भारतीय जनजातियों की समस्याओं की विवेचना कीजिए।

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भारतीय जनजातियों की समस्याओं की विवेचना कीजिए।

    भारतीय जनजातियों की समस्याओं को दो प्रकार से समझा जा सकता है (1) भारतीय जनजातियों की आर्थिक समस्याएं, (2) भारतीय जनजातियों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं।

    भारतीय जनजातियों की आर्थिक समस्याएं

    1. कृषि की समस्या
    2. जंगल की समस्या
    3. भूमि की समस्या
    4. ऋणग्रस्तता की समस्या

    1. कृषि की समस्या - जनजातियों द्वारा पूर्व से ही स्थानान्तरण खेती की जाती रही है। स्थानान्तरण खेती का आशय एक स्थान पर एक निश्चित समय तक ही रहकर खेती करने से है। अधिकांशतः एक स्थान पर दो या तीन बार खेती करने के पश्चात जैसे ही जमीन से उत्पादन कम हान लगता है तो उस स्थान को छोडकर किसी अन्य स्थान पर कृषि की जाती है।

    2. जंगल की समस्या - पहले जंगलों पर जनजातियों का अधिकार था, जिससे वह लकड़ियो को काटकर व अन्य साधनों से अपना जीवन-यापन करते थे. किन्तु नवीन कानूनों के अनुसार जगल पर सरकार का अधिकार हो गया, जिससे इनका जीवन-यापन करना और भी मुश्किल हो गया।

    3. भूमि की समस्या - पहले भूमि पर जनजातियों का स्वतन्त्र अधिकार था और वे जहाँ चाहती थीं वहाँ भूमि पर अधिकार करके खेती कर सकती थीं. किन्तु नवीन कानून के अनुसार उनके इस अधिकार पर रोक लगा दी गई, जिसके कारण इनका जीवन-यापन करना और भी मुश्किल हो गया।

    4. अर्थव्यवस्था तथा ऋणग्रस्तता की समस्या - पूर्व में जनजातीय समाजों में अर्थव्यस्था का प्रमुख आधार वस्तु-विनिमय था इनसे धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था का प्रचलन बढ़ता गया जिसका प्रमुख लाभ व्यापारियों, साहूकारों व सूदखोरों को मिला। 

    भारतीय जनजातियों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं 

    एक स्वस्थ व्यक्ति अपने जीवन में उन्नति कर सकता है ऐसी, संस्था जबकि एक अस्वस्थ व्यक्ति किसी लायक नहीं होता है। इस प्रकार स्वास्थ्य जीवन की एक अमूल्य निधि है। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का जन्म निम्न कारकों से हो सकता है - अशिक्षा, अज्ञानता, अन्धविश्वास, परम्परागत मान्यताएँ, निर्धनता, आहार एवं भाग्यवादिता आदि। एक तो जनजातीय क्षेत्रों में चिकित्सा व्यवस्था का अभाव पाया जाता है और यदि कुछ स्थानों पर चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध भी है तो ये लोग अपनी निर्धनता के कारण अपना समुचित इलाज नहीं करा पाते हैं इसके अतिरिक्त कुछ जनजातीय समाज अन्धविश्वासों के चक्कर में फंसे होने के कारण जड़ी-बूटियों पर ही विश्वास करते हैं। जनजातीय लोगों में अनेक चर्मरोग, पीलिया, मलेरिया, चेचक व गुप्तांगों की बीमारियाँ पायी जाती हैं और उचित स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में बीमारियाँ विकराल रूप धारण कर लेती हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों से यह ज्ञात होता है कि 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण की अधिक दर पायी जाती है। पेचिस, अतिसार, चर्मरोग, आँख की बीमारियाँ, श्वांस की बीमारी एवं कुकुर खाँसी जैसे आम रोग अधिक पाये जाते हैं।

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