सिद्धांत निर्माण के विभिन्न चरण एवं दृष्टिकोणों को बताइए।

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सिद्धांत निर्माण के विभिन्न चरण एवं दृष्टिकोणों को बताइए।

सिद्धांत निर्माण के विभिन्न चरण

  1. अवधारणात्मक रूपरेखा - सिद्धांत निर्माण की प्रक्रिया में अवधारणापूर्ण रूपरेखा का प्रयोग अति आवश्यक है। इससे घटनाओं, गतिविधियों, वस्तुओं का चयन आदि करने में सरलता हो जाती है। इसके आधार पर किया गया चुनाव बहुत महत्त्वपूर्ण होता है।
  2. प्रामाणिकता - प्रत्येक संकल्पना का अनुभव अन्य रूपों में होना इसकी प्रामाणिकता के लिए आवश्यक है।
  3. व्यापकता - व्यापकता का आशय यहाँ अधिक वस्तुओं, घटनाओं की विशेषताओं तथा साधारण पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट की क्षमता होने से है। जैसे-जैसे तथ्य से आगे की ओर बढ़ने का कार्य शुरू होता है, सिद्धांतों की व्याख्या भी वैसे-वैसे आगे बढ़ती रहती है।
  4. परीक्षणशीलता - निर्माण प्रक्रिया में परीक्षणशीलता का अर्थ है कि वह वस्तु, घटना या प्रक्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए कि उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञात किया जा सके। साथ ही उसके गुणों की विशेषताओं का भी पता लगाया जा सके।

सिद्धांत निर्माण के विभिन्न दृष्टिकोण

सिद्धांत-निर्माण के विभिन्न दृष्टिकोणों में दार्शनिक, परम्परावादी तथा ऐतिहासिक दृष्टिकोण का उल्लेख है। परम्परावादी दृष्टिकोण में मूल्यों को प्रधानता दी गई है। इस दृष्टिकोण के विचारकों के द्वारा धर्म, प्रकृति, दर्शन, चिन्तन, इतिहास, विश्वास तथा श्रद्धा, संविधान तथा उसके पश्चात् आस्था और विश्वास की बातें बताई गई हैं। ये मूल्य श्रद्धा, आस्था, विश्वास तथा अन्तःप्रेरणा पर आधारित होते हैं, परन्तु अनुभववादी दृष्टिकोण में व्यवहारवादी ज्ञान पर विशेष बल दिया गया है। राजनीतिक अध्ययन में किस प्रकार के मूल्यों को स्थान दिया जाए या बिल्कुल न दिया जाए, यह प्रश्न विचारकों के समक्ष आदर्शवादी तथा उत्तर-व्यवहारवादी विद्वानों ने भी प्रस्तुत किया था। 

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