शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तत्व बताइये।

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शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तत्व बताइये।

शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तत्व : शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के तत्वों को लेकर विद्धानों में विभेद है। इन मतभेदों का प्रमुख कारण सिद्धांत की व्याख्या सम्बन्धी मतभेद हैं। सभी विद्धान इस बात पर तो सहमत हैं कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए शक्तियों का पृथक्करण अपरिहार्य है। पर शक्ति पृथक्करण से क्या तात्पर्य लिया जाए इस पर मतभेद आरम्भ हो जाते हैं। गैटिल ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है, "सरकार के तीनों प्रमुख कार्य भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा सम्पादित होने चाहिए और इन तीनों विभागों के कार्य क्षेत्र इस प्रकार सीमित होने चाहिए कि वे अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र और सर्वोच्च बने रहें।" गैटिल के विचार मोन्टेस्क्य के विचारों से कोई भिन्नता नहीं रखते।

ब्लैकस्टोन ने भी इन्हीं से मिलते-जुलते विचार व्यक्त किये हैं। उसने लिखा है कि "जहाँ कहीं कानन बनाने और उन्हें लागू करने का अधिकार एक ही व्यक्ति अथवा व्यक्ति-समूह में निहित रहता है वहाँ सार्वजनिक स्वतन्त्रता नष्ट हो जाती है क्योंकि शासक अत्याचारपूर्ण कानून बनाकर उन्हें अत्याचारी ढंग से लागू कर सकता है। यदि न्यायिक अधिकार को व्यवस्थापिका के साथ संयुक्त कर दिया जाता है तो प्रजा के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के अधिकार स्वेच्छाचारी न्यायाधीशों के हाथ में आ जाते हैं क्योंकि वे सभी फैसले अपने मतानुसार देते हैं न कि आधारभूत कानूनों के अनुसार। यदि न्यायपालिकाको कार्यपालिका के साथ संयुक्त कर दिया जाए तो व्यवस्थापिका का स्थान गौण हो जाता है।"

आधुनिक समय में एम० जे० सी० वाइल ने अपनी पुस्तक कॉन्स्टीटयूशनलिज्म एण्ड सेपेरेशन ऑफ पावर्स में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को विशुद्ध रूप देने की बात तो कही पर इसके द्वारा किया गया विवेचन की किसी भी तरह मोन्टेस्क्यू और ब्लेकस्टोन के द्वारा की गई व्याख्या से भिन्न नहीं बन पाया है। स्वयं वाइल के शब्दों में शक्तियों के पृथक्करण का विवेचन इस प्रकार है, "राजनीतिक स्वतन्त्रता की स्थापना और स्थायित्व के लिए यह आवश्यक है कि सरकार को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक इन तीन, अंगों अथवा विभागों में विभाजित किया जाए। इन तीनों अंगों में से प्रत्येक के पास क्रमशः सरकार के व्यवस्थापन सम्बन्धी, प्रशासकीय और न्यायिक कार्य हों और उन्हें दूसरे अंगों कार्यों का अतिक्रमण करने की आज्ञा न मिले। वे व्यक्ति भी जो सरकार के इन तीनों अंगों की रचना करते हैं, एक-दूसरे से पृथक हों। कोई भी एक व्यक्ति एक ही समय में एक से अधिक अंग अथवा शाखा का सदस्य न हो। इस प्रकार, सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंगों पर नियन्त्रण अथवा अंकुश रखे और व्यक्तियों का कोई एक समूह सम्पूर्ण सरकारी तन्त्र पर नहीं छाए।"

एम० जे० सी० वाइल ने शक्तियों के पृथक्करण के विशुद्ध सिद्धांत की बात इसलिए की है, क्योंकि उसके अनुसार, अपने अत्यन्तिक रूप में यह सिद्धांत न अभी तक कभी प्रयोग में आया है, और न ही प्रयोग में लाया जा सकता है। इस पर भी वह यह मानता है कि यह सिद्धांत ही समाजों की मूल्य व्यवस्था को सुरक्षित करने का एक मात्र साधन अभी तक मानव मस्तिष्क खोज पाया है। इस सम्बन्ध में वाइल ने लिखा है कि "पाश्चात्य संस्थात्मक सिद्धांतवादी हमेशा इस चिन्ता से ग्रस्त रहे कि शासन शक्ति का प्रयोग, जो उनके समाजों के मूल्यों को व्यावहारिक बनाने के लिए अति आवश्यक है, किस प्रकार से नियन्त्रित किया जाए जिससे वही शक्ति जो इन मूल्यों को प्रोत्साहित करने के लिए सृजित की गई थी, इनकी विनाशक नहीं बन जाए।" वाइल ने आगे इसी सम्बन्ध में लिखा है कि "इस समस्या (मूल्यों के सुरक्षण की) के समाधान के लिए जो शासन सिद्धांत प्रतिपादित किए गये हैं उन सबमें शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, आधुनिक समय में बौद्धिक दृष्टि से तथा संस्थात्मक संरचनाओं पर प्रभाव की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है।"

इसी कारण यह सिद्धांत, किसी-न-किसी रूप में, हर काल व युग में विशेष कर आधुनिक युग में भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होने की जिद्दी प्रवृत्ति व गुण परिलक्षित करता रहा है।

आधुनिक समय में एम० जे० सी० वाइल ने अपनी पुस्तक कॉन्स्टीटयूशनलिज्म एण्ड सेपेरेशन ऑफ पावर्स में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को विशुद्ध रूप देने की बात तो कही पर इसके द्वारा किया गया विवेवन किसी भी तरह मोन्टेस्क्यू और ब्लैकस्टोन के द्वारा की गई व्याख्या से भिन्न नहीं बन पाया है। स्वयं वाइल के शब्दों में शक्तियों के पृथक्करण का विवेचन इस प्रकार है, "राजनीतिक स्वतन्त्रता की स्थापना और स्थायित्व के लिए यह आवश्यक है कि सरकार को विधायी, कार्यकारी और न्यायिक इन तीन अंगों अथवा विभागों में विभाजित किया जाए। इन तीनों अंगों में से प्रत्येक के पास क्रमश: सरकार के व्यवस्थापन सम्बन्धी, प्रशासकीय और न्यायिक कार्य हों और उन्हें दूसरे अंगों के कार्यों का अतिक्रमण करने की आज्ञा न मिले। वे व्यक्ति भी जो सरकार के इन तीनों अंगों की रचना करते हैं, एक-दूसरे से पृथक हों। कोई भी एक व्यक्ति एक ही समय में एक से अधिक अंग अथवा शाखा के सदस्य न हो। इस प्रकार, सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंगों पर नियन्त्रण अथवा अंकुश रखे और व्यक्तियों का कोई एक समूह सम्पूर्ण सरकारी तन्त्र पर नहीं छाए।"

शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के चार तत्व यह हैं

  1. शासन अभिकरणों का पृथक्करण इस सिद्धांत का आवश्यक तत्व है, जिसका आशय है कि शक्ति के स्वायत्त केन्द्र बनाकर सरकार पर आंतरिक रूप से अकुंश रखा जाए।
  2. इस सिद्धांत के दूसरे तत्व का बल इस बात पर निर्भर है कि सरकार के तीन विशिष्ट कार्य-व्यवस्थापन, कार्यपालन और न्यायपालन होते हैं।
  3. सिद्धांत की तीसरी बात व्यक्तियों या कार्मिकों के पृथक्करण की है। सरकार के तीनों अंग, लोगों के बिल्कुल पृथक और निश्चित समूहों के द्वारा गठित होते हैं।
  4. इस सिद्धांत के चौथे तत्व में यह विचार है कि जब सरकार के अंगों, उनके कार्यों, उन कार्यों का संचालन करने वाले व्यक्तियों के पृथक्करण का अनुसरण किया जायेगा तब सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंग द्वारा स्वेच्छाचारी या मनमाने ढंग से शक्ति प्रयोग करने पर नियन्त्रक का कार्य करेगा।
शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के इन तत्वों के आधार पर इस सिद्धांत की पुन: व्याख्या की जाए तो यह मोन्टेस्क्यू द्वारा की गई व्याख्या से विशेष भिन्न प्रकार की नहीं होगी।

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