Tuesday, 28 December 2021

असहयोग आंदोलन की असफलता के चार कारण बताइये तथा इसके महत्व की विवेचना कीजिए।

असहयोग आंदोलन की असफलता के चार कारण बताइये तथा इसके महत्व की विवेचना कीजिए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. 'गाँधी जी का ही एकमात्र प्रभाव' किस प्रकार असहयोग आन्दोलन की सफलता का कारण बना है।
  2. असहयोग आन्दोलन ब्रिटिश शक्ति के प्रति महज एक नैतिक विरोध था स्पष्ट कीजिये।
  3. असहयोग आन्दोलन ने जनसाधारण में अदम्य साहस का संचार किया, स्पष्ट कीजिये।
  4. असहयोग आन्दोलन का रचनात्मक कार्यक्रम किस प्रकार सफल रहा?

असहयोग आन्दोलन की असफलता के कारण

1919 ई. को प्रारम्भ हुआ असहयोग आन्दोलन शीघ्र ही एक व्यापक जन आन्दोलन बन गया परन्तु चौरी चौरा थाना पर हुए कांड के कारण यह अपने घोषित उद्देश्यों की पूर्ति में अन्तिम रूप से असफल ही रहा, इसकी निम्नलिखित कारण बताये जा सकते हैं -

  1. गाँधी जी का एकमात्र प्रभाव - असहयोग आन्दोलन की विफलता का मूल कारण यह था कि इस आन्दोलन का प्रस्ताव पारित होने का आधार कांग्रेस के नेताओं की सर्वसम्मति न होकर केवल गाँधी जी का प्रभाव मात्र था। प्रस्ताव पर मतभेद के फलस्वरूप कांग्रेस के अनेक नेता अन्त तक इस आन्दोलन से अलग ही रहे। विपिनचन्द्र पाल, मोहम्मद अली जिन्ना, ऐनीबेसेण्ट इत्यादि नेता सदैव के लिए कांग्रेस से अलग ही हो गये। फलस्वरूप आन्दोलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और यह आन्दोलन महज गाँधी जी द्वारा संचालित आन्दोलन में तब्दील हो गया।
  2. धर्म को राजनीति में सम्मिलित करना - इस आन्दोलन की दुर्बलता का एक अन्य प्रमुख कारण खिलाफत जैसे धार्मिक प्रश्न को राष्ट्रीय आन्दोलन जैसे राजनीतिक संग्राम के साथ सम्बद्ध करना भी था। यह गाँधी जी की एक बहत बड़ी राजनीतिक भूल थी। हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर गाँधी जी द्वारा किये गये इस प्रयास के कारण ही भारतीय राजनीति में धर्म का ही नहीं अपितु धर्मान्धता का भी प्रवेश हुआ। अन्ततः इसका दुष्परिणाम हिन्दू-मुस्लिम तनाव के रूप में सामने आया। इस सन्दर्भ में इतिहासकार प्रो. मजूमदार ने ठीक ही लिखा है कि - "गाँधी जी द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए चुना गया आधार बहुत ही कमजोर था।
  3. त्याग और अनुशासन का अभाव - असहयोग आन्दोलन जिस समय प्रारम्भ किया गया उस समय तक भारतीय जनता में त्याग व अनुशासन की श्रेष्ठ भावना का अभाव था। लोग केवल भावावेश से प्रेरित थे। अतः यह आन्दोलन अपने लक्ष्य तक पहुँचने में कामयाब न हो सका। इस सन्दर्भ में पं. नेहरू का अभिमत था कि- "आन्दोलन न केवल चौरी-चौरी की घटना के कारण स्थगित किया गया वरन वास्तविकता तो यह थी कि बाहर से शक्तिशाली दिखने वाला यह आन्दोलन भीतर से छिन्न-भिन्न हो रहा था।
  4. नैतिक विरोध - असहयोग आन्दोलन ब्रिटिश सरकार की शक्ति के विरुद्ध एक प्रकार का नैतिक विरोध था. जबकि ब्रिटिश सरकार का नैतिकता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। इसीलिये इस आन्दोलन की सफलता यदि असम्भव नहीं। तो संदिग्ध अवश्य ही थी। इस आन्दोलन से भारतीय जनता को जो आशाएँ थीं उनके पूर्ण हुए बिना ही आन्दोलन स्थगित कर दिये जाने से भारतीय जनता पर मनोवैज्ञनिक रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इस सन्दर्भ सुभाषचन्द्र बोस ने अपनी पुस्तक 'इंडियन स्ट्रगल' में ठीक ही लिखा है कि - "एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्त करने का वचन न केवल अविवेकपूर्ण था. वरन इसके अतिरिक्त जनता द्वारा जो भी छिट-पुट हिंसक घटनाएं की गयी थी. वे तो सरकार द्वारा की जा रही दमनात्मक कार्यवाही की प्रतिक्रिया मात्र थीं। अतः जनता की मनोवत्ति को ध्यान में रखकर उन घटनाओं को स्वाभाविक मानते हुए गाँधी जी को उनके लिये सरकार को उत्तरदायी ठहराना चाहिए था. इसके उलट अति नैतिकता से प्रेरित होकर उन्होंने इसका उत्तरदायित्व जनता व स्वय का माना जोकि आन्दोलन के लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ।

असहयोग आन्दोलन का महत्व

असहयोग आन्दोलन की असफलता व अनेक दुर्बलताओं के बावजूद इस आन्दोलन के महत्व को निम्नांकित आधारों पर समझा जा सकता है -

  1. जन आन्दोलन का रूप प्राप्त करना - असहयोग आन्दोलन को राष्ट्रीय आन्दोलनों में अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। इस आन्दोलन के कारण ही राष्ट्रीय आन्दोलन को जन आन्दोलन का रूप प्राप्त हो सका इसने जनसाधारण में अपूर्व त्याग साहस और राष्ट्रीय भावना का संचार किया। इसके पूर्व तक देशभक्ति कुछ गिने-चुने व्यक्तियों तक सीमित समझी जाती थी। गाँधी जी और असहयोग आन्दोलन के प्रभाव से यह सर्वसाधारण की सम्पत्ति बन गयी। यह आन्दोलन पहला जन-आन्दोलन था जिसने भारतीय जनता को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया गाँधी जी और कांग्रेस की यह महत्वपूर्ण सफलता थीं।
  2. निर्भीकता की भावना का विकास - असहयोग आन्दोलन ने जनसाधारण में अदम्य साहस व निर्भीकता की भावना उत्पन्न की। सरकार का विरोध करने, जेल जाने में भारतीय जनता प्रारम्भ में घबराती थी। अब सरकार का विरोध और आलोचना करने के साथ-साथ राष्ट्रीय संघर्ष के सभी क्षेत्रों में निर्भीक होकर जनता अपना सहयोग देने को तत्पर हो उठी।
  3. प्रभावपूर्ण आन्दोलन - असहयोग आन्दोलन के चलते रहने तक आन्दोलन से भयभीत सरकार उदारवादियों और जनता का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील रही। इस हेतु 1919 ई. में सुधारों को उदारतापूर्वक क्रियान्वित भी किया जाने लगा था।
  4. रचनात्मक कार्यक्रम की सफलता - असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम का रचनात्मक पक्ष को महत्वपूर्ण रहा। इस आन्दोलन द्वारा गाँधी जी ने जनता की भावना को उत्तेजित करने के लिये स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर बल दिया गया। खादी पवित्रता और राष्ट्रीयता का प्रतीक बन गयी। घर-घर में चरखे और हथकरघे का प्रचलन हुआ और खादी को प्रोत्साहन मिला।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि असहयोग आन्दोलन का भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में विशेष स्थान है। असहयोग आन्दोलन के कारण स्वराज्य की मंजिल थोडा निकट आ गई। कांग्रेस व जनता को अपनी शक्ति का आभास हो गया। आगे चलकर ऐसे ही आन्दोलनों व इनके प्रभावों द्वारा भारतीयों ने स्वतन्त्रता प्राप्त की।

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