Saturday, 29 January 2022

कोबेन का राजनीतिक सिद्धान्त के पतन पर विचार लिखिए।

कोबेन का राजनीतिक सिद्धांत के पतन पर विचार लिखिए।

कोबेन का राजनीतिक पतन सम्बन्धी विचार

कोबेन के विचार-राजनीतिक सिद्धांत के ह्रास के सम्बन्ध में कोबेन का यह मत है कि इसके लिए राजनीतिक वैज्ञानिक उत्तरदायी नहीं हैं, वरन् राजनीति विज्ञान का स्वरूप ही स्वयं इसके लिए उत्तरदायी है राजनीतिक चिन्तन तथा मूल्य प्रधान होता है वर्तमान समय में नीतिशास्त्र के ह्रास के कारण ही राजनीतिक सिद्धांतों का ह्रास हुआ है इसका एक प्रमुख कारण नैतिक मूल्यों को शक्ति की राजनीति से पृथक् कर देना है। कोबेन ने इस बात पर भी बल दिया है कि आधनिक राजनीतिक सिद्धांत 'प्रगतिशील विज्ञान' नहीं है क्योंकि यह नवीन परिस्थितियों के अनुरूप अपने आपको ढालने में असमर्थ रहा है यह एक घिसा हुआ सिक्का प्रतीत होता है जिसे नए सिरे से ढालने की आवश्यकता है राजनीतिक सिद्धांत द्वितीय विश्वयद्ध के उपरान्त की परिस्थितियों के संदर्भ में न तो अपने आपको सुधार पाया है और न ही नवीनीकरण कर सका है। कोबेन के अनुसार, राजनीतिक सिद्धांत के पतन के प्रमुख कारण हैं -

  1. लोकतंत्र - कोबेन के शब्दों में - "आधनिक विश्व में लोकतंत्र प्रभावी राजनीतिक विचार है समसामयिक राजनीति के अधिकांश परस्पर विरोध लोकतांत्रिक छत्रछाया से अपना स्थान प्राप्त करते हैं, परन्तु वह छत्र अधिक विशाल है वह एक-दूसरे के साथ संघर्ष की स्थिति में आ जाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि छत में से पानी बुरी तरह टपक रहा है। भावी लोकतंत्र के सिद्धांतशास्त्री कहाँ हैं ? राजनीतिक सिद्धांत के स्थान पर यह अधिकार सा बन गया है यह सर्वत्र राजनीतिक कोश खोजने वालों का सुगम उपाय-सा बन गया है दुनिया भावी चमत्कारों से भरी पड़ी है जो लोकतंत्र का राग अलापते हैं।"
    वर्तमान समय में बर्क अथवा बेन्थम के समान राजनीतिक क्षेत्र में कोई बौद्धिक महामानव विद्यमान नहीं है। लोकतान्त्रिक प्रणाली की सफलता एक मायने में राजनीतिक सिद्धांत के पतन के लिए उत्तरदायी है। व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य से सन्तुष्ट प्रतीत होते हैं अतः राजनीतिक जीवन प्रायः समाप्त हो गया है यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी राजनीतिक गतिविधि को ध्यान से देखा जाए तो वह किसी-न-किसी तरीके से सत्ता के लिए संघर्ष की ओर इशारा करती है किसी अच्छे विकल्प की खोज करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं होता है।
  2. परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप ढालने में अक्षम - सामाजिक जीवन स्थिर न होकर सदैव परिवर्तित होता रहता है सामाजिक जीवन के परिवर्तित होने के कारण राजनीतिक जीवन भी परिवर्तित होने लगता है। परन्तु राजनीतिक सिद्धांत परिवर्तित राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों में अपनी तारतम्यता स्थापित करने में असमर्थ रहा, परिणामस्वरूप यह मृतप्राय हो गया। कोबेन के शब्दों में “राजनीतिक चिन्तन तभी प्रभावशाली रहता है, जब उसका बदलते सामाजिक संदर्भ में पुनः निर्माण होता रहता है।" वर्तमान राजनीतिकशस्त्रियों का यह प्रयास है कि परम्परागत राजनीतिक चिन्तन को जीवित रखा जाए।
  3. राजनीतिक चिन्तन में अन्तर्निहित कमियाँ - राजनीतिक चिन्तन में अन्तर्निहित कमियाँ भी किसी सीमा तक राजनीतिक पतन के लिए उत्तरदायी हैं राजनीतिक चिन्तन की विचारधारा पर इतिहास व विज्ञान का प्रमुख स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। इसके परिणामस्वरूप आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत वर्तमान जीवन के सम्बन्ध अपने मूल्यों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं करता है परम्परागत राजनीतिक चिन्तक अपने सक्षम कुछ व्यावहारिक उद्देश्य रखकर ही चिन्तन करते थे जबकि आधुनिक राजशास्त्री एक वैज्ञानिक के रूप में तथ्यों के संकलन में उलझे रहते हैं।
  4. व्यावहारिकता की कमी - व्यावहारिकता की कमी ने भी राजनीतिक सिद्धांत के पतन में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है परम्परागत राजनीतिक चिन्तन व्यावहारिक था प्राचीन समय में राजनीतिक सिद्धांत का अध्ययन ऐसे व्यक्तियों के द्वारा किया जाता था जो व्यावहारिक विषयों से गहन रूप से सम्बन्धित थे परन्तु आधुनिक समय में यह मात्र एक शैक्षणित विषय बनकर रह गया है राजनीतिक विज्ञान सिद्धांत से पृथक् हो गया है।
  5. उचित दिशा का अभाव - आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में उचित दिशा का अभाव भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है यह उद्देश्यों से प्रेरित नहीं है। हीगलवादी विचारधारा भी शून्य हो चुकी है। मार्क्सवादी चिन्तनधारा को सत्ता के अनुसरण के लिए द्वन्द्वात्मक समर्थन के रूप में अधिकाधिक प्रस्तुत किया जा रहा है। व्यवहारवादी अध्ययन पद्धति ने तथ्यों तथा मूल्यों के बीच उत्पन्न कर दी है इसका यह परिणाम हुआ है कि अपने राजनीतिक आधार को न्यायोचित तथा तर्कसंगत सिद्ध करने के उद्देश्य से विकासशील सिद्धांत के अभाव में शासित समुदाय में राजनीतिक गतिविधि का उचित प्रयोग भी सत्ता की राजनीति के विवेकहीन सिद्धांत से ग्रस्त हो गया।
  6. इतिहासवाद - कोबेन ने इतिहासवाद को भी राजनीतिक सिद्धांत के पतन के लिए उत्तरदायी माना है विद्वानों के अनुसार राजनीति के अध्ययन के प्रति ऐतिहासिक दृष्टिकोणों को राजनीति के सत्ता सिद्धांत के पुष्टि माना जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि इतिहासकार का प्रमुख सम्बन्ध राजनीतिक घटनाओं के निर्धारण में सत्ता की भूमिका से है। कोबेन ने स्पष्ट रूप से कहा है कि "राजनीतिक सिद्धांत में इतिहास केवल अर्द्ध मैकियावैलीवाद को जन्म देता है यदि समस्त इतिहासकार लघ मैकिया-वैलीवाद नहीं है तो इसका कारण है कि वे किसी अन्य स्रोतों से राजनीतिक आदर्श प्राप्त करते हैं तथा उन्हें इतिहास में स्थान प्राप्त करते हैं।"
  7. सनकपूर्ण निराशावाद - राजनीतिक सिद्धांत के पतन में किसी सीमा तक सनकपूर्ण निराशावाद भी उत्तरदायी है यह राजनीति के अध्ययन में नैतिकता की उपेक्षा करता है तथा इस विश्वासं पर कायम है कि किसी-न-किसी रूप में बराई में से अच्छाई का जन्म होगा।
  8. सत्ता की अवधारणा से सम्बद्ध करने का प्रयास - विद्वानों ने राजनीतिक सिद्धांत को सत्ता की अवधारणा के साथ सम्बद्ध करने का प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सिद्धांत में पतन की स्थिति उत्पन्न हो गई है। मैकियावैली, हॉब्स, मैक्स बेवर, हैरोल्ड तथा एच० जे० मॉगैन्थो आदि विद्धानों ने राज्य को सत्ता के रूप में अभिव्यक्त किया है शक्ति न केवल समाज में संचालित होती है वरन् उसका एकमात्र सार तत्व भी है कोबेन ने इस विषय पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि राजनीति के अध्ययन में मूल्यों की स्थिति को राजनीति के शक्ति सिद्धांत की वेदी पर चढ़ा दिया गया है जिसकी प्रथम असभ्य अभिव्यक्ति मैकियावैली की रचनाओं में देखने को मिलती है और जिसकी पुनः प्राप्ति नाइबूर व ओ० वाई० गैसेट की रचनाओं में दिखाई देता है।


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