डॉ. धर्मवीर भारती का जीवन परिचय, रचनाएँ, सम्मान एवं पुरस्कार

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डॉ. धर्मवीर भारती का जीवन परिचय, रचनाएँ, सम्मान एवं पुरस्कार : डॉ. धर्मवीर भारती हिंदी के एक महान लेखक तथा गद्यकार तथा उपन्यासकार थे। उन्होंने 'गुनाहों का देवता' (1949) और 'सूरज का सातवां घोड़ा' (1952) जैसे उपन्यास लिखे।  उनकी कृति 'सूरज का सातवां घोड़ा' पर फिल्म बनी और 'कनुप्रिया' तथा 'अंधायुग' ने साहित्य के क्षेत्र में नयी बहस शुरू की। तो आइये जानते हैं लेखक धर्मवीर भारती के जीवन परिचय (JEEVAN PARICHAY)तथा रचनाओं के बारे में।

    धर्मवीर भारती का जीवन परिचय / Jeevan Parichay

    धर्मवीर भारती का जन्म 24 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद के अतर सुइया मुहल्ले में हुआ। उनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा और माँ का श्रीमती चंदादेवी था।
    जन्म
    25 दिसम्बर 1926
    मृत्यु
    4 सितंबर, 1997
    माता
    चंदादेवी
    पिता
    चिरंजीवलाल वर्मा
    पत्नी
    कांता कोहली, पुष्पलता शर्मा (पुष्पा भारती)
    व्यवसाय
    लेखक, कवि, नाटककार
    स्कूली शिक्षा डी. ए. वी. हाई स्कूल में हुई और उच्च शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में। घर और स्कूल से प्राप्त आर्यसमाजी संस्कार, इलाहाबाद और विश्वविद्यालय का साहित्यिक वातावरण, देश भर में होने वाली राजनैतिक हलचलें, बाल्यावस्था में ही पिता की मृत्यु और उससे उत्पन्न आर्थिक संकट इन सबने उन्हें अतिसंवेदनशील, तर्कशील बना दिया। वर्ष 1945 में उन्होंने बी.ए. किया और वर्ष 1947 में एम.ए. में तथा वर्ष 1954 में सिद्ध साहित्य पर पीएचडी की।

    इलाहाबाद से प्रकाशित साहित्यिक पत्र 'संगम' के सहायक संपादक के पद पर कार्य किया। एक वर्ष तक हिंदुस्तानी अकादमी के उपसचिव रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में वर्ष 1960 तक हिंदी विभाग में अध्यापक की नौकरी की। देखते-ही-देखते लोकप्रिय अध्यापकों में उनकी गिनती होने लगी। वे वर्ष 1960 में धर्मयुग के संपादक होकर मुंबई चले गए और 1987 तक उसका संपादन किया। उनका कहना था कि सच्चा पत्रकार स्वभाव से प्रगतिशील होता है। वर्ष 1952 में प्रकाशित दसरा सप्तक में उनकी रोमानी कविताएं अज्ञेय जी ने एक साथ छापी। उनका अंतिम कविता, संग्रह 'सपना अभी भी' वर्ष 1993 में प्रकाशित हुआ। नयी कविता आंदोलन के लिए उन्होंने 'निकष' पत्रिका भी निकाली और 'आलोचना' का संपादन भी किया।

    उन्हें जीवन में दो ही शौक थे-अध्ययन और यात्रा। भारती के साहित्य में उनके विशद अध्ययन और यात्रा-अनुभवों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है- “जानने की प्रक्रिया में होने और जीने की प्रक्रिया में जानने वाला मिजाज़ जिन लोगों का है उनमें मैं अपने को पाता हूँ।” (ठेले पर हिमालय) उन्हें आर्यसमाज की चिंतन और तर्कशैली भी प्रभावित करती है और रामायण, महाभारत और श्रीमदभागवत भी। प्रसाद और शरत् का साहित्य उन्हें विशेष प्रिय था। आर्थिक विकास के लिए मार्क्स के सिद्धांत उनके आदर्श थे परंतु मार्क्सवादियों की अधीरता और मताग्रहता उन्हें अप्रिय थे। 'सिद्ध साहित्य' उनके शोध का विषय था, उनके सहजिया सिद्धांत से वे विशेष रूप से प्रभावित थे। पश्चिमी साहित्यकारों में शैले और आस्करवाइल्ड उन्हें विशेष प्रिय थे। भारती को फूलों का बेहद शौक था। उनके साहित्य में भी फूलों से संबंधित बिंब प्रचुरमात्रा में मिलते हैं।

    आलोचकों ने भारती जी को प्रेम और रोमांस का रचनाकार माना है। उनकी कविताओं, कहानियों और उपन्यासों में प्रेम और रोमांस का यह तत्त्व स्पष्ट रूप से मौजूद है। परंतु उसके साथ-साथ इतिहास और समकालीन स्थितियों पर भी उनकी पैनी दृष्टि रही है जिसके संकेत उनकी कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, आलोचना तथा संपादकीयों में स्पष्ट देखे जा सकते हैं। उनकी कहानियों-उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन के यथार्थ के चित्र हैं। 'अंधा युग' में स्वातंत्र्योत्तर भारत में आई मुल्यहीनता के प्रति चिंता है। उनका बल पूर्व और पश्चिम के मूल्यों, जीवन-शैली और मानसिकता के संतुलन पर है, वे न तो किसी एक का अंधा विरोध करते हैं न अंधा समर्थन, परंतु क्या स्वीकार करना और क्या त्यागना है इसके लिए व्यक्ति और समाज की प्रगति को ही आधार बनाना होगा- “पश्चिम का अंधानुकरण करने की कोई जरूरत नहीं है, पर पश्चिम के विरोध के नाम पर मध्यकाल के तिरस्कृत मूल्यों को भी अपनाने की जरूरत नहीं है।” उनकी दृष्टि में वर्तमान को सुधारने और भविष्य को सुखमय बनाने के लिए आम जनता के दुःख दर्द को समझने और उसे दूर करने की आवश्यकता है। दुःख तो उन्हें इस बात का है कि आज ‘जनतंत्र में ‘तंत्र शक्तिशाली लोगों के हाथों में चला गया है और 'जन' की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। अपनी रचनाओं के माध्यम से इसी ‘जन' की आशाओं, आकांक्षाओं, विवशताओं, कष्टों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास उन्होंने किया है। 5 सितंबर, 1997 को उन्हें नींद के दौरान ही दिल का दौरा पड़ जाने से उनकी मृत्यु हो गई।

    धर्मवीर भारती की रचनाएँ

    डॉ. धर्मवीर भारती ने अनेक विधाओं में साहित्य-रचना की । उनकी रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं
    मुक्तक कविताएँ - ठंडा लोहा, सात गीत वर्ष 
    प्रबंधकाव्य - कनुप्रिया 
    दृश्यकाव्य - अंधा युग, नदी प्यासी थी 
    उपन्यास - गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा
    कहानी संकलन - मुर्दो का गाँव, चाँद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान 
    ललित गद्य - ठेले पर हिमालय, पश्यन्ती, कहनी - अनकहनी, मुक्त क्षेत्रे : युद्ध क्षेत्रे 
    आलोचना - प्रगतिवादः एक समीक्षा, मानवमूल्य और साहित्य 
    शोध प्रबंध - सिद्ध साहित्य 
    सहयोगी लेखन - ग्यारह सपनों का देश 
    अनुवाद - आस्कर वाइल्ड की कहानियाँ, देशांतर 
    संपादन/सह संपादन - संगम (पत्रिका), निकष (पत्रिका) आलोचना (पत्रिका) धर्मयुग (पत्रिका), हिंदी साहित्य कोश (संदर्भ ग्रंथ) अर्पित मेरी भावना (भगवती चरण वर्मा अभिनंदन ग्रंथ)

    सम्मान एवं पुरस्कार

    पद्मश्री पुरस्कार (1972), संगीत नाटक अकादमी सदस्यता, दिल्ली (1967), हल्दी घाटी श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार राजस्थान (1984), साहित्य अकादमी रत्न सदस्यता, (1985), संस्थान सम्मन, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (1986), सर्वश्रेष्ठ लेखक सम्मान, राजस्थान (1988), गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, आगरा (1989), राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान, बिहार सरकार (1989), भारत भारती सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (1990), महाराष्ट्र गौरव, (1990), साधना सम्मन, मध्य प्रदेश (1991), महाराष्ट्राच्या सुपुत्रांचे अभिनंदन, वसंतराव नाईक प्रतिष्ठान, महाराष्ट्र (1992), व्यास सम्मान, के के बिड़ला फाउंडेशन, दिल्ली (1994), उत्तर प्रदेश गोरव, अभियान संस्थान, मुंबई (1997) |

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