सोरोकिन के सांस्कृतिक परिवर्तन के सिद्धांत को विस्तार से चर्चा कीजिए।

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सोरोकिन का सांस्कृतिक परिवर्तन सिद्धांत

सोरोकिन का सांस्कृतिक परिवर्तन सिद्धांत : सोरोकिन की सांस्कृतिक परिवर्तन के विषय में रुचि प्रारम्भ से ही थी सन् 1925 ई० में उन्होंने सामाजिक क्रांति पर The Socialogy of Revalution नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया। समाज में ही समूहों और व्यक्तियों के बीच होने वाले आन्तरिक परिवर्तन पर सन् 1927 ई० में उन्होंने अपनी अमर कृति Social Mobility प्रकाशित की। 1937-41 ई० के बीच चार भागों में उन्होंने Social and Cultural Dynamics नामक ग्रन्थ प्रकाशित कराया जो पिछले 2500 वर्षों एवं 1622 क्रांतियों के इतिहास के अध्ययन पर आधारित है।

सोरोकिन की इन्हीं भावनाओं को व्यक्त करते हुए स्टुवर्ट और दृष्टि ग्लिन ने लिखा है "भावनात्मक सभ्यता की सांस्कृतिक के अनुयायी आध्यात्मिक"से ही वास्तविकता को देखते हैं ये सभ्यताएँ अपने में एक धार्मिकता रखती हैं और सत्य का स्रोत विश्वास तथा दिव्यवाणी को मानती है अस्तित्व के आनुभाविक पहलुओं में इनकी रुचि नहीं होती।

सोरोकिन ने अपने सिद्धांत को सांस्कृतिक के आधार पर स्पष्ट किया है उन्होंने बताया है कि वास्तव में सामाजिक परिवर्तन सांस्कृतिक के उतार-चढ़ाव के कारण होता है इनके अध्ययन द्वारा पुरानी संस्कृति के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप कोई प्रगति नहीं हुई है कुछ समय तो प्रगति होती है परन्तु बाद में परिवर्तन के कारण अवनति होने लगती है परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो समाज व संस्कृति में निहित शक्तियों से होती है वह संवेगात्मक सांस्कृति को भावात्मक सांस्कृति से अधिक जटिल मानते हैं

सोरोकिन के संस्कृति के प्रकार 

सोरोकिन के सांस्कृतिक परिवर्तन सिद्धांत के अनुसार संस्कृति के तीन प्रकार होते हैं भावात्मक संस्कृति, संवेदनात्मक संस्कृति तथा आदर्शात्मक संस्कृति।

1. भावात्मक संस्कृति - इस प्रकार की संस्कृति में हमारे विचारों, भावनाओं, मनोधारणाओं, नैतिकता, सामाजिक मूल्यों, आदर्शों व जीवन के प्रति दृष्टिकोणों का भावात्मक विकास होता है। भौतिक सुख की अपेक्षा मानसिक या आध्यात्मिक उन्नति ही इसका लक्ष्य है। भौतिक सुख की आध्यात्मिक कल्पना को ही उच्च माना जाता है। ईश्वर में एकग्रत होना परलौकिक सुख के लिए रात-दिन पुरुषार्थ करना आवश्यक है इस संस्कृति में सत्य वही है जिसे हमारी आत्मा सत्य स्वीकार करे, ज्ञान वही है जो ईश्वर के बारे में पता दे, कानून वह है जो नैतिक आदर्शों से ओत-प्रोत हो। इस संस्कृति में मस्तिष्क नहीं वरन् हृदय व दृष्टिकोण को विशाल बनाने के लिए प्रयत्न किए जाते हैं। भौतिक उपकरण हमारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती है उनकी माँग उन्हीं के बराबर होती है जिसके कारण भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। भौतिक आविष्कार नहीं होते बल्कि सामाजिक आविष्कार भी होते हैं। वास्तव में समाज में कोई भी सामाजिक सांस्कृतिक आविष्कार तभी हो सकता है जब समाज उसकी निरन्तर आवश्यकता का अनुभव करता है। प्राचीन भारत में हम किसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा की उपलब्धि नहीं करते थे। अतः भौतिक आविष्कारों का न होना स्वाभाविक ही था।

2. संवेदनात्मक संस्कृति - संवेगात्मक सांस्कृति भौतिक युक्त सांस्कृति होती है इसमें आध्यात्मिकता व कल्पना का स्थान व्यावहारिकता व यथार्थता ग्रहण कर लेती है। इसके मुख्य उपादान, विचार, आदर्श, कला, कानून का विकास मानते हैं। इसमें हम भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले औतिक उपकरण को ही आविष्कृत मानते हैं तथा वही सत्य है जिसे हम अपनी आँखों से देख सकते हैं। इस संस्कृति का उद्देश्य जीवन में अधिक-से-अधिक भौतिक सुविधाएँ लेना है। बेवर ने इसमें प्रोटेस्टैण्ट धर्म की व्याख्या करके दिखाया है संवेगात्मक सांस्कृति में विवाह का उद्देश्य सहयोगात्मक विधि से अधिकाधिक धन कमाना भौतिक सुख साधनों की उपलब्धि तथा अधिक जैविक व लैंगिक सख प्राप्त करना। परिवार व शिक्षा संस्थाएँ दोनों ही यह पाठ पढ़ाती हैं कि अधिक से अधिक धन कमाया जाए बल्कि पत्नी मोक्ष या ईश्वर की प्राप्ति कराने में नहीं वरन अधिक धन उपार्जित करने में सहायक होती है प्रत्येक बात में वैज्ञानिक तथ्यों का सहारा लिया जाता है। दूसरों के विषय में सोचने के लिए हमारे पास समय नहीं होता यह सांस्कृति भावात्मक सांस्कृति को विपरीत विशेषताओं को प्रकट करती है। वर्तमान काल में यूरोप व अमेरिका की सांस्कृति इसी प्रकार की है। सोरोकिन के शब्दों में, "संवेदनात्मक संस्कृति एवं समाज इस अन्तिम सिद्धांत पर आधारित है कि सच्ची वास्तविकता व मूल्य ऐन्द्रिक होते हैं और हमारी ज्ञानेन्द्रियों द्वारा अनुभूत वास्तविकता व मूल्यों से बढ़कर कोई भी सत्य नहीं है।" 

3. आदर्शात्मक संस्कृति - आदर्शात्मक संस्कृति आदर्शात्मक सांस्कृति वह संस्कृति है जो दोनों सांस्कृतियों का समन्वयकारी बोध कराती है। भावात्मक व संवेगात्मक सांस्कृतियाँ परस्पर विरोधी विशेषताओं को प्रकट करने वाली सांस्कृतिक व्यवस्था के दो विपरीत छोर हैं। वास्तव में इन दोनों के मध्य की व्यवस्था ही श्रेष्ठ है, क्योंकि वह दोनों के श्रेष्ठ गुणों को अपने में सम्मिलित करती है। इस अवस्था को आदर्शात्मक संस्कृति का नाम दिया जाता है। यह संस्कृति तब आती है या तो भावात्मक संस्कृति संवेगात्मक में या संवेगात्मक संस्कृति भावात्मक संस्कृति में बदल रही हो, इस संस्कृति में न तो इहलौकिक व परलौकिक वस्तु पर अधिक बल दिया जाता है और न किसी वस्तु की उपेक्षा की जाती। इस प्रकार हम देखते हैं कि वास्तविक सन्तुलन स्थिति ही आदर्शात्मक संस्कृति है, सोरोकिन इसी संस्कृति को सर्वोत्तम कहते हैं।

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