कुलीन विवाह का अर्थ और नियम

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कुलीन विवाह का अर्थ और नियम

    कुलीन विवाह का अर्थ

    कुलीन विवाह - जब उच्च जाति, कुल या वर्ग का युवक अपने समकक्ष कुल या , निम्न जाति, कुल या वर्ण की युवती से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करता है, तो ऐसे विवाह को कुलीन या अनुलोम विवाह कहा जाता है। युवतियों के सन्दर्भ में कुलीन विवाह वह प्रथा है जो कि लड़की को अपनी ही जाति या उप जाति में अपने से बराबर या ऊँचे कुलों में विवाह करने की आज्ञा देती है ।

    कुलीन विवाह का अर्थ और नियम

    कुलीन विवाह के प्रमुख नियम 

    1. कुलीन विवाह का पहला नियम यह है कि लड़का जिस लड़की से विवाह करेगा वह उससे निम्न जाति, कुल या वर्ण की होगी।

    2. कुलीन विवाह का दूसरा नियम यह है कि इसके अन्तर्गत ब्राह्मण चार विवाह (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की कन्या से), क्षत्रिय को तीन विवाह (क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की कन्या से), वैश्य को दो विवाह (वैश्य एवं शूद्र की कन्या से) तथा शूद्र को केवल एक विवाह (शूद्र की कन्या से) करने की अनुमति प्रदान की गयी है।

    3. ऐसे विवाह से उत्पन्न सन्तान को मनु ‘पार्षव' की संज्ञा देते हैं तथा उसे सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं होता है।

    4. ऐसे विवाह में कोई युवक अपने से उच्च जाति, कुल या वर्ण की कन्या से विवाह नहीं कर सकता है।

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