Thursday, 13 December 2018

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय, रचनाएं तथा काव्यगत विशेषताएँ

जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय, रचनाएं तथा काव्यगत विशेषताएँ

नाम
जयशंकर प्रसाद
जन्म
30 जनवरी 1889
जन्म स्थान
वाराणसी
माता
श्रीमती मुन्नी देवी था
पिता
देवी प्रसाद
राष्ट्रीयता
ब्रिटिश भारतीय
कार्य क्षेत्र
कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार
मृत्यु
नवम्बर 15, 1937
जीवन-परिचयः छायावाद के प्रमुख स्तम्भ एवं राष्ट्रीय चेतना के अमर कवि जयशंकर प्रसाद का व्यक्तित्व एवं कृतित्व पूरे छायावादी युग पर छाया रहा। प्रसाद, पन्त और निराला को मिलाकर जो वृह्तत्रयी बनती है, उसमें जयशंकर प्रसाद को ब्रह्म कहा जा सकता है। छायवादी युग के एकमात्र महाकाव्य कामायनीके रचयिता के रूप में ही जयशंकर को याद नहीं किया जाता, बल्कि छायावादी युग की चेतना को गढ़ने वाले अमर कवि के रूप में भी उन्हे याद किया जाता है। 
जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद जी का जन्म वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के एक सम्पन्न वैश्य परिवार मे 30 जनवरी 1889 को हुआ था। आपके पितामह श्री शिवरत्न जी तथा पिता देवी प्रसाद जी काशी में तम्बाकू, सुंघनी तथा सुर्ती के मुख्य विक्रेता थे। जयशंकर प्रसाद जी की माता का नाम श्रीमती मुन्नी देवी था।आपका परिवार काशी में सुंघनी साहु के नाम से प्रसिद्ध था। जिस समय प्रसाद जी सातवीं कक्षा में पढ़ते थे, उस समय उनके पिता का देहान्त हो गया था। घर को चलाने की जिम्मेवारी उनके बड़े भाई पर आ पड़ी। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी में क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन इन्होंने किया। प्रसाद जी को उन दिनों तीन कार्य करने पड़ते थे - व्यायाम करना, पढ़ना और दुकान की देखभाल करना। प्रसाद जी मन दुकानदारी में नहीं लगता था। प्रायः तम्बाकू की दुकान पर बैठे बही में कविताएं लिखा करते थे। भाई की डांट-फटकार का भी उन पर काई असर नहीं पड़ता था। कुछ ही समय में उनके द्वारा भेजी गई समस्या पूर्तियों का प्रभाव पड़ने लगा था। भाई ने उन्हें कविता लिखने की छूट दे दी। कुछ समय पश्चात् शम्भु रत्न जी की मृत्यु हो गयी। किशोरावस्था के पूर्व ही माता और बड़े भाई का देहावसान हो जाने के कारण 17 वर्ष की उम्र में ही प्रसाद जी पर आपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा। गृहस्थी चलाने की जिम्मेवारी जयशंकर प्रसाद जी पर आ पड़ी। प्रसाद जी अत्यन्त उदार, सरल, मृदुभाषी, साहसी एवं स्पष्ट वक्ता थे। उन्हें साहित्य पर जो भी पुरस्कार मिले, उन्होंने वे सभी दान कर दिये। प्रसाद जी एकान्तप्रिय तथा भीड़-भाड़ से बचने वाले व्यक्ति थे। 
Related : आकाशदीप कहानी की समीक्षा मृत्यु : 22 जनवरी, 1937 को वे बीमार पड़े और डॉक्टरों ने उन्हें क्षय रोग का रोगी घोषित कर दिया था। वे प्रायः जीवन से उदासीन हो गए थे और 1937 में उनका देहान्त हो गया। अड़तालीस वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु हो गई। हिन्दी जगत् को प्रसाद जी ने अमूल्य साहित्य-रत्न दिए।

रुचियाँ : वे एक कुशल कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार होने के अतिरिक्त बाग-बगीचे तथा भोजन बनाने के शौकीन थे और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। वे नियमित व्यायाम करनेवाले, सात्विक खान पान एवं गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। 

रचनाएं - जयशंकर प्रसाद जी ने 27 से अधिक रचनाएं लिखी। प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं। 
काव्य-संग्रह
चित्राधार, करूणालय, महाराणा का महत्व, प्रेम-पथिक, कानन-कुसुम, झरना, लहर, आंसू और कामायनी।
नाटक
राज्यश्री, एक घूंट, कामना, अजातशत्रु, स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी। 
कहानी-संग्रह
छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी और इन्द्रजाल।
उपन्यास
कंकाल, तितली  तथा अधूरा उपन्यास इरावती
निबन्ध
काव्यकला और अन्य निबन्ध।

साहित्यिक विशेषताएं : जयशंकर प्रसाद जी की आकाशदीप कहानी के आधार साहित्यपरक निम्नलिखित विशेषताएं मानी जा सकती हैं- 

1. अतीत के प्रति आकर्षण - जयशंकर प्रसाद ने ‘आकाशदीप’ कहानी में इतिहास और कल्पना का सम्मिश्रण कर अपने गौरवशाली अतीत का चित्रण किया है। वे अतीत की मर्यादाओं का समर्थन करते थे। उनकी कहानियों का मुख्य उद्देश्य धर्म, सम्प्रदाय और जातिवाद से ऊपर उठकर एक आदर्श समाज और गौरवशाली राष्ट्र की प्रतिष्ठा करना है। वे अतीत की मर्यादाओं का समर्थन करते थे। इसके साथ-साथ समाज में फैली बुराईयों का भी विरोध किया।
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2. राष्ट्रीय भावना - प्रसाद जी की कहानियों में राष्ट्रीय प्रेम की भावना का बढ़-चढ़कर वर्णन किया गया है। राष्ट्र प्रेम के लिए जयशंकर प्रसाद व्यक्ति के बलिदान और त्याग के पक्षधर रहे हैं। उनकी कहानियों में नारी एवम् पुरूष पात्र युद्ध के बिगुल बजते ही राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत हो जाते हैं। उनकी कहानियों में बलिदान, त्याग, समर्पण और करुणा का सदा संचार रहता है। जयशंकर प्रसाद की कहानियों में राष्ट्रीय प्रेम की भावना का महत्वपूर्ण वर्णन है।  
3. मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा - प्रसाद ने सदा मानव का मूल्यांकन गुणों और चरित्र के आधार पर किया है। प्रसाद के अनुसार ऊच-नीच, जाति-पाति सभी मनुष्य द्वारा निर्मित संकीर्ण प्रवृत्तियां समाज में कोई स्थान नहीं रखती। वह मनुष्य के द्वारा मनुष्य के शोषण के सदैव विरोधी हैं। उनकी कहानियों में राजा-रानियों से लेकर दीन-दुखियों तक को स्थान मिला है। उनके लिए मानवता ही सर्वोपरि धर्म है। 
4. गद्य में काव्यपरकता - उनके गद्य में भी काव्य के जैसी भाषा और भावों का चित्रण अंकित किया है। उनकी कहानियों में मन व तन को स्पर्श करने वाली अभिव्यक्ति है। उनकी भाषा संकेत देने वाली तथा काव्यात्मक होने के कारण पाठक के मन को मधुर स्वप्नलोक में ले जाती है। 
5. प्रेम और त्याग भावना का वर्णन - जयशंकर प्रसाद की रचनाओं में प्रेम और त्याग-भावना का उदान्त चित्रण मिलता है। आकाशदीप कहानी भी इसी प्रकार की भावनाओं से आपूरित है। चम्पा और बुद्धगुप्त में प्रेम की पराकष्ठा भी है लेकिन परिणय के बाद जब बुद्धगुप्त उससे द्वीप को छोड़कर भारत चलने का आग्रह करता है तो वह अपने द्वीपवासियों के साथ रहने की इच्छा प्रकट करती है। उसमें प्रेम के नाम पर केवल वासना नहीं है अपितु त्याग की भावना है। 
6. तत्सम्-तद्भव शब्दों का प्रचुर प्रयोग - जयशंकर प्रसाद की गद्य-भाषा पर उनकी कवित्व-प्रतिभा का प्रभाव रहा है। उनकी गद्य-भाषा में हिन्दी की खड़ी बोली का संस्कृत निष्ठ रूप प्रयुक्त हुआ है। उनके द्वारा लिखित कहानी ‘आकाशदीप’ में प्रयुक्त शब्दावली से स्पष्ट है कि उन्होंने तत्सम्-तद्भव शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है, जैसे-दस्यु, वृत्ति, बन्दीगृह, पोत, जलयान, आलोक, शैलमाला, सिन्धु, निविड़तम्, तारिका आदि। 
इस प्रकार कहा जा सकता है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी कहानीकार जयशंकर प्रसाद की कहानियों में मानव, समाज और राष्ट्र सर्वोपरि रहा है। बार-बार कहानीकार का मानस इन्हीं तत्वों के प्रति आकर्षित होता चला गया है। मूल संवेदना को पकड़कर उसके अनुकलू भाषा और अन्य तत्वों का सम्यक् सृजन करना प्रसाद जी की प्रमुख विशेषता रहा है। उनके पात्र भले ही इतिहास-सम्बन्धी घटनाओं के आधार पर काल्पनिक हैं, लेकिन देशकाल एवं वातावरण की दृष्टि से अपने उद्देश्य की पूर्ति करने में सक्षम हैं। सांस्कृतिक मूल्यों का विकास करना ही कहानीकार का मूल ध्येय रहा है।


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