मुस्लिम विवाह पर निबंध - Essay on Muslim Marriage in Hindi

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मुस्लिम विवाह पर निबंध - Essay on Muslim Marriage in Hindi

मुस्लिम विवाह पर निबंध - Essay on Muslim Marriage in Hindi

मुस्लिम विवाह पर निबंध

मुस्लिम विवाह पर निबंध : मुस्लिम विवाह को 'निकाह' कहा जाता है। हिन्दू विवाह से भिन्न मुस्लिम विवाह एक धार्मिक संस्कार न होकर एक समझौता होता है जिसका उद्देश्य बच्चे पैदा करना व उन्हें वैधता प्रदान करना होता है। परन्तु व्यवहारिक स्तर पर भारत में मुस्लिम विवाह भी एक धार्मिक कृत्य माना जाता है। भारत में विवाह की रस्म हिन्दू तथा मुसलमानों दोनों समुदायों में दुल्हन के घर पर ही करने की प्रथा है। एक क्षेत्र के हिन्दुओं तथा मुसलमानों में कई प्रथायें समान रूप से मानी जाती हैं। उदाहरण के लिए केरल के मोपला मुसलमानों में 'कल्याणम' नामक हिन्दू कर्मकाण्ड पारंपरिक निकाह का आवश्यक अंग माना जाता है। चचेरे भाई बहनों का विवाह मुसलमानों में पसंदीदा विवाह माना जाता है। पुनर्विवाह मुस्लिम समुदाय में निषिद्ध नहीं है। 

डी. एफ. मुल्ला ने लिखा है : 'विवाह (निकाह) एक समझौते के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसका उद्देश्य बच्चों को जन्म देना व उन्हें वैधता प्रदान करना है।

इस्लामी समाज में ब्रहमचर्य जीवन को अप्रिय ठहराकर इन्हे विवाह (निकाह) करने का आदेश दिया गया है

(कुरान 24ः32) पैगम्बर मोहम्मद साहब ने हदीस में भी निकाह करने का आदेश दिया है। मोहम्मद साहब ने कहा है कि निकाह मेरी सुन्नत (तरीका) है, जो मेरी सुन्नत से कतराता है वह हम में से नहीं है।

पत्नी के अधिकार व कर्तव्य विवाह से पत्नी को अनेक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं तथा इनके बदले में उसे कुछ कर्तव्य भी निभाने पड़ते हैं।

इस्लाम में पत्नी के कर्तव्य

(1) पति के यहां सदाचरण वाली होनी चाहिए। 
(2) पति के प्रति वफादार होने के साथ-साथ उसे आज्ञाकारिणी होना चाहिए। 
(3) यदि धाय न हो तो बच्चे को दूध पिलाना। 
(4) पति के तलाक व मृत्यु के समय इद्दत का पालन । इद्दत तीन माह का वह समय है जब तलाक के बाद सहवास नहीं किया जाता। इसका आशय यह जानना है कि कहीं स्त्री गर्भवती तो नहीं हैं।

इस्लाम में पत्नी के अधिकार

(1) मेहर लेने का अधिकार 
(2) गजारे तथा मकान में रहने का अधिकार 
(3) खच-ए-पानदान 
(4) अन्य पत्नियों के साथ आदर पाने का अधिकार 
(5) बच्चों के भरण-पोषण का अधिकार। 

मुसलमानों में दो प्रकार के विवाहों का प्रचलन है - (1) निकाह (2) मुताह ।

मुस्लिम विवाह एक समझौता है

मुस्लिम विवाह एक समझौता है, कुछ विधि शास्त्रियों तथा न्यायाधीशों ने मुस्लिम विवाह (निकाह) को पूर्ण रूपेण एक सिविल संविदा माना है। सिविल संविदा मानने का कारण यह है कि इसमें संविदा के सभी आवश्यक लक्षण विद्यमान होते है। जैसे निकाह मे एक पक्षकार द्वारा प्रस्ताव होता है और दूसरे पक्षकार द्वारा स्वीकृत होना आवश्यक है। इसके अलावा शादी कभी भी स्वतंत्र सहमति के बिना नहीं हो सकती है और ऐसी सहमति प्रपीड़न  कपट अथवा असम्यक प्रभाव द्वारा नही प्राप्त होनी चाहिए। साथ में प्रतिफल के रूप में मेहर विद्यमान रहता है। यदि अवयस्को का विवाह संरक्षको द्वारा किया जाता है तो व्यस्क होने पर उसका निराकरण करने का अधिकार पक्षकारों के पास रहता है। यदि अनुबंध युक्तियुक्त और इस्लाम विधि के नीतियों के विरूद्ध न हो तो विधि द्वारा प्रवर्त नीय होगा। इसलिए मुस्लिम विवाह को संविदा कहा जाता है, संस्कार नहीं माना जाता है।

मुस्लिम विवाह की परिभाषा 

  1. सर रोलैण्ड विलसन के अनुसार - “मुस्लिम विवाह यौन सम्बन्ध को वैद्य करने तथा सन्तान उत्पन्न करने निमित्त संविदा है।”
  2. बैली ने लिखा है कि “मुस्लिम विवाह (निकाह) एक संविदा है जिसका उद्देश्य सम्भोग तथा सन्तानोत्पत्ति का अधिकार प्राप्त करना है।”
  3. हेदाया में वर्णित निकाह की परिभाषा मुस्लिम विधि के अनुसार निकाह स्त्री एवं पुरूष के बीच एक ऐसी संविदा है जिसका उद्देश्य उन दोनों के समागम (Sexual Intercourse) को वैधता प्रदान करना तथा सन्तान उत्पन्न करना है।
  4. अब्दुल कादिर बनाम सलीमा के वाद में विवाह की परिभाषा देते हुए न्यायाधीश महमूद ने कहा था “मुस्लिमों में विवाह शुद्ध रूप से एक सिविल समझौता है, यह कोई संस्कार नही है”।
  5. सबरूनिंशा बनाम सब्दू के वाद में न्यायाधीश मित्तर ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का निर्णय देते हुए मुस्लिम विवाह को विक्रय संविदा के सामान एक सिविल समझौता कहा है।

मुस्लिम विवाह एक समझौता तथा संस्कार दोनों

लेकिन दूसरी ओर कुछ विद्वानों ने मुस्लिम विवाह को संविदा और धार्मिक संस्कार दोनो माना है। अब्दुर रहीम ने लिखा है कि “विवाह (निकाह) की प्रकृति धार्मिक तथा सांस्कारिक दोनो प्रकार की है। डा0 जंग कहते है कि विवाह यद्यपि आवश्यक रूप से एकसमझौता है तथा समर्पण का कृत्य भी है। अनीश बेगम बनाम मुहम्मद इस्तफा के महत्वपूर्ण मामले में मुख्य न्यायाधीश सुलेमान ने निर्धारित किया है कि मुस्लिम विवाह एक सिविल संविदा और धार्मिक संस्कार दोनो हैं। शाेहरत सिंह बनाम जाफरी बेगम5के वाद में प्रिवी कौंसिल ने कहा है कि मुस्लिम विधि के अन्तर्गत विवाह (निकाह) एक धार्मिक संस्कार है, क्योंकि विवाह के समय कुरान की पवित्र आयते भी पढ़ी जाती हैं। इसलिए धार्मिक पक्ष इसमे शामिल हैं।

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर मुस्लिम विवाह संविदा के साथ ही संस्कार भी माना जाता है। ऐसा इसलिए भी कि विवाह जीवन की पवित्रता के लिए की जाती है तथा यह विक्रय संविदा से भिन्न होता है। संविदा में क्रेता और विक्रेता होते है। यदि संविदा का पालन नही होता है तो असंदत्त विक्रेता धारणा अधिकार का प्रयोग कर संविदा को रोक सकता है या निरस्त करवा कर माल का पुनः विक्रय कर सकता है जबकि विवाह की संविदा में असंदत्त पत्नी इस कारण की मेहर की धनराशि का आंशिक भुगतान नही हुआ हैं विवाह में पति के विरूद्ध तलाक नही प्राप्त कर सकती है या अन्य पुरूष के साथ नहीं रह सकती है। इसके अलावा संविदा सीमित अवधि के लिए हो सकता है लेकिन विवाह जीवन भर के लिए होती है, केवल मुता विवाह एक अपवाद हैं। इस प्रकार मुस्लिम विवाह संविदा होने के साथ ही धार्मिक संस्कार भी हैं।

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