Saturday, 8 December 2018

महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय। Maharshi Valmiki ki Jivani

महर्षि वाल्मीकि का जीवन परिचय। Maharshi Valmiki ki Jivani

Maharshi Valmiki ki Jivani
महर्षि वाल्मीकि
अयोध्या के समीप तमसा नदी के किनारे वाल्मीकि तपस्या करते थे। वह प्रतिदिन प्रातः स्नान के लिये नदी जाया करते थे। एक दिन जब वह स्नान करके लौट रहे थे, तो उन्होंने एक क्रौंच पक्षी के जोडे़ को क्रीड़ा करते देखा। वाल्मीकि मुग्ध होकर देख ही रहे थे कि एक व्याद्द ने तीर चला कर जोड़े में से एक पक्षी को मार दिया। दूसरा पक्षी पास के वृक्ष पर बैठकर अपने मरे हुये साथी को देखकर विलाप करने लगा। इस करुण दृश्य को देखकर वाल्मीकि के मुख से स्वतः कविता का स्रोत फूट पड़ा ।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौ॰चमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्।।
(अर्थात्-हे व्याध ! तुमने काम में मोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से जो एक को मार दिया है, इसलिए तुम चिर स्थाई प्रतिष्ठा (शान्ति) को नहीं प्राप्त कर सकोगे।)

वाल्मीकि ने आगे चलकर रामायण की रचना की। महर्षि वाल्मीकि का जन्म सहस्रों वर्ष पूर्व हुआ था। वह कब और कहाँ जन्में इस बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। बचपन में महर्षि वाल्मीकि का नाम ‘रत्नाकर’ था। ईश्वरीय प्रेरणा से वह सांसारिक जीवन (मोह) को त्याग कर परमात्मा के ध्यान में लग गए। उन्होंने कठोर तपस्या की। तपस्या में वह इतने लीन हो गए कि उनके शरीर पर दीमक नेे अपनी बाँबी (वल्मीक) बना लिया। इसी कारण उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।

तमसा नदी के किनारे स्थित आश्रम में रहकर उन्होंने कई रचनाएँ की । प्रसिद्ध ग्रंथ ‘रामायण’ की भी रचना यहीं पर की गई। रामायण में वर्णित कथा जैसा सुन्दर, स्पष्ट और भक्ति-भावपूर्ण वर्णन दूसरे कवि के काव्य में नहीं मिलता है। वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का आदि कवि माना जाता है। वाल्मीकि-रामायण में सात काण्ड (खण्ड) हैं। उन्होंने अपनी इस रचना में राम के चरित्र का ही नहीं बल्कि उस समय के समाज की स्थिति, सभ्यता, शासन-व्यवस्था तथा लोगों के रहन-सहन का भी वर्णन किया है। रामायण को त्रेता युग का इतिहास-ग्रंथ भी माना जाता है।

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पुरुषोत्तम श्री राम के पुत्रों लव-कुश का जन्म हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा महर्षि की देख-रेख में हुई थी। उन्होंने अपने ज्ञान और शिक्षा-कौशल से लव-कुश को अल्प आयु में ही ज्ञानी बनाया और युद्ध-कला में पारंगत कर दिया था।

श्री राम के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा जब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचा तो लव-कुश ने उसे बाँध लिया। उन्होंने लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की सेना को पराजित कर अपनी असीम शक्ति तथा प्रतिभा का परिचय दिया। उन दोनों ने श्री राम को भी अपनी वीरता और बुद्धि से हतप्रभ कर दिया। उनका यह पराक्रम महर्षि वाल्मीकि की शिक्षा-दीक्षा का ही परिणाम था।

महर्षि वाल्मीकि कवि, शिक्षक, ज्ञानी तथा त्रिकालदर्शी ऋषि थे। रामायण ग्रंथ भारत का ही नहीं बल्कि सारे संसार की अनमोल कृति है। महर्षि वाल्मीकि को उनकी नीति, शिक्षा, दूरदर्शिता तथा कृतियों के कारण आज भी आदर और सम्मान के साथ याद किया जाता है।

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