Sunday, 9 December 2018

महाराजा अग्रसेन की जीवनी गोत्र व कहानी

महाराजा अग्रसेन की जीवनी गोत्र व कहानी 

नाम
महाराजा अग्रसेन
जन्म
अश्विन शुक्ल प्रतिपदा
राजकाल
4250 BC से 637 AD
पिता
महाराजा श्री वल्लभसेन जी
माता
महारानी श्रीमती भगवती देवी जी
पत्नी
महारानी माधवी, महारानी सुन्दरावती
उत्तराधिकारी
महाराजा श्री विभुसेन जी
‘‘ बाहर से कोई व्यक्ति अग्रोहा में बसने आए तो प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य होगा कि वह स्वेच्छा से उस नवागन्तुक को एक मुद्रा और एक ईंट दे ताकि नया आने वाला व्यक्ति अग्रोहा राज्य में सुख-शान्ति से रह सके।’’
-महाराजा अग्रसेन
महाराजा अग्रसेन का परिचय : हरियाणा राज्य में एक नगर है अग्रोहा। पहले यह अग्रोहा राज्य था। इस गणतांत्रिक राज्य के संस्थापक प्रजापालक और समाजसेवी राजा थे महाराज अग्रसेन। इनके राज्य में हिंसा को कोई स्थान नहीं था। उन्होंने यज्ञों में बलि का कार्य बन्द करा दिया था। प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के सुख-दुःख में समान रूप से सहयोगी था।
महाराजा अग्रसेन
महाराजा अग्रसेन

राजस्थान और हरियाणा राज्य के बीच में एक नदी बहती थी सरस्वती। इसी सरस्वती नदी के किनारे एक राज्य प्रताप नगर था। मांकिल ऋषि की परम्परा में धनपाल नाम के एक राजा हुए थे। धनपाल ने ही प्रताप नगर बसाया था। राजा धनपाल की छठीं पीढ़ी में महाराजा बल्लभ हुए। महाराजा बल्लभ के दो पुत्रों में एक अग्रसेन थे और दूसरे शूरसेन थे। युवावस्था में अग्रसेन शासन व्यवस्था देखते थे और शूरसेन सैन्य व्यवस्था देखते थे। अग्रसेन और शूरसेन में अटूट प्रेम था। अग्रसेन के जन्म के समय ऋषि गर्ग ने कहा था कि अग्रसेन बहुत बड़ा और तेजस्वी राजा बनेगा। यह एक नयी शासन व्यवस्था का निर्माण करने में भी सक्षम होगा।

महाराजा अग्रसेन का विवाह : अग्रसेन का विवाह नागराज कुमुद की पुत्री माधवी से हुआ। इसके अलावा महाराजा अग्रसेन ने कोलापुर के राजा महीरथ की पुत्री सुन्दरावती से भी विवाह किया था।

अग्रसेन की पत्नी माधवी के पिता कुमुद और सुन्दरावती के पिता महीरथ ने संकट की घड़ी आने पर अग्रसेन की मदद करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि यह मात्र दो परिवारों का ही मिलन नहीं है, वरन् दो संस्कृतियों का मिलन है।

अग्रसेन द्वारा दो नागवंशों से सम्बन्ध स्थापित कर लेने के कारण उनका राज्य और ज्यादा समृद्धिशाली एवं मजबूत हो गया। उनकी प्रजा संतुष्ट थी।
मंदाकिनी नदी के किनारे बसे यक्ष राजा की पुत्री सुपात्रा का विवाह अग्रसेन के भाई शूरसेन से हो गया।

अग्रसेन के निमंत्रण पर इन्द्र स्वयं प्रताप नगर आए। इस अवसर पर प्रताप नगर को खूब सजाया गया। इन्द्र की अगवानी भी बड़े सम्मान पूर्वक की गई। अग्रसेन के पिता महाराजा बल्लभ का आसन, छत्र व चँवर इन्द्र के बराबर लगाया गया। अग्रवंशजों की शादी में छत्र व चँवर का प्रयोग उसी परम्परा के अनुसार आज भी किया जाता है ।

समय पूर्व अग्रसेन दक्षिणी राज्यों के भ्रमण पर पत्नियों सहित चले गए, तब वहाँ की व्यवस्था शूरसेन ने सँभाली।

अग्रोहा राज्य की स्थापना : महाराजा बल्लभ की मृत्यु के बाद पिण्डदान के लिए अग्रसेन अनेक तीर्थों के बाद गया पहुँचे। वहाँ से वह लोहागढ़ सीमा से निकल पंच नद (वर्तमान पंजाब) राज्य पहुँचे जो सरस्वती व यमुना नदी के किनारे था।

वहाँ एक स्थान पर सिंहनी अपने शावक के साथ खेल रही थी। अग्रसेन हाथी पर बैठे थे। वह शावक तेजी से उछला और हाथी के मस्तक पर जा बैठा। तभी उन्हें अपने पिता की बात याद आयी कि किसी वीरधरा पर एक नया राज्य बसाना है। अग्रसेन ने उस स्थान के विषय में विद्वानों से सलाह ली। सभी ने उस जगह को वीरभूमि, उर्वरा व श्रेष्ठ बताया । और यहीं नया राज्य आग्रेयगण (बाद में अग्रोहा) बसाया। इसकी राजधानी अग्रोदक थी। अग्रसेन यहीं के महाराजा बने और शूरसेन प्रतापनगर के राजा बने। कहा जाता है कि अग्रसेन ने 18 बस्तियाँ बसायीं। उनके राज्य की नीति ‘जियो और जीने दो’ पर आधारित थी। महाराजा अग्रसेन के राज्य में हिंसा व दुर्नीति के लिए कोई स्थान नहीं था।

पशुबलि का विरोध  गर्ग के कहने पर अग्रसेन ने अश्वमेध यज्ञ किया। अश्वमेध में पशुबलि देने की परम्परा होने पर भी अग्रसेन ने पशुबलि नहीं होने दी । पशु बलि के स्थान पर श्री फल (नारियल) को ही उन्होंने यज्ञ की पूर्णाहुति का साधन बनाया। अपने राज्य में कहीं भी होने वाली पशु-बलि उन्होंने रुकवा दी।

एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत
उनके राज्य में हर व्यक्ति एक-दूसरे की मदद करने वाला था। बाहर से आने वाले व्यक्ति को एक मुद्रा और एक ईंट, प्रत्येक नागरिक को देने का आदेश था ताकि नवागंतुक का जीवनयापन सुखपूर्वक व्यतीत हो सके। बाद में अग्रसेन ने गणतान्त्रिक व्यवस्था के अंतर्गत अन्य जनपदों में जन-प्रतिनिधियों की नयी व्यवस्था को जन्म दिया।

अश्वमेध यज्ञ में..........
तत्कालीन राजा अपनी सत्ता का प्रभाव सबको मानने के लिए एक यज्ञ करता है। यज्ञ के बाद एक घोड़ा छोड़ा जाता है। वह विभिन्न स्थानों से होता हुआ फिर वहीं वापस आता है। यदि कोई व्यक्ति उस घोड़े को पकड़ लेता था, तो उससे युद्ध करना पड़ता था।
अश्वमेध यज्ञ के बाद लम्बी अवधि तक महाराजा अग्रसेन ने राज्य किया। तत्पश्चात् अपने पुत्र विभु को शासन व्यवस्था सौंपकर दोनों महारानियों सहित वनवास ग्रहण कर लिया।

अठारह गोत्र की स्थापना
अग्रसेन जी ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर, अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। 
ऐरन
बंसल
बिंदल
भंदल
धारण
गर्ग
गोयल
गोयन
जिंदल
कंसल
कुच्छल
मधुकुल
मंगल
मित्तल
नागल
सिंघल
तायल
तिंगल

काका हाथरसी जी ने अग्रवाल गोत्र महिमा कविता के माध्यम से बताई है।
वैश्य जाती में प्रतिष्ठित अग्रवाल का वर्ग,
गोत्र अठारह में प्रथम नोट कीजिए गर्ग,
नोट कीजिए गर्ग कि कुच्छल, तायल, तिंगल,
मंगल, मधुकूल, ऐरण, गोयन, बिंदल, जिंदल,
कहीं कहीं है नागल, धारण, भंदल, कंसल,
अधिक मिलेंगे मित्तल, गोयल, सिंहल, बंसल,
यह सब थे अग्रसेन के पुत्र दूलारे,
हम सब उनके वंशज है, वे पूज्य हमारे।

महाराजा अग्रसेन की स्मृति में..........
  1. भारत सरकार ने उनके अहिंसक, लोकतंत्रात्मक एवं भाई चारे की शासन व्यवस्था के कारण उनकी स्मृति में 24 सितम्बर 1976 को 25 नये पैसे का डाक टिकट जारी किया।
  2. दिल्ली से अग्रोहा होकर पाकिस्तान सीमा तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 10 का नाम भी महाराजा अग्रसेन राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित किया गया।
  3. 25 जनवरी 1995 को दक्षिण कोरिया से खरीदे गए एक लाख दस हजार टन की क्षमता वाले तेल वाहक जलपोत का नाम महाराजा अग्रसेन के नाम पर रखा गया है।
  4. दिल्ली सरकार ने भी एक महाविद्यालय का नाम महाराजा अग्रसेन के नाम पर किया है।
  5. दिल्ली से मुम्बई एवं बंगलौर (बंगलुरु) होते हुए कन्याकुमारी तक जाने वाले नेशनल हाईवे क्रमांक एक का नाम महाराजा अग्रसेन के नाम पर रखा गया है।

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