ढोल की पोल होना मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग

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ढोल की पोल होना मुहावरे का अर्थ और वाक्य प्रयोग

ढोल की पोल होना मुहावरे का अर्थ होता है– बाह्य दिखावा परन्तु भीतर खोखलापन; केवल ऊपरी दिखावा, थोथा या सारहीन; नकली या बाहरी ढोंग। 

वाक्य प्रयोग – वर्तमान समय के राजनेता सत्यनिष्ठा का आवरण ओढ़कर जनता को मूर्ख बनाते रहते हैं। ऐसे नेताओं के प्रति जनता अब जागरूक हो गई है। उन्हें पता है कि इनका यह व्यवहार ढोल की पोल की तरह है।

वाक्य प्रयोग – इन नेताओं की बनावटी बातों से प्रभावित मत होना, सब ढोल में पोल है। चुनाव के बाद ये झाँकने भी नहीं आएंगे। 

वाक्य प्रयोग – कवि जी हिंदीप्रेम ढोल के भीतर पोल के रूप में सिद्ध हुआ, जब यह सूचना मिली कि कंसलजी के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ने जाते हैं।

वाक्य प्रयोग – अजय बहुत बड़ा पहलवान बना फिरता था लेकिन अखाड़े में कुश्ती की नाम  वह डरकर कांपने लगा इस तरह उसकी ढ़ोल की पोल खुल गई है ।

वाक्य प्रयोग – आजकल राजनतिक पार्टियों का चुनावी घोषणा पत्र ढ़ोल की पोल के सिवाय कुछ नहीं है। पढ़ने में तो बड़ा अच्छा लगता है परन्तु धरातल पर कभी नहीं आता। 

वाक्य प्रयोग – गुप्ता जी दूसरों के बच्चों को पढ़ाई करने का उपदेश दिया करते थे परन्तु जब रिजल्ट आया तो उनका अपना लड़का ही गणित में फेल हो गया। उनकी हालत तो ढ़ोल में पोल वाली हो गयी।

वाक्य प्रयोग – इस स्कूल की सिर्फ इमारत बड़ी है, बच्चों का परीक्षा परिणाम देखोगे तो ढ़ोल की पोल खुल जाएगी।

ढोल की पोल होना एक प्रचलित मुहावरा या लोकोक्ति है जिसका अर्थ होता है– बाह्य दिखावा परन्तु भीतर खोखलापन; केवल ऊपरी दिखावा, थोथा या सारहीन; नकली या बाहरी ढोंग। जब कोई व्यक्ति बहुत अधिक दिखावा करता है परन्तु उसकी वास्तविकता पृथक होती है तो इस मुहावरे का प्रयोग करते हैं।  

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