परंपरागत राजनीति शास्त्र का क्षेत्र स्पष्ट कीजिए।

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परंपरागत राजनीति शास्त्र का क्षेत्र स्पष्ट कीजिए।

परंपरागत राजनीति शास्त्र का क्षेत्र

जिस प्रकार राजनीति-शास्त्र की परिभाषा के विषय में मतभेद हैं, उसी प्रकार इसके क्षेत्र के विषय में भी मतभेद हैं। वस्तुतः राजनीति-शास्त्र के क्षेत्र के विषय में भिन्न-भिन्न भावों ने ही भिन्न-भिन्न परिभाषाओं को जन्म दिया है। राजनीति-शास्त्र के क्षेत्र के सम्बन्ध में विभिन्न लेखकों को तीन भागों में बाँट सकते हैं :

  1. एक वे हैं, जो एक सीमित दृष्टिकोण से केवल राज्य को ही इस विषय के अध्ययन का विषय मानते हैं।
  2. दूसरे वे हैं, जो इसके विपरीत राजनीति-शास्त्र को केवल सरकार का अध्ययन ही मानते हैं।
  3. तीसरे वे हैं, जो मध्य मार्ग को अपनाकर इसे राज्य और सरकार दोनों के ही अध्ययन का विषय मानते हैं।

पहले दृष्टिकोण में ब्लुशली और गार्नर के, दूसरे में सीले और लीकॉक जैसे लेखकों के और तीसरे में प्रो० लॉस्की, गैटेल और गिलक्राइस्ट के नाम आते हैं। परम्परावादी विचारक तीसरे मत को ही अधिकतर मानते हैं। परन्तु एक दृष्टिकोण से पहला मत भी उचित है क्योंकि राज्य बिना मनुष्यों के और बिना सरकार के हो ही नहीं सकता। जनता और सरकार राज्य के दो अभिन्न अंग हैं। राजनीति-शास्त्र का क्षेत्र राज्य है और राज्य का व्यावहारिक रूप सरकार है। अतः हम पहले मत को ही उचित मान सकते हैं, बशर्ते कि उसका अर्थ वही लिया जाए जो कि हमने इस विषय में कहा है। राजनीति-शास्त्र के क्षेत्र के विषय दो बातें विचारणीय हैं

  1. राज्य ही राजनीतिक अध्ययन का मुख्य विषय है। राज्य वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द सरकार की उत्पत्ति तथा समस्त व्यवस्था चक्कर काटती है। सरकार की स्थापना राज्य का कार्यभार सम्भालने वाली संस्था के रूप में हुआ। मनुष्य-जीवन की प्रथम आवश्यकता राज्य है।

    अरस्तू (Aristotle) के अनुसार, "राज्य की उत्पत्ति मनुष्य के जीवन के लिए होती है और इसका अस्तित्व मनुष्य के अच्छे जीवन के लिए बना रहता है।" (State comes into existence for the sake of life and continues to exist for the sake of good life). राजनीति-शास्त्र मुख्यतया राज्य का ही अध्ययन करता है।

  2. राजनीति-शास्त्र न केवल राज्य के वर्तमान रूप का, अपितु उसके भूतकाल का और भविष्य का अध्ययन भी है। किसी भी संस्था की वर्तमान दशा का सही ज्ञान प्राप्त करने के लिए उसके पिछले इतिहास का ज्ञान होना आवश्यक है और किसी भी संस्था की वर्तमान दशा को जानने का मुख्य कारण उस संस्था के भविष्य का अनुमान करना ही हुआ करता है। अतः एक संस्था का पूर्ण अध्ययन उसके भूत और वर्तमान के आधार पर उसके भविष्य के रूप का अनुमान ही होता है। राजनीति-शास्त्र भी राज्य के इतिहास का, उसके वर्तमान रूप का तथा उसके भविष्य का अध्ययन करता है। जैसा कि गैटेल (Gettel) ने लिखा है, "ऐतिहासिक क्षेत्र में, राजनीति-शास्त्र राज्य की उत्पत्ति, राजनीतिक संस्थाओं के विकास तथा अतीत के सिद्धान्तों का अध्ययन करता है। वर्तमान का अध्ययन करने में यह वर्तमान राजनीतिक संस्थाओं तथा विचारधाराओं का वर्णन, उनकी तुलना तथा वर्गीकरण करने का प्रयत्न करता है। राज्य का क्या स्वरूप होना चाहिए, इस दृष्टिकोण से राजनीति-शास्त्र राज्य के भविष्य का अध्ययन करता है। राजनीति-शास्त्र बदलती हुई परिस्थितियों और नैतिक मापदण्डों के आधार पर राजनीतिक संस्थाओं के संगठन और कार्यों के उद्देश्यों का भी अध्ययन करता है।" 

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