मुख्यमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार होती है ? मुख्यमन्त्री पद की शक्तियाँ कार्य व महत्व बताइए।

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मुख्यमंत्री की नियुक्ति किस प्रकार होती है? मुख्यमंत्री पद की शक्तियाँ कार्य व महत्व बताइए।

सम्बन्धित लघु उत्तरीय प्रश्न

  1. मुख्यमंत्री की नियुक्ति कैसे की जाती है ?
  2. मुख्यमंत्री की शक्तियों पर टिप्पणी लिखिए।
  3. मुख्यमंत्री की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियाँ क्या हैं ?
  4. मुख्यमंत्री के विधायिका सम्बन्धी कार्यों का वर्णन कीजिए।
  5. मुख्यमंत्री राज्यपाल तथा राज्य मंत्रिपरिषद के मध्य कड़ी का कार्य करता है, स्पष्ट कीजिए।
  6. मुख्यमंत्री की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कीजिए।
  7. मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन एवं शासन की धुरी है। इस कथन की विवेचना कीजिए।
  8. मुख्यमंत्री के पद का क्या महत्व है ?

मुख्यमंत्री की नियुक्ति

केन्द्र की भाँति राज्यों में भी संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। अतः राज्य शासन में मुख्यमंत्री की स्थिति और भूमिका लगभग वैसी ही है जैसी कि केन्द्र में प्रधानमंत्री की। संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल को यह अधिकार है कि वह अपने राजकीय कार्यों के सम्पादन के लिए एक मंत्रिपरिषद का गठन करे जिसका नेतृत्वकर्ता अर्थात प्रमुख मुख्यमंत्री होता है। संविधान के अनुच्छेद-164 के अंतर्गत, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा। वहीं अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।

संवैधानिक दृष्टि से मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है, परन्तु व्यवहार में विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करने के लिए राज्यपाल बाध्य होता है। मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सम्बन्ध में राज्यपाल दो परिस्थितियों में अपने विवेक का प्रयोग कर सकता है प्रथम, जबकि विधानसभा में किसी एक राजनीतिकदल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हो और एक से अधिक पक्ष मुख्यमंत्री के लिये दावे कर रहे हों । द्वितीय, स्थिति उस समय हो सकती है जबकि विधानसभा के बहु

इसी प्रकार उसे तब तक अपदस्थ नहीं किया जा सकता जब तक कि वह विधानसभा के बहुमत दल का सर्वमान्य नेता बना रहता है। मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों का चयन उसी के द्वारा किया जाता है यद्यपि मंत्रिपरिषद के इन सदस्यों की नियुक्ति मुख्यमंत्री के परामर्श पर राज्यपाल के द्वारा की जाती है तथा मुख्यमंत्री के माध्यम से मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धान्त क्रियान्वित होता है।

मुख्यमंत्री की शक्तियाँ व अधिकार

मुख्यमंत्री को निम्नलिखित शक्तियों से अधिकार प्राप्त होता है :-

  1. मंत्रिपरिषद का निर्माण
  2. शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय
  3. मंत्रिमण्डल का कार्य संचालन
  4. विधानसभा का नेता
  5. राज्य में बहमत दल का नेता
  6. कार्यपालिका प्रशासन सम्बन्धी अधिकार
  7. वित्त सम्बन्धी कार्य
  8. विधायिका सम्बन्धी कार्य
  9. न्यायपालिका सम्बन्धी कार्य
  10. राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद के मध्य की कड़ी का कार्य
  11. राज्य सरकार व सत्तारूढ़ दल का प्रमुख प्रवक्ता
  12. महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति

मंत्रिपरिषद का निर्माण - मुख्यमंत्री का सर्वप्रथम कार्य अपनी मंत्रिपरिषद का निर्माण करना होता है। मुख्यमंत्री मंत्रियों का चयन कर सूची राज्यपाल को दे देता है जिसे राज्यपाल स्वीकार कर लेता है। मंत्रियों के चयन में मुख्यमंत्री बहत कुछ सीमा तक अपने विवेक के अनुसार कार्य कर सकता

शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय - मख्यमंत्री इस बात का प्रयत्न करता है कि शासन के सभी विभाग एक इकाई के रूप में कार्य करें । यदि मंत्रिपरिषद के दो या अधिक सदस्यों में किसी प्रकार के मतभेद उत्पन्न हो जायें, तो उसके द्वारा इन मतभेदों को दूर कर सामंजस्य स्थापित किया जाता

मंत्रिमण्डल का कार्य संचालन - मुख्यमंत्री ही मंत्रिमण्डल की बैठकें बुलाता है तथा उनकी अध्यक्षता करता है। बैठक के लिए 'एजेण्डा' मुख्यमंत्री के द्वारा ही तैयार किया जाता है। यदि मुख्यमंत्री पर्याप्त प्रभावशाली है, तो मंत्रिमण्डल की समस्त कार्यवाही मुख्यमंत्री की इच्छानुसार ही सम्पादित होती

विधानसभा का नेता - विधानसभा के नेता के रूप में उसे कानून निर्माण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थिति प्राप्त होती है और बहुत कुछ सीमा तक कानून निर्माण कार्य उसकी इच्छानुसार ही सम्पन्न होता है। विधानसभा के नेता के रूप में वह राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का परामर्श भी दे सकता है ।

राज्य में बहमत दल का नेता - मुख्यमंत्री राज्य में बहुमत दल का नेता भी होता है तथा उसे दलीय ढाँचे पर नियंत्रण प्राप्त होता है । यह स्थिति उसके प्रभाव तथा शक्ति में अधिक वृद्धि कर देती

कार्यपालिका प्रशासन सम्बन्धी अधिकार - मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन तथा शासन की वास्तविक मुख्य कार्यपालिका है। वह मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता है। इस हैसियत से वह मंत्रिपरिषद के सदस्यों को चयनित कर राज्यपाल के माध्यम से नियुक्त कराता है। उनके विभागों का बंटवारा करता है। वह मंत्रिपरिषद का नेतृत्वकर्ता होता है।

वित्त सम्बन्धी कार्य - राज्य के सर्वांगीण विकास तथा प्रशासनिक कार्यों के संचालन के लिए वित्त की व्यवस्था करना भी मुख्यमंत्री का उत्तरदायित्व होता है। वित्तीय व्यवस्था के लिए बजट बनवाना उसे लागू करना, अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले करों के सम्बन्ध में निर्णय करना, राजस्व की वसली करना तथा किस प्रकार के अनुदान प्राप्त किए जाएँ इस सबकी व्यवस्था करना मुख्यमंत्री का ही दायित्व होता है।

विधायिका सम्बन्धी कार्य - राज्य का मुख्यमंत्री विधायिका सम्बन्धी कार्यों का भी सम्पादन करता है। भारतीय संसदीय प्रणाली में मंत्रिपरिषद विधायिका के प्रति उत्तरदायी होने के साथ-साथ विधायन के क्षेत्र में भी विधायिका का नेतृत्व करती है। विधानमण्डल में बहुमत दल का नेता होने के नाते यह देखना उसका कर्तव्य होता है कि राज्य का प्रशासन चलाने के लिए किन-किन विधियों की आवश्यकता है ? विधेयकों को समय से पारित करना, वित्त विधेयक पारित कराना और लागू करना मुख्यमंत्री का ही कर्त्तव्य होता है। मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर सकता है।

न्यायपालिका सम्बन्धी कार्य - संवैधानिक रूप से भारत में न्यायपालिका की दृष्टि से शक्ति पृथक्करण है। न्यायपालिका स्वतन्त्र है, फिर भी छोटे न्यायालयों से लेकर जिला न्यायालयों तक न्यायाधीशों की नियुक्ति स्थापना व्यवस्था मुख्यमंत्री के आधीन न्याय विभाग करता है। यद्यपि न्यायालयों पर । प्रशासनिक नियन्त्रण राज्य के उच्च न्यायालय का होता है।

राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद के मध्य की कड़ी का कार्य - मुख्यमंत्री का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों की सूचना राज्यपाल को देता रहे जैसाकि केन्द्र में प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सूचित करता रहता है तथा राज्यपाल की माँग पर उसे वांछित अन्य सचना देना . भी मख्यमंत्री का कर्तव्य होता है क्योंकि मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद तथा राज्यपाल के मध्य की एक प्रशासनिक कड़ी का कार्य करता है।

राज्य सरकार व सत्तारूढ़ दल का प्रमुख प्रवक्ता - मुख्यमंत्री सम्बन्धित राज्य सरकार व सत्तारूढ़ दल का प्रमख प्रवक्ता होता है। इसके द्वारा की गई घोषणाएं और आश्वासन अधिकारिक माने जाते हैं।

महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति - मख्यमंत्री अपने सहयोगी मंत्रियों की नियुक्ति के साथ-साथ राज्य में महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति के लिए राज्यपाल को सिफारिश करता है।

मुख्यमंत्री के पद का महत्व और उसकी वास्तविक स्थिति

वस्तुतः मुख्यमंत्री, राज्य मंत्रिमण्डल का निर्माणकर्ता, जीवन देने वाला और संहारकर्ता होता है। किसी मंत्री से मतभेद होने की स्थिति में मुख्यमंत्री की ही विजय होती है। व्यावहारिक रूप में यदि देखा जाय तो मुख्यमंत्री की वास्तविक स्थिति तीन परिस्थितिजन्य आयामों पर निर्भर करती है -

  1. यदि मुख्यमंत्री उसी दल का है जिसकी केन्द्र में सरकार है और यदि उसके पीछे विधानसभा का स्पष्ट बहुमत भी हो तो उसकी स्थिति अत्यन्त मजबूत होती है।
  2. यदि किसी मुख्यमंत्री को विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त है, परन्तु उसका दल केन्द्र में सत्तारूढ़ नहीं है तो उसे मुख्यमंत्री की स्थिति न तो बहुत कमजोर होती है और न ही बहुत शक्तिशाली।
  3. तीसरी स्थिति उस मुख्यमंत्री की होती है जो मिली-जुली सरकार या बाहरी समर्थन पर टिकी सरकार के मुख्यमंत्री की होती है। ऐसे मुख्यमंत्री की स्थिति अत्यन्त दुर्बल तथा दयनीय होती है।

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