भारत में जनजातियों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है।

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भारत में जनजातियों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है।

भारत की जनजातियों का वर्गीकरण दो आधार पर किया गया है (1) भारत की जनजातियों का भौगोलिक वर्गीकरण (2) भारतीय जनजातियों का प्रजातीय वर्गीकरण 

भारत की जनजातियों का भौगोलिक वर्गीकरण 

  1. दक्षिण क्षेत्र की जनजातियां 
  2. उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की जनजातियां  
  3. मध्यवर्ती क्षेत्र की जनजातियां 

1. दक्षिण क्षेत्र की जनजातियां - इसके अन्तर्गत मैसूर, हैदराबाद, ट्रावनकोर कर्ण, आन्ध्र और मद्रास, कुर्ग, कोचीन आते हैं। इन क्षेत्र की प्रमुख जनजातियाँ कोटा, कीडा, कादर, मालायन, इरुला, उराली, पुलयन आदि हैं।

2. उत्तरी तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की जनजातियां - इसके अन्तर्गत पूर्वी पंजाब, पूर्वी कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी उत्तर प्रदेश और असम के पहाड़ी प्रदेश सम्मिलित हैं। इस प्रदेश की प्रमुख जनजातियाँ खम्बा, गद्दी गुरार, लहोला, कनौटा, भेटिया, जानसारा, नागा, थारू, राभा, कूकी, कचाटी खासी आदि हैं।

3. मध्यवर्ती क्षेत्र की जनजातियां - इसके अन्तर्गत बंगाल, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, बिहार, दक्षिणी राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तरीय मुंबई सम्मिलित हैं। इन प्रदेशों की प्रमुख जनजातियाँ संथाल, हो, उराव खरिया, बिरहोर, बैगा गोंड, कोरवा, कोटा, कोल, सुन्डा भील आदि हैं। 

भारतीय जनजातियों का प्रजातीय वर्गीकरण

डॉ. बी. एस. गहा का कथन है कि भारतीय 'जनजातियों में चार प्रारूप पाये जाते हैं जो निम्नलिखित हैं -

  1. बौना कद, काला रंग, काफी धुंघराले बाल वाला नार्डिक पुरुष, कादर तथा पुलयन जनजाति में अब भी पाये जाते हैं।
  2. लम्बा तथा कुछ ऊँचा सर, छोटा कद, चौड़ा और छोटा चेहरा, मुँह आगे की ओर उठा हआ. छोटी चपटी नाक पहले प्रारूप के प्रमुख शारीरिक लक्षण हैं।
  3. तीसरा प्रारूप चौड़े सिर वाले मंगोल प्रजातियाँ हैं, जिसके सदस्य आसाम तथा वर्मा में पाये जाते हैं।
  4. चौथा प्रारूप भी मंगोल प्रजाति तत्व का है, पर इनमें तीसरे प्रारूप से मंझोले कद, ऊँचे सिर और बीच की नाक के आधार पर भेद किया जा सकता है।

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