Monday, 17 January 2022

विधानसभा के संगठन, कार्यकाल तथा अधिकारों (शक्तियों) का उल्लेख कीजिए।

विधानसभा के संगठन, कार्यकाल तथा अधिकारों (शक्तियों) का उल्लेख कीजिए।

  1. विधानसभा की रचना पर प्रकाश डालिए। 
  2. विधानसभा के लिए सदस्यों की योग्यता क्या होनी चाहिए?
  3. विधानसभा के अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य बताइये।
  4. राज्य विधान सभाओं की शक्तियों का वर्णन कीजिए। 
  5. विधानसभा के पदाधिकारी।
  6. विधानसभा की विधायी शक्ति पर प्रकाश डालिए। 

संविधान के द्वारा भारत के प्रत्येक राज्य में एक विधानमण्डल की व्यवस्था की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 168 में कहा गया है कि "प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमण्डल होगा जो राज्यपाल तथा कुछ राज्यों में दो सदनों से तथा कुछ में एक सदन से मिलकर बनेगा। जिन राज्यों में दो सदन होंगे, उनके नाम क्रमशः विधानसभा और विधान परिषद होंगे। प्रत्येक राज्य में जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों का एक सदन होता है, विधानमण्डल के इस प्रथम सदन को 'विधानसभा कहते हैं। जिन राज्यों में विधानमण्डल का दूसरा सदन है उसे 'विधान परिषद' कहते हैं।

विधानपरिषद वाले राज्यों में विधानमण्डल के निम्न तीन अंग हैं : 

  1. राज्यपाल। 
  2. विधानसभा - जिसे प्रथम या निम्न सदन कहते हैं
  3. विधान परिषद - जिसे द्वितीय या उच्च सदन कहते हैं।

विधानसभा की रचना अथवा संगठन

विधानसभा विधानमण्डल का प्रथम और लोकप्रिय सदन है। जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन होते हैं, वहाँ पर यह विधान परिषद से अधिक शक्तिशाली है।

सदस्य संख्या - संविधान में राज्य की विधानसभा के सदस्यों की केवल न्यूनतम और अधिकतम संख्या निश्चित की गयी। संविधान के अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य की विधानसभा से सदस्यों की अधिकतम संख्या 5000 और न्यूनतम संख्या 60 होगी। चुनाव के लिये प्रत्येक राज्य को भौगोलिक आधार पर अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाता है कि विधानसभा का प्रत्येक सदस्य कम से कम 75 हजार जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे।

स्थान आरक्षण - राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की व्यवस्था 25 जनवरी, 2010 ई. (79 वें संवैधानिक संशोधन 2000) तक लिये है। राज्य की विधानसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो वह समुदाय के सदस्य को विधानसभा में मनोनीत कर सकता है।

निर्वाचन पद्धति - आंग्ल-भारतीय समुदाय के नामजद सदस्यों को छोड़कर विधानसभा के अन्य सभी सदस्यों का मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनाव होता है। इन चुनावों के लिए वयस्क मताधिकार और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली अपनायी गयी है।

मतदाताओं की योग्यतायें - मतदाता होने के लिये 61वें संवैधानिक संशोधन (1989) के बाद 18 वर्ष की आयु प्राप्त भारतीय नागरिक होना चाहिए। ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि उसे पागल. दिवालिया या अन्य किसी अपराध के कारण मताधिकार से वंचित कर दिया गया हो। उसका नाम मतदाता सूची में होना चाहिए।

सदस्यों की योग्यतायें - विधानसभा की सदस्यता के लिये व्यक्ति को निम्नवत् योग्यतायें प्राप्त होनी चाहिए

  1. वह भारत का नागरिक 
  2. उसकी आयु कम से कम 25 वर्ष हो 
  3. भारतीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण न किया हो। 
  4. वह पागल या दिवालिया घोषित न किया गया हो।

कोई भी व्यक्ति राज्य विधानमण्डल के दोनों सदनों का एक साथ सदस्य नहीं हो सकता, न ही वह दो या दो से अधिक राज्यों के विधानण्डल का सदस्य हो सकता है।

विधानसभा का कार्यकाल - राज्य विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। राज्यपाल द्वारा इसे समय के पूर्व भी भंग किया जा सकता है, परन्तु यदि संकट काल की घोषणा प्रवर्तन में हो तो संसद विधि द्वारा विधान सभा का कार्यकाल बढ़ा सकती है।

विधानसभा के पदाधिकारी - प्रत्येक राज्य की विधानसभा के दो मुख्य पदाधिकारी होते हैं - 

  1. अध्यक्ष,
  2. उपाध्यक्ष

इन दोनों का चुनाव विधान सभा के सदस्य अपने सदस्यों में से ही करते हैं तथा इनका कार्यकाल विधानसभा के कार्यकाल तक होता है। इसके बीच अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को तथा उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को दे सकता है।

विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य 

विधानसभा के अध्यक्ष के अधिकार तथा कार्य निम्नलिखित हैं -

  1. विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सदन की कार्यवाही का संचालन करता है।
  2. सदन में शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना उसका मुख्य उत्तरदायत्वि है तथा इस हेतु उसे समस्त आवश्यक कार्यवाही करने का अधिकार है।
  3. सदन की कार्यवाही से ऐसे शब्दों को निकाले जाने का आदेश दे सकता है, जो असंसदीय अथवा अशिष्ट हैं।
  4. सदन के नेता के परामर्श से वह सदन कार्यवाही का क्रम निश्चित कर सकता है।
  5. वह प्रश्नों को स्वीकार करता है या नियम-विरुद्ध होने पर उन्हें अस्वीकार करता है।

अध्यक्ष की अनुपस्थिति में इन सभी कार्यों का सम्पादन उपाध्यक्ष करता है। यदि दोनों ही अनुपस्थित हों तो विधानसभा अपने सदस्यों में से किसी एक को कार्यवाहक अध्यक्ष चुन लेती है।

विधानसभा की शक्तियाँ एवं कार्य

राज्य विधानमण्डल की शक्तियों का एवं कार्यों का वर्णन निम्न प्रकार है -

  1. विधायी शक्ति - राज्य के विधानण्डल को सामान्यतया उन सभी विषयों पर कानून निर्माण 'की शक्ति प्राप्त है जो राज्य सूची और समवर्ती सूची में दिये गये हैं, परन्तु समवर्ती सूची के विषयों पर राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्मित कोई विधि यदि उसी विषय पर संसद द्वारा निर्मित विधि के विरुद्ध हो, तो राज्य ग्धिानमण्डल द्वारा निर्मित विधि मान्य नहीं होगी। राज्य विधानमण्डल की कानून निर्माण की शक्ति पर निम्नलिखित प्रतिबन्ध भी हैं -
    1. अनुच्छेद 356 के अनुसार यदि राज्य में संवैधानिक तन्त्र भंग होने के कारण राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है अथवा यदि अनुच्छेद 352 या 360 के अन्तर्गत भारत में संकटकाल लागू हो तो ऐसी स्थिति में संसद राज्य सूची के सभी विषयों पर कानून बना सकती है।
    2. अनुच्छेद 249 के अनुसार राज्यसभा यदि राज्य सूची के किसी विषय के सम्बन्ध में 2/3 बहमत से ऐसा प्रस्ताव पास कर दे कि राष्ट्रीय हित में ससंद को इस विषय पर कानून बनना चाहिए, तो संसद ऐसा कर सकती है।
  2. वित्तीय शक्ति - विधानमण्डल मुख्यतया विधानसभा को, राज्य के वित्त पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त होता है । आय-व्यय का वार्षिक लेखा (बजट) विधानसभा से स्वीकृत होने पर ही शासन के द्वारा आय-व्यय से सम्बन्धित कोई कार्य किया जा सकता है।
  3. प्रशासनिक शक्ति - विधानसभा या विधान परिषद के सदस्यों द्वारा मत्रियों से उनके विभागों के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जा सकते हैं। मन्त्रिमण्डल के विरुद्ध निन्दा अथवा आलोचना का प्रस्ताव पास किया जा सकता है या काम रोको प्रस्ताव पास किया जा सकता है।
  4. निर्वाचन सम्बन्धी शक्ति - राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं। 

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