दूर के ढोल सुहावने मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग

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दूर के ढोल सुहावने मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग

दूर के ढोल सुहावने मुहावरे का अर्थ होता है– दूर की चीज़ अच्छी लगती है; दूर से सब आकर्षक और लुभावना महसूस होता है। 

वाक्य प्रयोग – लोग मुंबई और बेंगलुरु की बहुत तारीफ़ करते हैं, पर वहाँ जीवन कितना दूभर हो गया है कोई नहीं जानता। दूर के ढोल सुहावने ही लगते हैं। 

वाक्य प्रयोग – गांव के जीवन की सभी तारीफ करते हैं परन्तु वहां जीवन यापन  विचार दूर के ढोल सुहावने जैसा है।

वाक्य प्रयोग – रमेश ने सोचा था कि शेयर मार्केट में पैसा लगाकर वह जल्दी से अमीर बन जायेगा परन्तु अपनी बचीखुची संपत्ति गँवा बैठा क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। 

वाक्य प्रयोग – सिनेमा जगत की चकाचौंध देखकर लोग अभिनेता बनने का ख्वाब लेकर मुंबई चले जाते हैं लेकिन वहां नाम कमाने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है, दूर के ढोल हमेशा सुहाने ही लगते हैं।

वाक्य प्रयोग – रमेश का परिवार तो दूर के ढोल सुहावने जैसा है बाहर तो सभी सदस्य अपनापन दिखाते हैं लेकिन अंदर की बात कुछ और ही है।

वाक्य प्रयोग – बाबाजी के गुणों की चर्चा बाहर से आने वाले खूब करते हैं, लेकिन हम उनके बारे में अच्छी तरह जानते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। 

वाक्य प्रयोग – जब मैंने पिताजी से पर्वतारोहण की इच्छा प्रकट की तो वे बोले कि तुम्हें दूर के ढोल सुहावने लग रहे हैं, चढ़ाई चढ़ोगे तब मालूम पड़ेगा।

दूर के ढोल सुहावने होते हैं एक प्रसिद्ध मुहावरा या कहावत है जिसका अर्थ होता है– दूर की चीज़ अच्छी लगती है; दूर से सब आकर्षक और लुभावना महसूस होता है। दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, इसी प्रकार दूर से प्रत्येक वस्तु प्रिय लगती है परन्तु उसकी वास्तविकता तो पास जाकर देखने से ही पता चलती है। 

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