कृति एक व्यवस्था है जिसके संवेगात्मक व भावात्मक दो विपरीत छोर हैं। इन व्यवस्थाओं में जो उप-व्यवस्थाएँ होती हैं वह तार्किक अर्थपूर्ण ढंग में समन्नित होती हैं। इस समन्वय से ही सांस्कृति व्यवस्था का निर्माण होता है इसी को स्पष्ट करते हुए सोरोकिन ने कहा कि संस्कृति की वास्तविकता सही अर्थों में ही छिपी है। स्त्री व पुरूष के बीच सहवास की क्रिया जैविक एवं शारीरिक दृष्टि से एक-सी होते हुए भी अर्थपूर्ण सम्बन्ध में वैवाहिक आनन्द, बलात्कार व अनैतिक व्यापार बन जाती है।

(3) चरम सीमाओं का सिद्धांत - इनके अनुसार संस्कृति के किसी भी स्वरूप का विकास असीमित नहीं होता उसकी एक सीमा जिसके आगे वह विकास हो ही नहीं सकता और न ही संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुँचने के बाद दूसरी दिशा में मुड़कर दूसरे स्वरूप को जन्म देती है। मनुष्य अपने मूल्यों द्वारा उस पर एक सीमा तक ही धीमी आवाज निकाल सकता है इस प्रकार जोर की ध्वनि निकालने की भी एक चरम सीमा है, यही बात सांस्कृतिक विकास पर भी लागू होती है यदि समाज चरम आध्यात्मिकता में डूब जाए तो प्रगति रुक जाएगी।

(4) प्रवृत्तियों एवं प्रतिमानों का सिद्धांत - सोरोकिन के अनुसार, परिवर्तन होता तो अवश्य है लेकिन यह कब व किधर हो जाए इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। परिवर्तन की दिशा को सीमा में नहीं बाँधा जा सकता और न ही उसका कोई अनमान भी लगाया जा सकता है। सदरलैण्ड ने इस परिवर्तन को बालू पर घूमते हुए मुर्गी के बच्चे के उदाहरण से स्पष्ट किया है, मुर्गी का बच्चा इधर-उधर घूमता रहता है वह कब अपनी गति को धीमा व तेज कर दे व किधर भी चल पड़े यह निश्चित नहीं है। भावात्मक व संवेगात्मक संस्कृति बीच परिवर्तन की सीमा भी कुछ इसी तरह ही है।

(5) अन्तःस्थ परिवर्तन का सिद्धांत - सोरोकिन के सामाजिक परिवर्तन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है, परिवर्तन की स्वाभाविकता की व्याख्या। उनके अनुसार, यदि यह प्रश्न उठाया जाए कि 'परिवर्तन होता रहता है परन्तु कहाँ से होता है, इसके स्त्रोत कहाँ हैं तो इसका उत्तर है अन्त:स्थ परिवर्तन का सिद्धांत। इसी के आधार पर इन्होंने यह स्वीकार किया है कि परिवर्तन की शक्ति स्वयं पदार्थ में ही निहित रहती है समाज व संस्कृति में विकास की क्षमताएँ छिपी रहती हैं, बाह्य स्वभाव संस्कृति को प्रभावित करता है और उनकी भूमिका केवल मध्यस्थ कारकों की ही होती है।

उपर्युक्त सिद्धांत को अमेरिका व यूरोप के समाज पर लागू किया तो उन्हें अनुभव हुआ कि अमेरिका व पश्चिम की संस्कृति अब संवेगात्मक परिपक्वास्था पर पहँच चकी है क्योंकि हर व्यक्ति विलासिता में लिप्त है इसलिए आधुनिक युग को सोरोकिन ने संकट का युग कहकर पुकारा है। 


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