Thursday, 13 December 2018

आकाशदीप कहानी की नायिका चम्पा का चरित्र चित्रण

आकाशदीप कहानी की नायिका चम्पा का चरित्र चित्रण

आकाशदीप नामक कहानी प्रसिद्ध छायावादी कवि, ऐतिहासिक नाटककार एवं कहानीकार जयशंकर प्रसाद की भावपूर्ण कहानी है। पूरा कथानक कहानी की नायिका चम्पा के क्रिया-कलापों एवं निर्णयों के आसपास घूमता रहता है। यहाँ तक कि कहानी का नामक बुद्धगुप्त भी चम्पा के सामने समर्पण किये रहता है। चम्पा का चरित्र नारी के त्याग एवं लोक-कल्याण की भावना का उत्कृष्ट उदाहरण है। वह लोक-कल्याण के लिए अपने प्रेम तक का बलिदान कर देती है। उसमें साहस की कमी नहीं है, लेकिन बुद्धगुप्त को पाकर उसमें और भी वृद्धि हो जाती है। निर्णय लेने में वह देरी नहीं करती। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चम्पा के चरित्र का आंकलन इस प्रकार किया जा सकता है-
साहसी क्षत्रिय बालिका - आकाशदीप कहानी की नारी-पात्र ‘चम्पा क्षत्रिय बालिका है, जो किसी भी मुसीबत में साहस नहीं छोड़ती। जाहनवी नदी के तट पर स्थित चम्पा नगरी के क्षत्रिय वंश से उसका सम्बन्ध है। बचपन से ही पिता के साथ समुद्र में रहने के कारण उसका साहस और भी मजबूत हो गया था। बुद्धगुप्त के साथ हुए वार्तालापों से भी उसके इस गुण की पुष्टि होती है। 
गम्भीर नारी - चम्पा एक गंभीर नारी है। अपने हर कदम के प्रति गंभीर रहती है। जल्दबाजी में निर्णय लेते समय भी उसके चिंतन की गंभीरता उजागर हुई है। चाहे उसके मन में बुद्धगुप्त के प्रति प्रेम-जाग्रत होने की स्थिति रही हो, घृणा का भाव रहा हो; भीतर ही भीतर सोचती रहती है। समय की प्रतीक्षा करती है। ऐसे अनेक प्रसंग-वर्णन हैं, जहाँ चम्पा की गंभीरता को देखकर जलदस्यु बुद्धगुप्त परेशान हो उठता है।
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नारी होने का स्वाभिमान - आकाशदीप कहानी की चम्पा नारी होने पर स्वाभिमान प्रकट करती है। कहीं भी विवश, लाचार या कमजोर नहीं दिखती। बंधनमुक्त जब बुद्धगुप्त विस्मय से कहता है कि अरे तुम तो नारी हो तो वह बिना किसी संकोच या हिचकिचाहट के इस बात को स्वीकार करती है और उल्टा प्रश्न कर देती है- क्या नारी होना कोई पाप है। परिणय-सूत्र में बँधने पर भी वह अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ती। 
सेवा व त्याग की साक्षात् मूर्ति - चम्पा सेवा व त्याग की साक्षात् मूर्ति है। वह किसी ऐश्वर्य-सुख-भोगने की लालसा नहीं रखती। वह द्वीपवासियों की सेवा का संकल्प लेती है, ताकि उनके जीवन स्तर को सुधारा जा सके। केवल इतना ही नहीं, बुद्धगुप्त चम्पा से परिणय के बाद भारत लौटने को कहता है तो साफ इंकार कर देती है। कर्तव्य को प्रमुखता देते हुए बुद्धगुप्त के प्रति अपने प्रेम का त्याग कर देती है।
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कर्तव्यपालन के प्रति सजग - आकाशदीप कहानी को पढ़ने पर पता चलता है कि उसकी नायिका चम्पा अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहती है। एक तरफ प्रेम का दीपक है तो दूसरी तरफ कर्तव्य की लौ। एक सीमा तक तो वह प्रेम की दीपक हो जलाती है, लेकिन कर्तव्य के सम्मुख उसे छोड़ने को तैयार हो जाती है। पीड़ित आदिवासियों की सेवा को अपना कर्तव्य समझते हुए बुद्धगुप्त से कहती है कि मेरे लिए यह सब भूमि मिट्टी है और पानी, हवा तरल है। अग्नि की तरह मेरे मन में कोई आकांक्षा नहीं है। यह उनके मन की कर्तव्य-पालन के प्रति सजगता की ही भावना है। 
भावुक और कोमल स्वभाव - चम्पा का स्वभाव भावुक और कोमल है। इसका चित्रण कहानी में अनेक स्थलों पर हुआ है, जैसे कहानी के प्रारम्भ में दोनों बन्दियों के रूप में बुद्धगुप्त और चम्पा के बीच हुए वार्तालाप से इस गुण की झलक मिलती है। चम्पा को देखकर बुद्धगुप्त के मनोभावों के चित्रण में भी कहानीकार ने लिखा है, ‘दुर्दान्त दस्यु ने देखा, अपनी महिमा में अलौकिक एक तरूण बालिका, वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला वह थी कोमलता। ‘इसी तरह बुद्धगुप्त द्वारा विश्वास की बात कहे जाने पर वह भावुक हो उठती है। 
स्पष्टवादी - चम्पा, जो कुछ भी बोलती है, साफ बोलती है। उसके मन में किसी भय की आशंका नहीं रहती। जब बुद्धगुप्त अपनी दस्युवृत्ति छोड़ने की बात कहता है तो वह कहती है- तुमने दस्युवृत्ति तो छोड़ दी है, लेकिन तुममें करूणाहीनता, तृष्णा-भाव और ईष्र्या वैसी ही है। वह उसे अपने पिता की हत्या का कारण कहने में भी हिचक नहीं करती। इसी तरह बुद्धगुप्त चम्पा से जब भारत लौटने की बात कहता है, तो भी वह उसे स्पष्ट जवाब दे देती है। साफ बोलने-कहने से उसका व्यक्तित्त्व चमत्कृत हो उठा है। 

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘आकाशदीप’ कहानी की नायिका चम्पा नारी-जनित गुणों के साथ त्याग एवं लोक-कल्याण की भावना का प्रतीक है। अपने कर्तव्य-पालन के मार्ग में आने वाली प्रेम-जैसी भावना को भी त्यागने में संकोच न करने वाली चम्पा निश्चित ही महान् पात्रा है। उसका सदाचरण एवं सद्कर्म ही उसे कहानी की नायिका के रूप में प्रतिष्ठित होने का मार्ग प्रशस्त करते दिखायी पड़ते हैं।

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