Thursday, 3 February 2022

राजनीति शास्त्र के अध्ययन के दृष्टिकोण का वर्णन कीजिये।

राजनीति शास्त्र के अध्ययन के दृष्टिकोण का वर्णन कीजिये। 

राजनीति-शास्त्र के अध्ययन के दृष्टिकोण

परम्परागत राजनीति-शास्त्र के अध्ययन के दृष्टिकोणों के सम्बन्ध में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि राजनीति-शास्त्र के अध्ययन के लिए सुनिश्चित पद्धतियों की आवश्यकता है। परम्परावादी राजनीति वैज्ञानिकों ने अध्ययन के लिए संस्थागत तथा दार्शनिक दृष्टिकोण को अपनाया। उनकी अध्ययन प्रणालियाँ अविकसित तथा अवैज्ञानिक मानी जाती रही। आधुनिक राजनीति वैज्ञानिक 'व्यवहारवादी दृष्टिकोण' को अपना कर वैज्ञानिक पद्धतियों तथा कनीकों के द्वारा इस अनुशासन का अध्ययन करता है।

परम्परागत पद्धति के प्रकार (Traditional Approaches)

  1. प्रयोगात्मक पद्धति (Experimental Approach) 
  2. ऐतिहासिक पद्धति (Historical Approach) 
  3. तुलनात्मक पद्धति (Comparative Approach) 
  4. पर्यवेक्षणात्मक पद्धति (Observational Approach) 
  5. दार्शनिक पद्धति (Philosophical Approach) 
  6. सादृश्यात्मक पद्धति (Analogical Approach)

इन पद्धतियों में दार्शनिक पद्धति को निगमनात्मक तथा अन्य को आगमनात्मक पद्धति हा जाता है।

1. प्रयोगात्मक पद्धति अथवा दृष्टिकोण (Experimental MethodorApproach)- राजनीतिक विज्ञान में इस दृष्टिकोण का प्रयोग बहुत ही कम किया जाता है। इसका कारण यह कि यह अनुशासन रसायन अथवा भौतिक विज्ञान की तरह का विज्ञान नहीं है, जिसमें यान्त्रिक धनों का उपयोग हो सके अथवा प्रयोगशाला में राजनीतिक प्रयोग किए जा सकें। मानव रणाओं और मानवीय मूल्यों को न तो किसी द्रव्य की तरह तोला जा सकता है और न ही लिकाबद्ध (Tabulate) किया जा सकता है। जान स्टुअर्ट मिल, वॉन तथा लावैल का भी ही मत है।

लेविस (Lewis) ने इसको इन सन्दर शब्दों में स्पष्ट किया है : "हम राजनीति विज्ञान) में वैसा नहीं कर सकते, जैसा कि रसायन शास्त्र में एक अन्वेषक प्रयोग करते हुए करता है। हम समाज के एक अंश को अपने हाथ में उस प्रकार उठाकर नहीं ले सकते, जैसे कि बडिंगनैग के राजा ने गुलीवर को अपने हाथ में उठा लिया था। न ही हम उसके विभिन्न हलुओं का उसी प्रकार अध्ययन कर सकते हैं, और न ही उसे मनोवांछित स्थितियों में रखकर सामाजिक समस्याओं को हल करने की चेष्टा कर सकते हैं, और न ही इस प्रकार अपनी कल्पनाशील ज्ञान पिपासा को शान्त कर सकते हैं।"

किन्तु ऐसे विचारों से यह नहीं मान लेना चाहिए कि राजनीति में प्रयोग सम्भव ही नहीं । सकते। सरकारें अपनी प्रशासनिक नीतियों द्वारा लगातार समाज में प्रयोग करती रहती हैं। तिहास स्वयं विशाल पैमाने पर होने वाला प्रयोग है। विभिन्न देशों में बनने वाले विभिन्न कानून, युद्ध एवं क्रान्तियाँ प्रयोग ही तो होते हैं। इनके द्वारा महान सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक रिवर्तन होते हैं। इन घटनाओं व प्रयोगों के क्रमबद्ध अध्ययन तथा अनुभव के आधार पर राजनीति के अध्येता निश्चित नियमों का निर्माण कर सकते हैं। यद्यपि ये प्रयोग राजनीति विज्ञान क छात्र के लिए अथवा उसके द्वारा नहीं किए जाते, बल्कि अज्ञात शक्तियों द्वारा किये जाते हैं।

काम्टे के अनुसार, जब राज्य में ज्ञात या अज्ञात परिवर्तन होते हैं तभी वास्तव में राजनीतिक प्रयोग होते रहते हैं।

2. ऐतिहासिक दृष्टिकोण (Historical Approach)- राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के लिए इतिहास का ठीक प्रकार से अध्ययन आवश्यक है। राजनीतिक संस्थाएं निर्माण का नहीं, वरन विकास का परिणाम हैं। राज्य कैसे बना, पहले कैसा था, उसके क्या कार्य थे अथवा अब क्या हैं, तथा भविष्य में उसे कैसा होना चाहिए, इन बातों का अध्ययन राजनीति का विद्यार्थी इतिहास द्वारा करता है।

गिलक्राइस्ट ने कहा है कि “राजनीति विज्ञान के प्रयोग इतिहास की पृष्ठभूमि में ही किये जाते हैं।"

लॉस्की के अनुसार, "सच्ची राजनीति इतिहास का दर्शन है।"

प्रो० आशीर्वादम के अनुसार, “इतिहास हमें केवल बीती हुई बात ही स्पष्ट नहीं करता, वह भविष्य की व्याख्या करने की कंजी भी है।"

इसी विचार को गिलक्राइस्ट (Gilchrist) इन शब्दों में प्रकट करता है, “इतिहास न केवल संस्थाओं की व्याख्या करता है, वरन् यह भविष्य के पथ-प्रदर्शन हेतु निष्कर्ष प्राप्त करने में भी सहायक होता है। यह वह धुरी है जिसके चारों ओर राजनीति विज्ञान की आगमनात्मक और नेगमनात्मक दोनों ही प्रक्रियाएँ कार्य करती हैं।"

ऐतिहासिक दृष्टिकोण की उपयोगिता के कारण ही अरस्तू के समय से ही इसका उपयोग किया जाता रहा है। सेविग्नी, जैलिनेक, हेनरी मेन, मैकियावेली, माण्टेस्क्यू, हीगल, मार्क्स, मैक्सवेबर, सीले, लॉस्की, काम्टे, मार्गन आदि सभी ने उस उपागम को अपनाया है। किन्तु व्यवहारवादी क्रान्ति और विज्ञानवाद के उदय के बाद इस उपागम की लोकप्रियता काफी कम की गई है। राबर्ट डैल तथा बैन्टले ने व्यवहारवादियों की इस आधार पर आलोचना की है।

इतिहासवादी उपागम एक पूरक, और कभी आधार के रूप में, राजनीतिक व्यक्तियों, घटनाओं, विचारों, संस्थाओं के भूतकालीन विकास को आधार बनाकर पात्र परिचय का काम करता है। यह वर्तमान को अतीत के माध्यम से देखता है। यह व्यवस्थित रूप में तथ्य-आँकड़े प्रस्तुत करके भविष्यवाणी करने में सहायक होता है, जैसा कि प्रारम्भ में ही बताया गया था। यहाँ तक कि राजनीति विज्ञान का अध्ययन इतिहास की एक शाखा के रूप में किया जाता रहा। आज भी अनेक देशों में ऐसी स्थिति विद्यमान है। एलन, कार्लाइल, डनिंग, मैक्लवैन, जार्ज सैबाइन, आदि विद्वान इतिहासवादिता के शिकार हो चुके हैं।

सीमाएँ (Limitations) - ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए, क्योंकि इसकी अपनी सीमाएं हैं।

सिजविक, ब्राइस, सीले तथा बार्कर इसे गौण स्थान देने के पक्ष में हैं। इस पद्धति का प्रयोग करते समय निम्नलिखित सावधानियाँ प्रयुक्त की जानी चाहिए

  1. ऐतिहासिक तथ्यों की ऊपरी समानताओं तथा सादृश्यों (Superficial resemblances and parallels) को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए।
  2. इतिहास का अध्ययन पूर्व कल्पित धारणाओं के अनुसार नहीं अपितु निष्पक्ष रूप से करना चाहिए।
  3. यह सदैव सत्य नहीं होता कि वर्तमान भूतकाल का परिणाम है अथवा वर्तमान में भविष्य की प्रगति के बीच विद्यमान हैं। यह आंशिक सत्य है कि 'इतिहास अपने को दोहराता है।' अतः वर्तमान अथवा भविष्य की हर समस्या का हल भूतकाल के आधार पर नहीं करना चाहिए।
  4. इस पद्धति द्वारा राजनीतिक तथ्यों का संकलन मात्र हो सकता है। जाँच किए बिना उनको स्वीकार करना ठीक नहीं।

3. तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method) - यह पद्धति ऐतिहासिक पद्धति की सहायक या पूरक पद्धति है। इस पद्धति का सर्वप्रथम प्रयोग राजनीति में अरस्तू ने किया था। उसने अपने समय के 158 संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया। आधुनिक युग में माण्टेस्क्यू, हेनरी मेन, डी० टाकविल और ब्राइस आदि विद्वानों ने इसका उपयोग किया है। माण्टेस्क्यू ने फ्रांसीसी संविधान की ब्रिटिश संविधान से तुलना करके ही 'शक्ति-पृथक्करण' के प्रसिद्ध सिद्धान्त की रचना की थी। भारतीय संविधान निर्माताओं ने इस पद्धति की सहायता लेकर भारतीय संविधान में विश्व भर के संविधानों की प्रमुख विशेषताओं को शामिल किया था। इस दृष्टि से राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक पद्धति की उपयोगिता है।

तुलनात्मक पद्धति में छः तार्किक कदमों का अनुसरण करना पड़ता है :

  1. ऐतिहासिक तथ्यों का संग्रह (Accumulation), 
  2. तथ्यों का क्रमबद्ध अनुशीलन (Arrangement),
  3. विषयवार वर्गीकरण (Classification), 
  4. पारस्परिक तारतम्य (Co-ordination), 
  5. काम के तथ्यों की छाँट (Selection) और
  6. निष्कर्ष अथवा परिमाणन (Deduction)

किन्तु इस कार्य में सावधानी प्रयुक्त की जानी चाहिए। निष्कर्ष निकालने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जिन तथ्यों से हमने सामान्य तत्त्व निकालने हैं, उनमें आपस में बहुत अधिक विभिन्नता होनी चाहिए। तुलनाएँ बहुत दूर तक नहीं घसीटी जानी चाहिएँ। उन्हीं राज्यों अथवा संस्थाओं के बीच तुलना की जानी चाहिए जिनके पीछे समान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही हो और अन्य परिस्थितियाँ भी समान हों। यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि विभिन्न देशों के निवासियों की पृष्ठ-भूमि, आर्थिक विचारधाराएँ, राजनीतिक-संस्कृति आदि में असमानता होती है। एक ही प्रकार की शासन प्रणाली विशिष्ट पृष्ठ-भूमि में विभिन्नता को जन्म दे सकती है। भारत तथा पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक प्रणालियाँ इसका उदाहरण हैं। यही नहीं, भारत, संयुक्त राज्य अमरीका तथा ग्रेट ब्रिटेन में लोकतन्त्र के तीन रूप हैं। प्रत्येक देश ने अपने प्रकार के लोकतन्त्र को अपनाया हुआ है।

आधुनिक राजनीति वैज्ञानिकों ने इस पद्धति का प्रयोग विशेषकर नवोदित अपश्चिमी राष्ट्रों तथा अन्तर्राष्ट्रीय-राजनीतिक क्षेत्रों में किया है। तुलना का आधार अब जगह (Space) ही नहीं काल (Period) भी हो गया है। इस पद्धति के लिए अब अधिक शुद्ध तथा स्पष्ट संकेतिकाएँ (Indices) व वैचारिक संचार-क्रम (Conceptual Framework) आदि विकसित कर लिए गए हैं। भिन्न प्रकार की शासन प्रणालियों के अध्ययन के लिए भिन्न प्रकार के आधार । चने गए हैं। आधुनिक लेखकों ने अब कई-एक माडलों का निर्माण करके तुलनात्मक पद्धति में - नए आयाम स्थापित किए हैं।

इस दिशा में आल्मण्ड तथा कोलमैन की 'The Politics of Developing Areas' और गिर्टज़ की 'Old Societies and New Nations' का नाम विशेष उल्लेखनीय है।


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